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1.(राग केदार)
पकरि बस कीने री नँदलाल।
काजर दियौ खिलार राधिका, मुख सों मसलि गुलाल॥
चपल चलन कों अति ही अरबर, छूटि न सके प्रेम के जाल।
सूधे किए अंक ब्रजमोहन, आनँदघन रस-ख्याल॥

2.(राग सोरठ)
मनमोहन खेलत फाग री, हौं क्यों कर निकसौं।
मेर संग की सबै गईं, मोहि प्रगट भयौ अनुराग॥
एक रैन सपनौ भयौ री, नंदनँदन मिले आय।
मैं सकुचत घूँटत कढ़यौ, उन भेंटी भुज लपटाय॥
अपनौ रस मोकों दियौ री, मेरौ लीयौ घूँट।
बैरिन पलकैं उघरि तें, मेरी गई आस सब छूट॥
फिर मैं बहुतेरौ  कियौ री, नैक न लागी आँख।
पलद मूँदि परचौ लियौ, मैं जाम एक लौं राख॥
ता दिन द्वारैं ह्वै गयौ री, होरी-डाँड़ौ रोप।
सास-ननद देखन गईं, मोहिं घर-रखवारी सोंप॥
सास उसासन त्रासही री, ननद खरी अनखाय।
देबर डग धरिबौ गिनै, मेरौ बोलत नाह रिस्याय॥
तिखने चढ़ि ठाढ़ी रहौं री, लेवौं करौं कन हेर।
रात-दिवस हो-हो रहै, बिच वा मुरली की टेर॥
ऐसी मन में आवही री, छाँड़ि लाज-कुल-कान।
जाय मिलों ’ब्रज-ईस’ सों, रतिनायक रस की खान॥

3.(राग सारंग)
मोहन हो-हो, हो-हो होरी।
काल्ह हमारे आँगन गारी दै आयौ, सो को री॥
अब क्यों दुर बैठे जसुदा ढिंग, निकसो कुंजबिहारी।
उमँगि-उमँगि आई गोकुल की, वे सब भई धन बारी॥
तबहिं लला ललकारि निकारे, रूप सुधा की प्यासी।
लपट गईं घनस्याम लाल सों, चमकि-चमकि चपला सी॥
काजर दै भजि भार भरु वाके, हँसि-हँसि ब्रज की नारी।
कहै रसखान एक गारी पर, सौ आदर बलिहारी॥

4.(राग कान्हरौ)
मोसों होरी खेलन आयौ।
लटपटी पाग, अटपटे बैनन, नैनन बीच सुहायौ॥
डगर-डगर में, बगर-बगर में, सबहिंन के मन भायौ।
आनँदघन प्रभुकर दृग मींड़त, हँसि-हँसि कंठ लगायौ॥

5.(राग सारंग)
मोहन हो-हो, हो-हो होरी।
काल्ह हमारे आँगन गारी दै आयौ, सो को री ॥
अब क्यों दुर बैठे जसुदा ढिंग, निकसो कुंजबिहारी।
उमँगि-उमँगि आई गोकुल की , वे सब भई घन बारी॥
तबहिं लला ललकारि निकारे, रूफ सुधा की प्यासी।
लपट गईं घनस्याम लाल सों, चमकि-चमकि चपला सी॥
काजर दै भजि भार भरु वाके, हँसि-हँसि ब्रज की नारी।
कहै रसखान एक गारी पर, सौ आदर बलिहारी॥

6.(राग सारंग)
अहो पिय! मोसों ही खेलो, हौं खेलौं तुम संग।
जो कोऊ और खेलि है तुम सों, कर हौं तामैं भंग॥
हौ ही आँजौ तुम्हारे नयना, जानै न और गँवारि।
तुम मेरे मुख मृगमद माँढ़ो, हौं भेंटौ अँकवारि॥
तुम डफ लेहु आपुने ही कर, हौं गाउँगी गारि।
कुमकुम रंग जो छिरको भरि-भरि रत्नजटित पिचकारि॥
तुम सों कहें लेत फगुवा मैं, हौं आलिंगन लेहौं।
ब्रजपति आज आन बनिता कौ, लागन लाग न देहौं॥

7.(ठुमरी)
उड़ि जा पंछी, खबर ला पी की।
जाय बिदेस मिलो पीतम सें, कहो बिथा बिरहिन के जी की॥
सौने की चोंच मढ़ाऊँ मैं पंछी, जो तुम बात करो मेरे ही की।
माधवी लाओ पिय को सँदेसवा, जरनि बुझाओ बियोगिन ती की॥

8.
फूलि रही सरसों चहुँ ओर, जो सौने के बेस बिछायत साँचैं।
चीत सजे नर-नारिन पीत, बढ़ी रस-रीति, बरंगना नाँचैं॥
त्यों कवि ग्वाल रसाल के बौरन, झोंरन-झोंरन ऊधम माँचैं।
काम गुरु भयौ, फाग सुरू भयौ, खेलिए आजु बसंत की पाँचैं॥

9.
फागुन लाग्यौ सखी जब तें, तब तें ब्रजमंडल धूम मच्यौ है।
नारि नवेली बचै नहीं एक, बिसेष इहैं सबै प्रेम अँच्यौ है॥
साँझ सकारे कही रसखान सुरंग गुलाल लै खेल रच्यौ है।
को सजनी निलजी न भई, अरु कौन भटू जिहिं मान बच्यौ है।

क्रमशः–

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