31 जनवरी 2009

अब न अरमान हैं न सपने हैं

"ऐसी मँहगाई है कि चेहरा ही
बेंच कर अपना खा गया कोई।
अब न अरमान हैं न सपने हैं
सब कबूतर उड़ा गया कोई ।"
एक झोला हाँथ में लटकाये करीब खाली ही जेब लिये बाजार में घूम रहा हूं। चाह स्याह हो रही है। देख रहा हूँ, मँहगाई की मार से बेहाल हुई जिन्दगी बेढंगी चाल चलने लगी है। मुनाफ़ाखोरी की हवा खोरी-खोरी चक्रमण करने लगी है। अब तो "साँकरी गली में मोहिं काँकरी गरतु है।"

एक रामराज्य की बात सुनी थी, एक आम राज्य की बात देख रहा हूँ। 'सुराज' और 'स्वराज' की 'इति श्री रेवाखण्डे' की सत्यनारायणि कथा का पंचमोध्याय चल रहा है। चूरन लेने में ही कथा को संपूरन करके शंख बजा दी जा रही है। बाबा तुलसी ने 'सुराज' के लिये एक अर्थ दिया - "सुखी प्रजा जिमि पाइ सुराजा", और एक दिया - "जिमि सुराज खल उद्यम गयऊ।" दूसरे अर्थ को उजागर करता हुआ 'सुराज' खल राज हो गया। सामान्य जन खा तो ले रहा है, भोजन कहाँ कर पा रहा है। यथार्थ और आदर्श के द्वन्द्व युद्ध में यथार्थ चढ़ बैठा है । सोचता हूँ, ऐसी यथार्थता में मेरे जिले का नक्सलवादी पूत जन्म ले ले तो कैसा आश्चर्य?

अंग्रेजी कवि कीट्स ने नाइटिंगल का गीत सुनकर आह्लादित हृदय से कहा था -
"Still let me sleep embracing clouds invain
And never wake to feel the days disdain"

फ़िर झट ही कीट्स ऐसे ही तिलमिला गया होगा, और कह उठा -
"Fancy, Thou cheat me."

मन अजीब हो गया है। जहाँ देखता हूँ आग लगी है। हर माह देखता हूँ, मिट्टी का तेल लेने की लाइन में टिन लेकर खड़ा होता है, मेरे कस्बे का किशोर; धक्का-मुक्की में सिर फ़ट जाता है। इसी भाग्य को लेकर कमोबेश नौजवानी ठोकर खा रही है। वोट की राजनीति, कोट की किरिच और नोट की फ़ितरत में एक व्यूह रचना कर दी गयी है। इसमें सातवें फ़ाटक पर ही सही, अभिमन्यु मारा जायेगा ही । कोई राह निकलनी चाहिये -
"यही रात मेरी, यही रात उनकी,
कहीं बढ़ गयी है,कहीं घट गयी है।"

30 जनवरी 2009

आपका हँसना

आपके हँसने में
छ्न्द है
सुर है
राग है,
आपका हँसना एक गीत है।

आपके हँसने में
प्रवाह है
विस्तार है
शीतलता है,
आपका हँसना एक सरिता है।

आपके हँसने में
शन्ति है
श्रद्धा है
समर्पण है,
आपका हँसना एक भक्ति है।

आपके हँसने में
स्नेह है
प्रेम है
करुणा है,
आपका हँसना एक भाव-तीर्थ है।

आपके हँसने में
आपका विचार है
अस्तित्व है
रहस्य है,
आपका हँसना स्वयं आप हैं।

मेरे जीवन में
आपकी तरलता है
स्निग्धता है
सम्मोहन है,
मेरा जीना आपका हँसना है।

निंदक-वंदना का विवेक-सत्‍य

'निंदक नियरे राखिये' की लुकाठी लेकर कबीर ने आत्‍म परिष्‍कार की राह के अनगिनत गड़बड़ झाले जला डाले। ब्‍लागरी के कबीरदास भी इसी मति के विवेकी गुरूघंटाल हैं । कबीर ने तो खुद को कहा था, 'जाति जुलाहा मति का धीर' । इस ब्‍लागर कबीर की मति का ही अनुमान लगायें, क्‍योंकि आज के सर्वसमाज में तो 'जाँति पाँति पूछै नहिं कोई, ह‍‍रि का भजै सो हरि का होई' ।

य़द्यपि अपने इस कबीर को कह तो मैं 'कबीर' रहा हूँ, पर निन्‍दक वन्‍दना की ऐसी ही शैली का प्रयोग जमकर 'तुलसी' बाबा अपनी खलवन्‍दना में करते हैं। अपने विवेक से मैं समझ रहा हँ 'निन्‍दक नियरे राखिये' का कूटनैतिक निहितार्थ । मैं समझ रहा हूँ निन्‍दकों को थपकी देकर सुलाने की आपकी मधुर चाल। अपनी निन्‍दा न हो, इसका अच्‍छा उपाय कर लिया है आपने इस मनोहारी नम्रता से । सच बताइये यह निन्‍दक-वन्‍दना पूज्‍य-भाव की है? सात्विक श्रद्धा की है? अथवा यह सर्प को मोह लेने की चाल है, जिससे वह डँस न सके । मेरे प्‍यारे ब्‍लॉगर, यह आत्‍म-समर्पण नहीं, पूर्व-समर्पण है।
हे मेरे चतुरंग चिट्रठाकार! सच कहो कि अनायास ही यह निन्‍दक वन्‍दना हो गयी अथवा सायास उद्यम है यह । कहीं इस वन्‍दना में जो ब्‍याजस्‍तुति है, परिहास की कपट-लीला है, उसमें निन्‍दकों को मन ही मन चिढाने की चाल तो नहीं । कहीं उन्‍हें आईना तो नहीं दे रहे कि वो इसमें आकृति देखें और अपना सा मुँह लेकर रह जॉंय । कहीं ऐसा तो नहीं कि सम्‍मान की ओट से भेद के बाण चलाये जा रहे हो आप?
मैं जानता हूँ कि निन्‍दक जीवन-सरिता की मँझधार में छिपे ग्राह हैं । वे जीवन श्रृंखला के बीच की कडी हैं, उन्‍हें हटाइयेगा तो श्रृंखला का ही विच्‍छेद हो जायेगा । पर इन्‍हें वन्‍दनीय न बनाइये प्रियवर ! यद्यपि मैं समझ रहा हूँ थोडा-थोडा कि निन्‍दक को पास बिठाने का संकल्‍प आत्‍मविश्‍वास का नहीं, आभास का है । शायद यह आपकी खेचरी-मुद्रा है स्‍वयं-सिद्ध! यह निन्‍दक के प्रति विनय नहीं, विनय का व्‍यायाम लगता है ।

आप बहुत चतुर हो श्रीमन् ! बेचारे निन्‍दक क्‍या जानें कि जाने अनजाने उनकी कलई खोल रहे हैं आप । सब आये, आ के टिपिया गये । उन्‍हें क्‍या मालूम कि मधु और दंश की शैली है यह । बेचारे मूढ-मति नहीं जानते कि अदृश्‍य उपहास शत्रु पर सम्‍मुख प्रहार नहीं करता, वह शत्रु को निरस्‍त्र कर देता है ।
खूब हवा भरते हो आप, फिर कॉंटा चुभा देते हो । मतलब समझे - पहले वायु-विकार, फिर खट्टी डकार । अभी भी नहीं समझे, समझाता हूँ । आप कहते हैं - 'निन्‍दक महान हैं', ध्‍वनि आती है - 'महान निन्‍दक हैं' ।

उल्‍लेखनीय - विवेक जी की यह पोस्‍ट तीन दिन पुरानी है, तीन दिन पुराना मेरा बुखार भी है । आज बुखार से निवृत्‍त हुआ हूँ, सो उस दिन की य‍ह प्रविष्टि आज पोस्‍ट कर रहा हूँ ।

29 जनवरी 2009

कर स्वयं हर गीत का श्रृंगार

दूसरों के अनुभव जान लेना भी व्यक्ति के लिये अनुभव है। कल एक अनुभवी आप्त पुरुष से चर्चा चली। सामने रामावतार त्यागी का एक गीत था। प्रश्न था - वास्तविकता है क्या?
"वस्तुतः, तत्वतः, यथार्थः अपने को जान लेना ही अध्यात्म है, और यही वास्तविकता है", उसने गम्भीर स्वर में मुझे प्रबोध दिया।

बात ही बात में बात और बढ़ती गयी। उधर से एक बात कलेजे में घुस गयी और एक बात सहजता से समझा दी गयी -
"सर्व-सर्वत्र जागरण'। होश सम्हालो।सब की सहज स्वीकृति ईश्वर के प्रसाद के रूप में सिर माथे लगाओ। बैठो नहीं, बढ़ो तो।
"रोक सका संकल्पबली को कौन आज तक बोल/अमृत सुत! सोच दृगंचल खोल ।"
वस्तुस्थिति को तह पर तह सजा कर रखता गया वह। बोला, "लम्बे होते नारियल के पेड़ों को छाया की अनुपयोगिता में नहीं, आकाशभेदक साहस के सौन्दर्य में समझना होता है। आकाश बुलाया नहीं जाता बाहों में भरने के लिये । सिर्फ़ बाहें फ़ैलानी काफ़ी होती हैं। वह उनमें भरा होता है।"
"चाँदी की उर्वशी न कर दे युग के तप-संयम को खंडित
भर कर आग अंक में मुझको सारी रात जागना होगा।"
"इसलिये तेरे सूने आंगन में दुख़ भी मेहमान बन कर आये तो उसे ईश्वर से कम मत समझना । अपने किसी भी आंसू को व्यर्थ मत मानना। समुद्र उसको माँगने पता नहीं कब तेरे दरवाजे आ जाय ।"

तब से बार-बार इन पंक्तियों का फ़ेरा मेरे स्मृति-पटल पर हो रहा है-
"पास प्यासे के कुँआ आता नहीं है
यह कहावत है, अमर वाणी नहीं है,
और जिसके पास देने को न कुछ भी
एक भी ऐसा यहाँ प्राणी नहीं है।
कर स्वयं हर गीत का श्रृंगार
जाने देवता को कौन सा भा जाय ।"

28 जनवरी 2009

किसने बाँसुरी बजायी

जरा और मृत्यु के भय से यौवन के फ़ूल कब खिलने का समय टाल बैठे हैं? जीवित जल जाने के भय से पतंग की दीपशिखा पर जल जाने की जिजीविषा कब क्षीण हुई है? क्या कोयल अपने कंठ का मधुर राग बिखेरना मेढकों के कटु शब्द से विक्षिप्त होकर छोड़ देती है? शायद नही। जीवन का यह दृष्टिकोण समझ आ रहा है कि विषय नहीं, विषय का विनिवेश ही आप्लावित करता है। तृप्त-अतृप्त आकांक्षाओं से मुक्त गहरे आनन्द का चिरन्तन प्रकाश है यह जीवन। तीर की चाह पीड़ा का स्रोत है । जीवन की उत्ताल तरंगें किसी तट से नहीं टकराती।

कई बार जिससे मैं समझता हूं कि मेरा कोई रिश्ता-नाता नहीं, उसकी चिरपरिचित पुकार का आकर्षण मन में सुगन्ध की तरह खिलता है और मैं बेचैन यहाँ-वहाँ घूमता रहता हूं। जरूर मेरे और उसके बीच कोई अन्दर ही अन्दर प्रवाहित होने वाली नदी बहती है। मैं भले ही धूप-छाँव के खेल में उलझा हूँ, लेकिन वह पुकारता है तो पुकारता ही चला जाता है। लाख चाहता हूं भरम जाऊँ, कहूँ- कोई नहीं, कुछ भी नहीं, कोई बात नहीं। पर हृदय का एक कोना कह ही देता है -
"किसने बाँसुरी बजायी
जनम-जनम की पहचानी यह तान कहाँ से आयी?"

27 जनवरी 2009

वह आँसू कह जाते हैं

मेरा प्रेम
कुछ बोलना चाहता है ।
कुछ शब्द भी उठे थे, जिनसे
अपने प्रेम की सारी बातें
तुमसे कह देने को
मन व्याकुल था ,
पर जबान लड़खडा गयी।
अन्दर से आवाज आयी
"कोई बाँध सका है
की तुम चले हो बांधने
प्रेम को, शब्दों में ।
ठहर गया मैं ।

प्रश्न था, प्रेम बोलना चाहता है,
अभिव्यक्त होना चाहता है,
पर प्रेम के पास तो कोई भाषा ही नहीं-
मौन है प्रेम ।
तो ऐसी दुविधा में उलझकर
पोर-पोर रो उठे,
आंखों से आंसू झरें
तो आश्चर्य क्या ?
आंसू झर पड़ते हैं, जब
गहरी हो जाती है कोई अनुभूति-
प्रेम की अनुभूति - शब्दातीत।

राह मिल गयी......
जो शब्द नहीं कह पाते
वह आँसू कह जाते हैं।

26 जनवरी 2009

कैसे मुक्ति हो ?

बंधन और मोक्ष कहीं आकाश से नहीं टपकते। वे हमारे स्वयं के ही सृजन हैं। देखता हूं जिन्दगी भी क्या रहस्य है। जब से जीवन मिला है आदमी को, तब से एक अज्ञात क्रियाशीलता उसे नचाये जा रही है। अभी क्षण भर का हास्य देखते-देखते विषाद के गहन अन्धकार में डूब जाता है। जहाँ वचन की विद्ग्धता और स्नेहसिक्त मधुमय वाणी का प्रवाह था वहीं अवसाद की विकट लीला प्रारंभ हो जाती है। हृदय में जहाँ उल्लास का सिंधु तरंगित होता था, वहीं पीड़ा और पश्चाताप का साम्राज्य स्थापित हो जाता है। भविष्य जिस प्रसन्नता की रंगभूमि बनने की पृष्ठभूमि रच रहा था, वही न जाने क्यों चुभन से भरा हुआ कंटकमय वर्तमान बन जाता है। इस अस्ति और नास्ति के खेल में जूझता व्यक्ति किस घाट का पानी पिये? गजब स्थिति हो गयी है-
"कुछ ऐसी लूट मची जीवन चौराहे पर
खुद को ही खुद लूटने लगा हर सौदागर।"

तो कैसे मुक्ति हो इस अगति से?

खुद के सवाल में खुद ही जवाब हाजिर होता है हमारे सामने। 'आशावाद परो भव'। आशावाद जिन्दगी का एक बड़ा ही सुहावना सम्बल है। अंधेरे में फ़ंस कर कीमती जिन्दगी को बर्बाद करना बड़ी मूर्खता है। अँधेरा एक रात का मेहमान होता है। फ़िर चमकता सवेरा हाजिर हो जाता है। पतझर के बाद बसंत आता ही है। इसलिये बसंत के पाँवों की आहट जरूर सुननी चाहिये। हमारा अधैर्य हमारी परेशानी है। निराशा का कुहासा फ़टेगा। सूर्य पीछे ही तो बैठा है-
"If winter comes can the spring be far behind?"

25 जनवरी 2009

उसकी याद ही अच्छी

खो ही जाऊं अगर कहीं
किसी की याद में
तो बुरा क्या है?

व्यर्थ ही भटकूंगा - राह में
व्यर्थ ही खोजूंगा - अर्थ को
व्यर्थ ही रोऊंगा - निराशा के लिये,
न पाऊंगा
प्रेम, दुलार और स्नेह का आमंत्रण,
फ़िर डूब जाने को प्रेम में
खो जाने को प्रीति में,
आनन्द के असीम आकाश में उड़ने को
क्यों न मैं खो जाऊं, किसी की याद में।

उस याद का हर रूप ही साकार है
उस याद की आवाज ही झंकार है,
यदि नहीं पाऊं उसे - जो सामने हो
या कि, जिसकी बात सुननी हो मुझे
मैं कहां फ़िर ढूढ़ता उसको फ़िरूं?
फ़िर वही एक रास्ता है याद आया
खो मैं जाऊं क्यों न उसकी याद में!

वह नहीं अच्छा
है उसकी याद ही अच्छी ।

24 जनवरी 2009

बात, यदि अधूरी है

बात, यदि अधूरी है
तो उसका अर्थ नहीं,
यदि संभावनायें हैं तो
उसे पूर्ण कर लेना व्यर्थ नहीं।

कहा था किसी ने
स्वीकार है मुझे भी-
"कविता करो न करो
कवि बन जाओ"
और अपनी इस सहज मनोदशा में
उस अदृश्य कविता में ही खो जाओ।

पर कवि जिसके लिये
"कविता एक कवच है, और
उसके होने जैसा ही सच है"-
क्या हर तन्हा रात को रो दिया करे
(जैसा वह अक्सर किया करता है,
अपनी कविताओं में)
किसी की याद में
कोई बात न कह पाने के मलाल से
या जिसका उत्तर न पा सके
ऐसे ही अनगिन सवाल से?

23 जनवरी 2009

रास्ते बन्द नहीं सोचने वालों के लिये

कविता की दुनियां में रचने-बसने का मन करता है। समय के तकाजे की बात चाहे जो हो, लेकिन पाता हूं कि समय का सिन्धु-तरण साहित्य के जलयान से हो जाता है। साहित्य की जड़ सामाजिक विरासत लिये होती है। शब्दों की जड़ें व्यक्ति के मन के सपनों और स्मृतियों में गहरी जमी होती हैं। इसका परिसर रोने-सुबकने से लेकर अंतःसार एवं मुखर वागविलास तक फ़ैला है। शब्दों का आर्केस्ट्रा वेश्या-बस्ती के मोलभाव से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय कूट्नीति तक फ़ैला है। अच्छी कविता में हर शब्द बोलता है। हर शब्द अनिवार्य और अद्वितीय होता है। मुझे लगता है कि यही माध्यम है जिससे निहायत पैनेपन से बात कही जाती है। शब्द तरह तरह की अनुभुतियों में, भाव-भूषित अनुभूतियों में डूबा होता है। यही शब्द की जादूगरी काम करती है। दूरस्थ तारों के स्वप्न से लेकर मुंह के स्वाद तक यह हर स्थिति की याद करा देती है। हमारी देह, हमारी आत्मा, हमारे स्वप्न, हमारी मृत्यु - सब इसी झोली में समा जाते हैं।

व्यग्रता तो रहती है जरूर कि जो कहा वह शायद पहले ही कहा जा चुका है, और जो कहना चाहता था वह कभीं नहीं कह पाऊंगा । लेकिन एक न एक दिन, कहीं न कहीं सही रूप में अच्छी से अच्छी कविता जन्मेगी, इस आशा के साथ साहित्य का दामन छूटता नहीं। समय के गर्भ से आश्वस्त किया जाता हूं -

"देख यूं वक्त की दहलीज से टकरा के न गिर
रास्ते बन्द नहीं सोचने वालों के लिये ।"

पढ़ा तुम्हारा गीत-पत्र

एक खामोशी-सी दिखी
एक इंतिजार भी दिखा
अनसुलझी आंखों में बेकली का
सिमटा ज्वार भी दिखा,
आशाओं के दीप भी जले
विश्वास के सतरंगी स्वप्न भी खिले
लगा जैसे हर सांस
वीणा के सुर में सुर मिलाकर
गुनगुना रही हो, और
जैसे कोई काली-सी कोयल
एक थके राही को प्रेम का,निश्चय का
सुधा-सा गीत सुना रही हो ।

मन हुआ मैं क्यों न लिखता
गीत कुछ इस बानगी के?
पिरोया हो प्यार जिसमें और
बंधा हो स्नेह का अनमोल मोती,
कर सकूं मैं याचना उस गीत में
'याद रखना मुझे और मेरा पता'।

वह तुम्हारा गीत,या फ़िर पत्र
बह गया इस मन-विजन में
स्वर-समीरण बन ।

21 जनवरी 2009

कह दूँ उसी से .

सोचता हूं, इतनी व्यस्तता, भाग-दौड़, आपाधापी में कितनी रातें, कितने दिन व्यतीत किये जा रहा हूं। क्या है जो चैन नहीं लेने दे रहा है? कौन सी जरूरत है जो सोने नहीं देती है? कौन-सा मुहूरत है जो अभी मृगजल की तरह अनास्वाद बना है। कुछ प्राप्ति में आनन्द को खोजना चाहता हूं, लेकिन वह झट अप्राप्ति की चादर ओढ़ लेता है। कुछ होने, कुछ पाने की ललक में इसी भांति घुड़दौड़ करते हुए या जो कुछ पाये हुए से दीखते हैं, उनकी बेचैनी भी मैं देख-देख कर बेचैन-सा हुआ जा रहा हूं। क्या बात है?

सहसा कुछ अन्तर्विरोध से मुझे जूझने की भीतरी रोशनी दिखायी देती है। विचार उभरते हैं - 'जरूरत के बिना गुजरे उसी दिन की जरूरत है'। मेरे मन में शरीर के आराम की और नाम के नाम की इच्छा बड़ी गहराई तक जाग्रत है शायद। इसी से जो मिलना चाहिये, उसका मिलन नहीं हो रहा है। जिस दिन से ये दोष खत्म हो जायेंगे,, उसी दिन वह मिल जायेगा, जो छल रहा है। वह मिल जायेगा जिससे मैं कभी पृथक नहीं रहूंगा। इन दोषों ने बीच में कई दीवालें खड़ी कर रखीं हैं। मुझे तो कुछ होने, कुछ पाने की चाह ने कितनी स्पर्धा, द्वेष, अभिशाप, घृणा, जलन, निन्दा आदि से भर दिया है। इनकी तो गणना भी करनी मुश्किल है। तो जब तक ये लम्बी ऊंची दीवालें हैं, तब तक उस प्राप्ति का आनन्द कैसे मिले?

एक आत्म-प्रबोध बार बार मेरे अन्दर जागृत हो जाता है - "उससे क्यों नहीं कहता मैं, जिसके पाये बिना सब अनपाया रह जाना है। क्या उसकी आवाज अनसुनी कर रहा हूं जिसने कहा है -
"हमारे पास कोई बद्दुआ खोजे न पाओगे
मेरे दिल में किसी के वास्ते नफ़रत रहे तब तो"।

कह दूं उसी से कि इन दीवालों को ढहाने का काम भी तो आप ही को करना है। पहले परख लो मुझे कि इस हृदय में कुछ चाह है कि नहीं, और यह भी देख लो कि इस 'कुछ' चाह को असीम बनाने की चाह भी है या नहीं। यदि है तो इसे असीम कर दो ना, मेरे प्रिय!

कितना सिखाओगे मुझे?

चेहरे पर मौन सजा लेते हो
क्योंकि बताना चाहते हो मुझे
मौन का मर्म,
हर पल प्रेम और स्नेह से
सहलाते हो मुझे
शायद बताना चाहते हो
एक स्नेही,एक प्रेमी का कर्म
आकंठ डूब जाते हो हास्य में
मेरे जैसे गर्हित की आस के लिये
शायद देना चाहते हो यह जीवन-दर्शन
कि 'जीवन हास ही तो है'
और सोख कर गम
बरसा देते हो खुशी
यही समझाने के लिये शायद
कि 'जीवन गम और खुशी का रास ही तो है"।

और भी न जाने कितने अनगिनत भाव
सजा लेते हो एक साथ
एक ही अरूप-रूप पर
मुझ जैसे अकलित,विरहित,अकुसुमित के लिये।

कितना सिखाओगे मुझे?

20 जनवरी 2009

नए साल की सबसे सुंदर शुभकामना

साल भर पहले जब वह एक हफ्ते के लिए मेरे घर आयी थी, उसे 'ई-मेल' करना सिखाया था - उसने समझा नहीं था कुछ भी, बस याद भर कर लिया था तरतीब से । मैंने सोचा क्षणिक उत्साह है - खेल-खेल में खेली गयी प्रतिबद्धता। पर आज जब वह कक्षा छः में पहुँच गयी होगी - उसने मुझे 'ईमेल' किया है। क्या उसे अंगरेजी आ गयी? (मैंने कहा था उससे, "बड़े होकर अंगरेजी सीखना, तब आयेगा) क्या उसके गाँव में बिजली आने लगी?(उस वक्त तार थे, बिजली नहीं थी, ट्रांसफार्मर सालों से फूंका पडा था ) क्या किसी ने कंप्यूटर रख लिया वहाँ?(साल भर पहले तक नहीं था), फ़िर इन्टरनेट कैसे मिला?(सात किलोमीटर दूर की बाजार में भी नहीं था साल भर पहले तक)।

पर आज उसने मुझे मेल किया है, साल भर बाद। अब वह पांचवीं में नहीं पढ़ती, छः में पढ़ती है । गाँव में बिजली तो आ गयी है, पर कंप्यूटर अभी भी नहीं। सात किमी० दूर 'कन्या पूर्व माध्यमिक विद्यालय' में पढ़ते हुए कंप्यूटर पर अंगुलिया चलाती है - सरकारी योजना के तहत। पर वहाँ इन्टरनेट नहीं । वहीं पास की बाजार में बी०एस०एन०एल० ने ग्रामीण ब्रोड्बैंड विस्तार में नए कनेक्शन दिए हैं । वह सजग है । पता नहीं कैसे, पर वह मुझे मेल करती है (सब सीखा-सिखाया) --
H= ham
A= aap ko
P= pal
P= pal
Y= yaad karate hain
aur HAPPY rahate hain. HAPPY NEW YEAR 2009
क्या इससे सुंदर भी शुभकामना संदेश हो सकता है नए साल का ? मैं खुश हूँ कि साल भर बाद भी उसे इमेल करना याद है, और मैं भी।

प्रेम पत्रों का प्रेमपूर्ण काव्यानुवाद 6

इस छ्लना में पड़ी रहूं
यदि तेरा कहना एक छलावा.

तेरे शब्द मूर्त हों नाचें
मैं उस थिरकन में खो जाऊं
तेरी कविता की थपकी से
मेरे प्रियतम मैं सो जाऊं
अधर हिलें मैं प्राण वार दूं
यदि उनका हिलना एक छलावा.

प्रिय तेरे इस भाव-जलधि में
मैं डूबी, बस डूबी जाऊं
तेरी रसना के बन्धन से
मैं असहज हो बंधती जाऊं
इन आंखों पर जग न्यौछावर
यदि इनका खुलना एक छ्लावा.

सारी चाह हुई है विस्मृत
केवल एक अभिप्सित तू है
प्रेम-उदधि मेरे प्राणेश्वर
मेरा हृदय-नृपति तो तू है
प्रतिक्षण मिलन-गीत ही गाऊं
यदि तेरा मिलना एक छलावा.

प्रेम पत्रों के प्रेम पूर्ण काव्यानुवाद: सभी प्रविष्टियाँ

  1. प्रेम पत्रों का प्रेम पूर्ण काव्यानुवाद 1
  2. प्रेम पत्रों का प्रेम पूर्ण काव्यानुवाद 2
  3. प्रेम पत्रों का प्रेम पूर्ण काव्यानुवाद 3
  4. प्रेम पत्रों का प्रेम पूर्ण काव्यानुवाद 4
  5. प्रेम पत्रों का प्रेम पूर्ण काव्यानुवाद 5
  6. प्रेम पत्रों का प्रेम पूर्ण काव्यानुवाद 6

19 जनवरी 2009

कैसा भय?

एक सैनिक अधिकारी अपनी नव-विवाहिता पत्नी के साथ समुद्री यात्रा कर रहा था. अकस्मात एक भयानक तूफ़ान आ गया. सागर की लहरें आसमान छूने लगीं. ऐसा प्रतीत होने लगा, मानो सामने साक्षात मौत खड़ी हो. सभी भय से कांपने लगे. किन्तु सैनिक के चेहरे पर भय का लेशमात्र भी चिन्ह नहीं था, वह सम्पूर्ण स्वस्थता के साथ खड़ा रहा.

उसकी पत्नी ने साश्चर्य पूछा, "इस भयानक तूफ़ान में भी तुम्हें जरा भी डर नहीं लग रहा है!"

सैनिक ने एक क्षण अपनी पत्नी के सामने देखा और झटके के साथ अपनी रिवाल्वर उसके सामने तानते हुए बोला, "क्या तुम्हें मुझसे भय लग रहा है?"
"नहीं तो !"
"क्यों?"
"क्या आप मेरे दुश्मन हैं, जो आपके हाथ में रिवाल्वर देख कर डर जाउं!"

रिवाल्वर नीचे करते हुए सैनिक ने कहा, "जिस प्रकार मेरे हाथ में रिवाल्वर थी, उसी प्रकार भगवान के हाथ में तूफ़ान है. तुम जिस प्रकार मुझे अपना समझ कर मेरे रिवाल्वर से नहीं डरीं, उसी प्रकार मैं भगवान को अपना समझता हूं. इसलिये भगवान से कैसा भय! वह जो करेगा, वह हमारे शुभ के लिये करेगा.

नोट: आज अपने पिता जी की संचित पुस्तकों को उलटते-पलटते 'भारतीय विद्या भवन' की 'भारती' पत्रिका के मार्च १९६५ के अंक में यह घटना-प्रसंग पढ़ाजो पाया उसे बाँट दूं- इसी अन्तःप्रेरणा से यह कथा प्रस्तुत है

नहीं, प्रेम है कार्य नहीं

प्रेमिका ने कहा था-"प्यार करते हो मुझसे?" प्रेमी ने कहा-"प्यार करने की वस्तु नहीं. मैं प्यार ’करता’ नहीं, ’प्यार-पूरा’ बन गया हूं.
यहां इसी संवाद का विस्तार है-

कहने वाला कह जाता है सुनने वाला सुन लेता है
लेकिन कहने और सुनने में कहीं विभेद छिपा होता है
कहने वाला तो सीधे ही मन की बातें कह जाता है
भाषा को अनुकूल बनाना भावप्रवण को कब आता है?
पर सुनने वाला तो केवल शब्दों की ही बात जानता
कहां भाव है, कहां अर्थ है, क्या प्रतीति है? नहीं जानता
वह तो निर्णय ले लेता है बिन विमर्श के लगातार
कहने वाला पा जाता है बिना हार के अपनी हार .

मैने भी जो प्रश्न किया था क्या वह साधारण लगता था?
बिना भाव के प्रेम तत्व का, क्या वह निर्धारण लगता था?
अरे, प्रेम तो पूजा है यह खिलता फ़ूल हृदय के भीतर
मन से मन मिलते ही बहता प्रेम रूप निर्झर सुन्दर
निर्धारण है नहीं प्रेम में, प्रेम बड़ी अनजान डगर है
’मैं को छोड़ प्रेम में आओ’ यही प्रेम का विह्वल स्वर है
कहा आपने प्रेम पूर्ण बन सको तभी कुछ हो सकता है
प्रेम बनाकर कार्य कोई क्या प्रेम हृदय में बो सकता है?
नहीं, प्रेम है कार्य नहीं, है एक अवस्था - यही सही
नहीं पूछ पायी जो मन में, बात गलत वह निकल गयी.

कोई कुछ यदि कहना चाहे और नहीं वह कह पाता है
तो उसके मन के भीतर कहने का दर्द छिपा होता है
मेरी भी है दशा वही, कहना है ना जाने क्या- क्या?
पर सत्य कहूं तो शब्द नहीं हैं ढूंढ़ रही हूं यहां-वहां.

जब कुछ भी कहने लगती हूं, यह लगता है कहीं कमी है
अगले ही पल भय लगता है, कहीं यही तो अधिक नहीं है?

18 जनवरी 2009

गोबर गणेशों की गोबर-गणेशता

"पहले आती थी हाले दिल पे हंसी
अब किसी बात पर नहीं आती ।"
कैसे आए? मात्रा का प्रतिबन्ध है । दिल के हाल का हाल जानिए तो पता चले कितनी मारामारी है ? हंसी का गुण ही है की वह वह तत्वतः मात्रा की अपेक्षा करती है । पहले हमें पाकिस्तान की करनी पर हंसी आती थी, अब नहीं आती। अब हमें भारत के धैर्य पर हंसी आती है, कुछ दिनों बाद नहीं आयेगी। सब मात्रा का प्रतिबन्ध है।

हंसाने के लिए तो जरूरी है कि परिस्थिति हल्की हो। परिस्थिति गंभीर होगी तो इसका बोझ हमारा हास्य-शील कैसे सह सकेगा? पर अब तो परिस्थिति गंभीर ही हो गयी है। कैसे हंसें? पर मैंने सोचा हंस सकते हैं अगर अरस्तू की बात माने । वह कहता है न कि वही हास्य-जनक है, जिसकी देश या काल से संगति न हो । तो अभी हमारे पास बहुत से तबीयत के उल्लू बसंत हैं हमारे देश में जिनकी देश, काल, परिस्थिति से कोई संगति नहीं। तबीयत के उल्लू बसंत मने ऐसे खद्दरधारी, कोटधारी, पगडीधारी प्राकृतजन जिन्हें विहाग के वक्त भैरवी और सुहाग के वक्त शिकवा करने की आदत है । पक्का नाम न बताउंगा, ख़ुद समझ लें।

खैर, मैंने कहा न कि अब हंसी नहीं आती। अआखिर उस समाज में हंसी कैसे आयेगी जहाँ सभी नग्न हैं? नग्नता केवल शरीर की ही मत समझें, मन की भी। शरीर की नग्नता कार्य है । कारण है- आलस्य। जहाँ नग्नता नियम बन जाय, अपवाद नहीं; विकास बन जाय, अवकाश नहीं, वहाँ क्या होगा? हंसी प्रदान कर सकने वाली नग्नता कपड़े न पहनने के आलस्य से स्वभाव बन जाय तो हंसी कैसे आयेगी? तो ऐसे निरंतर नंगे रहने की चाह रखने वाले प्राकृत जनों कैसे बताओगे देश की जनता को कि तुम अक्ल का बोझ भी नहीं उठा सकते! क्या कह पाओगे कि तुममें एक inertia भर गयी है जिसका मतलब परिस्थितियों से पलायन है ।

हमारे देश का भार ढोने वाले गोबर गणेशों! गोबर गणेशता से संतोष कर लेना विश्राम की वासना है, इसे त्यागो। अरे, गणेश तो लम्बोदर थे, वाहन था मूस । इसलिए नारद ने कहा 'राम' शब्द की परिक्रमा करो और वे गणपति बन गए। पर क्या तुम भी सच्चे गणेश के भक्त ही हो कि समझ लिया कि बिना प्रयास किए ही पूजा हो सकती है तो चलो, श्रद्धेय गोबर को ही गणेश मान बैठे हो । 'धैर्य' नामक शब्द की परिक्रमा से ही अपने कार्यों की इति समझ ले रहे हो, अपने पर ही नहीं फूले समा रहे हो ? पर ख़याल रखो, बुलबुले की तरह सतह पर तैरने वाले मत बनो । गंभीर हवा का एक झोंका आया, बुलबुले किनारे हुए।

17 जनवरी 2009

प्रेम पत्रों का प्रेमपूर्ण काव्यानुवाद 5

अब तक जो मैं हठ करती थी, हर इन्सान अकेला होता
मुझे पता क्या था जीवन यह अपनों का ही मेला होता.
यही सोचती थी हर क्षण केवल मनुष्य अपने में जीता
उसके लिये नहीं होता जग, ना वह किसी और का होता.

किसी एक का, किसी एक से मिलना परम असम्भव है
अलग-अलग दो अस्तित्वों का होना एक कहां सम्भव है?
ऐसे भाव भरे थे मन में मैं बेकल होकर जीती थी
एकाकी मैं किससे कहती मुझ पर कब क्या-क्या बीती थी?

तभी-तभी तो तुम आये थे, सत्य मिला था, सत्व मिला था
मेरे अन्तस में भी तेरे वृहत रूप का फ़ूल खिला था
अब तो प्रियतम दशा वही है, भूल गयी हूं निज को अपने
विस्मृत जग है, कण-क्षण विस्मृत,पाकर इस सुरभित को अपने

बस करती हूं, आज यहीं तक, प्राण! मुझे रह जाने दो
अपने प्रेम-सरित को मेरे हृदय जगत पर बह जाने दो.


प्रेम पत्रों के प्रेम पूर्ण काव्यानुवाद: सभी प्रविष्टियाँ

  1. प्रेम पत्रों का प्रेम पूर्ण काव्यानुवाद 1
  2. प्रेम पत्रों का प्रेम पूर्ण काव्यानुवाद 2
  3. प्रेम पत्रों का प्रेम पूर्ण काव्यानुवाद 3
  4. प्रेम पत्रों का प्रेम पूर्ण काव्यानुवाद 4
  5. प्रेम पत्रों का प्रेम पूर्ण काव्यानुवाद 5
  6. प्रेम पत्रों का प्रेम पूर्ण काव्यानुवाद 6

16 जनवरी 2009

सदैव सहमति में हिलते सिर

बहुत वर्षों पहले से एक बूढ़े पुरूष और स्त्री की आकृति के उन खिलौनों को देख रहा हूँ जिनके सर और धड़ आपस में स्प्रिंग से जुड़े हैं। जब भी उन खिलौनों को देखता हूँ वो अपना सर हिलाते मालूम पड़ते हैं । अपने बचपन में भी कई बार अपने दादा-दादी को देख न पाने की टीस इन्हीं खिलौनों से मिटा लिया करता था । बहुत सी बातें जो अम्मा-बाबूजी से व्यक्त नहीं कर पाता था, इन्हीं खिलौनों वाले दादा-दादी से कहता और उनका प्रबोध ले लिया करता था। इन खिलौनों वाले दादा-दादी का बड़ा ऋण है मेरे इस व्यक्तित्व पर ।

इन खिलौनों का सिर सदैव सहमति के लिए हिलता है। यद्यपि केवल एक अंगुली के विपरीत धक्के से इनके सिर के कम्पन की दिशा बदली जा सकती है, पर न जाने क्यों मानव-मन की अस्तित्वगत विशेषता के तकाजे से हर बार अंगुलियाँ इनके सिर सहमति के लिए ही कम्पित करती हैं। मुझे यह खिलौनों का जोड़ा बड़े मार्मिक गहरे अनुभूति के अर्थ प्रदान करता है। मैं सोचता हूँ कितना अच्छा होता- हर एक सिर इसी तरह सहमति में हिलता, प्रकृति और जगत के रहस्य को निस्पृह भाव से देखता, विधाता की प्रत्येक लीला को सहज स्वीकारता। जो घट रहा है इस संसार में, वह दुर्निवार है, तो यह खिलौनों का जोड़ा उसे सहज स्वीकृति देता है-जानता है की अगम्य है प्रकृति का यह लीला-विधान। जो रचा जा रहा है यहाँ, कल्याणकारी है, तो सहज ही सिर हिल उठते हैं आत्मतोष में इन खिलौनों के।

यह खिलौने जानते हैं कि संसार अबूझ है-जिह्वा की भाषा से व्यक्त न हो सकने वाला। तो जिह्वा की असमर्थता, भाषा की अवयक्तता उनकी इसी मौन सिर हिलाने की अभिव्यक्ति में प्रकट होती है। शायद इन खिलौनों का सहमति में सिर हिलाना विशिष्टतः बोलना है। भाषा और शब्द का संसार इतना सीमित नहीं कि वह जिह्वा और अन्य वाक् अंगों का आश्रय ले। 'पाब्लो नेरुदा' की एक कविता स्पष्टतया व्यक्त करती है कि शब्द और भाषा का संसार कितना व्यापक हो सकता है-
"......For human beings, not to speak is to die-
language extends even to the hair
the mouth speaks wothout the lips moving
all of a sudden the eyes are words..."

(मनुष्य के लिए चुप्पी मौत है -
केश तक में भाषा का विस्तार है,
मुख बिना होंठ हिले बोलता है
हठात आँखें शब्द बन जाती हैं.... ।)
शायद यही कारण है कि इन खिलौनों का स्वरूप मुझे अपनी अनुभूतियों की राह से गुजरने के बाद शाश्वत मनुष्य का स्वरूप लगता था, इनका मौन गहरी मुखर अभिव्यक्ति बन जाता था और इनका सत्वर सिर हिलाना मानवता और अस्तित्व की सहज स्वीकृति लगाने लगता था। यह सच है कि इनके केश नहीं थे, आँखें भी नहीं थीं, होठ भी नहीं थे सचमुच के (और इसीलिये यह 'नेरुदा' के मनुष्य नहीं थे) पर हो सकता है कि 'मनुष्य' को खोजते हुए मेरे इस अतृप्त मानस ने इन्हीं में अपने सच्चे मनुष्य का स्वरूप देख लिया हो ।

15 जनवरी 2009

कविता लम्बी है, पर क्या करुँ कहानी है 2

तुम पर तो होकर न्यौछावर हम सब कुछ थे वार गये
पर सत्य कहो, क्यों इस समाज के लघु चिंतन से हार गये
यह समाज तो कहने को केवल अपनों का मेला होता
सत्य कहूं तो इस समाज में हर एक व्यक्ति अकेला होता
पर एक अनोखी बात! प्रीति की रीति जिसे भी आ जाती है
और जिसे यह प्रीति हृदय की विरद नीति समझा जाती है
उसे अकेलेपन का भय भी कहाँ सता पाता है क्षण भर?
वह तो इस एकाकीपन को ही जीता रहता है जीवन भर
और इसी एकाकीपन में हृदय द्वार जब आता कोई
अंधेरी-सी नीरवता में गीत रश्मि बिखराता कोई
तब उस मनभावन का दर्शन, भर देता है उर में कम्पन
और इन्ही कम्पन-पंखों पर उड़ता है प्रेमी का निज-मन
फ़िर तो एकाकीपन अपने हीन भाग्य पर रोने लगता
डूब रास में उर के स्नेही एकाकीपन खोने लगता ।

मन दर्पण हो जाता है, प्रिय शशि मुख दर्शन को तत्पर
विकसित होता लावण्यधाम का प्रीति-पुष्प उर के भीतर
नर्तन करता कण-कण,क्षण-क्षण,बिसरा-सा होता यह तन-मन
प्रिय के हेतु स्वयं का प्रिय ही होता है शाश्वत जीवन धन ।

यह धन ही जब निज जीवन से अनायास दूर हो जाए
बोलो! प्यासा बिन पानी के कैसे क्षण भर भी जी पाये
और किया क्या था मैंने जो तुमने यह परिणाम दे दिया
जिउं सिसकती जीवन भर, मुझको वैसा आयाम दे दिया ।

निश्चय ही जीना अब तो केवल बस एक बहाना है
मैं व्यर्थ नहीं हूँ धरा-धाम पर, तुमको तथ्य बताना है
यह जानो, नारी भले ही सबकुछ पत्थर रखकर सह लेती है
मिली परिस्थिति जो भी उसमें निर्देशित वह रह लेती है
फ़िर भी वामा है सत्व धारिणी, संचित उसमें है शक्तिधाम
संयम की वह मूर्ति रूपिणी, ममता-प्रेम उसी के नाम
दिखलाउंगी नारी क्या है? खाती हूँ यह अनिवार्य शपथ
फ़िर भी जैसे हो स्नेह-विगत! आलोकित हो तेरा आगत-पथ ।

14 जनवरी 2009

अंधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है ?

बड़ी घनी तिमिरावृत रजनी है. शिशिर की शीतलता ने उसे अतिरिक्त सौम्यता दी है. सबकी पलकों को अपरिमित विश्रांति से भरी हथेलियां सहलाने लगीं हैं . नयन-गोलकों के नन्हें नादान शिशु पलकों की थपकी से झंपकी लेने लगे हैं. अब काम आराम का क्षपापन स्तोत्र बांचने लगा है . Rest belongs to the work as eyelids to the eye.

मैं शय्या-सुख से विरत हो बाहर निकल आया हूं . नक्षत्र खचित नीरव-रात्रि का आकर्षण बड़ा अद्भुत है। स्वच्छ टिमटिमाते तारों के अक्षर में लिखी आकाश-पाती प्राप्त हुई है । सांसे विराट के सन्देशों का स्वगत वाचन प्रारंभ कर देती हैं। याद आ जाती है ’ भागवत’ के ’गजेन्द्र मोक्ष’ की वह पंक्ति - "तमस्तदासीत गहनं गभीरं, यस्तस्य पारेभिराजते विभुं।" - तब घोर गंभीर अन्धकार था। वह विभु उसीके पार बैठा था.

बहुत गहरी से गहरी अनुभुति की मन्जूषा के पट खुल जाते हैं. अन्धकारपूरिता निशा मां की गोद सी सुखद प्रतीत होती है. विविधाकार विलीन हो गया है. एक ही मां की ममतामयी गोद में सारा कोलाहल शांत हो गया है. ’One appears as uniform in the darkness'. मैं अंधेरे की लय में तल्लीन होने लगता हूं.

अन्धेरा परमातिपरम है. व्यर्थ ही भयभीत होते हैं हम इसके कारुण्यमय विस्तार में - "The mystery of creation is like the darkness of night." क्यों न प्रार्थना की विनत भावाकुलता में माथा झुक जाय .

मैं रात्रि की गहनता का चारण बन जाता हूं. डरो मत - ’मा भेषि’- का इंगित करती निशा को प्रणाम करता हूं. क्यों नहीं समझते हम कि प्रकाश का उत्स यह अन्धकार है. रात्रि की ही अधिष्ठात्री का नाम तो उषा है. पंत की भाषा में कहें तो क्या नहीं है यह रात्रि ? - "देवि, सहचरि, मां." बड़ी ही भावाकुलित बेला में टैगोर के मुख से निकला था -

"I feel thy beauty, darknight, like that of the loved woman, when she has put out the lamp".

हमारी नासमझी ने रात्रि की गहनता को अबूझ पहेली बना दिया . मां के गर्भ से अन्धमय क्या होगा जहां सृजन अपने को संवारता है. हमारी ही भूल है कि हमने रात्रि की अंचल छांव को दुःखान्तक खेल समझ लिया. तुम्हारे सांय-सांय के स्वर में सन्नाटे का संगीत बार-बार हमें यही समझा रहा है - "मां भेषि, मां भेषि"- ’मत डर, मत डर. "
रात की इस गहनता ने समझा दिया है -

"We read the world wrong / and say that it deceives." - TAGORE
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विशेष :यह प्रविष्टि दो दिन पहले लिखी थी । इस प्रविष्टि को बहुत हद तक ललित निबंध का स्वरूप देने की प्रेरणा मेरे बाबूजी की हैबहुत सारे उद्धरण उन्हीं से लिए हैं, इस प्रविष्टि पर चर्चा करते हुएबहुत कुछ मेरा नही है इसमें, पर हौसला मेरा है

कविता लम्बी है, पर क्या करुँ कहानी है

नीचे की कविता, कविता नहीं, कहानी हैनीतू दीदी की कहानी कह रहा हूँ मैंमेरे कस्बे के इकलौते राष्ट्रीयकृत बैंक में कैशियर होकर आयी थीं और पास के ही घर में किराए पर रहने लगीं थींसहज आत्मीयता का परिचय बना-कब गूढ़ हुआ- मैंने नहीं जानाकुल छः महीने रहीं नीतू दीदीट्रांसफर हो गया उनकापर इन छः महीनों में नीतू दीदी के भीतर का अनंत गह्वर मैंने पहचानाउस चुलबुली चिड़िया के अन्तर में चिपकी हुई बेचैनी मैंने महसूसीएक दिन बाँध ढहा, सब कुछ बह निकला- बातों ही बातों मेंअब मैं जान गया था, नीतू दीदी ने तब तक शादी क्यों नहीं की थी? वह कभीं भी शादी क्यों नहीं करेंगी? जो उन्होंने मुझसे कहा, ज्यों का त्यों यहाँ -

यह खेल नियति का देखो, कितना विपुल कष्टदायी है
विकल हुआ है हृदय, आज प्राणों पर बन आयी है
जो सौभाग्य पुष्प था अपना वही हृदय का शूल हुआ है
जो उर में उल्लास रूप था वह कष्टों का मूल हुआ है
तरु की छाया समझ रही थी, वह तो दुःख की कठिन धूप है
जो उल्लास समझ बैठी थी, वह तो केवल विजन रूप है
इस संसार सकल में इतना, कहाँ कहाँ कैसा संशय है
सरल रूप में हुआ दृष्टिगत, पर देखो कितना विस्मय है?

खूब घिरे थे बादल , लेकिन बिन बरसे ही चले गए
हम भी कैसी तृप्ति आस से विस्मित होकर छले गए
आज दूर निज से होकर बेचैन हुआ जाता है मन
प्रेम वारि से विलग कहाँ होकर रह पाता है जीवन ?

जिन्हें हृदय का अधिपति समझा, उनसे क्या यह प्रत्याशा थी?
क्या मुझको समझाने लायक, केवल एक यही भाषा थी ?
क्या क्षणभर में ही खो बैठे, अपनी दृढ़ता, अपना चिंतन ?
क्या भूल गए जो कभी दिया था मुझको वह अनमोल वचन-
"जग छूट जाय परिवार सही, पर हम विलग हो पायेंगे
अपनी नीरवता में ही हम आनंद सुधा बरसाएंगे "
क्या यह छल था? किया बात से तुमने जी भर कर सम्मोहित
मैं विरहित मोहित हो बैठी आज कंटकों से हूँ लोहित

यह सत्य, विरह में प्रेम हृदय में संचित होकर रह पाता है
यह सत्य, मिलन में प्रेम 'प्रेम' की आंखों से बह-बह जाता है
पर मिलन कहाँ, है विरह कहाँ, यह तो है मुझ पर अनाचार
क्या किया नहीं कुछ भी विचार, मैं आज पडी हूँ निराधार!

उस दिन की याद करो क्षण भर, जब रूप-राशि विस्मित थे हम
आलोक-बिन्दु हिय में संचित था, कण-कण में सुरभित थे हम
गूंजा करता था सजल गान, यह प्रकृति मधुर मुस्काती थी
तुम खो जाते थे शून्य बीच, मैं भी अनंत खो जाती थी
उन प्राणों का कहना क्या था, नर्तन करता आनंद वहाँ
सोचो! जब प्रमुदित हो मानस, स्वीकार तब वह बंध कहाँ?
कैसी अनूप थी, साग्रह थी, अपनी यह प्रेम-पिपासा भी
हो उत्सर्ग प्राण तेरे हित मन की यह अभिलाषा थी
पर हाय! हमारी रूचि कितनी शुचिहीन प्रतिष्ठित होकर आयी
तेरी छवि भी हृदय-मध्य की प्रेम-प्रतिष्ठा खोकर आयी

-क्रमशः -

13 जनवरी 2009

तुम्हारी प्रेम-पाती के लिए

तुम्हारे लिखने में बड़ा हौसला है ।

मेरे जीवन के गीत भी तुम्हीं ने लिखे
प्रणय के स्वप्न तुमने ही अंकित कर दिए
और हृदय के उन तारों को, जो
वर्षों से सोये पड़े थे, तुमने ही
अपनी लेखनी से झंकृत कर दिया ।

तुम्हारे लिखने में युगों-युगों की प्यास है
पर आतुरता नहीं,
तुम्हारे लिखने में दृढ़ता है
अनंतकाल की गति की ।

तुमने लिखा समाज की
अतिरंजना को पददलित कर,
निहार कर भर आँख
अपनी विचार अभिव्यंजना को
और उतार कर अपने अंतस में
जीवन का विंहसित और सुरभित रूप ।

तुम्हारा लिखना
जीवन को सजाना, निहारना
उसमें खो जाना है ।

11 जनवरी 2009

सर्वत्र तुम

मैंने चंद्र को देखा
उसकी समस्त किरणों में
तुम ही दिखाई पड़े
मैंने नदी को देखा
उसकी धारा में तुम्हारी ही छवि
प्रवाहित हो रही थी
मैंने फूल देखा
फूल की हर पंखुड़ी पर
तुम्हारा ही चेहरा नजर आया
मैंने वृक्ष देखा
उसकी छाया में मुझे
तुम्हारी प्रेम-छाया दिखाई पड़ी
फ़िर मैं आकाश की ओर देखने लगा
उसके विस्तार ने खूब विस्तृत अर्थों वाली
तुम्हारी मुस्कान की याद दिला दी
और तब मैंने धरती को देखा
उसके प्रत्येक अवयव में तुम ही
अपनी सम्पूर्ण प्रज्ञा के साथ अवस्थित थे,

मैं सम्मोहित था
मैं स्वयं को देखा
मेरी बुद्धि, आत्मा, हृदय - सब कुछ
तुम्हारे ही प्रकाश से प्रकाशित था,

वस्तुतः वाह्य में भी तुम हो,
अन्तर में भी तुम -
सर्वत्र तुम ।

चाटुकारिता का धर्म-शास्त्र

आज का मनुष्य यह भली भाँती समझता है कि उसकी सफलता के मूल में वह सद्धर्म (चाटुकारिता) है, जिसे निभाकर वह न केवल स्वतः को समृद्धि और सुख प्रदान करता है, बल्कि दूसरे की महत्वाकांक्षा व उसके इष्ट को भी साधता है ।
कितनी सुखद और विशद है इस सद्धर्म की गति ? इस लोकैषणा के युग में जहाँ सब कुछ प्राप्य नहीं, जहाँ संघर्ष ही जीवन है, जहाँ टूटन ही बिखरी पड़ी है चंहुओर , यह चाटुकारिता ही है जो अपनी मनोहारिता से, अपनी वाक् चतुरता से ऐसी सृष्टि निर्मित करती है जहाँ हमें सब कुछ प्राप्त होता बिना संघर्ष के, बिना कठिन गति के ।

वर्तमान का सत्य है, जिससे इष्ट सधे वही देवता है । आज न जाने कितने भद्र हैं जो धन और शक्ति का केन्द्र बनकर देवता हो जाते हैं । फ़िर तो आज के मनुष्य के लिए आसानी हो जाती है, वह जितने चाहे उतने देवता बदल ले। हमारा प्राचीन देवता ऋचाएं सुनता था, प्रार्थना के विभिन्न गीत भी, और प्रसन्न हो जाया करता था, वरदान दिया करता था; हमारा आधुनिक देवता भी इस परम्परा को जीवित रखता है, बस ढंग बदल जाता है ।

मानव, मानव का वैशिष्ट्य निरुपित करता है चाटुकारिता से । कितना उत्कृष्ट मानववाद है ? चाटुकारिता का महनीय कार्य मनुष्य के आकांक्षा जगत और वस्तु जगत के मध्य के अन्तर को समाप्त कर देता है । चाटुकार अपनी चाटुकारी से हमारे सामने आकांक्षाओं का स्वर्ग निर्मित करता है, और हमें तत्क्षण ही उस स्वर्ग का अधिपति बना देता है । चाटुकार अपने कौशल से हमें हमारी सीमाओं के बोध से मुक्त कर देता है । हम झट से सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान बन जाते हैं ।

चाटुकार 'शब्द' की आराधना करता है। आख़िर शब्द ही तो ब्रह्म है । शब्द की मंत्र-शक्ति से वह हमें तुंरत ही जड़ से सूक्ष्म, नित्य से अनित्य, लघु से विराट में रूपांतरित कर देता है । वह इन शब्दों से हमारे सामने जो चित्र खींचता है, हम उस चित्र के साक्षात्कार से अभिभूत होने लगते हैं । अब हम पथ के साथी नहीं रह जाते, पथ के दावेदार हो जाते हैं । वस्तुतः चाटुकार की सफलता यही है ।

कितना सारग्रही है, इस चाटुकारिता के धर्म का पालन ? हमारे उसी पुराने धर्म की तरह भक्त और भगवान् के अन्योन्याश्रित सम्बन्ध का वाहक है यह धर्म । और बड़ा ही समतामूलक धर्म है यह । देवता भी मनुष्य, पूजने वाला भी मनुष्य । प्रासंगिक भी कितना है हमारे युग के लिए कि दुर्बल और अपने अस्तित्व के प्रति शंका-ग्रस्त मनुष्य भी चाटुकार बन अपना अस्तित्व संवार सकता है, और सटीक कितना है इस लोकतंत्र के लिए कि इसमें अभिव्यक्ति की पूरी गुंजाइश विद्यमान है, क्योंकि लोकतंत्र में सबको अपनी अभिव्यक्ति का पूरा अधिकार है ।

10 जनवरी 2009

तुम हँस पड़ते हो...

मैं अकेला खड़ा हूँ
और तुम्हारे आँसुओं की धाराएँ
घेर रही हैं मुझे ,
कुछ ही क्षणों में यह
पास आ गयी हैं एकदम ,
शून्य हो गया है मेरा अस्तित्व
बचने की कोई आशा ही नहीं रही,
मैं हो जाता हूँ निश्चल,
फ़िर धाराएँ
जिधर चाहती हैं बहा ले जाती हैं
मेरे जैसा अधीर, गंभीर हो जाता है
मेरा मस्तिष्क, मेरी आत्मा,
मेरा चिंतन -सब कुछ
इन धाराओं के अधीन हो चला है ,
इन धाराओं की गति से
मैं निश्चेष्ट तुम्हारे सम्मुख
आ पड़ा हूँ, और तुम
उन्हीं आँसू भरी आंखों से
निहार रहे हो मुझे ...
..........................
तभी तुम हँस पड़ते हो
मैं जी उठता हूँ ।

9 जनवरी 2009

किं कर्मं किं अकर्मं वा ....

प्रातः काल है । पलकें पसारे परिसर का झिलमिल आकाश और उसका विस्तार देख रहा हूँ । आकाश और धरती कुहासे की मखमली चादर में लिपटे शांत पड़े हैं । नन्हा सूरज भी अभी ऊँघ रहा है । मैं हवा से अंग छिपाए परिसर में टहल रहा हूँ । एक ही, बस एक ही नन्ही भोली चिड़िया फुदक-फुदक कर चोंच में कीड़े पकड़ रही है । उन्हें फटे चीथड़े की तरह उछालती है और निढाल कर खा जाती है ।

यह वही कीट है जो धरती के भारीपन को भुरभुरा बनता है । परती को बाँझ का कलंक नहीं लगाने देता है। निर्विष है । निरापद है। निष्प्रयोजन नहीं है । निरंकुश नहीं है । चलता है तो खलता नहीं है । विकलता में उबलता नहीं है । उसकी तबियत खराब नहीं होती । केंचुआ है वह । क=जल । जैसे 'कंज', जल में जन्मा । के = जले। च्युतः=डाल दिया गया । केंचुआ = जल में गिरा दिया गया । वंशी लगाने वाला मछुवारा केंचुआ फंसा कर मछली बाहर खींच लेता है । इतना तुच्छ है, इतना निरीह है कि प्रतिरोध भी नहीं करता । बेचारा।

इसी केंचुए को चिड़िया चीथड़े में बदल रही है । केंचुए की तबीयत और अपनी आदमीयत की तुलना करने लगता हूँ । यदि उसे मरने देता हूँ तो निरीह के वध का द्रष्टा बना अपराध बोध से भरता हूँ। यदि चिड़िया को उड़ा देता हूँ तो भींगी सुबह में एक नन्हें पखेरू को भूख से बिलखने देने का अपराधी बनता हूँ। क्या करुँ, क्या न करुँ ? भाग्य और कर्म की श्रेष्ठता का सनातन प्रश्न सामने खडा हो जाता है। जगद्गुरु कृष्ण की पंक्ति बुदबुदाने लगता हूँ -
"किं कर्मं किं अकर्मं वा मुनयोप्यत्र मुह्यते "।
'जीवो जीवस्य भोजनम्' को सहजता से स्वीकार करने में तिलमिला जाता हूँ । पर नियति की गति निराली है, प्रकृति का ढंग अपना । लेकिन, लेकिन ही बना है । केंचुए का मरना, पक्षी का पेट भरना -दोनों चक्की के पाटों में मैं पिस रहा हूँ ।

8 जनवरी 2009

तुम्हारे सामने ही तो अभिव्यक्त हूँ

कुछ अभीप्सित है
तुम्हारे सामने आ खड़ा हूँ
याचना के शब्द नहीं हैं
ना ही कोई सार्थक तत्त्व है
कुछ कहने के लिए तुमसे।

यहाँ तो कतार है
याचकों, आकांक्षियों की,
सब समग्रता से अपनी कहनी
कहे जा रहे हैं

न तो मेरी तुम्हारे मन्दिर में
कुछ कहने की सामर्थ्य है
ना ही कुछ करने की,
तुम्हारे श्रृंगार में
एक भी अंश मेरा नहीं,
फ़िर भी आ खड़ा हूँ ।

क्या स्नेह न दोगे,
स्वीकार न करोगे मेरा अभीप्सित ?
अनवरत संघर्षों में उलझा मेरा जीवन
तुम्हारे सामने ही तो व्यक्त है,
हर मौन, संवाद होकर प्रस्फुटित है,
और मैं अकिंचन
तुम्हारे सामने ही तो व्यक्त हूँ।

7 जनवरी 2009

मेरा मानक विचलन नहीं हो पाया

आलोचना प्रत्यालोचना एक ऐसी विध्वंसक बयार है जो जल्दी टिकने नहीं देती। प्रायः संसार में इसके आदान कम, प्रदान की उपस्थिति ज्यादा देखी जाती है। मेरे जीवन के क्षण इस बयार में बहुत बार विचलित हुए हैं। अभी कल की ही बात है। एक व्यक्ति ने मेरी रहनी पर रहम नहीं किया । मैं जिस मनोभूमि में कुछ लिखता पढ़ता हूँ , उस पर उसकी खरी टिप्पणी थी कि 'कुछ नहीं मिलेगा इससे । तेरा स्वान्तः सुखाय दो कौड़ी का है । दुनियादारी का दामन पकडो । क्यों बर्बाद हुए जा रहे हो । "अर्थागमोनित्यमरोगिता च प्रिया च भार्या प्रिय वादिनी च " का सूत्र भूल कर भटक गए हो, मूर्ख कहीं के ।

ऐसा पूर्व में भी कई बार घटित हुआ है, किंतु तब उसे मैंने समीक्षा के रूप में, अनुशीलन के रूप में लिया, आलोचन के रूप में नहीं । अब जब मुझमें विचलन ने स्थान बनाना प्रारंभ किया तो आत्ममंथन को बाध्य हो गया । "They also serve who stand and wait" की Miltonic Feeling ने फिसलते पांवों को रोक दिया । किसी ने जैसे भीतर से संबल दिया कि कल्पना द्वारा प्रतीत होने वाला सत्य, बहुमत द्वारा मान्य सत्य, स्थूल रूप से दीखने वाला सत्य, विचारों की कसौटी पर खरा लगाने वाला सत्य और व्यवहार में माने जाने वाले सत्य का चिंतन करते रहो । दूसरों की तरह क्या होना है ? क्या दूसरे वैसे हैं, जैसे तुम हो ? मेरा मानक विचलन नहीं हो पाया।

सामान्यतः यह देखा गया है कि आदमी दूसरे की आलोचना करने में आनंदित होता है, पर छिद्रान्वेषण की आँख यदि अपनी और खुल जाय तो अपना खालीपन भर जाय । ऊंची चढ़ाई चढ़ने के लिए हमें उन सीढियों पर अधिक ध्यान रखना होगा जो स्वयं हमारे पैरों के नीचे अवस्थित हैं । आलोचना अभिमान का ही पोषण है। प्याज-लहसुन को कूट कर यदि किसी पात्र में रखा जाय, और फ़िर उसे सैकड़ों बार क्यों न धोया जाय, उसकी गंध नहीं जाती । वैसे ही आलोचक में अभिमान का चिन्ह कुछ न कुछ रह ही जाता है ।

प्रसिद्द दार्शनिक 'देकार्त' से उसके प्रति किए गए व्यवहार का बदला लेने की बात उसके शुभेच्छु कहते रहे; पर वे धीरे से बोले - " जब कोई मुझसे बुरा व्यवहार करता है, आलोचना की आग में जलने के लिए मुझे धकेलता है, तो मैं अपनी आत्मा को उस ऊंचाई पर ले जाता हूँ, जहाँ कोई दुर्व्यवहार उसे नहीं छू सकता । आवेश और क्रोध को वश में कर लेने से शक्ति बढ़ती है । "

रविन्द्र की आलोचना से तिलमिलाए शरदचंद्र ने जब उनके विरुद्ध कुछ करने, कहने की बात उनसे कही तो गुरुदेव बोले -
"शरद बाबू ! मैं स्वप्न में भी ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं कर पाउँगा, जैसा वे कर रहे हैं । मेरी चेतना के वातायन से धैर्य, सहिष्णुता और सद्भाव का चंद्र झाँक गया । जो हो, वही तुम्हारा स्वधर्म है। "
"All is well and wisely put."

4 जनवरी 2009

कहा जाता है की प्रेम का स्वाद तीखा होता है

प्रेम के अनेकानेक चित्र साहित्य में बहुविधि चित्रित हैं। इन चित्रों में सर्वाधिक उल्लेख्य प्रेम की असफलता के चित्र हैं। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से प्रेम की असफलता एवं इस असफलता से उत्पन क्रिया-प्रतिक्रया पर काफी विचार किया जा सकता है, पर मैं यहाँ विचार नहीं, प्रेम की असफलता से उपजी प्रतिक्रया के दो कथा-प्रसंग लिख रहा हूँ। यह दो प्रसंग दो भिन्न मनोवृत्तियों का चित्र खींचते हैं । मैंने इन्हें 'डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी' के एक निबंध में पढा और यहाँ प्रस्तुत करने से ख़ुद को रोक नहीं पाया। यद्यपि ये प्रसंग सर्वज्ञात हैं परन्तु फ़िर भी.... ।

पहला प्रसंग अंगरेजी साहित्य के प्रख्यात कथाकार 'आस्कर वाइल्ड' के बाइबिल वर्णन पर आधारित नाटक 'सलोमी'से है । सेलोमी प्रसिद्द नृशंस अत्याचारी राजा हैरोड की सौतेली पुत्री है। हैरोड ने अपने राज्य के एक संत जोकानन को बंदी बना कर अपने कारागृह में रख छोड़ा है । सेलोमी इस जोकानन से प्रेम करती है और प्रयास करती है कि उसे उसके प्रेम का प्रतिदान मिले । अनेक प्रयत्नों के बाद भी उसे उसके प्रेम का प्रतिदान नहीं मिलता । एक अतृप्त कामना के वशीभूत होकर उसके मन में प्रतिशोध का भाव जगता है । वह हैरोड को अपने नृत्य से मुग्ध कर लेती है और उससे अपनी एक बात मान जाने का वचन ले लेती है। वह हैरोड से कहती है कि उसे जोकानन का सर काट कर दिया जाय। हैरोड अनेक आपत्तियां करने के बाद भी वचनबद्ध होने के कारण जोकानन का सर काटकर सेलोमी को देता है। सेलोमी उस कटे सर को अपने हाथ में लेती है और उसके होठों को चूमती हुई कहती है - "कहा जाता है कि प्रेम का स्वाद तीखा होता है"।

दूसरा प्रसंग हिन्दी नाटककार 'जयशंकर प्रसाद' के नाटक 'चन्द्रगुप्त' का है। मालविका चन्द्रगुप्त को प्रेम करती है, और चन्द्रगुप्त को ही अपना सर्वस्व मानती है । मालविका का यह मौन-प्रेम निखरता जाता है, परन्तु चन्द्रगुप्त उसके इस मौन प्रेम व समर्पण को पहचान नहीं पता और किंचित पहचान भी लेता है तो मन से उसे स्वीकार नहीं करता। कारण, वह कार्नेलिया से अगाध प्रेम करता है । मालविका चन्द्रगुप्त से उपेक्षिता है, परन्तु वह अपने प्रेमी चन्द्रगुप्त की रक्षा के लिए अकेली उसकी शय्या पर सोती है, जहाँ चन्द्रगुप्त के धोखे में विरोधी दल के सैनिक उसका वध कर डालते हैं।

वह डोर ही नहीं बुन पा रहा हूँ

मैं जिधर भी चलूँ
मैं जानता हूँ कि राह सारी
तुम्हारी ही है, पर
यह मेरा अकिंचन भाव ही है
कि मैं नहीं चुन पा रहा हूँ अपनी राह ।

मैंने बार-बार राह की टोह ली
पर चला रंच भर भी नहीं, टिका रहा
मैं जानता हूँ कि दस-दिगंत में
तुम्हारा बधावा बज रहा है, पर
यह मेरे कान ही हैं जो इस ध्वनि को
नहीं सुन पा रहे हैं ।

मैं क्या करुँ अपनी इस नींद का
कि तुम बार-बार
खटका देते हो मेरे द्वार, पर
यह आँखें खुलती ही नहीं ।
मैं महसूस करता हूँ कि
अनगिनत गीतों का खजाना
पथाते हो तुम मेरे लिए, पर
मैं उन्हें गुनगुना नहीं पाता क्योंकि
मुझे उनकी धुन नहीं मालूम ।

मैं ललचा रहा हूँ
कि तुम्हारे पाँव निरख लूँ
और खिंचा चला जाऊं तुम्हारी ओर,
और जबकि मैं जानता हूँ कि
तुम अवश बाँध जाते हो प्रेम-पाश में,
मैं अभागा
वह डोर ही नहीं बुन पा रहा हूँ ।

3 जनवरी 2009

एक दिन ब्रह्मा मिल जाते...

एक दिन ब्रह्मा मिल जाते
तो उनसे पूछता कुछ प्रश्न
और अपनी जिज्ञासा शांत करता
कि क्यों नहीं पहुंचती
उन तक किसी की चीख ?

उनसे पूछता कि
जिसका ताना मजेदार, खूब रसभरा है
फलदार क्यों नहीं हो गयी वह ईख ?
और जानता कि
जिसकी लकडियाँ बांटती हैं सुगंध चहुँओर
उस चंदन के वृक्ष में
क्यों नहीं दीखता कोई फूल ?
और समझता कि
जिसे चमकते देख
मुग्ध हो जाता है मन
उस स्वर्ण ने गमकाना क्यों नहीं सीखा?
और जवाब मांगता उनसे कि
क्यों अल्पायु होते है सुधि-क्षण
और विद्वान को
क्यों नहीं मिलती भली-भीख ?

एक दिन ब्रह्मा मिल जाते
तो उनसे पूछता यही कुछ प्रश्न ।

2 जनवरी 2009

'अति सूधो सनेह को मारग है'

कल मेरे पास के घर की वृद्धा माँ को वृद्धाश्रम भेंज दिया गया । याद आ गया कुछ माह पहले का अपना वृद्धाश्रम-भ्रमण । गया था यूँ ही टहलते-टहलते अपने जोधपुर प्रवास के दौरान । सोचा था देवालय जैसा होगा । आँखें फटी रह गयीं । वृद्धाश्रम के सरंक्षक श्री अग्रवाल जी ने सुविधाएं जुटाने में कोई कोर-कसर नहीं छोडी थी । खेल का सरजाम था, पुस्तकालय-वाचनालय था, भ्रमण-वाटिका थी, सर्वधर्म की देव-प्रतिमाएँ थीं, सुस्वादु भोजन की थाली थी, और भी बहुत कुछ । सुभाव और स्वभाव की लेनी-देनी थी। किंतु एक अभाव की भांग पूरे कूएं में पडी थी । वास में ही उपवास था । हास में भी बैठा उपहास मुँह बिरा रहा था । सुन्दरता के वस्त्र में मुझसे अदृश्य नही रह सका असुन्दरता का पैबंद।

मुझे चाट थी कि परिपक्वता का साक्षात्कार होगा, पर दिखाई दी प्रेम की, नेह की, रागात्मकता की कपाल क्रिया । सब की किसी न किसी रूप से अपनत्व की पोटली खो गयी थी । एक व्यक्ति ऐसा मिला जिसको उसका पुत्र लक्जरी कार में बैठा कर लाया था, मुड़ा और छोड़ गया । कहा, पैसा भर सकते हैं, परवरिश नहीं कर सकते । एक की आंसू भरी आँखें बोल रही थीं - "कोई मुझे माँ कह देता !" एक ने कान से सट कर कहा -"लकुटी थमा दो, भीड़ में भी अकेलापन लगता है "।

अनाथालय तो समझ में आता है, यह वृद्धालय कौन सी बला है ? "नित्यं वृद्धोपसेविनः" की आत्मीयता को लकवा क्यों मार गया ? यहाँ सुघराई की दुहाई तो सुनी, पर वैसे ही - "ज्यों खगेश जल की चिकनाई"। याद आयी वह बात -
"O,Beauty, find thyself in love, not in the flattery of the mirror."
सब है यहाँ, किंतु वही ढाई आखर विदा हो गया । पिटा-पुत्र के बीच का, पति-पत्नी के बीच का, सेवक-स्वामी के बीच का, शिक्षक-शिक्षार्थी के बीच का वही ढाई अक्षर- 'प्रेम'-खो गया है । यों ही कबीर ने नहीं कह दिया होगा-
"ढाई आखर प्रेम का पढे सो पंडित होय । "
मैं तब और तिलमिला गया, जब एक वृद्ध ने कहा - "यहाँ आने के पहले तीन मंजिले घर में ऊपर एक जगह अकेले छोड़ दिया गया जीव था। सीढियां चढ़ते-उतरते समय बच्चों के शरीर से शरीर छू जाता था, लेकिन कोई मुझसे बोलता नहीं था ।" अरे यह तो पशुता का नंगा नाच है । वे पशु बिचारे इतने रागी तो अवश्य होते हैं कि वध के लिए उठे हाथ को भी चाटने लगते हैं । किंतु आदमी से आदमी की यह बेरुखी ? मेरा मन कहता है, लौट आए वह दिन जब प्रेम की फुलवारी खिलेगी। मेरा 'अहं', मेरा 'मैं' जीवन में ममत्व की चासनी में पग जायेगा। स्वार्थ का रोग परार्थ के राग में मिट जायेगा । क्या कहूं -
"अपने भीड़ भरे आँगन में,
नरकट खड़ा अकेला ।
क्योंकि किसी ने नहीं प्रीति-घट
उस पर हाय उड़ेला ।"
क्या कहना पड़ेगा कि दुनिया को सुधारने से पहले हम अपना सुधार कर लें। घर में दिया जलाएं, कोई मन्दिर कभी फ़िर खोज लेंगे । स्वजन-सौहार्द्र को पसरने दें । निरापद पंथ है यही कि नेह की माला न टूटे । बाकी गली आगे मुड़ती है ।
"He who wants to do good knocks at the gate, he who loves finds the gate open."

एक स्त्री के प्रति

स्वीकार कर लिया
काँटों के पथ को
पहचाना फ़िर भी
जकड़ लिया बहुरूपी झूठे सच को
कुछ बतलाओ, न रखो अधर में
हे स्नेह बिन्दु !
क्यों करते हो समझौता ?

जब पूछ रहा होता हूँ, कह देते हो
'जो हुआ सही ही हुआ' और
'
जो बीत गयी सो बात गयी' ,
कहो यह मौन कहाँ से सीखा ?
जो समाज ने दिया
अंक में भर लेते हो
अपने सुख को, मधुर स्वप्न को
विस्मृत कर देते हो
यह महानता, त्याग तुम्हीं में पोषित
कह दो ना, ऐसा मंत्र कहाँ से पाया ?

मन के भीतर
सात रंग के सपने
फ़िर उजली चादर क्यों ओढी है तुमने
हे प्रेम-स्नेह-करुणा-से रंगों की धारित्री तुम
स्वयं, स्वयं से प्रीति न जाने
क्यों छोड़ी है तुमने ?

मैं अभिभूत खडा हूँ हाथ पसारे
कर दो ना कुछ विस्तृत
हृदय कपाट तुम्हारे
कि तेरे उर-गह्वर की मैं गहराई नापूँ
देखूं कितना ज्योतिर्पुंज
वहाँ निखरा-बिखरा है ।

1 जनवरी 2009

मधु की तरह घुलता जा रहा हूँ मैं

नये वर्ष के आगमन पर
बहुत कुछ संजोया है मन में ।

सम्भव है नए साज बनें
हृदय के अनगिन स्नेहिल तार जुडें
मन का रंजन हो
उल्लासित हर अकिंचन हो
स्वप्न अवसित धरा पर
मधुरिम यथार्थ का स्यंदन हो ।

विचारता हूँ
पिछली सारी विषमताओं को
गाड़ दूंगा जमीन में,
विश्वास लेकर जी रहा हूँ
नए वर्ष के आगमन पर
कि सारे अंधेरे
सम्पूर्ण दर्प,
आच्छादित कालिमा से विचार -
सब कुछ तिरोहित हो जायेगा।

अस्तित्व शुद्ध लेकर विश्वास का
कि नव वर्ष प्रवेश करेगा,
सुशोभित वांगमय संकलित हो
हमारे स्वागत की चेष्टा करेगा,
हम स्वयं में विराट और सुरभित हो सकेंगे
सोच-सोच मधु की तरह घुलता जा रहा हूँ मैं ।

स्नेहिल मिलन की सीख दे दो

फ़ैली हुई विश्वंजली में , प्रेम की बस भीख दे दो
विरह बोझिल अंत को स्नेहिल मिलन की सीख दे दो ।

चिर बंधनों को छोड़ कर क्यों जा रही है अंशु अब
अपनी विकट विरहाग्नि क्यों कहने लगा है हिमांशु अब
सुन दारुण दारुण व्यथा सब नव वर्ष अपनी चीख दे दो ।
विरह बोझिल अंत को स्नेहिल मिलन की सीख दे दो ।

ज्यों डूब जाता है सुधाकर , विश्व को आलोक दे
फ़िर उदित होता नवल वह सब दुखों को शोक दे
बढ़ते रहें आगे सदा, नव वर्ष अपनी लीक दे दो ।
विरह बोझिल अंत को स्नेहिल मिलन की सीख दे दो।
 

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