29 सितम्बर 2009
27 सितम्बर 2009
अति प्रिय तुम हमसे अनन्य हो गये..
चारुहासिनी (मेरी भतीजी) की जिद है, इसलिये ये स्वागत-गीत यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ । उसके स्कूल में इस स्वतंत्रता दिवस पर गाने के लिये रचनायें दी थीं - उनमें यह भी था । उसकी जिद है कि "अपना तो सब यहाँ लिख देते हैं, मेरा भी यह गीत यहाँ लिख दीजिये ।" जिद पूरी कर रहा हूँ - इसी बहाने यह टंकित भी हो जायेगा -
अतिथि मंगल के मूल, अति प्रिय तुम हमसे अनन्य हो गये
आज स्वागत के फूल, झूल तेरी ग्रीवा में धन्य हो गये ।
आये तुम अति सुख का सागर लहराया
मन खग को मिली तेरी प्रेम तरु की छाया,
मेरे कंटक के शूल, लगता है अब मरणासन्न हो गये ।
देख तुम्हें जन-जन का आज हृदय हरषा
तेरी करुणा का सजल सावन-घन बरसा,
तेरी प्रीति का दुकूल,लहरा कि कण-कण आच्छन्न हो गये।
रिक्त इस अकिंचन के पूजा की थाली
आप को निहार बस बजाते करताली,
पूर्ण परिसर के कूल, रहे जो विपन्न अब प्रसन्न हो गये ।
अपनी अभिलाषायें अब हुई वसन्ती
आशीषें आपकीं मिली हैं रसवन्ती,
कष्ट कंटक बबूल, सुरभित मधु रस से सम्पन्न हो गये ।
आज स्वागत के फूल, झूल तेरी ग्रीवा में धन्य हो गये ।
आये तुम अति सुख का सागर लहराया
मन खग को मिली तेरी प्रेम तरु की छाया,
मेरे कंटक के शूल, लगता है अब मरणासन्न हो गये ।
देख तुम्हें जन-जन का आज हृदय हरषा
तेरी करुणा का सजल सावन-घन बरसा,
तेरी प्रीति का दुकूल,लहरा कि कण-कण आच्छन्न हो गये।
रिक्त इस अकिंचन के पूजा की थाली
आप को निहार बस बजाते करताली,
पूर्ण परिसर के कूल, रहे जो विपन्न अब प्रसन्न हो गये ।
अपनी अभिलाषायें अब हुई वसन्ती
आशीषें आपकीं मिली हैं रसवन्ती,
कष्ट कंटक बबूल, सुरभित मधु रस से सम्पन्न हो गये ।
25 सितम्बर 2009
मैंने जो क्षण जी लिया है ....
मैंने जो क्षण जी लिया है
उसे पी लिया है ,
वही क्षण बार-बार पुकारते हैं मुझे
और एक असह्य प्रवृत्ति
जुड़ाव की
महसूस करता हूँ उर-अन्तर
क्षण जीता हूँ, उसे पीता हूँ
तो स्पष्टतः ही उर्ध्व गति है,
क्षण में रहकर
क्षण से पार जाने की जुगत -
पार जाने की चरितार्थता ।
पर ढलान पर जैसे पानी
दौड़ता है नीचे की ओर
मैं भी कहाँ ठहर पाता हूँ कहीं ?
वर्तमान का सुख-दुःख, माया-मोह.....
सबको देखता हूँ लुढ़कते हुए किसी ओर ......
आगत प्रेम मेरी प्रतीक्षा में है ।
उसे पी लिया है ,
वही क्षण बार-बार पुकारते हैं मुझे
और एक असह्य प्रवृत्ति
जुड़ाव की
महसूस करता हूँ उर-अन्तर
क्षण जीता हूँ, उसे पीता हूँ
तो स्पष्टतः ही उर्ध्व गति है,
क्षण में रहकर
क्षण से पार जाने की जुगत -
पार जाने की चरितार्थता ।
पर ढलान पर जैसे पानी
दौड़ता है नीचे की ओर
मैं भी कहाँ ठहर पाता हूँ कहीं ?
वर्तमान का सुख-दुःख, माया-मोह.....
सबको देखता हूँ लुढ़कते हुए किसी ओर ......
आगत प्रेम मेरी प्रतीक्षा में है ।
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Himanshu Kumar Pandey |
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at 8:09 am |
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शीर्षक: poem, कविता, प्रेम |
23 सितम्बर 2009
जितनी मेरी बिसात है काम आ रहा हूँ मैं ....
क्या कहेंगे आप इसे ? संघर्ष ? समर्पण ? निष्ठा ? जिजीविषा ? आसक्ति ? या एक धुन ? मैं निर्णय नहीं कर पा रहा । चित्र तो देख रहे होंगे आप। उसमें रात है, अंधेरा भी । उस अंधेरे में कोई है । कुछ कर रहा है शायद । शायद क्यों ? पक्का पता है मुझे - लिख रहे हैं । अंधेरे में ? नहीं, नहीं ! रोशनी भी है - मोबाइल की । अनुमान हो सके तो देखें, हेमन्त है । अंधेरे में मोबाइल की रोशनी में एक छोटे से पैड पर अपनी कलम से सुबह की प्रविष्टि लिख रहे हैं । कुल जमा डेढ़-दो महीने के इस ब्लॉगर को यह क्या सूझा ?
कल अचानक ही हेमन्त से बात के दौरान मैंने जाना - बहक कर कह दिया उन्होंने - कि रात के गहराने के साथ लेटे-लेटे अंधेरे में (बिजली तो रहती नहीं कभी रात को, वैकल्पिक साधन भी सायास बन्द कर दिये जाते हैं ) जब हेमन्त की सोचने की गति तीव्र हो जाती है, और अभिव्यक्त होकर बाहर आना चाहती है वही सोच, तब और कुछ नहीं सूझता । एक मोबाइल है टॉर्च वाली (रोशनी कितनी होगी ? अनुमान कर लीजिये ) । हेमन्त टॉर्च की रोशनी में कागज पर कलम से जो लिख रहे होते हैं बहुधा वही उनके चिट्ठों की सुबह की प्रविष्टि बनती है ।
मैं हतप्रभ हो गया सुनकर । हँसी भी आ गयी । खुद पर । बिजली नहीं है, व्यस्तता बहुत है, कुछ दिमाग बन नहीं रहा - ऐसे न जाने कितने बहाने मैंने अपनी झोली में रखे हैं ; कई बार मेरा चिट्ठा हफ्तों अपडेट नहीं होता । पर इन्हें देखिये, दिन भर की गहरी व्यस्तता, घर की जिम्मेदारियों के अकेले खेवनहार लिखे जा रहे हैं - दिन में व्यस्त हैं, तो रात को; बिजली नहीं है तो मोबाइल की रोशनी में । आप इनका चिट्ठा देखें - लगभग रोज अपडेट होता हुआ । आप वहाँ तलाशना मत साहित्य के श्रेष्ठतम मानक और यह भी मत कहना (प्लीज !) कि जो छपा है, वह उल्लेखनीय़ कितना है ! आप तो बस हौसला देना - "मंजिल न दे, चिराग न दे, हौसला तो दे ..."
ज्यादा क्या कहूँ, हेमन्त की संवेदना से जुड़ता इतना ही कह रहा हूँ -
पाद-टिप्पणी : और हाँ, भाभी जी (हेमन्त की पत्नी ) ने मेरी बार-बार की याचना स्वीकार ली थी और ऊपर लगा हुआ चित्र उन्होंने ही रात को (कितने बजे ? पता नहीं ) अपनी मोबाइल से सप्रयत्न खींच कर मुझे उपलब्ध कराया । इसमें काफी प्रयत्न है उनका ( फोटो मोबाइल से ली गयी है) । आभार उनका ।
कल अचानक ही हेमन्त से बात के दौरान मैंने जाना - बहक कर कह दिया उन्होंने - कि रात के गहराने के साथ लेटे-लेटे अंधेरे में (बिजली तो रहती नहीं कभी रात को, वैकल्पिक साधन भी सायास बन्द कर दिये जाते हैं ) जब हेमन्त की सोचने की गति तीव्र हो जाती है, और अभिव्यक्त होकर बाहर आना चाहती है वही सोच, तब और कुछ नहीं सूझता । एक मोबाइल है टॉर्च वाली (रोशनी कितनी होगी ? अनुमान कर लीजिये ) । हेमन्त टॉर्च की रोशनी में कागज पर कलम से जो लिख रहे होते हैं बहुधा वही उनके चिट्ठों की सुबह की प्रविष्टि बनती है ।
मैं हतप्रभ हो गया सुनकर । हँसी भी आ गयी । खुद पर । बिजली नहीं है, व्यस्तता बहुत है, कुछ दिमाग बन नहीं रहा - ऐसे न जाने कितने बहाने मैंने अपनी झोली में रखे हैं ; कई बार मेरा चिट्ठा हफ्तों अपडेट नहीं होता । पर इन्हें देखिये, दिन भर की गहरी व्यस्तता, घर की जिम्मेदारियों के अकेले खेवनहार लिखे जा रहे हैं - दिन में व्यस्त हैं, तो रात को; बिजली नहीं है तो मोबाइल की रोशनी में । आप इनका चिट्ठा देखें - लगभग रोज अपडेट होता हुआ । आप वहाँ तलाशना मत साहित्य के श्रेष्ठतम मानक और यह भी मत कहना (प्लीज !) कि जो छपा है, वह उल्लेखनीय़ कितना है ! आप तो बस हौसला देना - "मंजिल न दे, चिराग न दे, हौसला तो दे ..."
ज्यादा क्या कहूँ, हेमन्त की संवेदना से जुड़ता इतना ही कह रहा हूँ -
"मैं राह का चिराग हूँ, सूरज नहीं हूँ मैं
जितनी मेरी बिसात है काम आ रहा हूँ मैं "
पाद-टिप्पणी : और हाँ, भाभी जी (हेमन्त की पत्नी ) ने मेरी बार-बार की याचना स्वीकार ली थी और ऊपर लगा हुआ चित्र उन्होंने ही रात को (कितने बजे ? पता नहीं ) अपनी मोबाइल से सप्रयत्न खींच कर मुझे उपलब्ध कराया । इसमें काफी प्रयत्न है उनका ( फोटो मोबाइल से ली गयी है) । आभार उनका ।
21 सितम्बर 2009
जागो मेरे संकल्प मुझमें ....
जागो मेरे संकल्प मुझमें
कि भोग की कँटीली झाड़ियों में उलझे,
भरपेट खाकर भी प्रतिपल भूख से तड़पते
स्वर्ण-पिंजर युक्त इस जीवन को
मुक्त करूँ कारा-बंधों से,
दग्ध करूँ प्रेम की अग्नि-शिखा में ।
मेरा मनोरथ सम्हालो मेरे प्रिय !
कलमुँहीं रजनी के प्रभात हो तुम !
मन्दोत्साहित चेतना के मन्द हास हो तुम !
तुम दिक्काल से परे प्रेम-ज्ञान के ज्ञान-फल हो !
तुम सीमा रहित अतल-तल हो !
कि भोग की कँटीली झाड़ियों में उलझे,
भरपेट खाकर भी प्रतिपल भूख से तड़पते
स्वर्ण-पिंजर युक्त इस जीवन को
मुक्त करूँ कारा-बंधों से,
दग्ध करूँ प्रेम की अग्नि-शिखा में ।
मेरा मनोरथ सम्हालो मेरे प्रिय !
कलमुँहीं रजनी के प्रभात हो तुम !
मन्दोत्साहित चेतना के मन्द हास हो तुम !
तुम दिक्काल से परे प्रेम-ज्ञान के ज्ञान-फल हो !
तुम सीमा रहित अतल-तल हो !
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Himanshu Kumar Pandey |
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at 2:11 pm |
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शीर्षक: poem, कविता |
19 सितम्बर 2009
कैसे ठहरेगा प्रेम जन्म-मृत्यु को लाँघ ...
तुम आते थे
मेरे हृदय की तलहटी में
मेरे संवेदना के रहस्य-लोक में
मैं निरखता था-
मेरे हृदय की श्यामल भूमि पर
वन्यपुष्प की तरह खिले थे तुम ।
तुम आते थे
अपने पूरे प्रेमपूर्ण नयन लिये
निश्छल दूब का अंकुर खिलाये
मुग्धा, रसपूर्णा, अनिंद्य ;
मेरी चितवन ठहरा देते थे
अपने उन किसलय-कपोलों पर ,
फिर तुम्हारी श्वांस-रंध्र में समाकर
अनन्त यात्रा पूरी हो जाती थी ।
तुम आते थे
साँझ-सकारे के बादल के किनारे
चमके सितारे की तरह,
मेरी बरौनियों में उमड़ पड़ता था
आश्चर्य-मोद-लोक;
सोचता हूँ
कितना छोटा होता है प्रत्येक निमिष
कितनी छोटी होती है तुम्हारी चितवन
कितना छोटा होता है तुम्हारा आलिंगन
फिर यह भी सोचता हूँ
कि कितना छोटा होता है यह क्षण,
पर यह विस्तरित न हो
इस जगती में, इस विपुल व्योम में
तब कैसे
काँपेंगे अन्तराकुल मन,
कैसे विहरेंगी साँसे
कैसे ठहरेगा प्रेम
जन्म-मृत्यु को लाँघ !
मेरे हृदय की तलहटी में
मेरे संवेदना के रहस्य-लोक में
मैं निरखता था-
मेरे हृदय की श्यामल भूमि पर
वन्यपुष्प की तरह खिले थे तुम ।
तुम आते थे
अपने पूरे प्रेमपूर्ण नयन लिये
निश्छल दूब का अंकुर खिलाये
मुग्धा, रसपूर्णा, अनिंद्य ;
मेरी चितवन ठहरा देते थे
अपने उन किसलय-कपोलों पर ,
फिर तुम्हारी श्वांस-रंध्र में समाकर
अनन्त यात्रा पूरी हो जाती थी ।
तुम आते थे
साँझ-सकारे के बादल के किनारे
चमके सितारे की तरह,
मेरी बरौनियों में उमड़ पड़ता था
आश्चर्य-मोद-लोक;
सोचता हूँ
कितना छोटा होता है प्रत्येक निमिष
कितनी छोटी होती है तुम्हारी चितवन
कितना छोटा होता है तुम्हारा आलिंगन
फिर यह भी सोचता हूँ
कि कितना छोटा होता है यह क्षण,
पर यह विस्तरित न हो
इस जगती में, इस विपुल व्योम में
तब कैसे
काँपेंगे अन्तराकुल मन,
कैसे विहरेंगी साँसे
कैसे ठहरेगा प्रेम
जन्म-मृत्यु को लाँघ !
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Himanshu Kumar Pandey |
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at 7:25 am |
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शीर्षक: love, poem, कविता, प्रेम कविता |
17 सितम्बर 2009
समय और शब्द के कवि सीताकान्त महापात्र
" जिसका विकल्प नहीं, वही कविता का संकल्प है । कवि की तलाश वही शब्द है - आदि शब्द, अनुभव मूल में निहित शब्द । क्या इसलिये कि प्रत्येक अनुभव शब्द्से अनुविद्ध है ? क्या सीताकान्त की शब्द चिन्ता का रहस्य यही है ? कौन जाने ? कवि के सिवा और कौन जानता है कि अन्ततः टिकते हैं शब्द ही । शब्द को अक्षर कहा गया है । समय का क्या ? आया और गया । किसकी मजाल है जो उसे पकड़ रखे । क्या इसीलिये कवि अपने समय को शब्द में बदलता रहता है ।"
डॉ० सीताकान्त महापात्र का काव्य-संसार हिन्दी के पाठक के लिये पूर्णतया परिचित है । वह हिन्दी में भी उतने ही समादृत हैं जितने उड़िया में । विश्व की अनेकों भाषाओं में उनकी रचनाओं के अनुवाद कविता की संप्रेषणीयता एवं आज के संक्रमण काल में कविता की गंभीर प्रकृति व उसकी अर्थवत्ता के स्वीकार के प्रति आश्वस्त करते हैं । कविता को अनवरत साधना और तपस्या का पर्याय मानने वाले इस कवि की एक कविता में - जिसका शीर्षक है ’समय का शेष नाम’ - कवि कविता को जन्म-जन्मांतर की वर्णनातीत साधना सिद्ध करता है -
"कभी-कभी लगता है
अब हमारे चारों ओर रुद्ध हो रहे
बेशुमार शब्द, शब्द ही शब्द
खचाखच, रेल-पेल, हाव-भाव,
घटाटोप शब्दों पर
शब्द रूप, शब्द रस
शब्द गंध, शब्द स्पर्श
न तुम मुझे देख पाती, न मैं तुम्हें
मेरे हाथ से बिछुड़कर खो जाती
शब्दों की भीड़ में तुम
डूब जाती शब्दों के समुद्र में
उन्हीं शब्दों के ढेर को उलीच कर
मैं खो जाता तुम्हें
कान या नाक में पानी भरने पर
याद करता तुम्हें
इतना कहने कि
सारे शब्द मरने के बाद जो रहता है, वही है प्रेम
और सारे शब्द चुक जाने के बाद जो बचता है, वह है कविता ।"
सीताकान्त महापात्र आधुनिक कवि हैं - शिल्प में भी, कथ्य में भी, परन्तु परम्परा से संयुक्त । परम्परा का स्वीकार, उसकी प्रकृति-विकृति का सम्यक परीक्षण एवं उससे प्राप्त सम्पदा का वर्तमान की जटिलता के सांगोपांग विवेचन में उपयोग, डॉ० सीताकान्त की कविता की मूल विशेषतायें हैं । आधुनिकता परम्परा से सार्थक रूप से समन्वित होकर एक नयी अभिव्यंजना की पृष्ठभूमि रचती है । यह समन्वय केवल भावात्मक व बौद्धिक स्तर पर नहीं है इस कवि में, बल्कि उनकी पूरी सर्जना और उनके व्यक्तित्व में भी सहज ही परिलक्षित है । परम्परा और आधुनिकता के सम्बंध को व्याख्यायित करते हुए डॉ० सीताकान्त कहते हैं -
" परम्परा रक्त में घुली रहती है, आँख-कान उसी क़ायदे से देखते हैं, दिमाग नए क़ायदे से देखना सीखता है, समझता है । बहुत कुछ नहीं भी समझता । वही टेंशन, तनाव, द्वंद्व, विरोधाभास की नई परंपरा बनता है और मैं उसे कविता में खींच लेता हूँ । वैसे परंपरा कोई निर्दिष्ट बिन्दु नहीं है । वह इतिहास का कारागार भी नहीं है । यथार्थ को देखने का क़ायदा परम्परा से मिलता है, वास्तविक आधुनिकता तो परम्परा का नवीनतम रूप है, उसका नव-कलेवर है, आत्मिक उद्वर्तन है ।" (भारतीय साहित्यकारों से साक्षात्कार : डॉ० रणवीर रांग्रा )
समकालीन भारत के दक्षतम कवियों में शुमार इस कवि ने कविता को नई काव्य-चेतना और नई संभावनायें दीं हैं । उन्होंने परम्परा और आधुनिकता का सार्थक समन्वय किया है । वे दुख और वेदना में भी मानव के गहनतम आनन्द की खोज अपनी कविता में करने वाले, पारंपरिक प्रतीकों का प्रयोग करने वाले, विराट फलक पर जीवन के इंद्रधनुषी आयाम प्रकट करने वाले कालजयी कवि हैं । आज इस कवि का पुण्य स्मरण मेरे मुझमें असीम श्रद्धा का सन्निवेश कर रहा है । विनत !
16 सितम्बर 2009
15 सितम्बर 2009
क्या दूर सुहृद ! प्रियतम ! निराश चित्कार रहा अम्बर-अन्तर (गीतांजलि का भावानुवाद )
14 सितम्बर 2009
हिन्दी दिवस पर ’क्वचिदन्यतोऽपि”
हिन्दी दिवस की शुभकामनाओं सहित क्वचिदन्यतोऽपि पर की गयी टिप्पणी प्रसंगात यहाँ प्रस्तुत कर दे रहा हूँ -
"देर से देख रहा हूँ, पर हिन्दी दिवस के दिन देख रहा हूँ - संतोष है ।
इसका कुछ निहितार्थ भी जाने अनजाने खुल रहा है । विचित्र है मनुष्य का यह मन ! यह हिन्दी के शब्द नहीं सीखना चाहता - कठिन हैं इसलिये या शायद पिछड़ेपन के प्रतीक हैं इसलिये - तो भीतर एक विचार तंत्र बनता है जिसका लक्ष्य एक चली आ रही सत्ता (अंग्रेजी) को अक्षुण्ण रखना है ।
हम प्रयास नहीं करते ! हमें हिन्दी कठिन लगती है । हम उनके विकल्प दूसरी भाषाओं (अंग्रेजी) में ढूँढ़्ना चाहते हैं । पर जब हमें अंग्रेजी कठिन लगती है, हम उसके लिये शब्दकोष ले आते हैं । उन कठिन अंग्रेजी शब्दों के विकल्प हिन्दी में नहीं ढूँढ़ते ।
हिन्दी का प्रवेश लोक की संश्लिष्ट चेतना का प्रवेश है - चाहे सत्ता में, चाहे पाठ्यक्रम में, चाहे व्यवहार में, चाहे हमारी अंतश्चेतना में । हिन्दी के आने से सत्ता में नये वर्ग, नये विचार प्रवेश करेंगे । हिन्दी के एक कठिन शब्द के प्रति (खासतौर पर जो इतनी आत्मीयता से ब्लॉग-जगत में उपस्थित है) इतनी उदासीन मनोवृत्ति । ऐसे अनगिन शब्द हमें सीखने होंगे अध्यवसाय से, क्योंकि इसी अध्यवसाय से विकास की नयी दिशायें खुलेंगीं । देश में स्वावलंबन का उदय होगा । फिर जागेगी देश के प्रति स्वाभिमान की मनोवृत्ति और स्वभूति का अनुभव कर सकेंगे हम ।
हम ’स्व’ के प्रति इतनी लगन वाले क्यों नहीं ? ’स्व’ के प्रति लगाव, अपनापन से ही तो प्रकट होता है ममत्व ! हिंदी अपनेपन का प्रतीक है और नींव है । हिन्दी सबकी भाषा क्यों नहीं ? हिन्दी के ऐसे शब्द सबके शब्द क्यों नहीं ? अंग्रेजी से अनभिज्ञ समाज के मतों की स्वीकृति के लिये ही रह गयी है यह भाषा ? हिन्दी सहनीय है, परन्तु विकास की प्रवृत्ति का परिचय नहीं ।
हम विस्मृत कर रहे हैं उपनिषदीय वचन - "नायमात्मा बलहीनेन लभ्य" । आत्मा कैसे पायी जा सकेगी यदि बल ही खो गया । बलहीन आत्मा की उपलब्धि नहीं किया करते । हिन्दी की उपेक्षा में क्या भारत की आत्मा ही नहीं खो गयी ? सृजनशीलता की कर्मण्यता ही नहीं खो गयी ?
हिन्दी को उपेक्षित कर हमने अपने आत्मविश्वास को उपेक्षित कर दिया है । हमारी अन्तर्निहित प्रज्ञा, हमारी प्रतिभा, हमारा सम्मान वंचित हो रहा है। हमें हिन्दी के इस आत्मविश्वास को संरक्षित करना होगा ।
"जनभाषा है हिन्दी, जनभाषा बने हिन्दी" - अनगिनत बार कहे जाने वाले इन वाक्यों में एक अनोखा वैपरीत्य नजर आता है मुझे - एक आइरोनी (Irony)- बिलकुल हिन्दी दिवस के रूप में उपस्थित एक जीवंत आइरोनी की तरह । सब कुछ खानापूर्ति के लिये । केवल कह दिये जाने के लिये । पूरे देश में निभायी जाती है औपचारिकता, लिये जाते हैं मजबूती के संकल्प- परन्तु ढाक के वही तीन पात ! क्यों ? भारतीय जिस प्रकार वस्तु के प्रति स्वदेशी भाव से परोन्मुख हैं, भाषा के प्रति भी हैं ।
वह तो भला हो हिन्दी की गतिशील भाषिक संस्कृति का, उसमें अन्तर्निहित उदारवादी विकासशीलता के तत्व का - कि इसमें भाषाई बद्धमूलता और जड़ता का दोष नहीं आने पाया और सभ्यताओं के संघर्ष, अस्मिताओं की टकराहट, विखंडनवाद, मूल्यों और मान्यताओं के विघटन, वैश्विक बाजारवाद व भाषाओं की विलुप्ति की चिंता के इस संक्रमण काल में भी हिन्दी ने अपने अस्तित्व के प्रश्नचिन्हों को दरकिनार किया । भाषा फलती, फूलती रही । कारण इसकी ग्राहिका शक्ति । विभिन्न भाषाओं के शब्दों को अपनी ध्वनि-प्रकृति में ढाल लेने की सामर्थ्य । हिन्दी के फलक का विस्तार हमें सुनिश्चित करना है । हम क्वचिदन्यतोऽपि कहते ठहरें नहीं, विरम न जाँय । यह क्वचिदन्यतोऽपि का भाव न होता तो बाबा तुलसी की रामायण न होती । "
चित्र : वेबदुनिया से साभार ।
"देर से देख रहा हूँ, पर हिन्दी दिवस के दिन देख रहा हूँ - संतोष है ।
इसका कुछ निहितार्थ भी जाने अनजाने खुल रहा है । विचित्र है मनुष्य का यह मन ! यह हिन्दी के शब्द नहीं सीखना चाहता - कठिन हैं इसलिये या शायद पिछड़ेपन के प्रतीक हैं इसलिये - तो भीतर एक विचार तंत्र बनता है जिसका लक्ष्य एक चली आ रही सत्ता (अंग्रेजी) को अक्षुण्ण रखना है ।
हम प्रयास नहीं करते ! हमें हिन्दी कठिन लगती है । हम उनके विकल्प दूसरी भाषाओं (अंग्रेजी) में ढूँढ़्ना चाहते हैं । पर जब हमें अंग्रेजी कठिन लगती है, हम उसके लिये शब्दकोष ले आते हैं । उन कठिन अंग्रेजी शब्दों के विकल्प हिन्दी में नहीं ढूँढ़ते ।
हिन्दी का प्रवेश लोक की संश्लिष्ट चेतना का प्रवेश है - चाहे सत्ता में, चाहे पाठ्यक्रम में, चाहे व्यवहार में, चाहे हमारी अंतश्चेतना में । हिन्दी के आने से सत्ता में नये वर्ग, नये विचार प्रवेश करेंगे । हिन्दी के एक कठिन शब्द के प्रति (खासतौर पर जो इतनी आत्मीयता से ब्लॉग-जगत में उपस्थित है) इतनी उदासीन मनोवृत्ति । ऐसे अनगिन शब्द हमें सीखने होंगे अध्यवसाय से, क्योंकि इसी अध्यवसाय से विकास की नयी दिशायें खुलेंगीं । देश में स्वावलंबन का उदय होगा । फिर जागेगी देश के प्रति स्वाभिमान की मनोवृत्ति और स्वभूति का अनुभव कर सकेंगे हम ।
हम ’स्व’ के प्रति इतनी लगन वाले क्यों नहीं ? ’स्व’ के प्रति लगाव, अपनापन से ही तो प्रकट होता है ममत्व ! हिंदी अपनेपन का प्रतीक है और नींव है । हिन्दी सबकी भाषा क्यों नहीं ? हिन्दी के ऐसे शब्द सबके शब्द क्यों नहीं ? अंग्रेजी से अनभिज्ञ समाज के मतों की स्वीकृति के लिये ही रह गयी है यह भाषा ? हिन्दी सहनीय है, परन्तु विकास की प्रवृत्ति का परिचय नहीं ।
हम विस्मृत कर रहे हैं उपनिषदीय वचन - "नायमात्मा बलहीनेन लभ्य" । आत्मा कैसे पायी जा सकेगी यदि बल ही खो गया । बलहीन आत्मा की उपलब्धि नहीं किया करते । हिन्दी की उपेक्षा में क्या भारत की आत्मा ही नहीं खो गयी ? सृजनशीलता की कर्मण्यता ही नहीं खो गयी ?
हिन्दी को उपेक्षित कर हमने अपने आत्मविश्वास को उपेक्षित कर दिया है । हमारी अन्तर्निहित प्रज्ञा, हमारी प्रतिभा, हमारा सम्मान वंचित हो रहा है। हमें हिन्दी के इस आत्मविश्वास को संरक्षित करना होगा ।
"जनभाषा है हिन्दी, जनभाषा बने हिन्दी" - अनगिनत बार कहे जाने वाले इन वाक्यों में एक अनोखा वैपरीत्य नजर आता है मुझे - एक आइरोनी (Irony)- बिलकुल हिन्दी दिवस के रूप में उपस्थित एक जीवंत आइरोनी की तरह । सब कुछ खानापूर्ति के लिये । केवल कह दिये जाने के लिये । पूरे देश में निभायी जाती है औपचारिकता, लिये जाते हैं मजबूती के संकल्प- परन्तु ढाक के वही तीन पात ! क्यों ? भारतीय जिस प्रकार वस्तु के प्रति स्वदेशी भाव से परोन्मुख हैं, भाषा के प्रति भी हैं ।
वह तो भला हो हिन्दी की गतिशील भाषिक संस्कृति का, उसमें अन्तर्निहित उदारवादी विकासशीलता के तत्व का - कि इसमें भाषाई बद्धमूलता और जड़ता का दोष नहीं आने पाया और सभ्यताओं के संघर्ष, अस्मिताओं की टकराहट, विखंडनवाद, मूल्यों और मान्यताओं के विघटन, वैश्विक बाजारवाद व भाषाओं की विलुप्ति की चिंता के इस संक्रमण काल में भी हिन्दी ने अपने अस्तित्व के प्रश्नचिन्हों को दरकिनार किया । भाषा फलती, फूलती रही । कारण इसकी ग्राहिका शक्ति । विभिन्न भाषाओं के शब्दों को अपनी ध्वनि-प्रकृति में ढाल लेने की सामर्थ्य । हिन्दी के फलक का विस्तार हमें सुनिश्चित करना है । हम क्वचिदन्यतोऽपि कहते ठहरें नहीं, विरम न जाँय । यह क्वचिदन्यतोऽपि का भाव न होता तो बाबा तुलसी की रामायण न होती । "
चित्र : वेबदुनिया से साभार ।
13 सितम्बर 2009
बचपन, यौवन, वृद्धपन....
बचपन !
तुम औत्सुक्य की अविराम यात्रा हो,
पहचानते हो, ढूढ़ते हो रंग-बिरंगापन
क्योंकि सब कुछ नया लगता है तुम्हें ।
यौवन !
तुम प्रयोग की शरण-स्थली हो,
आजमाते हो, ढूँढ़ते हो नयापन
क्योंकि सबमें नया स्वाद मिलता है तुम्हें ।
वृद्ध-पन !
तुम चाह से पगे परिपक्व आश्रय हो,
तुम भी उत्कंठित होते हो, ललचाते हो
उन्हीं रंगबिरंगी चीजों में अनुभव आजमाते हो ।
तुम औत्सुक्य की अविराम यात्रा हो,
पहचानते हो, ढूढ़ते हो रंग-बिरंगापन
क्योंकि सब कुछ नया लगता है तुम्हें ।
यौवन !
तुम प्रयोग की शरण-स्थली हो,
आजमाते हो, ढूँढ़ते हो नयापन
क्योंकि सबमें नया स्वाद मिलता है तुम्हें ।
वृद्ध-पन !
तुम चाह से पगे परिपक्व आश्रय हो,
तुम भी उत्कंठित होते हो, ललचाते हो
उन्हीं रंगबिरंगी चीजों में अनुभव आजमाते हो ।
11 सितम्बर 2009
कानून ताज़ीरात शौहर : भारतेंदु हरिश्चंद्र - 3
आठवाँ बाब (प्रकरण)
जुर्म बरखिलाफ अमन (शांति) शहर
दफा (24) जो शख्स अपने दोस्तों या रिश्तेदारों को जो जोरू की राय के बरखिलाफ हैं अक्सर अपने मकान में जमा करेगा या ज्यादातर उनकी दावत करैगा, वह इस बात का मुजरिम समझा जायेगा कि उसने शहर के अमन में फरक ( भंग करना ) डाला ।
दफा (25) जो शख्स किसी रिश्तेदार या बुजुर्ग को घर में अपने जोरू के समझने के वास्ते बुलावेगा वह भी शहर के अमन में फरक डालने का मुजरिम करार दिया जायेगा ।
दफा (26) दफा 24 वो 25 के मुजरिमों की सजा गाली वगैरा या जुर्म संगीन हो तो हब्सदवाम बअबूर दरियाशोर (समुद्र पार कर सदा की सजा ) हो सकती है ।
नवाँ बाब
अदूलहुक्मी (आज्ञा की अवहेलना)
दफा (27) जो अपनी जोरू का हुक्म न मानेगा वह अदूलहुक्मी का मुजरिम करार दिया जायेगा ।
तमसीलात (उदाहरण)
अलिफ - जोरू ने हुक्म दिया कि कल शाम तक फलाना जेवर या कपड़ा बन कर आवे मगर शौहर तंगदस्ती (धनाभाव) के सबब से नहीं ला सकता इस वास्ते मुजरिम हुआ ।
बे - जोरू से एक दूसरी औरत से लड़ाई है और वह लड़ाई भी महज बे बुनियाद है । दोनों के शौहर आपस में करीबी रिश्तेदार हैं, एक शौहर के यहाँ कोई शादी या गमी का जरूरी काम पेश आया और दूसरे शौहर को लड़ाई के सबब से उसकी जोरू ने पहिले के यहाँ जाने से बाज रखना चाहा मगर शौहर शर्त आदमियत से बाज न रहा इस वास्ते वह मुजरिम जुर्म दफा हाजा का हुआ ।
जीम - जोरू को शैतानपरस्ती (भूत पूजना ) पर एतकाद (विश्वास) है मगर शौहर एक पढ़ा-लिखा आदमी है । लड़कों की खैरियत के वास्ते जोरू ने शौहर को किसी पीर की नेयाज (मिन्नत या चढ़ावा) करने को कहा मगर शौहर ने ईमान को पाबन्दी से उसको नहीं माना लेहाजा वह मुजरिम दफा हाजा का हुआ ।
दफा (28) मुजरिम अदूलहुक्मी को जुर्माना या कैद या दोनों किस्म की सजायें दी जायेंगी ।
दसवाँ बाब
जुर्म दिलशिकनी (हृदय पर चोट)
दफा (29) जो शौहर अपनी जोरू की दिलशिकनी करेगा वह दिलशिकनी के जुर्म का मुजरिम समझा जायेगा ।
तमसीलात
अलिफ - शौहर ने हीलतन (कपट से) या सरीहतन ( प्रकट में) कोई हरकत ऐसी नहीं की कि उसकी जोरू की दिलशिनी हो मगर जोरू ने किसी हरकत से किसी दिलशिकनी मान ली तो वह भी दिलशिकनी होगी और उस में शौहर को कोई उज्र (आपत्ति) न होगा ।
बे - शौहर किसी मोहफिल में गया और वहाँ ब मजबूरी उसको रंडियों का तमाशा देखना पड़ा तो यह भी दिलशिकनी हुई ।जीम - शौहर किसी ऐसी मजहबी जमायात में शरीक हुआ जिसमें बहुत सी औरतें मौजूद थीं अगरचे मजहब के पाबंद होकर उसका उस जमायात में शरीक होना फर्ज था मगर उससे दिलशिकनी हुई ।
दाल - अगर शौहर किसी ऐसी राह से गुजरा कि जिसमें किसी सबब से कुछ औरतें जमा थीं तो वह मुर्तकिब जुर्म दिलशिकनी हुआ ।
हे - किसी रिश्तेदार के सबब से या किसी मुआमिला के सबब से किसी शौहर ने दूसरे औरत से जरूरी गुफ्तगू की तो मुजरिम दिलशिकनी हुआ ।
बाव - लड़कों को पढ़ने की ज्यादा ताकीद करना भी जुर्म दिलशिकनी है ।
जे - रँगरेज पर कपड़ा जल्द न रंगलाने की, दरजी पर कुरती जल्द न सीने की ताकीद नहीं करना या उन कामों का जल्द अंजाम पाना उसके अख्तियार के बाहर है, तो वह शख्स मुजरिम दिलशिकनी का हुआ ।
हे - मेले या तमाशे वगैरह के ऐसे मौकों से जिस में इज्जत जाने का खौफ है, जोरू को बमिन्नत बाज रखना भी जुर्म दिलशिकनी है ।
दफा (30) मुजरिम दिलशिकनी को सर्सरी की कुल सजायें दी जा सकती हैं ।
ग्यारहवाँ बाब
हंगामा (विद्रोह)
दफा (31) जोरू की किसी बात का जवाब देना जुर्म हंगामा है ।
दफा (32) हंगामा करने वाले मुजरिम को रोने या बकने की सजा दी जायेगी ।
----सन 1883
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10 सितम्बर 2009
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कानून ताज़ीरात शौहर : भारतेंदु हरिश्चंद्र - 2
भारतेन्दु हरिश्चंद्र
कानून ताज़ीरात शौहर
चौथा बाब (प्रकरण)
मुस्तसनियात (मुक्तगण)
दफा (8) हर बशर (मनुष्य) जो खुदा के यहाँ से जामय (वस्त्र) औरत पहिना से उतारा गया है वह इस कानून से मुस्तसना है ।दफा (9) कोई जुर्म मुन्दर्जे कानून हाजा अगर बहुक्म औरत किया जाय तो इस कानून से मुस्तसना है ।
दफा (10) कोई शख्स जो कि दरहकीकत फकीरी अख्तियार करे और दुनिया छोड़ दे वह बाद उस लमहा के जिसमें कि दुनिया छोड़ी है, इस कानून से मुस्तसना है ।
दफा (11) कोई शख्स जो अपने जोरू को तिलाक दे, वह बाद उस लमहा के जब कि उसने अपना औरत को तिलाक दिया है, उस लहजा (समय) के पेश्तर तक जबकि वह दूसरी औरत से सरोकार कायम करे, इस कानून से मुस्तसना है ।
पाँचवा बाब
इमदाद (सहायता) जुर्म
दफा (12) कोई शौहर को कि दूसरे शौहर को किसी औरत के बरखिलाफ बरगलायेगा तो यह समझा जायेगा कि उसने जुर्म करने में इमदाद की ।
दफा (13) जिस वक्त कोई शौहर किसी दूसरे शौहर के जुर्म करने के वक्त मौजूद रहे और उसको उस जुर्म से न बाज रखे तो वह भी जुर्म की इमदाद करने वाला समझा जायेगा ।
मुस्तसनियात (मुक्त-गण)
अलिफ - कोई औरत व मर्द जिन की शादी नहीं हुई है, इमदाद करने के जुर्म से मुस्तसना हैं ।बे - कोई शख्स जो बजोर बदमाशी या दौलत या किसी और सबब से जुर्म करदा शौहर की औरत के अख्तियार के बाहर है वह इस कानून से मुस्तसना है ।
जीम - मगर बगैर शादी किये हुए भी वह लोग जो किसी औरत के तहत हुकूमत में हैं मुस्तसना न समझे जायेंगे ।
तमसीलात (उदाहरण)
अलिफ - जैद का बकर नाम का एक भतीजा है जिस की शादी नहीं हुई है , जैद बकर के बहकाने से किसी मेला में गया और वहाँ रात को देर तक रहा पस (इसलिये) जैद मुजरिम हुआ, मगर बकर जो कि दूसरे घर में रहता है और औरत की हुकूमत से बाहर है इमदाद जुर्म की तुहमत उस पर नहीं हो सकती ।बे - खालिद एक नव्बाब है जिस के सबब से अमरू की गुजर औकात होती है, खालिद ने किसी शब मुहफिल में अमरू को अपने साथ रहने पर मजबूर किया मगर चूँकि वह दौलतमंद है इस वास्ते इमदाद जुर्म के इत्तिहाम (दोष) से मुस्तसना है ।
जीम - जैद बकर का छोटा भाई है और अपने भावज की पकाई हुई रोटी खाता है । अगर वह जैद व बकर दोनों किसी शब को देर तक बाहर रहे तो जैद इमदाद जुर्म करने से सजायाब (दंडित ) हो सकता है ।
दफा (14) इमदाद जुर्म करने वाले मुजरिमों की सजा उन की अदालत में होगी अगर वे असल मुजरिम की अदालत के हद अख्तियार (अधिकार की सीमा) के बाहर हैं ।
तमसील (उदाहरण)
अलिफ - जैद असल मुजरिम है और बकर उसका मददगार है मगर दोनों की शादी हो चुकी है तो जैद की सजा उसकी जोरू करेगी और बकर की सजा जैद की जोरू के बहकाने से बकर की जोरू करेगी ।दफा (15) जुर्म के इमदाद करने वालों की सजा ब नजर तम्बीह (शासन की दृष्टि में) सिर्फ सर्सरी तौर से काफी होगी ।
छठा बाब
जुर्म खिलाफ अदब अदालत
दफा (16) लफ्ज अदालत से मुराद यहाँ सिर्फ शादी की हुई जोरू समझना चाहिए ।
दफा (17) जो शौहर अपनी जोरू से लड़ना चाहे या लड़े या गैर शख्स जो उससे लड़ता हो उसकी इमदाद करें तो उस को किसी किस्म की कैद की सजा दी जायेगी लेकिन अगर अदालत की राय में यह जुर्म संगीन है तो हब्सदवाम बअबूर दरयाशोर (समुद्र पार कर सदा की सजा ) की सज़ा देने का भी अदालत को अख्र्तियार है ।
दफा (18) जो शख्स अपने किसी बुजुर्ग या रिश्तेदार या दोस्त या लड़कों को अपने तरफ करके जोरू पर हावी होने का इरादा करे उसकी कैद की सजा या अलग सोने की सजा या सिर्फ गाली वगैरह दी जायेगी ।
दफा (19) जो शख्स सिवा अपनी औरत के और किसी औरत पर इश्क जाहिर करेगा, तो वह अदालत का दुश्मन समझा जायेगा ।
खुलासा
अपनी जोरू के सिवा किसी औरत पर मेहरबानी की नजर करना ही जुर्म है, चाहे व किसी सबब से क्यों न हो ।तमसीलात
सुग़रा जैद की जोरू है और कुबरा जैद की परोसिन है मगर कुबरा गरीब है । इस वास्ते जैद कभी-कभी कुबरा की कुछ मदद करता है पस जैद मुजरिम जुर्म मुन्दरज दफा हाजा (पूर्वोक्त) का हुआ ।अलिफ - अदालत को अख्तियार हासिल है कि बगैर कसूर किये हुए भी शौहर को इस जुर्म का मुजरिम करार दे, मुजरिम का यह सबूत देना कि वह मुर्तकिब (करने वाला) इस जुर्म का नहीं हुआ काबिल समाअत न होगा ।
बे - अदालत के खौफ से झूठ-मूठ भी एक मर्तबा जुर्म का इकरार कर लेना किसी शौहर को मुजरिम बनाने के वास्ते काफी होगा ।
जीम - बगैर जुर्म के इस कसूर में मुजरिम बनाने वाली अदालत यानी औरत सिनरसिदा या बदसूरत होनी चाहिये या जिसका शौहर सिनरसीदा या मकरूहसूरत (घृणित रूप वाला) हो उस औरत को भी इस किस्म का जुर्म कायम करने का अख्तियार हासिल है ।
दाल - अगर नौजवान या खूबसूरत औरत अख्तियारात मुन्दर्जे बाला हासिल करना चाहे तो उस को अपनी बदमिजाजी (कर्कशापन) कबूल करनी पडे़गी ।
दफा (20) इस कानून में जितनी किस्म की सजायें लिखी हैं वह सब या उन में से चंद दफा (19) के मुजरिम को दी जा सकती है ।
सातवाँ बाब
जुर्म खिलाफ फौज सर्कारी
दफा (21) घर के लड़के बर्री (स्थल की) फौज और मजदूरनियाँ बहरी (समुद्री) फौज समझी जायेंगी ।
दफा (22) जो शख्स अपने किसी लड़की या अपने किसी लड़के को उन के माँ के बरखिलाफ बोलने या मजदूरनियों को बगैर हुक्म बीबी के काम करने को कहेगा तो वह फौज के बरखिलाफ बलवा करने का मुजरिम करार दिया जायेगा ।
दफा (23) जो मुजरिम जुम-मुन्दर्जे दफा (22) का होगा उस को गाली बकने या झिड़की देने या रोने की सजा दी जायेगी ।
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कानून ताज़ीरात शौहर जारी रहेगा .........
9 सितम्बर 2009
क़ानून ताज़ीरात शौहर (पति दंड विधान ) : भारतेंदु हरिश्चन्द्र के जन्मदिवस पर
अपने समय की विरलतम अभिव्यक्ति, सशक्त वाणी भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्मदिवस है आज । भारतेन्दु आधुनिक हिन्दी के जन्मदाता और बहुआयामी, क्रान्तिकारी रचनाधर्मिता के विराट प्रतीक-पुरुष हैं । कुछ भी नहीं छूटा है इस सर्वतोमुखी प्रतिभा से । कर्तृत्व की समग्रता का दिग्दर्शन करना हो तो भारतेन्दु से बेहतर नाम और कौन ?
आज भारतेन्दु के जन्मदिवस पर उनके बहुआयामी रचना-कर्म से चुनकर एक विशिष्ट और रोचक प्रस्तुति । शब्दावली वही कानूनी उर्दू-फारसी । रचना का नाम - ’कानून ताज़ीरात शौहर’ । शब्दावली की दुश्वारी के लिये पहले तो हिन्दी में अनुवाद करना चाहा था - पर मूल का आनन्द ज्यों का त्यों अक्षुण्ण रखने की जिद ने रोक दिया । कठिन शब्दों के अर्थ नीचे लिखूँगा । रचना चूँकि लम्बी है, इसलिये दो-तीन प्रविष्टियों में ही प्रस्तुत करना बेहतर होगा । यहाँ प्रस्तुत करने का उद्देश्य भारतेन्दु का पुण्य-स्मरण तो है ही इस रचना का दस्तावेजीकरण भी है इण्टरनेट पर । ( साभार : भारतेन्दु समग्र-हिन्दी प्रचारक ग्रंथावली परियोजना, वाराणसी )
चूँकि मुनासिब मालूम हुआ कि एक कानून ऐसा इजरा किया जावै जिस से बाद शादी के जौजा अपने शौहरों पर बखूबी हकूमत कर सकें और इस सबब से उन दोनों में निफा़क़ न पैदा हो लेहाजा़ क़ानून हस्बज़ैल मुरौविज किया गया ।
दफा (1) इस कानून का नाम ताज़ीरात शौहर होगा, हिन्दुस्तान में कोई औरत या मर्द जो शादी कर लेगा वह कानूनन इसका पाबन्द समझा जायेगा ।
जो अह्ल यूरोप हिंदुस्तान में आकर शादी करेंगे वह इस कानून से मुस्तसना समझे जायेंगे ।
दफा (2) किसी औरत के तहत हुकूमत में कोई शै जो कि जाहिरा मनकूलः मगर बगैर हुक्म औरत के गैरमनकूलः है उस से मुराद शौहर है ।
बे - गाय, बैल, कुत्ता, गदहा वगैरह अगरचे खुद बखुद चल सकते हैं मगर वह अपने औरतों की हुकूमत से जायदाद गैरमनकूलः नहीं हो जाते, इस वास्ते लफ्ज शौहर उन पर असर पज़ीर न होगा ।
जीम- चूँकि ऐसी जायदाद जो कि जाहिरा मनकूलः हो मगर औरत के हुक्म से फौरन गैर मनकूलः हो जाय, सिर्फ शादीकरदः मर्द हैं, लेहाज़ा लफ्ज शौहर से मुराद उन्हीं लोगों से होगी ।
दफा (3) शौहर की जायदार है, इस वास्ते उसपर उसको हर किस्म का अख्तियार हासिल है ।
अपनी जायदाद को लोग जिस तरह बना बिगाड़ सकते हैं, उसी तरह जोरुओं को अपने शौहर पर ज़द व कोब करना व खाना न देना, वगैरह का अख्तियार हासिल होगा ।
दफा (4) इस कानून में मुजरिमों को हस्बजैल सज़ा दी जायेगी ।
अलिफ - कैद यानी शौहर को मकान की चारदीवारी से बाहर न जाने देना, यह कैद दोनों तरह की होगी, वा मेहनत व बिला मेहनत - लफ़्ज बिना मेहनत से मुराद है कि सिर्फ बाहर न जाने पाये ।
बे - अलग बिस्तर या दूसरे मकान में सोलाना ।
जीम - हमेशा के वास्ते गुलामी करानी ।
दाल - जुर्माना, यानी किसी किस्म का नक्द या जेवर लेकर कसूर मुआफ़ करना ।
दफा (5) इस कानून में भी सजाय मौत सब से बड़ी सज़ा है मगर आदमी के जान को उनकी बदन से अलग कर देना यहाँ सज़ाय मौत नहीं, यहाँ लफ़्ज सज़ाय मौत से यह मुराद है कि औरत रूठ कर अपने बाप या भाई के घर चली जाय और फिर न आये ।
दफा (6) सजाय हबसदवाम बअबूर दरियाशोर से इस कानून में यह मुराद है कि औरत चंद अरसः के वास्ते शौहर को अपने घर में न आने दे या चंद अरसः के वास्ते खफा होकर अपने बाप के घर में चली जाये ।
दफा (7) मुकद्दमात सर्सरी के वास्ते हस्बजैल छोटी-छोटी सज़ायें मुकर्रर हैं --
अलिफ - न बोलना ।
बे - भौं चढ़ाना ।
जीम- रोना ।
दाल - बकना ।
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रंगीन कठिन शब्दों के अर्थ यहाँ लिखे जा रहे हैं -
आज भारतेन्दु के जन्मदिवस पर उनके बहुआयामी रचना-कर्म से चुनकर एक विशिष्ट और रोचक प्रस्तुति । शब्दावली वही कानूनी उर्दू-फारसी । रचना का नाम - ’कानून ताज़ीरात शौहर’ । शब्दावली की दुश्वारी के लिये पहले तो हिन्दी में अनुवाद करना चाहा था - पर मूल का आनन्द ज्यों का त्यों अक्षुण्ण रखने की जिद ने रोक दिया । कठिन शब्दों के अर्थ नीचे लिखूँगा । रचना चूँकि लम्बी है, इसलिये दो-तीन प्रविष्टियों में ही प्रस्तुत करना बेहतर होगा । यहाँ प्रस्तुत करने का उद्देश्य भारतेन्दु का पुण्य-स्मरण तो है ही इस रचना का दस्तावेजीकरण भी है इण्टरनेट पर । ( साभार : भारतेन्दु समग्र-हिन्दी प्रचारक ग्रंथावली परियोजना, वाराणसी )
कानून ताज़ीरात शौहर
पहिला बाब
तमहीद
चूँकि मुनासिब मालूम हुआ कि एक कानून ऐसा इजरा किया जावै जिस से बाद शादी के जौजा अपने शौहरों पर बखूबी हकूमत कर सकें और इस सबब से उन दोनों में निफा़क़ न पैदा हो लेहाजा़ क़ानून हस्बज़ैल मुरौविज किया गया ।
दफा (1) इस कानून का नाम ताज़ीरात शौहर होगा, हिन्दुस्तान में कोई औरत या मर्द जो शादी कर लेगा वह कानूनन इसका पाबन्द समझा जायेगा ।
मुस्तसना
जो अह्ल यूरोप हिंदुस्तान में आकर शादी करेंगे वह इस कानून से मुस्तसना समझे जायेंगे ।
दूसरा बाब
बयान असर अल्फाज
दफा (2) किसी औरत के तहत हुकूमत में कोई शै जो कि जाहिरा मनकूलः मगर बगैर हुक्म औरत के गैरमनकूलः है उस से मुराद शौहर है ।
तमसीलात
अलिफ - सन्दूक वगैरह को शौहर नहीं कह सकते क्योंकि वह जयदाद मनकूलः से हैं मगर अपने को खुद बखुद नहीं चला सकते हैं ।बे - गाय, बैल, कुत्ता, गदहा वगैरह अगरचे खुद बखुद चल सकते हैं मगर वह अपने औरतों की हुकूमत से जायदाद गैरमनकूलः नहीं हो जाते, इस वास्ते लफ्ज शौहर उन पर असर पज़ीर न होगा ।
जीम- चूँकि ऐसी जायदाद जो कि जाहिरा मनकूलः हो मगर औरत के हुक्म से फौरन गैर मनकूलः हो जाय, सिर्फ शादीकरदः मर्द हैं, लेहाज़ा लफ्ज शौहर से मुराद उन्हीं लोगों से होगी ।
दफा (3) शौहर की जायदार है, इस वास्ते उसपर उसको हर किस्म का अख्तियार हासिल है ।
तमसील
अपनी जायदाद को लोग जिस तरह बना बिगाड़ सकते हैं, उसी तरह जोरुओं को अपने शौहर पर ज़द व कोब करना व खाना न देना, वगैरह का अख्तियार हासिल होगा ।
तीसरा बाब
सज़ा
दफा (4) इस कानून में मुजरिमों को हस्बजैल सज़ा दी जायेगी ।
अलिफ - कैद यानी शौहर को मकान की चारदीवारी से बाहर न जाने देना, यह कैद दोनों तरह की होगी, वा मेहनत व बिला मेहनत - लफ़्ज बिना मेहनत से मुराद है कि सिर्फ बाहर न जाने पाये ।
बे - अलग बिस्तर या दूसरे मकान में सोलाना ।
जीम - हमेशा के वास्ते गुलामी करानी ।
दाल - जुर्माना, यानी किसी किस्म का नक्द या जेवर लेकर कसूर मुआफ़ करना ।
दफा (5) इस कानून में भी सजाय मौत सब से बड़ी सज़ा है मगर आदमी के जान को उनकी बदन से अलग कर देना यहाँ सज़ाय मौत नहीं, यहाँ लफ़्ज सज़ाय मौत से यह मुराद है कि औरत रूठ कर अपने बाप या भाई के घर चली जाय और फिर न आये ।
दफा (6) सजाय हबसदवाम बअबूर दरियाशोर से इस कानून में यह मुराद है कि औरत चंद अरसः के वास्ते शौहर को अपने घर में न आने दे या चंद अरसः के वास्ते खफा होकर अपने बाप के घर में चली जाये ।
दफा (7) मुकद्दमात सर्सरी के वास्ते हस्बजैल छोटी-छोटी सज़ायें मुकर्रर हैं --
अलिफ - न बोलना ।
बे - भौं चढ़ाना ।
जीम- रोना ।
दाल - बकना ।
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रंगीन कठिन शब्दों के अर्थ यहाँ लिखे जा रहे हैं -
१)कानून ताज़ीरात शौहर - पति दंड विधान, २) बाब - प्रकरण, ३) तमहीद - भूमिका, ४) जौजा - पत्नी, ५) निफ़ाक़ - झगड़ा, ६) हस्बजै़ल - निम्न के अनुसार, ७) मुरौविज - प्रचलित , ८) दफा - धारा, ९) पाबन्द - आबद्ध, १०) मुस्तसना - मुक्त, ११) अह्ल - निवासी, १२) असर - परिभाषा, १३) तहत हुकूमत - शासन के अधीन, १४) शै - वस्तु, १५) जाहिरा - प्रकट में, १६) मनकूलः - चल, १७) गैरमनकूलः- अचल, १८) तमसीलात - उदाहरण, १९) पजीर - प्रभावान्वित, २०) शादीकरदः - विवाहित, २१) ज़द व कोब - मार पीट, २२) हबसदवाम - सदा का कारावास, २३) बअबूर - पार कर, २४) दरियाशोर - समुद्र, २५) सर्सरी - साधारण ।
कानून ताजीरात शौहर जारी रहेगा ......
7 सितम्बर 2009
रमणी के नर्म वाक्यों से फूल उठा मंदार (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा )
"पादाघाताद् अशोकः, तिलकवुरबकौ वीक्षणा-ऽलिंनभ्याम्,
(स्त्रीणां) स्पर्शात् प्रियंगुः, विकसित बकुलः सीधुगण्डूषसेकात्,
मन्दारो नर्मवाक्यात्, पटुमृदुहासनात् चम्पको, वक्त्रवातात्
चूतो, गीताद् नमेरुर्, विकसति च पुरो नर्तनात् कर्णिकारः ॥"
वृक्ष-दोहद की चर्चा में मंदार तक आ पहुँचा हूँ । चिन्तन की जीभ लपलपा रही है । सोचता हूँ , रमणियों की यह अन्यान्य क्रियायें - पैरों की लाली, बाँकी चितवन, अयाचित मजाक, गाना-गुनगुनाना, इठलाना, मुस्कराना, निःश्वांस-उच्छ्वास -- क्या ये कामिनियों के बाण हैं - और ये खुल-खिल जाने वाले आम्र,अशोक, प्रियंगु, नमेरु, कर्णिकार, मंदार - क्या इस बाण से पहली ही नजर में घायल चरित्र हैं, अवतार हैं ? संस्कृत कवि-सम्प्रदाय व अन्योक्तियों में रस सदा इसी कोमलता या श्रृंगाराभास के आरोप से ही आता है न !
मंदार देवताओं का प्रिय पुष्प है । भूत-भावन शिव की अर्चा का साधन यह पुष्प देवराज इंद्र के नन्दन कानन के पंच-पुष्पों में से एक है - अलकापुरी में सदा शोभित । कुमारसंभव में महाकवि ने इंद्र और मंदार दोनों को शिव-चरणाश्रित उल्लिखित किया है -
"असम्पदस्तस्य वृषेण गच्छतः प्रभिन्न दिग्वारणवाहनो वृषा ।["ऐरावतवाहन इन्द्र भी उस वृषभारूढ़ हर के चरण पर अपने सकिरीट मस्तक को अवनत करता है तथा मंदार वृक्ष की पुष्प रज से हर के चरणों को सर्वदा रंजित करता है ।"]
करोति पादावुपगम्य मौलिना विनिद्रमन्दाररजोऽरुणांगुलि ॥"
मंदार का एक नाम अर्क भी है । शिव का प्रिय, इसलिये विषयुक्त । फारसी में ’दरख्ते जहरनाक”। क्या यही दरख्ते जहरनाक अलकापुरी के प्रिय पुष्पों में से एक है ? ’रघुवंश ’में उल्लेख है कि मंदार के पुष्पों को इंद्राणी अपनी अलकों में सुशोभित करती थीं । ’शाकुंतलम’ में वर्णित है-इंद्र ने दुष्यंत को मंदार-माला दी थी । क्या इसी ’आक’ या ’अर्क’ के पुष्पों की माला ? शायद नहीं । कालिदास का मंदार अर्क या आक नहीं वल्कि दूसरा है है । कुछ-कुछ वनस्पतिशास्त्रियों का जाना-पहचाना ’कोरल-ट्री’ जैसा । कालिदास जिस मंदार का वर्णन करते हैं उसमें पुष्पों के स्तवक (गुच्छे) हैं । ’ब्रांडिस’ ने भी अपनी पुस्तक ’इंडियन ट्रीज’ (Indian Trees) में मंदार का जो चित्र दिया है उसमें पुष्पों के स्तवक हैं । कालिदास का मंदार बड़ा नहीं होता । हाँथ से छुए जा सकने वाले आकार का वृक्ष । कुछ पीले भूरे पुष्प और उनमें गोल-गोल बैंगनी रंग-से छोटे-छोटे स्तवक ।
कवि-प्रसिद्धि है कि मंदार रमणियों के नर्म वाक्यों से पुष्पित होता है - ’मंदारो नर्मवाक्यात "। कालिदास ने इस विश्वास की पुष्टि की है । इस मोहक पुष्प से कामिनियों का प्रेम विलक्षण है । ’कुमारसंभव’, ’रघुवंश’, ’शाकुंतलम’, ’विक्रमोर्वशीय’, मेघदूत -सबमें महाकवि कालिदास ने इस पुष्प का वर्णन किया है । अलकानगरी की अभिसारिकायें रात्रि में प्रियतम के समीप गमन करती हैं, क्षिप्रता में वेणियों से सरक जाता है मंदार का पुष्प -
"गत्युत्कन्पादलकपतितैर्यत्र मन्दारपुष्पैःमेघदूत में ही मेघ को अपने घर का पता देता यक्ष मंदार के उस छोटे वृक्ष को नहीं भूलता जिसे उसकी भार्या (यक्षिणी) ने सस्नेह संवर्धित किया है -
पत्रच्छेदैः कनककमलैः कर्णविभ्रंशिभिश्च ....."
"....तस्योपान्ते कृतकतनयः कान्तया वर्धितो मे
हस्तप्राप्यस्तवकनमितो बाल मन्दार वृक्षः ।"
अलकापुरी का मंदार, कवियों का वर्णित मंदार पता नहीं हमारे आस-पास दिखते मंदार का सहरूप है या नहीं, पर उष्ण एवं शुष्क प्रदेशों में पाये जाने वाला आज का परिचित मंदार भी कम महत्वपूर्ण नहीं । मंदार 3 से 9 फुट उँचे वर्षानुवर्षी या बहुवर्षायु तथा बहुशाखी क्षुप होते हैं जो एक प्रकार के दुग्धमय एवं चरपरे रस (Acrid Juice) से परिपूर्ण होते हैं । कोमल शाखायें धुनी हुई रुई की तरह सफेद रोयें से घनावृत्त, पत्तियाँ छोटे डंठलों वाली, अभिलट्वाकार (Obovate) अधस्तल पर रुई की भाँति रोमावृत तथा पुष्प बाहर से सफेद तथा भीतर बैंगनी रंग के होते हैं ।
लघु-रुक्ष-तीक्ष्ण गुण, कटु-तिक्त रस, कटु विपाक, ऊष्ण वीर्य, वेदनास्थापन, शोथघ्न, व्रणशोधन, कुष्ठघ्न, वामक, श्वांसहर आदि प्रधान कर्म वाले इस वृक्ष का सबसे प्रभावकारी अंश इसमें पाये जाने वाला चरपरा पीला राल होता है । मंदार के यह पुष्प सालभर में कभी फूल-फल से खाली नहीं रहते किन्तु अपेक्षाकृत जाड़ों में अधिक फलते-फूलते हैं ।
# मदार का एक चित्र यहाँ और मदार के पत्तों पर विशिष्ट टिड्डों के चित्र यहाँ मिलेंगे ।
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वृक्ष-दोहद के बहाने यह वृक्ष-पुष्प चर्चा जारी रहेगी .....
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० फूलो अमलतास ! सुन्दरियाँ थिरक उठी हैं (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा)
० रमणियों की ठोकर से पुष्पित हुआ अशोक (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा)
० स्त्रियाँ हँसीं और चम्पक फूल गया (वृक्ष-दोहद के बहाने वक्ष-पुष्प चर्चा)
5 सितम्बर 2009
गुरु की पाती -
शिक्षक-दिवस पर प्रस्तुत कर रहा हूँ ’हेनरी एल० डेरोजिओ”(Henry L. Derozio) की कविता ’To The Pupils' का भावानुवाद -
मैं निरख रहा हूँ
नव विकसनशील पुष्प-पंखुड़ियों-सा
सहज, सरल मंद विस्तार
तुम्हारी चेतना, तुम्हारे मस्तिष्क का,
और देख रहा हूँ शनैः शनैः
उस विचित्र जादुई सम्मोहन को टूटते हुए
जिसने बाँधे रखा था
तुम्हारी बौद्धिक उर्जा को, तुम्हारी सामर्थ्य को,
जादुई प्रभाव से मुक्त तुम्हारी चेतना
क्रमशः अभिव्यक्त कर रही है स्वयं को वैसे ही
जैसे कोई पक्षी-शिशु कोमल ग्रीष्म काल में
फैला रहा होता है अपने पंख
नापने के लिये उनकी सामर्थ्य ।
मैं साक्षी हूँ
तुम्हारे भीतर आकर लेते
ज्ञान के पहले प्रतिरूप का,
फिर क्रमशः घनीभूत होतीं
असंख्य धारणाओं-अवधारणाओं का -
जो निर्मित होती हैं परिस्थितियों की गति से,
स्फूर्ति लेती हैं समय की फुहारों से ।
फिर जो घटता है अनिवार्य
तुम्हारे अनुभव में
वह सत्य का स्वीकार होता है,
तुम औचक ही सत्य के पुजारी बन जाते हो ।
उस आनन्द का क्या कहूँ
जो भविष्य की उस कल्पना से उपजता है
जिसमें तुम यश के सहपथी बने
मुदित हो रहे होते हो और अनगिनत
पुष्प-हार सज रहे होते हैं तुम्हारी ग्रीवा में
तुम्हारे सम्मान में ।
और तब, बस तभी
मुझे लगता है, कि
मैंने व्यर्थ ही नहीं जिया है यह जीवन !
आप सभी को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनायें ।
मैं निरख रहा हूँ
नव विकसनशील पुष्प-पंखुड़ियों-सा
सहज, सरल मंद विस्तार
तुम्हारी चेतना, तुम्हारे मस्तिष्क का,
और देख रहा हूँ शनैः शनैः
उस विचित्र जादुई सम्मोहन को टूटते हुए
जिसने बाँधे रखा था
तुम्हारी बौद्धिक उर्जा को, तुम्हारी सामर्थ्य को,
जादुई प्रभाव से मुक्त तुम्हारी चेतना
क्रमशः अभिव्यक्त कर रही है स्वयं को वैसे ही
जैसे कोई पक्षी-शिशु कोमल ग्रीष्म काल में
फैला रहा होता है अपने पंख
नापने के लिये उनकी सामर्थ्य ।
मैं साक्षी हूँ
तुम्हारे भीतर आकर लेते
ज्ञान के पहले प्रतिरूप का,
फिर क्रमशः घनीभूत होतीं
असंख्य धारणाओं-अवधारणाओं का -
जो निर्मित होती हैं परिस्थितियों की गति से,
स्फूर्ति लेती हैं समय की फुहारों से ।
फिर जो घटता है अनिवार्य
तुम्हारे अनुभव में
वह सत्य का स्वीकार होता है,
तुम औचक ही सत्य के पुजारी बन जाते हो ।
उस आनन्द का क्या कहूँ
जो भविष्य की उस कल्पना से उपजता है
जिसमें तुम यश के सहपथी बने
मुदित हो रहे होते हो और अनगिनत
पुष्प-हार सज रहे होते हैं तुम्हारी ग्रीवा में
तुम्हारे सम्मान में ।
और तब, बस तभी
मुझे लगता है, कि
मैंने व्यर्थ ही नहीं जिया है यह जीवन !
आप सभी को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनायें ।
4 सितम्बर 2009
इस तरह नष्ट होती है वासना !
मेरा एक विद्यार्थी ! या और भी कुछ । कई सीमायें अतिक्रमित हो जाती हैं । आज निश्चित अंतराल पर की जाने वाली खोजबीन से उसकी एक चिट्ठी मिली । घटना-परिघटना से बिलकुल विलग रखते हुए आपके सम्मुख लिख रहा हूँ उसका पत्र -- प्रभाव और अर्थाभास आपके जिम्मे -
"नमन अनिर्वच !
हमारी, सब की,
यह एक आनुवंशिक आदत है
कि हम बस उसे ही चाह सकते हैं,
दुलार सकते हैं
जिस पर हमारे स्वत्व का प्रभुत्व हो !
जिस पर हमारी एकाकी अर्थवत्ता आच्छादित हो
जिस पर हमारे इतिहास,
हमारे अतीत के स्मारक अविच्छिन्न
अपनी ऐतिहासिकता में निमग्न हों,
जिस के अवलम्ब पर
हमारे अप्रस्फुटित भविष्य की सहस्र संभावनायें-
किसी अविकसित नव्य-यष्टि में संवलित
अनेक मधुर, गुह्य और अज्ञात आभासी प्रतानों-सी कसमसाती -
निर्भर हों ,
हम बस उसे ही चाह सकते हैं,
निरख सकते हैं ।
किन्तु ,
आपका सम्मोहन,
न जाने किस काल-युग में,
ब्रह्माण्ड के किसी अज्ञात अक्षांश-देशांतर पर,
अस्तित्व के किसी अज्ञेय विमा-कोण पर,
संचित, संघनित, संतृप्त
वैभव-विभव-स्थैर्य-सन्निहित
आपकी साधना, अकथ्य आराधना !
वह, आपकी दुर्वह मिठास !
वह अंजानी बेसुध शीतलता !
वह, झरने के बहते पानी-सा
ईषत-उत्पन्न अच्छापन !
हमें मजबूर करता है
कि चाहें हम सब आपको
आपकी स्नेह सन्निधि में परिवेष्टित हो ।
किन्तु,
फिर वे आपकी परिधि पर अवस्थित हजारों व्यूह !
आपका व्यापक फैलाव ! - अज्ञेय उलझाव !
आपकी वो क्रूर, नृशंस निर्वैयक्तिकता !
वो प्राणांतक अनिर्धारित विलगाव !
नोंच डालते हैं भीतर तक जर्रा - जर्रा
कर डालते हैं युगों पुरानी जन्मजात, सहजात
आदतों का विषण्ण बलात्कार
और लथफथ हो जाता है मन का हर कोमल-नाजुक अंग !
और उन पर जमें अनेक दाद-खाज नासूर- सब के सब ।
इस तरह
नष्ट होती है वासना !
(उसके चिट्ठे पर भी मिलेंगे कुछ ऐसे ही संवेदना-सूत्र -- दुर्लंघ्य, अनिवार, दुर्लभतम ! )
चित्र : रवीन्द्र व्यास की पेंटिंग (वेब दुनिया से साभार)
"नमन अनिर्वच !
हमारी, सब की,
यह एक आनुवंशिक आदत है
कि हम बस उसे ही चाह सकते हैं,
दुलार सकते हैं
जिस पर हमारे स्वत्व का प्रभुत्व हो !
जिस पर हमारी एकाकी अर्थवत्ता आच्छादित हो
जिस पर हमारे इतिहास,
हमारे अतीत के स्मारक अविच्छिन्न
अपनी ऐतिहासिकता में निमग्न हों,
जिस के अवलम्ब पर
हमारे अप्रस्फुटित भविष्य की सहस्र संभावनायें-
किसी अविकसित नव्य-यष्टि में संवलित
अनेक मधुर, गुह्य और अज्ञात आभासी प्रतानों-सी कसमसाती -
निर्भर हों ,
हम बस उसे ही चाह सकते हैं,
निरख सकते हैं ।
किन्तु ,
आपका सम्मोहन,
न जाने किस काल-युग में,
ब्रह्माण्ड के किसी अज्ञात अक्षांश-देशांतर पर,
अस्तित्व के किसी अज्ञेय विमा-कोण पर,
संचित, संघनित, संतृप्त
वैभव-विभव-स्थैर्य-सन्निहित
आपकी साधना, अकथ्य आराधना !
वह, आपकी दुर्वह मिठास !
वह अंजानी बेसुध शीतलता !
वह, झरने के बहते पानी-सा
ईषत-उत्पन्न अच्छापन !
हमें मजबूर करता है
कि चाहें हम सब आपको
आपकी स्नेह सन्निधि में परिवेष्टित हो ।
किन्तु,
फिर वे आपकी परिधि पर अवस्थित हजारों व्यूह !
आपका व्यापक फैलाव ! - अज्ञेय उलझाव !
आपकी वो क्रूर, नृशंस निर्वैयक्तिकता !
वो प्राणांतक अनिर्धारित विलगाव !
नोंच डालते हैं भीतर तक जर्रा - जर्रा
कर डालते हैं युगों पुरानी जन्मजात, सहजात
आदतों का विषण्ण बलात्कार
और लथफथ हो जाता है मन का हर कोमल-नाजुक अंग !
और उन पर जमें अनेक दाद-खाज नासूर- सब के सब ।
इस तरह
नष्ट होती है वासना !
प्रणाम !
(उसके चिट्ठे पर भी मिलेंगे कुछ ऐसे ही संवेदना-सूत्र -- दुर्लंघ्य, अनिवार, दुर्लभतम ! )
चित्र : रवीन्द्र व्यास की पेंटिंग (वेब दुनिया से साभार)
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Himanshu Kumar Pandey |
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at 8:38 am |
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शीर्षक: poem, prasangvash, अभिषेक, कविता, ब्लॉगर |
2 सितम्बर 2009
मलहवा बाबा फिर आ गये ...
ढोलक टुनटुनाते हुए, इस वर्ष भी गाते हुए बाबा आ गये । हमने कई बार अपना ठिकाना बदला- दो चार किराये के घर, फिर अपना निजी घर; बहुतों की संवेदना बदली- पर बाबा आते रहे । मैं उन्हें मलहवा बाबा (मल्लाह बाबा ) कहता रहा - बहुत बचपन में नहीं , दसवीं में पढ़ते वक्त से । मलहवा बाबा बेरोकटोक आते रहे-मेरे दरवाजे, क्रमशः मेरी संवेदना, मेरे अन्तर्मन की दहलीज पर ।
मलहवा बाबा भिखारी हैं - मेरी बहन (मुझसे काफी छोटी ) मुझे समझाती - इंगिति, इतना भी क्या राग ? बाबूजी मुझे उत्सुक करते कि मलहवा बाबा से उनके गीत सुन आऊं और फिर उन्हें सुनाऊँ । वर्ष में बस एक बार एक दिन के लिये भीख माँगते मलहवा बाबा, ढोलक टुनटुनाते मलहवा बाबा, मछुआरे का गीत गाते मलहवा बाबा - मेरे आत्मीय औत्सुक्य के केन्द्र थे । मैंने पूछा था एक बार - ये एक दिन की भीख से पूरा साल कैसे खा लेते हैं आप ? हँसे - " गंगा मईया कऽ परताप हऽ बचवाऽ । अधेल्ला में पूरा जीवन बीत जाई । गंगा माई हईं, हँसत मुसकियात जीवन भर रखिहैं।" बाद में बताया बाबा ने - कि यह तो जीवनदायिनी गंगा मईया की वार्षिक पूजा (मल्लाहों/मछुआरों द्वारा की जाने वाली ) का एक उपक्रम मात्र है । मलहवा बाबा ने गंगा की पार उतराई से अपने दोनों बेटों को पढ़ा लिखा कर अफसर बना दिया है । उन्हें धन-धान्य की कमी नहीं । बेटे रोकते हैं उन्हें गली-गली फिरते, गाते-बजाते भीख माँगने के लिये । पर बाबा हैं कि गंगा मईया सर चढ़ जाती हैं उनके - बेटों की हवेली छोड़ अपनी मड़ई में अपनी नाव के साथ गंगा जी के पास दौड़े चले आते हैं । ढोलक उठाते हैं, माँगने निकल पड़ते हैं गंगा मईया के पूजन के निमित्त ( शायद परंपरा हो कि भीख माँगकर पूजना चाहिये ) ।
तो बाबा इस बार भी आ गये । रिकॉर्ड करने के लिये कमजोर मोबाइल ही थी - आपके सम्मुख है बाबा का गाया पार-उतराई का गीत । मछुआरे का एक रानी को पार उतारने के पूर्व का संवाद ।
कठवा में काटि के नइया बनवली हो कि गंगा जी ।
हमरो नइया परवा उतरबा हो कि गंगा जी ।
आज के रइनियाँ रानी बसो मोरे नगरिया हो कि गंगा जी ।
होत भोरवैं परवा उतरबे हो कि गंगा जी ।
[रानी ! काठ को काट-काट कर अपनी नाव बनायी है मैंने, अपनी इसी नाव पर मैं तुम्हें उस पार उतार दूँगा । पर, आज तो ठहर जाओ यहीं- मेरे नगर । ज्यों ही भोर होगी तुम्हें उस पार पहुँचा दूँगा ।]
मरि न जाबे केवटवा भुखिया पियसिया हो कि गंगा जी ।
मरि जइबे जड़वा अस पलवा हो कि गंगा जी ।
आज तूँ का खियइबा केंवटवा हमरी भोजनियाँ हो कि गंगा जी ।
काऽ हो देबा ओढ़ना डसवनाँ हो कि गंगा जी ।
[केवट ! यहाँ कैसे ठहर जाऊं ? भूख-प्यास से मर न जाऊँगी ! ठंड और पाला भी तो ऐसा कि जान न बचेगी । और खाउँगी क्या ? (यहाँ है ही क्या ? मैं ठहरी रानी !), और सोऊँगी कैसे ? ओढ़ने-बिछाने के लिये क्या दोगे ?]
दिनवाँ खियाइब रानी रोहू जल मछरिया हो कि गंगा जी ।
रतिया के ओढ़ाइब महाजलिया हो कि गंगा जी ।
[रानी ! दिन में तो रोहू मछली खिलाऊँगा-भूख मिट जायेगी ; और रात को ओढ़ाने को मेरी मछली का जाल तो है ना ! ]
एक तऽ करुवासन केंवटवा रोहू तोर मछरिया हो कि गंगा जी ।
दुसरे करुवासन महाजलिया हो कि गंगा जी ।
[केवट ! कैसे खाउँगी मैं रोहू मछली ? वह तो कड़वी है । और तुम्हारा जाल ओढ़कर भी न सो सकूँगी - वह भी तो अजीब सी गंध देती है ।]
घरवाँ तऽ रोअत होइहैं गोदी के बलकवा हो कि गंगा जी ।
कैसे बसूँ तोहरि अब नगरिया हो कि गंगा जी ।
[केवट ! मुझे उसे पार ले चलो ! मेरे गोद का बालक घर पर बिलख रहा होगा मेरे लिये । उसे छोड़ कर कैसे ठहर जाऊँ यहाँ ?]
अरे अगिया लगावा रानी गोदी के बलकवा हो कि गंगा जी ।
बस जइबू हमरी अब नगरिया हो कि गंगा जी।
रानी ! आग लगाओ गोद के बालक को । इतना क्या सोचना ! उसे भूल जाओ और यहीं ठहर जाओ ]
अगिया लगइबै केंवटवा रोहू तोर मछरिया हो कि गंगा जी ।
बजर न परैं तोहरे महाजलिया हो कि गंगा जी ।
तोहरे ले सुन्दर केंवटवा घरवाँ मोरा बलमुआ हो कि गंगा जी ।
कचरत होइहैं मगहिया बीड़वा पनवाँ हो कि गंगा जी ।
[केवट ! आग तो लगाउँगी मैं तुम्हारी रोहू मछली को (इसका ही प्रलोभन था न !) । तुम्हारी जाल पर आफत आ जाये ! क्या तुम नहीं जानते ? तुमसे सुन्दर मेरा प्रियतम मुँह में मगही पान दबाये घर पर बैठा मेरी राह देख रहा होगा ।]
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मैं क्या हूँ? क्या सुनहली उषा में जो खो गया, वह तुहिन बिन्दु या बीत गयी जो तपती दुपहरी उसी का विचलित पल; या फिर जो धुँधुरा गयी है शाम अभी-अभी उसी की उदास छाया? मैं क्या हूँ? जो सम्मुख हो रही है इस अन्तर-आँगन में वही ध्वनि, या किसी सुदूर बहने वाली किसी निर्झर-नदी का अस्पष्ट नाद? मैं क्या हूँ? बार-बार कानों में जाने अनजाने गूँज उठने वाली किसी दूरागत संगीत की मूर्छित लरी या फिर जिस आकाश को निरख रहा हूँ लगातार,उस आकाश का एक तारा?
मैं क्या हूँ? जानना इतना आसान भी तो नहीं!
