Tuesday, February 21, 2017
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Articles written in Hindi and English. These are on various subjects and written on different occasions. These are in form of criticism, reviews and general observations.

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मुक्तिबोध की हर कविता एक आईना है ..

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आज ’मुक्तिबोध’ का जन्मदिवस है, एक अप्रतिम सर्जक का जन्मदिवस । याद करने की बहुत-सी जरूरतें हैं इस कवि को । मुक्तिबोध प्रश्नों की धुंध में छिपे उत्तरों की तलाश करते हैं-चोट पर चोट खाकर, आघात पर आघात सहकर । जो उपलब्ध होता है वह है उद्घाटित अन्तर्निहित सत्य । आदमी और आदमी के मन से जुड़ता है इस कवि का संबंध – इतनी गहराई से कि संबंधों की परिभाषा से इतर होता है एक नवीन संबंध का सृजन । चिन्तन और अभिव्यक्ति में एक-सी छटपटाहट, एक-सा आक्रोश, एक-सा संवेदन । मुक्तिबोध को स्मरण करते हुए ’अमृता भारती” के आलेख ’मुक्तिबोध् : सत्-चित्-वेदना-स्मृति’ से एक महत्वपूर्ण अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ —

“मुक्तिबोध की हर कविता एक आईना है – गोल, तिरछा, चौकोर, लम्बा आईना । उसमें चेहरा या चेहरे देखे जा सकते हैं  । कुछ लोग इन आईनों में अपनी सूरत देखने से घबरायेंगे और कुछ अपनी निरीह-प्यारी गऊ-सूरत को देखकर आत्मदर्शन के सुख क अनुभव करेंगे । मुक्तिबोध ने आरोप, आक्षेप के लिये या भय का सृजन करने के लिये कविता नहीं लिखी – फिर भी समय की विद्रूपता ने चित्रों का आकार ग्रहण किया है – आईनों का । ’अंधेरे में’ कविता इस संग्रह का सबसे बड़ा और भयजन्य आईना है …

….लौटते हुए खिड़की पर कुहरा नहीं होता था – न डिब्बे में एकान्त – बस पटरियाँ बजती रहतीं थीं और यात्रियों की आवाजें – इन सबके बीच मुक्तिबोध की कविता चलती रहती थी-कहीं कोई नहीं टोकता था-कहीं कोई नहीं रोकता था – बस, कविता चलती रहती थी – अविराम ….।”

चित्र : छाया से साभार 

के० शिवराम कारंत : ’मूकज्जी’ का मुखर सर्जक

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           ’के० शिवराम कारंत’ – भारतीय भाषा साहित्य का एक उल्लेखनीय नाम, कन्नड़ साहित्य की समर्थ साहित्यिक विभूति, बहुआयामी रचना-कर्म के उदाहरण-पुरुष !  सर्जना में सत्य और सौन्दर्य के प्रबल जिज्ञासु कारंत जीवन को सम्पूर्णता और यथार्थता में निरखने की निरंतर चेष्टा अपने कर्म में करते रहे, और इसीलिये ज्ञान के बहुविध क्षेत्रों में उनका प्रवेश होता रहा, कला के अनेक आयाम उन्होंने छुए । अपने प्रिय पाठकों की दृष्टि में एक स्वाधीन, निर्भय और निष्कपट व्यक्तित्व का नाम है के० शिवराम कारंत । साहित्य की अनेकों विधाओं में उनका समर्थ लेखन उन्हें एक विराट सर्जक की प्रतिष्ठा देता है । उत्कृष्ट उपन्यासकार, कुशल नाटककार, अन्यतम शोधकर्ता व आलोचक, प्रशंसित शब्दकोशकार व विश्वकोशकार, बहुचर्चित आत्मकथा लेखक व महनीय सम्पादक के रूप में डॉ० के० शिवराम कारंत कन्नड़ साहित्य को सार्वत्रिक प्रतिष्ठा प्रदान करते हैं ।
K. Shivaram karanth/के० शिवराम कारंतजन्म: १० अक्टूबर, १९०२, कोटा, कर्नाटक; मातृभाषा: कन्नड़; व्यवसाय: स्वतंत्र लेखन; पुरस्कार / सम्मान: डी०लिट० (मानद, कर्नाटक वि०वि०, मैसूर वि०वि०, मेरठ वि०वि०), पद्म भूषण (आपातकाल में लौटा दिया), साहित्य अकादमी पुरस्कार-१९५९, भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार-१९७७ एवं अन्य कई पुरस्कार/सम्मान; प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ: नाटक-गर्भगुडि, एकांत नाटकगलु, मुक्तद्वार, गीतानाटकगलु,विजय, बित्तिद बेले, मंगलारति, उपन्यास: चोमन दुड़ि, मरलि मण्णिगे, बेट्टद जीव, मुगिद युद्ध, कुडियर कुसु, चिगुरिद कनसु, बत्तद तोरे, समीक्षे, अलिद मेले, ओंटि दानि, मूकज्जिय कनसुगलु (ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त), केवल मनुष्यरु, मूजन्म, इळ्येम्ब, कन्निडु कणारू, कहानी-संग्रह – हसिवु, हावु, निबंध – ज्ञान, चिक्कदोड्डवरू, हल्लिय हत्तु समस्तरु, कला-विषयक – भारतीय चित्रकले, यक्षगान बयलाटा (साहित्य अकादेमी), चालुक्य वास्तुशिल्प, कला-प्रपंच, यक्षगान, भारतीय शिल्प, आत्मकथा – हुच्चु मनस्सिन हत्तु मुखगलु, विश्वकोश-शब्दकोश,विज्ञान विषयक – बाल प्रपंच, विज्ञान प्रपंच(चार खंड) विचित्र खगोल, हक्किगलु, अन्य- जीवन रहस्य, जानपद गीते, विचार साहित्य निर्माण, बिडि बरहगलु  ।
           लेखन कारंत जी के लिये अपने अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करना है । समग्र जीवन-दृष्टि के धनी कारंत वर्तमान को विगत के स्वीकार के साथ जीना चाहते हैं । पुरानी परिपाटी से उदाहरण लेना और फिर उसे वर्तमान जीवन की कसौटी पर कसना, प्रचलित मान्यताओं को ज्यों का त्यों न स्वीकारना बल्कि सातत्य में उनकी प्रासंगिकता का पुनरीक्षण करना आदि कारंत जी के व्यक्तित्व व उनकी सर्जना की अन्यतम विशेषताएं हैं, और इसीलिए वे विद्रोही हैं । विद्रोही हैं तो साहसी भी हैं – चौंतीस वर्ष की उम्र में तीन खण्डों के बाल-विश्वकोश का सम्पादन, उनतालीस वर्ष की उम्र में एक लघु शब्दकोश का निर्माण, सत्तावन वर्ष की उम्र में विज्ञान आधारित चार खण्डों का विश्वकोश विज्ञान प्रपंच का प्रणयन, तीन खण्डों की कृति ’भारतीय कला और मूर्तिकला’ की रचना आदि ।
           ’डॉ० कारंत’ की प्रत्येक रचना अन्याय के विरुद्ध आग्रह रखने का भाव अपने अन्तर में सँजोये प्रस्तुत होती है । न्याय और एकाधिकार की न्यून उपस्थिति भी उनका अन्तर भड़का देती है । वस्तुतः डॉ० कारंत की सम्पूर्ण रचना-गतिविधियों का केन्द्र मनुष्य और उसका समग्र व्यक्तित्व है और इसीलिये वे एक परिबुद्ध मानवतावादी के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं ।
          मानव की सम्पूर्ण अनुभूति को अभिव्यक्त करती लेखनी यह उदघोषित करती है कि साहित्य कुछ और नहीं वस्तुतः इस जीवन का ही प्रतिफल है । ’डॉ० रणवीर रांग्रा’ से बातचीत करते हुए ’डॉ० कारंत’ ने कहा है –
“अपने आसपास के प्राणियों के प्रति संवेदनशील रहते हुए ही जीवन जीना चाहिये । यदि मैं अपने पर्यावरण के प्रति उदासीन रहता हूँ तो मेरा जीना रुक जाता है । जब भी मैं अतीत को मुड़ कर देखता हूँ, कृतज्ञता की भावना से अभिभूत हो उठता हूँ । मैं अपने लोगों का ऋणी हूँ – उनका भी जो जीवित हैं और जो बीत गये हैं उनका भी । मैं सम्पूर्ण सृष्टि का ऋणी हूँ जो मेरे, मेरे समकालीनों और मेरे पूर्वजों सरीखे मनुष्यों का भार वहन कर रही है । यदि हमारे पूर्वजों ने हमें अपना चिन्तन, ज्ञान और अनुभव न दिया होता तो हम अपनी संस्कृति के बहुत बड़े दाय से वंचित रह जाते । मुझ पर इतने लोगों का ऋण है कि मुझे लेखन के माध्यम से अपने अस्तित्व का औचित्य सिद्ध कर अपना कर्त्तव्य पूरा करना चाहिये – मेरा वह लेखन वर्त्तमान और विगत तथा दूर और निकट के जीवन के प्रति योगदान के रूप में चाहे कितना ही अकिंचन क्यों न हो !” 
-(भारतीय साहित्यकारों से साक्षात्कार )

स्वयं लेखक के शब्दों में उनकी पुस्तकों पर एक दृष्टि –

K. Shivaram Karant Pagale man ke das chehare “मैं अपने मन को पागल क्यों कहता हूँ ? इसका कारण यह नहीं है कि यह पागलपन नहीं चाहता बल्कि उसे मैं पसन्द करता हूँ। ऐसे पागलपन के कारण अनेक ऐसे साहस करके जिन्हें करना नहीं चाहिए, मुझे अपनी और दुनिया का पागलपन समझ में आया है।….. विष्णु के यदि दस अवतार हैं तो मेरे ध्येय ने सोलह अवतार लिये। देशप्रेम, स्वदेशी प्रचार, व्यापार, पत्रकारिता अध्यात्म साधना, कला के विभिन्न रूप फोटोग्राफी, नाटक, नृत्य, चित्रकला, वास्तुकला, संगीत सिनेमा-इतना ही नहीं समाज- सुधार, ग्रामोद्धार, शिक्षा के नये नये प्रयोग, उद्योग यह सब मेरे कार्य क्षेत्र रहे। और भी नये-नये प्रयोग चल ही रहे हैं। …… केवल अपनी खिड़की से बाहर झाँकनेवालों को भले ही इन सब परिवर्तनों में कोई परस्पर- सम्बन्ध न दीखे पर वास्तविकता ऐसी नहीं है। इस यात्रा में कोई और व्यक्ति यदि मेरे साथ होता तो उसे पता चलता कि यह सब यात्रा के अलग-अलग पड़ाव हैं।……”
K. Shivaram Karant mookajji “मेरी पुस्तक ’मूकज्जी’ में यौन के मानवीय, अतीन्द्रिय व अन्य विविध पक्षों की चर्चा है, जो हमारे अतीत इतिहास में विकसित होते रहे गुहा-मानव से प्रारंभ होकर वर्तमान युग तक के लम्बे इतिहास-काल को समेटती है । यहाँ चर्चा है यौन की सर्जक शक्ति की, यौन के धार्मिक प्रतीक के रूप की, वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में यौन-स्थिति की । इन सबका तर्क-संगत पद्धति से विवरण है – यौन, एक सर्जक-शक्ति; यौन, एक धार्मिक प्रतीक; यौन, देवी-देवता के रूप में; यौन पौराणिक गाथाओं में; यौन वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में आदि ।”

याद कर रहा हूँ तुम्हें, सँजो कर अपना एकान्त …

उन दिनों जब दीवालों के आर-पार देख सकता था मैं अपनी सपनीली आँखों से, जब पौधों की काँपती अँगुलियाँ मेरी आत्मा को सहला जाती थीं, जब कुहासे की टटकी बूँदे बरस कर भिंगो देती थीं मन-वसन, जब पारिजात-वन का तारक-पुष्प झर-झर झरता था मेरी चेतना के आँगन – तब भी तुम अथाह की थाह लेती हुई न जाने किधर अविरत देखती रहती थीं ! तुम्हारा इस तरह निर्निमेष शून्य की ओर देखना मेरे प्राणॊं में औत्सुक्य भरता था । मैं सब कुछ तजकर तुम्हारी उन्हीं आँखों की राह पर बिछ-बिछ जाना चाहता था, और इच्छा करता था कि तुम्हारी अन्तर्यामिनी आँखें, तुम्हारी पारदर्शिनी आँखें मेरे अन्तर के हर भेद को पकड़ लें, उन्हें खोल दें ।
आज मैं अकेला हूँ । मैंने अपना यह एकान्त सँजो कर रखा था तुम्हें याद करने के निमित्त । आज जब मैं अपने मानस, अपनी चेतना के अत्यन्त एकान्त में तुम्हें स्मरण कर रहा हूँ, तो लगने लगा है कि तुम्हारी प्रेमपूर्ण, सजल आँखें मुझे देख रहीं हैं । मुझे लग रहा है कि वह आँखें मुझे आत्मसात कर लेंगी । और अचानक ही मैं संतप्त हो उठा हूँ । मुझे सम्हालों मेरे सुहृद ! यह ’मेरे” कहना तुम्हें बुरा तो नहीं लगा ! यह एकाधिकार कसक तो नहीं गया कहीं उर-अंतर ! पर मैं क्या करूँ ? जब मेरी सिहरन अनुभूति के द्रुत-गति तान लेती थी, जब अन्तर का प्यासा-पपीहा पुकार उठता था करुण-भाव, जब एक अन्तहीन-से लगने वाले विरह से कँप-कँप जाता था यह उदास मन,  तब वृक्षों, वनस्पतियों, फूल-पत्तों, सागर-पर्वतों, दिग-दिगन्तों को साक्षी मान मैं तुम्हें सिर्फ अपना ही जान पुकारता था । मैं और मेरा यह भावित हृदय तुम्हें विश्वास दिलाना चाहता है कि मेरा यह प्रेम किसी भाव-विभाव से अनुप्राणित नहीं, निःसीम है यह ।
मैं तुम्हें स्मरण कर रहा हूँ । उच्छ्वास की हवा बार-बार सिहरा रही है मुझे । कितनी करुणा है इसमें ? इस गीली, उदास हवा को तुम तक पठा दूँ ? समझ जाना इस संतप्त, व्यथित हवा की छुअन से कि तुम्हारा विरह मेरे प्राणों की कँपकँपी बन गया है । मेरी प्रेमातिरेकी भावना की गंध और हृदयावस्थित प्रेम की स्मृतियाँ सँजोकर यह हवा तुम तक जायेगी, तो विचार करना कि तुम कितने अभिन्न हो मेरे !
यद्यपि तुम सीमाहीन हो, निःसीम – पर क्या तुम्हें मेरा आत्मनिवेदन स्मरण है ? क्या वह आत्मनिवेदन भाव की सीमाओं में बँधा था ? नहीं न ! असीम ही था न  ! फिर निःसीम को निःसीम के आत्मनिवेदन के चिन्तन का कैसा भाव ! पर इसी निःसीमता में एक असीम व्याकुल भाव है जो सर्वत्र उपस्थित है, सर्वत्र विचरण करता हुआ – सबके प्राणों में ठहरा हुआ – प्रेम ।
आज मैं अकेला हूँ । अपने सँजोये एकान्त में तुम्हारा स्मरण कर रहा हूँ, तुम्हें पुकार रहा हूँ । क्या तुम आओगे ? अपना अस्तित्व सजा कर खड़ा हो जाउँगा मैं तुम्हारे स्वागत में । मेरे चटक अनुराग का पुष्प और उर-कोकिल की रागिनियाँ तुम्हारा मंगल-स्वागत करेंगी । अर्पित तो न कर सकूँगा कुछ, बस रख दूँगा तुम्हारे पास- आकाश, सूरज, धरती, गंध और प्रवाह ।

जितनी मेरी बिसात है काम आ रहा हूँ मैं ….

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क्या कहेंगे आप इसे ? संघर्ष ? समर्पण ? निष्ठा ? जिजीविषा ? आसक्ति ? या एक धुन ? मैं निर्णय नहीं कर पा रहा । चित्र तो देख रहे होंगे आप। उसमें रात है, अंधेरा भी । उस अंधेरे में कोई है । कुछ कर रहा है शायद । शायद क्यों ? पक्का पता है मुझे – लिख रहे हैं । अंधेरे में ? नहीं, नहीं ! रोशनी भी है – मोबाइल की । अनुमान हो सके तो देखें, हेमन्त है । अंधेरे में मोबाइल की रोशनी में एक छोटे से पैड पर अपनी कलम से सुबह की प्रविष्टि लिख रहे हैं । कुल जमा डेढ़-दो महीने के इस ब्लॉगर को यह क्या सूझा ?

कल अचानक ही हेमन्त से बात के दौरान मैंने जाना – बहक कर कह दिया उन्होंने – कि रात के गहराने के साथ लेटे-लेटे अंधेरे में (बिजली तो रहती नहीं कभी रात को, वैकल्पिक साधन भी सायास बन्द कर दिये जाते हैं ) जब हेमन्त की सोचने की गति तीव्र हो जाती है, और अभिव्यक्त होकर बाहर आना चाहती है वही सोच, तब और कुछ नहीं सूझता । एक मोबाइल है टॉर्च वाली (रोशनी कितनी होगी ? अनुमान कर लीजिये ) । हेमन्त टॉर्च की रोशनी में कागज पर कलम से जो लिख रहे होते हैं बहुधा वही उनके चिट्ठों की सुबह की प्रविष्टि बनती है ।

मैं हतप्रभ हो गया सुनकर । हँसी भी आ गयी । खुद पर । बिजली नहीं है, व्यस्तता बहुत है, कुछ दिमाग बन नहीं रहा – ऐसे न जाने कितने बहाने मैंने अपनी झोली में रखे हैं ; कई बार मेरा चिट्ठा हफ्तों अपडेट नहीं होता । पर इन्हें देखिये, दिन भर की गहरी व्यस्तता, घर की जिम्मेदारियों के अकेले खेवनहार लिखे जा रहे हैं –  दिन में व्यस्त हैं, तो रात को; बिजली नहीं है तो मोबाइल की रोशनी में । आप इनका चिट्ठा देखें – लगभग रोज अपडेट होता हुआ । आप वहाँ तलाशना मत साहित्य के श्रेष्ठतम मानक और यह भी मत कहना (प्लीज !) कि जो छपा है, वह उल्लेखनीय़ कितना है ! आप तो बस हौसला देना – “मंजिल न दे, चिराग न दे, हौसला तो दे …”

ज्यादा क्या कहूँ, हेमन्त की संवेदना से जुड़ता इतना ही कह रहा हूँ –

“मैं राह का चिराग हूँ, सूरज नहीं हूँ मैं
जितनी मेरी बिसात है काम आ रहा हूँ मैं ”

पाद-टिप्पणी :  और हाँ, भाभी जी (हेमन्त की पत्नी ) ने मेरी बार-बार की याचना स्वीकार ली थी और ऊपर लगा हुआ चित्र उन्होंने ही रात को (कितने बजे ? पता नहीं ) अपनी मोबाइल से सप्रयत्न खींच कर मुझे उपलब्ध कराया । इसमें काफी प्रयत्न है उनका ( फोटो मोबाइल से ली गयी है) । आभार उनका ।

समय और शब्द के कवि सीताकान्त महापात्र

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sitakant mahapatra यथार्थ और अनुभूति के विरल सम्मिश्रण से निर्मित कविता के कवि डॉ० सीताकांत महापात्र का जन्मदिवस है आज  । हिन्दी जगत में भली भाँति परिचित अन्य भाषाओं के कवियों में उड़िया के इस महत्वपूर्ण हस्ताक्षर का स्थान अप्रतिम है । डॉ० नामवर सिंह इन्हें ’समय और शब्द का कवि’ कहते हैं । इनके अनुसार समय को शब्द में और शब्द को समय में बदलना ही कवि की काव्य-साधना है जिसकी अन्तिम परिणिति संभवतः एक नयी शब्दहीनता है । डॉ० नामवर सिंह कवि की पुस्तक ’तीस कविता वर्ष’ की भूमिका लिखते हुए डॉ० सीताकान्त की शब्द-चिन्ता का रहस्य ढूँढ़ते मिलते हैं –

” जिसका विकल्प नहीं, वही कविता का संकल्प है । कवि की तलाश वही शब्द है – आदि शब्द, अनुभव मूल में निहित शब्द । क्या इसलिये कि प्रत्येक अनुभव शब्द्से अनुविद्ध है ? क्या सीताकान्त की शब्द चिन्ता का रहस्य यही है ? कौन जाने ? कवि के सिवा और कौन जानता है कि अन्ततः टिकते हैं शब्द ही । शब्द को अक्षर कहा गया है । समय का क्या ? आया और गया । किसकी मजाल है जो उसे पकड़ रखे । क्या इसीलिये कवि अपने समय को शब्द में बदलता रहता है ।”

डॉ० सीताकान्त महापात्र का काव्य-संसार हिन्दी के पाठक के लिये पूर्णतया परिचित है । वह हिन्दी में भी उतने ही समादृत हैं जितने उड़िया में । विश्व की अनेकों भाषाओं में उनकी रचनाओं के अनुवाद कविता की संप्रेषणीयता एवं आज के संक्रमण काल में कविता की गंभीर प्रकृति व उसकी अर्थवत्ता के स्वीकार के प्रति आश्वस्त करते हैं । कविता को अनवरत साधना और तपस्या का पर्याय मानने वाले इस कवि की एक कविता में – जिसका शीर्षक है ’समय का शेष नाम’  – कवि कविता को जन्म-जन्मांतर की वर्णनातीत साधना सिद्ध करता है –

“कभी-कभी लगता है
अब हमारे चारों ओर रुद्ध हो रहे
बेशुमार शब्द, शब्द ही शब्द
खचाखच, रेल-पेल, हाव-भाव,
घटाटोप शब्दों पर
शब्द रूप, शब्द रस
शब्द गंध, शब्द स्पर्श
न तुम मुझे देख पाती, न मैं तुम्हें
मेरे हाथ से बिछुड़कर खो जाती
शब्दों की भीड़ में तुम
डूब जाती शब्दों के समुद्र में
उन्हीं शब्दों के ढेर को उलीच कर
मैं खो जाता तुम्हें
कान या नाक में पानी भरने पर
याद करता तुम्हें
इतना कहने कि
सारे शब्द मरने के बाद जो रहता है, वही है प्रेम
और सारे शब्द चुक जाने के बाद जो बचता है, वह है कविता ।”

sitakant mahapatra 1 जन्म : 17 सितम्बर, 1937 – महँगा, जिला-कटक (उड़ीसा); मातृभाषा : उड़िया; शिक्षा : एम०ए० (इलाहाबाद), डी०ओ०डी०एस० (कैम्ब्रिज), पी-एच०डी० (उत्कल वि०वि०); पुरस्कार-सम्मान : फेलो इण्टरनेशनल अकादमी ऑफ पोएट्स, भाभा फेलोशिप, साहित्य अकादेमी पुरस्कार (1974), सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार (1983), भारतीय ज्ञानपीठ सम्मान (1993)  आदि ; प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ : दीप्ति ओ द्युति, अष्टपदी, शब्दार आकाश (साहित्य अकादेमी), समुद्र, चित्र नदी, आरा दृश्य, सूर्य तृष्णार, इत्यादि व हिन्दी में अनेकों कविता पुस्तकें अनुदित यथा लौट आने का समय, समय का शेष नाम, तीस कविता वर्ष, अपनी स्मृति की धरती आदि । अनेकों अन्य भाषाओं में रचनाओं का अनुवाद ।

सीताकान्त महापात्र आधुनिक कवि हैं – शिल्प में भी, कथ्य में भी, परन्तु परम्परा से संयुक्त । परम्परा का स्वीकार, उसकी प्रकृति-विकृति का सम्यक परीक्षण एवं उससे प्राप्त सम्पदा का वर्तमान की जटिलता के सांगोपांग विवेचन में उपयोग, डॉ० सीताकान्त की कविता की मूल विशेषतायें हैं । आधुनिकता परम्परा से सार्थक रूप से समन्वित होकर एक नयी अभिव्यंजना की पृष्ठभूमि रचती है । यह समन्वय केवल भावात्मक व बौद्धिक स्तर पर नहीं है इस कवि में, बल्कि उनकी पूरी सर्जना और उनके व्यक्तित्व में भी सहज ही परिलक्षित है । परम्परा और आधुनिकता के सम्बंध को व्याख्यायित करते हुए डॉ० सीताकान्त कहते हैं –

” परम्परा रक्त में घुली रहती है, आँख-कान उसी क़ायदे से देखते हैं, दिमाग नए क़ायदे से देखना सीखता है, समझता है । बहुत कुछ नहीं भी समझता । वही टेंशन, तनाव, द्वंद्व, विरोधाभास की नई परंपरा बनता है और मैं उसे कविता में खींच लेता हूँ । वैसे परंपरा कोई निर्दिष्ट बिन्दु नहीं है । वह इतिहास का कारागार भी नहीं है । यथार्थ को देखने का क़ायदा परम्परा से मिलता है, वास्तविक आधुनिकता तो परम्परा का नवीनतम रूप है, उसका नव-कलेवर है, आत्मिक उद्वर्तन है ।” (भारतीय साहित्यकारों से साक्षात्कार : डॉ० रणवीर रांग्रा )

समकालीन भारत के दक्षतम कवियों में शुमार इस कवि ने कविता को नई काव्य-चेतना और नई संभावनायें दीं हैं । उन्होंने परम्परा और आधुनिकता का सार्थक समन्वय किया है । वे दुख और वेदना में भी मानव के गहनतम आनन्द की खोज अपनी कविता में करने वाले, पारंपरिक प्रतीकों का प्रयोग करने वाले,  विराट फलक पर जीवन के इंद्रधनुषी आयाम प्रकट करने वाले कालजयी कवि हैं । आज इस कवि का पुण्य स्मरण मेरे मुझमें असीम श्रद्धा का सन्निवेश कर रहा है । विनत !

सब कुछ अदभुत …

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अद्भुत छलाँग । अद्भुत फिल्मांकन । अद्भुत प्रस्तुति । यहाँ देखा, इच्छा हुई, साभार प्रस्तुत है –

सम्पूर्ण प्रविष्टियों की सूची

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रमणी के नर्म वाक्यों से फूल उठा मंदार (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा )

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मुझे क्षण-क्षण मुग्ध करती, सम्मोहित करती वृक्ष दोहद की चर्चा जारी है। कैसा विश्वास है कि वयःसंधि में प्रतिबुद्ध कोई बाला यदि बायें पैर से अशोक को लताड़ दे (मेंहदी लगाकर), या झुकती आम्र-शाख पर तरुण निःश्वांस छोड़ दे, स्मित बिखेर दे चम्पक के सम्मुख, गुनगुनाये नमेरु के लिये, आदि, आदि…… तो उसकी मुराद उसी वक्त पूरी हो जाती है, फलित हो जाता है कन्या का दोहद- प्रकृति भी संकेत देती है- वृक्ष की शाखें मौसम-बेमौसम सीधे फूलों से लद जाती हैं-

“पादाघाताद् अशोकः, तिलकवुरबकौ वीक्षणा-ऽलिंनभ्याम्,
(स्त्रीणां) स्पर्शात् प्रियंगुः, विकसित बकुलः सीधुगण्डूषसेकात्,
मन्दारो नर्मवाक्यात्, पटुमृदुहासनात् चम्पको, वक्त्रवातात्
चूतो, गीताद् नमेरुर्, विकसति च पुरो नर्तनात् कर्णिकारः॥”

वृक्ष-दोहद की चर्चा में मंदार तक आ पहुँचा हूँ। चिन्तन की जीभ लपलपा रही है। सोचता हूँ, रमणियों की यह अन्यान्य क्रियायें- पैरों की लाली, बाँकी चितवन, अयाचित मजाक, गाना-गुनगुनाना, इठलाना, मुस्कराना, निःश्वांस-उच्छ्वास- क्या ये कामिनियों के बाण हैं- और ये खुल-खिल जाने वाले आम्र,अशोक, प्रियंगु, नमेरु, कर्णिकार, मंदार- क्या इस बाण से पहली ही नजर में घायल चरित्र हैं, अवतार हैं? संस्कृत कवि-सम्प्रदाय व अन्योक्तियों में रस सदा इसी कोमलता या श्रृंगाराभास के आरोप से ही आता है न!

मंदार देवताओं का प्रिय पुष्प है। भूत-भावन शिव की अर्चा का साधन यह पुष्प देवराज इंद्र के नन्दन कानन के पंच-पुष्पों में से एक है- अलकापुरी में सदा शोभित। कुमारसंभव में महाकवि ने इंद्र और मंदार दोनों को शिव-चरणाश्रित उल्लिखित किया है-

“असम्पदस्तस्य वृषेण गच्छतः प्रभिन्न दिग्वारणवाहनो वृषा ।
करोति पादावुपगम्य मौलिना विनिद्रमन्दाररजोऽरुणांगुलि ॥”

[“ऐरावतवाहन इन्द्र भी उस वृषभारूढ़ हर के चरण पर अपने सकिरीट मस्तक को अवनत करता है तथा मंदार वृक्ष की पुष्प रज से हर के चरणों को सर्वदा रंजित करता है ।”]

मंदार का एक नाम अर्क भी है। शिव का प्रिय, इसलिये विषयुक्त। फारसी में ’दरख्ते जहरनाक”। क्या यही दरख्ते जहरनाक अलकापुरी के प्रिय पुष्पों में से एक है? ’रघुवंश ’में उल्लेख है कि मंदार के पुष्पों को इंद्राणी अपनी अलकों में सुशोभित करती थीं। ’शाकुंतलम’ में वर्णित है-इंद्र ने दुष्यंत को मंदार-माला दी थी। क्या इसी ’आक’ या ’अर्क’ के पुष्पों की माला? शायद नहीं। कालिदास का मंदार ‘अर्क’ या ‘आक’ नहीं बल्कि दूसरा है। कुछ-कुछ वनस्पतिशास्त्रियों का जाना-पहचाना ’कोरल-ट्री’ जैसा। कालिदास जिस मंदार का वर्णन करते हैं उसमें पुष्पों के स्तवक (गुच्छे) हैं। ’ब्रांडिस’ ने भी अपनी पुस्तक ’इंडियन ट्रीज’ (Indian Trees) में मंदार का जो चित्र दिया है उसमें पुष्पों के स्तवक हैं। कालिदास का मंदार बड़ा नहीं होता। हाँथ से छुए जा सकने वाले आकार का वृक्ष। कुछ पीले भूरे पुष्प और उनमें गोल-गोल बैंगनी रंग-से छोटे-छोटे स्तवक।

कवि-प्रसिद्धि है कि मंदार रमणियों के नर्म वाक्यों से पुष्पित होता है- ’मंदारो नर्मवाक्यात”। कालिदास ने  इस विश्वास की पुष्टि की है। इस मोहक पुष्प से कामिनियों का प्रेम विलक्षण है। ’कुमारसंभव’, ’रघुवंश’, ’शाकुंतलम’, ’विक्रमोर्वशीय’, मेघदूत- सबमें महाकवि कालिदास ने इस पुष्प का वर्णन किया है। अलकानगरी की अभिसारिकायें रात्रि में प्रियतम के समीप गमन करती हैं, क्षिप्रता में वेणियों से सरक जाता है मंदार का पुष्प-

“गत्युत्कन्पादलकपतितैर्यत्र मन्दारपुष्पैः
पत्रच्छेदैः कनककमलैः कर्णविभ्रंशिभिश्च …..”

मेघदूत में ही मेघ को अपने घर का पता देता यक्ष मंदार के उस छोटे वृक्ष को नहीं भूलता जिसे उसकी भार्या (यक्षिणी) ने सस्नेह संवर्धित किया है –

“….तस्योपान्ते कृतकतनयः कान्तया वर्धितो मे
हस्तप्राप्यस्तवकनमितो बाल मन्दार वृक्षः ।”

अलकापुरी का मंदार, कवियों का वर्णित मंदार पता नहीं हमारे आस-पास दिखते मंदार का सहरूप है या नहीं, पर उष्ण एवं शुष्क प्रदेशों  में पाये जाने वाला आज का परिचित मंदार भी कम महत्वपूर्ण नहीं। मंदार 3 से 9 फुट उँचे वर्षानुवर्षी या बहुवर्षायु तथा बहुशाखी क्षुप होते हैं जो एक प्रकार के दुग्धमय एवं चरपरे रस (Acrid Juice) से परिपूर्ण होते हैं। कोमल शाखायें धुनी हुई रुई की तरह सफेद रोयें से घनावृत्त, पत्तियाँ छोटे डंठलों वाली, अभिलट्वाकार (Obovate)  अधस्तल पर रुई की भाँति रोमावृत तथा पुष्प बाहर से सफेद तथा भीतर बैंगनी रंग के होते हैं।

लघु-रुक्ष-तीक्ष्ण गुण, कटु-तिक्त रस, कटु विपाक, ऊष्ण वीर्य, वेदनास्थापन, शोथघ्न, व्रणशोधन, कुष्ठघ्न, वामक, श्वांसहर आदि प्रधान कर्म वाले इस वृक्ष का सबसे प्रभावकारी अंश इसमें पाये जाने वाला चरपरा पीला राल होता है। मंदार के यह पुष्प सालभर में कभी फूल-फल से खाली नहीं रहते किन्तु अपेक्षाकृत जाड़ों में अधिक फलते-फूलते हैं।

# मदार का एक चित्र यहाँ और मदार के पत्तों पर विशिष्ट टिड्डों के चित्र यहाँ मिलेंगे

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मलहवा बाबा फिर आ गये …

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ढोलक  टुनटुनाते हुए, इस वर्ष भी गाते हुए बाबा आ गये । हमने कई बार अपना ठिकाना बदला- दो चार किराये के घर, फिर अपना निजी घर; बहुतों की संवेदना बदली- पर बाबा आते रहे । मैं उन्हें मलहवा बाबा  (मल्लाह बाबा ) कहता रहा – बहुत बचपन में नहीं , दसवीं में पढ़ते वक्त से । मलहवा बाबा बेरोकटोक आते रहे-मेरे दरवाजे, क्रमशः मेरी संवेदना, मेरे अन्तर्मन की दहलीज पर ।
मलहवा बाबा भिखारी हैं – मेरी बहन (मुझसे काफी छोटी ) मुझे समझाती – इंगिति, इतना भी क्या राग ?  बाबूजी मुझे उत्सुक करते कि मलहवा बाबा से उनके गीत सुन आऊं और फिर उन्हें सुनाऊँ । वर्ष में बस एक बार एक दिन के लिये भीख माँगते मलहवा बाबा, ढोलक टुनटुनाते मलहवा बाबा, मछुआरे का गीत गाते मलहवा बाबा – मेरे आत्मीय औत्सुक्य के केन्द्र थे । मैंने पूछा था एक बार – ये एक दिन की भीख से पूरा साल कैसे खा लेते हैं आप ? हँसे – ” गंगा मईया कऽ परताप हऽ बचवाऽ । अधेल्ला में पूरा जीवन बीत जाई । गंगा माई हईं,  हँसत मुसकियात जीवन भर रखिहैं।” बाद में बताया बाबा ने – कि यह तो जीवनदायिनी गंगा मईया की वार्षिक पूजा (मल्लाहों/मछुआरों द्वारा की जाने वाली ) का एक उपक्रम मात्र है । मलहवा बाबा ने गंगा की पार उतराई से अपने दोनों बेटों को पढ़ा लिखा कर अफसर बना दिया है । उन्हें धन-धान्य की कमी नहीं । बेटे रोकते हैं उन्हें गली-गली फिरते, गाते-बजाते भीख माँगने के लिये । पर बाबा हैं कि गंगा मईया सर चढ़ जाती हैं उनके – बेटों की हवेली छोड़ अपनी मड़ई में अपनी नाव के साथ गंगा जी के पास दौड़े चले आते हैं । ढोलक उठाते हैं, माँगने निकल पड़ते हैं गंगा मईया के पूजन के निमित्त ( शायद परंपरा हो कि भीख माँगकर पूजना चाहिये ) ।
तो बाबा इस बार भी आ गये । रिकॉर्ड करने के लिये कमजोर मोबाइल ही थी – आपके सम्मुख है बाबा का गाया पार-उतराई का गीत । मछुआरे का एक रानी को पार उतारने के पूर्व का संवाद ।

कठवा में काटि के नइया बनवली हो कि गंगा जी ।

हमरो नइया परवा उतरबा हो कि गंगा जी ।
आज के रइनियाँ रानी बसो मोरे नगरिया हो कि गंगा जी ।
होत भोरवैं परवा उतरबे हो कि गंगा जी ।
[रानी ! काठ को काट-काट कर अपनी नाव बनायी है मैंने, अपनी इसी नाव पर मैं तुम्हें उस पार उतार दूँगा । पर, आज तो ठहर जाओ यहीं- मेरे नगर । ज्यों ही भोर होगी तुम्हें उस पार पहुँचा दूँगा ।]
मरि न जाबे केवटवा भुखिया पियसिया हो कि गंगा जी ।
मरि जइबे जड़वा अस पलवा हो कि गंगा जी ।
आज तूँ का खियइबा केंवटवा हमरी भोजनियाँ हो कि गंगा जी ।
काऽ हो देबा ओढ़ना डसवनाँ हो कि गंगा जी ।
[केवट ! यहाँ कैसे ठहर जाऊं ? भूख-प्यास से मर न जाऊँगी ! ठंड और पाला भी तो ऐसा कि जान न बचेगी । और खाउँगी क्या ? (यहाँ है ही क्या ? मैं ठहरी रानी !), और सोऊँगी कैसे ? ओढ़ने-बिछाने के लिये क्या दोगे ?]
दिनवाँ खियाइब रानी रोहू जल मछरिया हो कि गंगा जी ।
रतिया के ओढ़ाइब महाजलिया हो कि गंगा जी ।
[रानी ! दिन में तो रोहू मछली खिलाऊँगा-भूख मिट जायेगी ; और रात को ओढ़ाने को मेरी मछली का जाल तो है ना ! ]
एक तऽ करुवासन केंवटवा रोहू तोर मछरिया हो कि गंगा जी ।
दुसरे करुवासन महाजलिया हो कि गंगा जी ।
[केवट ! कैसे खाउँगी मैं रोहू मछली ? वह तो कड़वी है । और तुम्हारा जाल ओढ़कर भी न सो सकूँगी – वह भी तो  अजीब सी गंध देती है ।]
घरवाँ तऽ रोअत होइहैं गोदी के बलकवा हो कि गंगा जी ।
कैसे बसूँ तोहरि अब नगरिया हो कि गंगा जी ।
[केवट ! मुझे उसे पार ले चलो ! मेरे गोद का बालक घर पर बिलख रहा होगा मेरे लिये । उसे छोड़ कर कैसे ठहर जाऊँ यहाँ ?]
अरे अगिया लगावा रानी गोदी के बलकवा हो कि गंगा जी ।
बस जइबू हमरी अब नगरिया हो कि गंगा जी।
रानी ! आग लगाओ गोद के बालक को । इतना क्या सोचना ! उसे भूल जाओ और यहीं ठहर जाओ ]
अगिया लगइबै केंवटवा रोहू तोर मछरिया हो कि गंगा जी ।
बजर न परैं तोहरे महाजलिया हो कि गंगा जी ।
तोहरे ले सुन्दर केंवटवा घरवाँ मोरा बलमुआ हो कि गंगा जी ।
कचरत होइहैं मगहिया बीड़वा पनवाँ हो कि गंगा जी ।
[केवट ! आग तो लगाउँगी मैं तुम्हारी रोहू मछली को (इसका ही प्रलोभन था न !) । तुम्हारी जाल पर आफत आ जाये ! क्या तुम नहीं जानते ? तुमसे सुन्दर मेरा प्रियतम मुँह में मगही पान दबाये घर पर बैठा मेरी राह देख रहा होगा ।]

तीज पर सुनिये एक झूला गीत..

तीज पर्व पर गाये जाने वाला झूला-गीत सुनिये । अभी अचानक ही यू-ट्यूब पर भ्रमण करते पा गया –