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Saundarya_Lahari

स्वदेहोद्भूताभिर्घृणिभिरणिमाद्याभिरभितो,
निषेवे नित्ये त्वामहमिति सदा भावयति यः।
किमाश्चर्यं तस्य त्रिनयनसमृद्धिं तृणयतो,
महासंवर्ताग्निविरचयति नीराजनविधिं ॥95॥
स्वशरीरोद्भूत किरणसमूह
अणिमादिक सुसेवित
जो स्वरूप त्वदीय नित
करता निषेवित
अहं भावित
कौन सा आश्चर्य
शंभुसमृद्धि वह
साधकशिरोमणि
तृणसदृश गिनता
प्रलय का प्रज्ज्वलित
पावक दहन भी
अभय नीराजन बना लेता
स्वरूपविलासिनी हे!

समुद्भूतस्थूलस्तन भरमुरश्चारुहसितं
कटाक्षे कन्दर्पाः कतिचन कदम्बद्युति वपुः।
हरस्य त्वद्भ्रांतिं मनसि जनयन्ती सुवदने
भवत्यां ये भक्ताः परिणतिरमीषामियमुमे॥96॥
वक्ष भर जाता पयोधरपीन से
मुख पर उभरता
मधुर हास
कटाक्ष में
कंदर्प जाते अमित भर हैं
पुलकपूर कदम्बद्युति वपु
भक्त में सारूप्य भरती
तुम स्वकीय ललाम छवि से
जो बनाती हैं स्ववल्लभ
चन्द्रशेखर शंभु मन भी भ्रान्त
कायाकल्पनी हे!

कलत्रं वैधात्रं कतिकति भजन्ते न कवयः
श्रियो देव्याः को वा न भवति पतिः कैरपि धनैः।
महादेवं हित्वा तव सति सतीना-मचरमे
कुचभ्या-मासङ्गः कुरवक-तरो-रप्यसुलभः॥97॥
कौन कौन न कवि
कलत्र विरंचिवामा को बनाते
कौन कौन धनाढ्य वैभवशील
लक्ष्मीपति न होता
पावनी
तुम श्रेष्ठ
सर्वसतीगणों में अग्रगण्या
छोड़ कर शिव को
अलभ्य अतीव
कुरवक विटप को भी
स्पर्श कर लेना
तुम्हारा उरज
सतीशिरोमणि हे!

गिरामाहुर्देवीं द्रुहिणगृहिणीमागमविदो
हरेः पत्नीं पद्मां हरसहचरीमद्रितनयाम् ।
तुरीया कापि त्वं दुरधिगमनिस्सीममहिमा
महामाया विश्वं भ्रमयसि परब्रह्ममहिषि ॥98॥
तुम्हें आगमविज्ञ
ब्रह्मा की प्रिया
कहते गिरा हैं
विष्णुगृहिणी रमा
शंकरसहचरी
गिरिसुता कहते
किन्तु तुम कोई तुरीया
वेद संस्तुतिता
न ज्ञेया
अगम महिमामयी
सारी श्रृष्टि को
करती भ्रमित हो
हे महामाये अगम्ये
परब्रह्मसुपट्टमहिषी!

कदा काले मातः कथय कलितालक्तकरसं
पिबेयं विद्यार्थी तव चरणनिर्णेजनजलम् ।
प्रकृत्या मूकानामपि च कविताकारणतया
कदा धत्ते वाणीमुखकमलताम्बूलरसताम् ॥99॥
अम्ब हम विद्यार्थीगण
कब अलक्तकरागरंजित
रुचिर तेरे कंजपद का
दिव्य चरणोदक पियेंगे
प्रकृत्या जो मूक
उनको भी कवित्व प्रदान करता
पान कर जिसको गिरा
करती सुधारित मुखकमल की
अति रुचिर ताम्बूलरसता
गुणरसामृत चरणकमले!

सरस्वत्या लक्ष्म्या विधि हरि सपत्नो विहरते
रतेः पतिव्रत्यं शिथिलपति रम्येण वपुषा ।
चिरं जीवन्नेव क्षपित-पशुपाश-व्यतिकरः
परानन्दाभिख्यं रसयति रसं त्वद्भजनवान् ॥100॥
हे भगवती
भक्त तेरा
हो गिरापति
रमापति हो
विधि मुकुन्द सपत्न सदृश
विहार करता है
दयामयि
रम्यवपु से
कामकामिनि
रतिपतिव्रत शिथिल करता
मुक्त हो पशुपाश से
परब्रह्म में रमण करता
चिरंजीवी भक्त तेरा
हे परब्रह्माभिधेया!

निधे नित्यस्मेरे निरवधिगुणे नीतिनिपुणे 
निराघातज्ञाने नियमपरचित्तैकनिलये । 
नियत्या निर्मुक्ते निखिलनिगमान्तस्तुतिपदे 
निरातङ्के नित्ये निगमय ममापि स्तुतिमिमाम्॥101॥
हे निधे
नित्यस्मिते हे
हे असीम गुणान्विते हे
सर्वनीतिविधा प्रवीणे
हे अवाधितज्ञानशीले
हे नियमपरिचितहृदयलीने
नियति निर्मुक्तजा हे
हे निखिल निगमादिसंस्तुत
युगल संपूजित चरण हे
निर्भये हे
अहो नित्ये
कर्ण कुहरों बीच
मेरा स्तुति वचन भी
करो धारण
जननि
सर्वगुणागरी हे!

प्रदीप ज्वालाभि-र्दिवसकर-नीराजनविधिः
सुधासूते-श्चन्द्रोपल-जललवै-रघ्यरचना ।
स्वकीयैरम्भोभिः सलिल-निधि-सौहित्यकरणं
त्वदीयाभि-र्वाग्भि-स्तव जननि वाचां स्तुतिरियम् ॥102॥
यह वचन स्तुति अम्ब
तेरी ही गिरा में तुम्हें अर्पित
है तथा विध
यथा नीराजनसमर्पित
दिवसमणि को
प्रज्ज्वलित दीपक लिए
या चन्द्रमणि से स्रवित जल ले
अर्घ्यरचना कर सुपूजा
की गयी रजनीश की हो
या पयोनिधि सलिल से ही
अर्चना हो नीरनिधि की
स्तुतिगिरा सारी हमारी
है तुम्हारी बैखरी ही
वस्तु तेरी तुम्हीं को अर्पित
करो स्वीकार हे माँ!

—-सम्पूर्ण—-

2 COMMENTS

  1. स्तुतिगिरा सारी हमारी
    है तुम्हारी बैखरी ही
    वस्तु तेरी तुम्हीं को अर्पित
    करो स्वीकार हे माँ!"
    ……
    भवानी की स्तुति में पता नहीं क्यों रोंआ-रोंआ गनगना उठता है….तन पुलकित मुख बचन न आवा….

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