Tuesday, February 21, 2017

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Articles on various subjects.

सम्पूर्ण प्रविष्टियों की सूची

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मलहवा बाबा फिर आ गये …

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ढोलक  टुनटुनाते हुए, इस वर्ष भी गाते हुए बाबा आ गये । हमने कई बार अपना ठिकाना बदला- दो चार किराये के घर, फिर अपना निजी घर; बहुतों की संवेदना बदली- पर बाबा आते रहे । मैं उन्हें मलहवा बाबा  (मल्लाह बाबा ) कहता रहा – बहुत बचपन में नहीं , दसवीं में पढ़ते वक्त से । मलहवा बाबा बेरोकटोक आते रहे-मेरे दरवाजे, क्रमशः मेरी संवेदना, मेरे अन्तर्मन की दहलीज पर ।
मलहवा बाबा भिखारी हैं – मेरी बहन (मुझसे काफी छोटी ) मुझे समझाती – इंगिति, इतना भी क्या राग ?  बाबूजी मुझे उत्सुक करते कि मलहवा बाबा से उनके गीत सुन आऊं और फिर उन्हें सुनाऊँ । वर्ष में बस एक बार एक दिन के लिये भीख माँगते मलहवा बाबा, ढोलक टुनटुनाते मलहवा बाबा, मछुआरे का गीत गाते मलहवा बाबा – मेरे आत्मीय औत्सुक्य के केन्द्र थे । मैंने पूछा था एक बार – ये एक दिन की भीख से पूरा साल कैसे खा लेते हैं आप ? हँसे – ” गंगा मईया कऽ परताप हऽ बचवाऽ । अधेल्ला में पूरा जीवन बीत जाई । गंगा माई हईं,  हँसत मुसकियात जीवन भर रखिहैं।” बाद में बताया बाबा ने – कि यह तो जीवनदायिनी गंगा मईया की वार्षिक पूजा (मल्लाहों/मछुआरों द्वारा की जाने वाली ) का एक उपक्रम मात्र है । मलहवा बाबा ने गंगा की पार उतराई से अपने दोनों बेटों को पढ़ा लिखा कर अफसर बना दिया है । उन्हें धन-धान्य की कमी नहीं । बेटे रोकते हैं उन्हें गली-गली फिरते, गाते-बजाते भीख माँगने के लिये । पर बाबा हैं कि गंगा मईया सर चढ़ जाती हैं उनके – बेटों की हवेली छोड़ अपनी मड़ई में अपनी नाव के साथ गंगा जी के पास दौड़े चले आते हैं । ढोलक उठाते हैं, माँगने निकल पड़ते हैं गंगा मईया के पूजन के निमित्त ( शायद परंपरा हो कि भीख माँगकर पूजना चाहिये ) ।
तो बाबा इस बार भी आ गये । रिकॉर्ड करने के लिये कमजोर मोबाइल ही थी – आपके सम्मुख है बाबा का गाया पार-उतराई का गीत । मछुआरे का एक रानी को पार उतारने के पूर्व का संवाद ।

कठवा में काटि के नइया बनवली हो कि गंगा जी ।

हमरो नइया परवा उतरबा हो कि गंगा जी ।
आज के रइनियाँ रानी बसो मोरे नगरिया हो कि गंगा जी ।
होत भोरवैं परवा उतरबे हो कि गंगा जी ।
[रानी ! काठ को काट-काट कर अपनी नाव बनायी है मैंने, अपनी इसी नाव पर मैं तुम्हें उस पार उतार दूँगा । पर, आज तो ठहर जाओ यहीं- मेरे नगर । ज्यों ही भोर होगी तुम्हें उस पार पहुँचा दूँगा ।]
मरि न जाबे केवटवा भुखिया पियसिया हो कि गंगा जी ।
मरि जइबे जड़वा अस पलवा हो कि गंगा जी ।
आज तूँ का खियइबा केंवटवा हमरी भोजनियाँ हो कि गंगा जी ।
काऽ हो देबा ओढ़ना डसवनाँ हो कि गंगा जी ।
[केवट ! यहाँ कैसे ठहर जाऊं ? भूख-प्यास से मर न जाऊँगी ! ठंड और पाला भी तो ऐसा कि जान न बचेगी । और खाउँगी क्या ? (यहाँ है ही क्या ? मैं ठहरी रानी !), और सोऊँगी कैसे ? ओढ़ने-बिछाने के लिये क्या दोगे ?]
दिनवाँ खियाइब रानी रोहू जल मछरिया हो कि गंगा जी ।
रतिया के ओढ़ाइब महाजलिया हो कि गंगा जी ।
[रानी ! दिन में तो रोहू मछली खिलाऊँगा-भूख मिट जायेगी ; और रात को ओढ़ाने को मेरी मछली का जाल तो है ना ! ]
एक तऽ करुवासन केंवटवा रोहू तोर मछरिया हो कि गंगा जी ।
दुसरे करुवासन महाजलिया हो कि गंगा जी ।
[केवट ! कैसे खाउँगी मैं रोहू मछली ? वह तो कड़वी है । और तुम्हारा जाल ओढ़कर भी न सो सकूँगी – वह भी तो  अजीब सी गंध देती है ।]
घरवाँ तऽ रोअत होइहैं गोदी के बलकवा हो कि गंगा जी ।
कैसे बसूँ तोहरि अब नगरिया हो कि गंगा जी ।
[केवट ! मुझे उसे पार ले चलो ! मेरे गोद का बालक घर पर बिलख रहा होगा मेरे लिये । उसे छोड़ कर कैसे ठहर जाऊँ यहाँ ?]
अरे अगिया लगावा रानी गोदी के बलकवा हो कि गंगा जी ।
बस जइबू हमरी अब नगरिया हो कि गंगा जी।
रानी ! आग लगाओ गोद के बालक को । इतना क्या सोचना ! उसे भूल जाओ और यहीं ठहर जाओ ]
अगिया लगइबै केंवटवा रोहू तोर मछरिया हो कि गंगा जी ।
बजर न परैं तोहरे महाजलिया हो कि गंगा जी ।
तोहरे ले सुन्दर केंवटवा घरवाँ मोरा बलमुआ हो कि गंगा जी ।
कचरत होइहैं मगहिया बीड़वा पनवाँ हो कि गंगा जी ।
[केवट ! आग तो लगाउँगी मैं तुम्हारी रोहू मछली को (इसका ही प्रलोभन था न !) । तुम्हारी जाल पर आफत आ जाये ! क्या तुम नहीं जानते ? तुमसे सुन्दर मेरा प्रियतम मुँह में मगही पान दबाये घर पर बैठा मेरी राह देख रहा होगा ।]

तीज पर सुनिये एक झूला गीत..

तीज पर्व पर गाये जाने वाला झूला-गीत सुनिये । अभी अचानक ही यू-ट्यूब पर भ्रमण करते पा गया –

तुम्हारी याद आती है चले आओ, चले आओ (तुलसी जयंती पर तुलसी-स्मरण )

आज तुलसी जयंती है । इन पंक्तियों के साथ इस विराट पुरुष का स्मरण कर रहा हूँ –

अहो, नंदन विपिन की विटप छाया में विराजित कवि
मुरलिका बन्द कर दो छेड़ना अब रुद्र रव लाओ
प्रलय है पल रहा हर घर लगी है आग हर कोने
तुम्हारी याद आती है चले आओ, चले आओ ।

लगा दो फिर अयोध्यानाथ के आ माथ पर चन्दन
यहाँ विध्वंस लीला शीर्ष पर, अब वन न मनसायन
हथेली एक ही कर कीं परस्पर लड़ रहीं, शोणित-
पिपासा में स्वजन रत, कवि रचो अब नवल रामायण ।

नहीं अकबर सही, लेकिन वही श्रावण, वही भारत
तुम्हारा पाञ्चजन्य निनाद स्तंभित क्यों महाबाहो !
विनय की पत्रिका लेकर तुम्हारे पास आया हूँ
हमारी प्राण-वीणा पर बजा लो गान जो चाहो ।

आ पथ दिखला दो सभी कहें अब यहाँ नहीं दख द्वंद्व रहे
तुलसी की जय, तुलसी की जय- यह नारा सदा बुलंद रहे ॥

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तुलसी के विनय के पद उत्कृष्टतम अभिव्यक्ति के उदाहरण हैं । यह भजन सुनें और सप्रेम तुलसी स्मरण करें –

हमसब की हरकतें : सच्ची-सच्ची

डिग (Digg) पर सफर करते हुए उसके आर्ट्स एंड कल्चर (Art & Culture) वर्ग से इस रोचक चित्रावली का लिंक मिला । कल्पनाशीलता और उसके प्रस्तुतिकरण दोनों ने लुभाया । मूल ब्लॉग से साभार, आपके सम्मुख भी ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहा हूँ इन्हें –

 

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जरा कुछ बताइये ना, कितना देखा अपना सच, अपनी हरकत ! 

पाँच पुरुषों की कामिनियाँ

द्रौपदी के पाँच पुरुषों की पत्नी होने पर बहुत पहले से विचार-विमर्श होता रहा है । अनेक प्रकार के रीति-रिवाजों और प्रथाओं का सन्दर्भ लेकर इसकी व्याख्या की जाती रही है । अपने अध्ययन क्रम में मुझे अचानक ही श्री दुर्गा भागवत का यह लघु-लेख मिल गया । पाँच पुरुषों की पत्नी होने की अवस्था में औचक ही एक रहस्य देख लिया है श्री भागवत ने । द्रौपदी को लेकर कुछ ऐसा सोच ही नहीं पाया था मैं, मुझे भी यह विचार कुछ नये से लगे । ‘सारिका’ के 15 अक्टूबर,1985 के अंक से ज्यों का त्यों साभार यह लघु-आलेख प्रस्तुत कर रहा हूँ –

“द्रौपदी के पाँच पति थे । इस विषय में अनेक अध्येताओं ने किसी न किसी प्रदेश अथवा जाति में प्रचलित बहुपतित्व की प्रथा का उल्लेख कर उसकी व्याख्या करने का प्रयास किया है । मुझे उन व्याख्यायों की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती । द्रौपदी का इस अवस्था का जो उल्लेख मात्र संयोगवश महाभारत में आ गया है, उसमें मुझे एक रहस्य दृष्टिगोचर होता है । कहना न होगा कि वह रहस्य भी व्यास ने इंगित भर किया है और बात समाप्त कर दी है । कुंती और द्रौपदी सास-बहू हैं । अर्थात समान वंश के संवर्धन का उत्तरदायित्व उठाये हुए हैं । कुंती अपने वरदान के बल पर देवताओं को कामपूर्ति के लिये बुला सकी थी । परम्परा में एक सूक्ति चलती है – ” द्रौपदी पाँच पुरुषों के लिये काम्य सिद्ध हुई और कुंती भी ।” इस सूक्ति ने, अनजाने, दोनों के मानसिक व दैहिक साधर्म्य का उल्लेख कर दिया है । दोनों के हृदयों की गढ़न इस विषय में एक समान थी । कुंती की नियोजक संतानों के वंश का पालन-पोषण द्रौपदी जैसी एक नारी करती है – यह मात्र संयोग नहीं है, यह एक अनुक्त संकेत है, जिसे व्यास ने इस प्रकार संकेत किया है कि सामान्यतः समझ में नहीं आ सकता; मुझे तो यही लगता है । क्योंकि इस धागे को जरा और ताना होता तो भी कुंती और द्रौपदी के व्यक्तित्व का समग्र सौंदर्य तथा औचित्य विनष्ट हो जाता । इसीलिये व्यास ने कुंती के इर्द-गिर्द सतत दुख के चक्र को चलाया है और दिखाया है कि द्रौपदी इंद्राणी का अंश है । इंद्र अनेक हैं – इंद्राणी एक है – यह पुरातन संकेत है ; द्रौपदी के संदर्भ में व्यास ने कैसी चतुराई से उसका प्रयोग किया है ! पांडव कुंती के बेटे थे इसी कारण उन्हें द्रौपदी के साथ ऐसा समान संबंध स्थापित करना काम्य जान पड़ा, संभव प्रतीत हुआ – यह भी एक सत्य ही है ।”

चित्र : द्रौपदी – राजा रवि वर्मा की पेंटिंग – विकीपीडिया से साभार

आप बतायें मुझे

कल आम खाते हुए मेरी भतीजी ने मुझसे पूछा –

“फलों का राजा तो आम है । फलों की रानी कौन है ? ”

मैं निरुत्तर, जवाब कहाँ ढूँढ़ता – आ गया आपके पास । आप बतायें मुझे ।

’लू शुन’(Lu Xun) ने कहा

“यदि आप एक ही विषय पर काम करते रहें तो अवश्य ही उसके चरम तक जा पहुँचेंगे । इसकी चिंता न करते हुए यदि आप निरंतर उसी विषय से सम्बन्धित नयी-नयी चीजों पर प्रकाश डालते रहें तो लोग समझेंगे कि अपनी हँसी आप स्वयं उड़ा रहे हैं। इसके बावजूद आप निरंतर काम करते रहें और अपने साथ कुछ समर्थकों को भी इकट्ठा कर लें तो जाहिर तौर पर लोग इसे सामान्य रूप में लेने लगेंगे । फिर आप निश्चिंत होकर अपना काम तो करते ही रहेंगे….उसमें पूरी तरह सफल भी हो सकेंगे ।”

सूरज की मृत्यु :एन०वी० कृष्ण वारियर

आज एन०वी० कृष्ण वारियर का जन्मदिवस है। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित एन०वी० कृष्ण वारियर मलयालम साहित्य के बहुप्रतिष्ठित और समादृत कवि-साहित्यकार हैं। हिन्दी में छपे एक साक्षात्कार से इस कवि को पहले पहल जाना, और उसमें छपी इनकी कविताओं के अंशों ने भीतर तक प्रभावित किया मुझे। आज इस कवि का स्मरण करते हुए इनकी कविता “सूरज की मृत्यु” का वही अंश प्रस्तुत आपके लिये भी –

“हमारा सूरज क्षितिज पर उतरता जा रहा था
लेकिन हमारी क्षमा अस्त हो चुकी थी
हमने सूरज को गोली मार कर गिरा दिया
समुन्दर लाल हो गया
पल भर के लिये सिर्फ
फिर वह काला हो गया
आकाश काला हो गया
पृथ्वी काली हो गयी
कालिमा घनी होती रही
अब भी वह घनी होती ही रहती है
सूरज में जो मरा वह क्या था ?
वह हमारी रोशनी थी
हमारी मानवता थी।”

नहीं जानता यह हिन्दी अनुवाद किसने किया पर इस कविता को लिया है डॉ० रणवीर रांग्रा द्वारा लिये गये उनके साक्षात्कार से। अनुवाद शायद रांग्रा जी का ही हो।

जन्म : १३ मई, १९१६ – नेरुविश्शेरि, जिला त्रिचूर (केरल); शिक्षा : साहित्य शिरोमणि, एम०ए० एम० लिट०; पुरस्कार/सम्मान : साहित्य अकादेमी पुरस्कार – १९७९, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार-१९७१ एवं अन्य । प्रमुख कृतियाँ : नीटा कवितगल (१९५१), कुरेक्कुतिनीनता कवितगल (१९५१), कोच्चुतोम्मन (१९५५), गांधीय गौडसेय (१९६७), वल्लतोलिंट काव्य शिल्पं (१९७७), ए हिस्ट्री ऑफ मलयालम मीटर (१९७८), आदि । अन्य : ’मातृभूमि ’ का सम्पादन (१९५०-१९६८), संस्थापक निदेशक : केरल राज्यभाषा संस्थान (१९६८-७५), ’कुंकुम’ साप्ताहिक के मुख्य सम्पादक, इत्यादि ।

नर्गिस की बेनूरी या “गुण ना हेरानो गुणगाहक हेरानो हैं”

इस हिन्दी चिट्ठाकारी में कई अग्रगामी एवं पूर्व-प्रतिष्ठित चिट्ठाकारों की प्रविष्टियाँ सदैव आकृष्ट करती रहतीं हैं कुछ न कुछ लिखने के लिये । मेरे लेखन का सारा कुछ तो इस चिट्ठाजगत के निरन्तर सम्मुख होते दृश्य के साथ निर्मित होता/अनुसरित होता रहा है । कुछ दिनों पहले शिव जी ने एक प्रविष्टि दी । इकबाल के एक शेर के बहाने चिट्ठाजगत में बहुत ही खूबसूरत विमर्श का सामान दे दिया उन्होंने, और क्या कहूँ अरविन्द जी की उस आँख का जो अपनी पुतरी की मनहर गति से कहीं सिमट रहे सम्पुटित अर्थ का लज्जावनत शील भी उघार कर रखने की कामना रखती है !

“हजारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है,
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा’

इकबाल का यह शेर तो सालों से सुनते आये थे पर ठहरे नहीं थे वहाँ । शिव जी के इस शेर को पोस्ट करने के बाद अनूप जी की इसकी रुटीन व्याख्या के बाद अरविन्द जी की टिप्पणी ने एक चिन्तन श्रृंखला दी । आभारी हूँ अभिषेक जी का कि उन्होंने जो दरीचा खोला इस शेर के अर्थ का, उसी ने प्रवृत्त किया कुछ सोचने विचारने के लिये, और अनेकों बार अभिषेक जी की व्याख्या ने ही उंगली थमा सारा चिन्तन क्लेश ही हर लिया । मन उन्मुक्त हुआ और उसने इस शेर के जितने अर्थ-गह्वर खोले आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ । ऋण तो शेष रह ही गया है अभिषेक जी, अनूप जी और अरविन्द जी का ।

“हजारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है,
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा’

इकबाल अपनी इन पंक्तियों में एक ही साथ मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए द्रष्टा और दृश्य दोनों की खबर ले रहे हैं । नर्गिस एक सलोना फूल है । नयनाभिराम तो वह है ही । अपनी खूबसूरती का उसको पता नहीं है । वह एकांत में खिला हुआ वनफूल है । पड़ा है कि कोई उसे पूछ लेता लेकिन बिचारी नर्गिस अपनी ही खूबी से नादान है । उसे यह जानकारी नहीं है कि उसके अन्दर भी खूबसूरती भरी हुई है । वह अपने नूर की दौलत से बेखबर है । रोती रहती है कि मैं नाचीज हूँ । मुझमें कोई न गुण है, न आकर्षण, न गरिमा है, न सुन्दरता । वह हजारों साल से रो रही है कि मैं ऐसी गुणहीन क्यों हुई? यह एक त्रासदी है पूरी मानवता के साथ कि वह अपनी कीमत को जान नहीं पाई । हीरा कचरे में खो गया है । राजा जो सदा सदा का राजा था, अपनी अज्ञानता से रंक बना हुआ है । जो खुद अपना उद्धार नहीं कर सकता, जो अपनी कीमत को स्वयं भूल बैठा है, वह संसार में जगह पाये तो कैसे ? औरों की छोड़ो, वह अपनी निगाह में ही गिर गया है । मुद्दतों बाद कोई आता है और वह कीमती हीरे को पहचानता है । वह हीरे को हीरे की औकात बता देता है । तब वह जान पाता है कि अरे वह कितना गया गुजरा अपने को मान बैठा था ! कोई जागा हुआ न जागे हुए को जगा देता है, तो कीमत समझ में आती है । गुरु ही eye-opener है, वह दीदावर है । ऐसा जानकार जमात में नहीं मिलता । वह हजारों साल बाद आता है और झकझोर देता है इस चेतना के साथ कि जागो ! तुममें भी कुछ है । नर्गिस के साथ कुछ ऐसी ही दुर्घटना हुई है । चमन में वह अपनी बेनूरी पर रो रही है । एक दिन, दो दिन, दस दिन, महीने, दो महीने, साल, दो साल नहीं हजारों साल से उसका रुंआसापन बरकरार है तब कहीं जाकर चमन में कोई दीदावर पैदा होता है, और वह नर्गिस को उसके नर्गिसपना की कीमिया समझा देता है । इकबाल एक आध्यात्मिक शायर हैं, और शायद यह बताना चाहते हैं कि अपने वजूद को पहचानो, रोओ नहीं । तुम सम्राट हो, रंक नहीं । कोई एक यह जानता है और अनजाने को जना देता है । चमन ऐसे ही दीद वाले का तलबगार है । वह यह कहना छुड़ा देता है कि

“मैं हूँ वनफूल / यहाँ मेरा कैसा होना क्या मुरझाना -/ जैसे आया वैसे जाना ।”

दूसरी ओर इकबाल यह दिखाना चाहते हैं कि “गुण ना हेरानो गुणगाहक हेरानो हैं” । सुन्दरता, आकर्षण, नूर, वैभव और सम्पन्नता कहाँ नहीं है ? लेकिन आँख रहे तब तो दिखायी दे । नर्गिस माथा पीट-पीट कर हजारों साल से रो रही है कि मेरे इस चमन में अंधे ही फेरी लगा रहे हैं । मैं तरस रही हूँ कि कोई जान पाता कि मुझमें क्या है, लेकिन नर्गिस की नेकनीयती, उसके नूर से सभी दूर-दूर ही हैं । किसी को भरपूर नूर का जलवा दिखायी नहीं पड़ता – ” अंधहिं अंधहिं ठेलिया, दोनों कूप पड़ंत ।” यह शेर इशारा कर रहा है कि आँख वाले बनो । द्रष्टा बनो तो पगे पगे नर्गिस अपनी खूबसूरती, अपना नूर समेटे तुम्हारे चरणों में बिछ जायेगी । कितना खूबसूरत है यह कहनाकि

” चमन में जा के तब होता है कोई दीदावर पैदा ।”

अपनी नूर पर इठलाती हुई और फिर भी रोती हुई नर्गिस की कितनी जिन्दगी गुजर गयी । यह अविद्या माया है जो ज्ञानियों को भी मोहित किये रहती है । लोग नर्गिस का नूर नहीं पहचानते । हजारों साल बाद किसी की आँख खुलती है और तब वह ’अस्ति’ (It is) को स्वीकार कर पाता है नहीं तो ’भाति’ (It seems) में ही बझा रहता है ।

अतः इकबाल इस शेर में देखने वाले का अज्ञान और दिखायी देने वाले का ज्ञान दोनों को ही विवेचित करते हैं ।