Friday, February 24, 2017

Contemplation

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कह दूँ उसी से..

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सोचता हूं, इतनी व्यस्तता, भाग-दौड़, आपाधापी में कितनी रातें, कितने दिन व्यतीत किये जा रहा हूं। क्या है जो चैन नहीं लेने दे रहा है? कौन सी जरूरत है जो सोने नहीं देती है? कौन-सा मुहूरत है जो अभी मृगजल की तरह अनास्वाद बना है। कुछ प्राप्ति में आनन्द को खोजना चाहता हूं, लेकिन वह झट अप्राप्ति की चादर ओढ़ लेता है। कुछ होने, कुछ पाने की ललक में इसी भांति घुड़दौड़ करते हुए या जो कुछ पाये हुए से दीखते हैं, उनकी बेचैनी भी मैं देख-देख कर बेचैन-सा हुआ जा रहा हूं। क्या बात है?

सहसा कुछ अन्तर्विरोध से मुझे जूझने की भीतरी रोशनी दिखायी देती है। विचार उभरते हैं – ‘जरूरत के बिना गुजरे उसी दिन की जरूरत है’। मेरे मन में शरीर के आराम की और नाम के नाम की इच्छा बड़ी गहराई तक जाग्रत है शायद। इसी से जो मिलना चाहिये, उसका मिलन नहीं हो रहा है। जिस दिन से ये दोष खत्म हो जायेंगे,, उसी दिन वह मिल जायेगा, जो छल रहा है। वह मिल जायेगा जिससे मैं कभी पृथक नहीं रहूंगा। इन दोषों ने बीच में कई दीवालें खड़ी कर रखीं हैं। मुझे तो कुछ होने, कुछ पाने की चाह ने कितनी स्पर्धा, द्वेष, अभिशाप, घृणा, जलन, निन्दा आदि से भर दिया है। इनकी तो गणना भी करनी मुश्किल है। तो जब तक ये लम्बी ऊंची दीवालें हैं, तब तक उस प्राप्ति का आनन्द कैसे मिले?
एक आत्म-प्रबोध बार बार मेरे अन्दर जागृत हो जाता है- “उससे क्यों नहीं कहता मैं, जिसके पाये बिना सब अनपाया रह जाना है। क्या उसकी आवाज अनसुनी कर रहा हूं जिसने कहा है –

“हमारे पास कोई बद्दुआ खोजे न पाओगे
मेरे दिल में किसी के वास्ते नफ़रत रहे तब तो”।

कह दूं उसी से कि इन दीवारों को ढहाने का काम भी तो आप ही को करना है। पहले परख लो मुझे कि इस हृदय में कुछ चाह है कि नहीं, और यह भी देख लो कि इस ‘कुछ’ चाह को असीम बनाने की चाह भी है या नहीं। यदि है तो इसे असीम कर दो ना, मेरे प्रिय!

सदैव सहमति में हिलते सिर

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Spring Toys-Man and Woman
Spring-Toys (Credit: Dolls of India-Art Store)

बहुत वर्षों पहले से एक बूढ़े पुरूष और स्त्री की आकृति के उन खिलौनों को देख रहा हूँ जिनके सर और धड़ आपस में स्प्रिंग से जुड़े हैं। जब भी उन खिलौनों को देखता हूँ वो अपना सर हिलाते मालूम पड़ते हैं। अपने बचपन में भी कई बार अपने दादा-दादी को देख न पाने की टीस इन्हीं खिलौनों से मिटा लिया करता था। बहुत सी बातें जो अम्मा-बाबूजी से व्यक्त नहीं कर पाता था, इन्हीं खिलौनों वाले दादा-दादी से कहता और उनका प्रबोध ले लिया करता था। इन खिलौनों वाले दादा-दादी का बड़ा ऋण है मेरे इस व्यक्तित्व पर।

इन खिलौनों का सिर सदैव सहमति के लिए हिलता है। यद्यपि केवल एक अंगुली के विपरीत धक्के से इनके सिर के कम्पन की दिशा बदली जा सकती है, पर न जाने क्यों मानव-मन की अस्तित्वगत विशेषता के तकाजे से हर बार अंगुलियाँ इनके सिर सहमति के लिए ही कम्पित करती हैं। मुझे यह खिलौनों का जोड़ा बड़े मार्मिक गहरे अनुभूति के अर्थ प्रदान करता है। मैं सोचता हूँ कितना अच्छा होता- हर एक सिर इसी तरह सहमति में हिलता, प्रकृति और जगत के रहस्य को निस्पृह भाव से देखता, विधाता की प्रत्येक लीला को सहज स्वीकारता। जो घट रहा है इस संसार में, वह दुर्निवार है, तो यह खिलौनों का जोड़ा उसे सहज स्वीकृति देता है-जानता है की अगम्य है प्रकृति का यह लीला-विधान। जो रचा जा रहा है यहाँ, कल्याणकारी है, तो सहज ही सिर हिल उठते हैं आत्मतोष में इन खिलौनों के।
यह खिलौने जानते हैं कि संसार अबूझ है-जिह्वा की भाषा से व्यक्त न हो सकने वाला। तो जिह्वा की असमर्थता, भाषा की अवयक्तता उनकी इसी मौन सिर हिलाने की अभिव्यक्ति में प्रकट होती है। शायद इन खिलौनों का सहमति में सिर हिलाना विशिष्टतः बोलना है। भाषा और शब्द का संसार इतना सीमित नहीं कि वह जिह्वा और अन्य वाक् अंगों का आश्रय ले। ‘पाब्लो नेरुदा’ (Pablo Neruda) की एक कविता ‘The Word’ स्पष्टतया व्यक्त करती है कि शब्द और भाषा का संसार कितना व्यापक हो सकता है-

“……For human beings, not to speak is to die-
language extends even to the hair
the mouth speaks without the lips moving
all of a sudden the eyes are words…”

(मनुष्य के लिए चुप्पी मौत है –
केश तक में भाषा का विस्तार है,
मुख बिना होंठ हिले बोलता है
हठात आँखें शब्द बन जाती हैं….।)

शायद यही कारण है कि इन खिलौनों का स्वरूप मुझे अपनी अनुभूतियों की राह से गुजरने के बाद शाश्वत मनुष्य का स्वरूप लगता था, इनका मौन गहरी मुखर अभिव्यक्ति बन जाता था और इनका सत्वर सिर हिलाना मानवता और अस्तित्व की सहज स्वीकृति लगाने लगता था। यह सच है कि इनके केश नहीं थे, आँखें भी नहीं थीं, होठ भी नहीं थे सचमुच के (और इसीलिये यह ‘नेरुदा’ के मनुष्य नहीं थे) पर हो सकता है कि ‘मनुष्य’ को खोजते हुए मेरे इस अतृप्त मानस ने इन्हीं में अपने सच्चे मनुष्य का स्वरूप देख लिया हो।

अंधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?

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Deepakबड़ी घनी तिमिरावृत रजनी है। शिशिर की शीतलता ने उसे अतिरिक्त सौम्यता दी है। सबकी पलकों को अपरिमित विश्रांति से भरी हथेलियां सहलाने लगीं हैं। नयन-गोलकों के नन्हें नादान शिशु पलकों की थपकी से झंपकी लेने लगे हैं। अब काम आराम का क्षमापन स्तोत्र बांचने लगा है। Rest belongs to the work as eyelids to the eye.
मैं शय्या-सुख से विरत हो बाहर निकल आया हूं। नक्षत्र खचित नीरव-रात्रि का आकर्षण बड़ा अद्भुत है। स्वच्छ टिमटिमाते तारों के अक्षर में लिखी आकाश-पाती प्राप्त हुई है। सांसे विराट के सन्देशों का स्वगत वाचन प्रारंभ कर देती हैं। याद आ जाती है ’भागवत’ के ’गजेन्द्र मोक्ष’ की वह पंक्ति –

“तमस्तदासीत गहनं गभीरं, यस्तस्य पारेभिराजते विभुं।”
(तब घोर गंभीर अन्धकार था। वह विभु उसीके पार बैठा था।)

बहुत गहरी से गहरी अनुभुति की मन्जूषा के पट खुल जाते हैं। अन्धकारपूरिता निशा मां की गोद-सी सुखद प्रतीत होती है। विविधाकार विलीन हो गया है। एक ही मां की ममतामयी गोद में सारा कोलाहल शांत हो गया है। ‘One appears as uniform in the darkness’. मैं अंधेरे की लय में तल्लीन होने लगता हूं।
अन्धेरा परमातिपरम है। व्यर्थ ही भयभीत होते हैं हम इसके कारुण्यमय विस्तार में- “The mystery of creation is like the darkness of night.” क्यों न प्रार्थना की विनत भावाकुलता में माथा झुक जाय।
मैं रात्रि की गहनता का चारण बन जाता हूं। डरो मत- ’मा भेषि’- का इंगित करती निशा को प्रणाम करता हूं। क्यों नहीं समझते हम कि प्रकाश का उत्स यह अन्धकार है। रात्रि की ही अधिष्ठात्री का नाम तो उषा है। पंत की भाषा में कहें तो क्या नहीं है यह रात्रि?- “देवि, सहचरि, मां!” बड़ी ही भावाकुलित बेला में टैगोर के मुख से निकला था –

I feel thy beauty, darknight, like that of the loved woman, when she has put out the lamp.

हमारी नासमझी ने रात्रि की गहनता को अबूझ पहेली बना दिया। मां के गर्भ से अन्धमय क्या होगा जहां सृजन अपने को संवारता है। हमारी ही भूल है कि हमने रात्रि की अंचल छांव को दुःखान्तक खेल समझ लिया। तुम्हारे सांय-सांय के स्वर में सन्नाटे का संगीत बार-बार हमें यही समझा रहा है- “मां भेषि, मां भेषि”- “मत डर, मत डर”। रात की इस गहनता ने समझा दिया है –

“We read the world wrong / and say that it deceives.” – TAGORE

यह प्रविष्टि दो दिन पहले लिखी थी। इस प्रविष्टि को बहुत हद तक ललित निबंध का स्वरूप देने की प्रेरणा मेरे बाबूजी की है। बहुत सारे उद्धरण उन्हीं से लिए हैं, इस प्रविष्टि पर चर्चा करते हुए। बहुत कुछ मेरा नही है इसमें, पर हौसला मेरा है।

किं कर्मं किं अकर्मं वा ….

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A bird capturing worm
प्रातः काल है। पलकें पसारे परिसर का झिलमिल आकाश और उसका विस्तार देख रहा हूँ। आकाश और धरती कुहासे की मखमली चादर में लिपटे शांत पड़े हैं। नन्हा सूरज भी अभी ऊँघ रहा है। मैं हवा से अंग छिपाए परिसर में टहल रहा हूँ। एक ही, बस एक ही नन्ही भोली चिड़िया फुदक-फुदक कर चोंच में कीड़े पकड़ रही है। उन्हें फटे चीथड़े की तरह उछालती है और निढाल कर खा जाती है।
यह वही कीट है जो धरती के भारीपन को भुरभुरा बनता है। परती को बाँझ का कलंक नहीं लगने देता है। निर्विष है। निरापद है। निष्प्रयोजन नहीं है। निरंकुश नहीं है। चलता है तो खलता नहीं है। विकलता में उबलता नहीं है। उसकी तबियत खराब नहीं होती। केंचुआ है वह। क=जल। जैसे ‘कंज’, जल में जन्मा। के= जले। च्युतः=डाल दिया गया। केंचुआ= जल में गिरा दिया गया। वंशी लगाने वाला मछुवारा केंचुआ फंसा कर मछली बाहर खींच लेता है। इतना तुच्छ है, इतना निरीह है कि प्रतिरोध भी नहीं करता। बेचारा।
इसी केंचुए को चिड़िया चीथड़े में बदल रही है। केंचुए की तबीयत और अपनी आदमीयत की तुलना करने लगता हूँ। यदि उसे मरने देता हूँ तो निरीह के वध का द्रष्टा बना अपराध बोध से भरता हूँ। यदि चिड़िया को उड़ा देता हूँ तो भींगी सुबह में एक नन्हें पखेरू को भूख से बिलखने देने का अपराधी बनता हूँ। क्या करुँ, क्या न करुँ? भाग्य और कर्म की श्रेष्ठता का सनातन प्रश्न सामने खडा हो जाता है। जगद्गुरु कृष्ण की पंक्ति बुदबुदाने लगता हूँ-

“किं कर्मं किं अकर्मं वा मुनयोप्यत्र मुह्यते”।

‘जीवो जीवस्य भोजनम्’ को सहजता से स्वीकार करने में तिलमिला जाता हूँ। पर नियति की गति निराली है, प्रकृति का ढंग अपना। लेकिन, लेकिन ही बना है। केंचुए का मरना, पक्षी का पेट भरना- दोनों चक्की के पाटों में मैं पिस रहा हूँ।

मेरा मानक विचलन नहीं हो पाया

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आलोचना प्रत्यालोचना एक ऐसी विध्वंसक बयार है जो जल्दी टिकने नहीं देती। प्रायः संसार में इसके आदान कम, प्रदान की उपस्थिति ज्यादा देखी जाती है। मेरे जीवन के क्षण इस बयार में बहुत बार विचलित हुए हैं। अभी कल की ही बात है। एक व्यक्ति ने मेरी रहनी पर रहम नहीं किया। मैं जिस मनोभूमि में कुछ लिखता पढ़ता हूँ, उस पर उसकी खरी टिप्पणी थी कि ‘कुछ नहीं मिलेगा इससे। तेरा स्वान्तः सुखाय दो कौड़ी का है। दुनियादारी का दामन पकडो। क्यों बर्बाद हुए जा रहे हो। “अर्थागमोनित्यमरोगिता च प्रिया च भार्या प्रिय वादिनी च” का सूत्र भूल कर भटक गए हो, मूर्ख कहीं के।

ऐसा पूर्व में भी कई बार घटित हुआ है, किंतु तब उसे मैंने समीक्षा के रूप में, अनुशीलन के रूप में लिया, आलोचन के रूप में नहीं। अब जब मुझमें विचलन ने स्थान बनाना प्रारंभ किया तो आत्ममंथन को बाध्य हो गया। “They also serve who stand and wait” की ‘Miltonic Feeling’ ने फिसलते पांवों को रोक दिया। किसी ने जैसे भीतर से संबल दिया कि कल्पना द्वारा प्रतीत होने वाला सत्य, बहुमत द्वारा मान्य सत्य, स्थूल रूप से दीखने वाला सत्य, विचारों की कसौटी पर खरा लगाने वाला सत्य और व्यवहार में माने जाने वाले सत्य का चिंतन करते रहो। दूसरों की तरह क्या होना है? क्या दूसरे वैसे हैं, जैसे तुम हो? मेरा मानक विचलन नहीं हो पाया।
सामान्यतः यह देखा गया है कि आदमी दूसरे की आलोचना करने में आनंदित होता है, पर छिद्रान्वेषण की आँख यदि अपनी और खुल जाय तो अपना खालीपन भर जाय। ऊंची चढ़ाई चढ़ने के लिए हमें उन सीढियों पर अधिक ध्यान रखना होगा जो स्वयं हमारे पैरों के नीचे अवस्थित हैं। आलोचना अभिमान का ही पोषण है। प्याज-लहसुन को कूट कर यदि किसी पात्र में रखा जाय, और फ़िर उसे सैकड़ों बार क्यों न धोया जाय, उसकी गंध नहीं जाती। वैसे ही आलोचक में अभिमान का चिन्ह कुछ न कुछ रह ही जाता है।
प्रसिद्द दार्शनिक ‘देकार्त’ से उसके प्रति किए गए व्यवहार का बदला लेने की बात उसके शुभेच्छु कहते रहे; पर वे धीरे से बोले- 
“जब कोई मुझसे बुरा व्यवहार करता है, आलोचना की आग में जलने के लिए मुझे धकेलता है, तो मैं अपनी आत्मा को उस ऊंचाई पर ले जाता हूँ, जहाँ कोई दुर्व्यवहार उसे नहीं छू सकता। आवेश और क्रोध को वश में कर लेने से शक्ति बढ़ती है। “
‘रविन्द्र’ की आलोचना से तिलमिलाए ‘शरदचंद्र’ ने जब उनके विरुद्ध कुछ करने, कहने की बात उनसे कही तो गुरुदेव बोले –

“शरद बाबू ! मैं स्वप्न में भी ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं कर पाउँगा, जैसा वे कर रहे हैं । मेरी चेतना के वातायन से धैर्य, सहिष्णुता और सद्भाव का चंद्र झाँक गया । जो हो, वही तुम्हारा स्वधर्म है। “

“All is well and wisely put.”

अति सूधो सनेह को मारग है

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pOOr.... buT hAppY...
pOOr…. buT hAppY… (Photo credit: poonomo)
कल मेरे पास के घर की वृद्धा माँ को वृद्धाश्रम (Old-age Home) भेंज दिया गया। याद आ गया कुछ माह पहले का अपना वृद्धाश्रम-भ्रमण। गया था यूँ ही टहलते-टहलते अपने जोधपुर प्रवास के दौरान। सोचा था देवालय जैसा होगा। आँखें फटी रह गयीं। वृद्धाश्रम के सरंक्षक श्री अग्रवाल जी ने सुविधाएं जुटाने में कोई कोर-कसर नहीं छोडी थी। खेल का सरजाम था, पुस्तकालय-वाचनालय था, भ्रमण-वाटिका थी, सर्वधर्म की देव-प्रतिमाएँ थीं, सुस्वादु भोजन की थाली थी, और भी बहुत कुछ। सुभाव और स्वभाव की लेनी-देनी थी। किंतु एक अभाव की भांग पूरे कूएं में पडी थी। वास में ही उपवास था। हास में भी बैठा उपहास मुँह बिरा रहा था। सुन्दरता के वस्त्र में मुझसे अदृश्य नही रह सका असुन्दरता का पैबंद।
मुझे चाट थी कि परिपक्वता का साक्षात्कार होगा, पर दिखाई दी प्रेम की, नेह की, रागात्मकता की कपाल क्रिया। सब की किसी न किसी रूप से अपनत्व की पोटली खो गयी थी। एक व्यक्ति ऐसा मिला जिसको उसका पुत्र लक्जरी कार में बैठा कर लाया था, मुड़ा और छोड़ गया। कहा, पैसा भर सकते हैं, परवरिश नहीं कर सकते। एक की आंसू भरी आँखें बोल रही थीं- “कोई मुझे माँ कह देता!” एक ने कान से सट कर कहा-“लकुटी थमा दो, भीड़ में भी अकेलापन लगता है”।
अनाथालय तो समझ में आता है, यह वृद्धालय कौन सी बला है? “नित्यं वृद्धोपसेविनः” की आत्मीयता को लकवा क्यों मार गया? यहाँ सुघराई की दुहाई तो सुनी, पर वैसे ही “ज्यों खगेश जल की चिकनाई”। याद आयी वह बात –

“O,Beauty, find thyself in love, not in the flattery of the mirror.”

सब है यहाँ, किंतु वही ढाई आखर विदा हो गया। पिता-पुत्र के बीच का, पति-पत्नी के बीच का, सेवक-स्वामी के बीच का, शिक्षक-शिक्षार्थी के बीच का वही ढाई अक्षर- ‘प्रेम’-खो गया है। यों ही कबीर ने नहीं कह दिया होगा-

“ढाई आखर प्रेम का पढे सो पंडित होय । “

मैं तब और तिलमिला गया, जब एक वृद्ध ने कहा- “यहाँ आने के पहले तीन मंजिले घर में ऊपर एक जगह अकेले छोड़ दिया गया जीव था। सीढियां चढ़ते-उतरते समय बच्चों के शरीर से शरीर छू जाता था, लेकिन कोई मुझसे बोलता नहीं था।” अरे यह तो पशुता का नंगा नाच है। वे पशु बिचारे इतने रागी तो अवश्य होते हैं कि वध के लिए उठे हाथ को भी चाटने लगते हैं। किंतु आदमी से आदमी की यह बेरुखी? मेरा मन कहता है, लौट आए वह दिन जब प्रेम की फुलवारी खिलेगी। मेरा ‘अहं’, मेरा ‘मैं’ जीवन में ममत्व की चासनी में पग जायेगा। स्वार्थ का रोग परार्थ के राग में मिट जायेगा। क्या कहूं –

“अपने भीड़ भरे आँगन में,
नरकट खड़ा अकेला।
क्योंकि किसी ने नहीं प्रीति-घट
उस पर हाय उड़ेला।”

क्या कहना पड़ेगा कि दुनिया को सुधारने से पहले हम अपना सुधार कर लें। घर में दिया जलाएं, कोई मन्दिर कभी फ़िर खोज लेंगे। स्वजन-सौहार्द्र को पसरने दें। निरापद पंथ है यही कि नेह की माला न टूटे। बाकी गली आगे मुड़ती है।

“He who wants to do good knocks at the gate, he who loves finds the gate open.”

सिन्धु में डूबा न मैं, डूबा नयन के नीर में

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आज की सुबह नए वर्ष के आने के ठीक पहले की सुबह है। मैं सोच रहा हूँ कि कल बहुत कुछ बदल जायेगा, कैलेंडर के पन्ने बदल जायेंगे, सबसे बढ़कर बदल जायेगी तारीख। मैं चाहता हूँ इस ठीक पहले की सुबह को अपनी आंखों में भर लूँ। क्या पता कल हो न हो?

मैं चादर में लिपटा अपने घर से बाहर निकला हूँ। सामने की गली में चपल चरण शिशु कुछ असुविधा भरी चाल सम्हाले चले जा रहे हैं। कोहरे से ढंके वातावरण में सामने दो बच्चों को देख रहा हूँ। इतनी सुबह एक बच्चा पंसारी की दुकान पर दाल की बोरी उझक उझक कर उठाते, सम करते कुछ बुदबुदा रहा है। दूसरा बच्चा चट्टी पर चुहल भरी भीड़ में खोया सा, चाय की प्याली और कुछ प्लेट खंगाल रहा है। मैं अपनी आँखें फेर लेता हूँ। कुछ दूर निकलता हूँ, देखता हूँ राजमिस्त्री के साथ देर शाम तक खट कर सोया बालू ढोने वाला बच्चा फ़िर बालू के टीले पर पहुँच गया है। मैं उदास हो जाता हूँ, तभी एक ठण्ड से कांपते अंगूठे पर ईंट के टुकड़े गिर जाने से रो रहे बच्चे को देख कर रुलाई छोट पड़ती है। याद आ जाते हैं राजेश जोशी-

“काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे ?
क्या सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आँगन
ख़त्म हो गए हैं इस दुनिया में ?”

मुझे रोना इसलिए आता है कि कुछ ही महीनों पहले बाल दिवस मनाया गया। बाल-श्रम रोकने के चटक विज्ञापन प्रकाशित हुए। बच्चों की खूबी का इतना बयान हुआ कि आकाश भर गया। पर क्या वास्तविकता की प्रश्नावली के उत्तर में रिक्त स्थान की पूर्ति हुई? क्या प्रश्न-चिह्न के आगे व्याकरण का विराम चिन्ह नहीं लग गया है? क्या होगा इस बचपन का? आह निकलती है कि कोई राह निकल जाती। क्या दृष्टिगत हो रहे इसी बचपन की ही मांग ‘पन्त’ ने की है –

“चित्रकार क्या करुणा करके मेरा भोला बालापन
मेरे यौवन के आँगन में चित्रित कर दोगे पावन?”

मैं घुलने लगता हूँ। वसुदेवनंदन कृष्ण ने घोर अंगरिस को जीवन रस की दीक्षा देते हुए छान्दोग्य उपनिषद् में कहा कि अपनी भूख, अपनी प्यास, अपने अकेलेपन को इतनी गहराई से अनुभव करना कि वह सबकी भूख, सबकी प्यास, सबका अकेलापन बन जाय। यही जीवन यज्ञ की दीक्षा है। इस जीवन का गुरु भी जीवन है।
मेरी सर्द साँसें गर्म होने लगती हैं। बच्चे की किलकारी गूंजने देना चाहता हूँ, क्रंदन नहीं। आदमी की भीड़ का आदमी जगना चाहिए। “Men are cruel but man is kind.” बच्चे को श्रम नहीं, प्रेम की जरूरत है। ‘भूल से, बेसुरेपन से, अक्षमता से भी आनंद पाने की शक्ति प्रेम में ही होती है’। हमें याद आ जानी चाहियें, बच्चे की-

“Ten little fingers, getting into trouble when at rest”,
“A combination of thousand questions, all asked at the same time”,
“An innocent calf like depth that breaks your heart when you want to scold.”

नए वर्ष के आगमन पर प्रार्थना करता हूँ सृष्टि के सिरमौर मानव से –

“होने पाये न किसी फूल को एहसास खिजाँ
ऐसा माहौल गुलिस्ताँ में बनाए रखना।”

मैं कुछ लिख नहीं पा रहा तो …

3
मैं लिख नहीं पा रहा हूँ कुछ दिनों से। ऐसा लगता है, एक विचित्रता भर गयी है मुझमें। मैं सोच रहा हूँ कि चिट्ठाकारी का यह कार्य-व्यापार कुछ दिनों के लिए ठहर क्यों नहीं जाता? वहीं, जहाँ छोड़कर इसे मैं ठहर गया हूँ। यह निरंतर गतिशील अखण्डता-अनवरतता का मोह क्यों बांधे रहता है जगत को? कि हम रोज लिख-रच रहे होते हैं।
मैं महसूस करता हूँ कि सर्जनात्मकता जब धर्म बन जाती है, तो वह गति-अगति से ऊपर, ज्ञात-अज्ञात से परे किसी भी विभाजन के पार ‘अज्ञेय’ की स्वीकृति बन जाती है।

“सर्जनात्मकता का प्रस्थान-बिन्दु ही यह जिद है कि जो कहा नहीं जा सकता, जो पहली निगाह में गूंगे के गुड़-सा अकथ प्रतीत होता है, उसे शब्द (या किसी अन्य माध्यम ) के जरिये कहा जाय यानी सिर्फ़ दूसरे को सुनाने के लिए ही नहीं, ख़ुद भी सुनने के लिए……….” (डॉ पुरुषोत्तम अग्रवाल)

तो ख़ुद भी सुनने के लिए / दूसरों को सुनाने के लिए मनुष्य (मैं) सर्जनाशील रहने का यत्न करता है, बिना समय-असमय का विचार किए। हर समय यह मनुष्य समय की चिंता करता रहता है। मन एक अजीब सी जीवैषणा से त्रस्त हुआ जाता है-गत को झुठलाना, अनागत की प्रतीक्षा करना। तो निरंतर चिन्ताशील मनुष्य का यह मन आशाओं का आश्रय ले अपनी क्रिया-गति तीव्र कर देता है। यह गति काल के पदाघात से निरंतर और भी तीव्र होती जाती है। मैं डर जाता हूँ। सोचता हूँ-

“जिस दिन गति इतनी तीव्र हो जायेगी कि वह अ-गति का रूप ले लेगी- तो क्या होगा”? (प्रभाकर माचवे)

एक हफ्ते इस चिट्ठाकारी से अयाचित विराम, उसी दौरान की बीमारी और इस अवधि में कुछ गंभीर पठन के कारण इस प्रकार के अस्पष्ट विचार उत्पन्न हुए; उन्हें ज्यों का त्यों लिखने की बात सोची- एकांश प्रस्तुत है। अर्थ की संगति न बैठे, तो क्षमाप्रार्थी!

आओ करें, कुछ दीवानगी की बातें

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“न समझने की ये बातें हैं, न समझाने की
जिंदगी उचटी हुई नींद है दीवाने की। “

LOVE
पढ़ कर कई बार सोचता रहा- “जिंदगी उचटी हुई नींद है दीवाने की। ” जिंदगी समझ में नहीं आयी, आती भी कैसे? जिंदगी जिसकी उचटी हुई नींद है, उस दीवाने का ही पता न था। पहले इस दीवाने का पता तो चले।

पश्चिम ने कहा ये दीवाना एक रोगी है और दीवानापन उसकी बीमारी है। यह मस्तिष्क में प्रकट होती है। दिमाग की बीमारी है यह। इसका कारण मानसिक अपर्याप्ति, मानसिक पक्षाघात, मानसिक शून्यता अदि हैं। लोगों ने कहा, दीवानगी की जड़ें मनुष्य के अतीत में हैं, उसके कटु अनुभवों में हैं। बात यहीं तक रहती तो ठीक- लोगों ने यह भी कहा कि मनुष्य के कटु अनुभव का मतलब सिर्फ़ उसके अपने अनुभव नहीं, उसके पूर्वजों के अनुभव भी हैं। अब विचारिये की बात यहाँ तक पहुंचे तो दीवानगी कितना कहर ढाए।
पश्चिम के मनोविश्लेषकों ने कहा- दिमाग की यह वृत्ति है, जो अमानवीय है और यह कुछ इतर नहीं बल्कि कर्मों को प्रेरित कराने वाली शक्ति बन कर मनुष्य के अन्तश्चेतन में बसी है। पश्चिम घबरा गया था इससे- दीवानगी को समझा हे नहीं था उसने। उसके चिकित्सकों ने कहा की चूँकि ये दिमाग का रोग है इसलिए दिमाग को बिजली के झटके दो; क्योंकि ये झटके दिमाग के हिस्स्सों को धीरे-धीरे निर्जीव कर देते हैं। मरीज थक जाता है, उत्पात रुक जाता है। पर दीवानगी का रोग ख़तम नहीं हो जाता इससे।
पश्चिम के मनोविश्लेषकों ने कहा (मैं फ्रायड की बात कर रहा हूँ)- ‘मस्तिष्क का विश्लेषण इसका निदान ढूंढ लेगा, घबराइये मत’। पर क्या आपको मालूम नहीं कि यह मनोविश्लेषण करते करते माहिर मनोविश्लेषक भी दिमाग के इस फेरे में कितनी आसानी से पड़ गए। ‘जुंग’, ‘टाउस्क ‘ या स्वयं ‘फ्रायड’ ख़ुद ही अपने-अपने रोगियों के प्रेम में पड़ गए। देखा! ये है दीवानगी का आलम। पता है न आपको कि अपने जमाने का सबसे बड़ा मस्तिष्क ‘नीत्शे’ भी ‘फ्रायड’ की उसी प्रेमिका के पीछे इसी दीवानगी के खलल से पागलखाने पहुँच गए थे। बाप रे –

“वह दीवानगी-ए-शौक कि हरदम मुझको
आप जाना उधर और आप ही हैराँ होना ।”

तो बात ऐसी हुई कि फ्रायड और उनके पदचिन्ह-चारकों ने साफ़ साफ़ कह दिया कि ले-दे कर हम इस दीवानगी का अध्ययन ही कर सकते हैं- न बच सकते हैं इससे, न बचा सकते हैं।

शेष फ़िर।

मेरा अकेलापन और रचना का सत्य-सूत्र

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New-born leaves
मैं लिखने बैठता हूँ, यही सोचकर की मैं एक परम्परा का वाहक होकर लिख रहा हूँ। वह परम्परा कृत्रिमता से दूर सर्जना का विशाल क्षितिज रचने की परम्परा है जिसमें लेखक अपनी अनुभूतियाँ, अपने मनोभाव बेझिझक, बिना किसी श्रम और संकोच के प्रकट करता है। मैं उसी स्वाभाविकता की खोज में अपने को निमग्न पाता हूँ जिसमें रचना विशिष्ट संप्रेषण की विशिष्ट स्थिति में पहुँच जाती है, भाव का तादात्म्य कर लेती है।
इसलिए मैं अकेला होकर रचने बैठता हूँ कि अपने इस एकांत के गह्वर से अभिव्यक्ति की रोशनी की किरण समेट लाऊं कि भावना के जगत का बहुत सारा रहस्य अनावृत हो जाय। पर मैं देखता हूँ कि मेरी यथार्थगत जड़ता मेरी भावना के उत्साह और रचना-प्रक्रिया के मौन आमंत्रण के जादू को क्षण भर में तोड़ डालती है। मैं यह भी देखता हूँ कि मेरी एकान्तिक कल्पना और अनभिव्यक्ति के अन्तराल में कई चेहरे अचानक सामने आ जाते हैं, फ़िर अपने आप को नष्ट करते रहते हैं।
मैं छटपटा-छटपटा कर अपनी रचना का सत्य-सूत्र खोजना चाहता हूँ। मैं इस सत्य को पाने के लिए बेचैन हूँ-उसी सत्य को जिसमें सब होने की सार्थकता है। जहाँ सारी बेचैनी, सारी घबराहट आकर समाप्त हो जाते है, जिसको ऋचाएं कहती हैं कि वह पूर्ण है, सम्पूर्ण है-

“सर्वं खत्विदं ब्रह्म ”

मैं रचना के इसी सत्य से अपना साक्षात्कार चाहता हूँ, पर साथ ही मैं यह भी आभास करता हूँ कि मेरा यह लघु मानस इतना विराट सत्य कैसे खोज सकेगा, प्राप्त कर सकेगा? मेरे इस मानव-मन की सीमायें हैं, और उनका अतिक्रमण कभी भी सम्भव नहीं हो सकेगा। फलतः मेरा सत्य खंड-सत्य ही हो सकता है, पूर्ण सत्य नहीं।
तो यह सत्य मेरे लिए रहस्य बन कर खडा है। यह सत्य रहस्य है, इसलिए अपरिचित और अकल्पित मेरे कण-कण को ओत-प्रोत किए है। वह निकटतम और अन्यतम है।
मुझे धीरे-धीरे यह लगने लगा है कि जो अबूझ की पीड़ा और मेरी जीवन-कथा की व्यथा है, उसी में यह रहस्य बोलता है।