आलेख Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम् https://blog.ramyantar.com/category/आलेख हिंदी ब्लॉग। साहित्य, भाषा, संस्कृति, लोक व शास्त्र से संयुक्त। कविता, कहानी, समीक्षा, निबन्ध, नाटक एवं अनुवाद का सहज प्रकाशन। लोक साहित्य का रंग भी। Wed, 26 Jun 2024 14:06:16 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1 https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2024/03/cropped-favicon-4-32x32.png आलेख Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम् https://blog.ramyantar.com/category/आलेख 32 32 शील और अनुशासन https://blog.ramyantar.com/2011/08/blog-post-8.html https://blog.ramyantar.com/2011/08/blog-post-8.html#comments Sat, 20 Aug 2011 13:31:00 +0000 अब शील पर आयें! ’शील’ और ’अनुशासन’ में अन्तर है जरूर। शील को पूरी तरह न तो ज्ञान से ही जोड़ कर देख सकेंगे और...

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फेसबुक सबके लिए बहुत अनुकूल है, पर मुझे सुहाता नहीं! इतनी रफ्तार का आदी मैं नहीं! चीजें बहुत तेज गुम होती जाती हैं वहाँ। कितने लिंक, कितने थ्रेड सहेजूँ? खैर, वहाँ एक प्रश्न दिखा, उत्तर वहाँ दे सकूँ, यह कौशल नहीं मेरे पास। जो कहने का मिजाज बना, उसे वहाँ कहना असुविधापूर्ण था, सो उत्तर प्रश्नकर्त्ता को मेल कर दिया मैंने। उन्होंने प्रवृत्त किया तो बात कहने ब्लॉग पर आया हूँ! यहाँ, वहाँ की बातें लिखूँगा, सो बहुत तात्विक और पारिभाषिक यहाँ कुछ भी न मिलेगा! मेरा चिन्तन भी भाव के साथ खूब रहस-वन विचरता है। सो उस अठखेली का अबूझ रस तो मिलेगा ही!

अब शील पर आयें! ’शील’ और ’अनुशासन’ में अन्तर है जरूर। शील को पूरी तरह न तो ज्ञान से ही जोड़ कर देख सकेंगे और न ही केवल शारीरिक क्रिया या व्यवहार से। हाँ, अनुशासन जरूर एक व्यवस्था है, जो हमें हमारी क्रियाओं और व्यवहार (ज्ञानात्मक, क्रियात्मक) के संबंध में निर्देशित करता रहता है। ख़बर रखें, यदि किसी सभा या सार्वजनिक स्थान पर वाणी (भाषा से अभिव्यक्त) चिन्तन की वस्तुनिष्ठा या सार्वजनिक सभा का हिस्सा होने के प्रति कृत संकल्पित रहती है, तब तक वह शील का एक आवरण मात्र है। हम सजग होकर अभिव्यक्त हैं, बह नहीं रहे हैं-चेहरों से चेहरा मिलाकर भाषायी व्यवहार कर रहे हैं- तब तक वह भाषा शीलावरण बन सकती है-दार्शनिकों की भाषा-सी (लगे हाँथ बुद्ध और राम के अन्तर को भी समझते जाइयेगा)। पर ज्यों ही भाषा भावों की सहचरी बनी, भावों की भी भाषा बनी- तब वही “वाणी शील की सरस्वती बन जाती है”।

शील वस्तुतः है क्या?

शील व्यक्ति के जीवन का दर्शन (मात्र) नहीं, काव्य है। कुछ सोच-समझ कर, अपने लिए कोई व्यवस्था बना कर, अपने जीवन या व्यवहार के लिए कोई अचल प्रतिष्ठा कर (मतलब अनुशासन-सा) व्यक्ति का शील निर्मित नहीं होता। इस शील का निर्माण हृदय की व्यवस्था से होता है, और यह व्यवस्था प्रतिक्षण चञ्चल गति से निर्मित होती है।

  • शील और अनुशासन में क्या अंतर है?
  • या दोनों समान हैं?
  • बुद्ध का शील और रामायण में वर्णित राम का गुण शील क्या एक ही हैं?

शील एक समजात स्वभावसिद्ध गुण है। इसे कहीं से सीखने या समुपार्जित करने की आजीवन आवश्यकता नहीं रहती। शील व्यक्तित्व का वह अविच्छिन्न अंग है जिससे मानवता अलंकृत होती है। जैसे पूरे पुद्गल में रक्त परिभ्रमण करता है, जैसे अस्थिसमूह पर चर्मावेष्टन रहता है, जैसे श्वांस संचरण की संजीवनी अनकहे शरीर को परिप्लुत किए रहती है, वैसे ही शील नस-नस की आभा है।

शील को विचारकों ने एक उदात्त अवदान स्वीकार किया है, और यह सब्लिमिटी (Sublimity) किसी और नाम से अभिहित नहीं की जा सकती। शील केवल शील है, और वह कोई ओढ़ी हुई चादर नहीं है कि वह उतार कर रख दी जाय, और न जाड़े की आग है कि दूर से बैठ कर उसका आनन्द लिया जाय। शील का अर्थ है सम्पूर्णता, जीवनी शक्ति और मानवता का दैवीय धन । शीलवान वह अरुणोदय है जो पूरे व्योम मण्डल को, पूरे धरामण्डल को और पूरे आभामण्डल को अपने में समेटे रहता है। 

शील तो शायद किसी परिस्थिति के ’बाद’ अपनी गरिमामयी उपस्थिति देता है, जैसे ’मर्यादापुरुषोत्तम’ राम, कर्त्तव्यनिष्ठ राम जो वैभव का सुख-भोग कर वनवास करते हैं, लक्ष्मण के शक्ति से मूर्छित होने पर कहते हैं -“जो जनितेऊँ बन बंधु बिछोहू, पिताबचन मनितेऊँ नहिं ओहू।” अंदाजा लगाइये कि इस असह्य क्षण में भी यदि राम यह कहते कि ’भले ही लक्ष्मण को हमें खोना पड़े, पर हमें तो हमारा कर्त्तव्य प्रिय है’-तो कैसा लगता! तो पूर्व के राम और बाद के राम में कोई अन्तर न दीखता तब। तब राम की देश में जड़स्थिति बनी रहती, पर काल ने जिस परिवर्तन की सृष्टि की उससे राम विमुक्त-से लगते।

रामचरित मानस में सारे गुणों से ऊपर शील की प्रतिस्थापना हुई है-“विद्या विनय निपुण गुण शीला”। सारे गुण, सारी निपुणता, सम्पूर्ण विद्या, सारा विनय शील की आरती उतारता है। सब का सम्मिलित नाम ही शील है । शील गृहिणी की पाकशाला, मल्ल की व्यायामशाला, शिशु की पाठशाला, युवक की रमणशाला और वृद्ध की संस्मरणशाला में समान रूप से वैसे ही बहता रहता है जैसे धमनियों में खून। भाव यह कि प्रवहमान जीवन, भाव विगलित जीवन-दशा, ’करऊँ प्रणाम जोरि जुग पानी’ जैसी सहजता-सरलता, हरी दूब जैसी विनम्रता, ताल-वृक्ष जैसी अकड़ नहीं, गिरि-शृंग जैसी पकड़ नहीं और उदधि उद्वेलन जैसा वितंडावाद नहीं । 

अनुशासन क्या है?

रही अनुशासन की बात तो वह आयास अर्जित है। अनुशासन को अपने में लागू करना होता है। अनुशासन से क्या ऐसा लगता नहीं कि समाज की तो सध रही है, व्यक्ति टूट जाता है। अनुशासन ’इंजेक्शन’ (injection) से लिया दिया गया ’vigour’(जीवन-रस) है। स्वतः तरंगित शोणित उर्जा नहीं है। अनुशासन को स्खलित होते, पतित होते देखा गया है, देखा जा रहा है। विश्वामित्रों की निर्विकल्प समाधियाँ गिरीं, अनुशासन टूटा। स्वतंत्रता की क्रांति से लेकर वर्तमान की एक आँधी जैसी क्रान्ति (अन्ना-आँधी) में शासक-प्रशासक के अनुशासन बने-गिरे, ’यह’-’वह’ की अनुशासनात्मक पतंग उड़ायी गयी। इसलिए अनुशासन की कई मुख मुद्रायें देखी गयीं और ऐसा हो क्यों नहीं? अनुशासन शासन का अनुगामी है। वह उसके पीछे-पीछे चलता है।

अनुशासन में चेहरे-चेहरे की खिंची-खिंची रेखाएं हैं, शील का दीप्तमान भाल कहाँ है? अनुशासन प्रबल हो सकता, सजल नहीं हो सकता। शील जहाँ जनमानस का प्रफुल्ल शतदल है ,अनुशासन वहीं वाटिका की चहारदीवारी के किनारे लगी हुई बबूल की डाल है। अनुशासन अवरोधक हो सकता है, अभिसिंचक नहीं। अनुशासन सुरक्षा है, संस्कार नहीं। अनुशासन अभिजात है, सहजात नहीं। अनुशासन दोपहरी है जरूर, लेकिन जीवनाकाश की ऊषा बेला या सूर्यास्त की गोधूलि बेला नहीं है। 

रामचरितमानस में आया है कि अनुशासन को मानना या जानना होता है– “को नहिं मान निगम अनुशासन”। राम ने कहा, वही मुझे प्रिय है-“मम अनुशासन मानेइ जोई।” साफ है कि अनुशासन मान ले, मना ले की तरकीब है। अनुशासन सीखना पड़ता है, सिखाना पड़ता है। अनुशासन की ’एन०सी०सी०’ होती है, ’स्काउट’ होता है, सेना होती है, संसद होती है, ट्रेनिंग स्कूल’ होते हैं। कहीं शील की भी कोई ’जिम्नास्टिक गैलरी’ है! अनुशासन के स्थान विशेष, व्यक्ति विशेष, परिस्थिति विशेष में नियम कानून बदलते रहते हैं। पश्चिम वाले अपनी दायीं ओर चलने को अनुशासन कहते हैं, हमारे यहाँ सड़क पर बायें चलने को अनुशासन कहते हैं। ’Keep Silent’ का बोर्ड लगा रहता है, स्वयं पढ़कर चुप रहो या थप्पड़ खाकर चुप रहो-चुप रहना अनुशासन हो गया। आसन लगाकर बैठा हुआ सन्यासी बिना इश्तेहार के चुप है। इसे अनुशासन तो नहीं कहेंगे, यह ध्यानी का शील है, स्मृतियों का अनुशासन नहीं।

शील निरूपण : सिद्दान्त और विनियोग

शील-निरूपण को लेकर एक किताब पढ़ी थी- शील निरूपण : सिद्दान्त और विनियोग। लेखक थे श्री जगदीश पाण्डेय। इस किताब को झटके में ही पढ़ा था काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में बैठे-बैठे। कुछ पन्ने जो लिख मारे थे, उन्हीं से शील की परत खुलेगी- ऐसा मुझे लगता है। लीजिए-

  • यों तो मनुष्य मात्र का सामान्य सत्तासार ज्ञातृत्व, कर्तृत्व और भोक्तृत्व शक्तियों की एक सम्पृक्त अन्विति है, पर व्यक्ति के शील-भवन की आधार-शिला उसकी भोक्तृत्व-पद्धति ही है।
  • यदि ज्ञान से मनुष्य के शील का सीधा या उलट लगाव नहीं तो कोरी शारीरिक क्रिया का भी शील से कोई अटूट या अन्योन्याश्रित संबंध नहीं । जहाँ हाव के पीछे भाव नहीं, वहां शील नहीं । क्रिया मात्र शील नहीं, जब तक वह प्रतिक्रिया न हो।
  • शील को पुतली उलटकर देखने की, अवचेतन के छाया-संस्कारों और प्रेत-स्मृतियों को जीवित व्यक्तित्व की विरल-विशेषता मान लेने की, जो परिपाटी चल पड़ी है, वह निंद्य है। जब तक ये संस्कार निष्प्राण, बलहीन उच्छ्वास मात्र रहते हैं तब तक इनकी संश्लिष्ट अभिव्यक्ति नहीं होती।
  • शील स्वसहाय होता है, नितान्त असहाय नहीं । ऐसा स्पष्ट दीखना चाहिए कि शीलवान भोक्ता है, अतएव कर्ता है, कुछ करण नहीं।
  • विरोध करने और विरोध का सामना करने का सामर्थ्य नहीं तो शील नहीं । जल के वेगवान प्रवाह में बहते हुए बोतल के काक में शील नहीं, विवशता है । पहाड़ पर ठोकर लगे और घर का सिल फोड़नेवाले बुद्धिमान में मूर्खता के साथ शील की निराली अदा भी है।
  • शीलवान की सत्ता देश में स्थित ही नहीं, काल की परिवर्तनशीलता की सहधर्मिणी होनी चाहिए। शील की अभिव्यक्ति जीवन की एक घटना है, व्याकरण की संज्ञा नहीं; आत्मदान है, गुण या प्रवृत्ति की भाववाचक सत्ता नहीं। इसी तरह शील का स्खलन परिस्थिति सापेक्ष रसोद्रेक है, स्थिर या स्थायी ताप-तुषार नहीं।

और-और लिखा जा सकता है इस किताब से । बस बहाने मिलते रहें, मैं नियमित रह सकूँ !

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हाँ, चलते-चलते एक जिज्ञासा ने घेर लिया है । ’शील’ को अंग्रेजी में क्या कहेंगे ?  अर्थ प्रतीक्षित ।

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वसंत प्रकृति का एक अनोखा उपहार है। आधी फरवरी से आधे अप्रैल तक का समय वसंत का समय है। इसमें स्वतः ही वृक्षों में फूल तथा जल एवं वनस्पतियों में सुगंध आ जाती है। न जाने क्या हो जाता है कि शिशिर के घोर संताप से संत्रस्त प्रकृति ऋतुराज वसंत के आते ही अपना नूतन श्रृंगार करने लगती है। यह ऋतु फाल्गुन में जन्म लेती है, चैत्र में जवान होती है और वैशाख बीतते पुनः अपने विश्राम में चली जाती है।

वसंत एक दूत है विराम जानता नहीं,
संदेश प्राण के सुना गया किसे पता नहीं ।
पिकी पुकारती रही पुकारते धरा गगन,
मगर कभी रुके नहीं वसंत के चपल चरण ।

आज ही नहीं जब से मनुष्य ने आँखें खोली हैं, वसंत का हर्षोल्लास उसे हँसाता, खिलाता और प्रफुल्लित करता रहा है। इस भूमंडल का सभ्य, असभ्य और उन्नत, अवनत प्रत्येक मानव इस ऋतु में स्वाभवतः आनन्दमग्न होकर अपने हृदय की आनन्द राशि बिखेरने के लिये उतावला हो जाता है। कविकुल गुरु कालिदास ने ’सर्वं प्रियं चारुतरं वसंते’ से अपनी रमणीक रचना का श्रृंगार किया है।

प्राचीन काल से अनेकों अनेक उत्सव इस ऋतु में आयोजित होने के लिये कतार बाँध कर खड़े हो जाते हैं। जिस दिन यह ऋतु सर्वप्रथम इस भूमंडल पर अवतरित होती थी उस दिन सुवसंतक उत्सव मनाया जाता था। यह वसंत पंचमी का ही प्रतिनिधि था।

वसंत में लाल वस्त्र और लाल पुष्प धारण करने का आम रिवाज था, इसके लिये पुष्पावचायिका नाम से एक उत्सव मनाया जाता था। मदनोत्सव, अशोकोतंसक आदि उत्सवों के नाम प्राचीन ग्रंथों में भरे पड़े हैं। कुछ-कुछ जरूर होने लगता है इस ऋतु में, इसलिये संस्कृत साहित्य और हिन्दी साहित्य में भी इस ऋतु के अगणित गीत गाये गये हैं। स्वागत में दोनों हाथ उठाकर कवियों ने कहा है-

जय वसंत रसवंत सकल सुख सदन सुहावन
मुनि मन मोहन भुवन तीन जिय प्रेम गुहावन।

याद आ जाती है जन-जन को बीती हुई रसवंती घड़ी। यह दौड़ते हुए ऋतुराज वसंत का समक्ष होकर आलिंगन करने का बाहु-प्रसरण क्या भुलाये भूल सकता है-

फेरि वैसे कुंजन में गुंजरन लागै भौंर
फेरि वैसे क्वैलिया कुबोलन ररै लगीं।
फेरि वैसे पातन में पूरि गौ पराग पीत
फेरि त्यौं पलासन में आगि सी बरै लगी॥
फेरि वैसें पपिहा पुकारै लागै नन्दराम
फेरि वैसें धाम-धाम सौरभ भरै लगी।
फेरि वैसे उधमी बसंत विस्वासी आयौ
फेरि वैसें डारन में डाक-सी परैं लगी॥

नन्दराम

ऋतुराज वसंत का एक संदेश, आमंत्रण, बुलावा यदि किसी को याद है तो जीवन में जरा और व्याधि दोनों का पलायन स्वतः हो जाता है। किसी के लिये तरसना, किसी के लिये हरषना, किसी को सर्वस्व समर्पित करना, किसी से सर्वस्व याचना करना- ये जिंदगी के पालने हैं जिस पर वासंती ऋतु प्राणों को सुलाती रहती है-

सखि ! आयो वसंत रितून को कंत, चहूँ दिसि फूल रही सरसों
————
परसों के बिताय दियो बरसों, तरसों कब पाँय पिया परसों।

परिवर्तन के झोंके बौरे वसंत की गज़ब की अंगड़ाई लेकर आते हैं, इसलिये यदि कहीं  कोई आह उठती हो तो वह भी इतनी वासंती होती है कि दर्द मीठा गाने लगता है-

को बचिहैं एहि बैरी बसंत ते आवत यों बन आग लगावत
बौरति ही करि डार है बौरी भरे विष बैरी रसाल कहावत।
ह्वैहैं करेजन की किरचें कवि देव जू कोकिल कूक सुनावत
बीर की सों बलबीर बिना उड़ि जायेंगे प्राण अबीर उड़ावत।।

’बनन में बागन में बगरयौ बसंत है ’ की धमक किसे नहीं सुनाई पड़ जाती! तुलसी का ’मनहु मुएहु मन मनसिज जागा’ का बिंब सामने खड़ा हो जाता है। लगता है आज धनुष लिये हुए काम वन में विचर रहा है- ’सम्प्रति काननेषु सधनुर्विचरित मदनः’। और क्या कहा जाय- “चिड़ियों के चहचहे को बाजा बनाकर , प्रेम के रस से मतवाली कोकिलायें गीत गा रही हैं। वन के अंतःपुर की कामिनी रूपी लता आचार्य वायु के उपदेश से अभिनय कर रही है। इस लता को वृक्ष अपने फूलों से हर्षित होकर पल्लव रूपी अंगुलियों से फुसला रहे हैं। श्रीमान वसंत के आते ही हार जैसा सफेद पाला फौरन गायब हो गया

आतोद्यं पक्षिसंघास्तरुरसमुदिताः कोकिला गावन्ति गीतं
वाताचार्योपदेशादभिनयति लता काननान्तःपुरस्त्री।
तां वृक्षाः साधयन्ति स्वकुसुमहृषिताः पल्लवग्रांगुलीभिः
श्रीमान प्राप्तो वसन्तस्त्वरितमपगतो हारगौरस्तुषारं॥

शिशिर रूपी बुढ़ापे से जर्जर, संवत्सर की सुन्दरी वसंती जवानी हिमरूपी रसायनखाने से लौटकर फिर उसके पास आ जाती है। एक सहृदय को लग रहा है- “हिलती कोपलों से नाचते हुए वृक्षों वाला और फूली लताओं से लिपटा हुआ वन यौवन पर आ रहा है। तिलक वृक्ष पर बैठी कोयल जूड़े-सी लग रही है और कुन्द के फूल पर बैठा भौंरा कामिनी के कटाक्ष का काम कर रहा है। कहीं नये उभरे छोटे स्तनों वाली कन्या की तरह कमलिनी साँवली कलियों-सी शोभित है, कहीं वसंत के वायु-समूह रति-श्रम के पसीने से भरे स्त्री के पीन-स्तनों के स्पर्श की धूर्तता करते बह रहे हैं-

तिलकि शिरसि केशपाशायते कोकिलः कुन्दपुष्पेस्थितः स्त्रीकटाक्षायते षटपदः ….”

ऋतुराज वसंत का एक दृश्य

यह उत्सव का परिवेश सँजोये ऋतु जगह-जगह फूलों की दुकान सजवा देती है। ऋतु की सर्वोत्तमता केवल उल्लास में नहीं, स्वास्थ्य की संजीवनी में भी छिपी है। यह वरदान है जन-जन के लिये। नाना प्रकार के पुष्पों की सुगंधित पवन से प्राणदायिनी शक्ति उत्पन्न हो जाती है।

मनुष्य की पाचन शक्ति बढ़ जाती है, मन का विषाद मिट जाता है, नवीन चेतना अँगड़ाई लेने लगती है, कार्य-क्षमता में सहज वृद्धि हो जाती है। इस तरह प्रभावशाली ढंग से यह ऋतु अपने आगोश में लेती जाती है। जो हूक उठती है, उसे रक्त-संचार का नवीनीकरण मान लें तो अतिशयोक्ति नहीं। खून के बीच जमा थक्का (क्लॉटिंग) टूटना ही टूटना है। एक कवि ने कहा है-

क्यों सहिहैं सुकुमारि ’किसोर’, अली कल कोकिल गावन दै री
आवत ही बनि है घर कंतहि, बीर बसंतहि आवन दै री।

उस आनंद को कौन छीन सकता है जब एक ही साथ इस ऋतु में नंदलाल और गुलाल दोनों ब्रजबाला की ओर दौड़ पड़े थे। पद्माकर की उस नायिका की आँखों से रंग तो निकला किन्तु रंगरेज नहीं निकल पाया-“ए री मेरी बीर! जैसे तैसे इन आँखिन ते / कढ़ि गौ अबीर पै अहीर तौ कढ़ै नहीं।”

‘कंत बिन कैसे ये बसंत ऋतु बीतैगो ’ का उन्मेष ही उस धन्यता का जन्मदाता है जो इस ऋतु के लिये सर्वग्राह्य सुख है-“धनि वे वनिता मनिता जग में सजि कंत के संग वसंत जो खेलती।”

इस वसंत को बेहद प्यार देते हुए कोई भी इस पर बलिहारी हो जाता है। वसंत का हम अभिनन्दन करते हैं। यह हमें बोध दे रहा है-

आज आया है प्रिय ऋतुराज, सजा है स्वागत का सब साज
कर रहा नवजीवन संचार, भर रहा मन में मोद अपार।
मिला है अवसर अति अनुकूल समय है सचमुच मंगल मूल
करें नवयुवक देश कल्याण हरें पर-पीर, ’दान दें’ प्राण।

वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनायें ! 

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प्रगीत और निराला की कविता शिवाजी का पत्र https://blog.ramyantar.com/2009/02/shivaji-ka-patra.html https://blog.ramyantar.com/2009/02/shivaji-ka-patra.html#comments Sun, 22 Feb 2009 03:58:00 +0000 छायावादी कवियों की नवीन चेतना के प्रसार के परिणामस्वरूप छायावादी रूढ़ि विद्रोही नवीन युग बोध ने इन्हें समस्त रूढ़ि बन्धनों का तिरस्कार कर अपने भावों...

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छायावादी कवियों की नवीन चेतना के प्रसार के परिणामस्वरूप छायावादी रूढ़ि विद्रोही नवीन युग बोध ने इन्हें समस्त रूढ़ि बन्धनों का तिरस्कार कर अपने भावों के संप्रेषण के लिये तथा विचारों के अनुकूल भिन्न-भिन्न प्रकार की नयी काव्य-विधाओं की रचना के लिये बाध्य कर दिया। यही कारण है कि छायावादी काव्य में काव्यरूप-गत वैविध्य मिलता है। परन्तु विविध काव्य-रूपों के होने पर भी छायावाद का अधिकांश प्रगीत काव्य ही है।

प्रगीत के भेद प्रभेद और पत्रगीति

प्रगीत के अनेक भेद-प्रभेद हैं, परन्तु छायावाद में जिन प्रगीति भेदों में काव्य रचना हुई है, वे निम्नलिखित हैं –

  1. संबोधन-गीति (Ode) 
  2. चतुर्दशपदी (Sonnet
  3. शोक-गीति (Elegy) 
  4. गीत (Song) 
  5. पत्रगीति (Epistle)

सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला ने प्रगीति के उपर्युक्त समस्त रूपों में काव्य-सर्जना कर छायावाद का अंचल भरा है, और उसे प्रगीत काव्य का पर्याय बना दिया है। इनमें पत्रगीति (Epistle) का विधान छायावादी कवियों में केवल निराला ने ही किया है। निराला की कविता ‘शिवा जी का पत्र‘ संभवतः छायावाद ही नहीं, सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ पत्रगीति है।

प्रगीत रचना की इस विशिष्ट शैली का प्रचलन यूनानी शब्द ‘एपिस्टाले’ से विकसित अंग्रेजी के ‘Epistle’ (एपिसिल) की प्रेरणा से हुआ। ‘एपिसिल’ शब्द किसी व्यक्ति अथवा व्यक्ति-समूह को सम्बोधित कर सचेष्ट एवं गरिमामयी शैली में रचित औपचारिक तथा उपदेशात्मक प्रवृत्ति के पत्र का अंग्रेजी का अभिधान है।” (The Universal English Dictionary : H.C. Wyld – ‘प्रतिमा कृष्णबल’ की ‘छायावाद का काव्यशिल्प’ में उद्धृत )

माइकेल मधुसूदन दत्त‘ की वीरांगना से प्रेरित होकर हिन्दी में सर्वप्रथम मैथिली शरण गुप्त ने ‘पत्रावली’ की रचना कर इस शैली का शुभारंभ किया। सम्पूर्ण छायावाद में केवल दो ही पत्रगीतियाँ रची गयीं, और दोनों ही निराला ने रचीं। ये हैं – ‘शिवा जी का पत्र’ और ‘हिन्दी के सुमनों के प्रति’।

निराला की कविता शिवाजी का पत्र

‘शिवाजी का पत्र’ रचना का उल्लेख आवश्यक इसलिये भी है कि यह कविता निराला के सांस्कृतिक चिंतन और उनकी राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति है। आज भी जब हमारे देश में विदेशी शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हुए, देश के इतिहास के प्रति निरपेक्ष रहने वाले मनीषी बुद्धिजीवियों की कमी नहीं है, यह बताने के लिये कि स्वपक्ष के सर्वनाश के लिये उद्यत होना कलंक रूप है, निराला की यह कविता ‘शिवाजी का पत्र’ अत्यन्त प्रासंगिक हो जाती है।

व्यक्ति-व्यक्ति के क्षुद्रतर स्वार्थ से उपजे संघर्ष मूलक अविश्वास ने ही भारत की सुसंगठित एकता को छिन्न-भिन्न कर दिया है। यदि यही होता रहा तो निश्चय ही परम्परार्जित जीवनी-शक्ति का पारस्परिक विरोध में ही सर्वनाश हो जायेगा और फ़िर कौन रोक सकेगा देश में वाह्य प्रभुत्व की स्थापना। क्या कह रहीं हैं ‘निराला’ की यह पंक्तियाँ –

“करो कुछ विचार
तुम देखो वस्त्रों की ओर
सराबोर किसके खून से ये हुए ?”

इस कविता की सामयिक इतिहास और हिन्दू चेतना की पृष्ठभूमि बड़ी सुदृढ़, सुघर है, परंतु उसकी ओजस्विता और वीरता की आँच नयी राष्ट्रीय चेतना ही है, जो निराला के कण्ठ से निकलकर ललकार बन जाती है –

“हैं जो बहादुर समर के,
वे मर कर भी
माता को बचायेंगे।
शत्रुओं के खून से
धो सके यदि एक भी तुम माँ का दाग
कितना अनुराग देशवासियों का पाओगे ! –
निर्जर हो जाओगे –
अमर कहलाओगे।”

इस प्रसंग में ‘निराला’ चेतावनी देते हैं जो इस युग में भी चरितार्थ होती है । यह पंक्तियाँ ही क्या पर्याप्त नहींं सब कुछ अभिव्यक्त कर देने के लिये-

“व्यक्तिगत भेद ने
छीन ली हमारी शक्ति ।
कर्षण-विकर्षण-भाव
जारी रहेगा यदि
इसी तरह आपस में,
नीचों के साथ यदि
उच्च जातियों की घृणा
द्वंद्व, कलह, वैमनस्य
क्षुद्र उर्मियों की तरह
टक्करें लेते रहे तो
निश्चय है,
वेग उन तरंगों का
और घट जायेगा –
क्षुद्र से क्षुद्रतर होकर मिट जायेंगी;
चंचलता शांत होगी,
स्वप्न सा विलीन हो जायेगा अस्तित्व सब
दूसरी ही कोई तरंग फ़ैलेगी ।”

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गोबर गणेशों की गोबर-गणेशता https://blog.ramyantar.com/2009/01/gobar-ganesh.html https://blog.ramyantar.com/2009/01/gobar-ganesh.html#comments Sat, 17 Jan 2009 18:30:00 +0000 पहले आती थी हाले दिल पे हंसीअब किसी बात पर नहीं आती। कैसे आए? मात्रा का प्रतिबन्ध है। दिल के हाल का हाल जानिए तो...

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पहले आती थी हाले दिल पे हंसी
अब किसी बात पर नहीं आती।

कैसे आए? मात्रा का प्रतिबन्ध है। दिल के हाल का हाल जानिए तो पता चले कितनी मारामारी है? हंसी का गुण ही है की वह वह तत्वतः मात्रा की अपेक्षा करती है। पहले हमें पाकिस्तान की करनी पर हंसी आती थी, अब नहीं आती। अब हमें भारत के धैर्य पर हंसी आती है, कुछ दिनों बाद नहीं आयेगी। सब मात्रा का प्रतिबन्ध है।

हँसाने के लिए तो जरूरी है कि परिस्थिति हल्की हो। परिस्थिति गंभीर होगी तो इसका बोझ हमारा हास्य-शील कैसे सह सकेगा? पर अब तो परिस्थिति गंभीर ही हो गयी है। कैसे हंसें? पर मैंने सोचा हंस सकते हैं अगर अरस्तू की बात मानें।

वह कहता है न कि वही हास्य-जनक है, जिसकी देश या काल से संगति न हो। तो अभी हमारे पास बहुत से तबीयत के उल्लू बसंत हैं हमारे देश में। इनकी देश, काल, परिस्थिति से कोई संगति नहीं। तबीयत के उल्लू बसंत मने ऐसे खद्दरधारी, कोटधारी, पगडीधारी प्राकृतजन जिन्हें विहाग के वक्त भैरवी और सुहाग के वक्त शिकवा करने की आदत है। पक्का नाम न बताउंगा, ख़ुद समझ लें।

खैर, मैंने कहा न कि अब हंसी नहीं आती। आखिर उस समाज में हंसी कैसे आयेगी जहाँ सभी नग्न हैं? नग्नता केवल शरीर की ही मत समझें, मन की भी। शरीर की नग्नता कार्य है। कारण है- आलस्य। जहाँ नग्नता नियम बन जाय, अपवाद नहीं; विकास बन जाय, अवकाश नहीं, वहाँ क्या होगा?

हंसी प्रदान कर सकने वाली नग्नता कपड़े न पहनने के आलस्य से स्वभाव बन जाय तो हंसी कैसे आयेगी? तो ऐसे निरंतर नंगे रहने की चाह रखने वाले प्राकृत जनों कैसे बताओगे देश की जनता को, कि तुम अक्ल का बोझ भी नहीं उठा सकते! क्या कह पाओगे कि तुममें एक inertia भर गयी है, जिसका मतलब परिस्थितियों से पलायन है।

हमारे देश का भार ढोने वाले गोबर गणेशों! गोबर गणेशता से संतोष कर लेना विश्राम की वासना है। इसे त्यागो। अरे, गणेश तो लम्बोदर थे, वाहन था मूस। इसलिए नारद ने कहा ‘राम’ शब्द की परिक्रमा करो। और वे गणपति बन गए। पर क्या तुम भी सच्चे गणेश के भक्त ही हो कि समझ लिया कि बिना प्रयास किए ही पूजा हो सकती है? तो चलो, श्रद्धेय गोबर को ही गणेश मान बैठे हो। धैर्य नामक शब्द की परिक्रमा से ही अपने कार्यों की इति समझ ले रहे हो, अपने पर ही नहीं फूले समा रहे हो? पर ख़याल रखो, बुलबुले की तरह सतह पर तैरने वाले मत बनो। गंभीर हवा का एक झोंका आया, बुलबुले किनारे हुए।

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