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Sarracenia    ©

Karen Hall

प्रणय-पीयूष-घट हूँ मैं।

आँख भर तड़ित-नर्तन देखता
मेघ-गर्जन कान भर सुनता हुआ 
पी प्रभूत प्रसून-परिमल 
ओस-सीकर चूमता निज अधर से  
जलधि लहरों में लहरता 
स्नेह-संबल अक्षय वट हूँ मैं।

देखता खिलखिल कुसुम तरु
सुरभि हाथों में समेटे उमग जाता 
पु्ष्प लतिका लिपट 
क्षण-क्षण प्रेम-पद गाता अपरिमित
सौन्दर्य-छवि जिसमें विहरती नित
वही सुरपति-शकट हूँ मैं। 

गगन होता जब तिमिर मय 
जग अखिल निस्तब्ध सोता 
सुन मधुर ध्वनि उस चरण की, सहज ही 
आभास होता उस प्रखर आलोक का 
सौन्दर्य-प्रतिमा पूजता निशि-दिन
सत्य-शिव-सुन्दर प्रकट हूँ मैं।

तृप्त मांसल रूप में भी 
भग्न लुंठित स्तूप में भी
धूप में भी चिलचिलाती
हूँ अनिवर्चनीय शीतल 
आर्तनाद करुण सुनता हूँ सदा पर
अट्टहास-प्रतिमा विकट हूँ मैं ।

जब  भुवन-भास्कर सिधारा
कौन खग-रव मिस पुकारा
नित्य रात-प्रभात में
पिक-कीर-चातक घर निहारा
कल्पना कल्लोलिनी का
उल्लसित रोमांच तट हूँ मैं।

प्रणय-पीयूष-घट हूँ मैं।

15 COMMENTS

  1. सत्य-शिव-सुन्दर प्रकट हूँ मैं।…..
    वास्तव में बहुत सुन्दर रचना,आभार।

  2. जलधि लहरों में लहरता
    स्नेह-संबल अक्षय वट हूँ मैं।…गायत्री गौर की कलाकृतियाँ एकाएक याद आ गईं !

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