SHARE

नखैर्नाकस्त्रीणां करकमलसङ्कोचशशिभिः
तरूणां दिव्यानां हसत इव ते चण्डि चरणौ।
फलानि स्वःस्थेभ्यः किसलय-कराग्रेण ददतां
दरिद्रेभ्यो भद्रां श्रियमनिशमह्नाय ददतौ ॥88॥
पद तुम्हारे
निज सुधाकर नख अवलि से
स्वर्गललना के सरोरुह पाणितल को
संकुचित देते बना हैं
चण्डि!
तेरे चरणद्वय
देवेन्द्रवन स्थित कल्पतरु का
भी सदा उपहास करते हैं
बिचारा कल्पतरु तो
पाणि किसलय से
उन्हीं को फलप्रदाता
स्वर्गस्थित जो,
किन्तु तेरे चरण
सर्व दरिद्रजन को ही निरंतर
बाँटते फिरते अमित धन-
नित चरणधनवर्षिणी हे!

ददाने दीनेभ्यः श्रियमनिशमाशानुसदृशी-
ममन्दं सौन्दर्यं प्रकरमकरन्दं विकिरति।
तवास्मिन् मन्दारस्तबकसुभगे यातु चरणे
निमज्जन् मज्जीवः करणचरणःष्ट्चरणताम् ॥89॥
क्षीनजन को बाँटते श्री
नित्य जो आशानुरूपी
जो अमंद
सुरूप छवि मकरंद नित
करते प्रवाहित
उन्हीं तव
मंदारपुष्पसुगुच्छ-सम
रमणीय पद में
जीव मेरा
षडेन्द्रिय पदधर भ्रमर सम
नित निमज्जन करे
हे सौभाग्यसुखसर्जक पदाब्जे!

पदन्यासक्रीडा परिचयमिवारब्धुमनसः
स्खलन्तस्ते खेलं भवनकलहंसा न जहति।
अतस्तेषां शिक्षां सुभगमणिमञ्जीररणित-
च्छलादाचक्षाणं चरणकमलं चारुचरिते ॥90॥
भवन में
कल राजहंस
समीप तेरे खेलते हैं
वे तुम्हारे चरणन्यास
सुकेलि अति लीला ललित का
प्राप्त करना चाहते परिचय
निपुण अभ्यासमन से
सुभग मणिझंकार से
पार्श्वस्थ राजमराल गण को
तुम किया करती सुशिक्षित
चरणपंकजचारुचरिते!

गतास्ते मञ्चत्वं द्रुहिणहरिरुद्रेश्वरभृतः
शिवः स्वच्छच्छायाघटितकपटप्रच्छदपटः।
त्वदीयानां भासां प्रतिफलन रागारुणतया
शरीरी शृङ्गारो रस इव दृशां दोग्धि कुतुकम् ॥91॥
मंचपद तेरे
विधाता हरि महेश्वर देवता त्रय
स्वच्छ छाया से स्वकीया घटित होकर
चन्द्रशेखर
लग रहें ज्यों धवल प्रच्छदपट
तुम्हारी विमल चादर
अंग की आभा अरुण तेरी
हुयी उनमें स्फुटित है
प्रेम रस परिपूर्ण
ज्यों स-तन श्रृंगाररस ही
हुआ प्रतिबिम्बित वहाँ
दृगहर
सुभगश्रृंगारिणी हे!

अराला केशेषु प्रकृति सरला मन्दहसिते
शिरीषाभा चित्ते दृषदुपलशोभा कुचतटे।
भृशं तन्वी मध्ये पृथुरुरसिजारोहविषये
जगत्त्रातुं शम्भोर्जयति करुणा काचिदरुणा ॥92॥
अलक से कुटिला
प्रकृत्या मंदस्मिति से
सहज सरला
अंग में
लावण्यभरिता
अमित सुमन शिरीष मृदुता
शैल सदृश कठोरता कुच बीच
कटि में क्षीणता अति
जघन में पृथुता वरोरुह
प्रथित कोई एक अरुणा
शंभु की करुणा विजयिनी
करे जग का त्राण
जग कल्याण
अरुणा भगवती हे!

कलङ्कः कस्तूरी रजनिकर बिम्बं जलमयं
कलाभिः कर्पूरै-र्मरकतकरण्डं निबिडितम्।
अतस्त्वद्भोगेन प्रतिदिनमिदं रिक्तकुहरं
विधि-र्भूयो भूयो निबिडयति नूनं तव कृते ॥93॥
चन्द्रविम्ब
सुगंध मरकतमणि विनिर्मित
पात्र जलमय
मृगमदांक जहाँ कलंक
कपूर विधु षोडस कलायें
ह्रासतागत जान
तेरे भोग से
शशि कृष्णपक्षक
शुक्ल में पूर्णत्व से
भरते उस विधि
भूरिभोगे!

पुरारातेरन्तःपुरमसि ततस्त्वच्चरणयोः
सपर्यामर्यादा तरलकरणानामसुलभा।
तथा ह्येते नीताः शतमखमुखाः सिद्धिमतुलां
तव द्वारोपान्तस्थितिभिरणिमाद्याभिरमराः ॥94॥
पट्टमहिषी शंभु की
तुम शंभु अंतःपुरनिवासिनि
सपर्यामर्याद
हो दुष्प्राप्य अजितेन्द्रिय जनों को
किन्तु द्वारोपान्त ही
तेरे सुलभ अणमादि की स्थिति
अतः पा जाते वही हैं
देव देवेन्द्रादि सत्वर
अतुल सिद्धि विभव
परमशिवसंगिनी सिद्धिप्रदा हे!

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here