Tuesday, February 21, 2017

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Translation of prose works.

पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-4

साहित्य क्यों? (Why Literature?): मारिओ वर्गास लोसा (Mario Vargas Llosa)
प्रस्तुत है पेरू के प्रख्यात लेखक मारिओ वर्गास लोसा के एक महत्वपूर्ण, रोचक लेख का हिन्दी रूपान्तर । ‘लोसा’ साहित्य के लिए आम हो चली इस धारणा पर चिन्तित होते हैं कि साहित्य मूलतः अन्य मनोरंजन माध्यमों की तरह एक मनोरंजन है, जिसके लिए समय और विलासिता दोनों पर्याप्त जरूरी हैं । साहित्य-पठन के निरन्तर ह्रास को भी रेखांकित करता है यह आलेख । इस चिट्ठे पर क्रमशः सम्पूर्ण आलेख हिन्दी रूपांतर के रूप में उपलब्ध होगा । पहली, दूसरीतीसरी कड़ी के बाद प्रस्तुत है चौथी कड़ी ।

Translation of Mario Vargas Llosa's Essay Why Literature

साहित्य ने अपनी ग्राह्यता प्रेम इच्छाओं और काम-कलापों में भी स्वीकृत करा दी है . यह कलात्मक रचना का स्तर बनाये रखता है .साहित्य के बिना कामोद्दीपन रह ही नहीं सकता है.  प्रेम और आनन्द और दीन हो जायेंगे.  उनकी नजाकत, उनकी सटीक चोट क्षीणतर होती चली जायेगी. वे उस गहनता की  उपलब्धि से  वंचित रह जायेंगे जो साहित्यिक कल्पना  प्रदान  करती है. 

न तो श्रव्य-दृश्य माध्यम में ही वह सामर्थ्य है कि साहित्य को अपने उस स्थान से च्युत कर दे जो मानव को पूर्ण विश्वास और पूर्ण कौशल के साथ यह सिखाता है कि भाषा के गुंफन में  असाधारण रूप से अपार समृद्ध संभावनायें सन्निहित  हैं . उल्टे श्रव्य-दृश्य संप्रेषण के माध्यम , जहाँ तक कल्पना का, बिम्बों का सम्बन्ध है, शब्दों को दोयम नम्बर पर पदावनत करके रख देते हैं जो संप्रेषण का मूलभूत तत्व है, और ये भाषा को उसके उस वाचिक प्रस्तुतीकरण से बहुत-बहुत दूर रख देते हैं जो उसका लिखित आयाम है . किसी फिल्म या टेलीविजन के कार्यक्रम को ‘साहित्यिक परिभाषित करने को मजेदार रूप में यह कहेंगे कि यह उबाऊ है . यही कारण है कि रेडियो या टॆलीविज़न के साहित्यिक कार्यक्रम शायद ही लोगों को अपने में बाँध पाते हैं . जहाँ तक मुझे ज्ञात है, इस नियम का अपवाद फ्रांस में बर्नार्ड पायवट (Bernard Pivot) का साहित्यिक कार्यक्रम ‘एपास्ट्राफीज’ (Apostrophes) था. और यह मुझे सोचने के लिए प्रोत्साहित करता है कि पूर्ण ज्ञान और पूर्णतः भाषा पर अधिकार के लिए साहित्य न केवल अपरिहार्य है, बल्कि पुस्तकों का भाग्य भी इसी से सम्बन्धित होकर सुरक्षित है जिसे व्यावसायिक उत्पाद इन दिनों प्रयोगवाह्य घोषित कर रहे हैं .
यह सोचना मुझे बिल गेट्स (Bill Gates) की ओर आकर्षित कर रहा है . बहुत दिन नहीं हुए वह मैड्रिड में थे. उन्होंने उस रायल स्पैनिश एकेडमी (Royal Spanish Academy) का भ्रमण किया जिसने माइक्रोसॉफ्ट पर साहसपूर्ण संयुक्त रूप से नया कार्य किया . अन्य दूसरी चीजों के बीच गेट्स ने एकेडमी के सदस्यों को विश्वस्त किया कि वह व्यक्तिगत रूप से यह गारंटी देंगे कि कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर से ‘N’ शब्द को कभी भी हटाया नहीं जा सकता . यह एक ऐसी प्रतिज्ञा थी जिससे पाँच महाद्वीपों के स्पैनिश बोलने वाले चार सौ करोड़ व्यक्तियों ने राहत की साँस ली, क्योंकि इतने आवश्यक अक्षर का साइबर स्पेस से देश निकाला एक अत्यंत विशाल समस्या सृजित कर देता. स्पैनिश भाषा के लिए सौहार्दपूर्ण छूट का स्थान बनाने के तुरंत बाद और एकेडमी परिसर के बाहर निकलते हुए भी उन्होंने एक प्रेस कॉन्फरेंस में यह प्रतिज्ञा की कि अपने उच्चतम आदर्श को अपनी मृत्यु के पहले वह स्थापित कर देने की अभिलाषा रखते हैं . वह लक्ष्य क्या था, इसको स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा, कि वह लक्ष्य कागज और फिर किताबों का अंत कर देना है.
अपने निर्णय में उन्होंने कहा है कि पुस्तकें समयानुकूल नहीं, दोष से पूर्ण हैं. उनका तर्क था कि कम्प्यूटर की स्क्रीन कागज को उसके द्वारा किए जाने वाले अबतक के समस्त कार्यों के साथ उसके स्थान से च्युत कर सकती है. उनका इस पर भी बल था कि कम कठिन और कम प्रयत्न-साध्य होने के अतिरिक्त कम्प्यूटर कम स्थान घेरते हैं, उन्हें आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाया जा सकता है, और यह भी कि समाचार-पत्रों और पुस्तकों के स्थान पर इन इलेक्ट्रिक माध्यमों से समाचार देने या साहित्य संप्रेषित करने में पर्यावरण सम्बन्धी लाभ भी हैं. जंगलों का विनाश, जो कागज उद्योग की प्रेरणा का दुष्फल है, रुकता है. गेट्स ने अपने श्रोताओं को विश्वास दिलाया कि वे कम्प्यूटर स्क्रीन पर पढ़ेंगे और परिणामतः वातावरण में पहले की अपेक्षा और अधिक ‘क्लोरोफिल’ उपस्थित रहेगी.
मारिओ वर्गास लोसा

पेरू के प्रतिष्ठित साहित्यकार। कुशल पत्रकार और राजनीतिज्ञ भी। वर्ष २०१० के लिए साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता।

जन्म : २८ मार्च, १९३६।
स्थान : अरेक्विपा (पेरू)।
रचनाएं : द चलेंज–१९५७; हेड्स – १९५९; द सिटी एण्ड द डौग्स- १९६२; द ग्रीन हाउस – १९६६;  प्युप्स –१९६७; कन्वर्सेसन्स इन द कैथेड्रल – १९६९; पैंटोजा एण्ड द स्पेशियल -१९७३; आंट जूली अण्ड स्क्रिप्टराइटर-१९७७; द एण्ड ऑफ़ द वर्ल्ड वार-१९८१; मायता हिस्ट्री-१९८४; हू किल्ड पलोमिनो मोलेरो-१९८६;द स्टोरीटेलर-१९८७;प्रेज़ ऑफ़ द स्टेपमदर-१९८८;डेथ इन द एण्डेस-१९९३; आत्मकथा–द शूटिंग फ़िश-१९९३।

‘बिल गेट्स’ के इस छोटॆ से संभाषण के समय मैं उपस्थित नहीं था. प्रेस के द्वारा मुझे सब कुछ मालूम हुआ. यदि मैं वहाँ होता तो मैं गेट्स के उन इरादों पर जो वह निर्लज्जतापूर्वक मेरे सहयोगियों, बेरोजगार लेखकों के लिए उद्घोषित कर रहा था, घोर अरुचि और अनिच्छा अभिव्यक्त करता. मैं दृढ़तापूर्वक स्पष्ट रूप से उनके विश्लेषण विरोध में उठ खड़ा होता. क्या सचमुच कम्प्यूटर स्क्रीन हर दृष्टिकोण से पुस्तकों का स्थान ले सकती है ? मुझको इतना निश्चित विश्वास नहीं होता. नयी तकनीक, जैसे इन्टरनेट ने संचार और सूचना के क्षेत्र में कितनी बड़ी क्रान्ति कर दी है, मैं इससे पूरी तरह अवगत हूँ , और मैं यह स्वीकार करता हूँ कि इन्टरनेट असाधारण रूप से मेरे दैनिक कार्य में प्रतिदिन सहायता करता है. लेकिन इन असाधारण सुविधाओं के लिए मेरी कृतज्ञता मुझे इस विश्वास से नहीं भर सकती कि इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन कागज का स्थान ले सकती है, या कम्प्यूटर स्क्रीन पर पढ़ना साहित्यिक पठन की बराबरी कर सकता है. इनके बीच की गहरी खाई को मैं लाँघ नहीं सकता. मैं यह स्वीकार नहीं कर सकता कि अनौपचारिक या अयथार्थवादी पठन जिसको किसी सूचना या लाभप्रद किसी तात्कालिक संवाद की आवश्यकता नहीं है, वह कम्प्यूटर की स्क्रीन पर सपनों को,शब्दों के आनन्द को उसी समुत्तेजना, उसी निकटता, उसी मानसिक एकाग्रता और आत्मिक एकान्त के साथ सम्बन्ध कर सकता है जैसा कि एक पुस्तक के पढ़ने की क्रिया द्वारा उपलब्ध होता है.

यह पूर्वाग्रह शायद अभ्यास की कमी और साहित्य का पुस्तकों और कागजों से लम्बे समय तक सम्बन्धित रहने के कारण उपजा है. मैं यद्यपि विश्व-समाचार जानने के लिए वेब-सर्फिंग का आनन्द लेता हूँ, लेकिन मैं स्क्रीन पर ‘गंगोरा’ (Gongora) की कवितायें पढ़ने, या ‘ऑनेटी’ (Onetti)का उपन्यास पढ़ने या ‘पाज’ (Paz)का लेख पढ़ने नहीं जाऊँगा, क्योंकि मैं पूरी तरह विश्वस्त हूँ कि इस पठन का प्रभाव उस पठन के समान नहीं होगा. मुझे विश्वास है, यद्यपि मैं इसे सिद्ध नहीं कर सकता, कि यदि किताबें गुम हुईं तो साहित्य को एक गहरा धक्का लगेगा, और उसे नैतिक आघात भी मिलेगा. वास्तविकता तो यह है कि फिर भी  ‘साहित्य’ शब्द का कभीं लोप नहीं हो सकता. इसका निश्चित ही प्रयोग उस पाठ्य वस्तु के लिए किया जाता रहेगा जिसका दूर-दूर तक, जिसे आज हम साहित्य समझते हैं, उससे सम्बंध नहीं होगा, ठीक वैसे ही जैसे ‘सोफोकल्स’ (sophocles) और ‘शेक्सपियर’ (Shakespeare) के दुःखान्त नाटक धारावाहिकों के रूप में प्रस्तुत हो रहे हैं.
एक दूसरा भी कारण है जिसके चलते राष्ट्रों के जीवन में साहित्य का स्थान स्वीकृत किया जाएगा. बिना इसके उस आलोचनात्मक मस्तिष्क की अपूरणीय क्षति होगी जो ऐतिहासिक परिवर्तन का वास्तविक संवाहक है और स्वतंत्रता का सर्वोत्तम संरक्षक है. ऐसा इसलिए है कि सभी उत्तम साहित्य क्रान्तिकारी परिवर्तक होता है, और जिस संसार में हम रह रहे हैं उसके सम्बंध में क्रान्तिकारी प्रश्नों को बनाये रखता है. सभी उत्तम साहित्यिक रचनाओं में, चाहे लेखक का इरादा रहा हो या न रहा हो, तल्लीन कर लेने की शक्ति की ओर ओर झुकाव बना ही रहता है.

–क्रमशः–
पूरे लेख को निम्न कड़ियों से क्रमशः पढ़ा जा सकता है –
  1. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-1
  2. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-2
  3. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-3
  4. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-4
  5. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-5
  6. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-6
  7. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-7

पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-3

साहित्य क्यों ? (Why Literature ?) : मारिओ वर्गास लोसा (Mario Vargas Llosa)
प्रस्तुत है पेरू के प्रख्यात लेखक मारिओ वर्गास लोसा के एक महत्वपूर्ण, रोचक लेख का हिन्दी रूपान्तर । ‘लोसा’ साहित्य के लिए आम हो चली इस धारणा पर चिन्तित होते हैं कि साहित्य मूलतः अन्य मनोरंजन माध्यमों की तरह एक मनोरंजन है, जिसके लिए समय और विलासिता दोनों पर्याप्त जरूरी हैं । साहित्य-पठन के निरन्तर ह्रास को भी रेखांकित करता है यह आलेख । इस चिट्ठे पर क्रमशः सम्पूर्ण आलेख हिन्दी रूपांतर के रूप में उपलब्ध होगा । पहली दूसरी कड़ी के बाद प्रस्तुत है तीसरी कड़ी ।

Translation of Mario Vargas Llosa's essay Why Literature

जनसामान्य के उद्भव और उसके लक्ष्य के प्रति चेतना का सृजन करके तथा मानव जाति को परस्पर संवाद के लिए बाध्य करके साहित्य उसमें जो भाईचारा स्थापित करता है, वह सारे भौतिक बंधनों को पार कर जाता है । साहित्य हमें विगत में पहुँचा देता है और उन लोगों से हमारा सम्बन्ध स्थापित कर देता है, जिन्होंने अतीत काल में योजनायें रचीं, आनन्द प्राप्त किया और उन रचनाओं की स्वप्न-सृष्टि में डूबे रहे जो हम तक उतर कर आयी हैं; और जो आज भी हमें आनन्द लेने और स्वप्न संरचना की पृष्ठभूमि प्रदान करती हैं । यह संयुक्त मानव अनुभूति में अपनी उपस्थिति की भावना जो समय और काल की सीमा के पार होती है, संस्कृति की सर्वोत्तम उपलब्धि होती है, और   पीढ़ी दर पीढ़ी इसके पुनर्नवीनीकरण में जितना योगदान साहित्य देता है उतना और कुछ भी नहीं ।

बोर्गेज (Borges) प्रायः उत्तेजित हो जाता करता था जब उससे पूछा जाता था, “ साहित्य का उपयोग क्या है?” उसके लिए यह प्रश्न मूर्खतापूर्ण लगता था और इसके लिए वह यही उत्तर देगा, “यह तो कोई नहीं पूछेगा कि कैनरी (Canary) के गीतों का या सूर्यास्त का क्या उपयोग है ? यदि इन मनोहर चीजों का अस्तित्व है, और धन्यवाद है उनको कि यदि जीवन उनके लिए अत्यल्प भद्देपन और उदासीनता का उदाहरण है तो क्या किसी चीज की प्रायोगिक तथ्यता खोजना नगण्य एवं तुच्छ नहीं है ?” परंतु प्रश्न एक अच्छा प्रश्न है  । उपन्यास और कवितायें पक्षियों के गीत की तरह नहीं हैं और न तो अंतरिक्ष में डूबते हुए सूर्य की चमक की तरह हैं, क्योंकि उनकी रचना संयोगवश या प्रकृति के द्वारा नहीं हुई । ये मनुष्य की रचनाएँ हैं, इसलिये यह पूछना उचित है कि वे कैसे और क्यों आये संसार में, और उनके आने का उद्देश्य क्या है, और वे इतने दिनों तक अस्तित्व में बनी क्यों हैं ।

मारिओ वर्गास लोसा

पेरू के प्रतिष्ठित साहित्यकार। कुशल पत्रकार और राजनीतिज्ञ भी। वर्ष २०१० के लिए साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता।

जन्म : २८ मार्च, १९३६
स्थान : अरेक्विपा (पेरू) 
रचनाएं : द चलेंज–१९५७; हेड्स – १९५९; द सिटी एण्ड द डौग्स- १९६२; द ग्रीन हाउस – १९६६;  प्युप्स –१९६७; कन्वर्सेसन्स इन द कैथेड्रल – १९६९; पैंटोजा एण्ड द स्पेशियल -१९७३; आंट जूली अण्ड स्क्रिप्टराइटर-१९७७; द एण्ड ऑफ़ द वर्ल्ड वार-१९८१; मायता हिस्ट्री-१९८४; हू किल्ड पलोमिनो मोलेरो-१९८६; द स्टोरीटेलर-१९८७;प्रेज़ ऑफ़ द स्टेपमदर-१९८८;डेथ इन द एण्डेस-१९९३; आत्मकथा–द शूटिंग फ़िश-१९९३।

जो साहित्यिक रचनायें हैं वे रचनाकार की चेतना की गहन आत्मीयता में एक आकृति-विहीन प्रेतात्मा की तरह उत्पन्न होती हैं । उनमें अचेतन की संयुक्त शक्ति होती है और होती है लेखक की संवेदना जो उसके चतुर्दिक व्याप्त विश्व के प्रति होती है, और होते हैं लेखक के संवेग – और ये ही चीजे हैं जिनको कवि या कथाकार शब्दों के साथ जूझता हुआ क्रमशः रूप, आकार, गति, लय, छंद और जीवन प्रदान करता है  । यह निश्चित ही एक बनावटी जीवन है, निश्चित ही एक काल्पनिक जीवन है, फिर भी नर-नारी यह बनावटी जीवन खोजते हैं – कुछ तो तीव्र गति से, कुछ बिखरे हुए भाव से । ऐसा इसलिए कि वास्तविक जीवन उनके लिए छोटा पड़ जाता है, और उनको वह देने में समर्थ नहीं हो पाता है जो वे चाहते हैं । साहित्य एक व्यक्ति की रचना के द्वारा अस्तित्व में आना प्रारंभ नहीं करता । यह तभीं अस्तित्व में रह सकता है जब दूसरे लोग भी इसको स्वीकार करते हैं, और यह एक सामाजिक जीवन का हिस्सा बन जाता है, और जब यह पठन, बहुत धन्यवाद की बात है कि, एक दूसरे में परस्पर बँटी हुई अनुभूति हो जाती है ।

इसके लाभप्रद प्रभावों में से एक है भाषा के स्तर का लाभ । लिखित साहित्य से विहीन समाज की अभिव्यक्ति  में निश्चितता का अभाव होता है , विविध कोमल अर्थों एवं आकृतियों की समृद्धि का अभाव होता है और अपेक्षाकृत उस स्पष्टता का अभाव होता है जो साहित्यिक रचनाओं के माध्यम से विरचित एवं पूर्ण होती हुई उस समाज को प्राप्त होती है जिसका परस्पर सम्वाद का अस्त्र शब्द है  । ऐसी पठन पाठन से विहीन मानवता उस बहरे और शब्दविहीन गूंगों का समूह होगी, जिसमें अपरिपक्व एवं अविकसित भाषा के चलते परस्पर संवाद की घोर कठिनाई झेलनी पड़ती है । यह व्यक्तियों के लिए भी सत्य है । जो व्यक्ति पढ़ता नहीं है या कम पढता है या पढ़ता भी है तो व्यर्थ की चीजें पढ़ता है, तो वह एक हकलाने वाला व्यक्ति है । वह बोल तो बहुत सकता है , पर कहेगा बहुत कम, क्योंकि उसका शब्दकोष आत्माभिव्यक्ति में अक्षम है ।

इसकी यह केवल वाचिक सीमा ही नहीं है । बुद्धि और कल्पना में भी इसकी सीमा प्रकट होती है । इसमें विचारों का कंगालीपना है । सीधा सा कारण् यही है कि विचार, अवधारणाएँ जिनसे हम अपनी स्थिति के रहस्यों को ग्रहण कर पाते हैं, वे शब्दों से अलग स्थित नहीं होते हैं । अच्छे साहित्य और केवल अच्छे साहित्य से ही हम यह सीख पाते हैं कि कैसे सही रूप से, गंभीरता से, दृढ़ता और सूक्ष्मता से बोला जाता है । कलाओं की किसी भी साज-सज्जा में, किसी भी शाखा में साहित्य के स्थान की पूर्ति करने की शक्ति नहीं है जो लोगों के लिए आवश्यक भाषा की संरचना कर सके । ठीक-ठीक कहें तो समृद्ध और परिवर्तनशील भाषा के स्वामित्व के लिए, संवाद-सृजन हेतु प्रत्येक विचार, प्रत्येक संवग की प्राप्ति हेतु सामर्थ्य के लिए, चिंतन,अध्यापन, सीख एवं संवाद के लिए तथा कल्पनाशीलता, स्वप्न और अनुभूति के लिए अच्छी तरह तैयारी करनी होती है । गुप्त रूप में शब्द हमारे क्रिया-कलाप में अनुगुंजित होते है । उन कार्यों में भी उनकी अनुगूंज सुनाई पड़ती है जो भाषा से बहुत दूर स्थित प्रतीत होते हैं । और चूंकि भाषा अनावृत हुई, उसका विकास हुआ तो धन्यवादार्ह है साहित्य कि उससे भाषा अपने परिष्कार और तौर तरीकों में उच्च स्थान प्राप्त कर सकी- इसने मानव के आनंद की संभावना में चार-चाँद लगाया ।

क्रमशः—
पूरे लेख को निम्न कड़ियों से क्रमशः पढ़ा जा सकता है –
  1. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-1
  2. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-2
  3. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-3
  4. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-4
  5. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-5
  6. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-6
  7. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-7

पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book) – 2

साहित्य क्यों? (Why Literature ?):मारिओ वर्गास लोसा (Mario Vargas Llosa)
प्रस्तुत है पेरू के प्रख्यात लेखक मारिओ वर्गास लोसा के एक महत्वपूर्ण, रोचक लेख का हिन्दी रूपान्तर । ‘लोसा’ साहित्य के लिए आम हो चली इस धारणा पर चिन्तित होते हैं कि साहित्य मूलतः अन्य मनोरंजन माध्यमों की तरह एक मनोरंजन है, जिसके लिए समय और विलासिता दोनों पर्याप्त जरूरी हैं । साहित्य-पठन के निरन्तर ह्रास को भी रेखांकित करता है यह आलेख । इस चिट्ठे पर क्रमशः सम्पूर्ण आलेख हिन्दी रूपांतर के रूप में उपलब्ध होगा । पहली कड़ी के बाद प्रस्तुत है दूसरी कड़ी ।

हम ज्ञान के विशिष्टीकरण के युग में रह रहे हैं । धन्यवाद देता हूँ और विज्ञान और तकनीक के आश्चर्यजनक और शक्तिशाली विकास को और परिणामस्वरुप अगणित खण्डों में ज्ञान के बँट जाने को । यह जो सांस्कृतिक प्रवृत्ति है इसपर संभवतः आनेवाले वर्षों में और बल दिया जायेगा । यह बात सच है कि विशिष्टीकरण के अनेकों लाभ हैं । इससे गहरी छानबीन और महान प्रयोगों की स्थिति बनती है । यह प्रगति का इंजिन ही है, फिर भी इसके नकारात्मक परिणाम भी हैं । क्योंकि यह उन सामान्य बौद्धिक और सांस्कृतिक प्रवृत्तियों को किनारे लगा देता है जो पुरुष और स्त्री को साथ-साथ रहने का संयोग बनाते हैं, उनके आपस में संवाद का सृजन करते हैं और दो वर्गों के मेल की अनुभूति का भाव पैदा करते हैं । विशिष्टीकरण सामाजिक समझ को कम करने में प्रमुख भूमिका निभाता है । यह मनुष्यों को एक ऐसी भीड़ में विभक्त कर देता है जिन्हें टेक्नीशियन या विशेषज्ञ कहेंगे । ज्ञान के विशिष्टीकरण को एक विशिष्ट भाषा की आवश्यकता होती है, जिनमें दुर्बोध संकेतों की बाढ़ होती है, क्योंकि सूचना अधिक से अधिक विशिष्ट और खंडों में विभक्त होती है । इसी विशेषता और विभाजन की ओर संकेत करते हुए एक पुरानी कहावत ने सचेत किया है – शाखा या पत्ती पर बहुत अधिक ध्यान मत दो, कहीं ऐसा न हो कि तुम यह भूल जाओ कि वे एक वृक्ष के अंग हैं, या वृक्ष पर अधिक ध्यान मत दो, कहीं ऐसा न हो कि  वृक्ष एक जंगल का हिस्सा है यह भूल  जाय । वन की उपस्थिति के प्रति सचेत रहना एक समानता की भावना को पैदा करता है, एक ऐसी भावना को उपस्थित करता है जो समाज को आपस में बाँधे रहती है और इसे असंख्य आत्मकेन्द्रित या अहंवादी विशेष खंड से बचाए रखती है । राष्ट्रों और व्यक्तियों का अहमन्यवादी होना एक संभ्रम और उन्माद को जन्म देता है । उससे वास्तविकता खंड-खंड हो जाती है और घृणा, युद्ध और यहाँ तक कि जाति-संहार भी उत्पन्न हो जाता है ।

मारिओ वर्गास लोसा

पेरू के प्रतिष्ठित साहित्यकार। कुशल पत्रकार और राजनीतिज्ञ भी। वर्ष २०१० के लिए साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता।

जन्म : २८ मार्च, १९३६
स्थान : अरेक्विपा (पेरू) 
रचनाएं : द चलेंज–१९५७; हेड्स – १९५९; द सिटी एण्ड द डौग्स- १९६२; द ग्रीन हाउस – १९६६;  प्युप्स –१९६७; कन्वर्सेसन्स इन द कैथेड्रल – १९६९; पैंटोजा एण्ड द स्पेशियल -१९७३; आंट जूली अण्ड स्क्रिप्टराइटर-१९७७; द एण्ड ऑफ़ द वर्ल्ड वार-१९८१;मायता हिस्ट्री-१९८४; हू किल्ड पलोमिनो मोलेरो-१९८६;द स्टोरीटेलर-१९८७;प्रेज़ ऑफ़ द स्टेपमदर-१९८८;डेथ इन द एण्डेस-१९९३; आत्मकथा–द शूटिंग फ़िश-१९९३।

हमारे समय में विज्ञान और तकनीकी संघटित करने या जोड़ने का कार्य नहीं कर सकते । खास कर इसलिए कि उसमें अनन्त ज्ञान का खजाना है और उसके विस्तारीकरण की पर्याप्त गति है । इसका फल है कि विशिष्टीकरण और अस्पष्टता उत्पन्न हो जाती है । लेकिन साहित्य एक प्रमुख सामान्य मूल्य के रूप में मनुष्य के अनुभवों के साथ रहा है, है और आगे भी रहेगा जिससे मनुष्य अपने को पहचानते हैं और एक दूसरे के साथ विचारों का आदान-प्रदान करते हैं, चाहे उनका पेशा, उनकी जीवन की योजनाएँ, उनका भौगोलिक और सांस्कृतिक स्थान,उनकी व्यक्तिगत समस्याएँ कितनी भी भिन्न क्यों न हों । यह मनुष्यों को उनकी हर विशेषताओं के साथ अपनी ऐतिहासिकता से परे पहुँचा देता है । सर्वेंटिस (Cervantes), शेक्सपियर (Shakespeare), दाँते (Dante) और ताल्सतॉय (Tolstoy)  के पाठक के रूप में हम यह पाते हैं कि प्रत्येक अपने समय और स्थान की सीमा को पार कर गया है और हम स्वयं को उसी जाति के लोगों के बीच का पाते हैं । क्योंकि इन लेखकों की रचनाओं में हम एक मनुष्य के रूप में हिस्सा बँटाते हैं जो पूरे विभेदों के बीच में भी हमें विलग होने से रोके रखता है । साहित्य के अतिरिक्त दूसरी ऐसी कोई अच्छी चीज नहीं है जो ईर्ष्या, जातीयता, धार्मिक और राजनीतिक कट्टरपना से हमारी रक्षा कर सके, और एक खास राष्ट्रवाद से हमें बचा सके । यह सत्य महान साहित्य में ही दिखायी पड़ता है कि सम्पूर्ण राष्ट्रों और सभी स्थानों के नर-नारी वास्तविक रूप से एक समान हैं । केवल अन्याय ही उनमें विभेद, वर्गीकरण और विखण्डन का बीज बोता है ।

राष्ट्रीय या जातिगत या सांस्कृतिक विभेदों के बीच भी अपनी मानवता की विरासत की सम्पन्नता को साहित्य के अतिरिक्त अच्छी तरह से और कौन सिखा सकता है,और साहित्य के अतिरिक्त कौन बता सकता है  कि वे विभिन्नताएं मानवता की बहुवर्णी रचनात्मकता का प्रकटीकरण ही हैं । वास्तव में अच्छा साहित्य पढ़ना एक आनन्द की अनुभूति की बात है, लेकिन यह उस सीख की भी अनुभूति है कि हम अपनी एकता और अपूर्णता में, अपने कर्मों, अपने स्वप्नों और अपनी प्रतिछाया में, अकेले या औरों के साथ रहकर, जनसामान्य के बीच की छवि और एकांत में चेतना के अवकाश की स्थिति में क्या हैं और कैसे हैं ।

जैसा ईसा बर्लिन (Isaiah Berlin) कहा करता था कि इन विरोधाभासी सत्यों का सम्पूर्ण योग ही मनुष्य की परिस्थितियों के सार तत्व का निर्माण करता है । आज के संसार में यह जीवन्त और सम्पूर्ण मानवता का ज्ञान केवल साहित्य में ही पाया जा सकता है । मानविकी की और किसी भी शाखा में चाहे दर्शन, इतिहास या कला हो ऐसा कहीं नहीं पाया जाता, और निश्चित रूप से सामाजिक विज्ञान भी एकता का सूत्र सँजोने में सफल नहीं हुए हैं, यह वैश्विक संवाद बनाने में सफल नहीं हुए हैं । इन मानविकी शाखाओं को भी ज्ञान के वर्गीकरण, उपवर्गीकरण का कैंसर लग गया है । ये अपने को भी किसी खंड या तकनीकी क्षेत्र में समेटने में लग गए हैं जहाँ के विचार और शब्द सामान्य नर-नारी की पहुँच के परे है । कुछ आलोचक या सिद्धान्तवादी साहित्य को भी विज्ञान में बदल देना चाहेंगे, लेकिन ऐसा कभी नहीं होगा, क्योंकि उपन्यास केवल एक क्षेत्र या अनुभव को खोजने के लिए नहीं होता । यह कल्पना के द्वारा मनुष्य जीवन की सम्पूर्णता को समृद्ध बनाने के लिए होता है जिसको लोगों से अलग नहीं किया जा सकता, विखंडित नहीं किया जा सकता और न तो ऐसे विशिष्ट आकार-प्रकार को सूत्रबद्ध कर सकता है जो किसी से अज्ञात रह जाँय । यह प्राउस्ट (Proust) के निरीक्षण का अर्थ ही है कि “वास्तविक जीवन, अंततः विचारशील और अभिव्यक्त जीवन, पूरी तरह से जिया गया एकमात्र जीवन यदि कोई है तो वह साहित्य है ।” वह अतिशयोक्ति नहीं कर रहा था और न तो अपने निजी व्यवसाय के प्रति अपना स्नेह अभिव्यक्त कर रहा था । वह तो उस खास सिद्धान्त को आगे बढ़ा रहा था कि साहित्य के फलस्वरूप ही जीवन को अच्छी तरह से समझा और जीया जा सकता है, और पूरी तरह से जीया गया जीवन दूसरों के जीने और दूसरों के साथ जीने और उनमें सहभागी होने की आवश्यकता की पूर्ति करता है ।
क्रमशः….

पूरे लेख को निम्न कड़ियों से क्रमशः पढ़ा जा सकता है –

  1. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-1
  2. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-2
  3. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-3
  4. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-4
  5. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-5
  6. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-6
  7. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-7

पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The premature obituary of the book)

साहित्य क्यों ? (Why Literature ?) : मारिओ वर्गास लोसा (Mario Vargas Llosa)

 प्रस्तुत है पेरू के प्रख्यात लेखक मारिओ वर्गास लोसा के एक महत्वपूर्ण, रोचक लेख का हिन्दी रूपान्तर । ‘लोसा’ साहित्य के लिए आम हो चली इस धारणा पर चिन्तित होते हैं कि साहित्य मूलतः अन्य मनोरंजन माध्यमों की तरह एक मनोरंजन है, जिसके लिए समय और विलासिता दोनों पर्याप्त जरूरी हैं । साहित्य-पठन के निरन्तर ह्रास को भी रेखांकित करता है यह आलेख । इस चिट्ठे पर क्रमशः सम्पूर्ण आलेख हिन्दी रूपांतर के रूप में उपलब्ध होगा ।

Translation of Mario Vergas Llosa's Why Literature?

पुस्तक मेलों या पुस्तक की दुकानों पर प्रायः ऐसा होता रहता है कि कोई सज्जन व्यक्ति मेरे पास आता है और मुझसे हस्ताक्षर की बात करता है, और कहता है, “यह मेरी पत्नी के लिए है, मेरी छोटी लड़की के लिए है या मेरी माँ के लिए है ।” वह इसे स्पष्ट करते हुए कहता है कि वह बहुत बड़ी पढ़ने वाली है और साहित्य से प्रेम करती है । मैं तुरंत पूछ बैठता हूँ, “और तुम्हारी अपने बारे में क्या स्थिति है? क्या तुम्हें पढ़ना पसन्द नहीं है?” एक ही तरह का उत्तर प्रायः मिला करता है, “वास्तव में मुझे पढ़ना पसन्द है किन्तु मैं बहुत व्यस्त आदमी हूँ ।” दर्जनों बार मैंने ऐसा स्पष्टीकरण सुना है । यह आदमी और इसी तरह के हजारॊ आदमी ऐसे हैं जिन्हें अनेकों महत्वपूर्ण कार्य करने हैं, उनकी अनेकों प्रतिबद्धताएँ हैं, अनेकों उत्तरदायित्व हैं और वे अपना मूल्यवान समय किसी उपन्यास में सिर गड़ा कर, कोई कविता की किताब पढ़ते हुए या घंटों-घंटों साहित्यिक लेख पढ़ते हुए नष्ट नहीं करना चाहते हैं । इस व्यापक विचारधारा के अनुसार साहित्य एक गौण क्रिया-कलाप है । निःसन्देह आनन्ददायक और लाभदायक है जो संवेदनाएं और अच्छे रंग-ढंग प्रदान करता है, लेकिन वास्तव में यह एक मनोरंजन है, एक प्यारा मनोरंजन है जिसे आदमी केवल मनोरंजन के लिए ही प्रयोग में लाने पर समय दे सकता है । यह कुछ ऐसी चीज है जो खेलों, चलचित्रों, ताश या शतरंज के खेल के बीच में बैठाई जा सकती है, और बिना सिर खपाए इसको बलिदान कर दिया जा सकता है जब जीवन के संघर्ष में कोई कार्य या कोई ड्यूटी “प्राथमिकता” के रूप में अनिवार्य रूप से सामने आ जाती हो । 

मारिओ वर्गास लोसा
पेरू के प्रतिष्ठित साहित्यकार। कुशल पत्रकार और राजनीतिज्ञ भी। वर्ष २०१० के लिए साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता।
जन्म : २८ मार्च, १९३६
स्थान : अरेक्विपा (पेरू) 
रचनाएं : द चलेंज–१९५७; हेड्स – १९५९; द सिटी एण्ड द डौग्स- १९६२; द ग्रीन हाउस – १९६६;  प्युप्स –१९६७; कन्वर्सेसन्स इन द कैथेड्रल – १९६९; पैंटोजा एण्ड द स्पेशियल -१९७३; आंट जूली अण्ड स्क्रिप्टराइटर-१९७७; द एण्ड ऑफ़ द वर्ल्ड वार-१९८१; मायता हिस्ट्री-१९८४; हू किल्ड पलोमिनो मोलेरो-१९८६; द स्टोरीटेलर-१९८७;प्रेज़ ऑफ़ द स्टेपमदर-१९८८;डेथ इन द एण्डेस-१९९३; आत्मकथा–द शूटिंग फ़िश-१९९३।

ऐसा स्पष्ट मालूम होता है कि साहित्य अधिक से अधिक औरतों के क्रिया-कलाप की चीज हो गयी है । पुस्तक की दुकानों में, किसी सम्मेलन में या लेखकों के सार्वजनिक पठन में और मानविकी के लिए समर्पित विश्वविद्यालय के विभागों में भी स्त्रियाँ स्पष्ट रूप से पुरुषों से आगे निकल जाती हैं । पारंपरिक रूप से ऐसा स्पष्टीकरण दिया जाता है कि मध्यमवर्ग की स्त्रियाँ ज्यादा इसलिए पढ़ती हैं क्योंकि वे पुरुषों की अपेक्षा कम काम करती हैं और उनमें से अनेकों ऐसा अनुभव करती हैं कि वे पुरुषों की अपेक्षा आसानी से उस समय को प्रयोग में ला सकती हैं जो उनके द्वारा कल्पनाओं और भावों के लिए समर्पित किया जाता है । मैं कुछ हद तक ऐसी व्याख्याओं से खीझ जाता हूँ जो पुरुष और स्त्रियों को एक असंवेदनशील श्रेणी में विभक्त कर देती हैं और प्रत्येक वर्ग को उनके गुण, चरित्र और उनकी कमियों के रूप में स्थापित कर देती हैं; लेकिन निःसन्देह साहित्य के कम से कम पाठक हैं और जो थोड़े बहुत पाठक रह भी गए हैं स्त्रियाँ उनकों पीछे छोड़ देती हैं ।


प्रायः यही दशा हर जगह है । उदाहरण के लिए स्पेन में ’जनरल सोसाइटी ऑफ स्पेनिश राइटर्स’ (General Society of Spanish Writers) ने अपने ताजा सर्वेक्षण में इस बात को अभिव्यक्त किया है कि देश की जनसंख्या का आधा भाग कभीं भी कोई किताब नहीं पढ़ा है । इस सर्वेक्षण ने यह भी बताया है कि उन कम लोगों में, जो पढ़ते भी हैं, उनमें स्त्रियाँ जो पठनशील हैं वे पुरुषों से ६.२ प्रतिशत के हिसाब से आगे निकल जाती हैं । यह एक ऐसा अन्तर है जो बढ़ता हुआ दिखायी दे रहा है । मुझे इन स्त्रियों से बड़ी प्रसन्नता है, लेकिन मुझे ऐसे मनुष्यों और लाखों-लाखों ऐसे मनुष्यों पर बड़ा दुख होता है, जो पढ़ तो सकते थे लेकिन न पढ़ने का निर्णय ले बैठे ।

मुझे ऐसे लोगों पर इसलिए दया नहीं आती है कि वे एक आनन्द को खो रहे हैं बल्कि इसलिए भी कि मुझे विश्वास है कि बिना साहित्य का कोई समाज, या ऐसा समाज जिसमें साहित्य को पदावनत कर दिया गया है वह आध्यात्मिक रूप से उद्दंड होगा । साहित्य को इस तरह से किनारे कर दिया जाय जैसे वह सामाजिक और व्यक्तिगत दोष हो और समाज में उसे एक अलग टुकड़े में बाँट दिया गया हो, तो ऐसा समाज एक असभ्य समाज होगा और यह अपनी स्वतंत्रता को भी खतरे में डाल देगा । मैं साहित्य को अवकाश के क्षणों में विलासिता की वस्तु के विपक्ष में कुछ तर्क प्रस्तुत करना चाहता हूँ और इस पक्ष में तर्क देना चाहता हूँ कि साहित्य मस्तिष्क के क्रियाकलापों के लिए एक प्राथमिक और आवश्यक वस्तु है और आधुनिक प्रजातांत्रिक समाज, स्वतंत्र व्यक्तियों के समाज के लिए नागरिकों के निर्माण कार्य की एक ऐसी वस्तु है जिसे हटाया नहीं जा सकता है ।
क्रमशः