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जाग जाये यह मेरा देश (गीतांजलि का भावानुवाद)

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की विशिष्ट कृति गीतांजलि के प्रसिद्ध गीत ’Let My Country Awake' का हिन्दी भावानुवाद।

यह देश अपूर्व, अद्भुत क्षमताओं का आगार है। यहाँ जो है, कहीं नहीं है, किन्तु यहाँ जो होता दिख रहा है वह भी कहीं नहीं है। इस देश की अनिर्वच प्रज्ञा और अद्वितीय पौरुष को विस्मरण ने आकंठ आवृत कर लिया है। अपनी क्षमता को न पहचान सकने से हमारा विषद वैभव नीर कायरता की काई से ढंक गया है। अपने पौरुष का विस्मरण ही सम्राट को भिखारी बनाकर रख छोड़ा है। इसी उद्वेलन से भरा हुआ गुरुदेव रवीन्द्रनाथ का हृदय फूट पड़ा है। कहे तो किससे? जगन्नियंता से ही अपने हृदय की कसक निवेदित करता हुआ वह इसके भाग्य विधाता से पुनः इस देश को अपने विस्मृत गौरव को प्राप्त करने और अभय की पीठिका पर खड़ा कर देने की प्रार्थना कर रहा है। यह गीत संवेदनशील कवि के कलेजे की गहरी टीस है जो शाश्वत और सार्वभौम लग रही है। गुरुदेव की विशिष्ट कृति गीतांजलि के कई गीतों का भावानुवाद यहाँ क्रमशः प्रकाशित है। इसी क्रम में एक और गीत Let my country awake का हिन्दी भावानुवाद।

Geetanjali: Tagore

Where the mind is without fear and
the head is held high
Where knowledge is free
Where the world has not been
broken up into fragments
By narrow domestic walls
Where words come out from the depth of truth
Where tireless striving stretches
its arms towards perfection
Where the clear stream of reason
has not lost its way
Into the dreary desert sand of dead habit
Where the mind is led forward by thee
Into ever-widening thought and action
Into that heaven of freedom,
my Father, let my country awake.

हिन्दी भावानुवाद: पंकिल

जहाँ मन अभय समुन्नत भाल
नहीं हो जहाँ ज्ञान परतंत्र
जहाँ संकीर्ण स्वार्थ प्राचीर
से न हो खंडित वैश्विक तंत्र

जहाँ हों सदा वहिर्गत शब्द
सत्य की गहराई को चीर
अकथ श्रम जहाँ पूर्णता ओर
बढ़े फैलाये बाँह अधीर

जहाँ पर स्पष्ट प्रखर मति सरित
विसर्जित कर प्रवाह विस्तार
जीर्ण निष्प्राण रूढ़ि मरु बीच
न विस्मृत कर दे निज पथ द्वार

अग्रसारित तुमसे मस्तिष्क
जहाँ संतत विस्तृत गतिमान
विवेकी चिन्तन कर्मों बीच
अखंडित करे मनोहर स्नान

कर रहा यही विनय हे तात
प्रार्थना यह पंकिल प्राणेश
इसी स्वातंत्र्य स्वर्ग के बीच
जाग जाये यह मेरा देश॥

गीतांजलि के अन्य भावानुवाद

एक, दो, तीन, चार, पाँच, छः, सात, आठ, नौ, दस, ग्यारह, बारह, तेरह, चौदह, पन्द्रह, सोलह, सत्रह, अट्ठारह, उन्नीस, बीस, इक्कीस, बाइस, तेईस, चौबीस, पच्चीस, छब्बीस, सत्ताइस, अट्ठाईस, उन्तीस, तीस, इकतीस बत्तीस, तैतीस, चौतीस, पैंतीस
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जाग जाये यह मेरा देश (गीतांजलि का भावानुवाद)
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