Tuesday, February 21, 2017

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शुभे! मृदु-हास्य से चम्पक खिला दो (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा)

champa1 imagesयह देखिये कि बूँदे बरसने लगीं हैं, सूरज की चातुरी मुंह छुपा रही है और ग्रीष्म ने हिला दिये हैं अपने हाँथ और इधर मैं हूँ कि ग्रीष्म के कनकवर्णी चम्पक को ही विस्मृत किये बैठा हूँ। यह कैसे संभव है कि जिस पुष्प की कांचन प्रतिभा से ग्रीष्म की रागिनी धूप भी चमक उठती हो उसे ग्रीष्म के अतीत होने तक भी याद न किया जाय! कवि-समय के उल्लेख में तो राजशेखर ने इसे ग्रीष्म में वर्णित करने की राह ही सुझायी थी-

” विचकिलकेसरपाटलिचम्पकपुष्पानुवृत्तयो ग्रीष्मे” (काव्य-मीमांसा १८)

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पर यह बात अलग है कि कालिदास ने इसे वसंत का फूल ही मान लिया। यह संभव भी था वसंत की प्रकृति के हिसाब से कि चम्पा जैसा सुगंधित फूल उसी ऋतु में खिलता। वस्तुतः यह सुरभित करता भी है दोनों ऋतुओं को, और खिलता है वसंत और ग्रीष्म की संधि में। चम्पक (चम्पा) की सुगंध ने बहुत लुभाया है साहित्यिकों को, और रसिकों को भी। आज जब यह पुष्प मन में उतर गया तो रूप से अधिक इसके गंध की माधुरी खिल गयी। वृंत पर अकेले (अकेले क्यों? क्या इसकी गंध वैयक्तिकता की गंध है?) खिलने वाला यह फूल भौंरे को मनमानी नहीं करने देता। झट से झिझक जाती है भ्रमर वृत्ति- अनोखा है यह पुष्प। यह अकेला ऐसा पुष्प होना चाहिये जिसकी उत्कट गंध के कारण भौंरे इनके पास नहीं जाते। बाबा तुलसी को भी यह बात रिझा गयी थी, और यही कारण है कि अयोध्या में राम के बिना भरत का अयोध्या के प्रति राग वैसा ही था- जैसे भौरा चंपक के बाग में हो। सर्वत्र बिखरा हुआ ऐश्वर्य (सुगंध), पर किसी काम का नहीं-

“तेहि पुर बसत भरत बिनु रागा
चंचरीक जिमि चंपक बागा ।”

भारतवर्ष के इस परिचित पुष्प का सौन्दर्य इसके हल्के पीले नारंगी रंग के फूलों से है । यही कारण है कि संस्कृत में यह कांचन, या सुवर्णपुष्प है । “गोस्वामी तुलसीदास” ने तो इस रूप का रहस्य भी खोल ही दिया है अपनी बरवै रामायण में –

“चंपक हरवा गर मिलि अधिक उदोत
कन अँगुरी की मुंदरी कंगन होत ..।”

वियोगिनी सीता के गले में झूलकर यह चंपक और भी कनकवर्णी होकर चमक उठा है, और ऐसा सहज ही हो क्यों न, यदि (किसी कवि की पंक्ति से कहूँ तो) –

“सिया सोने की अँगूठी, राम साँवरो नगीना हैं”

champak Flowers

वृक्ष-दोहद के संबंध में यह कवि-प्रसिद्धि है कि चंपक रमणियों के पटु-मृदु हास्य से पुष्पित होता है। तो इस सम्मति में कैसा संदेह कि स्त्री-स्मित की सुगंध ही व्याप्त हो गयी होगी इस फूल में अपनी पूरी तीव्रता से! जैसे सम्पुट में ठहरा हुआ विरलतम होता है किसी रमणी का मधुहास, वैसा ही तो खिलता है यह वृक्ष-वृंतों पर शरमाया-सा, पर पूर्णतया अभिव्यक्त और प्रभावी। भारत, इण्डोनेशिया और पड़ोसी क्षेत्रों का असली निवासी यह फूल पूर्वी हिमालय के क्षेत्रों में पूरी ऊर्जा से खिलता है। सदाबहार वृक्ष है यह। इसलिये ही तो अत्यन्त प्रिय है वाल्मीकि और कालिदास को। जितना ही यह सहित्य में वर्णित है उतना ही स्वीकृत है जन-जन में अपनी सुगंध के लिये। देवता के चरणों पर आस्था की सुगंध पहुँचाता है भली भाँति। गर्म-आर्द्र रात्रि में इसकी सुगंध की दूरी नाप नहीं सकते हमसब। यह गूढ़ बात भी तो समझानी है इसे-

“फूल डाली से गुँथा ही झर गया, घूम आयी गंध पर संसार में।”

The Champa Flower1


चम्पा का यह गौरव-गीत अक्षुण्ण है। कवि वाल्मीकि ने इसे गाया अपनी रामायण में। कालिदास ने वसंत वर्णन करते हुए ऋतुसंहार में, मेघदूत में। तुलसी, रवीन्द्रनाथ से होती हुई यह यात्रा आधुनिक कवि शलभ श्रीराम सिंह तक आयी। अजित वडनेरकर के शब्दों के सफर का एक पड़ाव यह चंपक भी था। वहीं से खयाल आया कि बिहार के चंपारन जिले का नाम इन चंपक वृक्षों की वहाँ बहुतायत से पड़ा। चम्पक+अरण्य= चम्पकारण्य, बाद में समयगति से चम्पारन। शेष फिर…

वृक्ष-दोहद सम्बन्धित अन्य प्रविष्टियाँ:

रूपसी गले मिलो कि कुरबक फूल उठे (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा )
फूलो अमलतास ! सुन्दरियाँ थिरक उठी हैं (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा)
रमणियों की ठोकर से पुष्पित हुआ अशोक (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा)
स्त्रियाँ हँसीं और चम्पक फूल गया (वृक्ष-दोहद के बहाने वक्ष-पुष्प चर्चा)

रूपसी गले मिलो! कि कुरबक फूल उठे (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा)

Kurabak_Barleria_Cristata
यूँ तो अनगिनत पुष्प-वृक्षों को मैंने जाना पहचाना नहीं, परन्तु वृक्ष-दोहद के सन्दर्भ में ’कुरबक’ का नाम सुनकर मन में इस पुष्प के प्रति सहज ही उत्कंठा हो गयी। मैंने इसे पहचानने का प्रयास किया। प्रथमतः जैसा कुछ ग्रंथों में उल्लिखित है, यह बहुत कुछ कांचनार या कोविदार जैसा एक पुष्प है, रूप और गुण के लिहाज से। परन्तु धन्वंतरि निघंटु के अनुसार सौरेयक के चार प्रकारों में से पीत सौरेयक को कुरण्टक और रक्त सौरेयक को ’कुरबक’ कहते हैं। हिन्दी में यही कटसरैया या पियाबासा कहा जाता है। पियाबासा के यह पुष्प सर्वत्र सुलभ हैं।

कुरबक का वर्णन साहित्य में एक रक्त-वर्णी पुष्प के रूप में किया गया है। अमरकोष के अनुसार भी कुरबक के फूल लात होते हैं। रामायण के वसंत वर्णन में रक्त कुरबकों का उल्लेख है। कालिदास भी इसे रक्त वर्णी ही उल्लिखित करते हैं। कुरबक को कटसरैया मान लेने में थोड़ी समस्या यह भी थी कि कटसरैया पूर्णतः लाल नहीं होती और अनेकों स्थानों पर तो इसके पीत और शुभ्र पुष्प ही प्राप्त होते हैं। परन्तु विभिन्न स्थानों पर इसके भिन्न-भिन्न प्रकार एवं इसकी स्वभावगत विशेषता के साम्य के कारण इसे कटसरैया मान लेना ही उपयोगी है। वनौषधि निदर्शिका (हिन्दी समिति, सूचना विभाग, उत्तर प्रदेश) में भी इसका स्पष्ट उल्लेख है कि पुष्प के रंग भेद से कटसरैया चार प्रकार की होती है – श्वेत , पीत, रक्त और नील। इनमें रक्त सौरेयक (barleria cristata) को ही कुरबक कहते हैं। इसके पुष्प भड़कीले, गुलाबी रंग के होते हैं। यह पौधे स्थान-भेद से पत्तों और पुष्प-वर्णों में भिन्न-भिन्न होते जाते हैं। हिमालय-क्षेत्र और हमारे आसपास यह पौधे जामुनी नील रंग के होते हैं। 

साहित्य में कवि-प्रसिद्धि है कि कुरबक सुन्दर स्त्रियों के आलिंगन से पुष्पित हो जाता है। इस विश्वास की जानकारी कालिदास को भी थी और राजशेखर को भी। राजशेखर ने अपनी काव्य-मीमांसा में वसंत-वर्णन के क्रम में इसका संकेत किया है-

“नालिङ्गितः कुरबकस्तलको न दृष्टो ना ताडितश्च चरणैः सुदृशामशोकः|
सिक्ता न वक्त्रमधुना बकुलश्च चैत्रे चित्रं तथापि भवति प्रसवावकीर्णाः||”

(आश्चर्य यह है कि इस मास में कुरबक का वृक्ष रमणी के आलिंगन के बिना, तिलक का वृक्ष उसकी चितवन के बिना, अशोक वृक्ष उसके पदाघात के बिना और बकुल वृक्ष मद्य-गंडूष के बिना ही पुष्प प्रसव करने लगते हैं।”)

Kurabak 

स्त्रियों द्वारा आलिंगन करने की इस कवि-प्रसिद्धि के पीछे शायद इस पुष्प-वृक्ष का छोटी झाड़ी या पौधे की तरह होना है। इस पौधे के स्वयंजात क्षुप आसानी से गाँवों के आसपास बगीचों की मेड़ों पर या मन्दिरों के उद्यानों, परिसरों में लगे हुए मिल जाते हैं।

कालिदास ने कुरबक का यह पुष्प वसंत में खिलते देखा था। कालिदास के काव्य में यह पुष्प सर्वत्र विद्यमान है। मेघदूत में यक्ष उद्यान के प्रसंग में उल्लेख है कि उस उद्यान के माधवी-मंडप का बेड़ा कुरबक का था। रघुवंश के वसंत वर्णन में इसका उल्लेख है। मालविकाग्निमित्र में इस पुष्प के वर्णन कि वसंत की प्रौढ़ावस्था में कुरबक के फूल पतित हो जाते हैं, हम एक संकेत भी ग्रहण कर सकते हैं कि यह कुरबक ही कटसरैया है।
Meghdoot by Kalidasa
कालिदास रचित मेघदूत से एक उद्धरण

देवपूजा के उपयोग में आने वाला यह पुष्प समस्त भारतवर्ष के उष्णकटिबंधीय प्रदेशों में पाया जाता है। इसकी शाखायें जड़ से निकलती हैं, पत्तियाँ अण्डाकार, अभिमु्खक्रम से स्थित; पुष्प अवृन्त बड़े, प्रायः एकाकी होते हैं। फल यवाकृतिक तथा द्विकोष्ठीय व जड़ काष्ठीय़ होती है। लघु-स्निग्ध गुण, तिक्त-मधुर रस, कटु विपाक व ऊष्ण वीर्य वाला यह पुष्प कफवातशामक, रक्तशोधक, ज्वरघ्नक, कुष्ठ्घ्न आदि है। श्वसन संस्थान के रोगों में इसका औषधि-प्रयोग अत्यन्त उपकारी है।

वृक्ष-दोहद सम्बन्धित अन्य प्रविष्टियाँ:

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फूलो अमलतास ! सुन्दरियाँ थिरक उठी हैं (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा)

फूलो अमलतास ! सुन्दरियाँ थिरक उठी हैं (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा)

Cassia Fistula -Amalatas
स्वर्ण-पुष्प वृक्ष की याद क्यों न आये इस गर्मी में। कौन है ऐसा सिवाय इसके जो दुपहरी से उसकी कान्ति चुराकर दुपहर से भी अधिक तीव्रता से चमक उठे और सारा जीवन सारांश अभिव्यक्त करे। वह कौन-सी जीवनी शक्ति है जो इस अमलतास को जीवन्त बनाये रखती है कठिनतम धूप में भी, और जो मुस्कराता रहता है सदैव अपने पीताभ वर्ण में गलबहियाँ खोले! अमलतास से हम सब बातें करना चाहते हैं कुछ न कुछ – सिद्धेश्वर भी बतिया रहे हैं अमलतास से मेरे मन की-

“जैसे – जैसे
बढ़ता जाता है धूप का ताप
और मौसम को लग जाता है
कोई अनदेखा – अनचीन्हा पाप
वैसे – वैसे
तुम्हारी हर कलिका से उभरता है अनोखा उल्लास
देखा है – सुना है
तरावट के बिना
पत्रहीन होकर नग्न हो जाते हैं गाछ
तब तुम्हारे ये दिव्य वस्त्राभरण
बताओ तो किस करघे पर काता गया
यह मखमली रेशम – जादुई कपास.

भरी दोपहरी में
जब गहराता है आलस का अंधियारा
दोस्त ! तुम्हीं तो ले आते हो
थोड़ी रोशनी – थोड़ा उजास.”

वृक्ष-दोहद के सन्दर्भ में कर्णिकार (यही नाम तो व्यवहृत है अमलतास का संस्कृत साहित्य में) का उल्लेख देखा तो मन मचल उठा। बहुत कुछ स्मरण हो उठा कालिदास की लेखनी का चमत्कार। कालिदास ने अपने काव्य में अनगिन स्थानों पर इस कर्णिकार का उल्लेख किया है अशोक के साथ। ब्रांडिस (Brandis) भी तो अशोक और अमलतास दोनों को एक ही जाति (Cassia) का सिद्ध करते हैं। प्रसिद्धि है कि यदि कर्णिकार वृक्ष के आगे स्त्रियाँ नृत्य करें तो प्रमुदित होकर वह पुष्पित हो उठता है

वृक्ष-दोहद के संबंध में कर्णिकार को संयुक्त करने का कारण इस वृक्ष का स्त्री-सहचर होना लगता है। कालिदास के रम्य काव्य में एकाधिक स्थानों पर इस तथ्य का उल्लेख है कि स्त्रियों से अत्यन्त निकट है यह वृक्ष। अमलतास सुन्दरियों के कानों में और केशों मॆं झूलता है, कुमार संभव में पार्वती की नील अलकों में यह नवकर्णिकार पुष्प सुशोभित है –

“उमाsपि नीलाsलकमध्यशोभि विसंसयन्ती नवकर्णिकारम्
चकार कर्णच्युतपल्लवेन् मूर्ध्ना प्रणामं वृषभध्वजाय ।”

और ऋतुसंहार में कान में नवकर्णिकार-पुष्पों को लगाने का उल्लेख है। स्वतः में अयत्नसंभूत यह वृक्ष स्त्रियों के मनरंजक प्रयत्नों से हर्षाभिव्यक्ति करता पुष्पित हो उठता है।

यूँ तो यह फूलता है वैशाख- जेठ की ग्रीष्मावधि में, पर साहित्य में कवि प्रसिद्धि है कि अमलतास वसंत में पुष्पित होता है। रामायण में वसंत-वर्णन के अवसर पर कर्णिकार के सुनहले पुष्पों का वर्णन मिलता है, राजशेखर वसंत में ही इसका प्रस्फुटित होना बताते हैं अपनी काव्य मीमांसा में और कालिदास ने भी वसंत में ही इन पुष्पों को खिलते देखा था। वैज्ञानिक इस पुष्प के फलों को तीखी गंध वाला बताता है और कवि कहते हैं यह पुष्प निर्गंध होता है –

“वर्णप्रकर्षे सति कर्णिकारं दुनोति निर्गंधतया स्म चेतः।
प्रायेण सामग्र्यविधौ गुणाना परांगमुखी विश्वसृजः प्रवृत्ति॥”

(कर्णिकार नामक पुष्प देखने में अत्यन्त सुन्दर होते हुए भी उनमें गंध के न होने से सहृदय पुरुषों के हृदय में उनपर तरस आती थी। ब्रह्मदेव की यह एक बुरी आदत है कि वह सकल पदार्थों में कुछ न कुछ गुण की कमी कर, किसी को सम्पूर्ण गुणसम्पन्न नहीं रहने देता।)

अमलतास के उच्छ्वसित सौन्दर्य की प्रशंसा उत्तरी हिमालय के यात्रियों ने भी मुक्त कंठ से की है। यह हिमालय के चार हजार फुट ऊँचे प्रदेशों में भी पुष्पित होता दृष्ट हुआ है। मूलतः है तो यह दक्षिण एशिया का वृक्ष, पर पूरे विश्व तक इसका विस्तार है। सूर्य-प्रिय है यह, और अकाल की भीषण स्थिति का भी सामना सहज ही खिलते हुए करता है। रूखा मौसम अमलतास को अत्यन्त प्रिय है, और यह जरा-सी भी सर्दी बर्दाश्त नहीं करता।
राजनिघंटुकार के मत से क्षुद्र आरग्वध (Disease-Killer) ही हिन्दी में अमलतास है। औषधीय गुणकारी यह वृक्ष एक बेहतर दर्दनिवारक और रक्त-शोधक सिद्ध है। इसकी फलियाँ अलसर, तेज बुखार, पीलिया, पेचिस आदि व्याधियों में सहायक हैं। त्वचा की देखभाल करने के लिये भी यह गर्मी में हमारी सहायता के लिये उपलब्ध है। अमलतास के औषधीय रेचक गुण (laxative actions) एंथ्राक्विनोन्स (anthraquinones) से आते हैं। अमलतास के बीजों में 2% एंथ्राक्विनोन्स (anthraquinones), 24% प्रकृत प्रोटीन (crude protein), 6.65% वसा (fat), 20% फाइबर (crude fibre) एवं 39.86% कार्बोहाइड्रेट्स (carbohydrates) की व्याप्ति होती है।

अपने स्वर्णिम पुष्पों, अपनी कमनीय प्रकृति, अपने औषधीय गुण-धर्म एवं साज-सज्जा में अपने चारु उपयोग के लिये यह वृक्ष सर्व-प्रिय व सर्व-प्रशंसित है।
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# वृक्ष-दोहद के बहाने यह वृक्ष-पुष्प चर्चा जारी रहेगी …..

रमणियों की ठोकर से पुष्पित हुआ अशोक (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा )

180px-Sita-Ashok_(Saraca_asoca)_flowers_in_Kolkata_W_IMG_4146 वृक्ष-दोहद की संकल्पना के पीछे प्रकृति के साथ मनुष्य का वह रागात्मक संबंध है जिससे प्रेरित होकर अन्यान्य मानवीय क्रिया-कलाप वृक्ष-पादपों पर आरोपित कर दिये जाते रहे हैं। प्रकृति के साथ मनुष्य के  यह रागात्मक सम्बन्ध वस्तुतः उसके आनन्द को और व्यापक बनाते हैं। मनुष्य के अन्तर्निहित भावों की अभिव्यक्ति इसी कारण प्रकृति के माध्यम से होने लगी और अनेकों इच्छायें (पूर्ण-अपूर्ण) विभिन्न क्रियाकलापों में दृष्ट होने लगीं। वृक्ष-दोहद का सम्बन्ध वृक्षों में असमय/अ-ऋतु ही पुष्प के उदगम से लिया जाता रहा है। आश्चर्यजनक है कि स्त्रियाँ जो स्वयं उर्वरता और प्रजनन के लिये उत्तरदायी हैं, विपरीततः  अपनी विभिन्न क्रियाओं से वृक्षों को गर्भित करती हैं, पल्लवित-पुष्पित करती हैं। वृक्ष-दोहद की क्रिया के अन्तर में मुझे सहज स्वाभाविक गर्भिणी स्त्रियों की सामान्य उत्कंठा दिखायी पड़ती है जो स्वतः में अनूभूत होने वाले उस विरल अनुभूति-व्यापार को अपने सामने, अपने से इतर कहीं घटित होते देखना चाहती हैं। प्रकृति से अच्छा साधन उन्हें कहाँ मिलेगा?

विज्ञान की अननन्तर सिद्ध सैद्धांतिकी कि वृक्षों में जीवन है  और वह संवेदित भी होते हैं, साहित्य की कल्पनाशीलता से घुलमिल कर एक रुचिकर प्रसंग वृक्ष-दोहद के रूप में हमारे सामने उपस्थित है। वृक्ष-दोहद के संबंध  में प्राचीन साहित्य-शिल्प में जिन वृक्षों का उल्लेख है, उनमें सबसे प्रिय और महत्वपूर्ण वृक्ष ’अशोक’ है। कहते हैं, सुन्दर स्त्रियों के पदाघात (पैरों के प्रहार) से अशोक में पुष्प खिल आते हैं, और पैर भी कैसे? किंकिणि-नूपूर-सज्जित, कुमकुम लेपित। नूपूर-सज्जित रमणियों के वाम पैर ही वृक्ष में आघात देते हैं और अशोक पुष्पित हो उठता है। उत्कीर्ण मूर्तियों में अशोक दोहद की क्रिया सम्पादित करती यक्षिणियाँ अपने वाम पैरों से ही आघात करती मालूम पड़ती हैं (A.K. Coomarswami – Yaksa)|

अशोक को कुसुमित करने की इस क्रिया के अनेकों उदाहरण हमारे साहित्य में व्याप्त हैं। राजशेखर की काव्यमीमांसा में इसका उल्लेख है। हमारे विश्व-प्रसिद्ध कवि कालिदास के समस्त काव्य में वसंत-उत्सव के बहाने, अथवा मदनोत्सव के बहाने अशोक को कुसुमित करने की क्रिया का वर्णन है। कुमारसंभव में वसंत का वर्णन करते हुए कवि अशोक को स्कंध पर पल्लवित और कुसुमित बताता है; मेघदूत में भी यक्ष के माध्यम से वह इस क्रिया का उल्लेख करा देता है कि “अशोक तो यक्षिणी के वामपाद का अभिलाषी है”। कालिदास की रचना ’मालविकाग्निमित्र” के तृतीय अंक की सारी कथा ही मालविका के पदाघात से अशोक को पुष्पित करने की क्रिया को केंद्र बना कर रची हुई है।

ashok ke phool
मदनोत्सव में कामदेव की अभ्यर्थना के पश्चात अशोक को पुष्पित करने की क्रिया विस्तार से वर्णित है मालविकाग्निमित्र में। सामान्यतः होता यही है कि कोई सुन्दर स्त्री अपने समस्त श्रृंगार के साथ, पैरों में अलक्तराग और नूपुर सजा कर, हाथों में अशोक के पल्लव के गुच्छे पकड़कर  अपने बायें पैर से अशोक वृक्ष पर आघात करती है। अशोक नूपुर-ध्वनि से उल्लसित होकर अपने कंधे पर ही फूल उठता है। इस मादक क्रिया को अपनी लेखनी से और मादक बना दिया है कालिदास ने।

ashok ke phool1हेम-पुष्प (स्वर्ण वर्ण के फूलों से लदा हुआ) और तामृपल्लव के नाम से विख्यात अशोक एक सदाबहार वृक्ष है। सदैव हरा रहने वाला। सदैव हरा तो कामदेव ही है। मन, तन, सृष्टि और जीवन- सब की हरीतिमा हर क्षण बनाये रखने वाला और कौन है सिवाय कामदेव के। इसलिये ही यह अशोक भी समस्त शोक को हरने वाला है। खयाल करिये कि कामदेव के पंच बाणों में एक अशोक ही है।

380px-SungaYaksa इसे विचित्र संयोग कहें या अशोक की महत्ता को स्थापित करने वाला ईश्वरीय विधान कि यह बौद्ध और जैन दोनों धर्मों के प्रवर्तकों के जीवन से संयुक्त होकर इन धर्मों के लिये श्रद्धा और आदर का पात्र बना। कहते हैं, शाक्य रानी महामाया ने लुम्बिनी के उपवन में इसी वृक्ष के नीचे बुद्ध को जन्म दिया। कथायें कहतीं है, कि रानी माया अपने उपवन में विहार कर रहीं थी और तनिक क्लांत होकर वह एक अशोक वृक्ष के नीचे आकर विश्राम करने लगीं। तभी अचानक ही विचित्रतः अशोक की शाखायें झुकने लगीं, और उन्होंने एक शाखा पकड़ ली। तत्क्षण ही रानी माया के दक्षिण भाग से महात्मा बुद्ध का अवतरण हो गया। जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर के संबंध में भी कहा जाता है कि वैशाली में इसी प्रकार के वृक्ष के नीचे बैठकर   उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया।

YVMN_Building_AshokaTree_2www.genv.net  seअशोक सदा हरित रहने वाला २५ से ३० फुट उंचा, अनेकों शाखाओं युक्त घना व छायादार वृक्ष होता है। देखने में कुछ कुछ मौलश्री के वृक्ष-सा। सम्पूर्ण भारतवर्ष में इसकी बहुतायत है। पत्ते लंबे, गोल व नोंकदार होते हैं। कोमल अवस्था में इन पत्तों का रंग लाल, फिर गहरा हरा हो जाता है।  बहुत औषधीय गुण भी हैं इसमें – यह बांझपन का कष्ट हरता है, मातृत्व देता है; रक्त प्रदर में, मूत्र के रोगों में चिकित्सा में सहायक होता है; गर्भाशय की अंतःसतह (एण्डोमेट्रीयम) व डिम्ब ग्रंथि (ओवरी) के ऊतकों पर लाभकारी प्रभाव डालता है और गुर्दे के दर्द एवं पुरुषों में अण्डकोष-सूजन की चिकित्सा में सहायक होता है।

वैज्ञानिक दृष्टि डालें तो अशोक में कई जैव-सक्रिय पदार्थ पाये जाते हैं। मुख्यतः टैनिन्स, कैटेकाल, इसेन्शियल आयल, हिमेटॉक्सिलीन, ग्लाइकोसाइड, सौपोनिन्स, कैल्शियमयुक्त कार्बनिक यौगिक और लौह खनिजयुक्त कार्बनिक यौगिक। आधुनिक वैज्ञानिक मत कहते हैं कि अशोक की छाल का निष्कर्ष गर्भाशय को उत्तेजित करता है। इसके प्रयोग से गर्भाशय की संकुचन दर बढ़ जाती है और यह संकोचन अधिक समय तक बना रहता है। ऐलोपैथिक संश्लेषण औषधि की अपेक्षा इसका प्रभाव हानिरहित माना जाता है। वैज्ञानिकों ने अशोक की त्वचा में कुछ ऐसे संघटकों की खोज भी की है, जो कैंसर का होना रोकते हैं।

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# वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प की यह चर्चा जारी रहेगी……किंचित अगला पड़ाव अमलतास होगा

स्त्रियाँ हँसीं और चम्पक फूल गया (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा)

कवि समय का अर्थ

साहित्य के अन्तर्गत ’कवि-समय’ का अध्ययन करते हुए अन्यान्य कवि समयों के साथ ’वृक्ष-दोहद’ का जिक्र पढ़कर सहित्य की विराटता देखी। वृक्ष-दोहद का अर्थ वृक्षों में पुष्पोद्गम से है। यूँ तो दोहद का अर्थ गर्भवती की इच्छा है, पर वृक्ष के साथ इस दोहद का प्रयोग फूलों के उद्गम के अर्थ में ही किया जाता है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी  ने अपनी पुस्तक ’हिन्दी साहित्य की भूमिका’ में कवि-प्रसिद्धियों के अन्तर्गत वृक्ष-दोहद का सुन्दर विवेचन किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि ’दोहद’ शब्द ’दौहृद’ शब्द का, प्राकृत रूप है जिसका अर्थ भी मिलता जुलता है। दोहद के सम्बन्ध में आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि “कुशल व्यक्तियों द्वारा वृक्षों-लताओं आदि में जिन पदार्थों और क्रियाओं से असमय, अऋतु में ही फूलों का उदगम करा दिया जाता है, उसे दोहद कहते हैं। यह वृक्ष दोहद मेरे लिये एक विचित्र चीज है। साहित्य और शिल्प में वर्णित, निर्मित यह वृक्ष-दोहद रोचक जान पड़ता है। संस्कृत काव्य में यथास्थान वृक्ष दोहदों का उल्लेख है। कालिदास के ग्रंथों, मल्लिनाथ के ग्रंथ, काव्य-मीमांसा व साहित्य दर्पण आदि शास्त्रीय ग्रंथों में इस वृक्ष दोहद का पर्याप्त उल्लेख है।

कवि प्रसिद्धियाँ

यूँ तो इन ग्रंथों में अशोक, बकुल, तिलक, कुरबक- इन चार ही वृक्षों से सम्बन्धित कवि-प्रसिद्धियाँ मिलती हैं, परन्तु अन्यत्र कुछ स्थानों पर कर्णिकार (अमलतास), चंपक (चंपा), नमेरु(सुरपुन्नाग), प्रियंगु, मंदार, आम आदि वृक्ष-पुष्पों के भी स्त्री-क्रियायों से उदगमित होने के उल्लेख हैं। Hindi Sahity kI bhoomikaa

मेरी रुचि अचानक ही इन वृक्षों के सम्बन्ध में बहुत कुछ जानने की तरफ हो गयी, और अपने आस-पास इनमें से कुछ वृक्षों को देखकर मन कल्पनाजनित वही दृश्य देखने लगा जिनमें सुन्दरियों के पदाघात से अशोक के फूल खिल रहे हों,अमलतास स्त्रियों के नृत्य से पुष्पित हो रहा हो, स्त्रियों की गलबहियाँ से कुरबक हँस कर खिल गया हो, चंपा फूल गया हो स्त्रियों की हँसी से चहककर, गुनगुना रही हों स्त्रियाँ और विकसित हो गया हो नमेरु, छूने भर से विकसित हुआ हो प्रियंगु और कुछ कहने भर से स्त्रियों के फूल गया हो मंदार आदि-आदि। 

इन वृक्षों और फूलों के सम्बन्ध में तलाशने निकला इस अन्तर्जाल पर। जो कुछ मिला वह इस कवि-समय से ताल्लुक तो नहीं रखता था, परन्तु काफी ज्ञानवर्द्धन करने के लिये पर्याप्त था। इन वृक्ष-पुष्पों के वानस्पतिक नामों की खोज ने तो और भी बहुत कुछ हाथ पकड़ा दिया। तो एक भाव मन में जागा। इन वृक्षों और पुष्पों को एक आत्मीय भाव से निरखते हुए इनकी परिचयात्मक चर्चा करूँ, यदि संभव हो तो शास्त्रीय और वैज्ञानिक सन्दर्भों के साथ।  सब कुछ इसी अन्तर्जाल और संकलित पुस्तकों की सामग्री का ही प्रस्तुतिकरण होगा- मेरा अपना कुछ नहीं।

क्रमशः —-

सभ्यताएँ जंगलों का अनुसरण करती रही हैं

“सदा स तीर्थो भवति सदा दानं प्रयच्छति
सदा यज्ञं स यजते यो रोपयति पादपम् ।”
By Planting a single tree one gets as much ‘punya’ in life as residing eternally in a famous Tirth; always giving ‘danas’ and always performing Vedic sacrifices.

वृक्षों की जीवन्त उपस्थिति और उनके शाश्वत मूल्य को स्पष्ट करता यह श्लोक अचानक ही विश्व पर्यावरण दिवस पर याद आ गया। अपनी आकांक्षाओं के वशीभूत होकर कितना कुछ विनष्ट करना शुरु कर दिया हमने! अपने ही पोषक ग्रह का पर्यावरण हम नष्ट करने लगे! आर्थिक विकास और व्यवसाय का चोला पहनाकर हमने भौतिक सुख सुविधायें जुटाईं और अपनी समाप्त न होने वाली आकांक्षा के आग्रह से औद्योगिक समाज निर्मित कर अपनी मिट्टी और अपने पानी को जहरीले रसायनों से प्रदूषित कर डाला।

अनियंत्रित आकांक्षा और तर्क-बुद्धि के उन्मत्त उपासक होकर हमने अपने हृदय का असली अंश खो दिया। फिर तो प्रकृति से चिरन्तन संयुक्त हमारी रागात्मिका वृत्ति भी क्षीण-सी होने लगी। हम वृक्ष काटने लगे, पूरे के पूरे वन भी। हमने यह न देखा कि वृक्षों के कटान से सब गड्ड-मड्ड हो चला है- हमारे पर्यावरण का संतुलन, मौसम का आना-जाना, हरेपन का सोने जैसी रेत में बदल जाना। हमने यह भी न देखा कि हमारे साँसो की आवाजाही पर भी इन वृक्षों की नेमत है। किताबों में रख छोड़ा हमने ऑक्सीजन और कॉर्बन डाई ऑक्साइड का वृक्षों से जुड़ाव। कान-फोड़ू शोर भी कहीं इन्हीं वृक्षों की लताओं में उलझकर रह जाता है, हमारे कान के पर्दे सलामत रहते हैं- यह भी हम भूल गये। तापमान बढ़ता रहा। नयी शब्दावली ने हमारे ज्ञान का दायरा बढ़ा दिया – हम ग्रीन हाउस प्रभाव जानने लगे। पर वृक्ष कटते रहे।

औद्योगिक विकास और यांत्रिकता को हमने जी भर कर अपनाया। हमें बस यही चाहिये था कि भारत की अर्थवत्ता का निर्माण हो जाय। सब कोई ऐश्वर्य की गोद में डूबे उतराये। आखिर विज्ञान ने मनुष्य का हित ही तो अपना काम्य रखा था- पर क्या यही अर्थ-संकुचित मानव स्वार्थ हित। पता नहीं। पर मुझे लगता है हमारे इस यंत्र जगत का इस्पात हमारी आत्मा में उतर गया है। दो सौ वर्षों से विज्ञान की उन्नति होती रही, हमारी नैतिक उन्नति ठहरी ही रह गयी। विकास की प्रत्याशा ने मानव को जीवन का संघर्ष दिया और बढ़ती आकांक्षा और अहमन्यता ने यांत्रिकता। फिर च्युत क्या हुआ मानव-धर्म ही न! जीवन यदि प्रकृति की देन है तो उसके प्रति उत्तरदायित्व का निर्वाह और प्रकृति के धन का संरक्षण ही मानव धर्म हो सकता है।

अंत में यह भी याद आ गया –

“सभ्यताएँ जंगलों का अनुसरण करती रही हैं व अपने पीछे रेगिस्तान छोड़ जाती हैं ।”