Friday, February 24, 2017

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पात-पात में हाथापायी बात-बात में झगड़ा

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पात-पात में हाथापायी
बात-बात में झगड़ा
किस पत्थर पर पता नहीं
मौसम ने एड़ी रगड़ा।

गांव गिरे औंधे मुंह
गलियां रोक न सकीं रुलाई
’माई-बाबू’ स्वर सुनने को
तरस रही अंगनाई,
अब अंधे के कंधे पर
बैठता नहीं है लंगड़ा।

अंगुल भर जमीन हित
भाई का हत्यारा भाई
हुए बछरुआ परदेशी
गैया ले गया कसाई,
गोदी बैठा भों-भों करता
झबरा कुत्ता तगड़ा।

पूजा के दिन गंगाजल की
घर-घर हुई खोजाई
दीमक चाट रहे कूड़े पर
मानस की चौपाई,
कट्टा रोज निकाल रहे हैं
बन कर पिछड़ा-अगड़ा।

ले प्रसाद जय बोल सत्यनारायण स्वामी की

बजी पांचवी शंखSatyanarayan Katha
कथा वाचक द्रुतगामी की।
ले प्रसाद जय बोल
सत्यनारायण स्वामी की।

फलश्रुति बोले जब मन हो
चूरन हलवा बनवाओ
बांट-बांट खाओ पंचामृत
में प्रभु को नहलाओ,
इससे गलती धुल जायेगी
क्रोधी-कामी की।

कलश नवग्रह गौरी गणपति
पर दक्षिणा चढ़ाओ।
ठाकुर जी को स्वर्ण अन्न
गो का संकल्प कराओ,
सही फलेगी खूब कमाई
तभी हरामी की।

पोथी पर पीताम्बर रख दो
भोजन दिव्य जिमाओ
हर पूर्णिमा-अमावस्या को
यह जलसा करवाओ,
फिर तो चर्चा कभीं न होगी
तेरी खामी की।

ब्राह्मण दीन लकड़हारे की
कह-कह कथा पुरानी
पंडित जी चूकते नहीं
चमकाने में यजमानी,
फोकट में खोली है दुकान
चद्दर रमनामी की।

प्रार्थना मैं कर रहा हूं

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prayerप्रार्थना मैं कर रहा हूं
गीत वह अव्यक्त-सा
अनुभूतियों में घुल-मिले।

हंसी के भीतर छुपा
बेकल रुंआसापन
और सम्पुट में अधर के
बेबसी का क्षण,
प्रार्थना मैं कर रहा हूं
अश्रु जो ठहरा हुआ
शुभ भाव ही के हित निकल ले।

अजानी राह पर
ढहते पराक्रम की कथायें
किन्हीं बिकते प्रणों की
अनगिनत सहमी व्यथायें,
प्रार्थना मैं कर रहा हूं
साज जो अनबूझ-सा
वह सरस राग सहाय्य बज ले।

बनारस की होली बनारस की बोली में

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holi1 अब का पूछ्त हउआ हमसे
कि होली का होला।
कइसे तोंहके हाल बताई
कवन तरीके से समझाई
कइसन बखत रहल हऽ ऊ भी
कवने भाषा में बतलाई,
उछरत रहल बांस भर मनवां
जमत रहल जब गोला।

छैल चिकनियां छटकत रहलन
झार के अद्धी ढाका
केसर के संग लप्पा मारतholi 2
रहलन जम के काका,
लगत रहल गुलाल जब माथे
खिलल रहल तब चोला।
होलकी गड़तय करत रहल सब
फगुआ क तइयारी
टेसू के रंग से भर-भर के
चलत रहल पिचकारी,
अब तऽ सब फुटपाथ बइठके
झोरिहैं चउचक छोला।

झमकत रहल झाल चालिस दिन
बुड़त रहल रंग चीरा
holi गूंजत रहल बनारस भर में
रसिया फाग कबीरा,
रंगभरी के सब ललकारें
जीयऽ बाबा भोला।
छनत रहल जब दिव्य ठंडई
बोलत रहल मलाई
चइता के संग भिड़त रहल
सप्तम सुर में शहनाई,
अब नऽ जहां नजर जाला
सब जगह देखाला पोला।

होत रहल सतरंगी अंगिया
जुटत रहल जब टोली
जमुना जुम्मन हिलमिल केcolours-of-holi
खेलत रहलन हऽ होली
आज तऽ सब सीटे वाले
देखात हउवन बड़बोला।
आर पार सब होत रहल
पैदल बुढ़वा मंगल में
मैना राउरवी तान लड़ावत
रहलिन इऽ दंगल में,
सोच-सोच के ऊ जुग कऽ
हौ दिल पर पड़ल फफोला।

रचना : ’ख़ाक बनारसी’

अब तो चले जाना है

Marigold
Marigold (Photo credit: soul-nectar)

कहता है विरहित मन, कर ले तू कोटि जतन
रुकना अब हाय नहीं, अब तो चले जाना है ।

छूटेंगे अखिल सरस, सुख के दिन यों पावस
हास कहीं रूठेगा, बोलेगा बस-बस-बस
दिन में अन्धेरा अब रात ही ठिकाना है,
रुकना अब हाय नहीं, अब तो चले जाना है ।

कैसे कह पाऊँगा अपने दुःख तुमसे
मेरे तो सारे सुख दूर कहीं झुलसे
अब तो स्व-अंजलि में तिमिर ही सजाना है,
रुकना अब हाय नहीं, अब तो चले जाना है ।

अब भी पर साहस है, तेरी शुभ स्मृति का
यह लिपटी है ऐसे, ज्यों लिपटी लघु लतिका
अन्तिम जीवनक्षण तक बस याद लिये जाना है
रुकना अब हाय नहीं, अब तो चले जाना है ।

मेरी समझ नहीं कि ये कमाल कर सकूँ

हर शख्स अपने साथ मैं खुशहाल कर सकूँ
मेरी समझ नहीं कि ये कमाल कर सकूँ।

फैली हैं अब समाज में अनगिन बुराइयाँ
है लालसा कि बद को मैं बेहाल कर सकूँ।

फेकूँ निकाल हिय के अन्धकार द्वेष को
कटुता के जी का आज मैं जंजाल कर सकूँ।

है प्रार्थना कि नाथ वृहद शक्ति दो हमें
चेहरा बुराइयों का मैं विकराल कर सकूँ।

ओ प्रतिमा अनजानी

ओ प्रतिमा अनजानी, दिल की सतत कहानी
कहता हूँ निज बात सुहानी, सुन लो ना।

डूबा रहता था केवल जीवन की बोध कथाओं में
अब खोया हूँ मैं रूप-सरस की अनगिन विरह-व्यथाओं में
सत्य अकल्पित-मधुरित-सुरभित, अन्तरतम में हर पल गुंजित
ओ प्रतिमा अनजानी, दिल की सतत कहानी
मुझ पर हो कर सदय, मुझे ही चुन लो ना।

संसार-सुखों की छाया का आस्वाद नहीं पाना मुझको
हो जहाँ नहीं तेरी ध्वनि वो संवाद नहीं पाना मुझको
हे प्रात-गीत, हे सुहृद मीत, मन-वीणा के तारों-सी झंकृत
ओ प्रतिमा अनजानी, दिल की सतत कहानी
हों हम एकाकार, स्नेह के स्वप्न यही तुम बुन लो ना।

कविता लम्बी है, पर क्या करुँ कहानी है: दो

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नीचे की कविता, कविता नहीं, कहानी है। नीतू दीदी की कहानी कह रहा हूँ मैं। मेरे कस्बे के इकलौते राष्ट्रीयकृत बैंक में कैशियर होकर आयी थीं और पास के ही घर में किराए पर रहने लगीं थीं। सहज आत्मीयता का परिचय बना-कब गूढ़ हुआ- मैंने नहीं जाना। कुल छः महीने रहीं नीतू दीदी। ट्रांसफर हो गया उनका। पर इन छः महीनों में नीतू दीदी के भीतर का अनंत गह्वर मैंने पहचाना। उस चुलबुली चिड़िया के अन्तर में चिपकी हुई बेचैनी मैंने महसूसी। एक दिन बाँध ढहा, सब कुछ बह निकला-बातों ही बातों में। अब मैं जान गया था, नीतू दीदी ने तब तक शादी क्यों नहीं की थी? वह कभीं भी शादी क्यों नहीं करेंगी? जो उन्होंने मुझसे कहा, ज्यों का त्यों यहाँ। पिछली प्रविष्टि से आगे..

Photo: Devian Art (Credit: Gigicerisier)

तुम पर तो होकर न्यौछावर हम सब कुछ थे वार गये
पर सत्य कहो, क्यों इस समाज के लघु चिंतन से हार गये
यह समाज तो कहने को केवल अपनों का मेला होता
सत्य कहूं तो इस समाज में हर एक व्यक्ति अकेला होता
पर एक अनोखी बात! प्रीति की रीति जिसे भी आ जाती है
और जिसे यह प्रीति हृदय की विरद नीति समझा जाती है
उसे अकेलेपन का भय भी कहाँ सता पाता है क्षण भर?
वह तो इस एकाकीपन को ही जीता रहता है जीवन भर
और इसी एकाकीपन में हृदय द्वार जब आता कोई
अंधेरी-सी नीरवता में गीत रश्मि बिखराता कोई
तब उस मनभावन का दर्शन, भर देता है उर में कम्पन
और इन्ही कम्पन-पंखों पर उड़ता है प्रेमी का निज-मन
फ़िर तो एकाकीपन अपने हीन भाग्य पर रोने लगता
डूब रास में उर के स्नेही एकाकीपन खोने लगता।

मन दर्पण हो जाता है, प्रिय शशि मुख दर्शन को तत्पर
विकसित होता लावण्यधाम का प्रीति-पुष्प उर के भीतर
नर्तन करता कण-कण,क्षण-क्षण,बिसरा-सा होता यह तन-मन
प्रिय के हेतु स्वयं का प्रिय ही होता है शाश्वत जीवन धन।

यह धन ही जब निज जीवन से अनायास दूर हो जाए
बोलो! प्यासा बिन पानी के कैसे क्षण भर भी जी पाये
और किया क्या था मैंने जो तुमने यह परिणाम दे दिया
जिउं सिसकती जीवन भर, मुझको वैसा आयाम दे दिया।

निश्चय ही जीना अब तो केवल बस एक बहाना है
मैं व्यर्थ नहीं हूँ धरा-धाम पर, तुमको तथ्य बताना है
यह जानो, नारी भले ही सबकुछ पत्थर रखकर सह लेती है
मिली परिस्थिति जो भी उसमें निर्देशित वह रह लेती है
फ़िर भी वामा है सत्व धारिणी, संचित उसमें है शक्तिधाम
संयम की वह मूर्ति रूपिणी, ममता-प्रेम उसी के नाम
दिखलाउंगी नारी क्या है? खाती हूँ यह अनिवार्य शपथ
फ़िर भी जैसे हो स्नेह-विगत! आलोकित हो तेरा आगत-पथ।

कविता लम्बी है, पर क्या करुँ कहानी है: एक

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नीचे की कविता, कविता नहीं, कहानी है। नीतू दीदी की कहानी कह रहा हूँ मैं। मेरे कस्बे के इकलौते राष्ट्रीयकृत बैंक में कैशियर होकर आयी थीं और पास के ही घर में किराए पर रहने लगीं थीं। सहज आत्मीयता का परिचय बना-कब गूढ़ हुआ- मैंने नहीं जाना। कुल छः महीने रहीं नीतू दीदी। ट्रांसफर हो गया उनका। पर इन छः महीनों में नीतू दीदी के भीतर का अनंत गह्वर मैंने पहचाना। उस चुलबुली चिड़िया के अन्तर में चिपकी हुई बेचैनी मैंने महसूसी। एक दिन बाँध ढहा, सब कुछ बह निकला- बातों ही बातों में। अब मैं जान गया था, नीतू दीदी ने तब तक शादी क्यों नहीं की थी? वह कभीं भी शादी क्यों नहीं करेंगी? जो उन्होंने मुझसे कहा, ज्यों का त्यों यहाँ-

A capture from Diary
A capture of Diary-pages

यह खेल नियति का देखो, कितना विपुल कष्टदायी है
विकल हुआ है हृदय, आज प्राणों पर बन आयी है
जो सौभाग्य पुष्प था अपना वही हृदय का शूल हुआ है
जो उर में उल्लास रूप था वह कष्टों का मूल हुआ है
तरु की छाया समझ रही थी, वह तो दुःख की कठिन धूप है
जो उल्लास समझ बैठी थी, वह तो केवल विजन रूप है
इस संसार सकल में इतना, कहाँ कहाँ कैसा संशय है
सरल रूप में हुआ दृष्टिगत, पर देखो कितना विस्मय है?

खूब घिरे थे बादल, लेकिन बिन बरसे ही चले गए
हम भी कैसी तृप्ति आस से विस्मित होकर छले गए
आज दूर निज से होकर बेचैन हुआ जाता है मन
प्रेम वारि से विलग कहाँ होकर रह पाता है जीवन?

जिन्हें हृदय का अधिपति समझा, उनसे क्या यह प्रत्याशा थी?
क्या मुझको समझाने लायक, केवल एक यही भाषा थी?
क्या क्षणभर में ही खो बैठे, अपनी दृढ़ता, अपना चिंतन?
क्या भूल गए जो कभी दिया था मुझको वह अनमोल वचन-
“जग छूट जाय परिवार सही, पर हम न विलग हो पायेंगे
अपनी नीरवता में ही हम आनंद सुधा बरसाएंगे”
क्या यह छल था? किया बात से तुमने जी भर कर सम्मोहित
मैं विरहित मोहित हो बैठी आज कंटकों से हूँ लोहित।

यह सत्य, विरह में प्रेम हृदय में संचित होकर रह पाता है
यह सत्य, मिलन में प्रेम ‘प्रेम’ की आंखों से बह-बह जाता है
पर मिलन कहाँ, है विरह कहाँ, यह तो है मुझ पर अनाचार
क्या किया नहीं कुछ भी विचार, मैं आज पडी हूँ निराधार!

उस दिन की याद करो क्षण भर, जब रूप-राशि विस्मित थे हम
आलोक-बिन्दु हिय में संचित था, कण-कण में सुरभित थे हम
गूंजा करता था सजल गान, यह प्रकृति मधुर मुस्काती थी
तुम खो जाते थे शून्य बीच, मैं भी अनंत खो जाती थी
उन प्राणों का कहना क्या था, नर्तन करता आनंद वहाँ
सोचो! जब प्रमुदित हो मानस, स्वीकार तब वह बंध कहाँ?
कैसी अनूप थी, साग्रह थी, अपनी यह प्रेम-पिपासा भी
हो उत्सर्ग प्राण तेरे हित मन की यह अभिलाषा थी
पर हाय! हमारी रूचि कितनी शुचिहीन प्रतिष्ठित होकर आयी
तेरी छवि भी हृदय-मध्य की प्रेम-प्रतिष्ठा खोकर आयी।

-क्रमशः –

स्नेहिल मिलन की सीख दे दो

Happy New Year

फ़ैली हुई विश्वंजली में, प्रेम की बस भीख दे दो
विरह बोझिल अंत को स्नेहिल मिलन की सीख दे दो।

चिर बंधनों को छोड़ कर क्यों जा रही है अंशु अब
अपनी विकट विरहाग्नि क्यों कहने लगा है हिमांशु अब
सुन दारुण दारुण व्यथा सब नव वर्ष अपनी चीख दे दो।
विरह बोझिल अंत को स्नेहिल मिलन की सीख दे दो।

ज्यों डूब जाता है सुधाकर, विश्व को आलोक दे
फ़िर उदित होता नवल वह सब दुखों को शोक दे
बढ़ते रहें आगे सदा, नव वर्ष अपनी लीक दे दो।
विरह बोझिल अंत को स्नेहिल मिलन की सीख दे दो।