20 नवम्बर 2008

काश ! मेरा मन

काश ! मेरा मन
सरकंडे की कलम- सा होता
जिसे छील-छाल कर,
बना कर
भावना की स्याही में डुबाकर
मैं लिखता
कुछ चिकने अक्षर -
मोतियों-से,
प्रेम के ।

4 comments:

शोभा ने कहा…

वाह बहुत सुन्दर।

नीरज गोस्वामी ने कहा…

लाजवाब भाव...एक दम नई सोच....भाई वाह..
नीरज

Tarun ने कहा…

इतने कम शब्दों में इतनी गहरी बात, नयी तरह की सोच नयी तरह की कविता।

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

इस टाइप की कविता के लिए मैंने शब्द चुना है --- 'कैप्सूल-पोएट्री' ... आभार ,,,

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