Tuesday, February 21, 2017

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बनारस के प्रकाशन पुरुष: कृष्णचन्द्र बेरी

httpwww.flickr.comphotosjoyoflife83203133 बनारस के प्रकाशन-संस्थानों में ‘हिन्दी प्रचारक संस्थान‘ का एक विशेष महत्व है। महत्व मेरी दृष्टि में इसलिये है कि इस संस्थान ने मेरी पठन-रुचि को तुष्ट करने में बड़ी भूमिका निभायी है। मेरे जैसे सामान्य आर्थिक पृष्ठ्भूमि के अध्येता और पाठक के लिये पुस्तकों के अतिशय मूल्य के कारण अपनी पुस्तक-रुचि के बलिदान के अलावा कोई चारा नहीं था। ऐसे समय में जब मेरी अध्येता-वृत्ति अनेकानेक पुस्तकों का पारायण चाहती थी, पुस्तकें खरीद कर पढ़ना असम्भव लगता था। कई प्रकाशकों के सूची-पत्र मंगा लिये थे, केवल कम मूल्य की पुस्तकों की खोज के क्रम में। इसी प्रक्रिया में हिन्दी प्रचारक संस्थान के सूची-पत्र ने आकृष्ट किया। कम मूल्य की पुस्तकें और उपयोगी और मूल्यवान पुस्तकें साफ ही दिख गयीं मुझे। अनेकों किताबें धीरे-धीरे मंगा कर पढ़ लीं और पुस्तक-पठन की प्रक्रिया ने गति पकड़ ली।
आज इस प्रकाशन-संस्थान के संस्थापक श्री कृष्णचन्द्र बेरी का जन्म-दिवस है। कृष्णचन्द्र बेरी केवल बनारस की पत्रकारिता और प्रकाशन व्यवसाय के शलाका-पुरुष ही नहीं थे, अपितु पूरे भारतीय प्रकाशन जगत में उनका स्थान अन्यतम है। चालीस से भी अधिक पुस्तकों के लेखक तथा विभिन्न गोष्ठियों में पढ़े गये १०० से अधिक प्रबंधों के प्रणेता श्री बेरी ने अपनी बाल्यावस्था से ही संघर्षशीलता और कर्तव्य-भावना से हिन्दी प्रकाशन और पुस्तक-व्यवसाय में अपनी सर्वतोमुखी प्रतिभा का परिचय दे दिया। हिन्दी प्रचारक संस्थान की ’प्रचारक बुक-क्लब’ और ’प्रचारक ग्रंथावली परियोजना’ जैसी योजनाओं का प्रारंभ कर उन्होंने एक नए युग का सूत्रपात किया।
श्री कृष्णचन्द्र बेरी का जन्म काशी मे १० मार्च १९२० को हुआ। बचपन से ही आप पिता श्री निहालचन्द्र बेरी के पुस्तक व्यवसाय से जुड गये। विद्यासागर कालेज तथा स्काटिश चर्च कालेज, कलकत्ता में एक मेधावी छात्र के रूप में आप सदैव उच्च श्रेणी में उत्तीर्ण होते रहे, किंतु सामाजिक और राष्ट्रीय संघर्ष के विघ्न ने स्नातक की शिक्षा पूरी न होने दी। पुस्तक व्यवसाय के सिलसिले में सोलह वर्ष की आयु में आपने मलाया, बर्मा, पूर्वी बंगाल आदि अनेक स्थानों की यात्रा की। १६ वर्ष की उम्र में ही बंगाल छात्र फेडरेशन के बड़ा बाजार शाखा के मंत्री बने। भारतीय स्वंतंत्रता संग्राम के प्रसंग में नेता जी सुबास चन्द्र बोस के सम्पर्क में आये।
सोलहवें वर्ष में ही हिटलर की आत्मकथा ’मेनकांम्फ’ का पहला हिन्दी अनुवाद ’मेरा जीवन संग्राम’ नाम से प्रस्तुत किया। प्रकाशक, लेखक और सम्पादक तीनों ही रूपों में आप प्रसिद्ध हैं। चार बार ’अखिल भारतीय हिन्दी प्रकाशक संघ’ के अध्यक्ष रह चुके बेरी जी को आपके वृहद कार्यों के फलस्वरूप इंडियन इन्स्टिट्यूट आफ पब्लिशिंग की ओर से १९९१ में ’हाल आफ फ़ेम’, फेडरेशन आफ इंडियन पब्लिशर की ओर से ’श्रेष्ठ प्रकाशक पुरस्कार’, नागरी प्रचारणी सभा-काशी द्वारा ’प्रकाशक शिरोमणि’ अलंकरण दिया गया है।
इसके अतिरिक्त भारतीय दलित साहित्य अकादेमी, हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग, अ०भा० भोजपुरी परिषद आदि संस्थाओं ने आपको सम्मानित किया। आपका विशिष्ट ग्रंथ ’पुस्तक प्रकाशन: संदर्भ और दृष्टि’ और आपकी आत्मकथा ’प्रकाशकनामा’ हिन्दी प्रकाशन पर प्रकाश डालती महत्वपूर्ण कृतियां हैं।

कहानी कैसे बनी (कर्तार सिंह दुग्गल के जन्म दिवस पर)

कहानी कैसे बनी

पिताजी की संग्रहित की हुई अनेकों किताबों में एक है ‘कहानी कैसे बनी’। उसे महीनों पहले पढ़ना शुरु किया था। कुल आठ कहानियों की यह किताब मुझे अविश्वसनीय रचनाधर्मिता का उदाहरण लगी। मैंने इसे पूरा का पूरा पढ़ तो लिया पर उसका कथ्य, उसकी बनावट, उसका रचनात्मक कौशल– सब अन्तर में मथता रहा। आज अचानक उसकी चर्चा कर रहा हूं, क्योंकि आज उस कहानी की किताब के अप्रतिम सर्जक का जन्म-दिवस है।

‘कहानी कैसे बनी’ पुस्तक की पहली रचना के नाम पर ही पुस्तक का नामकरण है। मैंने सुना था कि कहानी कैसे बनी दुग्गल जी की एक विशिष्ट कहानी है, पर इसको पढ़ने के बाद मैं इसे कहानी नहीं समझ पाया क्योंकि पहली ही दृष्टि में यह मुझे अपने रचनात्मक स्वरूप में बहुत कुछ नाट्य-रूप की रचना या रेडियो-नाटक जैसी लगी थी। यद्यपि इसके कथानक का आग्रह बहुत कुछ कहानी जैसा ही लग रहा था। बाद में इस दुविधा का अंत तब हुआ जब एक साक्षात्कार पढ़ा जिसमें स्वयं ‘दुग्गल’ जी इसका रहस्य खोलते हैं और स्पष्ट करते हैं कि उत्कृष्ट अभिव्यक्ति के लिये माध्यम अथवा विधा का कोई बंधन नहीं है-
“हर विषय जिसको मैं हाथ में लेता हूँ वह अपना रूप खुद लेकर आता है। एक बात जो मैं कहना चाहता हूँ, यदि वह कहानी में ही बेहतरीन कही जा सकती है तो वह कहानी का रूप लेकर आती है। बहुत बड़े कैनवस में मैं जो बात कहना चाहता हूँ, उपन्यास बन जाती है। लेकिन एक दफा यह हुआ कि एक चीज़ जो नाटक की शक्ल में आयी थी, मैंने उसे कहानी की शक्ल में लिख लिया। यह इसलिये हुआ कि मेरा एक कहानी संग्रह छ्प रहा था और मेरे प्रकाशक को एक और कहानी की जरूरत थी। मैंने नाटक न लिखकर कहानी लिख डाली। वह कहानी ‘कहानी कैसे बनी’ नाम से छप गई। उसकी चर्चा भी हुई। लेकिन मेरे अंदर एक चुभन ही बनी रही कि मैने उस पात्र के साथ इंसाफ नहीं किया था। आखिर हारकर मैंने उसे नाट्क की भी शक्ल दी।”
Kartar Singh Duggal
Kartar Singh Duggal
Source:www.apnaorg.com

इस कहानी मे जाड़े की एक तूफानी रात में एक स्त्री अपने बेटे के साथ अपने पति की प्रतीक्षा कर रही है। घनघोर वर्षा वाली इस रात में वह एक पथिक को वर्षा थमने तक के लिये अपने घर में आश्रय दे देती है। पथिक एक कहानी लेखक है, और संयोग से स्त्री उसकी कहानियों की मुरीद। अनजाने में मन का साहचर्य निर्मित हो जाता है स्त्री और उस कहानी लेखक में। बातों- बातों में स्त्री के मन का सारा दर्द बह निकलता है। इस प्रवाह का कारण है कहानी लेखक से बातचीत के क्रम में उसके पति का टेलीफोन जिसमें वह यह सूचना देता है कि इस तूफानी रात्रि में वह एक मित्र के यहाँ रुक गया है और घर न आ सकेगा। स्त्री जानती है कि यह एक बहाना है क्योंकि ऐसी अनगिनत रातें प्रतीक्षा करते और अपने बेटे को कहानियाँ गढ़-गढ़ सुनाते बीत गयीं हैं। आज तो उसने टेलीफोन पर उस स्त्री की आवाज भी सुन ली है। स्त्री अपनी व्यथा, अपना दर्द, पति की बेवफाई का दर्द कहानी लेखक से बाँटती है और उससे अपनी पूरी संवेदना की साझेदारी और उसके दर्द की पूरी कथा सुन लेने का आग्रह करती है। इस क्रम में कहानी लेखक उससे बार-बार घर जाने का आग्रह भी करता है पर बाद में भावुकतावश उसे छोड़ कर जा नहीं पाता और पूरी रात रुकने का निश्चय करता है।

जन्म: 01 मार्च,1917-धमियाल, जिला रावलपिंडी (अब पाकिस्तान); मातृभाषा: पंजाबी; शिक्षा: आनर्ज़ (पंजाबी), एम0ए0 (अंग्रेजी); पुरस्कार/सम्मान: साहित्य अकादेमी पुरस्कार(1965), गालिब पुरस्कार (1976), सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार(1981) ; प्रमुख कृतियाँ : कंढ़े-कंढ़े, बन्द दरवाजा, परे मेरे, इक छिट चानन दी, मीलपत्थर, तिलघट, माझा नहीं मोया, हाल मुरीदाँ दा, माँ-प्यो जाये–सरद पूनम दी रात, मन परदेशी, एक सिफर-सिफर, ओह गये साजन, सत्त नाटक,मिट्ठा पानी, इक अक्ख एक नजर, इसके अतिरिक्त लगभग सभी के हिन्दी अनुवाद स्वयं।
वह यहाँ रुक गया है, इसकी सूचना देने के लिये कहानी लेखक अपनी पत्नी को फोन करता है, और लगभग वही बातें दुहराता है जो उस स्त्री के पति ने उस स्त्री से कहीं थीं। स्त्री यह बातें सुन लेती है और फिर एक निश्चय करते हुए कहानी लेखक को धक्का देते हुए घर से बाहर कर देती है, यह कहते हुए कि –
“मेरे साथ अन्याय हुआ। मैं एक और अपनी बहन के साथ अन्याय नहीं होने दूँगी। सब पुरुष एक जैसे होते हैं। लुटती स्त्री है। चले जाइये।” (कहानी कैसे बनी – कर्तार सिंह दुग्गल)
यह कहानी दुग्गल जी के मानवीय सौन्दर्य के सूक्ष्म पारखी होने का प्रमाण देती है। मुझे उन्हीं की कही गयी ये बात इस कहानी के संबंध में बताना मौजूँ लग रहा है कि कला का सम्बंध जीवन से बहुत गहरा होने के नाते वही कहानियाँ जीवित रहती हैं, जिनमें इंसान की महानता को व्यक्त किया गया है। अच्छी कहानी वह है जो अच्छे लोगों का जिक्र करती है, उन लोगों का जो अच्छे हैं, चाहे अच्छे बन चुके हैं, चाहे अच्छे बन रहे हैं।

पत्रगीति और निराला की कविता शिवाजी का पत्र

छायावादी कवियों की नवीन चेतना के प्रसार के परिणामस्वरूप छायावादी रूढ़ि विद्रोही नवीन युग बोध ने इन्हें समस्त रूढ़ि बन्धनों का तिरस्कार कर अपने भावों के संप्रेषण के लिये तथा विचारों के अनुकूल भिन्न-भिन्न प्रकार की नयी काव्य-विधाओं की रचना के लिये वाध्य कर दिया। यही कारण है कि छायावादी काव्य में काव्य-रूप गत वैविध्य मिलता है। परन्तु विविध काव्य-रूपों के होने पर भी छायावाद का अधिकांश प्रगीत-काव्य ही है।

प्रगीत के अनेक भेद-प्रभेद हैं, परन्तु छायावाद में जिन प्रगीति-भेदों में काव्य रचना हुई है, वे निम्नलिखित हैं –
  1. संबोधन-गीति (Ode) 
  2. चतुर्दशपदी (Sonnet
  3. शोक-गीति (Elegy) 
  4. गीत (Song) 
  5. पत्र-गीति (Epistle)
‘निराला’ ने प्रगीति के उपर्युक्त समस्त रूपों में काव्य-सर्जना कर छायावाद का अंचल भरा है, और उसे प्रगीत-काव्य का पर्याय बना दिया है। इनमें पत्र-गीति (Epistle) का विधान छायावादी कवियों में केवल निराला ने ही किया है। ‘निराला की कविता ‘शिवा जी का पत्र’ संभवतः छायावाद ही नहीं, सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ पत्र-गीति है।

प्रगीत रचना की इस विशिष्ट शैली का प्रचलन यूनानी शब्द ‘एपिस्टाले’ से विकसित अंग्रेजी के ‘Epistle’ (एपिसिल) की प्रेरणा से हुआ। ‘एपिसिल’ शब्द किसी व्यक्ति अथवा व्यक्ति-समूह को सम्बोधित कर सचेष्ट एवं गरिमामयी शैली में रचित औपचारिक तथा उपदेशात्मक प्रवृत्ति के पत्र का अंग्रेजी का अभिधान है।” (The Universal English Dictionary : H.C. Wyld – ‘प्रतिमा कृष्णबल’ की ‘छायावाद का काव्यशिल्प’ में उद्धृत )

‘माइकेल मधुसूदन दत्त’ की वीरांगना से प्रेरित होकर हिन्दी में सर्वप्रथम मैथिली शरण गुप्त ने ‘पत्रावली’ की रचना कर इस शैली का शुभारंभ किया। सम्पूर्ण छायावाद में केवल दो ही पत्रगीतियाँ रची गयीं, और दोनों ही निराला ने रचीं। ये हैं – ‘शिवा जी का पत्र’ और ‘हिन्दी के सुमनों के प्रति’।

‘शिवा जी का पत्र’ रचना का उल्लेख आवश्यक इसलिये भी है कि यह कविता निराला के सांस्कृतिक चिंतन और उनकी राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति है। आज भी जब हमारे देश में विदेशी शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हुए, देश के इतिहास के प्रति निरपेक्ष रहने वाले मनीषी बुद्धिजीवियों की कमी नहीं है, यह बताने के लिये कि स्वपक्ष के सर्वनाश के लिये उद्यत होना कलंक रूप है, निराला की यह कविता ‘शिवाजी का पत्र’ अत्यन्त प्रासंगिक हो जाती है।

व्यक्ति-व्यक्ति के क्षुद्रतर स्वार्थ से उपजे संघर्ष मूलक अविश्वास ने ही भारत की सुसंगठित एकता को छिन्न-भिन्न कर दिया है। यदि यही होता रहा तो निश्चय ही परम्परार्जित जीवनी-शक्ति का पारस्परिक विरोध में ही सर्वनाश हो जायेगा और फ़िर कौन रोक सकेगा देश में वाह्य प्रभुत्व की स्थापना। क्या कह रहीं हैं ‘निराला’ की यह पंक्तियाँ –

“करो कुछ विचार
तुम देखो वस्त्रों की ओर
सराबोर किसके खून से ये हुए ?”

इस कविता की सामयिक इतिहास और हिन्दू चेतना की पृष्ठभूमि बड़ी सुदृढ़, सुघर है, परंतु उसकी ओजस्विता और वीरता की आँच नयी राष्ट्रीय चेतना ही है, जो निराला के कण्ठ से निकलकर ललकार बन जाती है –

“हैं जो बहादुर समर के,
वे मर कर भी
माता को बचायेंगे।
शत्रुओं के खून से
धो सके यदि एक भी तुम माँ का दाग
कितना अनुराग देशवासियों का पाओगे ! –
निर्जर हो जाओगे –
अमर कहलाओगे।”

इस प्रसंग में ‘निराला’ चेतावनी देते हैं जो इस युग में भी चरितार्थ होती है । यह पंक्तियाँ ही क्या पर्याप्त नहींं सब कुछ अभिव्यक्त कर देने के लिये –

“व्यक्तिगत भेद ने
छीन ली हमारी शक्ति ।
कर्षण-विकर्षण-भाव
जारी रहेगा यदि
इसी तरह आपस में,
नीचों के साथ यदि
उच्च जातियों की घृणा
द्वंद्व, कलह, वैमनस्य
क्षुद्र उर्मियों की तरह
टक्करें लेते रहे तो
निश्चय है,
वेग उन तरंगों का
और घट जायेगा –
क्षुद्र से क्षुद्रतर होकर मिट जायेंगी;
चंचलता शांत होगी,
स्वप्न सा विलीन हो जायेगा अस्तित्व सब
दूसरी ही कोई तरंग फ़ैलेगी ।”

किस-किसका दूर करूँगा मैं, संदेह यहाँ जन-जन के (‘बच्चन’ के जन्म दिवस पर)

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मधुशाला व बच्चन पर फतवे की आंच अभी धीमी नहीं पड़ी होगी। ‘बच्चन’ होते तो ऐसे फतवों के लिए कह डालते –

“मैं देख चुका जा मस्जिद में झुक-झुक मोमिन पढ़ते नमाज,
पर अपनी इस मधुशाला में पीता दीवानों का समाज ;
वह पुण्य कृत्या , यह पाप करमा, कह भी दूँ, तो दूँ क्या सबूत ;
कब कंचन मस्जिद पर बरसा, कब मदिरालय पर गिरी गाज ?
यह चिर अनादि से प्रश्न उठा मैं आज करूंगा क्या निर्णय ।
मिटटी का तन, मस्ती का मन, क्षण भर जीवन मेरा परिचय!”

यह ‘क्षण भर जीवन’ अपनी ‘क्षणता’ में विराटता का असीम सम्मोहन रखता है। निरंतर गतिशील संसृति में ‘क्षण’ की गहरी अनुभूति विराट के स्वरुप में रूपांतरित हो जाती है। हरिवंश राय बच्चन की कविता ने न जाने कितने गवाक्ष झांके हैं, न जाने कितने फतवों का सामना किया है, न जाने कैसे कैसे आरोप झेले है? फ़िर भी यह कविता- गीतात्मक कविता- कहीं ठहर नहीं गयी, सबको समझाती गयी-
“तीर पर कैसे रुकूं मैं, आज लहरों पर निमंत्रण।”
बच्चन हिन्दी कविता में नया रंग लेकर आए, गीतकार कवि के रूप में जनसाधारण के प्रिय बने, कवि सम्मेलनों से गीत को ऊंचाई दी और खादी बोली कविता को एक नया आयाम दे डाला। कविता छायावादी कल्पना के इन्द्रधनुषी आवरण को चीरकर जनसामान्य के बीच आ खड़ी हुई। कविता की सहज, सीधी सरल भाषा में जीवन और यौवन का उद्दाम आवेग भर गया । ‘बच्चन के गीत लोकप्रिय, आरोपित व विवादित भी हुए। उन्हें ‘शराब’ और शराबी का हितचिन्तक मान लिया गया।
पर यही तो साहित्य की ‘खेचरी मुद्रा’ है जो बच्चन के काव्य में प्रकट होती है। बच्चन की कविता संवेदना और अभिव्यक्ति दोनों दृष्टियों से कई मोडों से गुजरती है- कभीं छायावाद की रंगरची हो जाती है, कभीं निराशा व अवसाद के संकेत ग्रहण कराने लगती है, कभीं लोक-धुन की मनहर रागिनी से रागदीप्त हो जाती है तो कभीं युग की संपूर्ण चेतना को अंगीकृत करती मालूम पड़ती है। बच्चन ख़ुद स्वीकारते हैं –
“जहाँ खडा था कल उस थल पर आज नहीं
कल इसी जगह फ़िर पाना मुझको मुश्किल है “

हरिवंश राय बच्चन

'Madhushala hardcover edition'
‘Bachchan’ (Photo credit: Wikipedia)

जन्म- २७ नवम्बर, १९०७ – इलाहाबाद । मातृभाषा- हिन्दी । शिक्षा- एम० ए० (इलाहाबाद), पीएच० डी०(कैम्ब्रिज)। व्यवसाय- प्राध्यापक, अंग्रेजी विभाग, इलाहाबाद वि०वि०, इलाहाबाद -१९४१-५२ व १९५४-५५; हिन्दी प्रोड्यूसर, आकाशवाणी, विशेषाधिकारी (हिन्दी), विदेश मंत्रालय – १९५५-५६ । पुरस्कार-सम्मान – पद्मभूषण, विद्यावाचस्पति, साहित्य अकादमी पुरस्कार, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार आदि । प्रमुख रचनाएं – मधुशाला, मधुकलश, निशा- निमंत्रण, एकांत संगीत, आकुल अन्तर , सतरंगिनी, प्रणय पत्रिका, त्रिभंगिमा, कटती प्रतिमाओं की आवाज, जाल समेटा ; क्या भूलूँ क्या याद करूँ, नीड़ का निर्माण फ़िर, बसेरे से दूर, दशद्वार से सोपान तक; प्रवास की डायरी, डब्ल्यू० बी० ईट्स एंड ओकल्टिज्म आदि ।

आज बच्चन का जन्म दिवस है। आज के दिन कवि ‘बच्चन’ खूब याद आ रहे हैं एक ऐसे कवि के रूप में जिसने अतिबौद्धिकता के भ्रम जाल को तोड़कर जीवन के यथार्थ को भावना से संपृक्त किया, जिसने ह्रदय की संवेदनशीलता को स्वर दिया और जिसने अनुभूति और अभिव्यक्ति के मणिकांचन संयोग से कविता की शक्ति को नए रूप में परिभाषित करने की कोशिश की । बच्चन की यही कविता अगर संदेह के घेरे में आ जाय, फतवेबाजी का शिकार हो जाय तो बच्चन तो यही कहेंगे –

“किस-किसका दूर करूंगा मैं
संदेह यहाँ हैं जन-जन के । “

नामवर सिंह को समझते हुए

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बताना जरूरी है कि नामवर सिंह के व्यक्तित्व-कृतित्व की ऊँचाई मुझ जैसे अल्पज्ञानी से काफी अधिक बैठती है। काफी तैयारी से लिख कर बोला था, वही लिख रहा हूँ -इस आशा से कि यदि पढ़ें इसे आप तो मुझे संज्ञान दें –

“हिन्दी समीक्षा का सौभाग्य है कि श्री नामवर सिंह जी जैसी मनीषा उसकी मंजूषा की धरोहर है। Genius और Talent का एकत्र अद्भुत संयोग। विरल होता है ऐसा व्यक्तित्व। “Genius means a transcendent capacity for taking trouble.”(Carlyle) और Meredith की माने तो “Genius does what it must and talent does what it can.” श्री नामवर जी ऐसी ही विवेचनात्मक प्रतिभा के धनी हैं। नामवर की विवेचनात्मक प्रतिभा दृष्टि पर ज्यादा जोर देती है, दृष्टिकोण पर नहीं। गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा आयोजित पुनश्चर्या पाठ्यक्रम के अवसर पर उद्घाटन भाषण देते हुए नामवर जी स्पष्ट करते हैं- “दृष्टिकोण में कोण के बजाय मैं दृष्टि पर ज्यादा जोर देता हूँ, क्योंकि दृष्टि की एक चीज है। दृष्टि में आंसू भी आ गए, आँखें लाल भी होती हैं। साहित्य की क्षमता ही है, जो देखने का काम नहीं करती, बल्कि आँख जिससे नम भी होती है, और क्योंकि अनुभव भी ह्रदय से सराहा जाता है, भाव-अनुभूति, इन्द्रिय बोध से सत्य जाकर के – साहित्य का संयोजन बनता है।”(प्रगतिशील वसुधा, अप्रैल-जून 2005)।

नामवर पर आरोप हैं कि वह इतिहास के पन्नों पर अपना नाम लिखवा लेना चाहते हैं। इसलिए वह इतिहास की बनी बनाई मान्यताओं को पुनर्विश्लेषित करते हैं। पर क्या नामवर इतिहास के न्याय से परिचित नहीं? खूब परिचित हैं। वे जानते हैं कि यह समय सब कुछ को नष्ट किए जाने को देखते रहने का नहीं है, बचे हुए को बचाने का भी है। इतिहास कि थाती स्वयं अपनी छाती खोले खड़ी है। रत्न खोजता नहीं, खोजा जाता है- “न रत्नमन्विष्यति मृग्यते हि तत् “। इतिहास के द्वार पर जी हजूरी करना उनके लिए तो रवींद्र के शब्दों में वैसा ही है जैसे “The bird thinks it is the act of kindness to give the fish a lift in the air .”

श्री काशीनाथ सिंह से नामवर जी की वार्ता पढ़ी है।
काशीनाथ जी ने पूछा- “हर शिखर पर हैं आप उपलब्धि के । वह क्या है जो नहीं मिला है?
उनका उत्तर था- “समाधीस्थ चित्त की वह दशा जिसमें मनोवांछित की रचना सम्भव होती है।
“किनके आगे आप का सिर झुकता है?” “ज्ञानवृद्ध के”।
” कोई ऐसा वाद विवाद या संवाद, जिसमे बदला लेने या सबक सिखाने का भाव मन में रहा हो?”
“बदला किससे? सबक किसको? जो भी आरोप व्यक्तिगत लगा अनदेखा किया। वाद-विवाद-संवाद उन्हीं से किया जो बराबर के हैं या कुछ बड़े हैं। सहयोगी प्रयास के तहत। यहाँ तक कि ‘दस्ते अदू ‘ के साथ भी, फैज के अंदाज में ‘सलूक जिससे किया मैंने आशिकाना किया। “

ऐसा व्यक्तित्व इतिहास की कोठरी में कैद होने को बेचैन नहीं है। यह हमारे पास आता है, आप के पास जाता है, इतिहास के पास नहीं-

“दिले वहशी को ख्वाहिश है तुम्हारे दर पै आने की
दीवाना हो वो लेकिन बात कहता है ठिकाने की।”

अभी बस इतना ही।
Photo Source: Website of Vani Prakashan

मानवीय संवेदना के रचनाकार हजारी प्रसाद द्विवेदी

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मानवीय संवेदना के रचनाकार हजारी प्रसाद द्विवेदी

ऋग्वेद में वर्णन आया है: ‘शिक्षा पथस्य गातुवित’, मार्ग जानने वाले, मार्ग ढूढ़ने वाले और मार्ग दिखाने वाले- ऐसे तीन प्रकार के लोग होते हैं। साहित्यिकों की गणना इस त्रिविध वर्ग में होती है। सबसे अधिक योग्यता मैं उनकी मानता हूॅं जो मार्ग ढूढ़ने वाले होते हैं, जो नये मार्ग खोजते हैं, बहुत हिम्मत से आगे बढ़ते जाते हैं। हजारी प्रसाद द्विवेदी जी मानव संवेदना की अटवी में कुछ ऐसे ही मार्ग-संधानकर्त्ता की पृष्ठभूमि रचने वाले साहित्यकार हैं जहॉं है सब के केन्द्र के मनुष्य, उसका संघर्ष, उसकी जिजीविषा और ‘मानव तुम सबसे सुन्दरतम’ की अप्रतिहत आस्था। ‘अशोक के फूल’ की ये पंक्तियॉं द्विवेदी जी के मानवीय संवेदना के चितेरे होने का प्रतिफलन ही तो हैं –

“समूची मनुष्यता जिससे लाभान्वित हो, एक जाति दूसरी जाति से घृणा न करके प्रेम करे, एक समूह दूसरे समूह को दूर रखने की इच्छा न करके पास लाने का प्रयत्न करे, कोई किसी का आश्रित न हो, कोई किसी से वंचित न हो। इस महान उद्देश्य से ही हमारा साहित्य प्रणोदित होना चाहिये।”

मानव संवेदनाओं के सहभागी के रूप में, उसके चितेरे साहित्यकार के रूप मेें हजारी प्रसाद द्विवेदी यह उद्घोषित करते हुये दीखते हैं कि जीवन किस प्रकार का है, यह हमें नहीं देखना चाहिये। जहॉं उत्तम जीवन है, वहीं उत्तम विचार संभव है -यह तो सामान्य नियम हुआ । लेकिन किसी कारण अन्दर अन्दर एक चिन्तन प्रवाह होता है, तद्नुसार वाह्य का जीवन नहीं बनता। फिर भी अन्तर में परम रमणीय उन्नत विचार हो सकते हैं। दुनियॉं में सब कुछ कार्य-कारण के नियम से चलता, तो भगवान को कोई तकलीफ नहीं देनी पड़ती। आरोग्यवान शरीर में आरोग्यवान मन हो, इस सामान्य नियम के लिये असंख्य अपवाद हुये हैं और होंगे। द्विवेदी जी संसार में बरतने वाले सामान्य जनों के लिये अत्यंत प्रेम रखकर, चित्त में उनके लिये पक्षपात रखकर सर्वोत्तम साहित्य का सृजन करने वाले कालजयी रचनाकार हैं -उनमें मानवीय संवेदना के लिये विकारों से परिपूर्ण निर्लिप्तता है। उनमें बुखार के प्रति हमदर्दी दिखाने वाले वैद्य का लक्षण है। बुखार को ठीक पहचान कर उसके निवारण के लिये दवा भी बताते हैं –

“डरना किसी से भी नहीं। लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं, गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं।” “जो मेरा सत्य है वह यदि वस्तुतः सत्य है, तो वह सारे जगत का सत्य है, व्यवहार का सत्य है, परमार्थ का सत्य है -त्रिकाल का सत्य है।”
“देख बाबा, इस ब्रह्माण्ड का प्रत्येक अणु देवता है, त्रिपुर सुन्दरी ने जिस रूप में तुझे सबसे अधिक प्रभावित किया है, उसी की पूजा कर।” (बाणभट्ट की आत्मकथा)

Hazari-Prasad-Dwivediश्री रामदरश मिश्र  ने कहा है-“आखिर सर्जना है क्या? वह मनुष्य के भावों, संवेदनाओं और विचारों की एक कलात्मक अन्विति है। लेकिन पंडित जी की सर्जना यहीं रुकती नहीं, वे इससे बड़ी सर्जना करते हैं- वह है मानवीय जिजीविषा, विश्वास और मूल्यों की सर्जना। उनके शोध भी, उनकी आलोचना भी, उनके उपन्यास भी, उनके निबंध भी, उनके भाषण भी, उनकी बातचीत भी, उनका व्यवहार भी उसी मनुष्य की खोज और सृष्टि करते हैं जो गतिशील है, जो अपनी अपार जिजीविषा को लिये हुये इतिहास की दुर्गम घाटियॉं पार करता आ रहा है।……वे मानव धर्म की स्थापना मनुष्य के आदर्शो का सरलीकरण करके नहीं करते, उसे उसके द्वंद्व में देखते हैं। मनुष्य के भीतर पशु और देवता का द्वंद्व चलता रहता है, चलता आ रहा है। उसके भीतर की प्राकृतिक पशुता बार-बार सिर उठाती है किन्तु उसका अर्जित देवत्व बार-बार उसे नीचे -ढकेलता है। नाखून पशुता की निशानी हैं। नाखून बार-बार बढ़ते हैं, मनुष्य बार-बार उन्हें काटता है। वह नहीं चाहता कि उसकी पशुता उसपर हावी हो जाय। नाखून के बढ़ने और काटने का संघर्ष लगातार चला आ रहा है और पंडित जी विश्वास व्यक्त करते हैं कि कमबख्त नाखून बढ़ते हैं तो बढ़ें, मनुष्य एक दिन इन्हें काटकर ही रहेगा।’’

द्विवेदी जी मानवीय संवेदना के ‘भावानुभावव्यभिचारीभावसंयोगात्रसनिष्पत्तिः’ के स्वयंसिद्ध रसवादी साहित्यकार हैं –“There is always a difference between an eager man wanting to read a book and a tired man wanting a book to read.” हजारी प्रसाद जी समय को आक्रांत करते हैं, समय काटते नहीं। मानव संवेदना की किताब का इतना उत्सुक वाचक हिन्दी साहित्य में तो दुर्लभ ही है, विश्व साहित्य में भी शायद विरला ही मिले। उनके साहित्य में वस्तुनिष्ठा है, जीवन निष्ठा है और साथ-साथ लोकनिष्ठा है। द्विवेदी जी मानवीय संवेदना को समेटे हुये जब मनुष्य और सृष्टि का स्पर्श करते हैं तो जड़ वस्तु जड़ नहीं रह जाती और मनुष्य निरीह प्राणी नहीं रह जाता-

“जीना चाहते हो? कठोर पाषाण को भेदकर, पाताल की छाती चीरकर अपना भोग्य संग्रह करो; वायुमण्डल को चूसकर, झंझा-तूफान को रगड़कर, अपना प्राप्य वसूल लो; आकाश को चूमकर अवकाश की लहरी में -झूमकर उल्लास खींच लो।” कुटज का यही उपदेश है-

भित्वा पाषाणपिठरं छित्वा प्राभंजनीं व्यथाम्
पीत्वा पातालपानीयं कुटजश्र्चुम्बते नभः।

दुरन्त जीवन-शक्ति है! कठिन उपदेश है। जीना भी एक कला है। लेकिन कला ही नहीं, तपस्या है। जियो तो प्राण डाल दो जिन्दगी में, मन ढाल दो जीवनरस के उपकरणों में।’’यह एक अनूठी कला है, एक निराली रसिकता है, जिसे हजारी प्रसाद जी ने आत्मसात किया। ‘मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है’ में यह कहते हुये कि ‘साहित्य केवल बुद्धि विलास नहीं है, वह जीवन की उपेक्षा करके नहीं रह सकता’, उन्होंने यह संवेदित कर दिया है –
“साहित्य के उपासक अपने पैर के नीचे की मिट्टी की उपेक्षा नहीं कर सकते। हम सारे बाह्य जगत् को असुन्दर छोड़कर सौन्दर्य की सृष्टि नहीं कर सकते। सुन्दरता सामंजस्य का नाम है। जिस दुनिया में छोटाई और बड़ाई में, धनी और निर्धन में, ज्ञानी और अज्ञानी में आकाश-पाताल का अंतर हो, वह दुनिया बाह्य सामंजस्यमय नहीं कही जा सकती और इसीलिये वह सुन्दर भी नहीं है। इस बाह्य असुन्दरता के ’ढूह’ में खड़े होकर आन्तरिक सौन्दर्य की उपासना नहीं हो सकती। हमें उस बाह्य असौन्दर्य को देखना ही पड़ेगा। निरन्न, निर्वसन जनता के बीच खड़े होकर आप परियों के सौन्दर्य-लोक की कल्पना नहीं कर सकते। साहित्य सुन्दर का उपासक है, इसीलिये साहित्यिक को असामंजस्य को दूर करने का प्रयत्न पहले करना होगा, अशिक्षा और कुशिक्षा से लड़ना होगा, भय और ग्लानि से लड़ना होगा। सौन्दर्य और असौन्दर्य का कोई समझौता नहीं हो सकता। सत्य अपना पूरा मूल्य चाहता है। उसे पाने का सीधा और एकमात्र रास्ता उसकी कीमत चुका देना ही है। इसके अतिरिक्त कोई दूसरा रास्ता नहीं है।’’
द्विवेदी जी ‘फ्रायड’ के Homo-Psycologicus (मनःप्रधान मानव) को नहीं जानते। वे ‘मार्क्स’ के Homo-Economicus (अर्थस्य पुरुषोदास) को नहीं पहचानते। वे बुद्धिवादियों के Homo-Shapian (बुद्धिप्रधान मानव) से भी वाकिफ नहीं हैं। वे एक सामान्य समन्वित मानव की सावित इन्सान की जिन्दगी का जायका पहचानते हैं। उनका रचनाकार जिजीविषा में मशगूल है और यही उनकी मानवीय संवेदना की यथार्थ वैज्ञानिकता है। द्विवेदी जी अपनी रचना में जीवन की सुगंध का अनुभव करना चाहते हैं, जीवन की प्रतिष्ठा देखना चाहते हैं। उपनिषद का अभिवचन है –“अन्नमयं हियोम्यमनः आपोमयाः प्राणाः तेजोमय वाक्।” मनुष्य का तेज उसकी वाणी में प्रकट होता है। वह तेज हृदय की भावना से आता है, जीवन की प्रतीतियोें से उत्पन्न होता है। ये प्रतीतियॉं जितनी व्यापक और उदात्त होंगी, उनका आशय जितना भव्य और सुन्दर होगा, उतना सुमांगल्य और सौमनस्य सिद्ध होगा। ‘श्री विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जी’ ने लिखा है कि –

“जिन लोगों ने द्विवेदी जी को भाषण देते हुये देखा होगा उन्होंने खुद उनके व्यक्तित्व में भी इस छटपटाहट को जरूर लक्ष्य किया होेगा।……मनुष्य द्विवेदी जी की दृष्टि में चित् का स्फुरण है। इस मनुष्य में उनकी आस्था कभी खंडित नहीं होती। वे मनुष्य की जय-यात्रा में अखंड विश्वास रखते हैं।” मानवीय संवेदना के इस चितेरे को उस साहित्य को साहित्य कहने में ही संकोच होता है ‘जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गतिहीनता, परमुखापेक्षिता से न बचा सके, जो उसकी आत्मा को तेजोदीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुखकातर और संवेदनशील न बना सके।’’

जैनेन्द्र कुमार ने कहा है कि, “मुझको सूझता है कि साहित्य वह है, जिसमें हित सत् के साथ है। ‘हित’ के साथ जो ‘स’ लगा है, उसे सत् का प्रतीक हम मान लें। सत् और हित इन दोनों को साथ रखना बड़ी कला है। साहित्य की और शायद जीवन की कला वही है।’’ द्विवेदी जी ने मानवीय संवेदना के प्रस्तुतीकरण में सच में ही ‘सत्’ को ‘हित’ के साथ बनाये रखा है, और यह भाव अनन्त काल तक हमें संवेदित करता रहेगा, क्योंकि साहित्य तो कभीं असमर्थ हुआ नहीं है, हो नहीं सकता। जीवन निष्ठा और साहित्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी में एकरूप हो गये हैं। मानवीय संवेदना की चित्त में जो गहरी अनुभूति हुयी है, वह भाषा में सुन्दर रूप लेकर अपनी नित्यता को प्रतिष्ठित करना चाहती है। श्री नामवर जी ने इस तथ्य को बड़ी सदाशयता से स्वीकार किया है –
“प्रसाद जी की श्रद्धा ने तो अपनी स्मिति रेखा से ज्ञान, इच्छा और क्रिया के त्रिपुर को ही आकाश में एकजुट किया था, द्विवेदीजी की सर्जनात्मक कल्पना तो जाने कितनी असम्बद्ध वस्तुओं को एक सूत्र में बॉंधती चलती है।’’……‘‘आशय यह है कि वे ‘कोई तैयार सत्य उठाकर हमारे हाथ पर नहीं धरते।’’ जो कुछ भी है वह अपना अनुभूत सत्य। गहरी पीड़ा के बीच से निकले कुछ अनुभव-कण। और ऐसे चमकते हुए कण द्विवेदीजी के निबंधों में यत्र-तत्र-सर्वत्र बिखरे पड़े हैं – कहीं फूलों के ढेर में और कहीं धूल या राख की राशि में।’’(हजारी प्रसाद द्विवेदीःसंकलित निबंध: भूमिका)

निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि श्री हजारी प्रसाद द्विवेदी उस कोटि के रचनाकार हैं जिन्होंने आगत विगत अनागत मानव की संवेदना के हार में गुंथे पुष्पों को अपनी स्वकीय जीवनानुभूति का रस दिया है। ‘विचार-प्रवाह’ के ‘मानव-सत्य’ शीर्षक निबंध में उन्होंने लिखा है –

“जिस काव्य या नाटक या उपन्यास के पढ़ने से मनुष्य में अपने छोटे संकीर्ण स्वार्थों के बन्धन से मुक्त होने की प्रेरणा नहीं मिलती तथा ‘महान एक’ की अनुभूति के साथ अपने-आपको दलित द्राक्षा के समान निचोड़ कर ‘सर्वस्य मूलनिषेचनं’ के प्रति तीव्र आकांक्षा नहीं जाग उठती, वह काव्य और वह नाट्य और वह उपन्यास दो कौड़ी के मोल का भी नहीं है।’’

‘चारु-चन्द्रलेख’ में उन्होंने अक्षोभ्य भैरव से कहलवाया है –“देख रे, अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्र हर समय साथ-साथ नहीं चलते। देवी के चरणों में सिर रखकर शपथ कर कि तू सीधे जनता से सम्पर्क रखेगा, किसी को छोटा और किसी को बड़ा नहीं मानेगा, धरती को बपौती नहीं धरोहर सम-हजयेगा, सामन्ती प्रथा का उच्छेद करेगा। ऐसा करके ही तू वीर विक्रमादित्य की परम्परा का उत्तराधिकारी होगा।’’

निश्चय ही श्री हजारी प्रसाद द्विवेदी मानव संवेदना के अप्रतिम स्रष्टा हैैं, जैसा कवि चण्डीदास ने दुहराया –
“शुनह मानुषभाइ
सबार ऊपरे मानुष सत्य
ताहार ऊपरे नाइ।”