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ग्रीष्म-1: ग्रीष्म-गरिमा-1

गर्मी की बरजोरी ने बहुतों का मन थोर कर दिया है, मेरा भी। वसंत का मगन मन अगन-तपन में सिहुर-सा गया है। कोकिल कूकने से ठहरी, भौरा गुंजरित होने ...

गर्मी की बरजोरी ने बहुतों का मन थोर कर दिया है, मेरा भी। वसंत का मगन मन अगन-तपन में सिहुर-सा गया है। कोकिल कूकने से ठहरी, भौरा गुंजरित होने से, फिर अपनी क्या मजाल कि इस बउराती लूह के सामने हम अपने दरबे में न दुबुक जाँय। उचक-उचक झरोखे से झाँकते हैं और अकुलाये मन को समझाते हैं कि घाम भी तो  काम का है। सुरजू को दोष काहें?…बात तो समझने की है…

घाम के मारे अति घबराय, फिरत मारे चहुँ जीवन काज

एक थल अपनी बैर बिहाय, नीर ढिंग पीवत मृग-मृगराज ॥

दरबे में हों तो विचारने का मौका मिलता है, झरोखे खुलते हैं और लगे-लगे हाथ कुछ सूत्र आते हैं…गर्मी की यह ’टोन’ कुछ समझाती-सी मालूम पड़ती है। सोचता हूँ गर्मी की यह प्रचंडता विरस करनी चाहे तो….गिरिजेश भईया हर बार की तरह फिर कोंचते हैं… मन कचकचाने-सा हो आता है जैसे…फिर याद-सा आता है, मन रसाभासी है, वसन्त रस का स्थायी अभ्यासी है।  ललचता हुआ मन है यह…गर्मी की तपन में अंगराग-चंदन मलते प्रिय के कर्म में दुबके हुए वसन्त-रस को पहचानता है यह। खस की टाँटी से छन कर मधुर हो गयी हवा में बहक कर आए हुए वसन्त रस की साध है इसे। गर्मी की तपन में स्वेद का शीतल स्वाद चखती देंह-युग्म की फिसलन के बीच रिसता हुआ वह वसन्त-रस अभीष्ट है इसका। मन बउराह है, ’आनन्दवर्द्धन’ के स्वर में पुकार उठा है… सचमुच यदि विरस न ही होना चाहो तो इतना करना कि अपने रस को सँभालना, च्युत न होने देना..स्थायी होने देना; बदल मत देना उसे किसी और रस से, ठहराना -

विरोधी वाऽविरोधी वा रसोऽगिंनि रसान्तरे ।

परिपोषं न नेतव्यः तेन स्याद् अविरोधिता ॥

कोंच-वान को धन्यवाद! कई बार ध्वनि की ओजस्विता चरित्र एवं कर्म की ओजस्विता को उकसाया करती है। सो ग्रीष्म की यह तपन, स्वेद-श्लथ बदन, रस-चन्दन (आनन्दवर्द्धन भी) और धकेलती कोंच- ये ईंधन पर्याप्त हैं अन्तर की आग को भड़काने के लिए। गर्मी बनी रही तो यह ग्रीष्म चर्चा होती रहेगी । फिलहाल ब्रजभाषा से निकली यह ’ग्रीष्म-गरिमा’ आपके सम्मुख है, कवि हैं अल्पज्ञात कवि ’सत्यनारायण’।

 

ग्रीष्म-गरिमा

कँपत चर-अचर सकल लखि याहि, प्रभो परताप ताप के धाम ।

सीत-मद-हरन सरन-प्रद पाहि, तिहारे चरन कमल परनाम ॥१॥

 

देखि तव दारुन दुपहर दर्स, छांह हू तकत छांह के हेत ।

हियन आकर्षत कित हू हर्ष, लता-बनिता-कबिता नहिं देत ॥२॥

 

पसीना पौंछत बारहिं बार, पसीजत तोऊ सारे अंग ।

कलित कुम्हिलात हियौ की हार, उड़त सब मुख मंडल कौ रंग ॥३॥

 

हरति तव ज्वाल रसा-रस आय, सरित सरवर सब सूखे जात ।

बात बस बारि बहत, भय पाय, मनहुँ तिन थर-थर काँपत गात ॥४॥

 

तपनिसों सुधिबुधि तजि कहुँ जाय, मोर जब पैठत पाँख पसारि ।

दुरत ता नीचे बिषधर आय, विकल प्रानननि कौ मोह बिसारि ॥५॥

 

घाम के मारे अति घबराय, फिरत मारे चहुँ जीवन काज ।

एक थल अपनी बैर बिहाय, नीर ढिंग पीवत मृग-मृगराज ॥६॥

 

लार टपकत जा की अकुलात, स्वान अति हाँफत जीभ निकारि ।

बिलाई कढ़ि समीप सों जात, तऊ नहिं बोलत ताहि निहारि ॥७॥

 

तरनि कौ तापत तरुन प्रताप, बिबस तरुनी गन तजि संकोच ।

निबारति बसन आपसों आप, नहिं कुछ अनघेरिन कौ सोच ॥८॥

 

उत सों इत, इतसों उत जात, निरखि निरसात सुहात न ठाम ।

कृपा तो चिपचिपात सब गात, न पावत छिनक कहुँ विस्राम ॥९॥


चूम मुख दिना गए द्वै-चार, प्यार करि पावति परम प्रमोद ।

मात सोइ तव बस सकल बिसार, उतारति निज बालक कों गोद ॥१०॥

 

राह चलिबौ नहिं तनिक सुहाय, मचकि मसका तब मारें देत ।

पथिक पंछी पादप तर धाय, लेत सीरक तब आवत चेत ॥११॥

 

तपत रवि सहस किरन बिकराल, चील्ह चींहरत गगन मड़राय ।

भभकि भुव उगिलत दावा ग्वाल, लूअ की लपट झकोरा खाय ॥१२॥


महिष सूकर गन तालन जाहिं, न्हात लोटत अति हिय हरसात ।

कीच सनि मुदित महामन माहिं, मनहुँ तन लगि चंदन सरसात ॥१३॥

 

----कवि सत्यनारायण

 

(शेष बचे छंद अगली प्रविष्टि में)  यह ग्रीष्म-चर्चा और भी  अगली कड़ियों में जारी रहेगी……

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