Tuesday, February 21, 2017

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आत्मा की अमरता (एक अफ्रीकी मिथक कथा )

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Spiritमृत्यु और आत्मा में दुश्मनी थी, मृत्यु ने कहा, “मैं… तुम्हें मार डालूंगी”। आत्मा ने उत्तर दिया, “मुझे… मारा नहीं जा सकता।”

आत्मा और उसके साथी मौत के गांव गये । आत्मा ने पहले चमगादड़ को टोह लेने के लिये भेजा। मौत की कुटिया की छत के एक कोने में चमगादड़ लटक गया। किसी ने उसे देखा नहीं। मृत्यु अपने सिपाहियों से कह रही थी, “मैं आकाश में बादल लाउंगी, गाज, तुम मेरे घर पर, जिसमें आत्मा ठहरी हुई होगी, कूद पड़ना और सर्वनाश कर देना।” मौत के सिपाही मान गये और तितर-बितर हो गये।

गांव में पहुंचने पर आत्मा का खूब स्वागत किया गया। मृत्यु ने अपना घर खाली कर दिया ताकि अतिथि को हर प्रकार का आराम मिल सके। चमगादड़ आकाश पर नजरें गडा़ये हुए था। उसने बादल को अचानक आते हुए देख चिल्लाकर कहा, “इसी समय चले जाओ! भागो।”

आत्मा अपने सैनिकों के साथ एकदम भाग निकली। वे अभी अधिक दूर नहीं गये थे कि मृत्यु के घर पर गाज गिरी और घर पूरी तरह बरबाद हो गया। मृत्यु ने उल्लासित होकर कहा, “मैंने आत्मा को मार डाला।” उसने अपने सैनिकों को इकट्ठा किया और ढोल पिटवाये। “वह कहती थी उसको मारा नहीं जा सकता।”

उसी समय आत्मा के गांव से विजय के नगाड़े बजने का स्वर सुनायी दिया। मौत ने अपनी फौज के साथ एकदम कूच किया और आत्मा ने सुअरों और चींटीखोरों के रास्ते में गढ़े और खंदकें खोदने का आदेश दिया। मृत्यु अपने सैनिकों सहित गड्ढों में गिर पड़ी और आक्रमण न कर सकी। तब से आत्मा अमर है।

कथा : ’सारिका’ १५ अक्टूबर के अंक से साभार
चित्र : http://hypergraphian.blogspot.com

सबका पेट भरे

एक महात्मा हैं, उनके पास जाता रहता हूँ। महात्मा से मेरा मतलब उस गैरिकवस्त्र-धारी महात्मा से नहीं, जिनके भ्रम में इस पूरी दुनियाँ का निश्छल मन छला जाता है। महात्मा से मेरा अर्थ महनीय आत्मा से है। बात-बात में उन्होंने कहा- “बेटा, खिलाने वाला बन।” अभीं कुछ समझ भी नहीं पाया था कि उन्होंने फ़िर आत्मीयता से कहा- “मन छोटा नहीं है इसलिये थोड़े में नहीं होता।” 

बाद में उसका रहस्य स्पष्ट हुआ। उन्होंने अपरिग्रह और उत्सर्ग को जीवन-मंत्र बताया था। लगे हाथ उन्होंने एक कहानी कही थी। दानव ब्रह्मा से झगड़ रहे थे कि आपने देवताओं का हमेशा पक्ष लिया है और हमारी उपेक्षा की है, जबकि हम सभी आपके पैदा किये हैं। काफी उलझन में डाला उन्होंने और ब्रह्मा जी ने दूसरे दिन एक टेस्ट लेने के लिये दोनों दलों को बुलाया। दोनों के सम्मुख स्वादिष्ट भोजन परोसा गया। खाने के समय ब्रह्मा जी ने कहा, “एक शर्त है। हाँथ खाते समय मुड़ने न पाये।” दानव अपने मुँह में स्वादिष्ट पकवान लम्बे हाथों से फ़ेंकते रहे और वह गिर कर बेकार होता गया। वे भूखे रह गये। देवता पंक्ति में बैठे अपने बगल वाले के मुँह में कौर डाल देते, और उनके बगल वाला उनके मुंह में। इस तरह उनका पेट भर गया।
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दूसरों को देने वाला स्वयं पा जाता है। स्वयं का पेट भरने का यत्न तो कीट पतंगे तक करते हैं। आदमी की आदमीयत किसमें है?  मुझे सार्वभौम मानवता का पाठ मिल गया कि सबका पेट भरे, इसकी सनक सवार होनी चाहिये। एक रोटी में भी आधी रोटी किसी की हथेली रख कर मिल बाँट कर खा लिया तो मन संतुष्ट हो जाय, किसी की प्यास बुझा दी तो अपनी प्यास बुझ जाय, यह भाव ही तो मनुष्यता की पहचान है।  ‘शेक्सपियर’ ने ऐसी मानव-हृदय की पिघलन को देवता का धन कहा है-
“It blesseth him that gives and
him that takes ;
It is mightiest in the mightiest :……
It is an attribute to God himself.”
मन विशाल हो तो दानवी वृत्ति का विनाश होता है ।

कैसा भय?

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Mysterious Voyage
Mysterious Voyage (Photo credit: Pat McDonald)
एक सैनिक अधिकारी अपनी नव-विवाहिता पत्नी के साथ समुद्री यात्रा कर रहा था. अकस्मात एक भयानक तूफ़ान आ गया। सागर की लहरें आसमान छूने लगीं। ऐसा प्रतीत होने लगा, मानो सामने साक्षात मौत खड़ी हो। सभी भय से कांपने लगे। किन्तु सैनिक के चेहरे पर भय का लेशमात्र भी चिन्ह नहीं था, वह सम्पूर्ण स्वस्थता के साथ खड़ा रहा।
उसकी पत्नी ने साश्चर्य पूछा, “इस भयानक तूफ़ान में भी तुम्हें जरा भी डर नहीं लग रहा है!”
सैनिक ने एक क्षण अपनी पत्नी के सामने देखा और झटके के साथ अपनी रिवाल्वर उसके सामने तानते हुए बोला, “क्या तुम्हें मुझसे भय लग रहा है?”
“नहीं तो !”
“क्यों?”
“क्या आप मेरे दुश्मन हैं, जो आपके हाथ में रिवाल्वर देख कर डर जाउं!”
रिवाल्वर नीचे करते हुए सैनिक ने कहा, “जिस प्रकार मेरे हाथ में रिवाल्वर थी, उसी प्रकार भगवान के हाथ में तूफ़ान है। तुम जिस प्रकार मुझे अपना समझ कर मेरे रिवाल्वर से नहीं डरीं, उसी प्रकार मैं भगवान को अपना समझता हूं। इसलिये भगवान से कैसा भय! वह जो करेगा, वह हमारे शुभ के लिये करेगा।

आज अपने पिता जी की संचित पुस्तकों को उलटते-पलटते ‘भारतीय विद्या भवन’ की ‘भारती’ पत्रिका के मार्च १९६५ के अंक में यह घटना-प्रसंग पढ़ा । जो पाया उसे बाँट दूं- इसी अन्तःप्रेरणा से यह कथा प्रस्तुत है।

कहा जाता है कि प्रेम का स्वाद तीखा होता है

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प्रेम के अनेकानेक चित्र साहित्य में बहुविधि चित्रित हैं। इन चित्रों में सर्वाधिक उल्लेख्य प्रेम की असफलता के चित्र हैं। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से प्रेम की असफलता एवं इस असफलता से उत्पन क्रिया-प्रतिक्रया पर काफी विचार किया जा सकता है, पर मैं यहाँ विचार नहीं, प्रेम की असफलता से उपजी प्रतिक्रया के दो कथा-प्रसंग लिख रहा हूँ। यह दो प्रसंग दो भिन्न मनोवृत्तियों का चित्र खींचते हैं । मैंने इन्हें ‘डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी’ के एक निबंध में पढा और यहाँ प्रस्तुत करने से ख़ुद को रोक नहीं पाया। यद्यपि ये प्रसंग सर्वज्ञात हैं परन्तु फ़िर भी…।

पहला प्रसंग 

अंगरेजी साहित्य के प्रख्यात कथाकार आस्कर वाइल्ड (Oscar Wilde) के बाइबिल वर्णन पर आधारित नाटक सलोमी (Salome) से है। सेलोमी प्रसिद्द नृशंस अत्याचारी राजा हैरोड की सौतेली पुत्री है। हैरोड ने अपने राज्य के एक संत जोकानन को बंदी बना कर अपने कारागृह में रख छोड़ा है। सेलोमी इस जोकानन से प्रेम करती है और प्रयास करती है कि उसे उसके प्रेम का प्रतिदान मिले। अनेक प्रयत्नों के बाद भी उसे उसके प्रेम का प्रतिदान नहीं मिलता । एक अतृप्त कामना के वशीभूत होकर उसके मन में प्रतिशोध का भाव जगता है। वह हैरोड को अपने नृत्य से मुग्ध कर लेती है और उससे अपनी एक बात मान जाने का वचन ले लेती है। वह हैरोड से कहती है कि उसे जोकानन का सर काट कर दिया जाय। हैरोड अनेक आपत्तियां करने के बाद भी वचनबद्ध होने के कारण जोकानन का सर काटकर सेलोमी को देता है। सेलोमी उस कटे सर को अपने हाथ में लेती है और उसके होठों को चूमती हुई कहती है – “कहा जाता है कि प्रेम का स्वाद तीखा होता है”।

दूसरा प्रसंग 

हिन्दी नाटककार जयशंकर प्रसाद के नाटक चन्द्रगुप्त का है। मालविका चन्द्रगुप्त को प्रेम करती है, और चन्द्रगुप्त को ही अपना सर्वस्व मानती है। मालविका का यह मौन-प्रेम निखरता जाता है, परन्तु चन्द्रगुप्त उसके इस मौन प्रेम व समर्पण को पहचान नहीं पता और किंचित पहचान भी लेता है तो मन से उसे स्वीकार नहीं करता। कारण, वह कार्नेलिया से अगाध प्रेम करता है। मालविका चन्द्रगुप्त से उपेक्षिता है, परन्तु वह अपने प्रेमी चन्द्रगुप्त की रक्षा के लिए अकेली उसकी शय्या पर सोती है, जहाँ चन्द्रगुप्त के धोखे में विरोधी दल के सैनिक उसका वध कर डालते हैं।