Monthly Archives

June 2009

Ramyantar

अपने प्रेम-पत्र में यही तो लिखा मैंने….

“जीवन के रोयें रोयें कोमिलन के राग से कम्पित होने दो,विरह के अतिशय ज्वार कोठहरा दो कहीं अपने होठों पर,दिव्य प्रेम की अक्षुण्णता कोसमो लो अपने हृदय में, औरअपने इस उद्दाम यौवन की देहरी परप्रतीक्षा का पंछी उतरने दो;फिर देखो-मैं…

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“मगर सूर्य को क्यूं लपेटा” ?

अपनी पिछली प्रविष्टि (हे सूर्य : कविता – कामाक्षीप्रसाद चट्टोपाध्याय) पर अरविन्द जी की टिप्पणी पढ़कर वैसे तो ठहर गया था, पर बाद में मन ने कहा कि कुछ बातें इस प्रविष्टि के संदर्भ करना जरूरी है, क्योंकि लगभग यही…

Ramyantar

हे सूर्य !

हे बहु-परिचित सूर्य !नहीं पा रहा हूँ तुम्हें नये सिरे से पहचान,पहचान नहीं पा रहा ….उत्तरी हवा चल रही है । वैज्ञानिक कहता है-कृत्रिम-’हार्ट’ बना दूँगा,आँखें जाँय तो क्या, मृत कुत्ते की आँखें दूँगा ।और मस्तिष्क भी शायद,शायद वह भी…

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मास्ति वेंकटेश अय्यंगार : Masti Venkatesh Iyengar

गहन मानवतावाद के पोषक और मानव मात्र में अटूट आस्था रखने वाले कन्नड़ के प्रख्यात साहित्यकार डॉ० मास्ति वेंकटेश अय्यंगार ने कन्नड़ कहानी को उल्लेखनीय प्रतिष्ठा दी । सृजनात्मकता की असीम संभावनाओं से लबरेज ’मास्ति’ (मास्ति का साहित्यिक नाम श्रीनिवास…

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पाँच पुरुषों की कामिनियाँ

द्रौपदी के पाँच पुरुषों की पत्नी होने पर बहुत पहले से विचार–विमर्श होता रहा है । अनेक प्रकार के रीति–रिवाजों और प्रथाओं का सन्दर्भ लेकर इसकी व्याख्या की जाती रही है । अपने अध्ययन क्रम में मुझे अचानक ही श्री…

Ramyantar

कभी तुमने अपनी गली में न झाँका

दूसरों की गली का लगाते हो फेराकभी तुमने अपनी गली में न झाँकातितलियों के पीछे बने बहरवाँसूकभी होश आया नहीं अपनी माँ का । सुबह शाम बैठे नदी के किनारेचमकते बहुत सीप कंकड़ बटोरे,सहेजा सम्हाला उन्हें झोलियों मेंगया भूल अपना…