Geetanjali: Rabindra Nath Tagore
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| A portrait by Samarjit Roy (Licensed Under: CC BY-NC-ND 2.5 IN) |
said, "We shall only take the smallest
room here."
They said, "We shall help you in the worship
of your God and humbly accept only our
share of his grace;" and then they took
their in a corner and they sat quiet and meek.
But in the darkness of night I find they break
into my sacred shrine, strong and turbulent
and snatch with unholy greed the
offerings from God's altar.
हिन्दी भावानुवाद: प्रेम नारायण पंकिल
अभीं था दिवस ममालय बीच उन्होंने आकर कहा समक्ष"यहाँ पर हमें चाहिए मात्र सदन का तेरे लघुतम कक्ष।"
कहा, "तव ईश अर्चना बीच करेंगे हम सहायता कार्य
अंश की अपने उसकी कृपा हमें होगी विनम्र स्वीकार्य"।
सदन के कोने में चुपचाप विनत वे बैठे आसन मार
खंड पर किया निशा तम बीच पूत मेरा अर्चन गृह द्वार।
अहा विप्लवकारी बलशील अपावन लोलुप ’पंकिल’ हाथ
बढ़ा छीनते वेदिका दान हाय मैं धुनता रहता माथ।

मैं क्या हूँ? क्या सुनहली उषा में जो खो गया, वह तुहिन बिन्दु या बीत गयी जो तपती दुपहरी उसी का विचलित पल; या फिर जो धुँधुरा गयी है शाम अभी-अभी उसी की उदास छाया? मैं क्या हूँ? जो सम्मुख हो रही है इस अन्तर-आँगन में वही ध्वनि, या किसी सुदूर बहने वाली किसी निर्झर-नदी का अस्पष्ट नाद? मैं क्या हूँ? बार-बार कानों में जाने अनजाने गूँज उठने वाली किसी दूरागत संगीत की मूर्छित लरी या फिर जिस आकाश को निरख रहा हूँ लगातार,उस आकाश का एक तारा?
मैं क्या हूँ? जानना इतना आसान भी तो नहीं!

2 comments:
बहुत ही सुन्दर अनुवाद
आभार!
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निकष रखने वाले हैं आप....सो छिद्रान्वेषण और छुद्र-आलोचना से परे जो कहेंगे सिर आँखों पर। आपकी दुलराती, सहलाती, फटकारती टिप्पणियाँ इस रचनाकार को आत्मस्थ करेंगी। अग्रिम आभार।