30 नवम्बर 2008

उत्तर अपना औरों से पूछा

प्रश्न स्वयं का उत्तर अपना
औरों से पूछा,
अपने मधु का स्वाद
लुटेरे भौरों से पूछा ।

जाना जहाँ जहाँ से आया
याद नहीं वह घर ,
माटी का ही रहा घरौंदा
रचता जीवन भर -
भोज-रसास्वादन कूकर के
कौरों से पूछा ।

मूर्छा ही है पाप, जान भी
मूंदे रहा नयन ,
जड़ सूखी रह गयी
पत्र पर छिड़क रहा जलकण -
जग में सही ग़लत का ब्यौरा
बौरों से पूछा ।

झिलमिल प्राणों में न बांसुरी
बजी न हुई पुलक,
क्या जीना जीवन में उसकी
मिलीं न कभी झलक -
होश कहाँ है ,बेहोशी के
दौरों से पूछा ।

29 नवम्बर 2008

आतंकवाद : 'खून में कलमें डूबोने का ज़माना आ गया है'

भारत की साझी विरासत को लेकर बड़ा चिंतनशील हो चला हूँ । भारत की यह साझी विरासत सम्प्रदायवाद और आतंकवाद के साझे में चली गयी है। कभीं सम्प्रदायवाद बहकता है और किसी न किसी धर्म,सम्प्रदाय के कन्धों पर कट्टरता व धर्मांतरण की बंदूकें रखकर हमारी सांस्कृतिक एकरूपता, सहिष्णुता और सह-अस्तित्व को चुनौती देने लगता है, तो कभीं आतंकवाद सनक कर हमारी सामाजिक एकरसता, समन्वय और मानवीयता को कलंकित कराने का दुष्चक्र रचता है।

साम्प्रदायिकता और आतंकवाद-बहुतों ने कहा- अब दो नहीं रहे। बहुत पहले से लेकर कुछ दिनों पहले तक आतंकवाद केवल आतंकवाद था, अब वह 'हिंदू' और 'मुस्लिम' आतंकवाद हो गया है । हमने आतंकवाद को अभी तक विशेषीकृत नहीं किया था -अब कर दिया । हम अवधारणाओं को बनाने मिटाने के आदी हैं । हमने हिंदू और मुस्लिम आतंकवाद की नयी अवधारणा की प्रतिष्ठा कर दी है, और इसके सापेक्ष्य साम्प्रदायिकता की अवधारणा में बहुत कुछ संशोधन कर दिया है ।
अभीं कुछ दिनों पहले तक मैं केवल आतंकवाद के बारे में सोचता था , क्योंकि कुल मिलाकर भारत की धर्मनिरपेक्ष अंतर्शक्ति पर मुझे सदा का विश्वास है । भारत की साझी संस्कृति और विरासत मुझे गर्वोन्नत करते हैं। गंगा-जमुनी तहजीब का हरकारा हर साम्प्रदायिक घटना के बाद मुझे समझाने चला आता है । मैं बहल जाता हूँ यह सोचकर कि मेरे कस्बे में, मेरे आसपास तो हर व्यक्ति हिंदू,मुस्लिम,सिख, नहीं कहता अपने आपको । वह आदमी, इंसान है हर वक्त - साँसों में एक, तकलीफ में एक, खुशी में साथ। तो फ़िर कैसे केवल सम्प्रदाय के नाम पर कोई किसी का खून कर सकता है, किसी की जान ले सकता है ! इसलिए साम्प्रदायिकता मुझे भारतीय राजनैतिक चहरे का क्रूर परिहास समझ में आती है , कुछ और नहीं । हिंदू वोटों के लिए मुसलमानों के खिलाफ जहर उगलना और मुस्लिम वोटों की खातिर मुसलमानों की असुरक्षा व उग्र हिन्दुवाद की दुहाई देना - सब वोटों की राजनीति है ।

वोट की इस राजनीति, दुष्प्रवृत्ति ने अतिरेकी समाज का निर्माण किया है । इस राजनीति ने धर्म, सम्प्रदाय का दामन पकड़ लिया है और कट्टरता-धर्मान्धता की घुट्टी पिलाकर हमारे जनमानस का शील हर लिया है । सम्प्रदायवाद की इसी प्रायोजित संकल्पना से उपजा है आत्तंकवाद । राजनीति है आतंक- आतंक का पदचिन्ह ।

अगर आप यह सोच रहे हैं कि यह आतंकवाद किसी विशेष समुदाय के विशेष हित की पूर्ति या किसी के लिए जिद पूर्वक व्यवस्था के अतिक्रमण की प्रवृत्ति का परिणाम है, या यह किसी विशेष धर्म (इस्लाम या हिंदू) से प्रसरित, प्रवाहित है तो ग़लत सोच रहे हैं आप; क्योंकि इन्हीं धर्मों ने कुछ समय पहले तक ऐसी नृशंसहत्याओं की प्रेरणा नहीं दी थी । तो निश्चय ही यह आतंकवाद हमारे विचारों की निष्कृति है । यह विचार किसने पैदा किए - उन्होंने जो सामर्थ्यवान हैं, उन्होंने जो व्यवस्था के केन्द्र में हैं, उन्होंने जो अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के उपकरण ढूंढ रहे हैं, उन्होंने जो सत्ता की चारदीवारी के भीतर हैं और किसी भांति वहाँ से बाहर निकलना नहीं चाहते, या उन्होंने जो कट्टरपंथी रास्ते से व्यवस्था में हस्तक्षेप करने की अभिलाषा रखते हैं कि वे भी उस व्यवस्था के अंग हो जाएँ ।

सच कहूं तो मुंबई की वर्तमान घटना के बाद आतंकवाद या आतंकवादी से लड़ाई करने का जी नहीं चाहता । असली लड़ाई तो उस विचार से है जो केन्द्र में है उस भावना के जो एक कल्पित , अनिश्चित लक्ष्य के लिए जान की परवाह करने से रोकती है । 'आत्मघात' का सम्मोहन दे देने वाली इस वैचारिक प्रतिबद्धता से लड़ना है हमें । हमें हिंदू से नहीं लड़ना ; हमें हिंदुत्व की ग़लत शिनाख्त देने वाली कट्टर विचारधारा से लड़ना है । हमें मुसलमान से भी नहीं लड़ना; हमें इस्लामियत की उस काल्पनिक प्रतिबद्ध मनोदशा से लड़ना है जो मानवीय जीवन की अवहेलना करती है, और अपनी विचारधारा के विस्तार के लिए जन-जन में महत्वाकांक्षा के बीज बोती है ।

कैसे होगी यह लड़ाई ? चिंतन करना होगा हमें ? पर तत्क्षण मन में 'अकबर इलाहाबादी' कौंध जाते हैं -
"वक्त की तकदीर स्याही से लिखी जाती नहीं है
खून में कलमें डुबोने का ज़माना आ गया है । "

28 नवम्बर 2008

शोक, शोक, शोक, शोक, शोक


चाहता था न रोऊँ - पर हार कर अब, शोक..

मत पूछना वही प्रश्न

अगर कभी ऐसा हो
कि कहीं मिल जाओ तुम
तो पूछने मत लगना
वही अबूझे, अव्यक्त प्रश्न
अपने नेत्रों से
क्योंकि मेरी चुप्पी
फ़िर तोड़ देगी,
व्यथित कर देगी तुम्हें
और तब मैं भी
खंड-खंड हो जाऊंगा
अपने उत्तरों को समेटते-समेटते।

27 नवम्बर 2008

किस-किसका दूर करूँगा मैं, संदेह यहाँ जन-जन के ('बच्चन' के जन्म दिवस पर )

मधुशाला व बच्चन पर फतवे की आंच अभी धीमी नहीं पडी होगी । 'बच्चन' होते तो ऐसे फतवों के लिए कह डालते -

"मैं देख चुका जा मस्जिद में झुक-झुक मोमिन पढ़ते नमाज,
पर अपनी इस मधुशाला में पीता दीवानों का समाज ;
वह पुण्य कृत्या , यह पाप करमा, कह भी दूँ, तो दूँ क्या सबूत ;
कब कंचन मस्जिद पर बरसा, कब मदिरालय पर गिरी गाज ?

यह चिर अनादि से प्रश्न उठा मैं आज करूंगा क्या निर्णय
मिटटी का तन, मस्ती का मन, क्षण भर जीवन मेरा परिचय!"

यह 'क्षण भर जीवन' अपनी 'क्षणता' में विराटता का असीम सम्मोहन रखता है। निरंतर गतिशील संसृति में 'क्षण' की गहरी अनुभूति विराट के स्वरुप में रूपांतरित हो जाती है । हरिवंश राय बच्चन की कविता ने न जाने कितने गवाक्ष झांके हैं, न जाने कितने फतवों का सामना किया है , न जाने कैसे कैसे आरोप झेले है ? फ़िर भी यह कविता - गीतात्मक कविता- कहीं ठहर नहीं गयी, सबको समझाती गयी -

"तीर पर कैसे रुकूं मैं , अज लहरों पर निमंत्रण। "

बच्चन हिन्दी कविता में नया रंग लेकर आए, गीतकार कवि के रूप में जनसाधारण के प्रिय बने, कवि सम्मेलनों से गीत को ऊंचाई दी और खादी बोली कविता को एक नया आयाम दे डाला। कविता छायावादी कल्पना के इन्द्रधनुषी आवरण को चीरकर जनसामान्य के बीच आ खड़ी हुई। कविता की सहज, सीधी सरल भाषा में जीवन और यौवन का उद्दाम आवेग भर गया । 'बच्चन के गीत लोकप्रिय, आरोपित व विवादित भी हुए । उन्हें 'शराब' और शराबी का हितचिन्तक मान लिया गया ।
पर यही तो साहित्य की 'खेचरी मुद्रा' है जो बच्चन के काव्य में प्रकट होती है। बच्चन की कविता संवेदना और अभिव्यक्ति दोनों दृष्टियों से कई मोडों से गुजरती है - कभीं छायावाद की रंगरची हो जाती है, कभीं निराशा व अवसाद के संकेत ग्रहण कराने लगती है, कभीं लोक-धुन की मनहर रागिनी से रागदीप्त हो जाती है तो कभीं युग की संपूर्ण चेतना को अंगीकृत करती मालूम पड़ती है । बच्चन ख़ुद स्वीकारते हैं -

"जहाँ खडा था कल उस थल पर आज नहीं
कल इसी जगह फ़िर पाना मुझको मुश्किल है "

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हरिवंश राय बच्चन
जन्म- २७ नवम्बर, १९०७ - इलाहाबाद । मातृभाषा- हिन्दी । शिक्षा- एम० ए० (इलाहाबाद), पीएच० डी०(कैम्ब्रिज)। व्यवसाय- प्राध्यापक, अंग्रेजी विभाग, इलाहाबाद वि०वि०, इलाहाबाद -१९४१-५२ व १९५४-५५; हिन्दी प्रोड्यूसर, आकाशवाणी, विशेषाधिकारी (हिन्दी), विदेश मंत्रालय - १९५५-५६ । पुरस्कार-सम्मान - पद्मभूषण, विद्यावाचस्पति, साहित्य अकादमी पुरस्कार, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार आदि । प्रमुख रचनाएं - मधुशाला, मधुकलश, निशा- निमंत्रण, एकांत संगीत, आकुल अन्तर , सतरंगिनी, प्रणय पत्रिका, त्रिभंगिमा, कटती प्रतिमाओं की आवाज, जाल समेटा ; क्या भूलूँ क्या याद करूँ, नीड़ का निर्माण फ़िर, बसेरे से दूर, दशद्वार से सोपान तक; प्रवास की डायरी, डब्ल्यू० बी० ईट्स एंड ओकल्टिज्म आदि ।
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आज बच्चन का जन्म दिवस है। आज के दिन कवि 'बच्चन' खूब याद आ रहे हैं एक ऐसे कवि के रूप में जिसने अतिबौद्धिकता के भ्रम जाल को तोड़कर जीवन के यथार्थ को भावना से संपृक्त किया, जिसने ह्रदय की संवेदनशीलता को स्वर दिया और जिसने अनुभूति और अभिव्यक्ति के मणिकांचन संयोग से कविता की शक्ति को नए रूप में परिभाषित करने की कोशिश की । बच्चन की यही कविता अगर संदेह के घेरे में आ जाय, फतवेबाजी का शिकार हो जाय तो बच्चन तो यही कहेंगे -

"किस-किसका दूर करूंगा मैं
संदेह यहाँ हैं जन-जन के । "

26 नवम्बर 2008

उड़ चली है आत्मा परमात्मा के पास

सच में 'मैना' ही नाम था उसका । मेरे पास अब केवल यादें शेष रह गयी हैं उसकी । छः बरस पहले अचानक ही लिख गयी थी यह कविता ।

आज मैना उड़ चली
पिता के घर से पिया के घर
गीलीं हो आयीं पिता के घर की दीवारें , चौखटे, फर्श और दरवाजे -
आंखों का पानी थमा ही कहाँ ?
और इस गीले फर्श पर फिसल फिसल कर
गिरने लगीं सारी यादें पिछले पल की ।
पिया के घर तो जैसे उजाला हो गया
उड़ने लगीं उस घर की आशाएं, आकांक्षाएं
और जाकर गिरीं उस बहू की गोद में ।
कट गए पंख उसके उत्साह के
सुनने लगी वह वैभव का वार्तालाप ।
***** ***** ***** *****
हाँथ से तोते उड़ गए जब देखा
इस भारतीय नारी का परमेश्वर भी रटता है वही जबान
जो रटते हैं सब -अतिरेकी, पराये, लोलुप ।
'लक्ष्मी' से लक्ष्मी की निराशा
उन्हें खाए जा रही है
लग गए हैं पंख वासना के,
प्रेम-विहग कहीं दूर अपने पर कटा कर छटपटा रहा है
और वह रह गयी है एक - एक ठूंठ-सी ।
***** ***** ***** *****
छूट गया है पिया का घर
और निकल आयी है वह रात के अंधेरे में ,
अब वह है अज्ञात के प्रति उत्साहित ।
बिछल रहे हैं स्मृति-पट पर कई विगत चित्र -
पिता-पिता का घर,पिया-पिया की देहरी,
पुत्री,बहू,गृहलक्ष्मी और निष्कासिता व प्रताडिता वह
विचार मग्न और आलम्ब-शून्य अभी अभी
जा गिरी है सड़क के किनारे - ऊपर से निकल गयी है एक गाड़ी,
कट गए हैं पंख उसकी चेतना के
उड़ गया है प्राण-पखेरु ।
***** ***** ***** *****
अभी अभी उड़े हैं गिद्धों के झुंड
सड़क के किनारे पडी लावारिश लाश का करने अन्तिम संस्कार,
कट गए हैं पंख मानवता के
उड़ चली है आत्मा परमात्मा के पास ।

24 नवम्बर 2008

हिन्दी ब्लॉग लेखन : विरुद्धों का सामंजस्य

हिन्दी ब्लॉग लेखन के कई अंतर्विरोधों में एक है सोद्देश्य, अर्थयुक्त एवं सार्वजनीन बन जाने की योग्यता रखने वाली प्रविष्टियों, और आत्ममुग्ध, किंचित निरुद्देश्य, छद्म प्रशंसा अपेक्षिता प्रविष्टियों का सह-अस्तित्व । सोद्देश्य, गहरी अर्थवत्ता के साथ लिखने वाला ब्लोगर अपनी समस्त रचनाधर्मिता के साथ बस लिख रहा होता है, बिना विचारे के परिणिति क्या है इस लेखन की। इस राह पर जिस पर वह चला है, अनंत राही हैं। अनगिन पद चापों से ध्वनित है यह ब्लागरी की राह । सोद्देश्य लिखने वाला 'शब्द' के लिए श्रद्धावनत है । उसके लिए शब्द नैवेद्य हैं - ऐसी वस्तु जिसके लिए अगाध श्रद्धा का ज्ञापन हो । तो फ़िर वह जो भी प्रस्तुत करता है - आस्था के साथ । और फ़िर भले ही पाता है एक छोटा सा हिस्सा प्रतिक्रिया के तौर पर, पर उसी में मुदित विभोर हो जाता है । वह कभी अनथक श्रम की दुहाई नहीं देता, अतिरंजना नहीं करता। सार्थक रचनाएँ कराने वाला यह नया अन्वेषी नयी तरकीब से साहित्य एवं सर्जना की सेवा करता है । वह देशी-विदेशी विचार-साहित्य को मथता है और उसका अमृत उदार भाव से प्रस्तुत कर देता है । यद्यपि उसका अन्वेषण देखकर कुछ लोग प्रशंसा करते है, कुछ लोग ईर्ष्या ।

साथ
ही गहरी गतिमयता के साथ लिखते है वे लोग भी, जिनके लिए शब्द कंकड़ की मानिंद हैं । वे विशाल शब्द जाल खडा करते हैं, बड़ी प्रविष्टियाँ देने की सामर्थ्य रखते हैं, पर अंगरेजी कवि 'पोप' की दृष्टि में उनके "शब्द पत्तियों के सदृश हैं और जब उनकी सर्वाधिक बहुलता होती है तो उनके नीचे बुद्धिमानी का फल कदाचित ही कभीं मिलता है "-
"Words are like leaves and where they most abound
much fruit of sense beneath is rarely found ."
आत्ममुग्ध, यांत्रिक चिट्ठे एक लंबा हिस्सा घेर लेते हैं। उनकी उपस्थिति से ही चिट्ठाजगत समृद्ध होता है । ये चिट्ठे ब्लॉग जगत की गति को समायोजित करते हैं । इन चिट्ठों की चौकडी भरती हुई गति ही इनका आकर्षण है। इनसे निर्मित होता है चिट्ठाजगत का एक बड़ा हिस्सा ।

ब्लॉग लेखन का यह अंतर्विरोध - कि सार्थक, मूल्यनिष्ठ लेखन करने वाले चिट्ठाकार एवं निरुद्देश्य, अवांछित, केवल मनोरंजन के लिए कलम चलाने वाले चिट्ठाकार - दोनों एक ही राह पर चलते हुए दिखायी पड़ते हैं, अत्यन्त रोचक है । अंतर्विरोध एवं उसका समन्वय रचना के संसार की विरल विशेषता है और वस्तुतः यही ब्लॉग-जगत की जीवन्तता एवं गतिशीलता का प्रमाण भी है ।
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खत्म करते-करते - सच में, मैं भी एक आत्म-मुग्ध साहित्य-अध्यवसायी हूँ एवं बहुत कुछ को (इस ब्लॉगरी को भी ) साहित्य-दृष्टि से देख सकने की आत्म-श्लाघा का शिकार मनुष्यअतः यहाँ मेरे इस चिट्ठे पर यदि इस प्रकार के लेख उपस्थित होते हैं, तो आश्चर्य क्या ? इत्यलम

मुझमें जो आनंद विरल है

मुझमें जो आनंद विरल है
वह तुमसे ही निःसृत था और तुम्हीं में जाकर खोया ।

घूमा करता हूँ हर पल, जीवन में प्रेम लिए निश्छल
कुछ रीता है, कुछ बीता है, झूठा है यह संसार सकल
यह चिंतन जो बहुत विकल है
वह तुझसे ही उलझा था और तुम्हीं से जाकर रोया ।

सच कहता हूँ वृक्ष बनेंगे मेरे अतल प्रेम के बीज
सच कहता हूँ आयेंगे इस छाया में हर प्रेमी रीझ
मेरा यह जो बीज सबल है
वह तुमसे ही पाया था और तुम्हीं में जाकर बोया ।

जो आंसू थे, हास बनेंगे और मगन हम नाचेंगे
और ढालेंगे सभी स्वप्न सच्चाई के सुधि सांचे में
जो मेरा यह विश्वास प्रबल है
वह तुझसे ही उपजा था औ' तुझमें ही जाकर संजोया।

22 नवम्बर 2008

नेह-स्वांग

उसने नेह-स्वांग रच कर
अपने सामीप्य का निमंत्रण दिया
नेह सामीप्य के क्षणों में
झूठा न रह सका
अपने खोल से बाहर आकर
नेह ने अपनी कलई खोली
दिखा वही गुनगुना-सा
निष्कवच, निःस्वांग विदेह नेह ।

क्षुधा की तृप्ति नेह की तृप्ति नहीं
साहचर्य का उन्माद नेह का विकसन नहीं
दृष्टि का प्रमाद हृदय का स्वाद नहीं
दृश्य का दृष्टान्त अस्तित्व का सत्य नहीं
सब अनमने पन के
निष्ठा में परिवर्तित होने का ऐन्द्रिक जाल है ।

स्वांग परिवर्तन नहीं
परिवर्तन का आभास है,
नेह सायास उपलब्धि नहीं
नेह की सृष्टि अनायास है।

प्रेम पत्रों का प्रेम पूर्ण काव्यानुवाद 2

प्रिय ! तुमने लिखा आँख भर आयी,
मैंने अपने दिन खोये और रात गंवाई ।

मेरी भाव भूमि के बदले
सच, तुमने ही पहले पहले संचित भाव कोष दे दिया,
'विंहसेगा मानस उर अन्तर'
प्रियतम ! तुमने ऐसा लिखकर मेरे मन को संतोष दे दिया;

मैं रोई मन का यह संशय
व्यर्थ विकल हो भ्रम है अतिशय, वह रुदन नहीं थी प्रीत तुम्हारी,
क्या वह कहा गए प्रिय भूल
आँसू में खिलते है फूल, यही प्रीति की रीति हमारी ;

जब कोई प्रेम सघन हो जाए
पर-निज प्रेम बीच खो जाए, सुधि में रहना कब आता है,
हो जाता जब विवश शब्द
और प्रेम छलकता है अनहद, वह आँसू बनकर बह जाता है;

अपने इस संबल से तुमने
प्राण ! विगत से मुक्ति दिलाई,
प्रिय !तुमने लिखा आँख भर आयी।

प्रेम पत्रों के प्रेम पूर्ण काव्यानुवाद: सभी प्रविष्टियाँ

  1. प्रेम पत्रों का प्रेम पूर्ण काव्यानुवाद 1
  2. प्रेम पत्रों का प्रेम पूर्ण काव्यानुवाद 2
  3. प्रेम पत्रों का प्रेम पूर्ण काव्यानुवाद 3
  4. प्रेम पत्रों का प्रेम पूर्ण काव्यानुवाद 4
  5. प्रेम पत्रों का प्रेम पूर्ण काव्यानुवाद 5
  6. प्रेम पत्रों का प्रेम पूर्ण काव्यानुवाद 6

20 नवम्बर 2008

काश ! मेरा मन

काश ! मेरा मन
सरकंडे की कलम- सा होता
जिसे छील-छाल कर,
बना कर
भावना की स्याही में डुबाकर
मैं लिखता
कुछ चिकने अक्षर -
मोतियों-से,
प्रेम के ।

रचना का स्वान्तःसुख, सर्वान्तःसुख भी है

बिना किसी बौद्धिक शास्त्रार्थ के प्रयोजन से लिखता हूँ अतः 'हारे को हरिनाम' की तरह हवा में मुक्का चला लेता हूँ, और अपनी बौद्धिक इमानदारी निभा लेता हूँ। स्वान्तःसुखाय रचना भी विमर्श के झमेले में पड़ जाय तो क्या करें । शास्त्री, शास्त्रार्थ के बाद शास्त्र की भी तो सुनें, स्वान्तः सुखाय क्या है शास्त्र की दृष्टि में?
उपनिषद कहता है -
"एको देवः सर्वभूतेषु गूढः,
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा
तं आत्मस्थं येनुपश्यन्ति धीराः
तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम ।"
जब वह (परमात्मा) सर्वभूतेषु गूढ़ है , सबमें छिपा है , सर्वव्यापी सर्व अंतरात्मा है तो उसके सुख के लिए किसी एक की मचलन सभी प्राणियों के सुख के लिए क्यों नहीं हो सकती ? एक की अंतरात्मा का सुख सबकी अंतरात्मा का सुख हो सकता है । परमात्मा ने अपने को लक्षित करते हुए अर्जुन से कहा था -
"अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूतेषु भारत । "(गीता)
तो जब वह परमसुख का सुख परमात्मा ही सबकी आत्मा है, सबका अंतःकरण है तो एक का स्वान्तःसुखाय अखिल जगत का स्वान्तःसुखाय क्यों नहीं हो सकता, हो सकता है ।

'स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा' की विनीत उद्घोषणा करने वाले तुलसी का स्वान्तःसुख जन जन का स्वान्तःसुख नहीं हो गया , तो क्या रचनाकार तुलसी को साहित्य स्रष्टा की बिरादरी से बहिष्कृत कर देंगे? लिखा गया , जन-जन को उस आस्वाद को देने की विकलता हुई और वह जगतव्यापी हो गया - कुछ ऐसी ही स्वान्तःसुखाय रचना होती है । आरोप तो यही है कि यदि स्वान्तः सुखाय रचना है तो फ़िर जन- जन को देने की विकलता क्यों हो गयी ? तो वस्तुतः वह स्वतः संभूत बाढ़ की तरह होती है जो किनारों को चूमती दुलराती बढ़ी चली जाती है; और न चाहते हुए भी 'वह आयी थी, और कुछ अप्रत्याशित देकर गयी' ऐसा सबको अनुभूत होता है -
"बाढ़ प्रगाढ़ छलक पुलिनों पर छाप छोड़ जाती है
कभी सिन्धु की गहराई भी साफ़ झलक जाती है ।" (जानकी वल्लभ शास्त्री)
अतः स्वान्तःसुखाय रचना सर्वान्तःसुखाय बन जाती है ।
बड़े विनीत भावः से कह रहा हूँ कि राम करें स्वान्तःसुखाय रचनाएँ ब्लॉग, इंटरनेट की प्रभूत संपत्ति बन जाँय जो हर दर्शक और आस्वादक को बिना इति अथ के रसानुभूति में डुबोती रहें ।

18 नवम्बर 2008

प्रेम पत्रों का प्रेम पूर्ण काव्यानुवाद 1

स्नातक कक्षा में पढ़ते हुए कई किस्म के प्रेम पत्र पढ़े । केवल अपने ही नहीं, दूसरों के भी । अपनी इच्छा से नहीं, दूसरों की इच्छा से । उनमें से कुछ ऐसे थे जिन्होंने बहुत भीतर तक अपनी पैठ बना ली। उस भाव को स्थाई प्रतीति देने के लिए मैंने उनके काव्यानुवाद का यत्न किया। पत्र दस या ग्यारह की संख्या में थे । मैंने क्रमशः उनका काव्यानुवाद कर दिया । यहाँ ये अनुवाद लिखना उन पत्रों के गोपन भावों के प्रकाशन का निंदा योग्य प्रयास न माना जाय । हृदय की गहरी अनुभूतियों से उपजी ये अभिव्यक्तियाँ मुझ जैसे कई लोगों की मनोवृत्तियों की वाहिका हैं । इन पत्रों की पढ़न को प्रेमी हृदयों के लिए साधु भाव माना जाय, ऐसी प्रार्थना है । मैं क्रमशः कुछ निश्चित अंतराल पर इन काव्य-पत्रों को लिखूंगा, भावित हृदय की अपेक्षा के साथ -

मेरे चिंतन के तार सो गए, अथ-इति दोनों एक हो गए ।

समझ खो गयी क्या कहना है
मुझको क्या चुप ही रहना है मन में हाहाकार मचा है,
जो मेरा था हुआ आपका
जो अब है वह दिया आपका फिर कहना क्या और बचा है;

मुझको कहना कब आता था
शब्द सदा से भरमाता था पर फ़िर भी विश्वास आपका,
ना जाने कितना मनमोहन
निज करुना का ही यह दोहन यह आग्रह-सा हास आपका;

मेरे उर में अभिव्यंजन के सजल आपने बीज बो दिए-
मेरे चिंतन के तार सो गए, अथ-इति दोनों एक हो गए ।

प्रेम पत्रों के प्रेम पूर्ण काव्यानुवाद: सभी प्रविष्टियाँ


मैं मच्छरदानी नहीं लगाता तो इसका मतलब है ...

मच्छरदानी लगाना मेरे कस्बे में
सुरक्षित सभ्य होने की निशानी है

मैं मच्छरदानी नहीं लगाता
तो इसका मतलब है
कि मैं हाईस्कूल की जीव विज्ञान की
पुस्तक का सबक भूल गया हूँ ,
निरा, निपट विस्मृति का शिकार मनुष्य हूँ

मैं मच्छरदानी नहीं लगाता
तो इसका मतलब है
कि मैं अज्ञ हूँ निरंतर हो रहे शोध एवं उनके परिणामों से
कि मच्छर का इलाज मच्छर नाशक नहीं,
मच्छरदानी हो सकती है

मैं मच्छरदानी नहीं लगाता
कि कैद कराने की जगह मच्छरों को,
यह कैद कर लेती है मुझे
तो इसका मतलब है
कि मैं साहित्य के अलंकारों से परिचित नहीं,
मैंने अन्योक्ति अलंकार का नाम नहीं सुना

मैं मच्छरदानी नहीं लगाता
कि "दुश्मन को भी सीने से लगाना नहीं भूले" जैसी
पंक्ति का अनुसरण कर सकूँ
तो इसका मतलब है
कि मुझे समय का यह सच नहीं मालूम कि
सुनने सुनाने वाली यह पंक्तियाँ सच नहीं हुआ करतीं

मैं मच्छरदानी नहीं लगाता
कि मच्छर को आजादी दूँ
स्वतंत्र विचरण एवं स्वतंत्र अभिव्यक्ति का
कि उसे लगे कि वतमान में हर एक तक उसकी पहुँच है
तो इसका मतलब है
कि मैं रूढ़ सिद्धांतों का कोरा अनुवादी, मनुवादी नहीं
पक्का जनवादी हूँ

16 नवम्बर 2008

मैं कुन्नू सिंह के 'कुन्नू ब्लॉग से अपना ताल्लुक नहीं बना पाता

"इस नजाकत का बुरा हो , वो भले हैं तो क्या ।
हाथ आयें तो उन्हें हाथ लगाये न बने ॥ " (ग़ालिब )
तकनीकी रूप से सिद्धहस्त हैं तो भी क्या ? अपनी नयी निराली प्रविष्टियों के लिए बहुप्रशंसित हैं तो भी क्या ? चिट्ठों की पहेलियों को खुल्लमखुल्ला करने का हुनर रखते हैं तो भी क्या ? समस्याएं बनाना, समस्याएं सुझाना और समस्यायें हल करना -सब आता है तो भी क्या ? पर मैं 'कुन्नू सिंह' के 'कुन्नू ब्लॉग' से अपना ताल्लुक नहीं बना पाता।

अभीं नया-नया ब्लागर हूँ। बहुत कुछ जानने, समझने की जिद है; ललक भी । 'ब्लागवाणी' पर टहलते हुए 'कुन्नू ब्लॉग' के शीर्षकों पर नजर पडी थी । पर इस ब्लॉग का जायका पहली बार 'हिन्दी ब्लॉग टिप्स' में इसके जिक्र से लिया । उत्सुकतावश इनके ब्लॉग की ओर कदम बढ़ाए - फिर ठिठक कर रह गया ।
'हिन्दी पट्टी का ब्लागर हूँ। हिन्दी से छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं होती। बहुत से हिन्दी भाषाविदों की अतृप्त आत्माएं मुझ क्षुद्रात्मा में तफरीह करती रहती हैं। 'कुन्नू ब्लॉग' की उपस्थिति से बेचैनी होती है । मैं नहीं जानता कुन्नू जी की भाषा का यह स्वरुप प्रायोजित है अथवा स्वाभाविक -(उदाहरण देखें )-

१-मेरा hindimaja.com हैक हूवा है। पर ईसमे कीसी और का कोई नूकशान नही होगा क्यो की दो मीनट मे सब ठीक कर दूंगाऔर अभी आप http://www.hindimaja.com/ पर जा के देख सकते हैं। ठीक कर लीया हूं।
आषीस जी को ध्नयवाद उनहोने मूझे बताया की मेरा साईट हैक हो गया है। पर ईसमे मेरी गलती है फ्री मे साईट देने वाले की नही।
और जीनहोने मेरे ईस साईट का लींक दिया है उनको कोई परेसानी नही होगी।
क्यो की hindimaja।com हैक हूवा है। /toplinks नही। और सीर्फ index ही हैक हूवा है।
२-क्या कंप्यूटर की गती तेज की जा सकती है?
अगर सही मे गती बढानी है तो यह आसान तरीका जीससे कोई नूकशान नही।
1. कोई फील्म हो जीसे आप देखते भी नही उसे डीलीट कर दें , गाने जो बेकर के पडे हों उनहे भी डीलीट कर दें।..............................आदि, आदि ।

मेरा अपना भाषा-भावित हृदय 'उत्तर प्रदेश' लोकेशन वाले इस दक्ष ब्लागर से कत्तई इत्तेफाक नहीं रखना चाहता(भाषा-शब्द प्रयोग को लेकर)।

मैं हैरान हूँ, हिन्दी ब्लागरों के मध्य इनकी स्वीकृति से । क्या कुल मिलाकर किसी साईट को हैक करने की तकनीक सिखा देना, कुछ उपयोगी टिप्स बता देना, फ्री के ब्लॉग टेम्पलेट्स डाउनलोड करने की सुविधा देना आदि ही इनकी हिन्दी ब्लागरों के मध्य उपस्थिति के कारण हैं ? हिन्दी के ब्लागरों को क्या हिन्दी के प्रयोग या उपयोग का ख्याल नहीं ? क्या तकनीकी जानकारी के लिए हिन्दी का अवांछित प्रयोग आपत्तिजनक नहीं ? हो सकता है, इस पर विचार हो चुका हो , पर हिन्दी भाषा में तकनीकी जानकारी प्रदान करने के नाम पर हिन्दी से ऐसी छेड़छाड़ और हिन्दी ब्लागरों का चुपचाप बैठ जाना- आश्चर्यजनक है।

मैं 'प्रथम' का फालोअर (follower) हूँ, आशीष जी की 'हिन्दी ब्लॉग टिप्स' को अपने ई-मेल खाते में पढ़ता हूँ - क्या इनमें तकनीकी जानकारी एवं नवीनतम ब्लॉग-युक्तियों का अभाव है ? नहीं । पर ये अपनी भाषा का तनाव कभी ढीला नहीं करते और न ही शब्दों, वर्तनियों से अपने को निस्पृह रखते हैं ।
हाँ, कुन्नू जी की अन्वेषणात्मक प्रतिभा का मैं कायल हूँ । बहुत कुछ ऐसा है जो केवल कुन्नू जी के ब्लॉग पर ही मिल सकता है । कुन्नू जी के लिए इतना तो मैं कह ही सकता हूँ -

"शर्त सलीका है हर एक अभ्र में
ऐब भी करने को हुनर चाहिए ॥" (मीर)

खामोशी हर प्रश्न का जवाब है

मुझे नहीं लगता

कि खामोशी जवाब नहीं देती।

मैं समझता हूँ

खामोशी एक तीर्थ है

जहाँ हर बुरा विचार

अपनी बुराई धो डालता है ।

ये हो सकता है की तीर्थ के रास्ते में

कठिनाइयों का अम्बार हो,

और इसीलिये हर खामोशी भी शायद

कई गम और निराशाओं का भण्डार हो

लेकिन अंत फिर भी श्रेयस्कर है-

तीर्थ या फ़िर खामोशी।

संस्कार, आचार

सही अर्थों में आत्मा का संचार

जिस तरह तीर्थ दिया करता है

खामोश विश्रब्द्ध एवं शांत,

बस उसी तरह खामोशी भी दिया करती है

हर अनसुलझे, सिमटे और सहमे

प्रश्नों का उत्तरान्त।

वस्तुतः खामोशी हर प्रश्न का जवाब है

और सौंदर्य भी ।

15 नवम्बर 2008

मुंह की कालिख को पोंछ उंगली से गाल का तिल बना दिया तुमने

क्या करिश्मा है इस बुझे दिल को, कितना खुशदिल बना दिया तुमने
अब तो मुश्किल को भी मुश्किल कहना, बहुत मुश्किल बना दिया तुमने।

पाँव इस दर पै आ ठिठक जाते, हाँथ उठते भी तो सलीके से
आँख नम, क्या कहूं कि किन-किन को कितना बोझिल बना दिया तुमने।

रात दिन था तलाशता फिरता, नाव को कौन ठांव बाँधूं मैं
अब तो दरिया की मौज ही सच में, मेरी मंजिल बना दिया तुमने ।

इस हुनर में भी इतने माहिर हो इसका था तनिक भी न अंदाजा
मुंह की कालिख को पोंछ उंगली से गाल का तिल बना दिया तुमने ।

पाँव हारे थके मुसाफिर के धो के, जब दर्द पी गया उनका
मन को बुलबुल,जुबान को कोयल,दिल को हारिल बना दिया तुमने।

बात इतनी नहीं थी हल्की जो, बात ही बात में निबट जाती
लाख करता रहा गुणा-भागा, शून्य हासिल बना दिया तुमने ।

आज तक राज यह न खुल पाया, तुम हमारे कि हम तुम्हारे हैं
कुछ भी रहने दिया नहीं निर्मल, सब को पंकिल बना दिया तुमने।

14 नवम्बर 2008

वास्तविक अन्तिम उपलब्धि

मैं चला था जिंदगी के रास्ते पर

मुझे सुख मिला ।

मैंने कहा," बड़ी गजब की चीज हो

आते हो तो छा जाते हो

जीवन में अमृत कण बरसाने लगते हो,

सूर्य का उगना दिखाते हो

झरनों का गिरना, नदियों की कलकल

और इतना आनंद की युगों युगों तक रहे जिसकी आस ।"

कुछ और आगे, आ मिला दुःख

उससे कहा, "बड़े निष्ठुर हो

जब हो रहे होते हैं हम सुख के अनुयायी

दिखा रहे होते हैं जीवन का विहंसित रूप

और जब होती है केवल प्रसन्नता ही प्रसन्नता

तुम आ खड़े होते हो,

तुम्हे नहीं परवाह मेरे सुखों की,

हे दुर्विनीत !

कैसा बैर साधते हो तुम?"

धीरे से सरक गया वह ।

मैं उन दोनों के बारे में सोचता आगे बढ़ा

तो आ मिला प्रेम ।

प्रेम से कहा, "तुम ही अच्छे हो ।

दिन हो या रात

दुःख की हो या फ़िर सुख की बात

रहते हो हमेशा हृदय के किसी कोने में लगातार..."

और प्रेम के साथ ही जीवन का अन्तिम सत्य

मेरे सम्मुख आ खड़ा हुआ

मेरी उपलब्धि मेरे सामने थी-

मृत्यु ।

न दुःख ।

न सुख ।

न प्रेम ।

12 नवम्बर 2008

क्यों रह रह कर याद मुझे आया करते हो ?

नीरवता के सांध्य शिविर में
आकुलता के गहन रूप में
उर
में बस जाया करते हो
बोलो प्रियतम क्यों रह रह कर याद मुझे आया करते हो ?

आज सृष्टि का प्रेय नहीं हिय में बसता है
मिले हाथ से हाथ यही जग का रिश्ता है
अब कौन कहाँ किसके दिल में बैठा करता है ,
पर तुम मानस के गहन निविड़ में
मधु सौरभ के सघन रूप में
आकर बह जाया करते हो -
बोलो प्रियतम क्यों रह रह कर याद मुझे आया करते हो ?

तार प्रीति के आज कहाँ जुड़ते हैं स्नेही
प्रेम-ज्योति के दीप कहाँ जलते हैं स्नेही
स्नेह समर्पित लोग कहाँ मिलते हैं स्नेही,
पर तुम जीवन की श्वांस रूप में
औ' श्वांसों के लघु कम्पन में
आ कुछ कह जाया करते हो -
बोलो प्रियतम क्यों रह रह कर याद मुझे आया करते हो ?

11 नवम्बर 2008

हाय मेरा भटकता रहा मंद मन (गीतांजलि का भावानुवाद)

On the day when the lotus bloomed,
Alas,my mind was straying , and I
knew it not . My basket was empty
and the flower remained unheaded.

Only now and again a sadness fell
upon me , and I started up from
my dream and felt a sweet trace of
a strange fragrance in the south wind.

That vague sweetness made my heart-ache
with longing and it seemed to me
that it was the eager - breath of the
summer seeking for its complition .

I knew not then that it was so near,
that it was mine , and that this
perfect sweetness had blossomed in
the depth of my own heart. (R.N.Tagore-Geetanjali)

-----------------------------------------

उस समय जब खिला रम्य सरसिज सुमन
हाय मेरा भटकता रहा मंद मन

है खिला पद्म यह ध्यान आया नहीं
शून्य दलीय कमल खोज पाया नहीं
दृष्टि पथ में समाया सरसिज हसन
हाय मेरा भटकता रहा मंद मन

मात्र छाई उदासी कभीं जग गया
चौंक अद्भुत सुमन गंध में रंग गया
जब सुरभि ले बहा मंद दक्षिण पवन
हाय मेरा भटकता रहा मंद मन

भर गयी उर में धुंधली मधुरिमा कसक
यों लगा ले जगा पूर्णता की ललक
ग्रीष्म ऋतु का मनोह समुत्सुक श्वसन
हाय मेरा भटकता रहा मंद मन

जानता था इतनी निकटतम धुरी
यह हमारा ही सौरभ मेरी माधुरी
खिल उठी पूर्ण 'पंकिल' ह्रदय में गहन
हाय मेरा भटकता रहा मंद मन

10 नवम्बर 2008

अभी तक मैं चल रहा हूँ, चलता ही जा रहा हूँ

()
"बहुत दूर नहीं
बहुत पास "
कहकर
तुमने बहका दिया
मैं बहक गया ।

()
"एक,दो,तीन.....नहीं
शून्य मूल्य-सत्य है "
कहा
फिर अंक छीन लिए
मैं शून्य होकर विरम गया ।

()
तुम हो
जड़ों के भीतर, वृन्त पर नहीं
तुमने
ऐसा आभास दिया
मैंने जड़े खोद दीं ।

()
"विकल्प की कैसी आस
सत्य तो निर्विकल्प है "
मुझे समझाया था
मैं अब तलक
ढूंढ रहा हूँ सत्य ।

()
"चरैवेति, चरैवेति'
नारद ने कहा था, तुमने भी कहा
मैंने आस की डोर पकड़ ली
अभी तक मैं चल रहा हूँ
चलता ही जा रहा हूँ ।

9 नवम्बर 2008

मेरे समय की पहचान या सफल होने के नुस्खे

मैंने अपने समय को पहचानने की कोशिश की । मुझे लगा समय समाज को अतिक्रमित नहीं करता- उसे व्यक्त करता है। मेरे अस्तित्व ने मेरे व्यक्तित्व को अनगिन मौकों पर इस समय और समाज से लड़ते देखा है। मैंने अपनी इस लड़ाई में कहीं न कहीं समय (समाज) की सीमाओं को महसूस किया है और इस सीमाओं से मुक्त होने की चेष्टा में ख़ुद भी इन्ही सीमाओं में बंधता चला गया।

आज का समय सफलता, असफलता का समय है। इस युग के दो वर्ग किए जा सकते हैं - 
१)सफलता का युग, २)असफलता का युग ।

मेरे आसपास सफल लोगों की एक लम्बी भीड़ है । मैं सफल उन्हें कह रहा हूँ जो अपने अपने मध्यम बरतते हुए एक भीड़ से हटकर पहचाने जाने वाली शख्सियत बन गए हैं; जिन्होंने समाज को अपने ढंग से देखने की कोशिश में समाज की अतिरंजनाओं से कहीं न कहीं अपने को संयुक्त कर लिया है । मैं सफल लोगों की सफलता का कारण वर्त्तमान युग की प्रकृति से साधर्म्य मानता हूँ ।

अपने समय को पहचानने की कोशिश में मैंने सफल लोगों की सफलता एवं उस सफलता के कारणों को पहचानने की कोशिश की। बहुत कुछ समझ बूझ कर विवेचना से इतर मैंने आज के समय का वर्गीकरण कर दिया है। वस्तुतः यह वर्गीकरण मैंने अपने भुक्त यथार्थ एवं सापेक्ष सामाजिक जुड़ाव से निर्मित किया है , अतः यह पूर्णतः अप्रासंगिक भी हो सकता है (होगा -मुझे आश्चर्य नहीं )।

मेरा समय अयोग्यता का समय है। अयोग्यता का समय इसलिए कि योग्यता एवं अयोग्यता की विभाजन रेखा बहुत कुछ धुंधली हो गयी है । योग्यता एवं अयोग्यता की कसौटी सफलता बन गयी है । सफल होने के लिए समाज ने अनगिनत उपकरण निर्मित किए । रिश्वतखोरी, नातेदारी, भाई-भतीजावाद, क्षेत्रवाद जातिवाद आदि ने योग्यता एवं अयोग्यता का गुण धर्म छीन लिया । वस्तुतः छिन गयी योग्यता प्राप्त करने की ललक।

मेरा समय मिथ्यावादिता का समय भी है सत्य की रोशनी में अब शायद सफलता के सूत्र नहीं ढूंढें जा सकते । झूठ सफलता के न जाने कितने मुलम्मे चढ़ाकर चमक रहा है। सच का मध्यम बरतते हुए सफल होना एक लम्बी जद्दोजहद है , पर झूठ के बल पर सफल होने का करिश्मा रोज हुआ करता है। झूठ जरूरतों के लिए जन्म लेता है और उनकी पूर्ति के लिए अपना विकास करता है । अयोग्यता एवं झूठ समकक्षी हैं। मेरे कस्बे में सभी डॉक्टर एमबीबीएस थे । मुख्या चिकित्साधिकारी ने जांच कराई - एक को छोड़ सभी ने क्लिनिक हफ्ते भर के के लिए बंद कर दिए । पर उसी हफ्ते भर के भीतर मुख्य चिकित्साधिकारी का मुंह भी बंद हो गया । मेरे इस कस्बे के इकलौते एमबीबीएस हर वर्ष एक एमबीबीएस पैदा करते हैं - डॉक्टरों की भीड़ बढ़ती जाती है , क्लिनिक खुलते जाते हैं ।

अयोग्यता, मिथ्यावादिता एवं छद्म संतत्व मिलकर एक नए गुणधर्म का विकास करते हैं - वह है छद्म संतत्व । आजका समय छद्म संतत्व का समय है । अयोग्यता ने, मिथ्यावादिता ने सुनहरा आवरण ओढ़ लिया है । सफलता का मुहावरा बन गया है छद्म संतत्व । बिना किसी प्रयास श्रम एवं संघर्ष के यह संतत्व सफलता के नए प्रतिमान गढ़ता है। छलता है हमारी समरसता, हमारी योग्यता, हमारी ग्राह्यता, हमारे बंधुत्व एवं हमारे मन को - कभी भगवा आवरण में , कभी मौलाना टोपी व लम्बी दाढी में, कभी कंघा, कड़ा, कृपाण आदि के प्रतीकों में तो कभी 'धम्म-संघ' की पहेलियों में ।

मेरा समय अबूझा समय है । शाषक पुरूष है, शाषित स्त्री । पर सदैव बहस मुसाहिबे का विषय बनती है स्त्री । अजीब है कि भाषा पुरुष की है और उस भाषा में विमर्श स्त्री का । कैसी कुटिल नीति है ? नहीं, नहीं, यह सफलता का नुस्खा है। स्त्री-विमर्श मुद्दा-ए-ख़ास है । वस्तुतः मेरा समय ही स्त्री-विमर्श का समय है । मेरा एक मित्र कहा करता है, "किसी भी विमर्श के लिए भाषा चाहिए- अपनी स्व-अर्जित भाषा । आज स्त्री की भाषा कहाँ है, इस पुरुष समाज में ? फिर जब अपनी भाषा नहीं तो विमर्श कैसा ? कहाँ है स्त्री-विमर्श ?" पर मैं सदा समझाता हूँ उसे कि यह विमर्श स्त्री-अस्मिता के लिए नहीं, पुरुष के अस्तित्व के नए स्वरूप के विकास के लिए है। युगों की भांति एक बार फिर उपकरण है स्त्री। नहीं,नहीं -स्त्री-विमर्श ।

स्त्री-विमर्श की ही तरह दलित-विमर्श ने मेरे युग को एक औजार थमा दिया है । दलित -विमर्श का विमर्श दलितों के लिए अथवा दलितों का विमर्श नहीं है, अपितु यह विमर्श दलितों पर विमर्श है । आज यह विमर्श विमर्शकारों की बहुआयामी प्रतिभा एवं कुशल विमर्स्श्कार बनने की काबीलियत का साक्ष्य बन गया है । दलित विमर्श्कारी ने साहित्य, समाज में सफलता के नए आयाम छुए है। दलित विमर्श एक बौद्धिक नुस्खा है सफलता का । अतः मेरासमय दलित विमर्श का समय है ।

अतः मेरा यह समय १)अयोग्यता, २) मिथ्यावादिता, ३)छद्म संतत्व, ४)स्त्री-विमर्श एवं ५)दलित विमर्श का समय है और वस्तुतः समय के यही गुणधर्म समय के स्वरूप की निर्मिति के औजार भी हैं ।

मेरा यह वर्गीकरण उन सभी विभूतियों को अपवाद स्वरुप मानता है जिन्होंने अपनी क्षमता,कार्यकुशलता, श्रम एवं योग्यता से सफलता के कीर्तिमान गढे हैं ।

6 नवम्बर 2008

यह कैसा संवाद सखी !

यह कविता तब लिखी थी जब हिन्दी कविता से तुंरत का परिचय हुआ थास्नातक कक्षा की कविताओं को पढ़कर कवि बनने की इच्छा हुई - कविता लिख मारी

यह कैसा संवाद सखी ?

प्रेम-विरह-कातर-मानस यह तेरी दरस सुधा का प्यासा
इसके अन्तर में गुंजित है प्रिय के दर्शन की अभिलाषा
जब भी मोह-मथित-मानस यह तुम्हें ढूंढता,तुम छिपते हो
सच बतलाना अतल प्रेम का यह कोई अनुवाद सखी ?
यह कैसा संवाद सखी ?

आज तुम्हारे द्वार गया था नेत्र तुम्हीं पर जा कर ठहरे
सौरभ का वातास खुला हम प्रेम-वारि में गहरे उतरे
मैं वार गया अपनी पलकों पर, तुम पलकों से हार गए
इन आँखों का अंतर्मन से यह कैसा हुआ विवाद सखी ?
यह कैसा संवाद सखी ?

5 नवम्बर 2008

महाराष्ट्र के शनिदेव बनाम असली शनिदेव

हाराष्ट्र के शनि देव (राज ठाकरे की बात कर रहा हूँ ) हमारे असली शनिदेव से ज्यादा खतरनाक हो गए लगते हैं। बिहारियों, उत्तर भारतीयों पर दृष्टि पड़ी कि वे संकट में पड़े । मामला बहुत कुछ क्षेत्रवाद आदि का नहीं, स्वभाव का है । शनिदेव ने मुझे बहुत सताया है,मैं बहुत डरता हूँ शनिदेव से क्योंकि मैं उनकी मंशा नहीं समझ पाता । बैठे ठाले परेशान करने की आदत है उनकी- बिल्कुल राज ठाकरे की तरह । ये दोनों शनिदेव अपनी सामर्थ्य की स्वीकृति कराने का उद्यम रचते रहते हैं । अब क्या कहें कि अपने तैंतीस करोड़ देवताओं में शनि देव की सोच बिल्कुल एक तानाशाह सनकी देवता की तरह है जो अपनी संप्रभु सत्ता का लोभी है। कुछ अलग नहीं हैं हमारे आधुनिक शनिदेव - आचरण में । हाँ आवरण में हमारे शनि 'राज' शनि देव से बीस ठहरते हैं।
मैं महाराष्ट्र से, मुंबई से डरने लगा था । कारण शनि देव (राज ठाकरे) ही थे ।



ज 'हिन्दुस्तान' अखबार में एक ख़बर पढ़ी । महाराष्ट्र में अहमदनगर जिले में एक गाँव है - शनि शिंगणापुर। इस गाँव में घर में दरवाजे नहीं, दफ्तरों दुकानों में दरवाजे, खिड़कियाँ नहीं; जहाँ दरवाजे हैं वहां ताला नहीं । विचित्र लगता है सुनकर । यहाँ पिछले चार सौ सालों में एक भी चोरी की घटना नहीं हुई। यहाँ झूठ बोलना पाप है।यहाँ कोई किसी का शत्रु नहीं, किसी को किसी बात का भय नहीं। इसका प्रमाण गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड में इसका 'विश्व का सबसे न्यारा गाँव' के रूप में दर्ज होना है। इस गाँव पर शनिदेव की कृपा है । यहाँ शनिदेव किसी को चोरी नहीं करने देते, किसी को झूठ नहीं बोलने देते । सच में विश्वास नहीं होता ।
मैं महाराष्ट्र से, शनि शिंगणापुर से प्रेम करने लगा हूँ । कारण शनि देव ही हैं।

पूरी ख़बर यहाँ पढ़ें

3 नवम्बर 2008

समय का शोर

जब ध्वनि असीम होकर सम्मुख हो
तो कान बंद कर लेना बुद्धिमानी नहीं
जो ध्वनि का सत्य है
वह असीम ही है ।

चलोगे तो पग ध्वनि भी निकलेगी
अपनी पगध्वनि काल की निस्तब्धता में सुनो
समय का शोर
तुम्हारी पगध्वनि का क्रूर आलोचक होगा।

भूत,भूत,भूत,भूत, मैं भूत हूँ .

'मैं भूत हूँ', ऐसा कहकर अब किसी को डराया नहीं जा सकता। भूत कल्पना का सत्य है । यथार्थ का सत्य 'भूत' नहीं 'भभूत' है। 'भभूत' कई बार भूत को भगाने का उपक्रम करती हुई मालूम पड़ती है । बात अलग है की भूत को भगाने के लिए 'भभूत' को 'भूत' की अन्यान्य क्रियाएं करनी पड़ती हैं। भूत की महिमा से भभूत की महिमा कई गुना अधिक जान पड़ती है अब। भूत बनने बनने में कई जन्मों का फेरा है, भभूत बनाने के लिए क्षण मात्र का दृढ़ भाव चाहिए और चाहिए स्वतः 'भभूत-भावन' बनने की अदम्य इच्छा ।

आज के इस समय में भूत नहीं, भूत की कहानियां हैं। भूत से डरना बेवकूफी है । हाँ, भूत की कहानियों से डरा जा सकता है- ऐसा कहते है लोग। शायद इसीलिए भुतही फिल्में डरा देती हैं । यद्यपि विज्ञान इस भूत को स्वीकृति नहीं देता और भुतही फिल्मों से उत्पन्न डर को 'मेंटल डिसार्डर' कहने लगता है । एक मजेदार कारण 'वास्तविक भूत' एवं ' फिल्मी भूत' के स्वरुप में अन्तर है, जिससे हमें फिल्मी भूत ज्यादा डरा देते हैं ।

भूत 'भूतकाल' का विषय हैं। वर्त्तमान में 'भूत' की क्या आवश्यकता ? पर वस्तुतः भूत के अनगिनत भूत वर्त्तमान क्या भविष्य को भी आक्रान्त कर देते हैं । मैं कई बार वर्त्तमान से घबराकर भूत में पहुँच जाता हूँ और अनेकानेक भूतों से स्वयं को घिरा पाता हूँ । सच भी यही है कि भूत भगाने का एक नुस्खा वर्त्तमान की संगति भी है ।

भूत वर्त्तमान में ढूँढे नहीं मिलता । भूत के बने रहने की कुछ शर्तें हैं। भूत अंधेरे में अपना साम्राज्य बनाता है, चलाता है, अँधेरा कायम रखना चाहता है; लेकिन विभिन्न आकारों के वर्तमान के बिजली बल्बों से अँधेरा बाहर से घबरा कर कहीं भाग गया है । कहीं क्यों ? मनुष्य के अंतःकरण में समा गया है - और साथ ही भूत भी।
भूत सन्नाटे में, सुनसान में अपने को सहज पाता है, व्यक्त करता है -वीरानापन उसका सहचर है । परन्तु समय के शोर ने इस सन्नाटे को, इस वीरानेपन को बहिष्कृत कर दिया है । अब यह वीरानापन गाँव, शहर से उठकर मन के आँगन में आकर दुबक गया है ।
भूत को रहने की एक मुकम्मिल जगह चाहिए- कोई पुराणी हवेली, कोई टूटा किला,खंडहर, कोई बूढा पीपल-बरगद का पेड़ या ऐसी ही कोई जगह । पर वर्त्तमान ने यह सारी जगहें भूत से छीन ली हैं। इस वर्तमान में कोई पुरानी हवेली, कोई टूटा किला या कोई खंडहर शेष नहीं बचता - होटल बन जाता है या कोई मल्टीप्लेक्स । फिर कहाँ रहे भूत ? क्यों डरूं मैं भूत से ?

2 नवम्बर 2008

प्रेम-विस्मृति

तुम बैठे रहते हो मेरे पास
और टकटकी लगाए देखते रहते हो मुझे,
अपने अधर किसलय के एक निःशब्द
संक्षिप्त कम्पन मात्र से मौन कर देते हो मुझे
और अपने लघु कोमल स्पर्श मात्र से
मेरा बाह्यांतर कर लेते हो अपने अधीन

हृदय की सारी संवेदनाएं और जीवन की संपूर्ण गति
तब तुम और मैं,
हमारे हृदय के स्पंदन, हमारी चेतना और संसृति
हो जाते हैं एकमेक
विश्राम करने लगता है समय
और रह जाता है चहुँओर अकेला जाग्रत
एक शाश्वत विरल,तरल प्रेम

टांक लेना चाहता हूँ मैं इसे पृष्ठ पर
चित्रित कर लेना चाहता हूँ
एक अलभ्य आस्था - प्रेम विस्मृति
पर खो गयी है तूलिका
अपर्याप्त है पृष्ठ ।

इस अलौकिक दृश्य को अचित्रित ही रहने दो -
मेरे चित्रकार !

1 नवम्बर 2008

गया रे कहाँ प्रकाश चला (गीतांजलि का भावानुवाद )

Light, Oh where is the light? kindle it with the burning
fire of desire!
There is the lamp but never a flicker of a flame, -
is such thy fate, my heart ! Ah, death were
better by far for thee !
Misery knocks at thy door, and her message is that
thy lord is workful,and he calls thee to the
love- tryst through the darkness of night.

The sky is overcast with clouds and the rain is
ceaseless . I know not what this is that stirs in me,
I know not its meaning.
A moment's flash of lightning drags down a deeper gloom
on my sight, and my heart gropes for the path to
where the music of the night calls me.

Light, Oh where is the light! Kindle it with the
burning fire of desire! It thunders and the wind
rushes screaming through the void . The night
is black as a black stone. Let not the hours
pass by in the dark . Kindle the lamp of love
with thy life. (Geeanjali - R.N.Tagore)

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गया रे कहाँ प्रकाश चला
उर्जस्वित कामना अनल से उसको मूढ़ जला

ज्योति कभीं टिमटिमायी सूना बिलखाता दीप
तूँ कितना हतभाग्य अंधेरे में ही खड़ा समीप
तूँ तम में भटकता हाय क्यों मर गया पगला -
गया रे कहाँ प्रकाश चला

पट तेरा खटका-खटका पीड़ा देती संदेश
बौरे! निशि तम में भी तेरा जाग रहा प्राणेश
प्रेम मिलन हित टेर रहा है कब से सुनो भला -
गया रे कहाँ प्रकाश चला

मेघावृत है नील-गगन अनवरत बरसता नीर
बता नहीं सकता कैसी उठ रही कसक क्या पीर
उसका अर्थ समझ पाने की मुझमें कहाँ कला-
गया रे कहाँ प्रकाश चला

छान चपला द्युति से दृग आगे बढ़ा और तम-जाल
हृदय टटोले चला जा रहा है वह पथ तत्काल
अरे जहाँ से निशि पुकार का यह स्वर वह निकला-
गया रे कहाँ प्रकाश चला

कहाँ गयी रे ज्योति कहाँ रे तेरा दीपक माल
कर उसकी देदीप्यमान निज इच्छा में बल डाल
सुन घन गर्जन मारुत क्रंदन शून्य बीच मचला-
कहाँ रे गया प्रकाश चला

निशि तम यथा असित भूधर गुंजरित प्रभंजन गीत
यूँ ही हाय तिमिर में तेरे जांय नहीं क्षण बीत
'पंकिल' प्रेम प्रदीप जला ले अपने प्राण गला-
गया रे कहाँ प्रकाश चला ('पंकिल'-मेरे बाबूजी)
 

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