कहानी Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम् https://blog.ramyantar.com/category/कहानी हिंदी ब्लॉग। साहित्य, भाषा, संस्कृति, लोक व शास्त्र से संयुक्त। कविता, कहानी, समीक्षा, निबन्ध, नाटक एवं अनुवाद का सहज प्रकाशन। लोक साहित्य का रंग भी। Sun, 13 Nov 2022 08:51:59 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1 https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2024/03/cropped-favicon-4-32x32.png कहानी Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम् https://blog.ramyantar.com/category/कहानी 32 32 कथा प्रसंग: जब शंकर के हृदय से सौन्दर्य लहरी फूट पड़ी https://blog.ramyantar.com/2012/06/blog-post_13.html https://blog.ramyantar.com/2012/06/blog-post_13.html#comments Wed, 13 Jun 2012 09:56:00 +0000 आचार्य शंकर की दिग्विजय का एक मर्मस्पर्शी कथा प्रसंग दृश्य प्रथम प्रत्यक्ष के लिए प्रमाण चाहते हो संन्यासी?” तांत्रिक अभिनव शास्त्री का क्रुद्ध स्वर शास्त्रार्थ...

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यह कथा प्रसंग भारतीय विद्या भवन की पत्रिका ’भारती’ के वर्ष ९, अंक १२ (७ फरवरी १९६५) के अंक से साभार प्रस्तुत है। पिताजी की संग्रहित पुरानी पत्रिकाओं के अध्ययन क्रम में इसे पाया मैंने और सौन्दर्य लहरी का हेतु-प्रसंग होने से (क्योंकि सौन्दर्य लहरी का हिन्दी काव्यानुवाद इस चिट्ठे पर क्रमशः प्रकाशित हो रहा है) इस कथा प्रसंग को प्रस्तुत करना ठीक जान पड़ा।

इस प्रसंग के लेखक हैं श्री नरेश चन्द्र मिश्र। लेखक और पत्रिका दोनों से अनुमति नहीं ले सका हूँ, सो क्षमाप्रार्थी।

आचार्य शंकर की दिग्विजय का एक मर्मस्पर्शी कथा प्रसंग

दृश्य प्रथम

प्रत्यक्ष के लिए प्रमाण चाहते हो संन्यासी?” तांत्रिक अभिनव शास्त्री का क्रुद्ध स्वर शास्त्रार्थ सभा में गूँजा, तो उपस्थित पंडित वर्ग में छूट रही हल्की वार्ता की फुहारें भी शांत हो गयीं।  

“प्रत्यक्ष तो कुछ नहीं आचार्य, शास्त्रार्थ में प्रत्यक्ष है तर्क और प्रमाण है प्रतितर्क”, युवा संन्यासी शंकर आत्मविश्वास भरी हँसी हँस पड़े, “तर्क नहीं तो सारी कल्पना व्यर्थ है, ऐसी स्थिति में पराजय पत्र पर हस्ताक्षर ही उचित होगा।”   

“मैं हस्ताक्षर करूँ, पराजय पत्र पर? मदांध युवक।”

उत्तरीय झटक कर अभिनव शास्त्री क्रोधपूर्वक त्रिपुंड के स्वेद विन्दु पोंछने लगे। “ये बाहुएँ पराजय पत्र लिखेंगी जिनके द्वारा हवन कुण्ड में एक आहुति पड़े, तो आर्यावर्त में खंड प्रलय का हाहाकार मच सकता है। यह मस्तक पराजय वेदना से झुकेगा, जो अपनी तंत्र साधना के अहम् से त्रिलोक को झुकाने की सामर्थ्य रखता है?”   

“स्पष्ट ही यह सारा प्रलाप आहत मान का प्रण भरने के लिए है, आचार्य! किन्तु शंकर को इससे भय नहीं। उसे तो शास्त्रार्थ में  पराजित विद्वान से पराजय पत्र प्राप्त करने में ही…”   

“दे सकता हूँ, तू चाहे तो वह भी दे सकता हूँ,” अभिनव शास्त्री झंझा में पड़े बेंत की तरह काँप रहे थे, “किंतु समस्त पंडित जन ध्यानपूर्वक सुनें, मेरा यह पराजय-पत्र इस जिह्वापटु, तर्क दुष्ट, पल्लव ग्राहि मुंडित के समक्ष तब तक तंत्रशास्त्र की पराजय के रूप में न लिया जाय…….”   

“कब तक आचार्य श्रेष्ठ?” शंकर के मुख पर अभी भी व्यंग्य की सहस्रधार फूट रही थी। ”   

“जब तक मेरा तंत्र रक्त से इस पराजय पत्र का कलंक लेख न धो डाले।”   

“स्वीकार है, किंतु अभी तो उस ’कलंक लेख’ पर हस्ताक्षर कर ही दें तंत्राचार्य?”   

युवक शंकर ने उपस्थित पंडित वर्ग के चेहरे पर अपने लिए त्रास और भय की भावना पढ़कर भी अपना हठ न छोड़ा।


दृश्य द्वितीय

आश्रम का सारा वातावरण पीड़ा और निराशा भरी मृत्यु का साकार रूप बन गया। कुशासन पर पट लेटे योगी शंकराचार्य के मुँह से निकली आह नश्वर सांसारिक वेदना की क्षतिक विजय का घोष कर रही थी। वैद्यों, शल्य शास्त्रियों ने उन्हें देखकर निराश भाव से सर हिला दिया।

शास्त्रार्थ में अभिनव शास्त्री का मन मर्दन करने के दूसरे ही दिन भगन्दर का जो पूर्वरूप प्रकट हुआ, वह अब योगी शंकर को असाध्य सांघातिक उपासर्गों के यमदूतों द्वारा धमका रहा था।   

“आह…माँ….माँ….” कष्ट से करवट बदलते संन्यासी ने अपनी वेदना का चरम निवेदन ममतामयी जननी के दरबार में करके संसारी पुरुषों-सा रूप प्रकट कर दिया।  

“बहुत पीड़ा है गुरुदेव?” संन्यासी के रूप में शंकर के अनुयायी से सुरेश्वराचार्य और गृहस्थ के रूप में विदुषी शारदा के पति कर्मकांडी मंडन मिश्र के नाम से विख्यात एक शिष्य ने सह अनुभूति से पीड़ित हो पूछा।   

“पीड़ा नहीं, मृत्यु का साक्षात रूप,” वेदना बढ़ी होने पर भी शंकर मुस्करा उठे, “अभिनव आचार्य ने सत्य ही कहा था, किंतु मैंने तंत्र जैसी प्रत्यक्ष विद्या के लिए प्रमाण का हठ किया। अब प्रमाण मिला भी तो ऐसी शोचनीय दशा में जब मैं उसे स्वीकार भी न कर पाऊँगा।”  

“क्या रहस्य है गुरुदेव?” चरण-सेवा छोड़कर उत्सुक सुरेश्वर आगे खिसक आये।  

“कुछ नहीं। अभिमानी तांत्रिक ने अपनी पराजय का प्रायश्चित कराया है, शंकर से, एकांत वन की गुफा में बैठा  वह मारण प्रयोग में लिप्त है।”   

“ओह आर्य!” जगद्गुरु के चारों आद्य शिष्य आक्रोशमद पीकर मतवाले हो उठे।  

“हाँ आयुष्मानों! तांत्रिक का मारण न सह सका तो यह हंस अब हस्त पिंजर में न रहेगा।”   

अन्य तीनों शिष्यों ने तो चिन्ता मग्न हो गुरु चरणों में सर झुका कर विवशता प्रकट कर दी, किंतु चौथा अपने चेहरे पर प्रतिहिंसा की कठोर रेखाएँ छिटकाता वन प्रदेश को चल दिया।

प्रहर भर पश्चात्। 

निर्जन वन की उस झाड़-झंखाड़ भरी पहाड़ी गुफा का अंधकार भयंकर चीत्कार से सिहर उठा। शंकर का पुतला बनाकर उसके मर्मस्थानों में लौह कीले गाड़े हुए मारण प्रयोग में रत अभिनव पर प्रतिहिंसा विक्षिप्त शिष्य ने खड्ग का भरपूर प्रहार किया था। कुछ देर पश्चात् रक्त सने शस्त्र से लाल बिन्दु टपकाता वह गुरु के निकट उपस्थित हुआ।   

“मैंने उसका शिरच्छेद कर दिया देव”, शिष्य ने रक्त सना खड्ग शंकर के चरणों में रख कर हिंसा वीभत्स स्वर में कहा, “उस पिशाच विद्यादक्ष नर राक्षस का यही प्रतिकार……..”   

“शांतं पापं…ये क्या किया मूर्ख,” पीड़ा की अवहेलना कर जगद्गुरु बलात आसन पर उठ बैठे, ” तंत्र विद्या-पारंगत उस अकल्मष मनीषी का वध कर तूने भरत खंड के एक नर रत्न का विनाश कर दिया।”   

“इस हत्या का प्रायश्चित कर लूँगा गुरुदेव, किंतु आपका शरीर न रहता तो भरत खंड का सद्यः ज्वलित ज्ञान दीप ही बुझ जाता। उस हानि का शोक भला कैसे…..।”  

“उस हानि का पातक भी तेरे ही भाग्य में था,” करुणा मिश्रित विचित्र हँसी हँस कर शंकर ने कहा, “मारण प्रयोग द्वारा उत्पन्न यह व्रण त्रिलोकी का कोई शल्य वैद्य न पूरित कर सकेगा। अभिनव के जीवित रहते मेरे जीवन की भी क्षीण आशा थी, किंतु तूने उस पर तुषारापात कर दिया।”

पश्चाताप हत शिष्य अवाक् था। संन्यासी शंकर ने उसके मन का दूसरा संकल्प ’अपने ही शस्त्र से आत्मघात’ का आभास पा खड्ग उठा कर अन्य शिष्य को दे दिया।


दृश्य तृतीय

मर्म विधे पक्षी के पीड़ित डैनों की अन्तिम उड़ान, जगन्माता के अभयकारी आँचल का नीड़। आद्य शंकराचार्य के अन्तर से उठता स्वर आत्मविश्वास में परिवर्तित हो चुका था।

एक तांत्रिक के सांघातिक प्रयोग का निवारण उस ’महाभय विनाशिनि, महाकारुण्य रूपिणि’ के अतिरिक्त और कौन कर सकता था!

और आत्मविश्वास से प्रेरित योगी शंकर के मुख से मातृ-शक्ति की वंदना के बोल सौंदर्य लहरी बन कर फूट निकले। जगद्गुरु के एक-एक श्लोक व्रणरोपक लेप बनकर, असाध्य व्रण को भरने लगे।

स्तुतिकार शंकर ने अपनी करुणार्द्र वाणी में पहली बार शक्ति के सहज स्नेहमय रूप को स्वीकार किया और शक्ति के बिना अपने पूर्व प्रतिपादित शिव को ’शव’ के समान अर्थहीन, निस्पंद माना

और एक घन घिरी काली रात जब सारा देश निद्रारूपिणी प्रकृति माँ की गोद में बेसुध था, योगी शंकर ने अपने बाल सुलभ अपराध की स्वीकारोक्ति से माँ के करुण हृदय के तार-तार झंकृत कर दिए।

सौंदर्य लहरी का सौंवा श्लोक पूरा होने से पहले ही जगन्माता ने अपने वरद पुत्र को असाध्य भगंदर से मुक्त कर दिया।

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एक शान्त मन ही व्रती होता है https://blog.ramyantar.com/2009/08/blog-post_27-3.html https://blog.ramyantar.com/2009/08/blog-post_27-3.html#comments Thu, 27 Aug 2009 04:18:00 +0000 आजकल एक किताब पढ़ रहा हूँ – आचार्य क्षेमेन्द्र की औचित्य-दृष्टि। किताब बहुत पुरानी है- आवरण के पृष्ठ भी नहीं हैं, इसलिये लेखक का नाम...

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आजकल एक किताब पढ़ रहा हूँ – आचार्य क्षेमेन्द्र की औचित्य-दृष्टि। किताब बहुत पुरानी है- आवरण के पृष्ठ भी नहीं हैं, इसलिये लेखक का नाम न बता सकूँगा। इस पुस्तक में लेखक की भाषा और शैली के चमत्कार से हतप्रभ हूँ- प्रस्तुति विलक्षण है। पूरा पढ़ सकने के बाद इसके आश्रय से कुछ ब्लॉग-प्रविष्टियाँ लिखने की तीव्र इच्छा हो रही है। फिलहाल पुस्तक के परिशिष्ट से एक टिप्पणी लिख रहा हूँ- एक शान्त मन ही व्रती होता है।


मन की शान्ति व्रत साधना से सिद्ध नहीं हुआ करती; एक शान्त मन ही, उलटे, स्वभावतः – गृहे-वाSरण्ये वा – व्रती होता है – इन दो बोध-कथा-सूत्रों से तुलनीय –

प्रथम बोध-कथा सूत्र

एक भले आदमी ने दुनिया के प्रलोभनों से मुक्ति पाने के लिये वानप्रस्थ ले लिया।

रात होती और एक कुहुमुखी आकर अपना राग छेड़ देती।

साधु जी ने युक्ति सोच ली। कोयल आत्मविस्मृति में, अगले दिन, अपना सर्वस्व उड़ेल रही थी- जंगल में मंगल ला रही थी, कि योगी जी ने फूस की कुटिया को, बाहर से, बन्द कर दिया और आग लगा दी!

लोगों ने आकर पूछा- “क्या हुआ? यह आग कौन पापी लगा गया?”

“मैंने लगायी थी; और किसने? कुटिया गयी तो क्या हुआ; कोयल का तो कक्ख न रहा। मैं खुश हूँ।”

द्वितीय बोध-कथा सूत्र

बहावलपुर में एक पीर रहा करते थे। मुसलमान थे। एक हिन्दू व्यापारी तीर्थ, व्यापार के लिये बाहर जाते हुए पीर साहब से आशीर्वाद लेने आया और अपना घर उन्हीं के सुपुर्द करता गया।

इस अर्से में पीर साहब खुद, दिन में एक बार, उसके घर जाते और जो काम शहर का होता, सती के लिये, कर आते; किसी चेले से उन्होंने कुछ नहीं करवाया।

महीनों बाद जब यह भक्त व्यापारी घर लौट रहा था, वह दूर से क्या देखता है- कि पीर साहब के कंधे पर एक पुराना चर्खा है और वो बन्द दर पर, बाहर, चुप इंतजार में खड़े हैं। उसका सिर श्रद्धा से झुक गया।

कुछ महीने और बीत गये। व्यापारी, एक नया मकान बनवाकर, गृह-प्रवेश के लिये फिर उसी विभूति के क़दमों में हाज़िर हुआ। पीर साहब अपने सारे ’कुल’ समेत पहुँचे। बतासे बाँटे गये। एक बतासा पीर साहब ने भी थाली से उठा लिया; उसी वक्त एक मुहम्मदी ने अदब से जताया- “पीर साहब, आज तो रमजान है; आप का रोजा है।”

“रोजा तोड़ा जा सकता है, एक प्यारे का दिल नहीं” और पीर साहब ने बतासा मुँह में डाल दिया ।

संदर्भ तो यही था :-

अत्र वल्कलजुषः पलाशिनः पुष्परेणु(भर)भस्म-भूषिताः।
(लोल) भृंगवलया-Sक्षमालिकास् तापसा इव विभान्ति पादपाः॥”

[ये वल्कल, यह भस-सी पुष्परज, ये मंडराते भ्रमर:

– स्वयं शान्त-पूत मन को अचेतन पलाशों में भी व्रतोचित तपस्विता तथा अन्तःशुचिता ही गोचर होती है।]


अन्य कथा प्रसंग यहाँ पढ़ें – कथा प्रसंग

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मुंशी प्रेमचन्द की कहानी गमी : जन्मदिवस विशेष https://blog.ramyantar.com/2009/07/blog-post_31.html https://blog.ramyantar.com/2009/07/blog-post_31.html#comments Fri, 31 Jul 2009 12:44:00 +0000 मुंशी प्रेमचन्द की कहानी गमी मुझे जब कोई काम- जैसे बच्चों को खिलाना, ताश खेलना,, हारमोनियम बजाना, सड़क पर आने जाने वालों को देखना- नहीं...

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प्रेमचन्द हिन्दी और उर्दू के सर्वाधिक लोकप्रिय, सर्वकालिक महानतम उपन्यासकार, कहानीकार एवं विचारक थे। 31 जुलाई को पूरा साहित्य जगत उनका जन्मदिवस मनाता है। इस अवसर पर प्रस्तुत है मुंशी प्रेमचन्द की कहानी गमी ।

मुंशी प्रेमचन्द की कहानी गमी

मुझे जब कोई काम- जैसे बच्चों को खिलाना, ताश खेलना,, हारमोनियम बजाना, सड़क पर आने जाने वालों को देखना- नहीं होता तो अखबार उलट लिया करता हूँ। अखबार में पहले उन मुकद्दमों को देखता हूँ जिसमें किसी स्त्री की चर्चा होती है- जैसे आशनाई के, या भगा ले जाने के, या तलाक के, या बलात्कार के, विशेषकर बलात्कार के मुकदमें बहुत शौक से पढ़ता हूँ, तन्मय हो जाता हूँ।

कल संयोग से अखबार में ऐसा ही एक मुकदमा मिल गया, मैं संभल गया, ताबेदार से चिलम भरवा दी और घड़ी-दो-घड़ी असीम आनन्द की कल्पना कर के खबर पढ़ने लगा।

यकायक किसी ने पुकारा, “बाबूजी……?” मुझे यह ’मुदाखलक बेजा’ बुरी तो लगी, लेकिन कभी कभी इस तरह निमंत्रण भी आ जाया करते हैं, इसलिये मैंने कमरे के बाहर आ कर आदमी से पूछा, ” क्या काम है मुझसे? कहाँ से आया है?”

उस आदमी के हाँथ में न कोई निमंत्रण-पत्र था, न निमंत्रित सज्जनों की नामावली, इससे मेरा क्रोध दहक उठा, मैंने अंग्रेजी में दो चार गालियाँ दीं और उसके जवाब की अपेक्षा करने लगा।

आदमी ने कहा, ” बाबू भगीरथ प्रसाद के घर से आया हूँ, उनके घर में गमी हो गयी है।”

मैंने चिन्तित हो कर पूछा, ” कौन मर गया है?”

आदमी, “हुजूर! यह तो मुझे नहीं मालूम। बस इतना ही कहा है कि गमी की सूचना दे आ।”

यह कहकर वह चलता बना और मेरे मन में भ्रांति का एक तूफान छोड़ गया- कौन मर गया? स्त्री तो बीमार न थी, न कोई बच्चा ही बीमार था। फिर कौन गया? अच्छा समझ गया। स्त्री के बाल बच्चा होने वाला था, उसी में कुछ गोलमाल हो गया होगा। बेचारी मर गयी होगी। घर उजड़ गया। कई छोटे-छोटे बच्चे हैं, उन्हें कौन पालेगा? और तो और इस जाड़े पाले में नदी जाना और वह भी नंगे पैर और रात को नदी में स्नान, उसकी मृत्यु क्या हुई हमारी मृत्यु हुई। यहाँ तो हवा जुखाम हुआ करती है, रात को नहाना तो मौत के मुँह में जाना है।

इस सोच में कई मिनट मूढ़ बना खड़ा रहा। फिर घर में जाकर कपड़े उतारे, धोती ली और नंगे पाँव चला। भगीरथ प्रसाद के घर पहुँचा तो चिराग जल गये थे। द्वार पर कई आदमी मेरी तरह धोतियाँ लिये एक तख्त पर बैठे हुए थे। मैंने पूछा, “आप लोगों को तो मालूम होगा कि कौन मर गया है?” एक महाशय बोले, “जी नहीं, नाई ने तो इतना ही कहा था कि गमी हो गयी है। शायद स्त्री का देहान्त हो गया है। भगीरथ लाल को बुलाना चाहिये। देर क्यों कर रहे हैं। मालूम नहीं, कफन मँगवा लिया है या नहीं। अभी तो कहीं बाँस-फाँस का भी पता नहीं। …….”

मैंने द्वार पर जाकर पुकारा, “कहाँ हो भाई? क्या हम लोग अन्दर आ जाँय? चारपाई से उतार लिया है न?”

भगीरथ प्रसाद एक मिनट में पान और इलायची की तश्तरी लिये, फलालेन का कुर्ता पहने, पान खाते हुए बाहर निकले। बाहर बैठी हुई शोकमण्डली उन्हें देखकर चकित हो गयी। यह बात क्या है? न लाश, न कफन, न रोना, न पीटना… यह कैसी गमी है। आखिर मैंने डरते-डरते कहा, “कौन-यानि किसके विषय में… यही आदमी जो आपने भेंजा था…? तो क्या देर है?”

भगीरथ ने कुर्सी पर बैठकर कहा, “पहले आराम से बैठिये, पान खाइये, तब यह बात भी होगी। मैं आपका मतलब समझ गया । बात सोलहो आने ठीक है।”

“तो फिर जल्दी कीजिये, रात हो ही गयी है, कौन है?

भगीरथ ने अबकी गंभीर होकर कहा, “वही, जो सबसे प्यारा, मेरा मित्र, मेरे जीवन का आधार, मेरा सर्वस्व, बेटे से भी प्यारा, स्त्री से भी निकट मेरे ’आनन्द’ की मृत्यु हो गयी है। एक बालक का जन्म हुआ पर मैं इसे आनन्द का विषय नहीं, शोक की बात समझता हूँ। आप लोग जानते हैं, मेरे दो बालक मौजूद हैं। उन्हीं का पालन मैं अच्छी तरह नहीं कर सकता, दूध भी कभी नहीं पिला सकता, फिर इस तीसरे बालक के जन्म पर मैं आनन्द कैसे मनाऊँ। इसने मेरे सुख और शान्ति में बड़ी भारी बाधा डाल दी। मुझमें इतनी सामर्थ्य नहीं कि इसके लिये दाई रख सकूँ। माँ इसको खेलाये, उसका पाल्न करे या घर के दूसरे काम करे? फर्ज यह होगा कि मुझे सब काम छोड़कर इसकी सुश्रुषा करनी पड़ेगी। दस-पाँच मिनट जो मनोरंजन या सैर में जाते थे, अब इसकी सत्कार की भेंट होंगे। मैं इसे विपत्ति समझता हूँ, इसलिये इस जन्म को गमी कहता हूँ। आप लोगों को कष्ट हुआ, क्षमा कीजिये। आप लोग गंगा स्नान के लिये तैयार होकर आये, चलिये मैं भी चलता हूँ। अगर शव को कंधे पर रखकर चलना ही अभीष्ट हो तो मेरे ताश और चौसर को लेते चलिये। इसे चिता में जला देंगे। वहाँ मैं गंगाजल हाँथ में लेकर प्रतीज्ञा करुँगा कि अब ऐसी महान मूर्खता फिर न करुँगा।”

हमलोगों ने खूब कहकहे मारे, दावत खायी और घर चले आए। पर भगीरथ प्रसाद का कथन अभी तक मेरे कानों में गूँज रहा है।

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