Tuesday, February 21, 2017
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Poetic Adaptation

poetic translation of poems from different language.

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सौन्दर्य लहरी – 16

सौन्दर्य-लहरी संस्कृत के स्तोत्र-साहित्य का गौरव-ग्रंथ व अनुपम काव्योपलब्धि है। आचार्य शंकर की चमत्कृत करने वाली मेधा का दूसरा आयाम है यह काव्य। निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है सौन्दर्य-लहरी में। उत्कंठावश इसे पढ़ना शुरु किया था, सुविधानुसार शब्दों के अर्थ लिखे, मन की प्रतीति के लिये सस्वर पढ़ा, और भाव की तुष्टि के लिये हिन्दी में इसे अपने ढंग से गढ़ा। अब यह आपके सामने प्रस्तुत है। ’तर्तुं उडुपे नापि सागरम्’ – सा प्रयास है यह। अपनी थाती को संजो रहे बालक का लड़कपन भी दिखेगा इसमें। सो इसमें न कविताई ढूँढ़ें, न विद्वता। मुझे उचकाये जाँय, उस तरफ की गली में बहुत कुछ अपना अपरिचित यूँ ही छूट गया है। उमग कर चला हूँ, जिससे परिचित होउँगा, उँगली पकड़ आपके पास ले आऊँगा। जो सहेजूँगा,यहाँ लाकर रख दूँगा। पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठीं, सातवीं, आठवीं, नौवीं, दसवींग्यारहवीं, बारहवीं, तेरहवीं, चौदहवीं और पन्द्रहवीं कड़ी के बाद आज प्रस्तुत है सोलहवीं कड़ी-

saundarya-lahariकराग्रेण स्पृष्टं तुहिनगिरिणा वत्सलतया
गिरीशेनोदस्तं मुहुरधरपानाकुलतया 
करग्राह्यं शंभोर्मुखमुकुरवृन्तं गिरिसुते 
कथंकारं ब्रूमस्तव चुबुकमौपम्यरहितम्॥66॥
पाणि से
वात्सल्यवश
जिसको दुलारा हिमशिखर ने
अधरपानाकुलित
जिसको
किया स्पर्शित चन्द्रधर ने
मुख मुकुर के वृन्त सम
पकड़ा जिसे सविलास शिव ने
कौन वर्णन कर सकेगा
उस अमोलक
चिबुक का फिर
सत्य ही हैं ललित अनुपम
चिबुक तेरे
चारु-चिबुके!
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भुजाश्लेषान्नित्यं पुरदमयितुः कंटकवती 
तव ग्रीवा धत्ते मुखकमलनालश्रियमियम्
स्वतः श्वेता कालागुरुबहुलजम्बालमलिना 
मृणालीलालित्यं वहति यदधो हारलतिका॥67॥
ग्रीव तेरी
शंभु के भुजश्लेष से
कंटकवती जो
मुख-कमल-नाल-सी
जो श्रीमयी, सुषमामयी है
स्वतः श्वेता
किन्तु कालागरु विलेपित
श्यामवर्णी
विलसती है ग्रीव में
अभिराम मुक्ताहार लतिका
परम रम्य मृणालिनी का
वह किए लालित्य धारण
भासती अत्यंत रुचिरा ग्रीव तेरी
चारुग्रीवे!

गले रेखास्तिस्रो गतिगमकगीतैकनिपुणे 
विवाहव्यानद्धप्रगुणगुणसंख्याप्रतिभुवः
विराजन्ते नानाविधमधुररागाकरभुवां
त्रयाणां ग्रामाणां स्थितिनियमसीमान इव  ते॥68॥ 
कंठ की त्रय रेख राजित
यों सुशोभित हो रही है
यथा वैवाहिक घड़ी की
मांगलिक सूत्रावली हो त्रिगुण गुण ग्रथिता
तुम्हारे प्राण वल्लभ की पिन्हाई
या कि
नानाविधि मधुर रागादि की
प्रकटस्थली है
राग त्रय
गांधार माध्यम षड्ज की
अथवा नियमिका
ग्राम त्रय सीमा सदृश हो
गतिगमकगीतैकनिपुणे!

मृणालीमृद्वीनां तव भुजलतानां चतसृणां 
चतुर्भिः सौन्दर्यं सरसिजभवः स्तौति वदनैः।
नखेभ्यः संत्रस्यन् प्रथममथनादन्धकरिपो-
श्वतुर्णां शीर्षाणां सममभयहस्तार्पणधिया॥69॥
चार मृदु भुजवल्लरी
तेरी मनोज्ञ मृणालिनी-सी
चतुर्वदन विरंचि जिसके
अविर्वच लावण्य का नित
गान करते हैं
उन्हें है त्रास
अंधक प्राणहर (शिव) का
कर दिया विधिमुख प्रथम
नख धात्र से जिसने विदारित
निज चतुर्मुख रक्षणार्थ
प्रयास है यह स्तवन तेरा
जो विरंचि बखानते
तव बाहुसुषमा
अभयदा हे!

नखानामुद्योतैर्नवनलिनरागं विहसतां 
कराणां ते कान्तिं कथय कथयामः कथमुमे
कयाचिद्वा साम्यं भजतु कलया हन्त कमलं 
यदि क्रीडल्लक्ष्मीचरणतललाक्षारसचणम्॥70॥ 
हम तुम्हारे
युगल करतल कान्ति का
किस भाँति
वर्णन कर सकेंगे
नवल कुवलय राग का भी
जहाँ संस्थित
पाणितल की मंजु नख अवली
सदा उपहास करती
यदि कथंचित
साम्य ही उसका
कहीं करता समुद्धृत
स्वलीलामग्न
लक्ष्मीचरणतललाक्षारुणंकित
यदि कहीं अम्बोजदल हो
स्यात् वैसा ही
उमे हे!

सुबह की प्रार्थना : निस्सीम ईजीकेल

जितना मेरा अध्ययन है उसमें भारतीय अंग्रेजी लेखकों में निस्सीम ईजीकेल का लेखन मुझे अत्यधिक प्रिय है। ईजीकेल स्वातंत्र्योत्तर भारतीय अंग्रेजी कविता के पिता के रूप में प्रतिष्ठित हैं। आधुनिक भारतीय अंग्रेजी काव्य में विशिष्ट स्थान प्राप्त ईजीकेल सहज कविता, सामान्य जन की कविता के कवि हैं। ईजीकेल कविता में विचार एवं भाषा की सरलता-सहजता के प्रति प्रतिबद्ध हैं। प्रभाव उतना ही मारक। कवि की एक कविता ’कवि, प्रेमी और पक्षी विशेषज्ञ’ (Poet, Lover, Birdwatcher) सम्बन्धित एक आलेख पूर्व में इस ब्लॉग पर प्रकाशित हो चुका है, यद्यपि इस विशिष्ट कविता का हिन्दी भावानुवाद अभी शेष है। इसी कवि की कुछ अन्य कवितायें हिन्दी रूपांतर के साथ क्रमशः यहां प्रस्तुत करने का विचार है। इन्हीं कविताओं में से प्रस्तुत है एक कविता सुबह की प्रार्थना (Morning Prayer) का हिन्दी रूपांतर।

ईश्वर! मुझमें वह रहस्य भरो
जो तिल-सा गोपन हो
और प्रदान करो अगम्यता
परन्तु केवल आत्मा की।

मेरे जागृत काल को पुनः प्रतिष्ठित करो
जीवंत वर्तमान में
और वापिस लौटा दो
मेरे प्रेम व पाप के स्वप्न
आदिम निष्क्रियता में।

ईश्वर! मुझमें वह निश्चय भरो
जिसमें अनुस्यूत हो
नभ, वायु, धरा, अग्नि, सिन्धु
एवं नूतनतम अन्तर-दृष्टि की
सगोत्रीय आत्मीयता।

वस्तुतः कुछ भी हो
गूढ़तम प्रश्न-सम
अथवा रक्त का
कैसा भी हो भावावेश
सँजोना मुझमें वह रूपाकृति
जिससे
परिवर्तित हो यह सब कुछ
मानव मंगल-हित।

सौन्दर्य लहरी – 15

सौन्दर्य-लहरी संस्कृत के स्तोत्र-साहित्य का गौरव-ग्रंथ व अनुपम काव्योपलब्धि है। आचार्य शंकर की चमत्कृत करने वाली मेधा का दूसरा आयाम है यह काव्य। निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है सौन्दर्य-लहरी में। उत्कंठावश इसे पढ़ना शुरु किया था, सुविधानुसार शब्दों के अर्थ लिखे, मन की प्रतीति के लिये सस्वर पढ़ा, और भाव की तुष्टि के लिये हिन्दी में इसे अपने ढंग से गढ़ा। अब यह आपके सामने प्रस्तुत है। ’तर्तुं उडुपे नापि सागरम्’ – सा प्रयास है यह । अपनी थाती को संजो रहे बालक का लड़कपन भी दिखेगा इसमें। सो इसमें न कविताई ढूँढ़ें, न विद्वता। मुझे उचकाये जाँय, उस तरफ की गली में बहुत कुछ अपना अपरिचित यूँ ही छूट गया है। उमग कर चला हूँ, जिससे परिचित होउँगा, उँगली पकड़ आपके पास ले आऊँगा। जो सहेजूँगा,यहाँ लाकर रख दूँगा। पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठीं, सातवीं, आठवीं, नौवीं, दसवींग्यारहवीं, बारहवीं, तेरहवीं और चौदहवीं कड़ी के बाद आज प्रस्तुत है पन्द्रहवीं कड़ी-

Saundarya-Lahari

प्रकृत्या‌‌ऽऽरक्तायास्तव सुदति दंतच्छदरुचेः
प्रवक्ष्ये सादृश्यं जनयतु फलं विद्रुमलता
न बिबं तद्बिबं प्रतिफलन रागादरुणितं
तुलामध्यारोढुं कथमिव विलज्जते कलया ॥६१॥
सुभग स्वाभाविक अरुणिमाधर
तुम्हारे अधर पल्लव
कौन ऐसा है तुलित हो
जो अधर की अरुणिमा से
फल जनन से हीन
समता है कहाँ विद्रुमलता की
रंचमात्र कला बराबर
भी न हो सकता खड़ा सम्मुख
बिम्बफल रक्ताभ तेरे अधर दल के
जगत की सब वस्तु अरुणिम
प्राप्त कर तेरी ललाई
गड़ गईं संकोच में और लाज में
हे चारुदशने! 

स्मितज्योत्स्ना जालं तव वदन चंद्रस्य पिबतां
चकोराणामासीदति रसतया चंचु जडिमा
अतस्ते शीतांशोरमृत लहरीमाम्ल रुचयः
पिबंति स्वच्छंदं निशि निशि भृशं कांजिकधिया ॥६२॥
तव वदनविधुस्रवित
मधु ज्योत्सा सुधारस पान करते
हो गयी है चञ्चु जड़िमा
प्राप्त अखिल चकोरकों की
अतः निशि निशि अम्लरुचि
स्वच्छंद
निशिपति सुधालहरी पान करते
जाड्यवारण हित
विमुग्ध चकोर खगगण
हे सुहासिनि चन्द्रवदने!
हे मधुर मधुरस्मिते हे!

अविश्रांतं पत्युर्गुणगण कथाम्रेडनजपा
जपापुष्पच्छाया तव जननि जिह्वा जयति सा
यदग्रासीनायाः स्फटिक  दृषदच्छच्छविमयी
सरस्वत्या मूर्तिः परिणमति माणिक्य वपुषा ॥६३॥
जपा कुसुपोमय तुम्हारी
जननि
जिह्वा विजयिनी हो
अविश्रान्त
स्वभर्तृगुणगणगान में
तल्लीन है  जो
स्फटिक तुल्या छविमयी
वागीश्वरी
आसीन जिस पर
निखरती
माणिक्यवपुषा
अरुणवर्णमयी
जननि हे!

रणे जित्वा दैत्यानपहृत शिरस्त्रैः कवचिभिः
निवृत्तैश्चंडांश त्रिपुरहर निर्माल्य विमुखैः
विशाखेंद्रोपेंद्रैः शशिविशद कर्पूरशकला
विलीयंते मातस्तव वदन तांबूल कबलाः ॥६४॥
जीत दैत्यों को समर में
कवच मुकुटादिक हरण कर
पहुँचते षडवदन इन्द्र उपेन्द्र
सम्मुख त्रिपुरहर के
किन्तु शंभु प्रसाद वंचित
जानते चण्डांश अधिगत
अतः
शशिसम स्वच्छ अति
कर्पूरखंड सुगंध संयुत
वे तुम्हारे वदन के
ताम्बूल कवलों को
मुदितमन
कर लिया करते सकल स्वीकार
शोभाधार मातः!

विपंच्या गायंती विविधमपदानं पशुपते
स्त्वयारब्धे वक्तुं चलितशिरसा साधुवचने
तदीयैर्माधुर्यैरपलपित तंत्रीकलरवां 
निजां वीणां वाणी निचुलयति चोलेन निभृतम् ॥६०॥
भारती
जब वीण पर
त्रिपुरारिगुणगायन  निमग्ना
मधुर स्वर में
’साधु साधु’ बखानती तुम
सिर हिला कर
धन्य वह वाणी मधुरिमा
मंद होता
वीण का स्वर
शारदा लज्जायमाना
चोल में अपनी विपञ्ची
बन्द कर लेतीं गिरा चुपचाप
सुमधुरभाषिणी हे!

क्रमशः—

टू बॉडीज (Two Bodies) : ऑक्टॉवियो पाज़

प्रायः ऐसा होता है कि फेसबुक पर देखी पढ़ी गयी प्रविष्टियों पर कुछ कहने का मन हो तो उसके टिप्पणी स्थल की अपेक्षा ब्लॉग पर लिख देने की आदत बना ली है मैंने। यद्यपि ऐसा भी कम ही हो पाता है क्योंकि समय और सामर्थ्य की कमी से यहाँ भी आमद घट गयी है मेरी। फेसबुक पर अमरेन्द्र भाई ने ऑक्टॉवियो पाज़ (Octavio Paz) की एक कविता Two Bodies के प्रारंभिक परन्तु सशक्त हिस्से को शेयर किया तो सहज ही उसके हिन्दी रूपान्तर की जिज्ञासा ने घेरा। यद्यपि शुरुआती हिस्सों के अनुवाद फेसबुक पर तत्क्षण ही आए पर पूरी कविता का रूपांतर शेष रहा। अपनी टिप्पणी में अमरेन्द्र ने पूरी कविता उपलब्ध करायी तो इसका हिन्दी रूपांतर ब्लॉग पर प्रकाशित कर रहा हूँ। 

Two Bodies by Octavio Paz

Two bodies face to face
are at times two waves
and night is an ocean.

Two bodies face to face
are at times two stones
and night is a desert.

Two bodies face to face
are at times two roots
laced into night.

Two bodies face to face
are at times two knives
and night strikes sparks.

Two bodies face to face
are two stars falling
in an empty sky.

हिन्दी रूपांतर 

सम्मुख संस्थित दो देह
काल वह
ज्यों युग लहरों का खेला
हो जाती है विशाल सागर उस काल
यामिनी की बेला ।

आमने सामने कभीं युगल तन
लगते ज्यों युग शिला खण्ड
उस काल
निशा हो जाती है
जैसे कोई मरुथल प्रचंड।

आमने सामने दो शरीर
ज्यों
मूल बन्ध
हो रात कभीं।

सम्मुखभूता दो काय छुरी
निशि
ज्यों चमकी
दामिनी अभीं।

आमने सामने हुई देह
इस भाँति हो रही है दर्शित
विस्तीर्ण शून्य अम्बर से
ज्यों
नक्षत्र युगल हो गए पतित।

सौन्दर्य लहरी- 14

सौन्दर्य-लहरी संस्कृत के स्तोत्र-साहित्य का गौरव-ग्रंथ व अनुपम काव्योपलब्धि है। आचार्य शंकर की चमत्कृत करने वाली मेधा का दूसरा आयाम है यह काव्य। निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है ’सौन्दर्य-लहरी’ में। उत्कंठावश इसे पढ़ना शुरु किया था, सुविधानुसार शब्दों के अर्थ लिखे, मन की प्रतीति के लिये सस्वर पढ़ा, और भाव की तुष्टि के लिये हिन्दी में इसे अपने ढंग से गढ़ा। अब यह आपके सामने प्रस्तुत है। ’तर्तुं उडुपे नापि सागरम्’ – सा प्रयास है यह । अपनी थाती को संजो रहे बालक का लड़कपन भी दिखेगा इसमें। सो इसमें न कविताई ढूँढ़ें, न विद्वता। मुझे उचकाये जाँय, उस तरफ की गली में बहुत कुछ अपना अपरिचित यूँ ही छूट गया है। उमग कर चला हूँ, जिससे परिचित होउँगा, उँगली पकड़ आपके पास ले आऊँगा। जो सहेजूँगा,यहाँ लाकर रख दूँगा। पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठीं, सातवीं, आठवीं, नौवीं, दसवींग्यारहवीं, बारहवीं, और तेरहवीं कड़ी के बाद आज प्रस्तुत है चौदहवीं कड़ी

Saundarya-Lahari

दृशा द्राघीयस्या दरदलितनीलोत्पलरुचा
दवीयांसं दीनं स्नपय कृपया मामपि शिवे
अनेनायं धन्यो भवति न च ते  हानिरियता
वने वा हर्म्ये वा समकर निपातो हिमकरः ॥५६॥
दूरदृष्टि मनोहरा तव
नील कंजदलाभिरामा
सींच दे मुझ दीन को भी सदय निज करुणा सलिल से
अहहः होंगे धन्य मेरे प्राण
तेरी इस कृपा से
रंच भर तेरी न होगी हानि
द्युतिमय चन्द्र किरणें
एक सम ही हैं प्रकाशित युगल को करती निरंतर
हो भले वह विपिन प्रान्तर या कि राजमहल
शिवे हे! 

अरालं ते पालीयुगलमगराजन्य तनये
न केषामाधत्ते कुसुमशर कोदंडकुतुक
तिरश्वीनो यत्र श्रवणपथमुल्लंघ्य विलस
अपागं व्यासंगो दिशति शरसंधानधिषणा॥५७॥
युगल तेरी श्रवण बाली
चक्र सी शोभायमाना
कौन है उनको न जो
कोदण्ड मनसिज का कहेगा
कर उलंघन
कर्ण पथ का
कुटिल नयन कटाक्ष जिनसे
वाणवेधनबुद्धि
रखते हैं
अहो गिरिराजतनये!

स्फुरद्गण्डाभोग प्रतिफलितताटंकयुगलं
चतुश्चक्रं मन्ये तव मुखमिदं मन्मथरथ
यमारुह्य द्रुह्यत्यवनिरथमर्केंदुचरणं
महावीरो मारः प्रमथपतये सज्जितवते॥५८॥
मानता हूँ
मुख तुम्हारा
हैं जहाँ ताण्टंक गुम्फित
युगल
प्रतिबिम्बित जहाँ पर
परम रम्य कपोल तेरे
चार चक्रों से सुसज्जित
मनोभव के रथ सदृश मैं
बैठ जिसमें
महाबीर मनोज
रवि शशि चक्र भू रथ के रथी
कामारि का मन
क्षुब्ध कर देता
कुसुमशर काम
चारु कपोलिनी हे!

सरस्वत्याः सूक्तीरमृतलहरीकौशलहरीः 
पिबन्त्याः शर्वाणि श्रवणचुलुकाभ्यामविरलं 
चमत्कारश्लाघाचलितशिरसः कुण्डलगणो
झणत्कारैस्तारैः प्रतिवचनमाचष्ट इव ते ॥५९॥
कर्ण कुहरों से
मनोहरणी
सुधारस सूक्ति लहरी
तुम सरस्वतिमुखस्रवित का
पान करती मग्न अविरत
वचचमत्कृति मुग्ध
जब करती प्रशंसा में चलित शिर
कर्ण कुण्डल खनक जाते
तार के झंकार के मिस
प्रतिवचन प्रस्फुटित करते
वदन से
शर्वाणि मातः!

असौ नासावंशस्तुहिनगिरिवंशध्वजपटि
तवदीयो नेदीयः फलतु फलमस्माकमुचित
वहत्यंतर्मुक्ताः शिशिरकर निश्वास गलितं 
समृद्ध्या यत्तासां बहिरपि च मुक्तामणिधरः॥६०॥
यह तुम्हारी नासिका का वंश मनहर
घटित जिसमें
शिशिरतर निःश्वास की अंतस्थ
मौक्तिकमालिका है
वहिर्प्रान्त
समृद्धि जिसकी
धार्य मुक्तामणिधरी है
वही नासावंश तेरा
हम अकिंचन दीन के हित
अहो! हिमगिरिवंशध्वजिनी! 
हो उचित फलदानकर्ता॥

क्रमशः—

सौन्दर्य लहरी- 13

सौन्दर्य-लहरी संस्कृत के स्तोत्र-साहित्य का गौरव-ग्रंथ व अनुपम काव्योपलब्धि है। आचार्य शंकर की चमत्कृत करने वाली मेधा का दूसरा आयाम है यह काव्य। निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है ’सौन्दर्य-लहरी’ में। उत्कंठावश इसे पढ़ना शुरु किया था, सुविधानुसार शब्दों के अर्थ लिखे, मन की प्रतीति के लिये सस्वर पढ़ा, और भाव की तुष्टि के लिये हिन्दी में इसे अपने ढंग से गढ़ा। अब यह आपके सामने प्रस्तुत है। ’तर्तुं उडुपे नापि सागरम्’ – सा प्रयास है यह । अपनी थाती को संजो रहे बालक का लड़कपन भी दिखेगा इसमें। सो इसमें न कविताई ढूँढ़ें, न विद्वता। मुझे उचकाये जाँय, उस तरफ की गली में बहुत कुछ अपना अपरिचित यूँ ही छूट गया है। उमग कर चला हूँ, जिससे परिचित होउँगा, उँगली पकड़ आपके पास ले आऊँगा। जो सहेजूँगा,यहाँ लाकर रख दूँगा।
पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठीं, सातवीं, आठवीं, नौवीं, दसवींग्यारहवीं, बारहवीं कड़ी के बाद आज तेरहवीं कड़ी –

Saundarya Lahari

गते कर्णाभ्यर्णं गरुत एव पक्ष्माणि दधती
पुरां भेत्तुश्चित्तप्रशमरसविद्रावणफले 
इमे नेत्रे गोत्राधरपतिकुलोत्तंस कलिके
तवाकर्णाकृष्ट स्मरशरविलासं कलयतः ॥५१॥
जो कर्णान्तदीर्घ विशाल तेरे
युगल दृग अभिराम
पलक सायकयुक्त
उनको खींच कर अपने श्रवण तक
मन्मथ किया करता बाण का संधान तीव्र अचूक
सपदि जिससे विद्ध होते त्रिपुरहर वैराग्यवंचित
विकल कर देता नयन का बाण
हिमगिरिवंश कलिके!

विभक्तत्रैवर्ण्यं व्यतिकरितनीलांजनतया
विभाति त्वन्नेत्रत्रितयमिदमीशानदयिते
पुनः स्रष्टुं देवान्द्रुहिणहरिरुद्रानुपरता
न्रजः सत्वं विभ्रतम इति गुणानां त्रयमिव ॥५२॥
हे शंभुप्राणाधिकप्रिये!
नील अंजन खचित तेरे जो नयन त्रय हैं त्रिवर्णी
सत्व रज तम त्रिगुणमय
श्वेताभ श्यामल वर्ण लोहित
कालधर्मज विगत काय
त्रिदेव
ब्रह्मा विष्णु शिव का पुनः
कर देते सृजन हैं

पवित्रीकर्तुं नः पशुपति पराधीन हृदये
दयामित्रैर्नेत्रैररुण धवलश्यामरुचिभिः 
नदः शोणो गंगा तपनतनयेति ध्रुवममुम्‌   
त्रयाणां तीर्थानामुपनयसि सम्भेदमनघम्‌५३॥
धवल श्यामल अरुण तीनों नेत्र तेरे
दयामित्त स्वरूप
शोण सुरसरि सूर्यतनया का बनाते अमल संगम
सत्य यह ध्रुव सत्य
तुम त्रय सरित संगम तीर्थ
पावन पतित सेवक को बनाने हेतु
पशुपति पराधीन हृदाम्बुजे हे!

निमेषोन्मेषाभ्यां प्रलयमुदयं याति जगती
तवेत्याहुः संतो धरणिधर राजन्यतनये
त्वदुन्मेषाज्जातं जगदिदमशेषं प्रलयतः
परित्रातुं शंके परिहृतनिमेषास्तव दृशः ॥५४॥
सत्पुरुष कहते
तुम्हारे नयन पलकों का उभरना और गिर जाना
अखिल संसार का
उद्भव प्रलय है
खुले दृग तो विश्व उद्भव
बन्द पलकों से प्रलय है
अतः जगरक्षणमना ही
कर दिया तुमने विसर्जित नयन पलक निपात अपना
हे धरणिधरराजतनये!

तवापर्णे कर्णे जपनयनपैशुन्यचकिताः
निलीयन्ते तोये नियतमनिमेषाः शफरिकाः 
इयं च श्रीर्बद्धच्छदपुटकवाटं कुवलयं 
जहाति प्रत्युषे निशि च विघटय्य प्रविशति ॥५५॥
देख तेरे श्रवणस्पर्शित चक्षु
मुद्रित पलक भीता
डूब जातीं सलिल में पैशुन्य चकिता मछलियाँ हैं
प्रात में कर बंद स्वीय कपाट
कुवलय छवि निकलती खोल देती द्वार मुद्रित
श्री निशागम काल में आ पुनः कर जाती प्रवेश
विभावरी में, अपर्णे हे!

क्रमशः—

सौन्दर्य लहरी- 12

’सौन्दर्य-लहरी’ संस्कृत के स्तोत्र-साहित्य का गौरव-ग्रंथ व अनुपम काव्योपलब्धि है। आचार्य शंकर की चमत्कृत करने वाली मेधा का दूसरा आयाम है यह काव्य। निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है ’सौन्दर्य-लहरी’ में। उत्कंठावश इसे पढ़ना शुरु किया था, सुविधानुसार शब्दों के अर्थ लिखे, मन की प्रतीति के लिये सस्वर पढ़ा, और भाव की तुष्टि के लिये हिन्दी में इसे अपने ढंग से गढ़ा। अब यह आपके सामने प्रस्तुत है। ’तर्तुं उडुपे नापि सागरम्’ – सा प्रयास है यह । अपनी थाती को संजो रहे बालक का लड़कपन भी दिखेगा इसमें। सो इसमें न कविताई ढूँढ़ें, न विद्वता। मुझे उचकाये जाँय, उस तरफ की गली में बहुत कुछ अपना अपरिचित यूँ ही छूट गया है। उमग कर चला हूँ, जिससे परिचित होउँगा, उँगली पकड़ आपके पास ले आऊँगा। जो सहेजूँगा,यहाँ लाकर रख दूँगा। पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठीं, सातवीं, आठवीं, नौवीं, दसवींग्यारहवीं के बाद आज बारहवीं कड़ी

भ्रुवौ भुग्ने किं चिद्‌भुवनभयभंगव्यसनिनि
त्वदीये नेत्राभ्यां मधुकररुचिभ्यां धृतगुणम्‌ ॥
धनुर्मन्ये सव्येतरकरगृहीतं रतिपतेः
प्रकोष्ठे मुष्टौ च स्थगयति निगूढान्तरमुमे ॥४६॥

कुटिल भृकुटि युगल नयन की
ओ भुवनभयहारिणी हे!
तुल्यताधृत ज्यों शरासन
सुसज्जित मधुकरमयी अभिराम प्रत्यंचा जहाँ है
वाम करतल में स्वयं  धारण किए
जिसको मदन है
भ्रू धनुष के मध्य उसकी मुष्टि स्थापन की
सुसंगत बन गयी सम्यक व्यवस्था है॥

अहः सूते सव्यं तव नयनमर्कात्मकतया
त्रियामां वामं ते सृजति रजनीनायकतया ।
तृतीया ते दृष्टिर्दरदलितहेमाम्बुजरुचिः
समाधत्ते सन्ध्यां दिवसनिशयोरन्तरचरीम्‌ ॥४७॥

प्रकट करता है
दिवाकर को नयन दक्षिण तुम्हारा
वाम लोचन से तुम्हारे
सोम का होता सृजन है
विकच स्वर्ण विमल कमल सम
रूपवंत तृतीय लोचन
हे त्रिनयने!
समुद्भासित हो रहा ज्यों
दिवस निशि के मध्य
संध्या समासीना॥

विशाला कल्याणी स्फुटरुचिरयोध्या कुवलयैः
कृपाधाराधारा किमपि मधुराभोगवतिका ।
अवन्ती दृष्टिस्ते बहुनगरविस्तारविजया
ध्रुवं तत्तन्नामव्यवहरणयोग्या विजयते ॥४८॥
दृष्टि कल्याणी तुम्हारी विशालाख्या
कमलिनी ज्यों
वह अयोध्या पद्मरुचिरा
कृपाधाराधराधारा
भोगवति मथुरा वरेण्या
दृष्टि जयवन्ती अवन्ती
बहुनगर विस्तार विजया
व्यवहृता तद्नाम संज्ञक
दृष्टिभंगी
विजयिनी हे!

कवीनां सन्दर्भस्तवकमकरन्दैकरसिकं 
कटाक्षव्याक्षेपभ्रमरकलभौ कर्णयुगलम्‌
अमुश्चन्तौ दृष्ट्वा तव नवरसास्वादतरला-
वसूयासंसर्गादलिकनयनं किंचिदरुणम्‌ ॥४९॥
कवि भणितपद पुष्प गुच्छ
मरंद गंध रसार्द्र
कर्ण तक पसरे तुम्हारे
नवल नव रस स्वाद लोलुप
भ्रमर शिशुवत चपल लोचन
कर्णकोर न छोड़ते हैं,
देख यह ईर्ष्या विवश हो
भालस्थित जो चक्षु तेरे
सहज किंचित लालिमा
स्वीकारते
हे अरुण नयने!

शिवे शृंगारार्द्रा तदितरजने कुत्सनपरा
सरोषा गंगायां गिरिशचरिते विस्मयवती 
हराहिभ्यो भीता सरसिरुहसौभाग्यजननी
सखीषु स्मेरा ते मयि जननि दृष्टिः सकरुणा ॥५०॥
हर हृदीश्वर हेतु
अति शृंगारमयि स्नेहाम्बुतरला
इतर जनहित उपेक्षामयि
देवसरिता हित सरोषा
शिव चरित्र विमुग्धिता विस्मयवती
शिव सर्पभीता
कमलिनी
सौभाग्यजननी
सखीगणहित मधु सुहासा
मुझ अकिंचन हेतु
तेरी दृष्टि करुणामयि
जननि हे!

क्रमशः—

सौन्दर्य लहरी – 11

Hindi translation of Saundarya Lahari-a well-known and appriciated tantra and poetic work of Acharya Shankar

’सौन्दर्य-लहरी’ संस्कृत के स्तोत्र-साहित्य का गौरव-ग्रंथ व अनुपम काव्योपलब्धि है। आचार्य शंकर की चमत्कृत करने वाली मेधा का दूसरा आयाम है यह काव्य। निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है ’सौन्दर्य-लहरी’ में। उत्कंठावश इसे पढ़ना शुरु किया था, सुविधानुसार शब्दों के अर्थ लिखे, मन की प्रतीति के लिये सस्वर पढ़ा, और भाव की तुष्टि के लिये हिन्दी में इसे अपने ढंग से गढ़ा। अब यह आपके सामने प्रस्तुत है। ’तर्तुं उडुपे नापि सागरम्’ – सा प्रयास है यह । अपनी थाती को संजो रहे बालक का लड़कपन भी दिखेगा इसमें। सो इसमें न कविताई ढूँढ़ें, न विद्वता। मुझे उचकाये जाँय, उस तरफ की गली में बहुत कुछ अपना अपरिचित यूँ ही छूट गया है। उमग कर चला हूँ, जिससे परिचित होउँगा, उँगली पकड़ आपके पास ले आऊँगा। जो सहेजूँगा,यहाँ लाकर रख दूँगा। पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठीं, सातवीं, आठवीं, नौवीं, दसवीं के बाद आज ग्यारहवीं कड़ी –

गतै-र्माणिक्यत्वं गगनमणिभिः सांद्रघटितं
किरीटं ते हैमं हिमगिरिसुते कीतयति यः ॥
स नीडेयच्छाया-च्छुरण-शकलं चंद्र-शकलं
धनुः शौनासीरं किमिति न निबध्नाति धिषणाम् ॥४१॥

गगनमणि द्वादश दिवाकर
सान्द्र किरण समूह सुघटित
चमत्कृत माणिक्य-सम
कलधौत निर्मित मुकुट तेरा
ध्यान में किसके नहीं
होता स्फुरित यह इन्द्रधनु-सा
ग्रहण कर माणिक्य की द्युति
भाल संस्थित चन्द्रमा में
जो तुम्हारा स्वर्ण मंडित मुकुट है
गिरिबालिके हे!

धुनोतु ध्वांतं न-स्तुलित-दलितेंदीवर-वनं
घनस्निग्ध-श्लक्ष्णं चिकुर निकुरुंबं तव शिवे ।
यदीयं सौरभ्यं सहज-मुपलब्धुं सुमनसो
वसंत्यस्मिन् मन्ये बलमथन वाटी-विटपिनाम् ॥४२॥

जो प्रफुल्लित
चिकुर तेरा सघन कोमल
रुचिर भरित सुगंध
उसका सुरभि भार समेटने को
ललक आ बसते मनोज्ञ प्रसूनगण नंदन विपिन के
वह तुम्हारा रम्य केश कलाप
कर दे सहज मेरे हृदय संस्थित
घन तिमिर का नाश
छविचिकुरे शिवे हे!

वहंती- सिंदूरं प्रबलकबरी-भार-तिमिर
द्विषां बृंदै-र्वंदीकृतमेव नवीनार्ककिरणम् ॥

तनोतु क्षेमं न-स्तव वदनसौंदर्यलहरी
परीवाहस्रोतः-सरणिरिव सीमंतसरणिः।
४३॥

सघन श्यामल केश-दल में
राजती सिन्दूर रेखा
बैरियों को बाँध जैसे
नवल दिनमणि की किरण हो
वह ललाम चटक
तुम्हारे भाल की सिन्दूर रेखा
विलसती जैसे तुम्हारे
वह वदन सौन्दर्य लहरी के अबाध प्रवाह के हित
सरणि-सी कच में खड़ी हो
स्रोतस्विनी सुषमामयी हे!
वह ललित सीमंत सरणी
नित्य क्षेम सँवार दे मेरा।

अरालै स्वाभाव्या-दलिकलभ-सश्रीभिरलकैः
परीतं ते वक्त्रं परिहसति पंकेरुहरुचिम् ।
दरस्मेरे यस्मिन् दशनरुचि किंजल्क-रुचिरे
सुगंधौ माद्यंति स्मरदहन चक्षु-र्मधुलिहः ॥४४॥

युवा-अलि-दल-सा सहज सुन्दर
कुंचित केश संवृत तुम्हारा मुख कमल है,
इस मुख कमल की सुषमा
तिरस्कृत कर रही सरसिज सुमन को
और इसके वरदंत स्मिति की
कान्तिमय मधु सुरभि रस से
मत्त परिमल गंध
स्मरदहन शिव के विलोचन
घूमते मंदस्मिते हे!

ललाटं लावण्य द्युति विमल-माभाति तव यत्
द्वितीयं तन्मन्ये मकुटघटितं चंद्रशकलम् ।
विपर्यास-न्यासा दुभयमपि संभूय च मिथः
सुधालेपस्यूतिः परिणमति राका-हिमकरः ॥४५॥

विमल द्युति लावण्यमय
जो भाल उद्भासित तुम्हारा
मुकुटमंडित
अपर हिमकर खंड
सदृश विराजता है
इन युगल विपरीत भागों का
अमोलक घटित संगम
सुधालेप प्रवाह पूरित
पूर्णिमा का चन्द्र बन जाता
ललामललाटिके हे!

क्रमशः—

सौन्दर्य लहरी -10

Hindi Translation of Shankar's Saundarya Lahari’सौन्दर्य-लहरी’ संस्कृत के स्तोत्र-साहित्य का गौरव-ग्रंथ व अनुपम काव्योपलब्धि है । आचार्य शंकर की चमत्कृत करने वाली मेधा का दूसरा आयाम है यह काव्य । निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है ’सौन्दर्य-लहरी’ में । उत्कंठावश इसे पढ़ना शुरु किया था, सुविधानुसार शब्दों के अर्थ लिखे, मन की प्रतीति के लिये सस्वर पढ़ा, और भाव की तुष्टि के लिये हिन्दी में इसे अपने ढंग से गढ़ा । अब यह आपके सामने प्रस्तुत है । ’तर्तुं उडुपे नापि सागरम्’ – सा प्रयास है यह । अपनी थाती को संजो रहे बालक का लड़कपन भी दिखेगा इसमें । सो इसमें न कविताई ढूँढ़ें, न विद्वता । मुझे उचकाये जाँय, उस तरफ की गली में बहुत कुछ अपना अपरिचित यूँ ही छूट गया है । उमग कर चला हूँ, जिससे परिचित होउँगा, उँगली पकड़ आपके पास ले आऊँगा। जो सहेजूँगा,यहाँ लाकर रख दूँगा। पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठीं, सातवीं, आठवीं, नौवीं के बाद आज दसवीं कड़ी –

विशुद्धौ ते शुद्धस्फटिक विशदं व्योम-जनकं
शिवं सेवे देवीमपि शिवसमान-व्यवसिताम् ।
ययोः कांत्या यांत्याः शशिकिरण्-सारूप्य सरणे:
विधूतांत-र्ध्वांता विलसति चकोरीव जगती ॥ ३६ ॥
अम्ब
चक्र विशुद्ध तेरा
स्फटिक मणि सम विशद निर्मल
वहाँ अम्बर जनक शंकर
तथा शंकर के सदृश ही
व्यवसिता हो अम्ब तुम भी 
शशि किरण की सरणि-सी द्युतिमान
अंतर्तिमिरहारी
उस विलसती ज्योति को
जिसको समोद निहारता है
अखिल जगत चकोरवामा  सदृश
मैं भजता
शिवे हे!

समुन्मीलत् संवित्कमल-मकरंदैक-रसिकं
भजे हंसद्वंद्वं किमपि महतां मानसचरम् ।
यदालापा-दष्टादश-गुणित-विद्यापरिणतिः
यदादत्ते दोषाद् गुणमखिलमद्भ्यः पय इव ॥ ३७ ॥

जो कि संवितमय
समुन्मीलित कमल मकरंदरस-प्लुत
उस कमल मकरंद रस के
पान में रममाण हैं जो
महज्जन के
हृदय मानस बीच में
युग हंस विचरण-शील हैं जो
अष्टदश विद्या विवर्धन की
जहाँ परिणति सँवरती
मैं किन्हीं उन हंस द्वंद्वों का
स्मरण करता कृपामयि!

तव स्वाधिष्ठाने हुतवहमधिष्ठाय निरतं
तमीडे संवर्तं जननि महतीं तां च समयाम् ।
यदालोके लोकान् दहति महसि क्रोध-कलिते
दयार्द्रा या दृष्टिः शिशिरमुपचारं रचयति ॥ ३८ ॥

चक्र स्वाधिष्ठान तेरा
अग्निमय  आश्रयाधिष्ठित
हैं जहाँ संवर्त
समयायुत
उन्हें है प्रणति मेरी
महाक्रोधाविष्ट
लोक जब लगते जलाने
तब तुम
निज दयार्द्रादृष्टि से
करती शिशिर उपचार उसका
दयासंभरिता 
जननि हे!

तटित्वंतं शक्त्या तिमिर-परिपंथि-स्फुरणया
स्फुरन्नाना रत्नाभरण-परिणद्धेंद्र-धनुषम् ।
तव श्यामं मेघं कमपि मणिपूरैक-शरणं
निषेवे वर्षंतं-हरमिहिर-तप्तं त्रिभुवनम् ॥ ३९ ॥

तिमिरहर पथदर्शिनी
कल शक्तियुत विद्युत प्रभामय
विविध रत्नाभरण भूषित
प्रकट जैसे इन्द्रधनु हो
शंभु दिनमणि तप्त
त्रिभुवन को
बरस पीयूषधारा सींचता है जो
तुम्हारा श्यामघन मणिपूर शरणी
मैं उसी अमृताम्बुवर्षी
सजल श्यामल वारिधर का  
कर रहा सेवन सुधाप्लुत
मोदमय अभिराम जननी!

तवाधारे मूले सह समयया लास्यपरया
नवात्मान मन्ये नवरस-महातांडव-नटम् ।
उभाभ्या मेताभ्या-मुदय-विधि मुद्दिश्य दयया
सनाथाभ्यां जज्ञे जनक जननीमत् जगदिदम् ॥ ४० ॥

मूलाधार संस्थित
लास्य लीनालीन
समयासम
संग संयुत
नवात्मन नवरस वलित
ताण्डव निरत शिव
इस युगल युति की दया से
जनक जननी भाव भावित
जगत होता है समुद्भव प्राप्त
देवि दयालुनि हे!

क्रमशः—

सौन्दर्य लहरी-9

Shankaracharya

’सौन्दर्य-लहरी’ संस्कृत के स्तोत्र-साहित्य का गौरव-ग्रंथ व अनुपम काव्योपलब्धि है । आचार्य शंकर की चमत्कृत करने वाली मेधा का दूसरा आयाम है यह काव्य । निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है ’सौन्दर्य-लहरी’ में । उत्कंठावश इसे पढ़ना शुरु किया था, सुविधानुसार शब्दों के अर्थ लिखे, मन की प्रतीति के लिये सस्वर पढ़ा, और भाव की तुष्टि के लिये हिन्दी में इसे अपने ढंग से गढ़ा । अब यह आपके सामने प्रस्तुत है । ’तर्तुं उडुपे नापि सागरम्’ – सा प्रयास है यह । अपनी थाती को संजो रहे बालक का लड़कपन भी दिखेगा इसमें । सो इसमें न कविताई ढूँढ़ें, न विद्वता । मुझे उचकाये जाँय, उस तरफ की गली में बहुत कुछ अपना अपरिचित यूँ ही छूट गया है । उमग कर चला हूँ, जिससे परिचित होउँगा, उँगली पकड़ आपके पास ले आऊँगा। जो सहेजूँगा,यहाँ लाकर रख दूँगा। पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठीं, सातवीं, आठवीं के बाद आज नौवीं कड़ी

स्मरं योनिं लक्ष्मीं त्रितयमिदमादौ तव मनो
र्निधायैके नित्ये निरवधि महाभोग रसिकाः ।
भजंति त्वां चिंतामणि गुणनिबद्धाक्ष वलयाः
शिवाग्नौ जुह्वंतः सुरभिघृत धाराहुति शतैं ॥३२॥

उक्त वर्णित मंत्र
उसके तीन वर्ण प्रथम पृथक कर 
’काम-योनि-श्री’ त्रयी को 
आदि में योजित किए नित 
महाभोगरसज्ञ 
निरवधि सतत भजते हैं तुम्हीं को 
अक्ष चिन्तामणि सुमाला युक्त 
शंकर वह्नि में नित धेनुघृत की धार से 
शत आहुती दे हवन करते 
मंत्रविद् विद्वान तेरा 
सर्वमंगलदायिनी हे !॥32॥
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शरीरं त्वं शंभोः शशि मिहिर वक्षोरुह युगं 
तवात्मानं मन्ये भगवति नवात्मानमनघम् ।
अतः शेषः शेषीत्ययमुभय साधारणतया 
स्थितः संबंधो वां समरस परानंदपरयोः ॥३३॥

शंभु की काया तुम्हीं हो 
चन्द्रमा रवि युग पयोधर 
मानता आत्मा तुम्हारी 
शंभु की निष्पाप आत्मा 
अतः 
इन दो शेष-शेषी में 
समान तुम्हीं स्थिता हो
हे भगवती माँ ! 
समरसा 
अति परानन्दस्वरूपिणी  ॥33॥
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मनस्त्वं व्योम त्वं मरुदसि मरुत्सारथिरसि 
त्वमापस्त्वं भूमिस्त्वयि परिणतायां न हि परम् ।
त्वमेव स्वात्मानं परिणमयितुं विश्व वपुषा 
चिदानंदाकारं शिवयुवति भावेन बिभृषे ॥३४॥

मन तुम्हीं, तुम व्योम 
तुम मारुत, अनल हो 
सलिल, भू हो
ये सभी परिणाम तेरे ही
नहीं कुछ भी अपर हैं
विश्ववपु के रूप में
परिणत स्वयं को कर विलसती
चिदानन्दाकार
भावमयी तुम्हीं
शिवअंगना हे! ॥34॥
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तवाज्ञाचक्रस्थं तपन शशि कोटि द्युतिधरं 
परं शंभुं वंदे परिमिलित पार्श्वं परचिता।
यमाराध्यन् भक्त्या रवि शशि शुचीनामविषये
निरालोकेऽलोके निवसति हि भालोक भुवने ॥३५॥

कोटि रवि शशि ज्योतिमय 
जो दिव्य आज्ञाचक्र तेरा 
परिमिलित शिवपार्श्व वामा 
वहाँ परचित परम शिव को 
ध्यान में धारण किए 
साधक परम आराधनामय भक्ति संयुत,
भानु शशि पावक रहित स्वयमेव भासित
लोक ज्योतिर्मान में  
अविरत निरातंकित भुवन में 
मोदमग्न निवास करता है सदा 
शिवसंयुता हे! ॥35॥