30 सितम्बर 2008

वजह बता रहा हूँ

कई बार ब्लॉग की जरूरत और गैर जरूरत को लेकर मित्रों से चर्चा हुई । हिन्दी भाषा में ब्लॉग लिखने को लेकर कई शंकाएँ हैं मित्रों के मन में जो मिटती ही नहीं । सबसे बड़ा सवाल उनके मन में मेरे ब्लॉगर बनने की जरूरत को लेकर था । उन्हें यह जल्दबाजी लगती थी की मैं औसत तकनीकी और कम्प्यूटर ज्ञान वाला आदमी जिसे ठीक ठीक कम्प्यूटर पर हिन्दी लिखने में भी परेशानी होती है, हिन्दी में ब्लॉग लिखने लगा। मैं उन्हें समझाता रहा और वे समझने से बचते रहे -
"चाहता तो बच सकता था
मगर कैसे बच सकता था
जो बचेगा
वो कैसे रचेगा ।" (श्रीकांत वर्मा )
मैं उन्हें कैसे बताता की मैं जिस पर चला हूँ वह कुछ अजानी है, पर मेरी अपनी चुनी हुई खालिश अपनी राय। कब तक सुनता रहूँगा मैं अपनी रचनाओं को रचने के मंत्र विधान, तुम्हारे फतवे। कैसे कहूं मैं कि इन रचनाओं का आग्रह जमीनी तौर पर ख़ुद का आग्रह है, आयातित नहीं। यह रचनाएँ स्वतः-स्फूर्त संवेदनाओं का प्रतिफलन हैं। तो जरूरी नहीं कि ये हर उस परिपाटी पर चलें ही जिस पर चला है जमाना या फिर तुम। मित्रों के ये कथन क्यों न झूठे हो जाएँ कि इन्टरनेट का पाठक वर्ग गंभीर नहीं और न ही इन्टरनेट पर लिखने वाला लेखक या रचने वाला रचनाकार। मैं यह भी कैसे कहूं कि मैं उस संपूर्ण लेखकीय एवं पाठकीय गरिमा के साथ इस यात्रा के लिए आ खड़ा हुआ हूँ। यदि तकनीक एवं संसाधन नहीं हैं तो भी विकास कि संभावना तो कहीं नहीं गयी। यदि हिन्दी में लिखना हास्यास्पद है तो भी क्या दिन नहीं बदलेंगे? और यदि मैं रुक भी गया तो क्या वक्त रुक सकेगा?  सच कह रहा हूँ मैं कि आइना बनकर दूसरे को अपने को सवारने का मौका देने सच चल हूँ इस राह पर। और यदि अब नहीं तो कब?

पीपे का पुल


अपने बारे में कहने के लिए चलूँ तो यह पीपे का पुल मेरे जेहन में उतर आता है। गंगा बनारस में बड़ी चुहल करती हुई मालूम पड़ती हैं। गंगा लहरों की गति के साथ जीवन की गति संगति बैठाती है । गंगा के तटीय क्षेत्र गंगा के आश्वासन पर जीते हैं, लहरों की मनुहार पर उनके अस्तित्व का परवार छलक-छलक सा जाता मालूम पड़ता है। पीपे के यह पुल गंगा की गोद में झूला झूलते गंगा से लोक का नाता जोड़ते हैं। सहचरी गंगा हमारे रोम को सहलाने लगाती है। कंक्रीट के ऊंचे विशालकाय पुलों से लोक उतना नहीं जुड़ता जितना ये पीपे के पुल- लहराती हुई नदी पर लहराते हुए पुल- हमें हमारी थाती, हमारी गंगा से जोड़ते हैं। 

गाँव का लहरी मन गंगा की लहरों को इस लहराते हुए पुल से ही पार कर लेना चाहता है। यह पुल पूँजी के उस दलदल से दूर आम आदमी की स्वाभाविक जिंदगी के पैरोकार मालूम पड़ते हैं। कितना साफ अक्स दिखता है इस पुल में आम आदमी का। न जाने कितनी कड़ियों को जोड़ कर बनता है पुल पीपे का- रस्सियों के सहारे, और न जाने कितने ऐसे ही नियति-सम्भाव्यों से निर्मित होता है आम आदमी। पुल का उठना गिरना गंगा की लहरों की क्रीडाएं हैं और उठते, गिरते, लहराते इस पुल का बने, टिके रहना गंगा की इच्छा। गंगा का तनिक भ्रू-भंग इस पुल के अस्तित्व का नष्ट होना है। बहुत अलग नहीं है एक आदमी का वजूद । नियति की लहरों पे अठखेलियाँ करता न जाने कितनों का ह्रदय सूत्र क्षण में ही टूट कर नष्ट हो जाता है। मैं क्या कहूं अपने लिए । अज्ञेय की कविता की तरह- "मैं सेतु हूँ "।

25 सितम्बर 2008

बिन बोले

अब लिख रहा हूँ इसलिए ये चाह बढ़ गयी है कि मेरी इस छोटी सी कही के लिए आप कुछ कहें। मैं जानता हूँ कि रोज ब रोज लिखने से हौसला बढ़ता जाएगा और मैं कहूँगा कुछ ऐसा जिसकी जरूरत होगी इस दुनिया को। पर इसका एहसास जरूरी है कि मैं लिख सकता हूँ कुछ ऐसा कि वो आपकी फुरसत के कुछ पल चुरा सके। बहुत पहले जब अपने को तलाश रहा था एक कविता लिखी थी- कुछ रूमानी- कसक और घबराहट की कविता। शब्द जुटाने आते थे और उस जुटान को मैं कविता कह दिया करता था या कहूं दोस्त कह दिया करते थे। हिन्दी का विद्यार्थी था इसलिए ये एक कर्तव्य-सा मालूम पड़ता था । विद्यालय-विश्वविद्यालय में तो रोमांटिक कवियों को ही पढाने का फैशन है। तो लो मैं भी हो गया कवि और लिख मारी कविता। कविता कुछ यूँ थी-

बोलो कैसे रह जाते हो तुम बिन बोले

बोलो कैसे रह जाते हो तुम बिन बोले
जब कोई प्रेमी द्वार तुम्हारे आकर तेरा ह्रदय टटोले।

जब भी कोई पथिक हांफता तेरे दरवाजे पर आए
तेरे हृदय शिखर पर अपनी प्रेम पताका फहराए,
जब भी आतुर हो क्षण-क्षण कोई विह्वल मन डोले-
बोलो कैसे रह जाते हो तुम बिन बोले॥

जब भी कोई तुम्हे समर्पित तुमको व्याकुल कर जाता है
तेरे मन की अखिल शान्ति में करुण वेदना भर जाता है ,
जब भी कोई हेतु तुम्हारे हो करुणार्द्र नयन भर रो ले-
बोलो कैसे रह जाते हो तुम बिन बोले॥

24 सितम्बर 2008

उस भीड़ से इस भीड़ में

क्या कहूँ की कविता ने लुभाया बहुत और लिखने की ताब भी पैदा की, पर लिखने की रौ में मैं यह भूल गया कविता अगर आज की साज़िश का हिस्सा नहीं बनती तो वो कविता नहीं बनती । साहित्य के नये मौसम का हाल मुझ नये मुसाफिर को समझना था , पर मैं यहाँ भी असफल था । हार कर छूट गयी कविता और लिखने का हौसला भी । ज़रूरी भी था क्योंकि शुरुआत कच्ची थी और उमर भी कच्ची । दुर्घटना हो गयी कविता के साथ ।

कभी-कभी कहीं दूर से आती हुई एक मद्धिम सी रोशनी मन में आस जगा जाती है । बस पढ़ते-पढ़ते एक ख़ालीपन के बीच 'हिन्दुस्तान' में रवीश कुमार की ब्लॉग-वार्ता से भेंट हो गयी । अपने एक कंप्यूटर-फ्रेंड्ली मित्र से ब्लॉग के बाए में कुछ जाना और सम्मोहित सा रवीश जी के बारे में सोचने लगा । मुझे लिखने की प्यास फिर से महसूस होने लगी । अभी तक मैने अपने रिज़ल्ट देख कर इंटरनेट का मतलब समझा था (मेरे कस्बे के अधिकांश जन इंटरनेट को रिजल्ट देखने का साधन ही तो समझते हैं )- खालिस आम भारतीय की तरह । पर एक और गवाक्ष खुल रहा  था मेरे सामने  । एक पुराना कंप्यूटर और बीएसएनएल के ब्रॉडबॅंड को साथ ले मैने 'नई सड़क' पर चलने का निश्चय किया । कंप्यूटर अभी सीख रहा हूँ । अपनी इस पहली ना-मालूम लिखावट के लिए रविश जी की ब्लॉग वार्ता का बड़ा कर्ज़दार हूँ मैं ।

अब ढंग से लिखने की कोशिश करूँगा, कि 'नई सड़क' का एक अच्छा  मुसाफिर सिद्ध हो सकूँ ।  अब बाद में ।
 

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