सौन्दर्य लहरी के यह रूपान्तरित छन्द पहले मुक्त छन्द में लिखने शुरु किए थे। बाद में अमरेन्द्र के उचकाने पर छ्न्दबद्ध लिखने का प्रयास दूसरी प्रविष्टि में दिखा आपको। टिप्पणियाँ, मेल इनबॉक्स-दोनों ने छन्दबद्ध रूप से ज्यादा छन्दमुक्त रूप को सराहा। प्रयास तो यही था कि नियमित तीन चार छन्दों की प्रस्तुति से इस ग्रंथ को सम्पूर्णतः प्रस्तुत कर दूँगा, पर अनगिन व्यतिरेकों ने राह रोकी, मैं ठहरा ही रह गया। एकांत के क्षण जब खूब सघन होकर चेतना पर छा गए तो पुनः इस लहरी का सौन्दर्य स्मरण में आया। मैं सायास उपस्थित हूँ सौन्दर्य लहरी का हिन्दी रूपांतर (छन्द संख्या 7-11) प्रस्तुत करने के लिए। ढंग वही मुक्त छंदी, आपको रुचिकर लगेगा, इसलिए।

सौन्दर्य लहरी का हिन्दी भाव रूपांतर

क्वणत्कांची दामा करिकलभकुम्भस्तननता ।
परिक्षीणा मध्ये परिणतशरच्चन्द्रवदना ॥
धनुर्वाणान्पाशं सृणिमाप दधाना करतलैः ।
पुरस्तादास्तां नः पुरमथितुराहोपुरुषिका ॥७॥

पुरविनाशन शंभु की पुरुषत्वप्रबोधिनी
अति कृशा कटि प्रांत पर कल किंकिणी धारे
बालगज के कुम्भ से उन्नत उरोजों का सम्हाले भार
विनता मध्यभागा
शरच्चन्द्रमुखा
सुशोभित करतलों में
धनुषबाण सुपाश अंकुश
प्रकट हो सम्मुख हमारे दृष्टिगत हो जाँय॥7||

सुधासिन्धोर्मध्ये सुरविटपिवाटीपरिवृते ।
मणिद्वीपे नीपोपवनवति चिन्तामणिगृहे॥
शिवाकारे मञ्चे परमशिवपर्यंकनिलयां ।
भजन्ति त्वां धन्याः कतिचन चिदानन्दलहरीं ॥८॥

सुधासागर बीच जो नंदन विपिन के
कल्पविटपों  से घिरा मणिद्वीप सुन्दर
मध्य उसके नीपतरुआवृत
सुचिन्तामणि सदन है
शिवाकार वहाँ त्रिकोणाकृतिकृता मंचस्थिता जो
हे पराम्बा चिदानन्दलहरी !
धन्य हैं वे, ध्यान जो धरते तुम्हारा ॥8॥

महीं मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवहं ।
स्थितं स्वाधिष्टाने हृदि मरुतमाकाशमुपरि ॥
मनोऽपि भ्रूमध्ये सकलमपि भित्वा कुलपथं ।
सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसि ॥९॥

भेदकर तुम चक्र मूलाधार में जो स्थित धरा है
वारि जो मणिपूर, स्वाधिष्ठान में जो ज्वलित पावक
उर अनाहत चक्र का पवमान ऊपर गगनमण्डल
भेदती सब मन भृकुटि के मध्य आज्ञाचक्र में रख
सकल कुल कुण्डलिनि-पथ अवरोध का करती विभंजन
तुम परमशिव स्वपति के संग
सहस्रार सरोज में
करती रमण हो ॥9॥

सुधा-धारा-सारैश्चरण-युगलान्तर्विगलितैः ।
प्रपञ्चं सिञ्चन्ती पुनरपि रसाम्नाय महसः ॥
अवाप्य स्वां भूमिं भुजगनिभमध्युष्टवलयं,
स्वमात्मानं कृत्वा स्वपिषि कुलकुंडे कुहरिणि ॥१०॥

युगल पद पंकज-स्रवित जो सुधाधारा
सींचती उससे बनाती आर्द्र अखिल प्रपंच काया व्यूह
परमतृप्ता षटविधान प्रभावलय से
गता मूलाधार की निज वसुमति में
सार्ध त्रिवलय जो कि सर्पाकार
वहाँ स्वात्मरूपिणी करती शयन तुम
पुनः हे कुलकुण्डशयिनी !
गुहावासिनि ! 10॥

चतुर्भिं श्रीकण्ठैः शिवयुवतिभिः पञ्चभिरपि ।
प्रभिन्नाभिः शम्भोर्नवभिरपि मूलप्रकृतिभिः ॥
त्रयश्चत्वारिंशद्वसुदल-कलाब्ज-त्रिवलय —
त्रिरेखाभिः सार्द्धं तव चरणकोणः परिणताः ॥११॥

चार शिव के शक्ति के जो पंच संख्य
त्रिकोण अविकल
शंभु के फिर भिन्न नव मूला प्रकृति के
संरचित जो देवि तैंतालीस मंजु त्रिकोण वसुदल
संख्य षोडसदल समेटे सुभग त्रिवलय
चतुर्द्वारसमेत भूपुर रेख की संघति सम्हाले
संरचित है दिव्य जो श्री चक्र
देवि निकेत तेरा ॥11॥