Friday, February 24, 2017

Contemplation

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मस्ती की लुकाठी लेकर चल रहा हूँ

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A leaf in front of Lumia
A leaf  (Photo credit: soul-nectar)
मैं यह सोचता हूँ बार-बार की क्यों मैं किसी जीवन-दर्शन की बैसाखी लेकर रोज घटते जाते अपने समय को शाश्वत बनाना चाहता हूँ? क्यों, यदि सब कुछ क्षणभंगुर है तो उसे अपनी मुट्ठियों में भर कर कालातीत कर देना चाहता हूँ? मैं क्यों लगातार बीत रहे इस समय से आक्रांत हूँ? मैं बार-बार सोचता हूँ, पर समझ नहीं पाता।
मैं समझ शायद इसलिए नहीं पाता कि समय के सत्य को नहीं समझा मैंने । मैंने पटरी नहीं बैठाई सामयिकता से। मुझे लगता है मैंने कुछ स्वप्न बुने, उनसे आदर्शों का खाका खींचा और भविष्य की अतिरंजित कल्पना में वर्तमान का सत्य मैंने भुला दिया। मैं समझ नहीं पाया कि सामयिक जीवन की राग-रंजित तात्कालिकता को क्षणवादी चेतना से मुक्त नहीं किया जा सकता।
मैंने चिट्ठे लिखने की शुरुआत अचानक ही कर दी थी । रवीश कुमार की ब्लॉग-वार्ता पढ़कर और रचनाकार के सापेक्ष उद्देश्य को देखकर मैंने चिट्ठाकारी से समाज को दिशा देने, साहित्य को समृद्ध करने का किंचित विचित्र भाव मन में पाल लिया था । मैंने यथार्थ को भुला दिया था कि संसाधनों के सीमित होने का दंश क्या मेरे इस अभिनव प्रयास (मेरे लिए) को नहीं झेलना पडेगा? कि क्या किसी-किसी तरह लिख कर मैं श्रेष्ठतम की अभिव्यक्ति कर पाउँगा? पर मैंने तात्कालिकता को क्षणवादी चेतना से मुक्त कर शाश्वत जीवन-बिन्दु पर स्थापित करने की चेष्टा की थी ।
और तब, जब पिछले चार दिन लिखा नहीं पाया, कहीं टिप्पणी नही दी- तो लगा कि मैंने अपने जीवन के यथार्थ को अस्वीकार करने का कछुआ-धर्म निभाया था। उस कस्बे से जिसमें बिजली आठ घंटे आती हो-वह भी अनियमित; उस कस्बे से जिसमें एकमात्र इन्टरनेट सेवा प्रदाता बी०एस०एन०एल० बार-बार अपनी आँखें बंद कर लेता हो; उस परिवार का सदस्य होकर जिसमें जीवन व्यतीत कर लेने की ही सामर्थ्य विकसित हो पायी हो, और वैसे व्यक्ति होकर जो स्वतः में आत्मनिर्भर बनने की और प्रयत्नशील हो- ब्लॉग्गिंग करना मुश्किल-ए-जान है ।
आज जब यह प्रविष्टि लिख रहा हूँ, तो एक संतोष-सा मालूम पड़ रहा है, क्योंकि पिछले चार दिनों के अनुभवों से मेरे प्रथित जीवन-दर्शन की वैशाखी मेरे हाथों से फिसल गयी है। पर मैंने अपने स्वप्न नहीं खोये, अपनी रीति नहीं बदली। मैं भी अब उसी मस्त की घर फूंक मस्ती की लुकाठी लेकर चल रहा हूँ जो बीत रहे हर क्षण को ओढ़ सकता है , बिछा सकता है ।
मैं समझ गया हूँ कि मेरी सार्थकता व्यतीत में नहीं है, भविष्य में भी नहीं। इसलिए सामयिकता को जितना भर सकूं उतना बाहों में भर कर, जितना प्यार दे सकूं उतना प्यार देकर जीने योग्य ही नहीं, सुंदर बनाना होगा। यह लेखन, यह साहित्य इसी प्रयत्न के परिणाम हैं।

रचना का स्वान्तःसुख, सर्वान्तःसुख भी है

रचना का स्वांतः सुख

बिना किसी बौद्धिक शास्त्रार्थ के प्रयोजन से लिखता हूँ अतः ‘हारे को हरिनाम’ की तरह हवा में मुक्का चला लेता हूँ, और अपनी बौद्धिक इमानदारी निभा लेता हूँ। स्वान्तःसुखाय रचना भी विमर्श के झमेले में पड़ जाय तो क्या करें । शास्त्री, शास्त्रार्थ के बाद शास्त्र की भी तो सुनें, स्वान्तः सुखाय क्या है शास्त्र की दृष्टि में?
उपनिषद कहता है –

“एको देवः सर्वभूतेषु गूढः,
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा
तं आत्मस्थं येनुपश्यन्ति धीराः
तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम ।”

जब वह (परमात्मा) सर्वभूतेषु गूढ़ है , सबमें छिपा है , सर्वव्यापी सर्व अंतरात्मा है तो उसके सुख के लिए किसी एक की मचलन सभी प्राणियों के सुख के लिए क्यों नहीं हो सकती ? एक की अंतरात्मा का सुख सबकी अंतरात्मा का सुख हो सकता है । परमात्मा ने अपने को लक्षित करते हुए अर्जुन से कहा था –

“अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूतेषु भारत । “(गीता)

तो जब वह परमसुख का सुख परमात्मा ही सबकी आत्मा है, सबका अंतःकरण है तो एक का स्वान्तःसुखाय अखिल जगत का स्वान्तःसुखाय क्यों नहीं हो सकता, हो सकता है ।

‘स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा’ की विनीत उद्घोषणा करने वाले तुलसी का स्वान्तःसुख जन जन का स्वान्तःसुख नहीं हो गया, तो क्या रचनाकार तुलसी को साहित्य स्रष्टा की बिरादरी से बहिष्कृत कर देंगे? लिखा गया, जन-जन को उस आस्वाद को देने की विकलता हुई और वह जगतव्यापी हो गया- कुछ ऐसी ही स्वान्तःसुखाय रचना होती है। आरोप तो यही है कि यदि स्वान्तः सुखाय रचना है तो फ़िर जन- जन को देने की विकलता क्यों हो गयी? तो वस्तुतः वह स्वतः संभूत बाढ़ की तरह होती है जो किनारों को चूमती दुलराती बढ़ी चली जाती है; और न चाहते हुए भी ‘वह आयी थी, और कुछ अप्रत्याशित देकर गयी’ ऐसा सबको अनुभूत होता है-

“बाढ़ प्रगाढ़ छलक पुलिनों पर छाप छोड़ जाती है
कभी सिन्धु की गहराई भी साफ़ झलक जाती है ।” (जानकी वल्लभ शास्त्री)

अतः स्वान्तःसुखाय रचना सर्वान्तःसुखाय बन जाती है ।

बड़े विनीत भावः से कह रहा हूँ कि राम करें स्वान्तःसुखाय रचनाएँ ब्लॉग, इंटरनेट की प्रभूत संपत्ति बन जाँय जो हर दर्शक और आस्वादक को बिना इति अथ के रसानुभूति में डुबोती रहें ।

पीपे का पुल

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अपने बारे में कहने के लिए चलूँ तो यह पीपे का पुल मेरे जेहन में उतर आता है। गंगा बनारस में बड़ी चुहल करती हुई मालूम पड़ती हैं। गंगा लहरों की गति के साथ जीवन की गति संगति बैठाती है । गंगा के तटीय क्षेत्र गंगा के आश्वासन पर जीते हैं, लहरों की मनुहार पर उनके अस्तित्व का पारावार छलक-छलक सा जाता मालूम पड़ता है। पीपे के यह पुल गंगा की गोद में झूला झूलते गंगा से लोक का नाता जोड़ते हैं। सहचरी गंगा हमारे रोम को सहलाने लगाती है। कंक्रीट के ऊंचे विशालकाय पुलों से लोक उतना नहीं जुड़ता जितना ये पीपे के पुल- लहराती हुई नदी पर लहराते हुए पुल- हमें हमारी थाती, हमारी गंगा से जोड़ते हैं। 
Bridge-on-Gangesगाँव का लहरी मन गंगा की लहरों को इस लहराते हुए पुल से ही पार कर लेना चाहता है। यह पुल पूँजी के उस दलदल से दूर आम आदमी की स्वाभाविक जिंदगी के पैरोकार मालूम पड़ते हैं। कितना साफ अक्स दिखता है इस पुल में आम आदमी का। न जाने कितनी कड़ियों को जोड़ कर बनता है पुल पीपे का- रस्सियों के सहारे, और न जाने कितने ऐसे ही नियति-सम्भाव्यों से निर्मित होता है आम आदमी। पुल का उठना गिरना गंगा की लहरों की क्रीडाएं हैं और उठते, गिरते, लहराते इस पुल का बने, टिके रहना गंगा की इच्छा। गंगा का तनिक भ्रू-भंग इस पुल के अस्तित्व का नष्ट होना है। बहुत अलग नहीं है एक आदमी का वजूद । नियति की लहरों पे अठखेलियाँ करता न जाने कितनों का ह्रदय सूत्र क्षण में ही टूट कर नष्ट हो जाता है। मैं क्या कहूं अपने लिए । अज्ञेय की कविता की तरह- “मैं सेतु हूँ “।