Tuesday, February 21, 2017

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पत्रगीति और निराला की कविता शिवाजी का पत्र

छायावादी कवियों की नवीन चेतना के प्रसार के परिणामस्वरूप छायावादी रूढ़ि विद्रोही नवीन युग बोध ने इन्हें समस्त रूढ़ि बन्धनों का तिरस्कार कर अपने भावों के संप्रेषण के लिये तथा विचारों के अनुकूल भिन्न-भिन्न प्रकार की नयी काव्य-विधाओं की रचना के लिये वाध्य कर दिया। यही कारण है कि छायावादी काव्य में काव्य-रूप गत वैविध्य मिलता है। परन्तु विविध काव्य-रूपों के होने पर भी छायावाद का अधिकांश प्रगीत-काव्य ही है।

प्रगीत के अनेक भेद-प्रभेद हैं, परन्तु छायावाद में जिन प्रगीति-भेदों में काव्य रचना हुई है, वे निम्नलिखित हैं –
  1. संबोधन-गीति (Ode) 
  2. चतुर्दशपदी (Sonnet
  3. शोक-गीति (Elegy) 
  4. गीत (Song) 
  5. पत्र-गीति (Epistle)
‘निराला’ ने प्रगीति के उपर्युक्त समस्त रूपों में काव्य-सर्जना कर छायावाद का अंचल भरा है, और उसे प्रगीत-काव्य का पर्याय बना दिया है। इनमें पत्र-गीति (Epistle) का विधान छायावादी कवियों में केवल निराला ने ही किया है। ‘निराला की कविता ‘शिवा जी का पत्र’ संभवतः छायावाद ही नहीं, सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ पत्र-गीति है।

प्रगीत रचना की इस विशिष्ट शैली का प्रचलन यूनानी शब्द ‘एपिस्टाले’ से विकसित अंग्रेजी के ‘Epistle’ (एपिसिल) की प्रेरणा से हुआ। ‘एपिसिल’ शब्द किसी व्यक्ति अथवा व्यक्ति-समूह को सम्बोधित कर सचेष्ट एवं गरिमामयी शैली में रचित औपचारिक तथा उपदेशात्मक प्रवृत्ति के पत्र का अंग्रेजी का अभिधान है।” (The Universal English Dictionary : H.C. Wyld – ‘प्रतिमा कृष्णबल’ की ‘छायावाद का काव्यशिल्प’ में उद्धृत )

‘माइकेल मधुसूदन दत्त’ की वीरांगना से प्रेरित होकर हिन्दी में सर्वप्रथम मैथिली शरण गुप्त ने ‘पत्रावली’ की रचना कर इस शैली का शुभारंभ किया। सम्पूर्ण छायावाद में केवल दो ही पत्रगीतियाँ रची गयीं, और दोनों ही निराला ने रचीं। ये हैं – ‘शिवा जी का पत्र’ और ‘हिन्दी के सुमनों के प्रति’।

‘शिवा जी का पत्र’ रचना का उल्लेख आवश्यक इसलिये भी है कि यह कविता निराला के सांस्कृतिक चिंतन और उनकी राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति है। आज भी जब हमारे देश में विदेशी शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हुए, देश के इतिहास के प्रति निरपेक्ष रहने वाले मनीषी बुद्धिजीवियों की कमी नहीं है, यह बताने के लिये कि स्वपक्ष के सर्वनाश के लिये उद्यत होना कलंक रूप है, निराला की यह कविता ‘शिवाजी का पत्र’ अत्यन्त प्रासंगिक हो जाती है।

व्यक्ति-व्यक्ति के क्षुद्रतर स्वार्थ से उपजे संघर्ष मूलक अविश्वास ने ही भारत की सुसंगठित एकता को छिन्न-भिन्न कर दिया है। यदि यही होता रहा तो निश्चय ही परम्परार्जित जीवनी-शक्ति का पारस्परिक विरोध में ही सर्वनाश हो जायेगा और फ़िर कौन रोक सकेगा देश में वाह्य प्रभुत्व की स्थापना। क्या कह रहीं हैं ‘निराला’ की यह पंक्तियाँ –

“करो कुछ विचार
तुम देखो वस्त्रों की ओर
सराबोर किसके खून से ये हुए ?”

इस कविता की सामयिक इतिहास और हिन्दू चेतना की पृष्ठभूमि बड़ी सुदृढ़, सुघर है, परंतु उसकी ओजस्विता और वीरता की आँच नयी राष्ट्रीय चेतना ही है, जो निराला के कण्ठ से निकलकर ललकार बन जाती है –

“हैं जो बहादुर समर के,
वे मर कर भी
माता को बचायेंगे।
शत्रुओं के खून से
धो सके यदि एक भी तुम माँ का दाग
कितना अनुराग देशवासियों का पाओगे ! –
निर्जर हो जाओगे –
अमर कहलाओगे।”

इस प्रसंग में ‘निराला’ चेतावनी देते हैं जो इस युग में भी चरितार्थ होती है । यह पंक्तियाँ ही क्या पर्याप्त नहींं सब कुछ अभिव्यक्त कर देने के लिये –

“व्यक्तिगत भेद ने
छीन ली हमारी शक्ति ।
कर्षण-विकर्षण-भाव
जारी रहेगा यदि
इसी तरह आपस में,
नीचों के साथ यदि
उच्च जातियों की घृणा
द्वंद्व, कलह, वैमनस्य
क्षुद्र उर्मियों की तरह
टक्करें लेते रहे तो
निश्चय है,
वेग उन तरंगों का
और घट जायेगा –
क्षुद्र से क्षुद्रतर होकर मिट जायेंगी;
चंचलता शांत होगी,
स्वप्न सा विलीन हो जायेगा अस्तित्व सब
दूसरी ही कोई तरंग फ़ैलेगी ।”

माँ तुम गंगाजल होती हो

अभी-अभी पूजा उपाध्याय जी के ब्लॉग से लौट रहा हूँ। एक कविता पढ़ी- माँ के लिए लिखी गयी। मन सम्मोहित हो गया। पूजा जी की कविता से जेहन में एक कविता की स्मृति तैर गयी। छुटपन में बाबूजी ने पढ़ने को दी थी। कविता ‘जयकृष्ण राय तुषार’ नाम के किसी कवि की है। चाहता था इसे पूजा जी के ब्लॉग पर ही कमेन्ट के तौर पर दूँ, पर कमेन्ट के बड़े हो जाने का भय था। इसीलिये इसे प्रस्तुत कर रहा हूँ। इसे पढ़िये पर इसके पहले यहाँ से होकर आइये।

मेरी यादों में खोयी अक्सर तुम पागल होती हो
माँ तुम गंगाजल होती हो ।

सबका अभिनन्दन करती हो, लेकर अक्षत, चंदन, रोली
मन में सौ पीड़ाएं लेकर, सदा बांटती हंसी ठिठोली
जब-जब हम लयगति से भटकें, तब-तब तुम मांदल होती हो।

जीवन भर दुःख के पहाड़ पर, तुम पीती आंसू के सागर
फ़िर भी महकती फूलों-सा, मन का सूना-सा संवत्सर
मन के दरवाजे पर दस्तक देती तुम सांकल होती हो ।

व्रत,उत्सव,मेले की गणना कभी न तुम भूला करती हो
संबंधों की डोर पकड़कर, आजीवन झूला करती हो
तुम कार्तिक की धुली चाँदनी से ज्यादा निर्मल होती हो ।

पल-पल जगती सी आँखों में मेरी खातिर स्वप्न सजाती
अपनी उमर हमें देने को मन्दिर में घंटियाँ बजाती
जब-जब ये आँखें धुंधलाती तब-तब तुम काजल होती हो ।

हम तो नहीं भगीरथ जैसे कैसे सिर से कर्ज उतारें
तुम तो ख़ुद ही गंगाजल हो तुमको हम किस जल से तारें
तुम पर फूल चढाएं कैसे, तुम तो स्वयं कमल होती हो ।

——-‘जयकृष्ण राय तुषार’