Friday, February 24, 2017
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Poems written in Hindi and Bhojpuri. These are rhymed and even free verse.

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मैं सहजता की सुरीली बाँसुरी हूँ…

कमल - सहज अभिव्यक्तमैं सहजता की सुरीली बाँसुरी हूँ
घनी दुश्वारियाँ हमको बजा लें ।

मैं अनोखी टीस हूँ अनुभूति की
कहो पाषाण से हमको सजा लें ।

मैं झिझक हूँ, हास हूँ, मनुहार हूँ
प्रणय के राग में इनका मजा लें ।

आइने में शक़्ल जो अपनी दिखी है
उसी को वस्तुतः अपना बना लें ।

मिलन पहला, गले मिलना जरूरी है ?
जरा ठहरो ! तनिक हम भी लजा लें ।

बस आँख भर निहारो मसलो नहीं सुमन को

बस आँख भर निहारो मसलो नहीं सुमन को
संगी बना न लेना बरसात के पवन को ।

वह ही तो है तुम्हारा उसके तो तुम नहीं हो
बेचैन कर रहा क्यों समझा दो अपने मन को ।

न नदी में बाँध बाँधो मर जायेगी बिचारी
कितनी विकल है धारा निज सिन्धु से मिलन को ।

तूँ पुकारता चला चल जंजीर खटखटाते
वे सहन न कर सकेंगे सचमुच तेरे रुदन को ।

दवा उनकी भी आजमा कर तो देखो

उन्हें नब्ज अपनी थमा कर तो देखो
दवा उनकी भी आजमा कर तो देखो ।

अभीं पीठ कर अपनी बैठे जिधर तुम
उधर अपना मुख भी घुमाकर तो देखो ।

दरख्तों की छाया में है चैन कितना
कभी धूप में तमतमा कर तो देखो ।

सुघर साँवला जिसको आकर चुरा ले
कभी वह दही भी जमाकर तो देखो ।

जिसे बाँट कर खूब प्रमुदित रहो तुम
कभीं वह भी दौलत कमा कर तो देखो ।

न गयी तेरी गरीबी तुम्हें माँगने न आया

न गयी तेरी गरीबी तुम्हें माँगने न आया
खूँटी पर उसके कपड़ा तुम्हें टाँगने न आया ।

दिन इतना चढ़ गया तूँ अभीं ले रहा जम्हाई
गाफिल है नींद में ही तुम्हें जागने न आया ।

एक अंधे श्वान सा तूँ रहा भूँकता हवा में
असली जगह पे गोली तुम्हें दागने न आया ।

खुद रूप रंग रस की जलती चिता में कूदा
उस आग से निकलकर तुम्हें भागने न आया ।

चिथड़े में ही ठिठुर कर सारी उमर गंवा दी
सुधि रेशमी रजाई तुम्हें तागने न आया ।

सम्हलो कि चूक पहली इस बार हो न जाये(गज़ल)

सम्हलो कि चूक पहली इस बार हो न जाये
सब जीत ही तुम्हारी कहीं हार हो न जाये।

हर पग सम्हल के रखना बाहर हवा विषैली
नाजुक है बुद्धि तेरी बीमार हो न जाये।

अनुकूल कौन-सा तुम मौका तलाशते हो
जागो, कहीं तुम्हारी भी पुकार हो न जाये।

हर रोज जिन्दगी को रखना चटक सुगंधित
गत माह का पुराना अखबार हो न जाये।

खोना न होश, दौड़े जिस घर में जा रहे हो
तुम्हें देख बन्द उसका कहीं द्वार हो न जाये।

जी दुखी अपना यह खंडहर देखकर

कोई भाया न घर तेरा घर देखकर
जी दुखी अपना यह खंडहर देखकर।

आ गिरा हूँ तुम्हारी सुखद गोद में
चिलचिलाती हुई दोपहर देखकर।

साँस में घुस के तुमने पुकारा हमें
हम तो ठिठके थे लम्बा सफर देखकर।

अब किसी द्वार पर हमको जाना नहीं
तेरे दर पर ही अपनी गुजर देखकर।

महसूस करता हूँ, सब तो कविता है

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Flower Tree
 (Photo credit: soul-nectar)

मैं रोज सबेरे जगता हूँ
दिन के उजाले की आहट
और तुम्हारी मुस्कराहट
साफ़ महसूस करता हूँ।
चाय की प्याली से उठती
स्नेह की भाप चेहरे पर छा जाती है।

फ़िर नहाकर देंह ही नहीं
मन भी साफ़ करता हूँ,
फ़िर बुदबुदाते होठों से सत्वर
प्रभु-प्रार्थना के मंद-स्वर
कानों से ही नहीं, हृदय से सुनता हूँ।
अगरबत्ती की नोंक से उठता
अखिल शान्ति का धुआँ मन पर छा जाता है।

फ़िर दिन की चटकीली धूप में
राह ही नहीं, चाह भी निरखता हूँ,
देख कर भी जीवन की अथ-इति दुविधा
समझ कर भी तृष्णा की खेचर-गति विविधा
मैं औरों से नहीं, खुद से ठगा जाता हूँ।
तब कसकीली टीस से उपजी
वीतरागी निःश्वास जीवन पर छा जाती है।

फ़िर गहराती शाम में
उजास ही नहीं, थकान भी खो जाती है,
तब दिन की सब यंत्र-क्रिया
लगती क्षण-क्षण मिथ्या
सब कुछ काल-चक्र-अधीन महसूसता हूँ।
तत्क्षण ही अपने सम्मोहक-लोक से उठकर
सपनों से पगी नींद आँखों में छा जाती है।

मैं रोज सबेरे जगता हूँ
और रात को सो जाता हूँ,
पता नहीं कैसे इसी दिनचर्या से
निकाल कर कुछ वक्त
इसी दिनचर्या को निरखने के लिये,
अलग होकर अपने आप से
देखता हूँ अपने आप को।
महसूस करता हूँ,
सब तो कविता है।

दिया राहु लिख चन्द्रमा लिखते-लिखते

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Small Flowers
 Flowers (Photo credit: soul-nectar)

कविता: प्रेम नारायण ’पंकिल’

जो बोया वही तो फसल काटनी है
दिया लिख अमा पूर्णिमा लिखते-लिखते।
पथिक पूर्व का था चला किन्तु पश्चिम
दिया राहु लिख चन्द्रमा लिखते-लिखते।

रहा रात का ही घटाटोप बाँधे
न बाहर निकलकर निहारा सवेरा
कुआँ खनने वाले को जाना है नीचे
हुआ ऊर्ध्वगामी महल का चितेरा,
हमें कर्म ही रच रहे हैं हमारे
दिया क्रोध ही लिख क्षमा लिखते-लिखते।

बना हंस पर धूर्त बगुले की करनी
अधोगति में सोया अधोगति में जागा
कलाबाजियाँ कर कँगूरे पर बैठा
गरुड़ हो सकेगा कभीं भी क्या कागा,
कमल रज के बदले लिया पोत कीचड़
दिया टाँक खर्चा जमा लिखते-लिखते।

यह बुढ़िया स्वयं खा रही है ढमनियाँ
सिखाती है औरों को सदगुण ही सुख है
लबालब भरेगा सलिल कैसे ’पंकिल’
जो औंधा किया अपनी गागर का मुख है,
चिकित्सक बना भी तो कैसा अनाड़ी
दिया टाँक मिर्गी दमा लिखते-लिखते।

कविता और कविता का बहुत कुछ

Yellow Flowers
Flowers  (Photo credit: soul-nectar)

१)
कविता
उमड़ आयी अन्तर्मन में
जैसे उतर आता है
मां के स्तनों में दूध।

२) 
कविता का छन्द
सध गया वैसे ही
जैसे स्काउट की ताली में
मन का उत्साह।

३) 
कविता का शब्द
सज गया बहुविधि
जैसे बनने को माला
सजते हैं फूल।

४)
कविता का अर्थ
शब्दों के अन्तराल में निखर गया
जैसे रिश्ते
दोनों छोर के तनाव में।

५)
कविता का राग
बरस गया जीवन में
जैसे बरसती है ईश-कृपा
अकिंचन संसार में।

हंसी का व्यवहार

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Hibiscus (2)
Hibiscus (Photo : soul-nectar)

आंसू खूब बहें, बहते जांय
हंसी नहीं आती,
पर हंसी खूब आये
तो आंखें भर-भर जाती हैं
आंसू आ जाते हैं आंखों में।

कौन-सा संकेत है यह प्रकृति का?

वस्तुतः कितना विलक्षण है
हंसी का यह गुण
जो तत्वतः
मात्रा की अपेक्षा करता है

तो जिस परिस्थिति के किसी गुण पर
हमें आती हंसी है
यदि मात्रा में वृद्धि हो जाय उसके
हम रोने लगेंगे।

हाय, कैसा अनोखा
यह हंसी का व्यवहार है!