24 मार्च 2010

सेजिया से सइयाँ... (चैती ) और उस्तादों की जुगलबंदी में चैती-धुन

यूँ ही टहलते हुए नेट पर यहाँ पहुँच गया, शहनाई उस्ताद बिस्मिल्लाह खान और सितार के धुरंधर विलायत खान की जुगलबंदी में चैती धुन सुन कर अघा गया । आपके सामने ले आया हूँ ! सुनिये, रस पगिये ।



अभी कुछ दिन पहले ही अपने प्रिय संगीत-स्थल पर छन्नूलाल मिश्र जी की चैती का आनन्द ले चुका था, सोचा वह भी नत्थी कर दूँ ! आप भी अघाइये !



साभार -
चैती धुन(उस्ताद विलायत खां और उस्ताद बिस्मिल्ला खां): http://www.fmw11.net/
चैती (श्री छन्नूलाल मिश्र ):http://indianraga.blogspot.com/

19 मार्च 2010

कह दिया मैंने ..

मेरी अपनी एक ज़िद है
रहने की, कहने की 
और उस ज़िद का एक फलसफ़ा ।

यूँ तो दर्पण टूट ही जाता है
पर आकृति तो नहीं टूटती न !

उसने मेज पर बैठी मक्खी को
मार डाला कलम की नोंक से
क्या मानूँ इसे ?
विगत अतीत में 
दलित हिंसा की जीर्ण वासना का
आकस्मिक विस्फोट ?

पुरुषार्थ क्या इक्के का टट्टू है
असहाय, संकल्पहीन ?
बरज नहीं तो गति कैसी,
विरोध नहीं तो उत्कर्ष कैसा !

प्राण में प्राण भरना
आदत हो गयी है मेरी
अलग-अलग वक़्त में लिखी गईं अलग-अलग संदर्भों की पंक्तियाँ यहाँ मिलजुल गयी हैं, इनका हाथ मिलाकर चलना मुझे भाया, सो इन्हें आपके सामने ले आया।
इसके मूल में परिवर्तन है,
वही परिवर्तन
जो प्रकृति में न घटे
तो प्रकृति प्राणहीन हो जाय

साधन कितने बढ़ गये हैं आजकल
रावण के मुख की तरह,
पर मन तो
एक ही था न रावण का !
विविधता का मतलब आत्मघात तो नहीं ?

जिस असंगति पर
उसका खयाल नहीं
मुझे पता है उसका, 
यांत्रिक संगति से 
काम नहीं होता मेरा, 
प्राण-संगीत की लय पर 
झूमता है मेरा कंकाल,
जानता हूँ श्रेष्ठतर मार्ग
पर
हेयतर मार्ग पर चलता हूँ ..
क्योंकि
जानता हूँ 
कर्म और सिद्धांत की असंगति ।


बस मेरे खयाल में न्याय है
हर किस्म का,
हर मौके, 
हर तलछट का न्याय
क्योंकि
न्याय
सामाजिक व्यवस्था से
कुछ ऊपर की चीज है मेरे लिये,
भोग है एक आन्तरिक,
रसानुभूति है !

13 मार्च 2010

हाय दइया करीं का उपाय...

चारु और मैं
धर संवाद-स्वाद, फिर अवसाद के कुछ क्षणों से गुजरते हुए चारुहासिनी की मनुहार से बाबूजी के लिखे कई गीत यूँ ही गुनगुनाता रहा । अपनी सहेलियों को बाबूजी के लिखे गीतों को गा-गाकर सुनाना और फिर अपनी इस समृद्धि पर इतराना उसकी बाल सुलभ क्रिया हो गयी है इन दिनों । इसी उपक्रम में उसे सुनाये गये दो गीत यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ । पहला गीत अकेली मेरी आवाज में है, जिसमें लक्ष्मण को शक्ति लग जाने के बाद राम की कातर स्थिति का वर्णन है, और उनका विलाप ! दूसरा गीत चारुहासिनी के सहयोग से निर्मित मेरे स्वर का परिणाम है ! हम दोनों ने सम्हाला है एक दूसरे को बेसुरे होने से (फिर भी कहाँ रोक पाये हैं, और उम्र भी क्या है अभी चारु की, और मैं तो हूँ ही धुरंधर)। 


(1)
हाय दइया करीं का उपाय, लखन तन राखै बदे ।
घायल भइया गोद रखि बिलखत, राघव करेजवा लगाय,
लखन तन राखै बदे.......॥१॥
अबके विपिन में बिपति मोरि बाँटी, रनबन में होखी सहाय,
लखन तन राखै बदे.......॥२॥
अब के करी बड़का भइया क खोजिया, तनि उठि के देता बताय,
लखन तन राखै बदे.......॥३॥ 
सँग अइला तजि बाप मइया लुगइया, का कहबै जननी से जाय,
लखन तन राखै बदे.......॥४॥ 
जनतीं कि उड़ि जइबा बनि के चिरइया, मर जइतीं माहुर चबाय,
लखन तन राखै बदे.......॥५॥ 
बिरथा जनम दिहलीं तिरिया के खातिर, भाई दुलरुवा गँवाय,
लखन तन राखै बदे.......॥६॥ 
भरि दिन लड़ि थाकल बजरंगी, की कतहूँ गइलैं ओंहाय,
लखन तन राखै बदे.......॥७॥ 
की बिलमवलस रवनवाँ  कै बेटा, की गइलैं रहिया भुलाय,
लखन तन राखै बदे.......॥८॥ 
टप-टप टपकत ’पंकिल’ अँसुवा, झुकि गइलैं मुँहवा झुराय,
लखन तन राखै बदे.......॥९॥ 
वाहि घरी  मारुत सुत अइलैं, गइलीं बिपतिया पराय,
लखन तन राखै बदे.......॥१०॥



(२)
सखिया आवा उड़ि चलीं ओहि बनवाँ हो ना ।
जहवाँ टेरैलैं मुरली मोहनवाँ हो ना 
जहवाँ हरि बोलैं सुगना-मयनवाँ हो ना-
सखिया आवा उड़ि चलीं.....॥

उगलैं शरद पुरुनियाँ कै चनवाँ हो ना 
इहवाँ तन उहवाँ उड़ि गइलैं मनवाँ हो ना-
आली बिछपित भइलैं परनवाँ हो ना ॥

लाख रोकै चाहे दुनियाँ जहनवाँ हो ना
तजि भागि चला धनवा-घरनवाँ हो ना-
पग कै रुनझुन बाजैला बजनवाँ हो ना ॥

सासु सुतलीं अगोरले अँगनवाँ हो ना 
कवनों लागी नाहीं सखिया बहनवाँ हो ना-
भावै ’पंकिल’ हरि कै चरनवाँ हो ना ॥

10 मार्च 2010

माँ भी कुछ नहीं जानती

"बतलाओ माँ,
बालमणि अम्मा
मलयालम कविता की शीर्ष कवयित्री । प्रख्यात भारतीय अंग्रेजी साहित्यकार ’कमला दास’ की माँ ।
जन्म : १९ जुलाई १९०९,
मृत्यु : २९ सितम्बर २००४
’सरस्वती सम्मान’ सहित अनेक सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित । कवितायें दार्शनिक विचारों एवं मानवता के प्रति अगाध प्रेम की अभिव्यक्ति । बच्चों के प्रति प्रेम-पगी कविताओं के कारण मलयालम-कविता में अम्मा के नाम से समादृत । 
मुझे बतलाओ,
कहाँ से, आ पहुँची यह छोटी सी बच्ची ?"
अपनी अनुजाता को 
परसते-सहलाते हुए
मेरा पुत्र पूछ रहा था 
मुझसे;
यह पुराना सवाल,
जिसे हजारों लोगों ने 
पहले भी बार-बार पूछा है ।
प्रश्न जब उन पल्लव-अधरों से फूट पड़ा
तो उस से नवीन मकरन्द की कणिकाएँ चू पड़ीं;
आह, जिज्ञासा
जब पहली बार आत्मा से फूटती है
तब कितनी आस्वाद्य बन जाती है 
तेरी मधुरिमा ! 
कहाँ से ? कहाँ से ?
मेरा अन्तःकरण भी
रटने लगा यह आदिम मन्त्र ।
समस्त वस्तुओं में 
मैं उसी की प्रतिध्वनि सुनने लगी
अपने अन्तरंग के कानों से;
हे प्रत्युत्तरहीण महाप्रश्न !
बुद्धिवादी मनुष्य की 
उद्धत आत्मा में 
जिसने तुझे उत्कीर्ण कर दिया है 
उस दिव्य कल्पना की जय हो ! 
अथवा
तुम्हीं हो 
वह स्वर्णिम कीर्ति-पताका 
जो जता रही है सृष्टि में मानव की महत्ता ।
ध्वनित हो रहे हो
तुम 
समस्त चराचरों के भीतर
शायद,
आत्मशोध की प्रेरणा देने वाले
तुम्हारे आमंत्रण को सुनकर
गायें देख रही हैं
अपनी परछाईं को
झुककर ।
फैली हुई फुनगियों में
अपनी चोंचों से
अपने आप को टटोल रही हैं, चिड़ियाँ ।
खोज रहा है अश्वत्थ
अपनी दीर्घ जटाओं को फैलाकर
मिट्टी में छिपे मूल बीज को;
और, सदियों से
अपने ही शरीर का 
विश्लेषण कर रहा है
पहाड़ ।
ओ मेरी कल्पने,
व्यर्थ ही तू प्रयत्न कर रही है 
ऊँचे अलौकिक तत्वों को छूने के लिये ।
कहाँ तक ऊँची उड़ सकेगी यह पतंग
मेरे मस्तिष्क की पकड़ में ?
झुक जाओ मेरे सिर,
मुन्ने के जिज्ञासा भरे प्रश्न के सामने ! 
गिर जाओ, हे ग्रंथ-विज्ञान 
मेरे सिर पर के निरर्थक भार-से 
तुम इस मिट्टी पर ।
तुम्हारे पास स्तन्य को एक कणिका भी नहीं 
बच्चे की बढ़ी हुई सत्य-तृष्णा को -
बुझाने के लिये ।
इस नन्हीं सी बुद्धि को थामने-संभालने के लिये 
कोई शक्तिशाली आधार भी तुम्हारे पास नहीं ! 
हो सकता है,
मानव की चिन्ता पृथ्वी से टकराये
और सिद्धान्त की चिनगारियाँ बिखेर दे । 
पर, अंधकार में है 
उस विराट सत्य की सार-सत्ता 
आज भी यथावत ।
घड़ियाँ भागी जा रही थीं
सौ-सौ चिन्ताओं को कुचलकर;
विस्मयकारी वेग के साथ उड़-उड़ कर छिप रही थीं
खारे समुद्र की बदलती हुई भावनाएँ
अव्यक्त आकार के साथ,
अन्तरिक्ष के पथ पर ।
मेरे बेटे ने प्रश्न दुहराया,

माता के मौन पर अधीर होकर ।
"मेरे लाल,
मेरी बुद्धि की आशंका अभी तक ठिठक रही है
इस विराट प्रश्न में डुबकी लगाने के लिये,
और जिस को
तल-स्पर्शी आँखों ने भी नहीं देखा है,
उस वस्तु को टटोलने के लिए ।
हम सब कहाँ से आये ? --
मैं कुछ भी नहीं जानती !
तुम्हारे इन नन्हें हाथों से ही
नापा जा सकता है
तुम्हारी माँ का तत्त्व-बोध ।"
अपने छोटे से प्रश्न का
जब कोई सीधा प्रत्युत्तर नहीं मिल सका
तो मुन्ना मुसकराता हुआ बोल उठा
" माँ भी कुछ नहीं जानती ।"


'भारतीय ज्ञानपीठ' से प्रकाशित अनुवाद 'छप्पन कविताएं' से साभार ।

8 मार्च 2010

तब ’नारी’ हो जाउँगी..

मुक्ति पर इतना विवाद, 
खुलेपन पर इतना हंगामा क्यों ? 

युग बीते, पर
क्या तुम्हारी लोभ से ललचायी आँखों से 
पूर्व-राग का नशा नहीं उतरा ? 
शाश्वत कुंठा या कायरता
हो गयी न अभिव्यक्त !
संस्कार दुबक गया
शिक्षा का, समाज का
जग गई न निसर्ग की सोई भूख
हो गये न ’पुरुष’
जिसे स्त्री का उन्नयन नहीं,
मनस-पूजन नहीं
देंह-गठन, त्वचा-संवेदन चाहिए !

मैं आवरण में थी
बस इसलिये ही
कि निरावृत होकर
नहीं करना चाहती थी
निखिल सृष्टि का सौन्दर्य मलिन,
रूप को ढांक-छिपा रखना चाहती थी
माया-मेघ की ओट
कि पुरुषत्व के जीवन में
भर न जाय ग्लानि,
मुक्ति का स्वर्ग-द्वार
रखती थी बंद सदा
कि उसकी झलक से संसार का कतृत्व
मोहांध विमुख न हो जाय ,
कंठ में ही
ठहरा देती थी अपना संगीत
कि उसकी चाह में मतवाले बन
तुम छानो ख़ाक
क्षिति-तल की,
अघा न जाओ तत्क्षण !

पर मेरे इस निष्पाप मनोयोग की
खूब परीक्षा ली है तुमने,
नग्न शरीर की शारीरिकता पर उलझे हो,
उसके पीछे की सारभावना भुलाकर ।

पर, अब
अतीत की नियति-रेखाओं को लुप्त कर
मैं नव्य-जीवन की राह लूँगी,
सच की आधारशिला पर गढूँगी
नव नन्दन-वन,
खुद के रूप पर रीझूँगी नहीं
मुक्त करूँगी स्वयं को
’खुद’ के कारागृह की दीवार तोड़,
विचरूँगी तितली-सी आनन्द-स्वच्छंद,
मधुहास-सी खिलूँगी,
बदलूँगी वस्तु का सन्दर्भ
(क्योंकि बदलता है न
सन्दर्भ-भेद से अर्थ !)
और तत्त्व-मुक्त दीख पड़ूँगी...
मतलब..
तब ’नारी’ हो जाउँगी
पूरक प्रेरणा भी, चुनौती भी !

6 मार्च 2010

करुणावतार बुद्ध - 10

कुछ चरित्र हैं जो बार-बार दस्तक
देते हैं, हर वक्त सजग खड़े होते हैं
मानवता की चेतना का संस्कार
करने हेतु । पुराने पन्नों में अनेकों
बार अनेकों तरह से उद्धृत होकर
पुनः-पुनः नवीन ढंग से लिखे जाने
को प्रेरित करते हैं । इनकी अमित
आभा धरती को आलोकित करती
है, और ज्ञान  का प्रदीप उसी से
सम्पन्न होकर युगों-युगों तक
मानवता का कल्याण करता रहता
है । करुणावतार बुद्ध के ऐसे ही  
महानतम चरित्र को उद्घाटित करतीं 
प्रविष्टियाँ नाट्य-रूप में प्रस्तुत हैं । 
करुणावतार बुद्ध- 1, 2, 3, 4, 5,
6, 7, 8, 9 के बाद प्रस्तुत है दसवीं
कड़ी......
(अगम्य-गम्य गिरि प्रान्तरों, कंदर खोहों तथा घोर विपिन में घूमते फिरते सिद्धार्थ के साथ लगी विद्वत मण्डली ने साथ छोड़ दिया । पंचभद्रीय विप्र उनके साथ लगे रहे । शयन-जागरण, उत्थान-परिभ्रमण सब में सिद्धार्थ एक ही चिन्ता में डूबते उतराते रहते-दुख क्या है , क्यों है, कैसे है और इससे निवृत्ति कैसे हो ! कभीं सारी रात जल में खड़े रहते, कभीं नेत्र-प्रतिघातिनी सूर्य-किरणों को अपलक निहारते, कभीं कठोर आसन साधते, कभीं प्राणायाम में घंटो-घण्टों समय व्यतीत करते, कभी उपवास करते, कभी मौन रहते, कभी एक पादस्थिति में तरु शाखा पकड़कर खड़े रहते । कभीं समय निकलने पर संगस्थ विप्रों से मन की बातें करते, कभीं तत्व-चर्चा करते, कभीं फूट-फूट कर बिलख पड़ते, कभी पागलों-सा प्रलाप करते, कभीं कुछ गुनगुनाते, कभीं किसी को कुछ सुनाते-समझाते, कभी आकाश के विस्तार और उसकी गहन नीलिमा का अवलोकन करते, कभीं किसी गहन कूप की गहराई झाँकते, कभी खग-रव में अपना स्वर मिला देते, कभीं वन्यपशुओं को अपने गले लगाते, कभी आँखें मूँदे धूलि में लेट जाते, कभी आँखे अधमुखी छोड़ देते । इस प्रकार तपश्चर्या में कब दिन बीता, कब रात गयी, इसकी खोज खबर ही नहीं रहती । साथी ब्राह्मणों का संघट होने पर उनसे जीवन-चर्या, अध्यात्म-चर्या की दिशा-दशा निर्धारित करते । बीच-बीच में वार्ता-क्रम का विराम होता किन्तु उसमें भी उनका स्वगत भाषण चलता रहता । फिर वचन-प्रतिवचन की श्रृंखला प्रारंभ हो जाती । )



सिद्धार्थ - जीवन में दुःख क्यों है ? धधकती हुई अग्निज्वाला को शीतल मणिमंडन समझ कर अंक में उठा लेना जैसे सुख का कारण नहीं हो सकता तथा हलाहल को सुधा समझ पी लेना जैसे अमरत्व का कारण नहीं है, वैसे ही विनाशी वस्तु को सुख समझकर अपनाने से सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती ! एक ऐसी कोई सत्ता है जो समस्त परिवर्तनों में सदा एकरस है । उस को देखे बिना आंखें अतृप्त ही रहेंगी, उसके बिना हृदय की सेज सूनी ही रहेगी । उसका आलिंगन प्राप्त किये बिना बाहें फैली ही रहेंगी । उसको प्राप्त करने में ही जीव के जीवन की पूर्णता है । जिस जीवन का वह लक्ष्य है वहां सच्चा जीवन है । 

एक ब्राह्मण - गौतम ! आकाश में उड़ने के लिये केवल पंख ही आतुर नहीं होते, आकाश स्वयं निमंत्रण देता है कि कोई पंछी आये और मेरे उन्मुक्त व्योम में छलांग लगाये ! हृदय के अंतर्देश में परमात्मा और उसके वहिर्देश में प्रपंच है । उभय-मध्य में संस्थित हृदय जब स्थूल प्रपंच का चिन्तन करता है तब क्रमशः जड़भावापन्न हो जाता है, और जब अन्तःस्थित चित्स्वरूप परमात्मा का चिन्तन करता है, तब चिदभावापन्न हो जाता है । हृदय को जड़ता के दलदल से निकाल कर चिदभूमि पर प्रतिष्ठित करने का प्रयत्न ही तो साधना है । प्यारे ! पानी की सार्थकता केवल इस बात में नहीं है कि मेघ बरसें बल्कि आदमी के कंठ में उसकी प्यास भी हो ! वह पानी अर्थहीन हो जाता है, अगर उसे प्यासा कंठ न मिले ।

सिद्धार्थ - विप्रवर ! पानी की एक बूंद आकाश से मिट्टी पर गिर जाये तो वह धूल-धूसरित हो जाती है । वही पानी में गिर जाय तो अपना अस्तित्व मिटाकर उसी में समाहित हो जाती है । प्रवृत्ति के ही अनुसार फल । तप में, साधना में प्रवृत्ति ही दुख की आत्यंतिक निवृत्ति और परमानन्द की प्राप्ति को लक्ष्य करके होती है । जब तक लक्ष्य की सिद्धि न हो, तब तक साधना से निवृत्त हो जाना कायरता है । सुख और दुख अंतःकरण में होते हैं । अतः अंतःकरण को ऐसी स्थिति में ले जाना ही तपश्चर्या है द्विज, जिसमें उनका अनुभव ही नहीं हो ! ऐसा जागरण ही तप है और यह करना ही होगा ।

दूसरा ब्राह्मण - तरुण तापस ! मेरी समझ में जीवन से बढ़कर जीवन का कोई मूल्य नहीं है । जीवन के सम्पूर्ण सौन्दर्य को परिपूर्णता के साथ जियो ! जीवन के संगीत को सुनो । उठा लो जीवन की बांसुरी को, साध लो अंगुलियां । जीवन जीने की सार्थकता सोचा ? क्यों है जीवन यात्रा ?


सिद्धार्थ - जीवन यात्रा ? विप्रवर ! चलता रहता हूँ, पर वहीं रहता हूं । कहाँ रहता हूँ ? जहाँ रहना चाहिये । कहाँ रहना चाहिये ? स्वयं स्वरूप में । वह कैसा है - शांति स्वरूप और प्रकाश स्वरूप । चल में भी अचल होना चाहिये, यात्रा में भी स्थिर रहना चाहिये । पता नहीं यात्रा कब समाप्त हो जायेगी !

ब्राह्मण - तपश्वर्या तुम्हारे प्रश्नों का समाधान कर देगी, इसका क्या भरोसा ? भावानुभाव की हत्या करके कुछ पा जाओगे, यह दुराशा है । अनुराग-उदधि में डूबो, विचार का बोझ विसर्जित कर दो । क्यों खोजने पाने का चक्रव्यूह रच रहे हो ? क्या पाया तुमने अब तक ? क्या मिटा सके तुम ? तुम तो अपने आप को मिटा रहे हो । अनुपलब्धि के इस दुखान्तक खेल में हम तुम्हारे साथ नहीं रहेंगे । जगत दुख है, दुख है, मिथ्या है, मिथ्या है कहने से काम नहीं चलेगा । 
(ब्राह्मण साथ छोड़ काशी की ओर प्रस्थान कर जाते हैं ।सिद्धार्थ व्यथित घूम रहे हैं ।) 
करुणावतार बुद्ध 
सिद्धार्थ - ओ विश्वविपदे ! क्या तुम्हारा साम्राज्य अभेद्य है ? मुझसे देखा नहीं जाता । कहाँ सुख-स्रोत खोजूँ ?
(सिद्धार्थ माथ पीट-पीट कर गगन की ओर दृष्टि फैलाते हैं । आँखें अश्रुस्नात हैं । अधर विकंपित हैं । सहसा तपस्विनी दर्शित होती है ।)

तपस्विनी - देखो प्रिय ! ज्ञान ही ज्ञान के लिये आतुर हो रहा है । स्वयं स्वयं का अनुसंधान कर रहा है । कैसी लीला है ? कितना सुन्दर खेल है । जो खिलाड़ी है, वही खिलौना है और वही खेल है । देख भी वही रहा है । अपने खेल में स्वयं ही रीझ गया है । यही खेल की पूर्णता है । समय प्रतीक्षा कर रहा है तुम्हारे पकने की । जागो ! अपने पास रहो ! अपने सामने रहो ! जो कुछ भी हो रहा है, वह विराट नाटक की एक अनादि नाटकीय योजना के अनुसार ही हो रहा है । चित् शक्ति लीला कर रही है । 


संकल्प ही सारे प्रपञ्च का मूल् है । संकल्प ही न किया जाय ! जो हो रहा है, होने दो ! प्रिय ! तुम संकल्पहीनता का अभ्यास करो ! स्थिर हो जाओ ! अभीं स्थिर हो जाओ ! तुम स्थिर ही हो । तुममें गति है ही नहीं । तुम स्वयं पूर्ण हो ! पूर्ण रहो ! पूर्ण रहोगे ! 

सिद्धार्थ - जो दिखायी दे रहा है, वह क्या है ? यह दुःस्वप्न ही तो है । मुझे जो दर्शित हो रहा है, उसका परिचय ? 

तपस्विनी - दृश्य द्रष्टा से भिन्न नहीं है । अविद्या ने ही यह द्वैध उत्पन्न किया है । तुम असली स्वरूप में स्थित होकर दृश्य स्वरूप को समझ जाओगे ! तपो, तपो ! 

सिद्धार्थ - सही है, सही है ! तपना होगा ! तपना होगा !  अंधेरे को कोसने से प्रकाश की किरणें नहीं फूट जातीं । विषाद करने से वायु का रुख नहीं बदल जाता । इसी क्षण में जीना होगा, और इसी क्षण में इतनी परिपूर्णता से जीना होगा, जैसे कि दूसरा क्षण कभीं होगा ही नहीं । पूरा अस्तित्व इसी क्षण में ही मौजूद है । प्राण मेरे ! बैठो अपने पास ! 

(एक विशाल वट-वृक्ष के नीचे आसन लगाकर बैठ जाते हैं । घोर तपस्या करते हैं, अन्न-फलादि त्याग देते है । शरीर को सुखा रहे हैं ।)
जारी...

4 मार्च 2010

इस थकानमय निशि में प्रिय.. (गीतांजलि का भावानुवाद )

In the night of weariness let me give
myself up to sleep without struggle,
resting my trust upon thee.

Let me not force my flagging spirit into
a poor preparation for thy worship.

It is thou who drawest the veil of night
upon the tired eyes of the day to renew
its sight in a fresher gladness of awakening. 
--(R.N.Tagore : Geetanjali ) 


इस थकानमय निशि में प्रिय तव विश्वासी मन बन 
निद्रा की गोदी में करने दो निर्द्वंद्व शयन ।

बाध्य मुझे मत करने दो ये मंद प्राण खाली
दीन सजाने चलें तुम्हारी पूजन की थाली 
श्रमित उनींदे नयन करेंगे कैसे अलंकरण -
निद्रा की गोदी में करने दो निर्द्वंद्व शयन ।

थकित दिवस दृग पर रख पंकिल निशि अवगुण्ठन चीर
और कौन तुम ही तो हरते हो वासर की पीर 
नव स्फूर्जित दृग खोल देखता जो जागरण शयन-
निद्रा की गोदी में करने दो निर्द्वंद्व शयन ।
--('पंकिल' : मेरे बाबूजी)
 

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