26 सितम्बर 2010

अनुभूति..

ज देखा तुम्हें अन्तर के मधुरिल द्वीप पर !
निज रूपाकाश में मधुरिम प्रभात को पुष्पायित करती,
हरसिंगार के कुहसिल फूल-सी,
प्रणय-पर्व की मुग्ध कथा-सी बैठी थीं तुम !
अपने लुब्ध नयनों से ढाँक कर ताक रहा था तुम्हें !
औचक ही तुमने मुझे देख लिया ! अकारण ही सहसा आ गयी लाज तुम्हें !
वसन के समान ही छा गया रंग का आवरण !

यह आवरण किस लिए ?
विभोर मेरी वासना को थकने मत दो !
मेरी लालसा को भटकने दो तुम्हारे दृष्टि-निकुंज में !
तुम्हारी आँखों के उदार गगन का आश्रय चाहिए मेरे  वासना सघन नेत्रों को !


मैं कुछ पगला गया हूँ ! मत्त-सा !
खिंचता हूँ इधर-उधर सोच की तरह !
प्यास है अनोखी एक !
ज्योत्सना को शरीर में प्रवहित करने की सोचता हूँ,
अवश होना चाहता हूँ अपनी ही रागिनी छेड़,
निथरना चाहता हूँ सुख-सा दुख में,
झरना चाहता हूँ मोह-सा प्रेम में !

अपने हृदय कुसुम की सिहरती पंखुड़ी पर आ पड़ी ओस की बूँद-सा सिहराओ मुझे 
कि प्रेम का अनन्त आकाश उसमें अपना मुख निहारे
और निहाल हुआ जाय !
यह मत सोचना कि अवधि कितनी ?
उतनी ही जितनी पलको की हाँथों में थमे आँसू की उम्र !
पलकों की हाँथों से सरका कि उसमें झिलमिलाती आकृति क्षण भर में खोयी !

अनुभूति ने काम कर दिया अपना !

11 सितम्बर 2010

कौन-सी वह पीर है ?

विकल हूँ, पहचान लूँ मैं
कौन-सी वह पीर है !

अभीं आया नहीं होता वसन्त
तभीं उजाड़ क्यों हो जाती है वनस्थली,
क्यों हवा किसी नन्दन-वन का प्रिय-परिमल
बाँटती फिरती है गली-गली,
और
किसी सपनीली  रात में क्यों
कोयल चीख-चीख उठती है...सोती नहीं!

क्यों झूम-झूम उर्मिल पयोधि
चूमता है सदैव ही चन्द्र किरण
पर निज अंतराल-गत सलिल सम्पदा
लुटा देता है दिनमणि को,
और
क्यों दीप-लौ पर पतंग-बालिका
धोती है अपना कलेवर  !

वेदना कैसी कि विकल हो चकोर
चुँगता है पावक का अंगारा,
क्यों चन्द्र अहर्निश फिरता है,
अपलक निहारता ध्रुव तारा,
और
नित्य ही नीरव आकाश से
क्यों निशा सुन्दरी
अपनी आँखों के मोती ढरका देती है !

विकल हूँ, पहचान लूं मैं
कौन-सी वह पीर है ?
कि लघु पादप भी ललक
लहराता है नभ -चुम्बन हित,
और धरती भी स-यत्न
अपनी संपुटित सम्पदा
भाँति-भाँति खोती है !
 

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