Tuesday, February 21, 2017

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मैं क्या हूँ? जानना इतना आसान भी तो नहीं

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अपनी कस्बाई संस्कृति में हर शाम बिजली न आने तक छत पर लेटता हूँ। अपने इस लघु जीवन की एकरस-चर्या में आकाश देख ही नहीं पाता शायद अवकाश लेकर। और फिर आकाश को भी खिड़कियों से क्या देखना। तो शाम होते ही, अंधेरा गहराते ही कमरे में बिखरी इन्वर्टर की रोशनी अपने मन में सहेज छत की ओर रुख करता हूँ। चटाई बिछाकर लेट जाता हूँ। तत्क्षण ही छत पर बिखरी निस्तब्धता पास आकर सिर सहलाने लगती है, आँखें कुछ मुँद सी जाती हैं। फिर तो झूम-झूम कर सम्मुख होती हैं अनगिनत स्मृतियाँ, कुछ धुँधली तस्वीरें, और………न जाने किसकी सुधि जो कसकती है अन्तर में, व्यथित करती है।

मुक्ताकाश के नीचे इस लघु शयन में एक स्वर बार-बार प्रतिध्वनित होता है इस एकाकी अन्तर में। मन का निर्वेद पिघलने लगता है। स्वर के पीछे छिपी असंख्य संभावनाओं का चेतस भाव मन को कँपाने लगता है। मैं अचानक ही अपने को ढूँढने लगता हूँ, अपने अस्तित्व की तलाश में लग जाता हूँ।

इस मुक्ताकाश के नीचे मैं स्वयं को प्रबोध देते हुए पूछ्ता हूँ स्वयं से- मैं क्या हूँ?- क्या सुनहली उषा में जो खो गया, वह तुहिन बिन्दु या बीत गयी जो तपती दुपहरी उसी का विचलित पल; या फिर जो धुँधुरा गयी है शाम अभी-अभी उसी की उदास छाया?

मैं क्या हूँ?- जो सम्मुख हो रही है इस अन्तर-आँगन में वही ध्वनि, या किसी सुदूर बहने वाली किसी निर्झर-नदी का अस्पष्ट नाद?

मैं क्या हूँ?- बार-बार कानों में जाने अनजाने गूँज उठने वाली किसी दूरागत संगीत की मूर्छित लरी या फिर जिस आकाश को निरख रहा हूँ लगातार, उस आकाश का एक तारा?

मैं क्या हूँ?- जानना इतना आसान भी तो नहीं!

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सब कुछ ने मन का चैन हर लिया है

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कुछ पाने, न पाने की बेचैनी, जीवन की शान्ति और अन्तर्भूत आनन्द को पाने की छटपटाहट में कई बार मन उद्विग्न हो जाया करता है। अपना आन्तर जीवन तनाव और बेचैनी का जीवन महसूस होता है, जो पीड़ित है, असुरक्षित है। आसपास देखता हूं- सब कुछ आगे बढ़ रहा है- द्रुतगति से। मनुष्य को महत्व देने वाली अनेक उपलब्धियां मनुष्य ने प्राप्त कर ली है। सब कुछ व्याख्या, तर्क, बुद्धि के आश्रय में खो गया है- मैं भी अपनी इसी एकतान बुद्धिगामी अवस्था में मदमाता फिर रहा हूं। बहुत कुछ प्राप्ति की इच्छा, या कुछ अपने हिसाब से घटता जाय इसकी अपेक्षा- सब कुछ ने मन का चैन हर लिया है।

बार-बार यही लगता है कि मनुष्य के दुख और उसके निरानन्द के अनेक कारणों में से सम्भवतः एक कारण है उसकी यह इच्छा कि वस्तुओं को उसके मन के अनुसार ही घटित होना चाहिये, और जब ऐसा नहीं होता तो पीड़ा अपना सर उठा लेती है। ऐसे कठिनतम क्षणों में कई बार दार्शनिक ’एपिक्टेटस’(Epictetus) के यह शब्द प्रबोध देते जान पड़े हैं, समझाते हुए मिले हैं-

“उन चीजों की ओर मत देखो, जिन्हें तुम अपनी चाह के अनुसार घटित होने देना चाहते हो, बल्कि चाहो कि वस्तुएं वैसे ही घटित हों, जैसी वे हैं, और तब तुम जीवन के प्रशान्त प्रवाह का अनुभव करोगे।”

सबका पेट भरे

एक महात्मा हैं, उनके पास जाता रहता हूँ। महात्मा से मेरा मतलब उस गैरिकवस्त्र-धारी महात्मा से नहीं, जिनके भ्रम में इस पूरी दुनियाँ का निश्छल मन छला जाता है। महात्मा से मेरा अर्थ महनीय आत्मा से है। बात-बात में उन्होंने कहा- “बेटा, खिलाने वाला बन।” अभीं कुछ समझ भी नहीं पाया था कि उन्होंने फ़िर आत्मीयता से कहा- “मन छोटा नहीं है इसलिये थोड़े में नहीं होता।” 

बाद में उसका रहस्य स्पष्ट हुआ। उन्होंने अपरिग्रह और उत्सर्ग को जीवन-मंत्र बताया था। लगे हाथ उन्होंने एक कहानी कही थी। दानव ब्रह्मा से झगड़ रहे थे कि आपने देवताओं का हमेशा पक्ष लिया है और हमारी उपेक्षा की है, जबकि हम सभी आपके पैदा किये हैं। काफी उलझन में डाला उन्होंने और ब्रह्मा जी ने दूसरे दिन एक टेस्ट लेने के लिये दोनों दलों को बुलाया। दोनों के सम्मुख स्वादिष्ट भोजन परोसा गया। खाने के समय ब्रह्मा जी ने कहा, “एक शर्त है। हाँथ खाते समय मुड़ने न पाये।” दानव अपने मुँह में स्वादिष्ट पकवान लम्बे हाथों से फ़ेंकते रहे और वह गिर कर बेकार होता गया। वे भूखे रह गये। देवता पंक्ति में बैठे अपने बगल वाले के मुँह में कौर डाल देते, और उनके बगल वाला उनके मुंह में। इस तरह उनका पेट भर गया।
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दूसरों को देने वाला स्वयं पा जाता है। स्वयं का पेट भरने का यत्न तो कीट पतंगे तक करते हैं। आदमी की आदमीयत किसमें है?  मुझे सार्वभौम मानवता का पाठ मिल गया कि सबका पेट भरे, इसकी सनक सवार होनी चाहिये। एक रोटी में भी आधी रोटी किसी की हथेली रख कर मिल बाँट कर खा लिया तो मन संतुष्ट हो जाय, किसी की प्यास बुझा दी तो अपनी प्यास बुझ जाय, यह भाव ही तो मनुष्यता की पहचान है।  ‘शेक्सपियर’ ने ऐसी मानव-हृदय की पिघलन को देवता का धन कहा है-
“It blesseth him that gives and
him that takes ;
It is mightiest in the mightiest :……
It is an attribute to God himself.”
मन विशाल हो तो दानवी वृत्ति का विनाश होता है ।

चौथी शरण की खोज

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’बच्चन’ का एक प्रश्न-चिह्न मस्तिष्क में कौंध रहा है, उत्तर की खोज है –

“भूत केवल जल्पना है
औ’ भविष्यत कल्पना है
वर्तमान लकीर भ्रम की
और क्या चौथी शरण भी ?
स्वप्न भी छल जागरण भी।”

वह चौथी शरण क्या है ? उत्तर की तलाश में ’विनोबा’ की बात याद में उतर आयी –

“गीता के आधार पर अकेला मनुष्य सारी दुनियाँ का मुकाबला कर सकता है।”

लगा ‘चौथी शरण’ का समाधान हो गया। वह ‘आदमी’ ही है चौथी शरण। अखंड निर्लिप्त कर्मयोगी ‘मनुष्य’ ही भूत-भविष्य एवं तथाकथित भ्रमित वर्तमान की अर्गला तोड़ सकता है। कर्मयोग में न प्रसन्नता है न द्वेष। न विकर्म है, न अकर्म। न फलाकांक्षा है, न परिग्रह। वह चौथी शरण मानव स्वयं में स्वयं का उद्धारक है। कृष्ण के “कर्मण्येवाधिकारस्ते’ में निःसन्देह उसी ‘चौथी शरण’ का ही मंडन है और भूत, भविष्य, वर्तमान के जल्पना, कल्पना और भ्रम का खंडन। गीता ने समस्या हल कर दी।

भोगवादियों के अनुसार हम न तो वर्तमान को मात्र यथार्थ मानते हैं और न वैरागियों की तरह उसको स्वप्नवत मानते हैं। हम उसको कर्मभूमि मानते हैं क्योंकि वह हमें व्यक्ति-निर्माण करने के अपने अधिकार को किसी मूल्य पर छोड़ने नहीं देती। वस्तुतः भविष्य होता ही नहीं। निर्माण एवं सृजन की भावभूमि वाली कर्मकुशलता हमें योगी बनाती है और यही योग ही हमारी चौथी शरण है-

“योगः कर्मसु कौशलम् “

हम तो अस्तित्ववादियों की भाँति जीवन को क्षणवादी भी नहीं मानते, क्योंकि वह क्षण-क्षण करके हमें जीवन की समग्रता प्रदान करने वाला होता है। हमारी चाह है, कर्मफल की आशा का दंश न झेलते हुए निरंतर कर्म में लगे रहने की। फल तो आनुषंगिक है। इसी लिये जीवन का सूत्र ‘चौथी शरण’ कृष्ण ने बता दिया-

“तस्मात् योगी भवार्जुनः”।

पर क्या अर्जुन को ही …………।

तुम भी उबर गये पथरीली राह से

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तुम अब कालेज कभी नहीं आओगे। तुम अब इस सड़क, उस नुक्कड़, वहाँ की दुकान पर भी नहीं दिखोगे। तुम छोड़ कर यह भीड़ कहीं गहरे एकान्त में चले गये हो। पता नहीं वह सुदूर क्षेत्र कैसा है? अन्धकारमय या सर्वत्र प्रकाशित?

तुम कल तक मेरी कक्षा के विद्यार्थी थे, वही तीसरी बेंच पर बैठे हुए। टुक-टुक देखते, निहारते भर आँख मुझे- अब तुम वहाँ नहीं रहोगे। मेरे कहे गये हर एक शब्द को अपनी जीभ से चखते, स्वादते, तृप्त होते मैं देखता था तुम्हें। मैं निरखता था कि मेरा कहा एक-एक शब्द तुम्हारी आत्मा की थाती बन जाता था।
मैं साहित्य पढ़ाता था तुम्हें। तुम्हें ही क्यों, पूरी कक्षा को। पर बार-बार तुम ही खयाल में क्यों आ रहे हो? क्योंकि तुमने मेरी कही बातें सच मान लीं। कमबख्त साहित्य भी प्रेम, सौन्दर्य, श्रृंगार की चाकरी करता है कक्षाओं में, पाठ्यक्रमों में। कविता पढ़ाते वक्त देखता था तुम्हें – तुम्हारी अनुभूतियों के प्रत्यक्षीकरण के साथ। भावजगत की जितनी स्वतंत्रता मेरी कविता का कवि लेता उससे कहीं ज्यादा स्वतंत्र तुम अपनी अनुभूतियों में हो जाया करते थे। तुम्हारी तल्लीनता मुझे भी तल्लीन कर देती थी। पर अब तुम नहीं रहोगे मेरे एक एक शब्द को पीने के लिये, फ़िर कहीं ठहर न जाय मेरा यह शब्द-प्रवाह।

मैं क्या जानता था कि इतना गम्भीर हो जाते हो तुम इस भाव-यात्रा में। कविता की रहनुमाई का जीवन गढ़ लिया है तुमने – नहीं पता था। मैने उस दिन कविताओं का अर्थ बताते, प्रेम में स्व-विसर्जन की भूमिका तुम्हारे ही लिये गढ़ी थी, नहीं जानता था। काश समझ पाता कि ‘जियेंगे तो साथ, मरेंगे तो साथ’ का सूत्र-सत्य बहुत गहराई से आत्मसात कर लिया था तुमने उस दिन।

तुमने क्यों नहीं समझा कि साहित्य मनुष्य के सौन्दर्यबोध, कर्म और विचार का समुच्चय है। ज्ञान, क्रिया और ईच्छा की त्रिवेणी साहित्य में ऐसा संगम निर्मित करती है जिसे जीवन कहा जा सकता है। मैं शायद समझा न सका तुम्हें कि केवल भाव-भावना जीवन का निर्माण नहीं करती। कर्म और भाव दोनों मिलकर मानव-जीवन का निर्माण करते हैं।

मेरे साहित्य के विद्यार्थी! जीवन का ऐसा निषेध? साहित्य का तो उद्देश्य ही है व्यक्ति-चेतना का रूपायन और व्यष्टि का उन्नयन। इससे प्रभावित, निर्मित होता है जीवन और फ़िर बनती है जीवन के प्रति आकांक्षा। यह जीवन समाज का प्रतिरोध भी हो सकता है और प्रस्ताव भी। मेरे प्यारे! तुम जान नहीं सके कि अनुकूलता या विपरीतता उतनी महत्वपूर्ण नहीं जितनी यह कि जीवन में श्रद्धा-भाव की स्वीकृति हो।

कल अखबार में पढ़ा, तुम इस जीवन से विरम गये। पकड़कर उसका हाथ, जिससे साथ जीने-मरने की कसमें खायीं थीं, रेल की पटरी पर मुँह-अँधेरे ही सो गये थे तुम। फ़िर ट्रेन आयी, गुजर गयी। तुम दोनों भी उबर गये पथरीली राह से।

अब न अरमान हैं न सपने हैं

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“ऐसी मँहगाई है कि चेहरा ही
बेंच कर अपना खा गया कोई।
अब न अरमान हैं न सपने हैं
सब कबूतर उड़ा गया कोई।”

एक झोला हाँथ में लटकाये करीब खाली ही जेब लिये बाजार में घूम रहा हूं। चाह स्याह हो रही है। देख रहा हूँ, मँहगाई की मार से बेहाल हुई जिन्दगी बेढंगी चाल चलने लगी है। मुनाफ़ाखोरी की हवा खोरी-खोरी चक्रमण करने लगी है। अब तो “साँकरी गली में मोहिं काँकरी गरतु है।”

एक रामराज्य की बात सुनी थी, एक आम राज्य की बात देख रहा हूँ। ‘सुराज’ और ‘स्वराज’ की ‘इति श्री रेवाखण्डे’ की सत्यनारायणी कथा का पंचमोध्याय चल रहा है। चूरन लेने में ही कथा को संपूरन करके शंख बजा दी जा रही है। बाबा तुलसी ने ‘सुराज’ के लिये एक अर्थ दिया – “सुखी प्रजा जिमि पाइ सुराजा”, और एक दिया- “जिमि सुराज खल उद्यम गयऊ।” दूसरे अर्थ को उजागर करता हुआ ‘सुराज’ खल राज हो गया। सामान्य जन खा तो ले रहा है, भोजन कहाँ कर पा रहा है। यथार्थ और आदर्श के द्वन्द्व युद्ध में यथार्थ चढ़ बैठा है । सोचता हूँ, ऐसी यथार्थता में मेरे जिले का नक्सलवादी पूत जन्म ले ले तो कैसा आश्चर्य?

अंग्रेजी कवि कीट्स ने नाइटिंगल का गीत सुनकर आह्लादित हृदय से कहा था –

“Still let me sleep embracing clouds invain
And never wake to feel the days disdain.”

फ़िर झट ही कीट्स ऐसे ही तिलमिला गया होगा, और कह उठा –

“Fancy, Thou cheat me.”

मन अजीब हो गया है। जहाँ देखता हूँ आग लगी है। हर माह देखता हूँ, मिट्टी का तेल लेने की लाइन में टिन लेकर खड़ा होता है, मेरे कस्बे का किशोर; धक्का-मुक्की में सिर फ़ट जाता है। इसी भाग्य को लेकर कमोबेश नौजवानी ठोकर खा रही है। वोट की राजनीति, कोट की किरिच और नोट की फ़ितरत में एक व्यूह रचना कर दी गयी है। इसमें सातवें फ़ाटक पर ही सही, अभिमन्यु मारा जायेगा ही। कोई राह निकलनी चाहिये –

“यही रात मेरी, यही रात उनकी,
कहीं बढ़ गयी है,कहीं घट गयी है।”

कर स्वयं हर गीत का शृंगार

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Spirituality
दूसरों के अनुभव जान लेना भी व्यक्ति के लिये अनुभव है। कल एक अनुभवी आप्त पुरुष से चर्चा चली। सामने रामावतार त्यागी का एक गीत था। प्रश्न था- वास्तविकता है क्या?
“वस्तुतः, तत्वतः, यथार्थः अपने को जान लेना ही अध्यात्म है, और यही वास्तविकता है,” उसने गम्भीर स्वर में मुझे प्रबोध दिया।
बात ही बात में बात और बढ़ती गयी। उधर से एक बात कलेजे में घुस गयी और एक बात सहजता से समझा दी गयी –
“सर्व-सर्वत्र जागरण’। होश सम्हालो।सब की सहज स्वीकृति ईश्वर के प्रसाद के रूप में सिर माथे लगाओ। बैठो नहीं, बढ़ो तो।

“रोक सका संकल्पबली को कौन आज तक बोल / अमृत सुत! सोच दृगंचल खोल।”

वस्तुस्थिति को तह पर तह सजा कर रखता गया वह। बोला, “लम्बे होते नारियल के पेड़ों को छाया की अनुपयोगिता में नहीं, आकाशभेदक साहस के सौन्दर्य में समझना होता है। आकाश बुलाया नहीं जाता बाहों में भरने के लिये । सिर्फ़ बाहें फ़ैलानी काफ़ी होती हैं। वह उनमें भरा होता है।”

“चाँदी की उर्वशी न कर दे युग के तप-संयम को खंडित
भर कर आग अंक में मुझको सारी रात जागना होगा।”

“इसलिये तेरे सूने आंगन में दुख़ भी मेहमान बन कर आये तो उसे ईश्वर से कम मत समझना। अपने किसी भी आंसू को व्यर्थ मत मानना। समुद्र उसको माँगने पता नहीं कब तेरे दरवाजे आ जाय।”

तब से बार-बार इन पंक्तियों का फ़ेरा मेरे स्मृति-पटल पर हो रहा है-

“पास प्यासे के कुँआ आता नहीं है
यह कहावत है, अमर वाणी नहीं है,
और जिसके पास देने को न कुछ भी
एक भी ऐसा यहाँ प्राणी नहीं है।
कर स्वयं हर गीत का शृंगार
जाने देवता को कौन-सा भा जाय।” ——’रामावतार त्यागी’

किसने बाँसुरी बजायी

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जरा और मृत्यु के भय से यौवन के फ़ूल कब खिलने का समय टाल बैठे हैं? जीवित जल जाने के भय से पतंग की दीपशिखा पर जल जाने की जिजीविषा कब क्षीण हुई है? क्या कोयल अपने कंठ का मधुर राग बिखेरना मेढकों के कटु शब्द से विक्षिप्त होकर छोड़ देती है? शायद नही। जीवन का यह दृष्टिकोण समझ आ रहा है कि विषय नहीं, विषय का विनिवेश ही आप्लावित करता है। तृप्त-अतृप्त आकांक्षाओं से मुक्त गहरे आनन्द का चिरन्तन प्रकाश है यह जीवन। तीर की चाह पीड़ा का स्रोत है। जीवन की उत्ताल तरंगें किसी तट से नहीं टकराती।

कई बार जिससे मैं समझता हूं कि मेरा कोई रिश्ता-नाता नहीं, उसकी चिरपरिचित पुकार का आकर्षण मन में सुगन्ध की तरह खिलता है और मैं बेचैन यहाँ-वहाँ घूमता रहता हूं। जरूर मेरे और उसके बीच कोई अन्दर ही अन्दर प्रवाहित होने वाली नदी बहती है। मैं भले ही धूप-छाँव के खेल में उलझा हूँ, लेकिन वह पुकारता है तो पुकारता ही चला जाता है। लाख चाहता हूं भरम जाऊँ, कहूँ-कोई नहीं, कुछ भी नहीं, कोई बात नहीं। पर हृदय का एक कोना कह ही देता है –

“किसने बाँसुरी बजायी
जनम-जनम की पहचानी यह तान कहाँ से आयी?”

कैसे मुक्ति हो?

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बंधन और मोक्ष कहीं आकाश से नहीं टपकते। वे हमारे स्वयं के ही सृजन हैं। देखता हूं जिन्दगी भी क्या रहस्य है। जब से जीवन मिला है आदमी को, तब से एक अज्ञात क्रियाशीलता उसे नचाये जा रही है। अभी क्षण भर का हास्य देखते-देखते विषाद के गहन अन्धकार में डूब जाता है। जहाँ वचन की विद्ग्धता और स्नेहसिक्त मधुमय वाणी का प्रवाह था वहीं अवसाद की विकट लीला प्रारंभ हो जाती है। हृदय में जहाँ उल्लास का सिंधु तरंगित होता था, वहीं पीड़ा और पश्चाताप का साम्राज्य स्थापित हो जाता है। भविष्य जिस प्रसन्नता की रंगभूमि बनने की पृष्ठभूमि रच रहा था, वही न जाने क्यों चुभन से भरा हुआ कंटकमय वर्तमान बन जाता है। इस अस्ति और नास्ति के खेल में जूझता व्यक्ति किस घाट का पानी पिये? गजब स्थिति हो गयी है-

“कुछ ऐसी लूट मची जीवन चौराहे पर
खुद को ही खुद लूटने लगा हर सौदागर।”

तो कैसे मुक्ति हो इस अगति से?
खुद के सवाल में खुद ही जवाब हाजिर होता है हमारे सामने। ‘आशावाद परो भव’। आशावाद जिन्दगी का एक बड़ा ही सुहावना सम्बल है। अंधेरे में फ़ंस कर कीमती जिन्दगी को बर्बाद करना बड़ी मूर्खता है। अँधेरा एक रात का मेहमान होता है। फ़िर चमकता सवेरा हाजिर हो जाता है। पतझर के बाद बसंत आता ही है। इसलिये बसंत के पाँवों की आहट जरूर सुननी चाहिये। हमारा अधैर्य हमारी परेशानी है। निराशा का कुहासा फ़टेगा। सूर्य पीछे ही तो बैठा है-

“If winter comes can the spring be far behind?”

रास्ते बन्द नहीं सोचने वालों के लिये

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कविता की दुनियां में रचने-बसने का मन करता है। समय के तकाजे की बात चाहे जो हो, लेकिन पाता हूं कि समय का सिन्धु-तरण साहित्य के जलयान से हो जाता है। साहित्य की जड़ सामाजिक विरासत लिये होती है। शब्दों की जड़ें व्यक्ति के मन के सपनों और स्मृतियों में गहरी जमी होती हैं। इसका परिसर रोने-सुबकने से लेकर अंतःसार एवं मुखर वागविलास तक फ़ैला है। शब्दों का आर्केस्ट्रा वेश्या-बस्ती के मोलभाव से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय कूट्नीति तक फ़ैला है। अच्छी कविता में हर शब्द बोलता है। हर शब्द अनिवार्य और अद्वितीय होता है। मुझे लगता है कि यही माध्यम है जिससे निहायत पैनेपन से बात कही जाती है। शब्द तरह तरह की अनुभुतियों में, भाव-भूषित अनुभूतियों में डूबा होता है। यही शब्द की जादूगरी काम करती है। दूरस्थ तारों के स्वप्न से लेकर मुंह के स्वाद तक यह हर स्थिति की याद करा देती है। हमारी देह, हमारी आत्मा, हमारे स्वप्न, हमारी मृत्यु – सब इसी झोली में समा जाते हैं।
व्यग्रता तो रहती है जरूर कि जो कहा वह शायद पहले ही कहा जा चुका है, और जो कहना चाहता था वह कभीं नहीं कह पाऊंगा । लेकिन एक न एक दिन, कहीं न कहीं सही रूप में अच्छी से अच्छी कविता जन्मेगी, इस आशा के साथ साहित्य का दामन छूटता नहीं। समय के गर्भ से आश्वस्त किया जाता हूं –

“देख यूं वक्त की दहलीज से टकरा के न गिर
रास्ते बन्द नहीं सोचने वालों के लिये ।”