Tuesday, February 21, 2017

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प्रथम-पुरुष की खोज

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Unknown Person
(Photo credit: Wikipedia)
हमारे आर्य-साहित्य का जो ‘प्रथम पुरुष’ है, अंग्रेजी का ‘थर्ड पर्सन’ (Third Person), मैं उसकी तलाश में निकला हूँ। वह परम-पुरुष भी ‘सः’ ही है, ‘अहं’ या ‘त्वं’ नहीं। वर्तमान में देख रहा हूँ, फ़िजा ‘मत’ के आदान-प्रदान की है। समय की गजब करवट है। ‘मत’ को यदि उलट देते हैं तो ‘तम’ हो जाता है। ‘तम’ अर्थात अंधकार। उस मतदान की उलटवासी में देख रहा हूँ, तम ही इधर-उधर पल्टी मार रहा है। देने लेने वाले दोनों ही तमीचर कहे जाँय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। ‘तम’ का गूढ़ार्थ ‘अहंकार’ भी है। मत की ख्वाहिश वाले अहंकार के ही पुतले बने आकाश-पाताल एक कर रहे हैं। ‘अह’ और ‘त्वं’ में ‘सः’ और ‘ते’ खो गया है। ‘गांधी’ का कथन कि ‘सबसे नीचे से शुरु करो’ कपोलकल्पित हो गया है । शेखचिल्ली की सनक और ढपोरशंखी का घोषणापत्र हमें कहीं का नहीं रहने दे रहा है। भारतः- भा-रतः (प्रकाशालय) अब ‘भारं तनोति इति’ (भार का आगार) बन गया है, या यों कहें बना दिया गया है। हम गिरे नहीं, गिराये गये हैं-

“इस घर में आग लग गयी घर के चिराग से”।

सोचता हूँ, कहाँ है हमारा ‘प्रथम-पुरुष’ जिसे ’थर्ड पर्सन’ बना दिया गया है। उसे चूमे बिना, पीछे घूमे बिना उसके देश का कल्याण नहीं है । काश, अपने उस ‘प्रथम-पुरुष’ ‘भारत भाग्य विधाता’ को हम पहचान पाते-

“राष्ट्रगीत में भला कौन वह भारत भाग्य विधाता
फटा सुथन्ना पहने जिसका गुन हरचरना गाता।”

‘दिनकर’ ने संकेत कर दिया है, और धकिया कर हमें भेंज दिया है वहीं-

“आरती लिये तू किसे ढूँढ़ता है मूरख
मंदिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में।
देवता कही सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे
देवता मिलेंगे खेतों में खलिहानों में॥”

मैं उसी ‘प्रथम-पुरुष’ का हिमायती हूँ।

काल-पुरूष को नमस्कार

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Image taken from page 39 of 'The Poetical Work...
Image taken from page 39 of ‘The Poetical Works of Percy Bysshe Shelley from the original editions. Edited, prefaced, and annotated by R. H. Shepherd’ (Photo credit: The British Library)
समझदारों ने बड़ी आत्मीयता से यह समझाया है कि पुरुष बली नहीं है, समय बली है। समय से हारा हुआ आदमी कितना बेचारा हो जाता है, यह आँखों के सामने देख कर थका-थका निढाल बैठा हूँ। अपने में ही मसोसता हूँ, कचोटता हूँ- क्या मैं स्वयं विषण्ण देश का ध्वस्त संस्कार हूँ। बर्बरता, उद्दंडता, आक्रोश, छल, प्रतिकार, उपेक्षा, अश्लीलता, क्लैव्य, प्रवंचना, परिग्रह, हिंसा आदि हमारी दिनचर्या में रच पच गये। प्राचीन की इतनी उपेक्षा पूर्व में शायद देखी गयी हो। नये के आग्रह का निर्लज्ज विस्तार, शताब्दी की अखंड विकासोन्मुख उपलब्धि के रूप में क्यों ग्राह्य हो गया है। मैं काल-पुरुष को नमस्कार करता हूँ। क्या समय एक घोड़ा है। वह निरन्तर गतिमान है। उसमें न अथ है, न अवसान है। समय का फ़ैसला देखकर रोते हुए भी हंसी आ जाती है-

“जिनको खुशबू की कुछ भी न पहचान थी
उनके घर फ़ूल की पालकी आ गयी। “

मुझे अंग्रेजी कवि ’शेली’ (P.B. Shelley) की पीर स्वयं की पीड़ा के रूप में मथ रही है। समयातीत कैसे रहूँ? –

“Alas ! I have nor hope nor health
Nor peace within nor calm around,
Nor that content, surpassing wealth,
The sage in meditation found,
And walk’d with inward glory crown’d.”

उस समाज पर गाज गिरे जिसके तुम नायक

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Disturbing Stars
एक पार्टी का झंडा लिये एक भीड़ मैदान से गुजरी है। अपनी पड़ोस का कुम्हार उसी में उचक रहा है। बी0ए0 प्रथम वर्ष की छात्र पंजिका में रजिस्टर्ड बच्चे उत्सुकता से हुजूम देख रहे हैं। पास ही लकड़ी की दुकान पर रंदा चलाने वाला मुझसे पूछ रहा है- “सभा कब होगी?” मैने पूछा- “क्यों?” उत्तर मिला- “यूँ ही उत्सुकता है।”
मैं सोचने लगा, उत्सुकता ही है, उपलब्धि हवा है। दलों के दलदल में फ़ँसा आज का हमारा भारतीय समाज मुखौटों का खेल खेल रहा है। भगवान बचायें। वह दिन कब होगा जब सत्ता सुखदाता होगी। मुझे उस कुम्हार, रंदा चलाने वाले कारीगर और गाइड लेकर घूमने वाले बी0ए0 के विद्यार्थी की दबी आवाज सुनाई देने लगी –

“डूबने वाली कलम-सा मैं लिखा हूँ
ब्याज तो क्या मूल से भी कम दिखा हूँ
लाभ-शुभ अंकित रहे
पर पिट गये मेरे दिवाले ।
जिस्म पर लिपटे हुए हैं कफ़न
पर कहता दुशाले ।
कर गये कुछ लोग क्यों हमको बबूलों के हवाले।”

नेता जी मैदान में ओजस्वी भाषण दे रहे हैं- बहुत से वायदे, बहुत सी मनुहार। नेतागिरी की इस लफ़्फ़ाजी की शल्य-क्रिया जरूरी है। विदा हो बदसलूकी खिदमतगारी। मुझे यह समाज नहीं चाहिये।

“उस समाज पर गाज गिरे जिसके तुम नायक।
हस्तिमूर्ख हो सका कभीं भी नहीं विनायक।”

कर स्वयं हर गीत का शृंगार

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Spirituality
दूसरों के अनुभव जान लेना भी व्यक्ति के लिये अनुभव है। कल एक अनुभवी आप्त पुरुष से चर्चा चली। सामने रामावतार त्यागी का एक गीत था। प्रश्न था- वास्तविकता है क्या?
“वस्तुतः, तत्वतः, यथार्थः अपने को जान लेना ही अध्यात्म है, और यही वास्तविकता है,” उसने गम्भीर स्वर में मुझे प्रबोध दिया।
बात ही बात में बात और बढ़ती गयी। उधर से एक बात कलेजे में घुस गयी और एक बात सहजता से समझा दी गयी –
“सर्व-सर्वत्र जागरण’। होश सम्हालो।सब की सहज स्वीकृति ईश्वर के प्रसाद के रूप में सिर माथे लगाओ। बैठो नहीं, बढ़ो तो।

“रोक सका संकल्पबली को कौन आज तक बोल / अमृत सुत! सोच दृगंचल खोल।”

वस्तुस्थिति को तह पर तह सजा कर रखता गया वह। बोला, “लम्बे होते नारियल के पेड़ों को छाया की अनुपयोगिता में नहीं, आकाशभेदक साहस के सौन्दर्य में समझना होता है। आकाश बुलाया नहीं जाता बाहों में भरने के लिये । सिर्फ़ बाहें फ़ैलानी काफ़ी होती हैं। वह उनमें भरा होता है।”

“चाँदी की उर्वशी न कर दे युग के तप-संयम को खंडित
भर कर आग अंक में मुझको सारी रात जागना होगा।”

“इसलिये तेरे सूने आंगन में दुख़ भी मेहमान बन कर आये तो उसे ईश्वर से कम मत समझना। अपने किसी भी आंसू को व्यर्थ मत मानना। समुद्र उसको माँगने पता नहीं कब तेरे दरवाजे आ जाय।”

तब से बार-बार इन पंक्तियों का फ़ेरा मेरे स्मृति-पटल पर हो रहा है-

“पास प्यासे के कुँआ आता नहीं है
यह कहावत है, अमर वाणी नहीं है,
और जिसके पास देने को न कुछ भी
एक भी ऐसा यहाँ प्राणी नहीं है।
कर स्वयं हर गीत का शृंगार
जाने देवता को कौन-सा भा जाय।” ——’रामावतार त्यागी’

किसने बाँसुरी बजायी

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जरा और मृत्यु के भय से यौवन के फ़ूल कब खिलने का समय टाल बैठे हैं? जीवित जल जाने के भय से पतंग की दीपशिखा पर जल जाने की जिजीविषा कब क्षीण हुई है? क्या कोयल अपने कंठ का मधुर राग बिखेरना मेढकों के कटु शब्द से विक्षिप्त होकर छोड़ देती है? शायद नही। जीवन का यह दृष्टिकोण समझ आ रहा है कि विषय नहीं, विषय का विनिवेश ही आप्लावित करता है। तृप्त-अतृप्त आकांक्षाओं से मुक्त गहरे आनन्द का चिरन्तन प्रकाश है यह जीवन। तीर की चाह पीड़ा का स्रोत है। जीवन की उत्ताल तरंगें किसी तट से नहीं टकराती।

कई बार जिससे मैं समझता हूं कि मेरा कोई रिश्ता-नाता नहीं, उसकी चिरपरिचित पुकार का आकर्षण मन में सुगन्ध की तरह खिलता है और मैं बेचैन यहाँ-वहाँ घूमता रहता हूं। जरूर मेरे और उसके बीच कोई अन्दर ही अन्दर प्रवाहित होने वाली नदी बहती है। मैं भले ही धूप-छाँव के खेल में उलझा हूँ, लेकिन वह पुकारता है तो पुकारता ही चला जाता है। लाख चाहता हूं भरम जाऊँ, कहूँ-कोई नहीं, कुछ भी नहीं, कोई बात नहीं। पर हृदय का एक कोना कह ही देता है –

“किसने बाँसुरी बजायी
जनम-जनम की पहचानी यह तान कहाँ से आयी?”

कैसे मुक्ति हो?

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Photo Source: Google
बंधन और मोक्ष कहीं आकाश से नहीं टपकते। वे हमारे स्वयं के ही सृजन हैं। देखता हूं जिन्दगी भी क्या रहस्य है। जब से जीवन मिला है आदमी को, तब से एक अज्ञात क्रियाशीलता उसे नचाये जा रही है। अभी क्षण भर का हास्य देखते-देखते विषाद के गहन अन्धकार में डूब जाता है। जहाँ वचन की विद्ग्धता और स्नेहसिक्त मधुमय वाणी का प्रवाह था वहीं अवसाद की विकट लीला प्रारंभ हो जाती है। हृदय में जहाँ उल्लास का सिंधु तरंगित होता था, वहीं पीड़ा और पश्चाताप का साम्राज्य स्थापित हो जाता है। भविष्य जिस प्रसन्नता की रंगभूमि बनने की पृष्ठभूमि रच रहा था, वही न जाने क्यों चुभन से भरा हुआ कंटकमय वर्तमान बन जाता है। इस अस्ति और नास्ति के खेल में जूझता व्यक्ति किस घाट का पानी पिये? गजब स्थिति हो गयी है-

“कुछ ऐसी लूट मची जीवन चौराहे पर
खुद को ही खुद लूटने लगा हर सौदागर।”

तो कैसे मुक्ति हो इस अगति से?
खुद के सवाल में खुद ही जवाब हाजिर होता है हमारे सामने। ‘आशावाद परो भव’। आशावाद जिन्दगी का एक बड़ा ही सुहावना सम्बल है। अंधेरे में फ़ंस कर कीमती जिन्दगी को बर्बाद करना बड़ी मूर्खता है। अँधेरा एक रात का मेहमान होता है। फ़िर चमकता सवेरा हाजिर हो जाता है। पतझर के बाद बसंत आता ही है। इसलिये बसंत के पाँवों की आहट जरूर सुननी चाहिये। हमारा अधैर्य हमारी परेशानी है। निराशा का कुहासा फ़टेगा। सूर्य पीछे ही तो बैठा है-

“If winter comes can the spring be far behind?”

रास्ते बन्द नहीं सोचने वालों के लिये

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कविता की दुनियां में रचने-बसने का मन करता है। समय के तकाजे की बात चाहे जो हो, लेकिन पाता हूं कि समय का सिन्धु-तरण साहित्य के जलयान से हो जाता है। साहित्य की जड़ सामाजिक विरासत लिये होती है। शब्दों की जड़ें व्यक्ति के मन के सपनों और स्मृतियों में गहरी जमी होती हैं। इसका परिसर रोने-सुबकने से लेकर अंतःसार एवं मुखर वागविलास तक फ़ैला है। शब्दों का आर्केस्ट्रा वेश्या-बस्ती के मोलभाव से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय कूट्नीति तक फ़ैला है। अच्छी कविता में हर शब्द बोलता है। हर शब्द अनिवार्य और अद्वितीय होता है। मुझे लगता है कि यही माध्यम है जिससे निहायत पैनेपन से बात कही जाती है। शब्द तरह तरह की अनुभुतियों में, भाव-भूषित अनुभूतियों में डूबा होता है। यही शब्द की जादूगरी काम करती है। दूरस्थ तारों के स्वप्न से लेकर मुंह के स्वाद तक यह हर स्थिति की याद करा देती है। हमारी देह, हमारी आत्मा, हमारे स्वप्न, हमारी मृत्यु – सब इसी झोली में समा जाते हैं।
व्यग्रता तो रहती है जरूर कि जो कहा वह शायद पहले ही कहा जा चुका है, और जो कहना चाहता था वह कभीं नहीं कह पाऊंगा । लेकिन एक न एक दिन, कहीं न कहीं सही रूप में अच्छी से अच्छी कविता जन्मेगी, इस आशा के साथ साहित्य का दामन छूटता नहीं। समय के गर्भ से आश्वस्त किया जाता हूं –

“देख यूं वक्त की दहलीज से टकरा के न गिर
रास्ते बन्द नहीं सोचने वालों के लिये ।”

कह दूँ उसी से..

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सोचता हूं, इतनी व्यस्तता, भाग-दौड़, आपाधापी में कितनी रातें, कितने दिन व्यतीत किये जा रहा हूं। क्या है जो चैन नहीं लेने दे रहा है? कौन सी जरूरत है जो सोने नहीं देती है? कौन-सा मुहूरत है जो अभी मृगजल की तरह अनास्वाद बना है। कुछ प्राप्ति में आनन्द को खोजना चाहता हूं, लेकिन वह झट अप्राप्ति की चादर ओढ़ लेता है। कुछ होने, कुछ पाने की ललक में इसी भांति घुड़दौड़ करते हुए या जो कुछ पाये हुए से दीखते हैं, उनकी बेचैनी भी मैं देख-देख कर बेचैन-सा हुआ जा रहा हूं। क्या बात है?

सहसा कुछ अन्तर्विरोध से मुझे जूझने की भीतरी रोशनी दिखायी देती है। विचार उभरते हैं – ‘जरूरत के बिना गुजरे उसी दिन की जरूरत है’। मेरे मन में शरीर के आराम की और नाम के नाम की इच्छा बड़ी गहराई तक जाग्रत है शायद। इसी से जो मिलना चाहिये, उसका मिलन नहीं हो रहा है। जिस दिन से ये दोष खत्म हो जायेंगे,, उसी दिन वह मिल जायेगा, जो छल रहा है। वह मिल जायेगा जिससे मैं कभी पृथक नहीं रहूंगा। इन दोषों ने बीच में कई दीवालें खड़ी कर रखीं हैं। मुझे तो कुछ होने, कुछ पाने की चाह ने कितनी स्पर्धा, द्वेष, अभिशाप, घृणा, जलन, निन्दा आदि से भर दिया है। इनकी तो गणना भी करनी मुश्किल है। तो जब तक ये लम्बी ऊंची दीवालें हैं, तब तक उस प्राप्ति का आनन्द कैसे मिले?
एक आत्म-प्रबोध बार बार मेरे अन्दर जागृत हो जाता है- “उससे क्यों नहीं कहता मैं, जिसके पाये बिना सब अनपाया रह जाना है। क्या उसकी आवाज अनसुनी कर रहा हूं जिसने कहा है –

“हमारे पास कोई बद्दुआ खोजे न पाओगे
मेरे दिल में किसी के वास्ते नफ़रत रहे तब तो”।

कह दूं उसी से कि इन दीवारों को ढहाने का काम भी तो आप ही को करना है। पहले परख लो मुझे कि इस हृदय में कुछ चाह है कि नहीं, और यह भी देख लो कि इस ‘कुछ’ चाह को असीम बनाने की चाह भी है या नहीं। यदि है तो इसे असीम कर दो ना, मेरे प्रिय!

गोबर गणेशों की गोबर-गणेशता

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“पहले आती थी हाले दिल पे हंसी
अब किसी बात पर नहीं आती ।”

कैसे आए? मात्रा का प्रतिबन्ध है। दिल के हाल का हाल जानिए तो पता चले कितनी मारामारी है? हंसी का गुण ही है की वह वह तत्वतः मात्रा की अपेक्षा करती है। पहले हमें पाकिस्तान की करनी पर हंसी आती थी, अब नहीं आती। अब हमें भारत के धैर्य पर हंसी आती है, कुछ दिनों बाद नहीं आयेगी। सब मात्रा का प्रतिबन्ध है।
हँसाने के लिए तो जरूरी है कि परिस्थिति हल्की हो। परिस्थिति गंभीर होगी तो इसका बोझ हमारा हास्य-शील कैसे सह सकेगा? पर अब तो परिस्थिति गंभीर ही हो गयी है। कैसे हंसें? पर मैंने सोचा हंस सकते हैं अगर अरस्तू की बात माने। वह कहता है न कि वही हास्य-जनक है, जिसकी देश या काल से संगति न हो। तो अभी हमारे पास बहुत से तबीयत के उल्लू बसंत हैं हमारे देश में जिनकी देश, काल, परिस्थिति से कोई संगति नहीं। तबीयत के उल्लू बसंत मने ऐसे खद्दरधारी, कोटधारी, पगडीधारी प्राकृतजन जिन्हें विहाग के वक्त भैरवी और सुहाग के वक्त शिकवा करने की आदत है। पक्का नाम न बताउंगा, ख़ुद समझ लें।
खैर, मैंने कहा न कि अब हंसी नहीं आती। आखिर उस समाज में हंसी कैसे आयेगी जहाँ सभी नग्न हैं? नग्नता केवल शरीर की ही मत समझें, मन की भी। शरीर की नग्नता कार्य है। कारण है- आलस्य। जहाँ नग्नता नियम बन जाय, अपवाद नहीं; विकास बन जाय, अवकाश नहीं, वहाँ क्या होगा? हंसी प्रदान कर सकने वाली नग्नता कपड़े न पहनने के आलस्य से स्वभाव बन जाय तो हंसी कैसे आयेगी? तो ऐसे निरंतर नंगे रहने की चाह रखने वाले प्राकृत जनों कैसे बताओगे देश की जनता को कि तुम अक्ल का बोझ भी नहीं उठा सकते! क्या कह पाओगे कि तुममें एक inertia भर गयी है जिसका मतलब परिस्थितियों से पलायन है।
हमारे देश का भार ढोने वाले गोबर गणेशों! गोबर गणेशता से संतोष कर लेना विश्राम की वासना है, इसे त्यागो। अरे, गणेश तो लम्बोदर थे, वाहन था मूस। इसलिए नारद ने कहा ‘राम’ शब्द की परिक्रमा करो और वे गणपति बन गए। पर क्या तुम भी सच्चे गणेश के भक्त ही हो कि समझ लिया कि बिना प्रयास किए ही पूजा हो सकती है तो चलो, श्रद्धेय गोबर को ही गणेश मान बैठे हो। ‘धैर्य’ नामक शब्द की परिक्रमा से ही अपने कार्यों की इति समझ ले रहे हो, अपने पर ही नहीं फूले समा रहे हो? पर ख़याल रखो, बुलबुले की तरह सतह पर तैरने वाले मत बनो। गंभीर हवा का एक झोंका आया, बुलबुले किनारे हुए।

सदैव सहमति में हिलते सिर

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Spring Toys-Man and Woman
Spring-Toys (Credit: Dolls of India-Art Store)

बहुत वर्षों पहले से एक बूढ़े पुरूष और स्त्री की आकृति के उन खिलौनों को देख रहा हूँ जिनके सर और धड़ आपस में स्प्रिंग से जुड़े हैं। जब भी उन खिलौनों को देखता हूँ वो अपना सर हिलाते मालूम पड़ते हैं। अपने बचपन में भी कई बार अपने दादा-दादी को देख न पाने की टीस इन्हीं खिलौनों से मिटा लिया करता था। बहुत सी बातें जो अम्मा-बाबूजी से व्यक्त नहीं कर पाता था, इन्हीं खिलौनों वाले दादा-दादी से कहता और उनका प्रबोध ले लिया करता था। इन खिलौनों वाले दादा-दादी का बड़ा ऋण है मेरे इस व्यक्तित्व पर।

इन खिलौनों का सिर सदैव सहमति के लिए हिलता है। यद्यपि केवल एक अंगुली के विपरीत धक्के से इनके सिर के कम्पन की दिशा बदली जा सकती है, पर न जाने क्यों मानव-मन की अस्तित्वगत विशेषता के तकाजे से हर बार अंगुलियाँ इनके सिर सहमति के लिए ही कम्पित करती हैं। मुझे यह खिलौनों का जोड़ा बड़े मार्मिक गहरे अनुभूति के अर्थ प्रदान करता है। मैं सोचता हूँ कितना अच्छा होता- हर एक सिर इसी तरह सहमति में हिलता, प्रकृति और जगत के रहस्य को निस्पृह भाव से देखता, विधाता की प्रत्येक लीला को सहज स्वीकारता। जो घट रहा है इस संसार में, वह दुर्निवार है, तो यह खिलौनों का जोड़ा उसे सहज स्वीकृति देता है-जानता है की अगम्य है प्रकृति का यह लीला-विधान। जो रचा जा रहा है यहाँ, कल्याणकारी है, तो सहज ही सिर हिल उठते हैं आत्मतोष में इन खिलौनों के।
यह खिलौने जानते हैं कि संसार अबूझ है-जिह्वा की भाषा से व्यक्त न हो सकने वाला। तो जिह्वा की असमर्थता, भाषा की अवयक्तता उनकी इसी मौन सिर हिलाने की अभिव्यक्ति में प्रकट होती है। शायद इन खिलौनों का सहमति में सिर हिलाना विशिष्टतः बोलना है। भाषा और शब्द का संसार इतना सीमित नहीं कि वह जिह्वा और अन्य वाक् अंगों का आश्रय ले। ‘पाब्लो नेरुदा’ (Pablo Neruda) की एक कविता ‘The Word’ स्पष्टतया व्यक्त करती है कि शब्द और भाषा का संसार कितना व्यापक हो सकता है-

“……For human beings, not to speak is to die-
language extends even to the hair
the mouth speaks without the lips moving
all of a sudden the eyes are words…”

(मनुष्य के लिए चुप्पी मौत है –
केश तक में भाषा का विस्तार है,
मुख बिना होंठ हिले बोलता है
हठात आँखें शब्द बन जाती हैं….।)

शायद यही कारण है कि इन खिलौनों का स्वरूप मुझे अपनी अनुभूतियों की राह से गुजरने के बाद शाश्वत मनुष्य का स्वरूप लगता था, इनका मौन गहरी मुखर अभिव्यक्ति बन जाता था और इनका सत्वर सिर हिलाना मानवता और अस्तित्व की सहज स्वीकृति लगाने लगता था। यह सच है कि इनके केश नहीं थे, आँखें भी नहीं थीं, होठ भी नहीं थे सचमुच के (और इसीलिये यह ‘नेरुदा’ के मनुष्य नहीं थे) पर हो सकता है कि ‘मनुष्य’ को खोजते हुए मेरे इस अतृप्त मानस ने इन्हीं में अपने सच्चे मनुष्य का स्वरूप देख लिया हो।