मैं महाराष्ट्र से, मुंबई से डरने लगा था । कारण शनि देव (राज ठाकरे) ही थे ।
मैं महाराष्ट्र से, शनि शिंगणापुर से प्रेम करने लगा हूँ । कारण शनि देव ही हैं।
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मैं क्या हूँ? क्या सुनहली उषा में जो खो गया, वह तुहिन बिन्दु या बीत गयी जो तपती दुपहरी उसी का विचलित पल; या फिर जो धुँधुरा गयी है शाम अभी-अभी उसी की उदास छाया? मैं क्या हूँ? जो सम्मुख हो रही है इस अन्तर-आँगन में वही ध्वनि, या किसी सुदूर बहने वाली किसी निर्झर-नदी का अस्पष्ट नाद? मैं क्या हूँ? बार-बार कानों में जाने अनजाने गूँज उठने वाली किसी दूरागत संगीत की मूर्छित लरी या फिर जिस आकाश को निरख रहा हूँ लगातार,उस आकाश का एक तारा?
मैं क्या हूँ? जानना इतना आसान भी तो नहीं!
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राजा हरिश्चन्द्र के सत्यनिष्ठ-चरित्र पर आधारित नाटक
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आचार्य शंकर रचित सौन्दर्य लहरी का हिन्दी काव्य रूपांतर
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5 comments:
himanshu jee,
kamaal hai, ye thakre prakran par ek naya anlge de diya aapne, jaankaree achhe lagee aur andaaj bhee likhte rahein.
SIR aap ne such ko uske wastwik swroop me likha hai
sir aaj hum adhunik yug me jite hue bhi adim yug ke logo ki tarah rahte hai.EROM ABHISHEK (IT)BHU
लेकिन इस शनि को कोई नहीं कहेगा ... '' ....... तं नमामि शनैश्चरं .... '' !
I usually don’t leave remarks at blogs, but your post inspired me to comment on your blog. Thank you for sharing!
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निकष रखने वाले हैं आप....सो छिद्रान्वेषण और छुद्र-आलोचना से परे जो कहेंगे सिर आँखों पर। आपकी दुलराती, सहलाती, फटकारती टिप्पणियाँ इस रचनाकार को आत्मस्थ करेंगी। अग्रिम आभार।