छ्ठ पूजा : परम्परा एवं सन्दर्भ


हमारी परम्परा में विभिन्न ईश्वरीय रूपों की उपासना के लिए अलग-अलग दिन-तिथियों का निर्धारण है । जैसे गणेश पूजा के लिए चतुर्थी, विष्णु-पूजा के लिए एकादशी आदि। इसी प्रकार सूर्य के लिए सप्तमी तिथि की संगति है, जैसे सूर्य-सप्तमी, अचला सप्तमी आदि. छठ या सूर्य षष्ठी पर्व को लेकर मुख्य उत्सुकता यही है कि बिहार के इस व्रत में सूर्य से षष्ठी तिथि की संगति किस महत्व का प्रतिपादन करती है ?

पौराणिक कथाओं, उल्लेखों से अगर हम सन्दर्भ ग्रहण करें तो किंचित सूर्य एवं षष्ठी तिथि के समन्वय पर कुछ विचार हो सके ? 'बह्मवैवर्त पुराण में उल्लेख है कि परमात्मा ने सृष्टि के लिए स्वयं को दो भागों में विभक्त किया । दक्षिण भाग से पुरुष और वामभाग से प्रकृति का आविर्भाव हुआ । यही प्रकृति देवी विश्व की समस्त स्त्रियों में अंश,कला, कलांश,कलांशांश भेद से अनेक रूपों में दिखायी देती हैं. इन्ही प्रकृति का छठा अंश जो सबसे श्रेष्ठ मात्रिका मानी जाती हैं - 'देवसेना' या षष्ठी देवी कहलाती हैं। यह देवी श्रृष्टि के समस्त बालकों की रक्षिका एवं आयुप्रदा हैं। ' ब्रह्मवैवर्त पुराण' में ही इस देवी के महत्व से सम्बंधित 'राजा प्रियव्रत' की कथा का उल्लेख है। राजा प्रियव्रत निःसंतान थे। महर्षि कश्यप की प्रेरणा से पुत्र हुआ परन्तु वह शिशु मृत था। राजा के गहरे दुःख से द्रवित होकर आकाश से एक ज्योतियुक्त विमान में ब्रह्मा की मानस पुत्री 'षष्ठी देवी' उतरीं एवं अपने स्पर्श मात्र से शिशु को जीवित कर दिया। राजा प्रसन्न हो गए एवं देवी की स्तुति करने लगे। तब से षष्ठी तिथि की पूजा की परम्परा आरम्भ हो गयी.

एक अन्य महत्वपूर्ण सन्दर्भ जिससे षष्ठी तिथि में सूर्य पूजा का महत्व प्रकट होता है - मैथिल 'वर्षकृत्यविधि' ग्रन्थ है। इसमें बिहार में प्रसिद्द सूर्य षष्ठी व्रत की पर्याप्त चर्चा है, एवं इस व्रत से संदर्भित 'स्कन्दपुराण' की कथा का उल्लेख भी इस ग्रन्थ में है। इस कथा के अनुसार एक राजा कुष्ठरोग ग्रस्त एवं राज्यविहीन थे । एक ब्राह्मण की प्रेरणा से उन्होंने इस व्रत को किया जिससे वे रोगमुक्त होकर राज्याधिपति बन गए।

परन्तु षष्ठी तिथि में सूर्य पूजा क्यों ? सूर्य प्रत्यक्ष देवता हैं, वे समस्त अभीष्टों की पूर्ति करते हैं - " किं किं न सविता सूते ।" सांसारिक तीनों इच्छाओं -पुत्र-ईच्छा, वित्त-इच्छा एवं लोक-ईच्छा - में सभी भगवान सूर्य प्रदान करने में समर्थ हैं, परन्तु पुत्र-ईच्छा ? वात्सल्य का महत्व तो स्त्री, माँ ही जानती है । ब्रह्मा की मानस पुत्री प्रकृति-अंश देवी षष्ठी ही संतान की अधिकृत देवी हैं। अतः षष्ठी तिथि में सूर्य-पूजा से मनुष्य की तीनों एषणाओं की पूर्ति हो जाती है। यही कारण है कि इस व्रत का महत्व लोक में अधिक व्याप्त है।

सूर्य षष्ठी व्रत की प्रमुख कथा 'भविष्योत्तर पुराण' में संगृहीत है. सतयुग में 'शर्याति' नाम के राजा की 'सुकन्या' नामक पुत्री थी। एक दिन जब राजा शिकार खेलने वन में गए थे तो सुकन्या ने सखियों के साथ भ्रमवश तपस्यारत 'च्यवन' ऋषि की दोनों आँखें फोड़ दी थीं । मिट्टी से शरीर के ढँक जाने से च्यवन ऋषि एक टीले की भांति लग रहे थे और उनकी दोनों आँखें जुगनुओं की तरह चमक रही थीं। सुकन्या समझ न सकी और उत्सुकतावश काँटों से उसने दोनों आँखें फोड़ दीं। इस पाप से राजा एवं उनकी सेना का मल-मूत्र स्तंभित हो गया। फिर राजा शर्याति पश्चातापवश अपनी कन्या के साथ ऋषि के पास पहुंचे और अपनी कन्या का दान उन्हें कर दिया। ऋषि प्रसन्न हो गए और राजा एवं उनकी सेना का मल-मूत्र निष्कर्षण भली-भांति होने लगा। अपने अंधे पति च्यवन के साथ रहती हुई सुकन्या ने एक दिन नागकन्याओं द्वारा किए जाने वाले इस व्रत को देखा एवं बाद में स्वयं यही व्रत किया जिससे उसके पति की आँखें ठीक हो गयीं।

अतः पति के आयु, आरोग्य एवं पुत्र की कामना, सुरक्षा, हित-क्षेम आदि के लिए इस व्रत का महत्त्वपूर्ण विधान है। बिहार के लोकगीतों में पुराणों की इन कथाओं का समन्वय विद्यमान है । इन गीतों में वैभव,ऐश्वर्य, पति के आरोग्य आदि की कामना तो भगवान सूर्य से की जाती है, परन्तु पुत्र की कामना देवी षष्ठी (छठ मैया) से ही की जाती है। अतः भगवान् सूर्य के इस व्रत-पर्व में शक्ति एवं ब्रह्म दोनों की उपासना का फल एक साथ प्राप्त होता है।

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यद्यपि यह आलेख पिछले वर्ष पोस्ट किया था, पर अनजाने में ही डिलीट हो बैठा । लिखित रूप में लिखा रखा था, इसलिये पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ । 


photo : google

मुझे देखो ...

वहाँ देखो,
एक पेंड़ है जगमगाता हुआ
उसकी शाखो में चिराग फूलते हैं,
मदहोश कर देने वाली गंध-सी रोशनी
फैलती है चारों ओर,
आइने-से हैं उसके तने
जिनमें सच्चापन निरखता है हर शख़्स
और अशआर की तरह हैं उसकी पत्तियाँ
काँपती हुई ।

मुझे देखो,
मेरे दिल की इबारत, इशारत, अदा देखो !
उस जगमगाते पेंड़ का बीज
इस दिल में ही पैवस्त है ।

मेरी अमित हैं वासनायें .... (गीतांजलि का भावानुवाद )

My desires are many and my cry is
pitiful, but ever didst thou save
me by heart refusals; and this strong
mercy has been wrought into my
life through and through.

Day by day thou art making me worthy
of the simple great gifts that thou
givest to me unasked-this sky
and the light, this body and the life
and the mind-saving me from
perils of over-much desire.

There are times when I languidly
linger and times when I awaken
and hurry in search of my goal;
but cruelly thou hidest me thyself
from before me.

Day by day thou art making me
worthy of thy full acceptance by
refusing me ever and anon, saving
me from perils of weak, uncertain desire.
--(Geetanjali : R.N. Tagore)


मेरी अमित हैं वासनायें, है अमित मेरा रुदन
स्वीकृत न कर उनको बचाते हो मुझे तुम प्राणधन ।

मुझ पर यही करते रहे हो बार-बार कृपा प्रभो !
प्रति दिवस अपने योग्य करते इस प्रकार बचा प्रभो
महनीय शुचि उपहार देते जो बिना याञ्चा कथन-
स्वीकृत न कर उनको बचाते हो मुझे तुम प्राणधन ।

यह दिन दिया, यह द्युति दिया ऐसी दिया काया भली
ऐसा दिया मस्तिष्क प्रभु हो धन्य दी जीवन गली
मुझको न होने दिया मलिना वासनाओं का सदन -
स्वीकृत न कर उनको बचाते हो मुझे तुम प्राणधन ।

आया समय उर को मलिन जब तुच्छ इच्छा ने हरा
जब मैं सजग निज लक्ष्य पाने हेतु दिखलायी त्वरा
तुम दृष्टि ओझल हो गये तत्काल उस क्षण मति प्रवण -
स्वीकृत न कर उनको बचाते हो मुझे तुम प्राणधन ।

सम्पूर्ण स्वीकृति योग्य प्रतिदिन प्रभु बनाते हो मुझे 
दुत्कार मलिना तुच्छ इच्छायें सजाते हो मुझे
स्वीकृत नहीं करते विनश्वर वासना ’पंकिल’ सुमन
स्वीकृत न कर उनको बचाते हो मुझे तुम प्राणधन ।
--(’पंकिल ’- मेरे बाबूजी )

एक दीया गीतों पर रख दो ...

एक दिया गीतों पर रख दो, एक दिया जँह सुधियाँ सोयीं
एक दिया उस पथ पर रख दो जिस पर हो अनुरागी कोई ।


एक दिया पनघट पर रख दो एक दिया बँसवट के पास
एक दिया तालों में रख दो कमलों का है जहाँ निवास
एक दिया खेतों में रख दो, जिनमें हैं आशायें बोईं ।


एक दिया मेढ़ों पर रख दो एक दिया फिर क्यारी में
एक दिया मन्दिर में रख दो एक दिया फुलवारी में
एक दिया बगिया में रख दो जो खोज रही खुशबू खोयी ।


एक दिया लहरों पर रख दो एक दिया उस नाव पर
जो लिख रही है पत्र प्रणय के सदियों से बहाव पर
एक दिया रेत पर रख दो, जिसने सावन की आस सँजोयी ।


एक दिया झुरमुट में रख दो जिसमें हिरनों का है गेह
एक दिया पोखर पर रख दो जिसमें भरा हुआ है नेह
एक दिया नीड़ों में रख दो जिसमें है सृष्टि पिरोयी ।


एक दिया मन में रख लो एक दिया  दिल के पास
एक दिया पलकों पर रख दो जिसमें है मिलने की आस
एक दिया दृष्टि में रख दो, जो दूजों के दुख पर रोयी ।


--राम शरण ’अनुरागी’

रचना क्या है, इसे समझने बैठ गया मतवाला मन

कविता ने शुरुआत से ही खूब आकृष्ट किया । उत्सुक हृदय कविता का बहुत कुछ जानना समझना चाहता था । इसी अपरिपक्व चिन्तन ने एक दशक पहले कुछ पंक्तियाँ लिखीं । मेरी शुरुआती छन्द की रचनाओं के प्रयास दिखेंगे यहाँ । पढ़ते-लिखते जितना जाना-समझा था (वह बहुत न्यून था) सब अभिव्यक्त होना चाहता था । यहाँ वही शुरुआती कविता प्रस्तुत है -


"रचना क्या है, इसे समझने बैठ गया मतवाला मन
कैसे रच देता है कोई, रचना का उर्जस्वित तन ।

लगा सोचने क्या यह रचना, किसी हृदय की वाणी है,
अथवा प्रेम-तत्व से निकली जन-जन की कल्याणी है,
क्या रचना आक्रोश मात्र के अतल रोष का प्रतिफल है
या फिर किसी हारते मन की दृढ़ आशा का सम्बल है ।

’किसी हृदय की वाणी है’रचना, तो उसका स्वागत है
’जन-जन की कल्याणी है’ रचना, तो उसका स्वागत है
रचना को मैं रोष शब्द का विषय बनाना नहीं चाहता
’दृढ़ आशा का सम्बल है’ रचना तो उसका स्वागत है ।

’झुकी पेशियाँ, डूबा चेहरा’ ये रचना का विषय नहीं है
’मानवता पर छाया कुहरा’ ये रचना का विषय नहीं है
विषय बनाना हो तो लाओ हृदय सूर्य की भाव रश्मियाँ
’दिन पर अंधेरे का पहरा’ ये रचना का विषय नहीं है ।

रचना की एक देंह रचो जब कर दो अपना भाव समर्पण
उसके हेतु समर्पित कर दो, ज्ञान और अनुभव का कण-कण
तब जो रचना देंह बनेगी, वह पवित्र सुन्दर होगी
पावनता बरसायेगी रचना प्रतिपल क्षण-क्षण, प्रतिक्षण ।

तुमने मुझे एक घड़ी दी थी…

time-flies-clock तुम्हें याद है…तुमने मुझे एक घड़ी दी थी-कुहुकने वाली घड़ी । मेरे हाँथों में देकर मुस्करा कर कहा था, "इससे वक्त का पता चलता है । यह तुम्हें मेरी याद दिलायेगी । हर शाम चार बजे कुहुक उठेगी । आज भी….चार ही न बज रहे हैं अभी…लगता है बाकी हैं कुछ सेकेण्ड ।" फिर तुम खिलखिलाकर हँस पड़े..और अचानक ही वह कुहुक उठी ।

आज वर्षों के अंतराल पर तुम्हें देखा है । घड़ी कुहुक उठी है । चार तो नहीं बजे …. फिर क्यों ? हर शाम चार बजे घड़ी कुहुकती रही , मैं तुम्हारी यादों में निमग्न सुध-बुध खोता रहा ….तुम्हारी वह अंतिम मुस्कान, और फिर तुम्हारी वह खिलखिलाहट ! दुर्निवार …! मैंने कई बार महसूस किया ढलती हुई शाम में घंटो सोचते, उग आये चंद्रमा की चाँदनी-सी विस्तरित होती तुम्हारी खिलखिलाहट के बारे में … सोचता रहा, सोचता रहा….सोच न सका, समझ न सका ।

आज वर्षों के अंतराल पर तुम मिले हो । घड़ी वैसे ही चल रही है….चार बजे कुहुक रही है । वर्षों तक समझ न पाया, पर आज शायद तुम्हारा इशारा समझ रहा हूँ , समझ पा रहा हूँ । क्षण को अक्षुण्ण बनाये रखने की अदम्य अभीप्सा मुझे सौंपकर तुमने समझा दिया कि ऐसे ही किसी क्षण को अनन्त समय तक अ-व्यतीत बनाये रखने की संघर्षमयता में न जान कितने अमूल्य क्षण बीतते चले जाते हैं । अनवरतता का मोह ही ऐसा है । तुम्हारी उदभावना न समझी थी उस वक्त ।

मैं सोच रहा हूँ, तुमने उस क्षण को जी लिया…. फिर चल पड़े । मैंने उस क्षण को पकड़ लिया…. अटक गया । उस विशेष काल को विराट-काल से घुला-मिला दिया तुमने, मैंने उसे बाँध लेने की कोशिश की । क्या मैं समझता न था कि मनुष्य घड़ियों से कब बँधा है ?  घड़ियाँ हमेशा कुहुकती रही हैं, हँसती रहीं हैं उस पर । यद्यपि हम दोनों ने उस क्षण को विराट से लय कर देना चाहा, शाश्वत बना देना चाहा….तुमने उस क्षण-विशेष को सततता के सौन्दर्य में परखा…मैंने उस क्षण-विशेष की साधना से उसे ही सतत बना देना चाहा ।

क्या ऐसा हो सकता है कि बरसों बाद भी मनुष्य, उसका कोई एक अनुभव, उसका बोध - सब गतिहीन होकर ठहरा रह जाय ! क्या यह स्थिरता है - प्रेम की स्थिरता ! घड़ी जो तुमने दी थी, वो तो चल रही थी…चार बजना, उसक कुहुकना गति की सूचना थी । क्षण अटका नहीं था चार पर, क्षण का अनुभव था, जो चार की सापेक्षता में स्थायी हो गया था ।

बस यूँ ही….

रंग-गंध-मिलन क्षणिक मादक

मिल गयी है फूल की वह  गंध

जाकर रंग से….

ढूँढ़ना मत अमरता,

सज गया है वह अनोखा राग

जाकर गीत पर…

खोजना मत सततता ।

 

रंग-गंध-मिलन क्षणिक मादक

वियोग की करुण कथा है,

राग तो आकाश में लय हो उठेगा

मनोवांछा की व्यथा है..।

के० शिवराम कारंत : ’मूकज्जी’ का मुखर सर्जक

           ’के० शिवराम कारंत’ - भारतीय भाषा साहित्य का एक उल्लेखनीय नाम, कन्नड़ साहित्य की समर्थ साहित्यिक विभूति, बहुआयामी रचना-कर्म के उदाहरण-पुरुष !  सर्जना में सत्य और सौन्दर्य के प्रबल जिज्ञासु कारंत जीवन को सम्पूर्णता और यथार्थता में निरखने की निरंतर चेष्टा अपने कर्म में करते रहे, और इसीलिये ज्ञान के बहुविध क्षेत्रों में उनका प्रवेश होता रहा, कला के अनेक आयाम उन्होंने छुए । अपने प्रिय पाठकों की दृष्टि में एक स्वाधीन, निर्भय और निष्कपट व्यक्तित्व का नाम है के० शिवराम कारंत । साहित्य की अनेकों विधाओं में उनका समर्थ लेखन उन्हें एक विराट सर्जक की प्रतिष्ठा देता है । उत्कृष्ट उपन्यासकार, कुशल नाटककार, अन्यतम शोधकर्ता व आलोचक, प्रशंसित शब्दकोशकार व विश्वकोशकार, बहुचर्चित आत्मकथा लेखक व महनीय सम्पादक के रूप में डॉ० के० शिवराम कारंत कन्नड़ साहित्य को सार्वत्रिक प्रतिष्ठा प्रदान करते हैं ।

K. Shivaram karanth/के० शिवराम कारंतजन्म: १० अक्टूबर, १९०२, कोटा, कर्नाटक; मातृभाषा: कन्नड़; व्यवसाय: स्वतंत्र लेखन; पुरस्कार / सम्मान: डी०लिट० (मानद, कर्नाटक वि०वि०, मैसूर वि०वि०, मेरठ वि०वि०), पद्म भूषण (आपातकाल में लौटा दिया), साहित्य अकादमी पुरस्कार-१९५९, भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार-१९७७ एवं अन्य कई पुरस्कार/सम्मान; प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ: नाटक-गर्भगुडि, एकांत नाटकगलु, मुक्तद्वार, गीतानाटकगलु,विजय, बित्तिद बेले, मंगलारति, उपन्यास: चोमन दुड़ि, मरलि मण्णिगे, बेट्टद जीव, मुगिद युद्ध, कुडियर कुसु, चिगुरिद कनसु, बत्तद तोरे, समीक्षे, अलिद मेले, ओंटि दानि, मूकज्जिय कनसुगलु (ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त), केवल मनुष्यरु, मूजन्म, इळ्येम्ब, कन्निडु कणारू, कहानी-संग्रह - हसिवु, हावु, निबंध - ज्ञान, चिक्कदोड्डवरू, हल्लिय हत्तु समस्तरु, कला-विषयक - भारतीय चित्रकले, यक्षगान बयलाटा (साहित्य अकादेमी), चालुक्य वास्तुशिल्प, कला-प्रपंच, यक्षगान, भारतीय शिल्प, आत्मकथा - हुच्चु मनस्सिन हत्तु मुखगलु, विश्वकोश-शब्दकोश,विज्ञान विषयक - बाल प्रपंच, विज्ञान प्रपंच(चार खंड) विचित्र खगोल, हक्किगलु, अन्य- जीवन रहस्य, जानपद गीते, विचार साहित्य निर्माण, बिडि बरहगलु  ।
           लेखन कारंत जी के लिये अपने अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करना है । समग्र जीवन-दृष्टि के धनी कारंत वर्तमान को विगत के स्वीकार के साथ जीना चाहते हैं । पुरानी परिपाटी से उदाहरण लेना और फिर उसे वर्तमान जीवन की कसौटी पर कसना, प्रचलित मान्यताओं को ज्यों का त्यों न स्वीकारना बल्कि सातत्य में उनकी प्रासंगिकता का पुनरीक्षण करना आदि कारंत जी के व्यक्तित्व व उनकी सर्जना की अन्यतम विशेषताएं हैं, और इसीलिए वे विद्रोही हैं । विद्रोही हैं तो साहसी भी हैं - चौंतीस वर्ष की उम्र में तीन खण्डों के बाल-विश्वकोश का सम्पादन, उनतालीस वर्ष की उम्र में एक लघु शब्दकोश का निर्माण, सत्तावन वर्ष की उम्र में विज्ञान आधारित चार खण्डों का विश्वकोश विज्ञान प्रपंच का प्रणयन, तीन खण्डों की कृति ’भारतीय कला और मूर्तिकला’ की रचना आदि ।
           ’डॉ० कारंत’ की प्रत्येक रचना अन्याय के विरुद्ध आग्रह रखने का भाव अपने अन्तर में सँजोये प्रस्तुत होती है । न्याय और एकाधिकार की न्यून उपस्थिति भी उनका अन्तर भड़का देती है । वस्तुतः डॉ० कारंत की सम्पूर्ण रचना-गतिविधियों का केन्द्र मनुष्य और उसका समग्र व्यक्तित्व है और इसीलिये वे एक परिबुद्ध मानवतावादी के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं ।
          मानव की सम्पूर्ण अनुभूति को अभिव्यक्त करती लेखनी यह उदघोषित करती है कि साहित्य कुछ और नहीं वस्तुतः इस जीवन का ही प्रतिफल है । ’डॉ० रणवीर रांग्रा’ से बातचीत करते हुए ’डॉ० कारंत’ ने कहा है -
"अपने आसपास के प्राणियों के प्रति संवेदनशील रहते हुए ही जीवन जीना चाहिये । यदि मैं अपने पर्यावरण के प्रति उदासीन रहता हूँ तो मेरा जीना रुक जाता है । जब भी मैं अतीत को मुड़ कर देखता हूँ, कृतज्ञता की भावना से अभिभूत हो उठता हूँ । मैं अपने लोगों का ऋणी हूँ - उनका भी जो जीवित हैं और जो बीत गये हैं उनका भी । मैं सम्पूर्ण सृष्टि का ऋणी हूँ जो मेरे, मेरे समकालीनों और मेरे पूर्वजों सरीखे मनुष्यों का भार वहन कर रही है । यदि हमारे पूर्वजों ने हमें अपना चिन्तन, ज्ञान और अनुभव न दिया होता तो हम अपनी संस्कृति के बहुत बड़े दाय से वंचित रह जाते । मुझ पर इतने लोगों का ऋण है कि मुझे लेखन के माध्यम से अपने अस्तित्व का औचित्य सिद्ध कर अपना कर्त्तव्य पूरा करना चाहिये - मेरा वह लेखन वर्त्तमान और विगत तथा दूर और निकट के जीवन के प्रति योगदान के रूप में चाहे कितना ही अकिंचन क्यों न हो !" 
-(भारतीय साहित्यकारों से साक्षात्कार )

स्वयं लेखक के शब्दों में उनकी पुस्तकों पर एक दृष्टि -
K. Shivaram Karant Pagale man ke das chehare "मैं अपने मन को पागल क्यों कहता हूँ ? इसका कारण यह नहीं है कि यह पागलपन नहीं चाहता बल्कि उसे मैं पसन्द करता हूँ। ऐसे पागलपन के कारण अनेक ऐसे साहस करके जिन्हें करना नहीं चाहिए, मुझे अपनी और दुनिया का पागलपन समझ में आया है।….. विष्णु के यदि दस अवतार हैं तो मेरे ध्येय ने सोलह अवतार लिये। देशप्रेम, स्वदेशी प्रचार, व्यापार, पत्रकारिता अध्यात्म साधना, कला के विभिन्न रूप फोटोग्राफी, नाटक, नृत्य, चित्रकला, वास्तुकला, संगीत सिनेमा-इतना ही नहीं समाज- सुधार, ग्रामोद्धार, शिक्षा के नये नये प्रयोग, उद्योग यह सब मेरे कार्य क्षेत्र रहे। और भी नये-नये प्रयोग चल ही रहे हैं। …… केवल अपनी खिड़की से बाहर झाँकनेवालों को भले ही इन सब परिवर्तनों में कोई परस्पर- सम्बन्ध न दीखे पर वास्तविकता ऐसी नहीं है। इस यात्रा में कोई और व्यक्ति यदि मेरे साथ होता तो उसे पता चलता कि यह सब यात्रा के अलग-अलग पड़ाव हैं।……"
K. Shivaram Karant mookajji "मेरी पुस्तक ’मूकज्जी’ में यौन के मानवीय, अतीन्द्रिय व अन्य विविध पक्षों की चर्चा है, जो हमारे अतीत इतिहास में विकसित होते रहे गुहा-मानव से प्रारंभ होकर वर्तमान युग तक के लम्बे इतिहास-काल को समेटती है । यहाँ चर्चा है यौन की सर्जक शक्ति की, यौन के धार्मिक प्रतीक के रूप की, वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में यौन-स्थिति की । इन सबका तर्क-संगत पद्धति से विवरण है - यौन, एक सर्जक-शक्ति; यौन, एक धार्मिक प्रतीक; यौन, देवी-देवता के रूप में; यौन पौराणिक गाथाओं में; यौन वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में आदि ।"

मैं सहजता की सुरीली बाँसुरी हूँ…

कमल - सहज अभिव्यक्तमैं सहजता की सुरीली बाँसुरी हूँ
घनी दुश्वारियाँ हमको बजा लें ।

मैं अनोखी टीस हूँ अनुभूति की
कहो पाषाण से हमको सजा लें ।

मैं झिझक हूँ, हास हूँ, मनुहार हूँ
प्रणय के राग में इनका मजा लें ।

आइने में शक़्ल जो अपनी दिखी है
उसी को वस्तुतः अपना बना लें ।

मिलन पहला, गले मिलना जरूरी है ?
जरा ठहरो ! तनिक हम भी लजा लें ।

याद कर रहा हूँ तुम्हें, सँजो कर अपना एकान्त ...

उन दिनों जब दीवालों के आर-पार देख सकता था मैं अपनी सपनीली आँखों से, जब पौधों की काँपती अँगुलियाँ मेरी आत्मा को सहला जाती थीं, जब कुहासे की टटकी बूँदे बरस कर भिंगो देती थीं मन-वसन, जब पारिजात-वन का तारक-पुष्प झर-झर झरता था मेरी चेतना के आँगन - तब भी तुम अथाह की थाह लेती हुई न जाने किधर अविरत देखती रहती थीं ! तुम्हारा इस तरह निर्निमेष शून्य की ओर देखना मेरे प्राणॊं में औत्सुक्य भरता था । मैं सब कुछ तजकर तुम्हारी उन्हीं आँखों की राह पर बिछ-बिछ जाना चाहता था, और इच्छा करता था कि तुम्हारी अन्तर्यामिनी आँखें, तुम्हारी पारदर्शिनी आँखें मेरे अन्तर के हर भेद को पकड़ लें, उन्हें खोल दें ।

आज मैं अकेला हूँ । मैंने अपना यह एकान्त सँजो कर रखा था तुम्हें याद करने के निमित्त । आज जब मैं अपने मानस, अपनी चेतना के अत्यन्त एकान्त में तुम्हें स्मरण कर रहा हूँ, तो लगने लगा है कि तुम्हारी प्रेमपूर्ण, सजल आँखें मुझे देख रहीं हैं । मुझे लग रहा है कि वह आँखें मुझे आत्मसात कर लेंगी । और अचानक ही मैं संतप्त हो उठा हूँ । मुझे सम्हालों मेरे सुहृद ! यह ’मेरे” कहना तुम्हें बुरा तो नहीं लगा ! यह एकाधिकार कसक तो नहीं गया कहीं उर-अंतर ! पर मैं क्या करूँ ? जब मेरी सिहरन अनुभूति के द्रुत-गति तान लेती थी, जब अन्तर का प्यासा-पपीहा पुकार उठता था करुण-भाव, जब एक अन्तहीन-से लगने वाले विरह से कँप-कँप जाता था यह उदास मन,  तब वृक्षों, वनस्पतियों, फूल-पत्तों, सागर-पर्वतों, दिग-दिगन्तों को साक्षी मान मैं तुम्हें सिर्फ अपना ही जान पुकारता था । मैं और मेरा यह भावित हृदय तुम्हें विश्वास दिलाना चाहता है कि मेरा यह प्रेम किसी भाव-विभाव से अनुप्राणित नहीं, निःसीम है यह ।

मैं तुम्हें स्मरण कर रहा हूँ । उच्छ्वास की हवा बार-बार सिहरा रही है मुझे । कितनी करुणा है इसमें ? इस गीली, उदास हवा को तुम तक पठा दूँ ? समझ जाना इस संतप्त, व्यथित हवा की छुअन से कि तुम्हारा विरह मेरे प्राणों की कँपकँपी बन गया है । मेरी प्रेमातिरेकी भावना की गंध और हृदयावस्थित प्रेम की स्मृतियाँ सँजोकर यह हवा तुम तक जायेगी, तो विचार करना कि तुम कितने अभिन्न हो मेरे !

यद्यपि तुम सीमाहीन हो, निःसीम - पर क्या तुम्हें मेरा आत्मनिवेदन स्मरण है ? क्या वह आत्मनिवेदन भाव की सीमाओं में बँधा था ? नहीं न ! असीम ही था न  ! फिर निःसीम को निःसीम के आत्मनिवेदन के चिन्तन का कैसा भाव ! पर इसी निःसीमता में एक असीम व्याकुल भाव है जो सर्वत्र उपस्थित है, सर्वत्र विचरण करता हुआ - सबके प्राणों में ठहरा हुआ - प्रेम ।

आज मैं अकेला हूँ । अपने सँजोये एकान्त में तुम्हारा स्मरण कर रहा हूँ, तुम्हें पुकार रहा हूँ । क्या तुम आओगे ? अपना अस्तित्व सजा कर खड़ा हो जाउँगा मैं तुम्हारे स्वागत में । मेरे चटक अनुराग का पुष्प और उर-कोकिल की रागिनियाँ तुम्हारा मंगल-स्वागत करेंगी । अर्पित तो न कर सकूँगा कुछ, बस रख दूँगा तुम्हारे पास- आकाश, सूरज, धरती, गंध और प्रवाह ।

बालक की छतरी ...

एक समय महाराष्ट्र में वर्षा न होने से भीषण जलकष्ट हुआ; पशु और मनुष्य दोनों ही त्रस्त हो गये । तब सभी ने मिलकर वर्षा के लिये ईश्वर से प्रार्थना करने का निश्चय किया ! एक निश्चित स्थान पर सभी एकत्र हुए । इतने में एक बालक छतरी लिये आया और वह भी सबके साथ प्रार्थना करने लगा । लोगों ने पूछा,
" यह छतरी क्यों लाये?"
तो उसने उत्तर दिया,
"जब आप सभी लोग ईश्वर के पास वर्षा के लिये प्रार्थना करने आये हैं तो मैं भी उसी आशा में चला आया - सामान्य लोग भी किसी वस्तु के माँगने पर हमें निराश नहीं करते तो फिर ईश्वर के यहाँ क्या कमी है ? वर्षा आयेगी इसलिये उससे बचने के लिये छ्तरी ले आया ।"
कई लोग तो इस पर उसका मजाक उड़ाने लगे । परन्तु बालक की श्रद्धा से प्रसन्न होकर प्रभु ने वर्षा भेंजी । सब भींगने लगे, परन्तु बालक छतरी के नीचे सकुशल घर लौट आया ।

--’भारती ’ से साभार
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कहानी मौजूँ लगी । इसे पोस्ट करना प्रकारान्तर से ब्लॉग अपडेट करने का बहाना भी है । टेम्पलेट को बदलने के चक्कर में ब्लॉग बनावट और बुनावट दोनों खराब कर बैठा हूँ । शीर्षक तक नहीं दिख रहे मेरी प्रविष्टियों के,  लुका-छिपी का खेल खेल रहे हैं । आशीष जी को मेल किया है, उन्हीं का सहारा है - नहीं तो हारकर...!

नमन् अनिर्वच ! (गांधी-जयंती पर विशेष )



पूर्व और पश्चिम की संधि पर खड़े
युगपुरुष !
तुम सदैव भविष्योन्मुख हो,
मनुष्यत्व की सार्थकता के प्रतीक पुरुष हो,
तुम घोषणा हो
मनुष्य के भीतर छिपे देवत्व के
और तुम राष्ट्र की
भाव-प्रसारिणी प्रवृत्तियों का विस्तरण हो ।

अहिंसा के चितेरे बापू !
है क्या तुम्हारी अहिंसा -
जीवन का समादृत-स्वीकार ही न !
जीवनानुभूति का विस्तार ही न !
समादर-भाव की प्रतिष्ठा ही न मुक्त करती है
जीवन के अवरुद्ध-स्रोत को ।

गीता की धर्म-संस्थापना और है क्या 
सिवाय जीवन के प्रति समादर की प्रतिष्ठा के !

निर्विघ्न सुंदरता की सत्य-मूर्ति !
तुम सजग हो ’परिवर्तन ’ के प्रति ।
परिवर्तन का मतलब -
तल से नयी सभ्यता में दिखता नया मनुष्य ।

नयी सभ्यता : लोभ-मोह निःशेष मनस्थिति
नयी सभ्यता : प्रेमोत्सुक उर, सजल भाव चिति
नयी सभ्यता : प्रकृति प्रेम, निश्छलता औ’ करुणा का सुन्दर योग
नयी सभ्यता : सहज-सचेत-सजग अनुभव का मणिकांचन संयोग ।

हे सार्वत्रिक, हे सर्वमान्य, हे सर्वांतर-स्थित !
नमन् अनिर्वच !
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कवि प्रदीप का लिखा यह गीत मुझे सदैव प्रिय है -

कौतूहल एक धुआँ है..

कौतूहल एक धुआँ है
उपजता है तुम्हारी दृष्टि से,
मैं उसमें अपनी आँखे मुचमुचाता
प्रति क्षण प्रवृत्त होता हूँ
आगत-अनागत के रहस लोक में

समय की अनिश्चित पदावली
मेरी चेतना का राग-रंग हेर डालती है
जो निःशेष है वह ध्वनि का सत्य है ,
वह सत्य जो निर्विकल्प है,
गूढ़ है, पर सहज ही अभिव्यक्त है ।

गवाक्ष

विविध

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