Friday, February 24, 2017

Contemplation

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अंधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?

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Deepakबड़ी घनी तिमिरावृत रजनी है। शिशिर की शीतलता ने उसे अतिरिक्त सौम्यता दी है। सबकी पलकों को अपरिमित विश्रांति से भरी हथेलियां सहलाने लगीं हैं। नयन-गोलकों के नन्हें नादान शिशु पलकों की थपकी से झंपकी लेने लगे हैं। अब काम आराम का क्षमापन स्तोत्र बांचने लगा है। Rest belongs to the work as eyelids to the eye.
मैं शय्या-सुख से विरत हो बाहर निकल आया हूं। नक्षत्र खचित नीरव-रात्रि का आकर्षण बड़ा अद्भुत है। स्वच्छ टिमटिमाते तारों के अक्षर में लिखी आकाश-पाती प्राप्त हुई है। सांसे विराट के सन्देशों का स्वगत वाचन प्रारंभ कर देती हैं। याद आ जाती है ’भागवत’ के ’गजेन्द्र मोक्ष’ की वह पंक्ति –

“तमस्तदासीत गहनं गभीरं, यस्तस्य पारेभिराजते विभुं।”
(तब घोर गंभीर अन्धकार था। वह विभु उसीके पार बैठा था।)

बहुत गहरी से गहरी अनुभुति की मन्जूषा के पट खुल जाते हैं। अन्धकारपूरिता निशा मां की गोद-सी सुखद प्रतीत होती है। विविधाकार विलीन हो गया है। एक ही मां की ममतामयी गोद में सारा कोलाहल शांत हो गया है। ‘One appears as uniform in the darkness’. मैं अंधेरे की लय में तल्लीन होने लगता हूं।
अन्धेरा परमातिपरम है। व्यर्थ ही भयभीत होते हैं हम इसके कारुण्यमय विस्तार में- “The mystery of creation is like the darkness of night.” क्यों न प्रार्थना की विनत भावाकुलता में माथा झुक जाय।
मैं रात्रि की गहनता का चारण बन जाता हूं। डरो मत- ’मा भेषि’- का इंगित करती निशा को प्रणाम करता हूं। क्यों नहीं समझते हम कि प्रकाश का उत्स यह अन्धकार है। रात्रि की ही अधिष्ठात्री का नाम तो उषा है। पंत की भाषा में कहें तो क्या नहीं है यह रात्रि?- “देवि, सहचरि, मां!” बड़ी ही भावाकुलित बेला में टैगोर के मुख से निकला था –

I feel thy beauty, darknight, like that of the loved woman, when she has put out the lamp.

हमारी नासमझी ने रात्रि की गहनता को अबूझ पहेली बना दिया। मां के गर्भ से अन्धमय क्या होगा जहां सृजन अपने को संवारता है। हमारी ही भूल है कि हमने रात्रि की अंचल छांव को दुःखान्तक खेल समझ लिया। तुम्हारे सांय-सांय के स्वर में सन्नाटे का संगीत बार-बार हमें यही समझा रहा है- “मां भेषि, मां भेषि”- “मत डर, मत डर”। रात की इस गहनता ने समझा दिया है –

“We read the world wrong / and say that it deceives.” – TAGORE

यह प्रविष्टि दो दिन पहले लिखी थी। इस प्रविष्टि को बहुत हद तक ललित निबंध का स्वरूप देने की प्रेरणा मेरे बाबूजी की है। बहुत सारे उद्धरण उन्हीं से लिए हैं, इस प्रविष्टि पर चर्चा करते हुए। बहुत कुछ मेरा नही है इसमें, पर हौसला मेरा है।

सिन्धु में डूबा न मैं, डूबा नयन के नीर में

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आज की सुबह नए वर्ष के आने के ठीक पहले की सुबह है। मैं सोच रहा हूँ कि कल बहुत कुछ बदल जायेगा, कैलेंडर के पन्ने बदल जायेंगे, सबसे बढ़कर बदल जायेगी तारीख। मैं चाहता हूँ इस ठीक पहले की सुबह को अपनी आंखों में भर लूँ। क्या पता कल हो न हो?

मैं चादर में लिपटा अपने घर से बाहर निकला हूँ। सामने की गली में चपल चरण शिशु कुछ असुविधा भरी चाल सम्हाले चले जा रहे हैं। कोहरे से ढंके वातावरण में सामने दो बच्चों को देख रहा हूँ। इतनी सुबह एक बच्चा पंसारी की दुकान पर दाल की बोरी उझक उझक कर उठाते, सम करते कुछ बुदबुदा रहा है। दूसरा बच्चा चट्टी पर चुहल भरी भीड़ में खोया सा, चाय की प्याली और कुछ प्लेट खंगाल रहा है। मैं अपनी आँखें फेर लेता हूँ। कुछ दूर निकलता हूँ, देखता हूँ राजमिस्त्री के साथ देर शाम तक खट कर सोया बालू ढोने वाला बच्चा फ़िर बालू के टीले पर पहुँच गया है। मैं उदास हो जाता हूँ, तभी एक ठण्ड से कांपते अंगूठे पर ईंट के टुकड़े गिर जाने से रो रहे बच्चे को देख कर रुलाई छोट पड़ती है। याद आ जाते हैं राजेश जोशी-

“काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे ?
क्या सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आँगन
ख़त्म हो गए हैं इस दुनिया में ?”

मुझे रोना इसलिए आता है कि कुछ ही महीनों पहले बाल दिवस मनाया गया। बाल-श्रम रोकने के चटक विज्ञापन प्रकाशित हुए। बच्चों की खूबी का इतना बयान हुआ कि आकाश भर गया। पर क्या वास्तविकता की प्रश्नावली के उत्तर में रिक्त स्थान की पूर्ति हुई? क्या प्रश्न-चिह्न के आगे व्याकरण का विराम चिन्ह नहीं लग गया है? क्या होगा इस बचपन का? आह निकलती है कि कोई राह निकल जाती। क्या दृष्टिगत हो रहे इसी बचपन की ही मांग ‘पन्त’ ने की है –

“चित्रकार क्या करुणा करके मेरा भोला बालापन
मेरे यौवन के आँगन में चित्रित कर दोगे पावन?”

मैं घुलने लगता हूँ। वसुदेवनंदन कृष्ण ने घोर अंगरिस को जीवन रस की दीक्षा देते हुए छान्दोग्य उपनिषद् में कहा कि अपनी भूख, अपनी प्यास, अपने अकेलेपन को इतनी गहराई से अनुभव करना कि वह सबकी भूख, सबकी प्यास, सबका अकेलापन बन जाय। यही जीवन यज्ञ की दीक्षा है। इस जीवन का गुरु भी जीवन है।
मेरी सर्द साँसें गर्म होने लगती हैं। बच्चे की किलकारी गूंजने देना चाहता हूँ, क्रंदन नहीं। आदमी की भीड़ का आदमी जगना चाहिए। “Men are cruel but man is kind.” बच्चे को श्रम नहीं, प्रेम की जरूरत है। ‘भूल से, बेसुरेपन से, अक्षमता से भी आनंद पाने की शक्ति प्रेम में ही होती है’। हमें याद आ जानी चाहियें, बच्चे की-

“Ten little fingers, getting into trouble when at rest”,
“A combination of thousand questions, all asked at the same time”,
“An innocent calf like depth that breaks your heart when you want to scold.”

नए वर्ष के आगमन पर प्रार्थना करता हूँ सृष्टि के सिरमौर मानव से –

“होने पाये न किसी फूल को एहसास खिजाँ
ऐसा माहौल गुलिस्ताँ में बनाए रखना।”

सबका पेट भरे

एक महात्मा हैं, उनके पास जाता रहता हूँ। महात्मा से मेरा मतलब उस गैरिकवस्त्र-धारी महात्मा से नहीं, जिनके भ्रम में इस पूरी दुनियाँ का निश्छल मन छला जाता है। महात्मा से मेरा अर्थ महनीय आत्मा से है। बात-बात में उन्होंने कहा- “बेटा, खिलाने वाला बन।” अभीं कुछ समझ भी नहीं पाया था कि उन्होंने फ़िर आत्मीयता से कहा- “मन छोटा नहीं है इसलिये थोड़े में नहीं होता।” 

बाद में उसका रहस्य स्पष्ट हुआ। उन्होंने अपरिग्रह और उत्सर्ग को जीवन-मंत्र बताया था। लगे हाथ उन्होंने एक कहानी कही थी। दानव ब्रह्मा से झगड़ रहे थे कि आपने देवताओं का हमेशा पक्ष लिया है और हमारी उपेक्षा की है, जबकि हम सभी आपके पैदा किये हैं। काफी उलझन में डाला उन्होंने और ब्रह्मा जी ने दूसरे दिन एक टेस्ट लेने के लिये दोनों दलों को बुलाया। दोनों के सम्मुख स्वादिष्ट भोजन परोसा गया। खाने के समय ब्रह्मा जी ने कहा, “एक शर्त है। हाँथ खाते समय मुड़ने न पाये।” दानव अपने मुँह में स्वादिष्ट पकवान लम्बे हाथों से फ़ेंकते रहे और वह गिर कर बेकार होता गया। वे भूखे रह गये। देवता पंक्ति में बैठे अपने बगल वाले के मुँह में कौर डाल देते, और उनके बगल वाला उनके मुंह में। इस तरह उनका पेट भर गया।
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दूसरों को देने वाला स्वयं पा जाता है। स्वयं का पेट भरने का यत्न तो कीट पतंगे तक करते हैं। आदमी की आदमीयत किसमें है?  मुझे सार्वभौम मानवता का पाठ मिल गया कि सबका पेट भरे, इसकी सनक सवार होनी चाहिये। एक रोटी में भी आधी रोटी किसी की हथेली रख कर मिल बाँट कर खा लिया तो मन संतुष्ट हो जाय, किसी की प्यास बुझा दी तो अपनी प्यास बुझ जाय, यह भाव ही तो मनुष्यता की पहचान है।  ‘शेक्सपियर’ ने ऐसी मानव-हृदय की पिघलन को देवता का धन कहा है-
“It blesseth him that gives and
him that takes ;
It is mightiest in the mightiest :……
It is an attribute to God himself.”
मन विशाल हो तो दानवी वृत्ति का विनाश होता है ।

मैं कुछ लिख नहीं पा रहा तो …

3
मैं लिख नहीं पा रहा हूँ कुछ दिनों से। ऐसा लगता है, एक विचित्रता भर गयी है मुझमें। मैं सोच रहा हूँ कि चिट्ठाकारी का यह कार्य-व्यापार कुछ दिनों के लिए ठहर क्यों नहीं जाता? वहीं, जहाँ छोड़कर इसे मैं ठहर गया हूँ। यह निरंतर गतिशील अखण्डता-अनवरतता का मोह क्यों बांधे रहता है जगत को? कि हम रोज लिख-रच रहे होते हैं।
मैं महसूस करता हूँ कि सर्जनात्मकता जब धर्म बन जाती है, तो वह गति-अगति से ऊपर, ज्ञात-अज्ञात से परे किसी भी विभाजन के पार ‘अज्ञेय’ की स्वीकृति बन जाती है।

“सर्जनात्मकता का प्रस्थान-बिन्दु ही यह जिद है कि जो कहा नहीं जा सकता, जो पहली निगाह में गूंगे के गुड़-सा अकथ प्रतीत होता है, उसे शब्द (या किसी अन्य माध्यम ) के जरिये कहा जाय यानी सिर्फ़ दूसरे को सुनाने के लिए ही नहीं, ख़ुद भी सुनने के लिए……….” (डॉ पुरुषोत्तम अग्रवाल)

तो ख़ुद भी सुनने के लिए / दूसरों को सुनाने के लिए मनुष्य (मैं) सर्जनाशील रहने का यत्न करता है, बिना समय-असमय का विचार किए। हर समय यह मनुष्य समय की चिंता करता रहता है। मन एक अजीब सी जीवैषणा से त्रस्त हुआ जाता है-गत को झुठलाना, अनागत की प्रतीक्षा करना। तो निरंतर चिन्ताशील मनुष्य का यह मन आशाओं का आश्रय ले अपनी क्रिया-गति तीव्र कर देता है। यह गति काल के पदाघात से निरंतर और भी तीव्र होती जाती है। मैं डर जाता हूँ। सोचता हूँ-

“जिस दिन गति इतनी तीव्र हो जायेगी कि वह अ-गति का रूप ले लेगी- तो क्या होगा”? (प्रभाकर माचवे)

एक हफ्ते इस चिट्ठाकारी से अयाचित विराम, उसी दौरान की बीमारी और इस अवधि में कुछ गंभीर पठन के कारण इस प्रकार के अस्पष्ट विचार उत्पन्न हुए; उन्हें ज्यों का त्यों लिखने की बात सोची- एकांश प्रस्तुत है। अर्थ की संगति न बैठे, तो क्षमाप्रार्थी!

तुम भी उबर गये पथरीली राह से

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तुम अब कालेज कभी नहीं आओगे। तुम अब इस सड़क, उस नुक्कड़, वहाँ की दुकान पर भी नहीं दिखोगे। तुम छोड़ कर यह भीड़ कहीं गहरे एकान्त में चले गये हो। पता नहीं वह सुदूर क्षेत्र कैसा है? अन्धकारमय या सर्वत्र प्रकाशित?

तुम कल तक मेरी कक्षा के विद्यार्थी थे, वही तीसरी बेंच पर बैठे हुए। टुक-टुक देखते, निहारते भर आँख मुझे- अब तुम वहाँ नहीं रहोगे। मेरे कहे गये हर एक शब्द को अपनी जीभ से चखते, स्वादते, तृप्त होते मैं देखता था तुम्हें। मैं निरखता था कि मेरा कहा एक-एक शब्द तुम्हारी आत्मा की थाती बन जाता था।
मैं साहित्य पढ़ाता था तुम्हें। तुम्हें ही क्यों, पूरी कक्षा को। पर बार-बार तुम ही खयाल में क्यों आ रहे हो? क्योंकि तुमने मेरी कही बातें सच मान लीं। कमबख्त साहित्य भी प्रेम, सौन्दर्य, श्रृंगार की चाकरी करता है कक्षाओं में, पाठ्यक्रमों में। कविता पढ़ाते वक्त देखता था तुम्हें – तुम्हारी अनुभूतियों के प्रत्यक्षीकरण के साथ। भावजगत की जितनी स्वतंत्रता मेरी कविता का कवि लेता उससे कहीं ज्यादा स्वतंत्र तुम अपनी अनुभूतियों में हो जाया करते थे। तुम्हारी तल्लीनता मुझे भी तल्लीन कर देती थी। पर अब तुम नहीं रहोगे मेरे एक एक शब्द को पीने के लिये, फ़िर कहीं ठहर न जाय मेरा यह शब्द-प्रवाह।

मैं क्या जानता था कि इतना गम्भीर हो जाते हो तुम इस भाव-यात्रा में। कविता की रहनुमाई का जीवन गढ़ लिया है तुमने – नहीं पता था। मैने उस दिन कविताओं का अर्थ बताते, प्रेम में स्व-विसर्जन की भूमिका तुम्हारे ही लिये गढ़ी थी, नहीं जानता था। काश समझ पाता कि ‘जियेंगे तो साथ, मरेंगे तो साथ’ का सूत्र-सत्य बहुत गहराई से आत्मसात कर लिया था तुमने उस दिन।

तुमने क्यों नहीं समझा कि साहित्य मनुष्य के सौन्दर्यबोध, कर्म और विचार का समुच्चय है। ज्ञान, क्रिया और ईच्छा की त्रिवेणी साहित्य में ऐसा संगम निर्मित करती है जिसे जीवन कहा जा सकता है। मैं शायद समझा न सका तुम्हें कि केवल भाव-भावना जीवन का निर्माण नहीं करती। कर्म और भाव दोनों मिलकर मानव-जीवन का निर्माण करते हैं।

मेरे साहित्य के विद्यार्थी! जीवन का ऐसा निषेध? साहित्य का तो उद्देश्य ही है व्यक्ति-चेतना का रूपायन और व्यष्टि का उन्नयन। इससे प्रभावित, निर्मित होता है जीवन और फ़िर बनती है जीवन के प्रति आकांक्षा। यह जीवन समाज का प्रतिरोध भी हो सकता है और प्रस्ताव भी। मेरे प्यारे! तुम जान नहीं सके कि अनुकूलता या विपरीतता उतनी महत्वपूर्ण नहीं जितनी यह कि जीवन में श्रद्धा-भाव की स्वीकृति हो।

कल अखबार में पढ़ा, तुम इस जीवन से विरम गये। पकड़कर उसका हाथ, जिससे साथ जीने-मरने की कसमें खायीं थीं, रेल की पटरी पर मुँह-अँधेरे ही सो गये थे तुम। फ़िर ट्रेन आयी, गुजर गयी। तुम दोनों भी उबर गये पथरीली राह से।

अति सूधो सनेह को मारग है

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pOOr.... buT hAppY...
pOOr…. buT hAppY… (Photo credit: poonomo)
कल मेरे पास के घर की वृद्धा माँ को वृद्धाश्रम (Old-age Home) भेंज दिया गया। याद आ गया कुछ माह पहले का अपना वृद्धाश्रम-भ्रमण। गया था यूँ ही टहलते-टहलते अपने जोधपुर प्रवास के दौरान। सोचा था देवालय जैसा होगा। आँखें फटी रह गयीं। वृद्धाश्रम के सरंक्षक श्री अग्रवाल जी ने सुविधाएं जुटाने में कोई कोर-कसर नहीं छोडी थी। खेल का सरजाम था, पुस्तकालय-वाचनालय था, भ्रमण-वाटिका थी, सर्वधर्म की देव-प्रतिमाएँ थीं, सुस्वादु भोजन की थाली थी, और भी बहुत कुछ। सुभाव और स्वभाव की लेनी-देनी थी। किंतु एक अभाव की भांग पूरे कूएं में पडी थी। वास में ही उपवास था। हास में भी बैठा उपहास मुँह बिरा रहा था। सुन्दरता के वस्त्र में मुझसे अदृश्य नही रह सका असुन्दरता का पैबंद।
मुझे चाट थी कि परिपक्वता का साक्षात्कार होगा, पर दिखाई दी प्रेम की, नेह की, रागात्मकता की कपाल क्रिया। सब की किसी न किसी रूप से अपनत्व की पोटली खो गयी थी। एक व्यक्ति ऐसा मिला जिसको उसका पुत्र लक्जरी कार में बैठा कर लाया था, मुड़ा और छोड़ गया। कहा, पैसा भर सकते हैं, परवरिश नहीं कर सकते। एक की आंसू भरी आँखें बोल रही थीं- “कोई मुझे माँ कह देता!” एक ने कान से सट कर कहा-“लकुटी थमा दो, भीड़ में भी अकेलापन लगता है”।
अनाथालय तो समझ में आता है, यह वृद्धालय कौन सी बला है? “नित्यं वृद्धोपसेविनः” की आत्मीयता को लकवा क्यों मार गया? यहाँ सुघराई की दुहाई तो सुनी, पर वैसे ही “ज्यों खगेश जल की चिकनाई”। याद आयी वह बात –

“O,Beauty, find thyself in love, not in the flattery of the mirror.”

सब है यहाँ, किंतु वही ढाई आखर विदा हो गया। पिता-पुत्र के बीच का, पति-पत्नी के बीच का, सेवक-स्वामी के बीच का, शिक्षक-शिक्षार्थी के बीच का वही ढाई अक्षर- ‘प्रेम’-खो गया है। यों ही कबीर ने नहीं कह दिया होगा-

“ढाई आखर प्रेम का पढे सो पंडित होय । “

मैं तब और तिलमिला गया, जब एक वृद्ध ने कहा- “यहाँ आने के पहले तीन मंजिले घर में ऊपर एक जगह अकेले छोड़ दिया गया जीव था। सीढियां चढ़ते-उतरते समय बच्चों के शरीर से शरीर छू जाता था, लेकिन कोई मुझसे बोलता नहीं था।” अरे यह तो पशुता का नंगा नाच है। वे पशु बिचारे इतने रागी तो अवश्य होते हैं कि वध के लिए उठे हाथ को भी चाटने लगते हैं। किंतु आदमी से आदमी की यह बेरुखी? मेरा मन कहता है, लौट आए वह दिन जब प्रेम की फुलवारी खिलेगी। मेरा ‘अहं’, मेरा ‘मैं’ जीवन में ममत्व की चासनी में पग जायेगा। स्वार्थ का रोग परार्थ के राग में मिट जायेगा। क्या कहूं –

“अपने भीड़ भरे आँगन में,
नरकट खड़ा अकेला।
क्योंकि किसी ने नहीं प्रीति-घट
उस पर हाय उड़ेला।”

क्या कहना पड़ेगा कि दुनिया को सुधारने से पहले हम अपना सुधार कर लें। घर में दिया जलाएं, कोई मन्दिर कभी फ़िर खोज लेंगे। स्वजन-सौहार्द्र को पसरने दें। निरापद पंथ है यही कि नेह की माला न टूटे। बाकी गली आगे मुड़ती है।

“He who wants to do good knocks at the gate, he who loves finds the gate open.”

चौथी शरण की खोज

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’बच्चन’ का एक प्रश्न-चिह्न मस्तिष्क में कौंध रहा है, उत्तर की खोज है –

“भूत केवल जल्पना है
औ’ भविष्यत कल्पना है
वर्तमान लकीर भ्रम की
और क्या चौथी शरण भी ?
स्वप्न भी छल जागरण भी।”

वह चौथी शरण क्या है ? उत्तर की तलाश में ’विनोबा’ की बात याद में उतर आयी –

“गीता के आधार पर अकेला मनुष्य सारी दुनियाँ का मुकाबला कर सकता है।”

लगा ‘चौथी शरण’ का समाधान हो गया। वह ‘आदमी’ ही है चौथी शरण। अखंड निर्लिप्त कर्मयोगी ‘मनुष्य’ ही भूत-भविष्य एवं तथाकथित भ्रमित वर्तमान की अर्गला तोड़ सकता है। कर्मयोग में न प्रसन्नता है न द्वेष। न विकर्म है, न अकर्म। न फलाकांक्षा है, न परिग्रह। वह चौथी शरण मानव स्वयं में स्वयं का उद्धारक है। कृष्ण के “कर्मण्येवाधिकारस्ते’ में निःसन्देह उसी ‘चौथी शरण’ का ही मंडन है और भूत, भविष्य, वर्तमान के जल्पना, कल्पना और भ्रम का खंडन। गीता ने समस्या हल कर दी।

भोगवादियों के अनुसार हम न तो वर्तमान को मात्र यथार्थ मानते हैं और न वैरागियों की तरह उसको स्वप्नवत मानते हैं। हम उसको कर्मभूमि मानते हैं क्योंकि वह हमें व्यक्ति-निर्माण करने के अपने अधिकार को किसी मूल्य पर छोड़ने नहीं देती। वस्तुतः भविष्य होता ही नहीं। निर्माण एवं सृजन की भावभूमि वाली कर्मकुशलता हमें योगी बनाती है और यही योग ही हमारी चौथी शरण है-

“योगः कर्मसु कौशलम् “

हम तो अस्तित्ववादियों की भाँति जीवन को क्षणवादी भी नहीं मानते, क्योंकि वह क्षण-क्षण करके हमें जीवन की समग्रता प्रदान करने वाला होता है। हमारी चाह है, कर्मफल की आशा का दंश न झेलते हुए निरंतर कर्म में लगे रहने की। फल तो आनुषंगिक है। इसी लिये जीवन का सूत्र ‘चौथी शरण’ कृष्ण ने बता दिया-

“तस्मात् योगी भवार्जुनः”।

पर क्या अर्जुन को ही …………।

किसने बाँसुरी बजायी

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जरा और मृत्यु के भय से यौवन के फ़ूल कब खिलने का समय टाल बैठे हैं? जीवित जल जाने के भय से पतंग की दीपशिखा पर जल जाने की जिजीविषा कब क्षीण हुई है? क्या कोयल अपने कंठ का मधुर राग बिखेरना मेढकों के कटु शब्द से विक्षिप्त होकर छोड़ देती है? शायद नही। जीवन का यह दृष्टिकोण समझ आ रहा है कि विषय नहीं, विषय का विनिवेश ही आप्लावित करता है। तृप्त-अतृप्त आकांक्षाओं से मुक्त गहरे आनन्द का चिरन्तन प्रकाश है यह जीवन। तीर की चाह पीड़ा का स्रोत है। जीवन की उत्ताल तरंगें किसी तट से नहीं टकराती।

कई बार जिससे मैं समझता हूं कि मेरा कोई रिश्ता-नाता नहीं, उसकी चिरपरिचित पुकार का आकर्षण मन में सुगन्ध की तरह खिलता है और मैं बेचैन यहाँ-वहाँ घूमता रहता हूं। जरूर मेरे और उसके बीच कोई अन्दर ही अन्दर प्रवाहित होने वाली नदी बहती है। मैं भले ही धूप-छाँव के खेल में उलझा हूँ, लेकिन वह पुकारता है तो पुकारता ही चला जाता है। लाख चाहता हूं भरम जाऊँ, कहूँ-कोई नहीं, कुछ भी नहीं, कोई बात नहीं। पर हृदय का एक कोना कह ही देता है –

“किसने बाँसुरी बजायी
जनम-जनम की पहचानी यह तान कहाँ से आयी?”

मैं क्या हूँ? जानना इतना आसान भी तो नहीं

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अपनी कस्बाई संस्कृति में हर शाम बिजली न आने तक छत पर लेटता हूँ। अपने इस लघु जीवन की एकरस-चर्या में आकाश देख ही नहीं पाता शायद अवकाश लेकर। और फिर आकाश को भी खिड़कियों से क्या देखना। तो शाम होते ही, अंधेरा गहराते ही कमरे में बिखरी इन्वर्टर की रोशनी अपने मन में सहेज छत की ओर रुख करता हूँ। चटाई बिछाकर लेट जाता हूँ। तत्क्षण ही छत पर बिखरी निस्तब्धता पास आकर सिर सहलाने लगती है, आँखें कुछ मुँद सी जाती हैं। फिर तो झूम-झूम कर सम्मुख होती हैं अनगिनत स्मृतियाँ, कुछ धुँधली तस्वीरें, और………न जाने किसकी सुधि जो कसकती है अन्तर में, व्यथित करती है।

मुक्ताकाश के नीचे इस लघु शयन में एक स्वर बार-बार प्रतिध्वनित होता है इस एकाकी अन्तर में। मन का निर्वेद पिघलने लगता है। स्वर के पीछे छिपी असंख्य संभावनाओं का चेतस भाव मन को कँपाने लगता है। मैं अचानक ही अपने को ढूँढने लगता हूँ, अपने अस्तित्व की तलाश में लग जाता हूँ।

इस मुक्ताकाश के नीचे मैं स्वयं को प्रबोध देते हुए पूछ्ता हूँ स्वयं से- मैं क्या हूँ?- क्या सुनहली उषा में जो खो गया, वह तुहिन बिन्दु या बीत गयी जो तपती दुपहरी उसी का विचलित पल; या फिर जो धुँधुरा गयी है शाम अभी-अभी उसी की उदास छाया?

मैं क्या हूँ?- जो सम्मुख हो रही है इस अन्तर-आँगन में वही ध्वनि, या किसी सुदूर बहने वाली किसी निर्झर-नदी का अस्पष्ट नाद?

मैं क्या हूँ?- बार-बार कानों में जाने अनजाने गूँज उठने वाली किसी दूरागत संगीत की मूर्छित लरी या फिर जिस आकाश को निरख रहा हूँ लगातार, उस आकाश का एक तारा?

मैं क्या हूँ?- जानना इतना आसान भी तो नहीं!

photo : google

मेरा मानक विचलन नहीं हो पाया

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आलोचना प्रत्यालोचना एक ऐसी विध्वंसक बयार है जो जल्दी टिकने नहीं देती। प्रायः संसार में इसके आदान कम, प्रदान की उपस्थिति ज्यादा देखी जाती है। मेरे जीवन के क्षण इस बयार में बहुत बार विचलित हुए हैं। अभी कल की ही बात है। एक व्यक्ति ने मेरी रहनी पर रहम नहीं किया। मैं जिस मनोभूमि में कुछ लिखता पढ़ता हूँ, उस पर उसकी खरी टिप्पणी थी कि ‘कुछ नहीं मिलेगा इससे। तेरा स्वान्तः सुखाय दो कौड़ी का है। दुनियादारी का दामन पकडो। क्यों बर्बाद हुए जा रहे हो। “अर्थागमोनित्यमरोगिता च प्रिया च भार्या प्रिय वादिनी च” का सूत्र भूल कर भटक गए हो, मूर्ख कहीं के।

ऐसा पूर्व में भी कई बार घटित हुआ है, किंतु तब उसे मैंने समीक्षा के रूप में, अनुशीलन के रूप में लिया, आलोचन के रूप में नहीं। अब जब मुझमें विचलन ने स्थान बनाना प्रारंभ किया तो आत्ममंथन को बाध्य हो गया। “They also serve who stand and wait” की ‘Miltonic Feeling’ ने फिसलते पांवों को रोक दिया। किसी ने जैसे भीतर से संबल दिया कि कल्पना द्वारा प्रतीत होने वाला सत्य, बहुमत द्वारा मान्य सत्य, स्थूल रूप से दीखने वाला सत्य, विचारों की कसौटी पर खरा लगाने वाला सत्य और व्यवहार में माने जाने वाले सत्य का चिंतन करते रहो। दूसरों की तरह क्या होना है? क्या दूसरे वैसे हैं, जैसे तुम हो? मेरा मानक विचलन नहीं हो पाया।
सामान्यतः यह देखा गया है कि आदमी दूसरे की आलोचना करने में आनंदित होता है, पर छिद्रान्वेषण की आँख यदि अपनी और खुल जाय तो अपना खालीपन भर जाय। ऊंची चढ़ाई चढ़ने के लिए हमें उन सीढियों पर अधिक ध्यान रखना होगा जो स्वयं हमारे पैरों के नीचे अवस्थित हैं। आलोचना अभिमान का ही पोषण है। प्याज-लहसुन को कूट कर यदि किसी पात्र में रखा जाय, और फ़िर उसे सैकड़ों बार क्यों न धोया जाय, उसकी गंध नहीं जाती। वैसे ही आलोचक में अभिमान का चिन्ह कुछ न कुछ रह ही जाता है।
प्रसिद्द दार्शनिक ‘देकार्त’ से उसके प्रति किए गए व्यवहार का बदला लेने की बात उसके शुभेच्छु कहते रहे; पर वे धीरे से बोले- 
“जब कोई मुझसे बुरा व्यवहार करता है, आलोचना की आग में जलने के लिए मुझे धकेलता है, तो मैं अपनी आत्मा को उस ऊंचाई पर ले जाता हूँ, जहाँ कोई दुर्व्यवहार उसे नहीं छू सकता। आवेश और क्रोध को वश में कर लेने से शक्ति बढ़ती है। “
‘रविन्द्र’ की आलोचना से तिलमिलाए ‘शरदचंद्र’ ने जब उनके विरुद्ध कुछ करने, कहने की बात उनसे कही तो गुरुदेव बोले –

“शरद बाबू ! मैं स्वप्न में भी ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं कर पाउँगा, जैसा वे कर रहे हैं । मेरी चेतना के वातायन से धैर्य, सहिष्णुता और सद्भाव का चंद्र झाँक गया । जो हो, वही तुम्हारा स्वधर्म है। “

“All is well and wisely put.”