Tuesday, February 21, 2017

Capsule Poetry

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Short poems.

प्यार और मुक्त हृदय

12

Love-Roseवह तुम्हारा
मुक्त हृदय था
जिसने मुझे प्यार का
विश्वास दिया,
मैं तुम्हें प्यार करने लगा।

मैं तुम्हें प्यार करता था
अपनी समस्त जड़ता से
ऊपर उठकर
और इसलिये ही
तुम मुक्त हृदय थे।

ईश्वर की कानाफूसियाँ

whisperingहम सबके
अपने-अपने
अलग-अलग ईश्वर
कानाफूसी किया करते हैं।

क्या संसार के 
हम सभी लोगों को
चुप नहीं हो जाना चाहिये-
जैसा ’इमरसन’ कहता है-
कि हम ईश्वर की
कानाफूसियाँ सुन सकें!

विशिष्ट अनुभव

MixedEmotions1
photo :http://www.surrealview.net/art.htm

विशिष्ट अनुभव है क्या?
यही
कि कोयल के गीतों में
हमें गणित के सवालों के हल मिलें
और
बाघ की मुस्कराहट के कूटार्थ
हम समझ लें।

कल-आज आजकल

आज तुम     
मेरे सम्मुख हो,
मैं तुम्हारे ‘आज’ को
‘कल’ की रोशनी में देखना चाहता हूँ।

देखता हूँ
तुम्हारे ‘आज का कल’
‘कल के आज’ से
तनिक भी संगति नहीं बैठाता।

कल-आज
आजकल
समझ में नहीं आते मुझे।

और ……अंधेरा

Under The Cloak Of Darkness
(Photo credit: MarianOne)

आज फिर
एक चहकता हुआ दिन
गुमसुमायी सांझ में
परिवर्तित हो गया,
दिन का शोर
खामोशी में धुल गया,
रात दस्तक देने लगी।

हर रोज शायद यही होता है
फिर खास क्या है?

शायद यही, कि
मेरे बगल में
मर गया है मनुष्य – उसकी अन्त्येष्टि,
कुछ दूर लुट गयी लड़की- उसका सिसकना
और …. .अंधेरा।

दिन और रात

12

दिन
गये, तो ठीक
न गये, रुके रहे
तो और भी ठीक।

रात
गयी, तो ठीक
न गयी, रुकी रही
तो………………।

छोटी सी कविता

विश्वास के घर में
अमरुद का एक पेंड़ था
एक दिन
उस पेंड़ की ऊँची फ़ुनगी पर
एक उल्लू बैठा दिखा,
माँ ने कहा- ‘उल्लू’
पिता ने कहा- ‘अशुभ, अपशकुन’,
फ़िर
पेंड़ कट गया।

अब, उल्लू
तीसरी मंजिल की
मुंडेर पर बैठता है।

मत पूछना वही प्रश्न

2

अगर कभी ऐसा हो
कि कहीं मिल जाओ तुम
तो पूछने मत लगना
वही अबूझे, अव्यक्त प्रश्न
अपने नेत्रों से
क्योंकि मेरी चुप्पी
फ़िर तोड़ देगी,
व्यथित कर देगी तुम्हें
और तब मैं भी
खंड-खंड हो जाऊंगा
अपने उत्तरों को समेटते-समेटते।

काश! मेरा मन

काश! मेरा मन
सरकंडे की कलम- सा होता
जिसे छील-छाल कर,
बना कर
भावना की स्याही में डुबाकर
मैं लिखता
कुछ चिकने अक्षर –
मोतियों-से,
प्रेम के।