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	<title>नाटक Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</title>
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	<description>हिंदी ब्लॉग। साहित्य, भाषा, संस्कृति, लोक व शास्त्र से संयुक्त। कविता, कहानी, समीक्षा, निबन्ध, नाटक एवं अनुवाद का सहज प्रकाशन। लोक साहित्य का रंग भी।</description>
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	<title>नाटक Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</title>
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		<title>बतावत आपन नाम सुदामा: तीन</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 03 Oct 2014 11:01:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नाटक]]></category>
		<category><![CDATA[सुदामा]]></category>
		<category><![CDATA[कृष्ण सुदामा की मित्रता]]></category>
		<category><![CDATA[कृष्ण-सुदामा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>इस प्रविष्टि में कृष्ण सुदामा का मिलन है, भाव की अजस्र धारा है। पिछली प्रविष्टियों  ’बतावत आपन नाम सुदामा &#8211; एक और दो से आगे।...</p>
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<p>इस प्रविष्टि में कृष्ण सुदामा का मिलन है, भाव की अजस्र धारा है। पिछली प्रविष्टियों  ’बतावत आपन नाम सुदामा &#8211; <a href="https://blog.ramyantar.com/2014/09/krishna-sudama.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">एक</a> और <a href="https://blog.ramyantar.com/2014/09/krishna-sudama-2.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">दो</a> से आगे।</p>



<hr class="wp-block-separator has-alpha-channel-opacity is-style-wide"/>



<h3 class="has-text-align-center wp-block-heading">कृष्ण सुदामा का मिलन</h3>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color"><em>(प्रहरी राजमहल में प्रवेश करता है। प्रभु मखमली सेज पर शांत मुद्रा में लेटे हैं। रुक्मिणी पैर सहला रही हैं।<br>समीप में विविध भोग सामग्री सजी पड़ी है। गृह परिचारिकाएँ पंखा झल रहीं हैं। मह-मह सुगन्ध से पवन बोझिल है।)</em></p>



<p><strong>प्रहरी:</strong> हे देवाधिदेव! कृपा-करुणा-वरुणालय, स्नेहाम्बुनिधि, आनन्द-धन द्वारिका नरेश! सिंहद्वार पर एक अत्यन्त दीनहीन जीर्ण-शीर्ण वस्त्र धारण किए, मलिन, थकित, निरावृत पग ब्राह्मण कब से खड़ा है। वह आप से मिले बिना जाने का नाम नहीं ले रहा है। सुदूर देशवासी उस भिक्षुक से दीखने वाले ब्राह्मण की वाणी में बड़ी करुणा है, बड़ा दैन्य है। अपना नाम सुदामा बता रहा है। आपको अपना बालमित्र बता रहा है और कब से आप का धाम पूछते-पूछते भटकते-भटकते सिंहद्वार तक पहुँचा है। क्या आज्ञा है प्रभु?</p>



<p><strong>श्रीकृष्ण: </strong>अरे सुदामा!</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(प्रहरी पीछे छूट जाता है। रुक्मिणी सिंहासन के हिलने से नीचे गिर जाती हैं। कृष्ण पागलों की तरह विक्षिप्त हो, प्राचीर से लड़ते भिड़ते, अस्त-व्यस्त दुकूल सिंहद्वार पर पहुँच जाते हैं। अपनी मृणाल बाहों में विप्र को भरकर कलेजे से सटा लेते हैं। फूट-फूटकर रोते हैं, चरण चूमते हैं। अपने पीताम्बर को उनके गले में लटका देते हैं। फिर गोद में शिशुवत उठाकर कुशल-क्षेम पूछना प्रारम्भ करते हैं।)</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(विप्र के पाँवों को अपने हाथों में लेकर आँखों से बार-बार सहला रहे हैं। <a href="https://bhagavadgita.org.in/Blogs/5a95353208c5f06cbce644b7" target="_blank" rel="noreferrer noopener">युगल नयनों की जलधारा से पाँव धुलता जा रहा है।</a> रुक्मिणी का जलभरा पात्र अभी पहुँचा नहीं कि पगतली बार-बार धुलती गयी।)</p>



<p><strong>सुदामा:</strong> (गदगद कंठ, स्खलित वाणी, भावविभोर होकर) सखा मेरे, हे प्यारे कृष्ण! </p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p>जैसी तुम करी, तैसी करै को<br>कृपा को सिन्धु, ऐसी प्रीति दीनबन्धु दीनन पर आनै को। </p>
</blockquote>



<p>प्रभु जैसा सुना वैसा नहीं, उससे कोटि गुना अधिक पाया। जीवन धन्य हो गया। हे कृष्ण तुम्हारी जय हो! जय हो! जय हो! </p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(दोनों परस्पर गले मिलते हैं और एक दूसरे को सहलाते हैं।) </p>



<p style="text-align: justify;"><strong><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2014/10/Krishna-Sudama.webp" type="image/webp" /><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignright" title="Krishna-Sudama" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2014/10/Krishna-Sudama.jpg?x47177" alt="Krishna-Sudama" width="316" height="218" border="0" /></picture>श्रीकृष्ण:</strong> अरे भोजनभट्ट मेरे बड़े भैया! मेरे सुहृद, यह क्या कर रहे हो? भाभी की भेंट लौटाकर ले जाओगे? प्राचीन आदत मिटी नहीं? मित्र से चोरी अब नहीं चलेगी। <em>(अभी सुदामा कुछ समझ पाते कि कृष्ण उनकी काँख से फटी तन्दुल की पोटली बाहर खींच लेते हैं। कुछ चावल भूमि पर बिखर जाते हैं। श्रीकृष्ण जन्म-जन्मांतर भूखे की भाँति चावल मुट्ठी में भर फाँकना प्रारम्भ कर देते हैं)</em> काफी पुरानी धरोहर है। बिना खाये चैन कहाँ? सुदामा जी! आपकी दीनता और श्याम की दिव्यता का द्वन्द्व युद्ध प्रारम्भ हो गया है। जो लाये हो, अब उसे लेकर नहीं जाओगे।</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(एक मुट्ठी गाल में भर लेते हैं, दूसरी भरकर मुँह के पास ले जाते हैं, तब तक रुक्मिणी आगे दौड़ती हैं। दूसरी मुट्ठी भी कृष्ण मुख में डालते हैं। तीसरी भरने के पूर्व ही रानी उनकी कलाई कसकर पकड़ लेती हैं, प्रभु ठिठक जाते हैं। सुदामा काष्ठवत् सब चुपचाप देख रहे हैं। पूरा रनिवास, सभी सेवक स्तब्ध हैं।) </p>



<p><strong>रुक्मिणी:</strong> हे भुवनेश्वर! दो मुट्ठी तंदुल फाँककर आपने एक भिखारी को दो लोकों का वैभव बिहारी बना दिया है। क्या तीसरी मुट्ठी खाकर गली-गली के मंगन भिखारी स्वयं बन जाना चाह रहे हैं! अब रुक जाओ भक्तवत्सल! </p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(प्रभु के नयन नीर बरसा रहे हैं। सुदामा की हिचकी बँधी है। मंदहास मुरली मनोहर सुदामा के पास आ बैठ जाते हैं। उनकी भुजायें सुदामा के कंधे में झूल जाती हैं। दोनों एक दूसरे को अपलक निहार रहे हैं। दीनानाथ दीनबंधु भक्तवत्सल श्रीकृष्णचन्द्र की जय से वातावरण गूँज उठता है।)</p>



<hr class="wp-block-separator has-alpha-channel-opacity is-style-wide"/>



<h3 class="has-text-align-center wp-block-heading"><span style="text-decoration: underline" class="underline">दृश्य तृतीय</span></h3>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color"><em>(सुदामा का राजमहल सरीखा भवन। पहरेदार, तोरण-पताका, कोष, राजवैभव।)&nbsp;</em></p>



<p><strong>सुदामा:</strong>(चकित-से) अरे मेरी कुटिया कहाँ है? क्या मैं पथ भूल गया हूँ? कहाँ गयी मेरी धर्मभार्या, मेर जीर्णशीर्ण वस्त्रादि, मेरी पूजास्थली, दण्ड आदि।&nbsp;</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(सजी-सँवरी स्त्री के रूप में सुदामा की पत्नी का प्रवेश। हाथ मे आरती की थाल।)&nbsp;</p>



<p><strong>ब्राह्मणी:</strong> स्वामी! मैं ही आपकी वह भार्या हूँ जो मृत्यु का वरण करने के लिए महाकाल का थाल सजा रही थी। आज आपके सामने पूजन की थाली लेकर खड़ी हूँ। आप घर से निकले नहीं कि पलक मारते विश्वकर्मा ने यह सौंध सजाना प्रारम्भ कर दिया। सच में, कृष्ण की अघट घटना पटीयसी करुणा ने मेरी वेदना को आनन्द रागिनी में बदल दिया। (सुदामा की आरती उतारती हैं। सुदामा के आँसू थमने का नाम नहीं लेते।)&nbsp;</p>



<p><strong>सुदामा: </strong>प्रियतमे! अब कृष्ण प्रीतिचन्द्र में ग्रहण मत लगने देना। माँगा ही मुँह खोलकर तो फिर रह ही क्या गया?&nbsp;&nbsp;</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color"><em>(सुदामा विभोर जयकृष्ण, जयकृष्ण कह फूट पड़ते हैं। ब्राह्मणी लज्जित, संकुचित अपने आँचल से उनके आँसू पोंछती है।)&nbsp;</em></p>



<p><strong>ब्राह्मणी:</strong> प्रियतम! दारिद्र्य-अर्गला भग्नकर कृष्ण कृपा की किरण मेरी कुटिया में आ लगी है। मेरे प्राण आज अक्षय विश्वास से भरकर मुस्करा उठे हैं। प्रभु! प्रभात के इस प्रथम निःश्वांस के साथ मेरी चेतना आपको नमन कर सदा के लिए अक्षय बन जाय। मेरी जीवन-यात्रा का पुण्य प्रहर शृंगार कर उठा है। मेरे नैराश्य की शून्य नगरी स्वर्णिम शिखरों से मंडित हो उपहार लुटा रही है और मेरी प्राण-वीणा के तारों पर जैसे आरोह की रागिनी बज उठी है।&nbsp;</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color"><em>(ब्राह्मणी क्षमा याचना के भाव में विप्र के चरणों में बिछ जाती है। सुदामा के नेत्र बन्द हैं। हाथ प्रार्थना की मुद्रा में उठे हैं। जय-जयकार होती है।</em></p>



<p class="has-text-align-center"><strong>|| समाप्त ||</strong></p>
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		<title>बतावत आपन नाम सुदामा: दो</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 23 Sep 2014 04:56:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नाटक]]></category>
		<category><![CDATA[सुदामा]]></category>
		<category><![CDATA[कृष्ण सुदामा की मित्रता]]></category>
		<category><![CDATA[कृष्ण-सुदामा]]></category>
		<category><![CDATA[नाट्य]]></category>
		<category><![CDATA[मित्रता]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पिछली प्रविष्टि बतावत आपन नाम सुदामा: एक से आगे। इस प्रविष्टि में द्वारिकापुरी में सुदामा की उपस्थिति एवं सखा कृष्ण का औत्सुक्य, फिर मिलन-संदेश के...</p>
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<p><a href="https://blog.ramyantar.com/2014/09/krishna-sudama.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">पिछली प्रविष्टि</a> बतावत आपन नाम सुदामा: एक से आगे। इस प्रविष्टि में द्वारिकापुरी में सुदामा की उपस्थिति एवं सखा कृष्ण का औत्सुक्य, फिर मिलन-संदेश के उपक्रम में संवादों की प्रभावान्विता दर्शनीय है। </p>



<hr class="wp-block-separator has-alpha-channel-opacity is-style-wide"/>



<h3 class="has-text-align-center wp-block-heading">दृश्य द्वितीय: द्वारिकापुरी में सुदामा</h3>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color"><em>(द्वारिकापुरी का दृश्य। वैभव का विपुल विस्तार। धन-धान्य का अपार भण्डार। धनिक, वणिक, कुबेर हाट सजाये। संगीतागार, मल्लशाला, शुचि गुरुकुल, प्रशस्त मार्ग, गगनचुम्बी अट्टालिकाओं की मणि-माला, विभूषित अखण्ड शृंखला, सुसज्जित घने विटप एवं राज्य सभागार के फहरते तोरण। <a href="https://en.wikipedia.org/wiki/Sudama" target="_blank" rel="noreferrer noopener">सुदामा </a>चकित, विस्मृत, आत्मविभोर चिन्तनरत कृष्णधाम की खोज में बढ़े चले जा रहे हैं। उपानह हीन पैर, फटा कुर्ता, घुटने तक धोती, फटी पगड़ी, फटा चादर कंधे पर।) </em></p>



<p style="text-align: justify;"><strong><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2014/09/Sudama-at-Krishna-door.webp" type="image/webp" /><img decoding="async" class="alignright" title="Sudama at Krishna Door" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2014/09/Sudama-at-Krishna-door.jpg?x47177" alt="Sudama at Krishna Door" width="393" height="225" border="0" /></picture>सुदामा: </strong>(स्वगत) हे श्रीकृष्ण, सीढ़ियाँ तो केवल खड़े होने के लिए होती हैं। जबकि अवगाहन सीढ़ी से सम्पूर्ण समर्पण माँगता है। तुमसे मिलूँगा तो मैं कहूँगा कि मेरे लिए सबसे प्रिय कार्य यही है कि जिस तरह दर्पण के सामने खड़े होकर मैं अपना मुख निहारा करता हूँ उसी तरह तुम्हारे सामने खड़े होकर अपनी आत्मा को तुम्हारे नेत्रों में प्रतिबिम्बित होता हुआ देखा करूँ। मेरी आत्मा एक नूतन आनन्द के लिए तड़प रही है। उसकी बातों ने मुझे ढकेलकर तुम्हारे द्वारे कर दिया है और मैं अपने व्यग्र हृदय को लेकर तुम्हारे पास आया हूँ। </p>



<p>(मार्ग में भूले हुए-से लोगों से पूछते हैं) भैया! द्वारिकाधीश का धाम कहाँ है? वे कहाँ मिलेंगे? वे मेरे बाल सखा हैं।</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color"><em>(लोग नाक भौं सिकोड़कर दुर्बल गात विप्र को आगे बढ़ने का संकेत कर देते हैं। वे पुनः विचार मग्न हो ठिठकते चले जा रहे हैं। एक ही तरह की भवन शृंखला एवं समान वैभव विस्तार से उन्हें आश्चर्य एवं मतिभ्रम हो रहा है।)</em></p>



<p><strong>सुदामा:</strong> (स्वगत) वाह रे द्वारिका के राजाधिराज! अधिक तपस्वी वे ही हैं जो पहले भी ताप सहे और अन्त में भी। उनकी तपस्या की बराबरी वे कैसे कर सकते हैं जिन्होंने प्रारम्भ में भले ही यातनायें सहीं किन्तु अन्त में तो मेवा ही चखा। (प्रकट) हे भाई गृहपति! द्वारिकाधीश का द्वार कौन है, बता दोगे? (आगे बढ़ने का इशारा पाते हैं)&nbsp;</p>



<p><strong>सुदामा:</strong>(एक भद्र पुरुष से पूछते हैं) तात! राजाधिराज महाराज द्वारिकापति भूप श्यामसुन्दर मदनमोहन श्रीकृष्णचन्द्र जी का घर कौन-सा है?</p>



<p><strong>भद्र पुरुष:</strong> विप्रवर! ठीक सामने वह जो स्वर्णखचित सिंहद्वार दृष्टिगोचर हो रहा है, वही महाराज श्रीकृष्ण का घर है। प्रहरी वहां विराजमान हैं। उन्हीं से आपको सब ज्ञात हो जायेगा।&nbsp;</p>



<p><strong>सुदामा:</strong> चिरंजीव भद्र। (पास जाते-जाते बुदबुदा रहे हैं) प्यारे कृष्ण! कब तुम्हारा मुखचन्द्र देखूँगा! धरती की धूलि आकाश पर खिले उज्जवल प्रसून का सुख चाह रही है। तुम्हारे ध्यान से मेरी सम्पूर्ण स्मृति मूर्च्छित-सी होती जा रही है। लगता है, अब कुछ भी निवेदन करने का अवसर नहीं रह गया है।&nbsp;</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(पास पहुँचकर एक प्रहरी से निवेदन करते हैं)&nbsp;</p>



<p>मेरे प्यारे कृष्णानुरागी प्रिय! मुझे श्रीकृष्ण से मिला दो। मेरा नाम उन्हें बता देना। कहना, गुरुकुल में साथ-साथ पढ़े सुदामा नामधारी ब्राह्मण आपका दर्शन करना चाहते हैं। कृष्ण मेरे बाल सखा हैं। मेरी यह विनती उन तक पहुँचा न दो मेरे प्यारे।&nbsp;</p>



<p><strong>प्रहरी:</strong> विप्र! प्रभु के विश्राम का समय तो हो गया है। क्या आप कुछ रुक नहीं सकते हैं?&nbsp;</p>



<p><strong>सुदामा:</strong> भैया! बहुत दूर से आया हूँ। कृष्ण प्यारे का अधिक समय नहीं लूँगा। हालचाल के बाद तुरन्त वापस हो जाऊँगा। ब्राह्मण की विनती है। अनसुनी न करो। मैं उनसे मिलने को बेचैन हूँ।&nbsp;</p>



<p><strong>प्रहरी:</strong> अच्छा ठहरिए! देश, काल, अवसर देखकर तदनुसार आपको सूचित करता हूँ।</p>



<p class="has-text-align-right"><a href="https://blog.ramyantar.com/2014/10/krishna-sudama.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">क्रमशः- </a></p>
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		<title>बतावत आपन नाम सुदामा: एक</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2014/09/krishna-sudama-3.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 07 Sep 2014 06:31:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नाटक]]></category>
		<category><![CDATA[सुदामा]]></category>
		<category><![CDATA[कृष्ण सुदामा की मित्रता]]></category>
		<category><![CDATA[कृष्ण-सुदामा]]></category>
		<category><![CDATA[नाट्य]]></category>
		<category><![CDATA[मित्रता]]></category>
		<category><![CDATA[सुदामा चरित्र]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दृश्य प्रथम: सुदामा की कुटिया (सुदामा की जीर्ण-शीर्ण कुटिया। सर्वत्र दरिद्रता का अखण्ड साम्राज्य। भग्न शयन शैय्या। बिखरे भाण्ड, मलिन वस्त्रोपवस्त्रम। एक कोने विष्णु का...</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<h3 class="has-text-align-center wp-block-heading">दृश्य प्रथम: सुदामा की कुटिया</h3>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color"><em>(सुदामा की जीर्ण-शीर्ण कुटिया। सर्वत्र दरिद्रता का अखण्ड साम्राज्य। भग्न शयन शैय्या। बिखरे भाण्ड, मलिन वस्त्रोपवस्त्रम। एक कोने विष्णु का देवविग्रह। कुश का आसन। धरती पर समर्पित अक्षत-फूल। तुरन्त देवार्चन से उठे सुदामा भजन गुनगुना रहे हैं। सम्मुख प्रसाद और जल रखती ब्राह्मणी। ब्राह्मणी की आँखों से आँसू टपक रहे हैं, श्वांसे गर्म हैं। उदास किनारे खड़ी हो जाती हैं। होंठ काँप रहे हैं, हाथ मुद्रित हैं।)</em></p>



<p><strong>सुदामा:</strong> भद्रे! रात्रि अस्पष्ट होती जा रही है। आलोक के अक्षयवट के नीचे ज्योत्सना ध्यान में डूब गयी है। दिगन्त के तट पर उषा अमृत कलश भर रही है। प्रभु के मन्दिर में प्रत्यूष का शीतल संगीत प्रारम्भ हो गया है। आकाश के नीड़ में प्रकाश का पक्षी जाग उठा है। इस विसुध आलोक के स्वर में तुम्हारी वेदना की झंकृति क्यों हो रही है। तुम्हारी श्वांस प्रश्वांस में यह कैसा रुदन झनझना रहा है!</p>



<p><strong>ब्राह्मणी:</strong> प्राणेश! अब सहा नहीं जाता। दारिद्र्य के इस विष बुझे बाणों ने कलेजे को एकदम जर्जर कर दिया है। जीवन के बोझ से झुके कंधे अब कभी सीधे नहीं हो सकते। घोर दुखों के घेरे में कभी सुख न जाने। विपत्ति की अंधियारी राहों में अनगिनत कांटे चुभे हैं। हृदय और मस्तिष्क को कहीं प्रकाश की झलक भी न मिली। एक क्षण हंसने को न मिला। जीवन आशा विरहित संज्ञाहीन शव की भांति हो गया है। अब इसे जकड़कर बाहों के आलिंगन में नहीं रख सकूँगी। आँसुओं भरी अपनी धरती पर अंतिम दर्शन का आँचल बिछाये इस भिक्षुणी की भूल चूक माफ करना हृदयेश्वर। अंतिम प्रणाम स्वीकारो। अब जीवन लीला का अवसान कर दूँगी।</p>



<p><strong>सुदामा: </strong>रुको भद्रशीले! यह क्या? तेरे इन पाँवों में फिसलन कहाँ से आयी? दैव विधान का अतिक्रमण कभी किसी के बूते की बात रही है? अतीत का अकृतार्थ निष्फल जीवन, चेतना का स्खलन-पतन, अशुभ-अनिष्ट का वरण सुदामा की धर्मपत्नी का शील हरण करने में सफल हो जाय- क्या यही चाहती हो!</p>



<figure class="wp-block-pullquote alignright"><blockquote><p>आप पाषाण के समान अचल रहे, किन्तु मैं अन्तःसलिला सदानीरा नहीं रह सकी। </p></blockquote></figure>



<p><strong>ब्राह्मणी:</strong> स्वामी! शास्त्रविद तो आप हैं ही। क्या ’दारिद्रमनन्तकम् दुखम्’ की उक्ति सत्य नहीं है? इस भग्न कुटीर के शीर्ष पर कितनी बार वसंत आकर लौट गया है और उसके अर्पित कंजन कुसुमों की धूलि में मिल मेरी अश्रुधारा वाय की गोद में विलीन हो गयी। कितनी बार ग्रीष्म यहाँ तप कर चला गया है और मेरी उदास संध्या उसकी व्यथा कथा ढोती रही। कितनी बार इस कुटिया के शीर्ष से श्रावणी मेघ मल्हार गाता हुआ पार हुआ है, मैं दीना दुःख की कथरी को समेटने में लगी रही। हंसों की माला पहने कितनी बार शरद आया है और स्वप्न की भाँति पार हो गया। चक्रवातों के क्रन्दन में लिपटा हेमंत आया है और अश्रु की ओस बूँदों से मैं लथपथ हो गयी हूँ। अपने मर्मर में पागल बने शिशिर के सामने सब अंगहीन, दीन प्राणों ने प्रलाप के स्वर में स्वर मिलाया है। आप पाषाण के समान अचल रहे, किन्तु मैं अन्तःसलिला सदानीरा नहीं रह सकी। नाथ! मैं मनोरथों के निर्गन्ध पुष्प एकत्र करती रह गयी। तुम्हारे मनचाहे अर्चा की बेला बीत गयी। फिर कभी जन्म होगा तो यह दासी आपकी पगतरी बनकर जीवन धन्य करेगी। अब विदा चाहती हूँ इस जीवन से।</p>



<p><strong>सुदामा:</strong> देवि! संदेहों के दीवट पर विश्वास का चिराग जलाओ! जीवन के अर्क से प्रेम स्नात होता है, जीवनान्त से नहीं। तुम्हीं बताओ, मेरे धूल भरे चरणों की छालों की महक में ऐसा कौन-सा रस मिल गया था कि जिससे आकृष्ट होकर तुमने अपने अश्रु नीर से उन्हें धोकर उन्हें अपने अधरों से चूम लिया था। आज क्या हुआ कि मुझ अकिंचन को और अकिंचन बना रही हो। परिस्थिति की प्रतिमा का अभिषेक आँख की सीपी में सुरक्षित स्वाति बूँदों से करो। श्रीकृष्ण की करुणा की विश्वासी बनो। ज्ञान के आलोक में देखो। यह समस्त संसार उसी के दर्पण में प्रतिबिम्बित है। माधव-स्मृति में एक ऐसे अमृत का स्रोत निरन्तर बहता है जो हर पार्थिवता को अमर बना देता है। प्रिये! धैर्य न छोड़ो।</p>



<p style="text-align: justify;"><strong><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2014/09/Sudama2Band2Bhis2Bwife2Bdiscussing2Bfor2Bhelp2Bof2BKrishna.webp" type="image/webp" /><img decoding="async" class="alignright" title="Sudama and his wife " src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2014/09/Sudama2Band2Bhis2Bwife2Bdiscussing2Bfor2Bhelp2Bof2BKrishna.jpg?x47177" alt="Sudama's wife urges him to seek ShriKrishna-help" width="316" height="198" border="0" /></picture>ब्राह्मणी:</strong> मेरे स्वामी! जीवन का आदि पढ़ते-पढ़ते मैं उन आख्यानों उपाख्यानों से उकता कर उसके अंत को देखने के लिए उत्सुक हो गयी हूँ। सारी उमंगे टकराकर चकनाचूर हो गयी हैं। अपने प्राणों की करुण लालसायें अब आप को अर्पित करती हूँ। हाय, कृष्ण की मित्रता भी आपके लिए दो कौड़ी को हो गयी। इस हाड़तोड़ दरिद्रता में आपको जीवित ही मार डालने वाले द्वारका के राजा का कौन सा यश बढ़ रहा है! आपने अपने स्वामी की निज-जन-रक्षण की माला के मनके में दाग लगाने की ही ठान ली है। ऐसे जीवन से तो मरण भला है।</p>
<p style="text-align: justify;">अब तक अर्द्ध मूर्च्छा में पड़ी मैं मन को भाँति-भाँति भुलावे से समझाती रही किंतु अब दरिद्रता की विषैली नागिन का गरल हृदय तक लहराने लगा है, और मेरा अंग प्रत्यंग असह्य दरिद्रता की दारुण ज्वाला में दहक रहा है। यदि मेरी महायात्रा के अंत तक आपके धैर्य-प्रदीप का स्नेह न समाप्त हो और अदृष्ट अवलम्बन की लकुटी न डगमगाये तो अधरों से मेरी भींगी पलकें पोंछकर आप अनुग्रह के करों से मेरे असंख्य पापों की कालिमा धो देना। जीवन नाटिका पर अंधकार की यवनिका का पटाक्षेप होने के पूर्व अब यह दुर्भाग्यदलिता दरिद्रा आपको तथा आपके लक्ष्मीपति मित्र द्वारिकाधीश को अंतिम प्रणाम करती है।</p>



<p><strong>सुदामा:</strong> प्रिये! प्रारब्ध का दारुण खेल चल रहा है। मैं कृष्ण का चरणानुरागी हूँ, धनानुरागी नहीं हूँ।</p>



<p><strong>ब्राह्मणी:</strong> मरे को मारकर मंगल चाहना आपके किस भगवान का रचा विधान है। द्वारे-द्वारे भटकना ही भक्ति का मानक है तो ऐसे भक्त और ऐसे भगवान को मैं क्या कहूँ? आप द्वारिका जाने के नाम से चिढ़ते रहे हैं। जिसका घर ही उजड़ गया हो उसका परलोक क्या? सब निचुड़ गया है। स्वल्प&nbsp; भी मिलता तो संतोष रहता। हाय!</p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-large"><img decoding="async" src="https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/b/bc/Sudama%27s_wife_urges_him_to_seek_Krishna%27s_help%2C_ca._1775-ca._1790.jpg" alt=""/><figcaption class="wp-element-caption">Sudama’s wife urges him to seek Krishna’s help   Source: <a href="https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Sudama%27s_wife_urges_him_to_seek_Krishna%27s_help,_ca._1775-ca._1790.jpg" target="_blank" rel="noreferrer noopener">Wikimedia</a></figcaption></figure>
</div>


<p><strong>सुदामा:</strong> प्रिये! तुम मुझे तब छोड़कर जाने को राजी नहीं हुई जब कई दिन अन्न का मुँह नहीं देखा था और वह कठिन समय तुम मुझसे बातें करके काट लेती थी। तब नहीं छोड़ना चाहा था जब तुम्हारी सूखी छातियों में दूध नहीं होता था और अपने बच्चों को लोरियाँ गा-गाकर बहलाती थीं। तब नहीं छोड़ना चाहा, जब आँखों में पानी की परत लिए आकाश को निहारती रहती थी और आँखों से बरबस फूट पड़ने वाले आँसुओं को तुम हँस-हँसकर मुझसे छिपाती थी। भद्रशीले! तब मुझे छोड़कर नहीं गयी जब चटाई पर पड़ा मैं हड्डियों की मुट्ठी होकर रह गया था, कोई मेरे पास नहीं फटकता था। मेरी गन्दी चादर धोते, मेरे गीले कपड़ों को बदलते तुम नहीं ऊबती थी। मेरी हड्डियों की ठठरी को दुर्बल बाहों में उठा-उठाकर कंधे को सटा लेती थी और विलख-विलखकर मेरे प्राणों की भीख माँगती थी। आज क्या हो गया है तुम्हें? धैर्यवती का धीरज क्यों छूट रहा है?</p>



<p><strong>ब्राह्मणी:</strong> प्राणनाथ! किसी अदृश्य संकेत ने मुझे मथ दिया है। दुर्दशा की हद हो गयी है। एक पथ भूला राही किसी बन्द गली में आकर रुक जाय, ऐसी मेरी हालत हो गयी है। सारी पीड़ा, सारे दुःख, सारे अभाव एकत्र होकर मुझ दीना के विरुद्ध षड़यंत्र रच रहे हैं। अपनी मनोदशा क्या कहूँ? जैसे किसी डाल पर कोई घोंसला बनाये और नीचे से डाल टूट जाए। सारा रुदन अपने हिस्से समेटकर विदा हो जाना चाहती हूँ कि आपको न रोना पड़े।</p>



<p><strong>सुदामा:</strong> रुको भार्या-शिरोमणि! काल्पनिक छायाओं में न भागो जो तुम्हें विग्रह में डालती हैं। जो अतीत जीवन से मुक्त, भविष्य के जन्म मरणों से परे है, जिसमें हमारी स्थिति है, जिसमें हम सदा स्थित रहेंगे, उसी की आराधना करो और सभी प्रतिमाओं को तोड़ दो।</p>



<p><strong>ब्राह्मणी:</strong> प्रिये! वह प्रकाश प्रकाश नहीं है जो अंधेरे के भीतर है। कृष्ण की करुणा क्या शब्दकोष में ही दिखेगी? मित्र के दुःख का दूर से आनन्द लेना किस मैत्री का निर्वहन है।</p>



<p><strong>सुदामा:</strong> नहीं मानती हो, तो मैं कृष्ण के पास जा रहा हूँ। अपने प्राणों का परित्याग न करना। पर खाली हाथ कैसे जाऊँ। मन विचित्र हो रहा है। जिस मुँह से प्रेम मागा उसी से वैभव की याचना? फिर भी, त्रिया हठ के चलते जा रहा हूँ। कुछ हो तो दे दो।</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color"><em>(ब्राह्मणी थोड़ा तन्दुल लाकर देती है। सुदामा उसे अपने फटे दुपट्टे की कोर में बाँध लेते हैं। हरि-स्मरण करते हुए गृह से बाहर निकलते हैं।)</em></p>



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		<title>नल दमयंती: दमयंती स्वयंवर</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2013/05/nal-damyanti4.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 15 May 2013 22:30:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नल दमयंती]]></category>
		<category><![CDATA[नाटक]]></category>
		<category><![CDATA[आख्यान]]></category>
		<category><![CDATA[दमयंती स्वयंवर]]></category>
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		<category><![CDATA[वनपर्व]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दमयंती स्वयंवर : पंचम दृश्य (दमयंती स्वयंवर का महोत्सव। नृत्य गीतादि चल रहे हैं। राजा महाराजा पधार रहे हैं। सब अपने अपने निवास स्थान पर...</p>
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<p style="text-align: justify;"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2013/05/lonely_maidens_friend_or24.webp 650w" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-129 alignright" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2013/05/lonely_maidens_friend_or24-300x217.jpg?x47177" alt="" width="252" height="182" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2013/05/lonely_maidens_friend_or24-300x217.jpg 300w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2013/05/lonely_maidens_friend_or24-320x232.jpg 320w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2013/05/lonely_maidens_friend_or24.jpg 650w" sizes="auto, (max-width: 252px) 100vw, 252px" /></picture>नल दमयंती की यह कहानी अद्भुत है। भारत वर्ष के अनोखे अतीत की पिटारी खोलने पर अमूल्य रत्नों की विशाल राशि विस्मित करती है। इस पिटारी में यह कथा-संयोग ऐसा ही राग का एक अनमोल चमकता मोती है। भाव-विभाव और संचारी भाव ऐसे नाच उठे हैं कि अद्भुत रस की निष्पत्ति हो गयी है। निषध राजकुमार नल और विदर्भ राजकुमारी दमयंती के मिलन-परिणय की अद्भुत कथा है यह। रुदन, हास, मिलन, विछोह के मनके इस तरह संयुक्त हो उठे हैं इस कहानी में कि नल दमयंती मिलन की एक मनोहारी माला बन गयी है- अनोखी सुगंध से भरपूर। दमयंती स्वयंवर की यह कथा नाट्य-रूप में संक्षिप्ततः प्रस्तुत है। दृश्य-परिवर्तन के क्रम में कुछ घटनायें तीव्रता से घटित होती दिखेंगी। इसका कारण नाट्य के अत्यधिक विस्तृत  हो जाने का भय है, और शायद मेरी लेखनी की सीमा भी। प्रस्तुत है <a href="https://blog.ramyantar.com/2013/02/nal-damayanti.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">पहली</a>, <a href="https://blog.ramyantar.com/2013/02/nal-damyanti2.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">दूसरी</a>, <a href="https://blog.ramyantar.com/2013/03/nal-damyanti3.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">तीसरी</a> के बाद चौथी कड़ी।</p>





<h3 class="has-text-align-center wp-block-heading">दमयंती स्वयंवर : पंचम दृश्य</h3>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(<a href="https://www.youtube.com/watch?v=zhSsxfnOBf8">दमयंती स्वयंवर</a> का महोत्सव। नृत्य गीतादि चल रहे हैं। राजा महाराजा पधार रहे हैं। सब अपने अपने निवास स्थान पर यथास्थान विराजित होते हैं। सुन्दरी दमयंती अपनी अंगकांति से राजाओं के मन और नेत्रों को अपनी ओर आकर्षित करती हुई रंगमंडप में प्रवेश करती है। संग में सखी मंडल है। हाथ में वरमाला है। राजाओं का परिचय दिया जा रहा है।)</p>



<p><strong>दमयंती:</strong> <em>(सखियों के मुख की ओर निहारती है, फिर रंगभूमि की ओर देखती है, फिर चकित हो कर स्वगत भाषण करती हुई एक-एक को देखकर आगे बढ़ने लगती है। आगे एक ही स्थान पर नल के समान आकार और वेषभूषा के पाँच राजाओं को इकट्ठे ही बैठे हुए देखती है। संदेह और विस्मय के साथ स्वयमेव स्वयं से बातें कर रही है।)</em></p>



<p>अरे! मेरे प्राणेश्वर नल कौन है,यह कैसे जानूँ? कौन देवता हैं, कौन मेरे हृदयेश्वर हैं, यह कैसे पहचानूँ? (ठिठक जाती है, फिर अपनी अंगुलियों को अपने वक्षस्थल पर स्थापित कर दीर्घश्वांस भरती हुई कहने लगती है) बन्द करो मेरे दुर्भाग्य, यह नंगा नाच! अरे जगन्नियंता! मेरे किस अपराध की सजा मिलने वाली है। अरे मेरे व्याकुल नयन! तुम कौन-सा दृश्य देख रहे हो? जीवनधन कहाँ हो? हे विरहाग्नि में संतप्त होते हुए हृदय, यदि तुम लौहमय हो तो द्रवित क्यों नहीं होते। अरे जीवन! क्यों विलम्ब करते हो? तुम्हारा निवासभूत यह हृदय जल रहा है। क्यों नहीं निकल जाते? </p>



<p>अरे मंद-मंद बहते हुए मारुत! यदि विरहाग्नि में मैं जल कर मरूँ तो दीन वचन कह कर प्रार्थना करती हूँ कि मेरे मृत शरीर की भस्म को उत्तर दिशा में स्थित निषध देश में उड़ते हुए पहूँचा देना। ओ राजहंस! नल का संदेश देने वाले प्यारे विहंगम! किस तड़ाग में छिप गए हो? तुम मिल जाते तो मेरी इस यातना को मेरे हृदयेश्वर से परिचित करा देते। प्यारे नल! हे हृदयेश्वर! आपको वरण किए बिना ही यदि मेरे हतभाग्य प्राण निकल जाँय तो जन्म जन्मांतर में भी मैं हृदय से अनुरक्त हो कर आप को ही पुनः प्राप्त करूँ, यही मेरी याचना है। अनसुनी मत करना देव! छोड़ना मत प्राणनाथ! </p>



<p><em>(फिर देवताओं से ही हाथ जोड़कर प्रणामपूर्वक स्तुति करती हुई-)</em> हे देवताओं! हंसों के मुख से नल का वर्णन सुनकर मैंने उन्हें पति रूप से वरण कर लिया है। मैं मन से और वाणी से नल के अतिरिक्त किसी को भी नहीं चाहती। देवताओं! आपने ही, आपकी भाग्यविधाता सृष्टि ने ही, निषधेश्वर नल को ही मेरा पति बना दिया है, तथा मैंने नल की आराधना के लिए ही यह व्रत प्रारंभ किया है। मेरी इस सत्य शपथ के बल पर देवता लोग मुझे उन्हें ही दिखला दें। मैं  विनीता करबद्ध प्रार्थना करती हूँ। ऐश्वर्यशाली लोकपालों! आप लोग अपना रूप प्रकट कर दें, जिससे मैं पुण्यश्लोक नराधिराज राजा नल को पहचान लूँ।</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(दमयंती का अंतर्विलाप सुन कर देवता द्रवित हो जाते हैं। वे उसके दृढ़ निश्चय, सच्चे प्रेम, आत्मशुद्धि, बुद्दि, भक्ति और नल परायणता को देख कर उसे देवता और मनुष्य में भेद करने की शक्ति प्रदान कर देते हैं। उसको हृदय में ’विजयी भव’ का शब्द सुनायी पड़ता है।)</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-2-1536x864.webp 1536w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-2.webp 1920w" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="576" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-2-1024x576.jpg?x47177" alt="" class="wp-image-4339" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-2-1024x576.jpg 1024w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-2-300x169.jpg 300w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-2-768x432.jpg 768w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-2-1536x864.jpg 1536w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-2-409x230.jpg 409w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-2.jpg 1920w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></picture></figure>



<p><strong>दमयंती:</strong> (पुनः चमत्कृत होती हुई) अहा! अहा! अब तो पार्थक्या मुझे साफ दिखायी देने लगा है। देवताओं के शरीर पर पसीना नहीं है। पलकें गिरती नहीं हैं। उनकी ग्रीवा में पड़ी पुष्पमाला कुम्हलायी नहीं है। शरीर पर मैल नहीं है। वे सिंहासन पर स्थित हैं पर उनके पैर धरती को नहीं छूते और उनकी परछाईं नहीं पड़ती। इधर नल के शरीर की छाया पड़ रही है। माला कुम्हला गयी है। शरीर पर कुछ धूल और पसीना भी है। पलकें बराबर गिर रही हैं। अब मैं पहचान गयी। </p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(फिर सकुचा कर घूँघट काढ़ लेती हैं, और नल के गले में वरमाला डाल देती हैं। देवता और महर्षि साधु-साधु कहने लगते हैं। पुष्पवृष्टि होने लगती है। राजागण आश्चर्यचकित हो जाते हैं।) </p>



<p><strong>नल:</strong>(आनंद से फूले न समाते हुए) कल्याणी! तुमने देवताओं के सामने रहते हुए भी उन्हें वरण न करके मुझे ही वरण कर लिया है, इसलिए तुम मुझको प्रेम परायण पति समझना। मैं तुम्हारी बात मानूँगा। जब तक मेरे शरीर में प्राण रहेंगे तब तक मैं तुमसे प्रेम करूँगा, यह मैं तुमसे शपथ पूर्वक कहता हूँ। तुम्हारे योग्य आसन मेरा वक्षस्थल ही है। निष्कपट दूतता करने से इन्द्रादि देव मुझ पर दया करें। (देवता बहुत प्रसन्न होकर प्रकट हो जाते हैं तथा नल को वरदान देते हुए फूल बरसान लगते हैं।)</p>



<p><strong>इन्द्र</strong>: नल! तुम्हें यज्ञ में मेरा स्मरण करते ही दर्शन होगा और उत्तम गति मिलेगी।</p>



<p><strong>अग्नि:</strong> राजा नल! जहाँ तुम मेरा स्मरण करोगे, वहीं मैं प्रकट हो जाऊँगा। मेरे ही समान प्रकाशमय लोक तुम्हें प्राप्त होंगे।</p>



<p><strong>यम:</strong> नल! तुम्हारी बनायी हुई रसोई बहुत मीठी होगी और स्मरण रखो, तुम अपने धर्म में सदा दृढ़ रहोगे।</p>



<p><strong>वरुण:</strong> हे महाराज! जहाँ तुम चाहोगे,वहीं जल प्रकट हो जाएगा। तुम्हारी माला निरंतर उत्तम गंध से परिपूर्ण रहेगी।</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(सभी समवेत आशीर्वाद देते हैं।)&nbsp;</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(राजा नल महाराज भी की राजधानी कुण्डिनपुर में राजसम्मान से सुशोभित होते हैं। महामहोत्सव मनाया जाता है। तदनन्तर राजा भीम की अनुमति प्राप्त करके महाराज नल दमयंती के साथ अपनी राजधानी लौट आते हैं।)</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(पर्दा गिरता है।)</p>
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		<title>नल दमयंती: स्वयंवर की तैयारी</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2013/03/nal-damyanti3.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 25 Mar 2013 21:18:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नल दमयंती]]></category>
		<category><![CDATA[नाटक]]></category>
		<category><![CDATA[आख्यान]]></category>
		<category><![CDATA[दमयंती स्वयंवर]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नल: (उसकी बाहें पकड़कर सम्हालते हुए तथा आँसू पोंछते हुए) सुकुमारी! रोना अशुभ है, अतः मत रोओ। यदि मेरे अपराध के कारण तुम रो रही...</p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2013/03/nal-damyanti3.html">नल दमयंती: स्वयंवर की तैयारी</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
]]></description>
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<p style="text-align: justify;">नल दमयंती की यह कहानी अद्भुत है। भारत वर्ष के अनोखे अतीत की पिटारी खोलने पर अमूल्य रत्नों की विशाल राशि विस्मित करती है। इस पिटारी में यह कथा-संयोग ऐसा ही राग का एक अनमोल चमकता मोती है। भाव-विभाव और संचारी भाव ऐसे नाच उठे हैं कि अद्भुत रस की निष्पत्ति हो गयी है। निषध राजकुमार नल और विदर्भ राजकुमारी दमयंती के मिलन-परिणय की अद्भुत कथा है यह। रुदन, हास, मिलन, विछोह के मनके इस तरह संयुक्त हो उठे हैं इस कहानी में कि नल दमयंती मिलन की एक मनोहारी माला बन गयी है- अनोखी सुगंध से भरपूर। नल दमयंती की यह कथा नाट्य-रूप में संक्षिप्ततः प्रस्तुत है। दृश्य-परिवर्तन के क्रम में कुछ घटनायें तीव्रता से घटित होती दिखेंगी। इसका कारण नाट्य के अत्यधिक विस्तृत  हो जाने का भय है, और शायद मेरी लेखनी की सीमा भी। प्रस्तुत है <a href="https://blog.ramyantar.com/2013/02/nal-damayanti.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">पहली</a>, <a href="https://blog.ramyantar.com/2013/02/nal-damyanti2.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">दूसरी</a> के बाद <a href="https://blog.ramyantar.com/2013/03/nal-damyanti3.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">तीसरी</a> कड़ी।</p>





<p><strong>नल:</strong> (उसकी बाहें पकड़कर सम्हालते हुए तथा आँसू पोंछते हुए) सुकुमारी! रोना अशुभ है, अतः मत रोओ। यदि मेरे अपराध के कारण तुम रो रही हो तो उस अपराध के लिए राजा नल हाथ जोड़कर क्षमा माँगता है। निष्कारण क्रोध न करो, प्रिये! क्रोध को छोड़ो। मेरे ऊपर प्रसन्न हो जाओ। चाहे परिणाम जो हो, नल देवताओं के प्रतिशोध को झेल लेगा। तुम अधरों को मधुर हास्य से सुशोभित करो। नेत्रों को अपनी विलास लीला से चंचल करो। दृग बिन्दु की वर्षा समाप्त करो। प्रसन्नमुखी हो जाओ। मेरे सिंहासन को अलंकृत करो। मेरे अंक का विशिष्ट अलंकार बनो। तुम मेरी पीर का पराभव करो। वचन से अनुकंपा करो, अन्यथा मैं अब जी नहीं सकता। </p>



<p><strong>दमयंती: </strong>हे प्राणनाथ! &nbsp;मैं सब देवताओं को प्रणाम करके आप को ही पतिरूप में वरण कर रही हूँ। यह मैं सत्य-सत्य शपथ खा रही हूँ।</p>



<p><strong>नल:</strong> प्रिये! ज्यों ही पहली बार पाया तुम्हारी मुख छवि का दर्शन तो देखते ही निमिष मात्र में अन्तरतम्‌ के चिन्मय वातायन खुल गए। मेरे रोम रोम में आत्मरमण का आलोड़न जागा। मैं तन,मन, प्राण, आत्मा के सारे ही धरातलों पर समूचा ही तुमको पा गया। निहाल हो गए मेरे प्राण! देवताओं के वरण का तुमसे अनुरोध करने चला आया। तुम्हें नल ने घोर कष्ट दिया। किन्तु मैं धर्म विरुद्ध &nbsp;अपना स्वार्थ कैसे साधूँ, कमल नयने!</p>



<p><strong>दमयंती:</strong>(नल का मुख अपनी मृणाल कोमल अंगुलियों से ऊपर उठाती हुई गद्गद स्वर में) समझ रही हूँ प्राण! आप की अमोघ धर्मनिष्ठा को कौन नहीं जानता। नरेश्वर! इसके लिए एक निर्दोष उपाय है। इसके अनुसार काम करने से आपको को कोई दोष नहीं लगेगा। उपाय है कि आप लोकपालों के साथ स्वयंवर में मण्डप में आयें। मैं उनके सामने ही आपको वरण कर लूँगी। मेरा विनय अस्वीकार न करें जीवन-धन!&nbsp;</p>



<p><strong>नल:</strong> (दमयंती का सिर सहलाते हुए स्नेहमयी वाणी में) मुझे यशस्वी एवं कृतकार्य बनाने वाली गुणमयी राजकन्ये! तुम्हारी विनयशीलता एवं हृदय की पवित्रता के लिए कोई शब्द नहीं है मेरे पास। विधाता तुम्हें सफल मनोरथा करे। कल स्वयंवर में मुझे सनाथ करना।</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(नल का प्रस्थान। पर्दा गिरता है।)</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-1-1536x864.webp 1536w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-1.webp 1920w" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="576" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-1-1024x576.jpg?x47177" alt="" class="wp-image-4334" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-1-1024x576.jpg 1024w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-1-300x169.jpg 300w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-1-768x432.jpg 768w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-1-1536x864.jpg 1536w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-1-409x230.jpg 409w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-1.jpg 1920w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></picture></figure>



<h3 class="has-text-align-center wp-block-heading">नल दमयंती की कहानी: चतुर्थ दृश्य </h3>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(देवता बाहर प्रतीक्षा कर रहे हैं। नल उन्हें प्रणाम करते हुए कहते हैं-)</p>



<p><strong>नल: </strong>हे देवगण! मैं आपलोगों की आज्ञा से दमयंती के महल में गया। बाहर अनेकों द्वारपाल पहरा दे रहे थे, परंतु उन्होंने आप लोगों के प्रभाव से मुझे देखा नहीं। केवल दमयन्ती और उसकी सखियों ने मुझे देखा। मैंने दमयंती से आप लोगों के गुण और प्रभाव का विशद वर्णन किया। कोई कोर कसर नहीं छोड़ी, परंतु वह तो आप लोगों को न चाह कर मुझे ही वरण करने पर तुली हुई है। </p>



<p>देववरों! वस्तुस्थिति तो यह है कि किसी भी सद्गुण का एक कण भी मुझमें नहीं है और सम्पूर्ण दोषों की जीवंत प्रतिमा हूँ मैं। पर बलिहारी है उसके अनुराग भरे नयनों की- उसके समर्पणपूर्ण उरस्थल की, कि वह केवल, केवल मुझ पर ही न्यौछावर हो गयी थी और उसे मेरे अतिरिक्त अन्य सबकी विस्मृति हो गयी थी। एक बार नहीं शत-सहस्र बार लज्जा में मेरे प्राण जैसे भूमि में समा जाते थे। पर वह समर्पिता मुझे ही अपना जीवन-सर्वस्व मान चुकी थी। उस लावण्यमयी की विभोरावस्था अवर्णनीय है सुरवरों! जल से पूरित  उसके उन नयन सरोजों को मैं भूल नहीं पाता। मैं उस भावमयी के भावों की आँधीं में ऐसा बह गया कि आपलोगों के पास पुनरावर्तित होने में इतना विलम्ब हो गया। उसके ताम्बूलरंजित अधर अभी कम्पित ही थे कि मैं किसी भाँति उसके प्राण रमण की संबोधनमयी वाणी को विस्तृत करता हुआ बाहर आप तक आ गया हूँ।</p>



<p><strong>देवगण: अब तुमसे क्या पूछना और क्या कहना</strong>! जब तुम्हारे साथ स्वयंवर में बैठना है, तो कल जो होगा, देखा जायेगा। बाकी बातें व्यर्थ ही हैं।&nbsp;(देवता अदृश्य हो जाते हैं।)&nbsp;</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color"> (पर्दा गिरता है।) </p>
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		<title>नल दमयंती: प्रथम मिलन</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 17 Feb 2013 23:12:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नल दमयंती]]></category>
		<category><![CDATA[नाटक]]></category>
		<category><![CDATA[आख्यान]]></category>
		<category><![CDATA[दमयंती स्वयंवर]]></category>
		<category><![CDATA[नल-दमयंती]]></category>
		<category><![CDATA[नाट्य]]></category>
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		<category><![CDATA[मिथक]]></category>
		<category><![CDATA[वनपर्व]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नल दमयंती: तृतीय दृश्य (रनिवास का दृश्य। नल चकित होकर रनिवास देखता है। दमयंती का प्रवेश।) दमयंती: हे वीराग्रणी! आप देखने में परम मनोहर और...</p>
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<p style="text-align: justify;">नल दमयंती की यह कहानी अद्भुत है। भारत वर्ष के अनोखे अतीत की पिटारी खोलने पर अमूल्य रत्नों की विशाल राशि विस्मित करती है। इस पिटारी में यह कथा-संयोग ऐसा ही राग का एक अनमोल चमकता मोती है। भाव-विभाव और संचारी भाव ऐसे नाच उठे हैं कि अद्भुत रस की निष्पत्ति हो गयी है। निषध राजकुमार नल और विदर्भ राजकुमारी दमयंती के मिलन-परिणय की अद्भुत कथा है यह। रुदन, हास, मिलन, विछोह के मनके इस तरह संयुक्त हो उठे हैं इस कहानी में कि नल दमयंती मिलन की एक मनोहारी माला बन गयी है- अनोखी सुगंध से भरपूर। नल दमयंती की यह कथा नाट्य-रूप में संक्षिप्ततः प्रस्तुत है। दृश्य-परिवर्तन के क्रम में कुछ घटनायें तीव्रता से घटित होती दिखेंगी। इसका कारण नाट्य के अत्यधिक विस्तृत  हो जाने का भय है, और शायद मेरी लेखनी की सीमा भी। इस प्रविष्टि में <a href="https://en.wikipedia.org/wiki/Nala">राजा नल</a> देवताओं का संदेश लेकर दमयंती के पास प्रस्तुत हैं। नल दमयंती संवाद से अभिव्यक्ति के अनूप रूप उद्घाटित होंगे। प्रस्तुत है <a href="https://blog.ramyantar.com/2013/02/nal-damayanti.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">पहली</a> के बाद दूसरी कड़ी।</p>





<h3 class="has-text-align-center wp-block-heading">नल दमयंती: तृतीय दृश्य</h3>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(रनिवास का दृश्य। नल चकित होकर रनिवास देखता है। दमयंती का प्रवेश।)</p>



<p><strong>दमयंती:</strong> हे वीराग्रणी! आप देखने में परम मनोहर और निर्दोष जान पड़ते हैं। पहले अपना परिचय तो बतायें! आप यहाँ किस उद्देश्य से आये हैं? द्वारपाल ने आपको देखकर रोका नहीं?&nbsp;</p>



<p><strong>नल:</strong> इससे पहले कि मैं अपना परिचय दूँ, हे मृगाक्षी! तुम अधीरता छोड़कर संयमित हो जाओ। मुझे एक महत्वपूर्ण चर्चा करनी है।&nbsp;</p>



<p><strong>दमयंती: </strong>आप कहाँ से आ रहे हैं? आप कौन हैं? जो आपने सुरक्षित अन्तःपुर में प्रवेश किया है। यह अलक्ष्य समुद्र पार नहीं किया है क्या?&nbsp;</p>



<p><strong>नल:</strong>(विनीत भाव से) भद्रे! तुम्हारी कोमल काया स्वस्थ है न? तुम्हारा चित्त प्रसन्न है न? सुनो कर्णान्त दीर्घ नयने! मैं निषध देश का राजा नल हूँ। इन्द्र, अग्नि, वरुण और यम- ये चारों देवता तुमसे परिणय करना चाहते हैं। तुम इनमें से किसी एक का वरण कर लो। यही संदेश लेकर मैं तुम्हारे पास आया हूँ। उन देवताओं के प्रभाव से  ही मैं अदृश्य हो गया हूँ। जब मैं तुम्हारे महल में प्रवेश करने लगा, तब मुझे कोई देख नहीं सका। तुम अतिथि सत्कार छोड़कर मेरे दूतकर्म को सफल करो। मेरी विवशता और धर्मनिष्ठा  के चलते मुझपर कृपा करो। मैं वचनबद्ध हूँ। परकार्यसिद्धि हेतु अंतःपुर में प्रविष्ट हुआ हूँ। मैंने देवताओं का सन्देश कह दिया।  (स्नेहमयी दृष्टि से देखते हुए) कल्याणी! तुममें इन्द्रादि दिक्‌पालों का चित्त आसक्त है। अब जैसा विचारो वैसा करो।</p>



<p><strong>दमयंती:</strong> (किंचित हँसती है, फिर गंभीर होकर) हे राजा नल! आपकी अमृतमयी वाणी मैंने सुनी। पहले यह निवेदिता आपके श्री चरणों में प्रणाम करती है। पुनः प्रणाम करती है देवगणों को जिनके आग्रह और अनुग्रह से आपने दर्शन दिया। आपने यहाँ पधार कर गुरुतर उपकार किया है, उसके उपयुक्त प्रति-उपकार क्या हो सकता है नरेन्द्र? आप आज्ञा कीजिए, मैं आपकी यथाशक्ति सेवा करूँ। मेरे स्वामी! मैंने जिस दिन से हंस की बात सुनी है, उसी दिन से मैं व्याकुल हूँ और आपके लिए ही मैंने राजाओं की भीड़ इकट्ठी की है।&nbsp;</p>



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<iframe loading="lazy" title="Hindi Drama Video : Damayanti Swayamvar || हिन्दी नाटक : दमयंती स्वयंवर - Part 1" width="726" height="408" src="https://www.youtube.com/embed/zhSsxfnOBf8?start=725&#038;feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" allowfullscreen></iframe>
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<p><strong>नल:</strong> (दमयंती की वाक्‌पटुता से विस्मृत हो कर) हे मधुभाषिणी समुध्यये! तुम बहुत निपुण हो। अंगीकार कराना जानती हो। बोलने में ऐसी स्निग्ध समर्पिता वाक्‌पटुता दिखायी है कि मेरे उत्तर देने के लिए अवकाश ही नहीं रखा। हे मुग्धे! मुझे स्वयं में अपना रहने ही नहीं दिया। मेरी स्वाधीनता की कथा तो अब अस्तमित हो गयी। तुम्हारे वशीकरण शील गुणग्राम से मैं वशीभूत हो गया हूँ। परन्तु इसका ध्यान रखो कि मैं देवताओं के वचन से बँधा हूँ। मेरा निवेदन, मेरी बात सुनो। </p>



<p>जब बड़े-बड़े लोकपाल तुम्हारे प्रणय-संबंध के प्रार्थी हैं, तब तुम मुझ  मनुष्य की आकांक्षा क्यों कर रही हो? उन ऐश्वर्यशाली देवताओं की चरण-रेणु के समान भी तो मैं नहीं हूँ! तुम अपना मन उन्हीं में लगाओ। देवताओं का अप्रिय करने से मनुष्य को घोर विपत्ति झेलनी पड़ती है।मनुष्य की मृत्य तक हो जाती है। तुम मेरे वचन की रक्षा करो और उनका वरण कर लो। </p>



<p><strong>दमयंती:</strong> (घबरा जाती है। दोनों नेत्रों से आँसू झरने लगते हैं। भयभीत होकर कहती है-) नाथ! देवता केवल मेरे प्रणाम के योग्य हैं, वरण करने के योग्य नहीं। आपके प्रश्न का उत्तर नहीं देने से आपका अपमान होगा, इस कारण मैं आपका उत्तर देना चाहती हूँ।&nbsp; मैंने निषधेश्वर नल को बहुत समय से मन से वरण कर लिया है। अतः इन्द्रादि दिक्‌पालों के सन्देश पर मन से विचार भी नहीं करना चाहती, कार्य से उन्हें स्वीकार करना तो दूर की बात है।&nbsp;</p>



<p><strong>नल:</strong> हे पिकवयनी! तुम्हारा देवों से विमुख होना ठीक नहीं है। आयी हुई निधि के लिए किवाड़ बन्द करना कहाँ तक उचित है! देवों के अनुग्रह से तुम देवी बन जाओगी। स्वर्ग अपने यहाँ आश्रय देने के लिए तुम्हें बार-बार मानो हठ से खींच रहा है,किन्तु तुम नहीं चाहती, यह आश्चर्य है। तुम अपना मूर्खतापूर्ण दुराग्रह छोड़ दो मृदुभाषिणी!&nbsp;</p>



<p><strong>दमयंती:</strong>(लम्बी साँस लेती हुई) प्रियवर! आपका सन्देश कर्णकटु एवं मुझ पतिव्रता के लिए अपकीर्तिकारक है, अतः उसे मैं कदापि स्वीकार नहीं करूँगी। मेरे जीवन का एक मात्र आधार होने से मेरे ऊपर आपका पूर्ण प्रभुत्व है। (क्रोध से) मेरे वरमाला से कल स्वयंवर में राजा नल की ही पूजा होगी। यदि देवताओं को मुझ पर अनुग्रह करना है, तो वे प्रसन्न हो नल को ही पति रूप में भिक्षा देकर अपनी कृपा को चरितार्थ करें। राजाधिराज! मेरी दृढ़ प्रतिज्ञा सुन लें! (विलाप करती हुई गिर पड़ती है।) </p>
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		<title>नल दमयंती: प्रारंभ</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 13 Feb 2013 03:09:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नल दमयंती]]></category>
		<category><![CDATA[नाटक]]></category>
		<category><![CDATA[आख्यान]]></category>
		<category><![CDATA[दमयंती स्वयंवर]]></category>
		<category><![CDATA[नल-दमयंती]]></category>
		<category><![CDATA[नाट्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>प्रथम दृश्य (राजमहल का दृश्य। निषध नरेश नल विदर्भ राजकुमारी दमयंती के विवाह के लिए आयोजित स्वयंवर में जाने से पूर्व अपने कुलगुरु से आशीर्वाद...</p>
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<p>अरविन्द जी ने <a href="http://shilpamehta1.blogspot.in/" target="_blank" rel="noreferrer noopener">शिल्पा मेहता जी</a> के एक विशिष्ट आग्रह को पूर्ण करते हुए कुछ दिनों पूर्व नल-दमयंती आख्यान सरलतः <a href="https://blog.ramyantar.com/2013/01/blog-post_15.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">अपने ब्लॉग पर</a> प्रकाशित किया। नल और दमयंती की प्रणय-परिणय कथा मुझे भी आकर्षित किए हुए थी, और इसे नाट्य-रुप में ढालने की उत्कंठा भी बहुत पुरानी थी। अरविन्द जी से आशीर्वाद ले इस आख्यान को नाट्यरूप में प्रस्तुत करने का सहज प्रयास है यह। वस्तुतः यह आख्यान नाट्य-रूप में काफी विस्तार की माँग करता है। कोशिश यह होगी कि आख्यान के मर्मस्पर्शी अंश निश्चिततः विस्तार लें, और शेष सूत्रतः इस आख्यान को आगे बढ़ायें। इस प्रस्तुति की प्रेरणा के लिए अरविन्द जी का आभार। यह प्रविष्टि इस रूप में <a href="http://pankil.ramyantar.com/" target="_blank" rel="noreferrer noopener">बाबूजी</a> के विशिष्ट योग से आ पायी है, मैं सदा नत्‌।</p>







<p style="text-align: justify;">नल दमयंती की यह कहानी अद्भुत है। भारत वर्ष के अनोखे अतीत की पिटारी खोलने पर अमूल्य रत्नों की विशाल राशि विस्मित करती है। इस पिटारी में यह कथा-संयोग ऐसा ही राग का एक अनमोल चमकता मोती है। भाव-विभाव और संचारी भाव ऐसे नाच उठे हैं कि अद्भुत रस की निष्पत्ति हो गयी है। निषध राजकुमार नल और विदर्भ राजकुमारी दमयंती के मिलन-परिणय की अद्भुत कथा है यह। रुदन, हास, मिलन, विछोह के मनके इस तरह संयुक्त हो उठे हैं इस कहानी में कि नल दमयंती मिलन की एक मनोहारी माला बन गयी है- अनोखी सुगंध से भरपूर। नल दमयंती की यह कथा नाट्य-रूप में संक्षिप्ततः प्रस्तुत है। दृश्य-परिवर्तन के क्रम में कुछ घटनायें तीव्रता से घटित होती दिखेंगी (नेपथ्य में)। इसका कारण नाट्य के अत्यधिक विस्तृत  हो जाने का भय है, और शायद मेरी लेखनी की सीमा भी। प्रस्तुत है पहली कड़ी।</p>





<h3 class="has-text-align-center wp-block-heading"><span style="text-decoration: underline" class="underline">प्रथम दृश्य </span></h3>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(राजमहल का दृश्य। निषध नरेश नल विदर्भ राजकुमारी दमयंती के विवाह के लिए आयोजित स्वयंवर में जाने से पूर्व अपने कुलगुरु से आशीर्वाद के लिए प्रस्तुत होते हैं। कुलगुरु को प्रणाम करते हैं।)</p>



<p><strong>कुलगुरु:</strong> कल्याण हो राजन्‌! हे प्रजापालक! जो राजा, गुरु एवं श्रेष्ठजनों को आदर-सम्मान करता है, समकक्षी राजाओं को यथोचित स्थान देता है और प्रजा को पुत्रवत स्नेह करता है, उसका राज सदा ही निष्कंटक और चिरस्थायी होता है।</p>



<p><strong>नल:</strong> आशीष दें कुलगुरु! आपके आशीर्वचनों का अक्षरशः पालन कर सकूँ और मेरे मन मन्दिर में ले रही कल्पना की मूर्ति चिरस्थायी हो सके।</p>



<p><strong>कुलगुरु:</strong> जाओ राजन्‌! तुम्हारा मनोरथ निश्चय ही पूर्ण होगा। स्वयंवर में उपस्थित राजा-राजकुमार तुम्हारे तेज से वैसे ही प्रतिहत हो जायेंगे जैसे कि सूर्य की तेजोमय रश्मियों से तारे। विजयी भवः राजन! विजयी भव:।</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(नल प्रणाम करता है। पर्दा गिरता है।)</p>



<hr class="wp-block-separator has-text-color has-luminous-vivid-orange-color has-alpha-channel-opacity has-luminous-vivid-orange-background-color has-background is-style-wide"/>



<h3 class="has-text-align-center wp-block-heading"><span style="text-decoration: underline" class="underline">द्वितीय दृश्य</span></h3>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(पर्दा उठता है। इन्द्र, अग्नि, वरुण, यम राजा नल से मिलने जा रहे हैं)</p>



<p><strong>इन्द्र:</strong> देव! हम पहुँच गए! मुझे निषध नरेश नल की ही प्रतीति हो रही है जो सकल लोक हृदयानन्द त्रिभुवन विलोचन है। रमणीयता को भी दुगुनी रमणीयता प्रदान करने वाले और नवयौवन सागर का अमृत रस स्वरूप हैं वह।&nbsp;</p>



<p><strong>वरुण:</strong> हाँ देव! लग रहा है पुण्डरीकाक्ष नारायण ही, नल का रूप धारण कर लिए हैं। यह अमानुषी आकृति प्रणाम के योग्य है, यह भीम सुता को सनाथ करता हुआ प्रतीत हो रहा है।&nbsp;</p>



<p><strong>अग्नि:</strong> सत्य ही वरुण देव! लगता है इस महीपति के हृदय में धर्म का, अनुग्रह में कुबेर का, नेत्र में लक्ष्मी का और वाणी में वीणावादिनी का सत्व रच बस गया है। बुद्धि में वृहस्पति, तेज में भाष्कर तथा सौन्दर्य में मनसिज की निवास भूमि होने से यह सर्वदेवमय प्रकटित नल रूप ही है जो दमयंती स्वयंवर को सुशोभित करेगा।&nbsp;</p>



<p><strong>यम: </strong>हाँ, अग्निदेव! मुझे पूर्ण विदित है कि महाराज नल का राजभवन श्रेष्ठ मित्रों, राजपुरुषों से सदा सुशोभित रहता है। यज्ञ-यज्ञादि धर्म कार्य से सम्पूर्ण प्रजा सुयश और सम्मान का भाजन बनती है। अभ्यागतों का आदर सम्मान करने वाला यह महापुरुष अत्योत्तम है।</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(देवताओं का आगमन। नल सबको प्रणाम करते हैं।)</p>



<p><strong>वरुण:</strong> राजेन्द्र नल! आप बड़े सत्यव्रती हैं। हम लोग याचक होकर आपके पास आये हैं। आपसे अपने कार्य की सम्पन्नता के लिए आग्रह करते हैं। आप वचन दीजिए कि हमारा मनोरथ सिद्ध करेंगे।</p>



<p><strong>नल:</strong> कोई भी याचना करे और नल उसे पूरा न करे, ऐसा कभी संभव नहीं हो सकता। मैं आपका कार्य अवश्य करूँगा, ऐसी प्रतिज्ञा करता हूँ। किन्तु पहले आप अपना परिचय देने की कृपा तो करें। आप लोग कौन हैं?&nbsp;</p>



<p><strong>इन्द्र:</strong> महाराज नल! हम देवता हैं, मैं इन्द्र हूँ, ये अग्नि हैं, आप वरुण हैं और आप यम। आप हमारा दूत-कर्म कर दें। दमयंती के पास जाकर यह निवेदन कर दें कि इन्द्र, वरुण, अग्नि और यम देवता तुमसे परिणय करना चाहते हैं।&nbsp;</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-1536x864.webp 1536w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti.webp 1920w" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="576" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-1024x576.jpg?x47177" alt="Raja_Ravi_Varma,_Damayanthi" class="wp-image-4324" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-1024x576.jpg 1024w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-300x169.jpg 300w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-768x432.jpg 768w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-1536x864.jpg 1536w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-409x230.jpg 409w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti.jpg 1920w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></picture></figure>



<p><strong>नल:</strong>(दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए) देवराज! जिस दमयंती का वरण करने मैं जा रहा हूँ उसी का दूतकर्म भला कैसे करूँगा? ऐसे सर्वज्ञ, विश्वपूज्य आप लोगों को मुझ तुच्छ को ठगने में क्या दया नहीं आयी? खेद है! बड़े लोगों को तो पहले, उचित है कि वे किसी को ठगने का विचार ही न करें और यदि करें भी तो उन्हें बड़े लोगों को ही ठगना चाहिए। मनुष्य होने से देवताओं की अपेक्षा अत्यन्त तुच्छ, मुझे ठगने में तो आप जैसे देवताओं को दया होनी चाहिए। ऐसा तुच्छ काम भला मैं क्यों करूँ? आपलोग कृपया इस विषय में मुझे क्षमा ही करें। मुझे दूत बनाकर वहाँ भेजने से आपलोगों का कार्य सिद्ध होना तो दूर रहा, पहले ही सबको विदित होने से बिगड़ जाएगा।&nbsp;</p>



<p><strong>वरुण:</strong> नल! तुम क्षत्रिय हो और कदाचित तुम्हें स्मरण होगा कि क्षत्रिय वचन पालन हेतु प्राणोत्सर्ग करने में भी किंचित मात्र नहीं हिचकिचाते, अतः नल! अपने कुल और क्षत्रिय धर्म की रक्षा हेतु दिए गए वचन को पूर्ण करो और अविलम्ब प्रस्थान करो।&nbsp;</p>



<p><strong>नल:</strong> दमयंती के लिए जिस प्रकार आपलोगों ने मुझसे याचना की है, उसी प्रकार मैं एक साधारण मानव होकर श्रेष्ठ देवाधिपति आपलोगों से भीम कुमारी दमयंती की याचना करता हूँ। कुण्डिल पुराधीश की कन्या ने तो पहले से ही मुझे वरण कर लिया है, ऐसा निश्चित है। अतः सहसा मुझे देखने पर वह सात्विक भावों के उदय होने से लज्जित हो जाएगी और निश्चय है कि आप लोगों का वरण नहीं करेगी। वह आपलोगों के वरण का प्रस्ताव भी नहीं सुनना चाहेगी। अतः उसके लिए आपलोगों की इच्छा करना व्यर्थ ही है। इस कारण आपलोग मेरे ऊपर प्रसन्न हों क्योंकि यह मेरे लिए अत्यन्त अनुचित है।&nbsp;</p>



<p><strong>इन्द्र:</strong> हे नल! तुम चन्द्रमा के समान अपने निर्मल यश को क्यों छोड़ रहे हो? याचना पूरा करने के लिए आग्रह स्वीकार करके फिर उसे पूरा न करना तुम्हारे जैसे व्यक्ति के लिए कलंक है। तुम्हें हम लोगों के प्रति ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। तुमने अब तक किसी भी याचना करने वाले को ’नहीं’ नहीं कहा। अतः अब भी हम लोगों को ’नहीं’ मत कहो। याचना करने पर धीर दाता कहाँ विलम्ब करता है राजन! किसी व्यक्ति के क्षण मात्र भी जीने की ज़िम्मेदारी कोई नहीं उठा सकता। हम जैसे सतपालों को पहले देने को कह कर फिर निराश करने पर तुम्हें बड़ा कलंक तथा दोष लगेगा। अपनी कुल-मर्यादा क्यों छोड़ रहे हो, राजन!</p>



<figure class="wp-block-embed is-type-video is-provider-youtube wp-block-embed-youtube wp-embed-aspect-16-9 wp-has-aspect-ratio"><div class="wp-block-embed__wrapper">
<iframe loading="lazy" title="Hindi Drama Video : Damayanti Swayamvar || हिन्दी नाटक : दमयंती स्वयंवर - Part 1" width="726" height="408" src="https://www.youtube.com/embed/zhSsxfnOBf8?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" allowfullscreen></iframe>
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<p><strong>नल:</strong> (कुछ सोचते हुए) देव! आपलोग हमें वचन में बाँधकर निज कार्य सिद्धि के लिए विवश कर रहे हैं। मैं कृतप्रतिज्ञ हूँ। अतः जो आपकी अभिलाषा है, उसे अवश्य पूरा करूँगा। परंतु यह तो बताईये कि राजमहल में निरंतर कड़ा पहरा रहता है, मैं कैसे जा सकूँगा?&nbsp;</p>



<p><strong>इन्द्र:</strong> तुम्हें अभी भी हिचकिचाहट है राजन! देव दाता हैं। दूसरे लोग हमसे अभीष्ठ वर की याचना करते हैं। ऐसे हम तुमसे याचना कर रहे हैं, यह आश्चर्य है। हे दानवीर! तुम केवल हम लोगों के मनोरथ ही पूर्ण मत करो, इन्द्रादि दिगपाल तुम्हारे यहाँ याचक बने, ऐसे अपने यश से सारी दिशाओं को पूर्ण कर दो। तुम्हारी कीर्ति चमक उठेगी। अतः तुम्हें ऐसा अवसर नहीं चूकना चाहिए। लाभ हानि सोच लो। रही बात, तुम्हारे अन्तःपुर में प्रवेश करने की। हम आशीर्वाद देते हैं कि तुम राजमहल में बेरोक-टोक अदृश्य रुप में प्रवेश कर जाओगे और राजबाला दमयंती से अबाध रूप से मिल पाओगे। हम लोग राजद्वार के बाहर उत्सुकतापूर्वक तुम्हारी प्रतीक्षा करेंगे। शुभं भवतु।&nbsp;</p>



<p><strong>नल:</strong> हे सुरवरों! हमारा प्रणाम स्वीकार करें। नल आपके मनोरथ की पूर्ति के लिए राजा भीम के अन्तःपुर में प्रविष्ट होने जा रहा है। (नल प्रवृत्त होता है। देवताओं का प्रस्थान।)</p>



<p><strong>नल: </strong>(आँखों में आँसू भरकर आकाश में निहारते हुए) नल के जीने को धिक्कार है। हाथ में आयी हुई पारसमणि को ठोकर मारने पर विवश हो रहा है। हे देव दुर्लभ सुन्दरी राजकन्ये! ज्वाला को स्तंभित करने के लिए कूद पड़ते हैं काले-काले पतंगे,किन्तु वे जल्द ही पंखहीन बनकर राख हो जाते हैं। तब भी ज्वाला अक्षुण्ण ही रहती है। चाहे जो हो, हे आनन्द निकेतन! तुम्हारे यश की दीपशिखा अम्लान जलती रहे। मनुष्य तो सदा से ही परिस्थितियों का दास रहा है नल! चलो, अब अपनी राह पकड़ो!</p>
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		<title>सावित्री: यम-सावित्री संवाद</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 12 Jan 2013 22:46:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नाटक]]></category>
		<category><![CDATA[सावित्री]]></category>
		<category><![CDATA[नाट्य]]></category>
		<category><![CDATA[पौराणिक कहानियाँ]]></category>
		<category><![CDATA[महान व्यक्तित्व]]></category>
		<category><![CDATA[मिथक]]></category>
		<category><![CDATA[सती सावित्री]]></category>
		<category><![CDATA[सत्यवान]]></category>
		<category><![CDATA[स्वयंवर]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>यम-सावित्री संवाद: पंचम दृश्य (जंगल का दृश्य। सत्यवान के हाथ में कुल्हाड़ी, कन्धे पर गमछा, सावित्री के हाथ में टोकरी और पानी का बर्तन) सत्यवान:...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[


<p style="text-align: justify;">सती सावित्री का यह विशिष्ट चरित्र कालजयी है। नारी की अटूट व दृढ़ सामर्थ्य का अप्रतिम उदाहरण है। प्रस्तुत नाट्य प्रवि<picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2013/01/savitri7.webp" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-158 alignright" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2013/01/savitri7.jpg?x47177" alt="सावित्री-सत्यवान " width="196" height="165" /></picture>ष्टि वस्तुतः नारी की महानता का आदर है, सहज स्वीकार है। इस प्रविष्टि में सत्यवान के प्राण लेकर यमराज प्रस्थान करना चाह रहे हैं। सावित्री अत्यन्त दुःख में है, पर विवेकवान है, प्रज्ञावान है। वह यमराज के साथ हो लेती है, यम विचलित हो उठते हैं। यम-सावित्री संवाद का अनूप प्रभाव प्रकट करती है यह प्रविष्टि। <a href="https://blog.ramyantar.com/2012/12/blog-post.html">सावित्री-1</a>, <a href="https://blog.ramyantar.com/2012/12/2.html">सावित्री-2</a>, <a href="https://blog.ramyantar.com/2012/12/3.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">सावित्री-3</a>, <a href="https://blog.ramyantar.com/2012/12/4.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">सावित्री-4</a> एवं <a href="https://blog.ramyantar.com/2013/01/savitri5.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">सावित्री-5</a> से आगे।</p>





<h3 class="has-text-align-center wp-block-heading">यम-सावित्री संवाद: पंचम दृश्य</h3>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(जंगल का दृश्य। सत्यवान के हाथ में कुल्हाड़ी, कन्धे पर गमछा, सावित्री के हाथ में टोकरी और पानी का बर्तन)</p>



<p><strong>सत्यवान:</strong> सुखदायिनी! टोकरियों में पहले फल भर लिया जाय, फिर समिधा काटता हूँ। <em>(वृक्ष पर चढ़ता है और लकड़ियाँ काट के गिराने लगता है।)</em></p>



<p><strong>सावित्री:</strong> जीवनधन! आप के सभी अभिशापों का अवसान हो, आपके शरीर से स्वेद बह रहा है। अच्युत आपके सभी परितापों को हिमस्नात कमलिनी मुस्कान बना दें। आप इस निसर्ग धरा पर अमृत पीकर निर्भय हो जाँय।</p>



<div id="attachment_157" style="width: 214px" class="wp-caption alignright"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2013/01/savitri-satyavan.webp" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-157" class="wp-image-157" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2013/01/savitri-satyavan.jpg?x47177" alt="चित्र:अर्द्धेन्दु बनर्जी; स्रोत:Kamat’s Potpourri" width="204" height="132" /></picture><p id="caption-attachment-157" class="wp-caption-text">चित्र:अर्द्धेन्दु बनर्जी; स्रोत:Kamat’s Potpourri</p></div>
<p><strong>सत्यवान: </strong>(सिर सहलाते हुए) प्रिये! आज परिश्रम के कारण मेरे सिर में दर्द होने लगा है। सारा शरीर टूट रहा है। कलेजे में भी बड़ी पीड़ा है। इस समय मैं अपने आप को अस्वस्थ सा पा रहा हूँ। ऐसा जान पड़ता है कि अब तो खड़े रहने की भी शक्ति नहीं रह गयी है। कल्याणी! अब मैं सोना चाहता हूँ।</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(सावित्री सत्यवान को संभालती है और सत्यवान धरा पर सो जाते हैं। सावित्री पानी लाती है, पानी के छींटे मारती है। सहसा अत्यन्त तेजस्वी पुरुष दिखायी देता है। वह सूर्य-सा तेजस्वी है। लाल वस्त्र पहने हुए है, शरीर का रंग साँवला है, हाथ में गदा और पाश है, स्वरूप भयानक है। सत्यवान के पास खड़ा हो वह उसी को देख रहा है।)</p>



<p><strong>सावित्री:</strong>(उस दिव्य पुरुष को देख खड़ी हो जाती है) प्रणाम महापुरुष! आप कोई देवता जान पड़ते हैं, क्योंकि आपका शरीर मनुष्य-सा नहीं है ।</p>



<p><strong>यमराज</strong>: देवि! मैं और कोई नहीं, साक्षात मृत्यु का देवता यमराज हूँ। तुम पतिव्रता और तपस्विनी हो, अतः मैं तुमसे वार्ता कर सकता हूँ। तुम्हारे पति की आयु समाप्त हो चुकी है। अब मैं बहुत विलम्ब नहीं कर सकता, मैं इसे लेने आया हूँ। </p>



<p><strong>सावित्री:</strong> हे देवाधिदेव! मैंने तो सुना है कि जीवों को लेने के लिए आप के दूत आते हैं। आप स्वयं कैसे पधारे हैं?</p>



<p><strong>यमराज:</strong> सत्यवान परम धर्मात्मा है। यह दूतों द्वारा ले जाने योग्य नहीं है।&nbsp;</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(इतना कहकर अँगूठे के आकार वाला जीव कलेजे से निकाल लेते हैं और उसे पाश में बाँधकर दक्षिण दिशा की ओर चल देते हैं। दुःख से आतुर सावित्री यमराज के पीछे चल पड़ती है।)</p>



<figure class="wp-block-embed is-type-video is-provider-youtube wp-block-embed-youtube wp-embed-aspect-4-3 wp-has-aspect-ratio"><div class="wp-block-embed__wrapper">
<iframe loading="lazy" title="हिन्दी नाटक : सावित्री ॥ Hindi Play : Savitri - Part-6" width="726" height="545" src="https://www.youtube.com/embed/kkgw3ALRW_4?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" allowfullscreen></iframe>
</div></figure>



<p><strong>यमराज:</strong> सावित्री! तू कहाँ! अरे तू लौट। अब जा, इसका दाह संस्कार कर। पति सेवा के ऋण से मुक्त हो चुकी है और पति के पीछे-पीछे जहाँ तक आना चाहिए, आ चुकी है।</p>



<p><strong>सावित्री:</strong> भगवन! जहाँ मेरे पतिदेव जायें, वहाँ मुझे भी जाना चाहिए। आपकी दया से मेरी गति कुंठित नहीं हो सकती। नारी के लिए पति का अनुसरण ही सनातन धर्म है। आप तो जानते हैं यह लोक विश्रुति है कि<a href="http://wordsofwisdom.in/subhashitani/2010/05/14/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A4%BE-%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A4%95-%E0%A4%AD%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%83%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5%E0%A4%BE-%E0%A4%B9/" target="_blank" rel="noreferrer noopener"> <strong>&#8220;भर्तृनाथा हि नार्यः&#8221;</strong></a>।</p>



<p><strong>यमराज:</strong> सावित्री! तेरी धर्मानुकूल युक्ति-युक्त बातें सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हो रही है। सहज पुरुष हृदय में कोमलता कैसे आ गयी? मैं जानता हूँ कि तू सविता की तपस्या से प्राप्त की गयी है। अतः मैं द्रवित होकर तुम्हें एक वर देना चाहता हूँ। सत्यवान के अलावा कोई एक वर माँग ले।</p>



<p><strong>सावित्री:</strong> देव! मेरे श्वसुर के नेत्र की ज्योति नष्ट हो गयी है, अतः वह ज्योति उनको पुनः प्राप्त हो और वे बलवान तथा तेजस्वी हो जायें।</p>



<p><strong>यमराज:</strong> तथास्तु! अब तू लौट जा सुकुमारी। थक जायेगी।</p>



<p><strong>सावित्री</strong>: पति के समीप रहते हुए मुझे किसी प्रकार की थकावट नहीं हो सकती। प्राणनाथ के अतिरिक्त मेरा और कौन आश्रय है! उन्हें छोड़कर क्या पतिव्रता की कोई और गति होगी। मैं उनके साथ ही चलूँगी। पति का संग और सत्पुरुष का संग, मुझे इस युगल लाभ से वंचित न करें देव!</p>



<p><strong>यमराज:</strong> सावित्री! तुम्हारी बातें इतनी धर्मप्रिय और सत्य सार हैं कि मैं इसे परम-प्रिय और हितकर स्वीकार कर रहा हूँ। एक नारी गृहप्रपंच से जकड़ी होकर भी, इतने उन्नत भाव में स्नात हो, यह तो दुर्लभ है। मैं तुम्हें देखकर बार बार यह चाहता हूँ कि सत्यवान को छोड़कर&nbsp; कोई दूसरा वर माँगो।</p>



<p><strong>सावित्री: </strong>प्रभु! मेरे श्वसुर का खोया हुआ राज्य उन्हें फिर उपलब्ध हो जाये और वे राजमद में ग्रसित होकर कभी धर्म पथ से विचलित न हो।</p>



<p><strong>यमराज:</strong> चलो, दे दिया! अब तो तू लौट जा।</p>



<p> (सावित्री पीछे-पीछे लगी है। वस्त्र विश्रृंखलित है, केशराशि कटि तक बिखर गयी है।)</p>



<div id="attachment_159" style="width: 213px" class="wp-caption alignright"><a href="https://blog.ramyantar.com/2013/01/6.html/yamaandsavatiri-jpg"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2013/01/yamaandsavatiri.webp 217w" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-159" class="wp-image-159 size-medium" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2013/01/yamaandsavatiri-203x300.jpg?x47177" alt="यम एवं सावित्री: चित्र-नन्दलाल बोस" width="203" height="300" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2013/01/yamaandsavatiri-203x300.jpg 203w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2013/01/yamaandsavatiri.jpg 217w" sizes="auto, (max-width: 203px) 100vw, 203px" /></picture></a><p id="caption-attachment-159" class="wp-caption-text">यम एवं सावित्री: चित्र-नन्दलाल बोस</p></div>
<p><strong>सावित्री:</strong> देव आप सारी प्रजा का नियमन करने वाले हैं। अतः आपका यम नाम पड़ा। हे श्रेष्ठ! मैंने यह भी सुना है कि मन, वचन और क्रिया द्वारा किसी भी प्राणी का प्रतिद्रोह न कर के, सब पर समान रूप से दया करना और दान देना ही महापुरुषों का सनातन धर्म है। यूँ तो संसार के सभी पुरुष यथाशक्ति कोमलता का आश्रय ग्रहण करते हैं किन्तु महापुरुष तो महापुरुष होता है। वह तो अपने पास आये शत्रु पर भी दया करता है।</p>
<p><strong>यमराज:</strong> कल्याणी! जैसे क्षुधित को अन्न मिले, त्रिषित को जल मिले और चिर रोगी को अमृत समान औषधि मिल जाय, वैसे ही तुम्हारे धर्मानुकूल वचनों को सुनकर मुझे खुशी-खुशी सत्यवान के जीवन को छोड़कर कोई तीसरा जो भी वर माँगो स्वीकार है।</p>



<p><strong>सावित्री:</strong> देव! आप धर्मराज हैं, आप दाता हैं और मैं दया की पात्रा हूँ। मेरे पिता अश्वपति को कोई पुत्र नहीं है, उन्हें भी औरस पुत्र देने की कृपा करें।</p>



<p><strong>यमराज:</strong> मुझे बरबस कोई तुम्हारी हाँ में हाँ मिलाने को प्रेरित कर रहा हूँ। चलो! यह भी दे दिया। हे नारी रत्न! मेरी बात मान लो। बहुत दूर आ गयी हो। आगे का मार्ग किसी मानव के लिए असम्भव है। अब तो लौट जा।</p>



<p><strong>सावित्री: </strong>महाराज! मेरी एक-दो बातें और सुन लीजिए। एक तो मैं पति के समीप हूँ, अतः दूरी का तो कोई नाम ही नहीं और न मुझे उसका अनुभव हो रहा है। दूसरी बात आप विवस्वान सूर्य के पुत्र हैं और वैवष्वत्‌ कहलाते हैं। सब पर समान न्याय करने वाले होते हैं। आप तो सज्जन शिरोमणि हैं, आप कृपा के जलधर हैं, करुणा के सागर हैं। और क्या इसमें भी दो राय है कि संतों के साथ सात कदम चल ही दिया जाय तो मित्रता हो जाती है- <em><strong>&#8220;सतां हि सप्तपदेशु मैत्री&#8221;</strong></em>। अतः आप मेरे परम सुहृद भी हुए। आप सन्त हैं, कृपालु हैं, सुहृद हैं, न्यायी हैं, धर्मराज हैं इसलिए आप पर विश्वास करके आप से कुछ कहने का साहस करती हूँ।</p>



<p><strong>यमराज:</strong> तूने जो बातें कहीं, वैसी आज तक मैंने किसी के मुँह से नहीं सुनी। अतः मेरी प्रसन्नता और बढ़ गयी है। अब तो सत्यवान के अतिरिक्त कोई चौथा वर भी माँग ले।</p>



<p><strong>सावित्री:</strong> हे परमात्मन्! मुझे भी कुल की वृद्धि करने वाले सौ औरस पुत्रों की जननी होने का सौभाग्य प्रदान करें। वे सभी बलवान और पराक्रमी हों।</p>



<p><strong>यमराज:</strong> तेरी यह अभिलाषा भी पूर्ण हो। मेरी प्रिय बालिके अब तो तू लौट जा।</p>



<p><strong>सावित्री:</strong> हे परम सुहृद परमात्मा! सद्पुरुषों का मन सदा धर्म में ही लगा रहता है और सद्पुरुषों के संग की गई चर्चा कभी व्यर्थ नहीं जाती। संतो से किसी को भय नहीं लगता। सद्पुरुष तो अपने बल से सूर्य को भी समीप बुला लेते हैं। आप तो सनातन सदाचार के प्रणेता हैं। भूत-भविष्य के आधार हैं। अपने प्रभाव से आपने धरती को धारण किया है। आप जैसे केवल आप ही हैं।&nbsp;</p>



<p><strong>यमराज:</strong> सावित्री! मैं परम प्रसन्न हूँ। तुम्हारी बातें ज्यों-ज्यों सुनता हूँ, त्यों-त्यों मेरी श्रद्धा बढ़ती जाती है। मन उमग रहा है। माँग ले कोई और वर।</p>



<p><strong>सावित्री:</strong> भगवन! अब तो आप सत्यवान के जीवन का ही वरदान दे दीजिए! इससे आपके सत्य और धर्म दोनों की रक्षा होगी। मेरा सौभाग्य बढ़ेगा और आप का सुयश बढ़ेगा। आपने मुझे सौ पुत्रों का वर दिया है, बिना पति के पुत्र की संभावना कैसे होगी देव?</p>



<p>(यमराज सिर पर हाथ रख लेते हैं। कुछ देर के लिए मौन हो जाते हैं और फिर हाथ वरद मुद्रा में उठा बोल पड़ते हैं-)</p>



<div id="attachment_160" style="width: 166px" class="wp-caption alignright"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2013/01/savitri-satyavan-yama-story.webp" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-160" class="wp-image-160 size-full" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2013/01/savitri-satyavan-yama-story.jpg?x47177" alt="सावित्री द्वारा यमराज से सत्यवान के प्राण का वरदान" width="156" height="256" /></picture><p id="caption-attachment-160" class="wp-caption-text">सावित्री-यमराज</p></div>
<p><strong>यमराज:</strong> देवि! यह मेरी तीसरी पराजय है। एक बारा हारा था ऋषि पुत्र मारकण्डेय से और उसे अमरत्व का वरदान मिला। दूसरी बार हारा ऋषि-पुत्र नचिकेता से, वह मेरी यमपुरी से अमरत्व का ज्ञान लेकर चिरंजीवी हो लौटा। और तीसरी बार हारा नारी सावित्री से। मेरे पास से तुमने अपने पति को प्रेम से छीन लिया है। मैं हारा हूँ लेकिन प्रसन्नता से, खेद से नहीं। नियम में बँधा हुआ आज नियम तोड़ दे रहा है। वचनबद्ध यमराज तुम्हें तुम्हारा पति दे रहा है। जा! सावित्री नाम को पतिव्रता की रेखा में सबसे ऊँची कर दे। आज की तिथि से तुम्हारे पति को चार सौ वर्षों की आयु दे रहा हूँ। <em><strong>पुत्रि पवित्र किये कुल दोऊ</strong></em>&#8211; अपने पिता और अपने पति दोनों को सनाथ कर देने वाली सावित्री तुम्हारी जय हो!</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(सावित्री की आँखें बन्द हैं। दोनों नेत्रों से प्रसन्नता के आँसू टपक रहे हैं।)</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(पर्दा गिरता है)&nbsp;</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color"><strong>&#8212;समाप्त&#8212;</strong></p>
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		<title>सावित्री: सत्यवान का वन-गमन</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 02 Jan 2013 18:00:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नाटक]]></category>
		<category><![CDATA[सावित्री]]></category>
		<category><![CDATA[नाट्य]]></category>
		<category><![CDATA[पौराणिक कहानियाँ]]></category>
		<category><![CDATA[महान व्यक्तित्व]]></category>
		<category><![CDATA[मिथक]]></category>
		<category><![CDATA[सती सावित्री]]></category>
		<category><![CDATA[सत्यवान]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>सत्यवान का वन-गमन (महाराजा द्युमत्सेन की पवित्र स्थलीय आश्रम जैसी व्यवस्था। सावित्री पति के साथ सुख पूर्वक निवास करती है। आभूषण उतार कर रख देती...</p>
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<div class="wp-block-image">
<figure class="alignright"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2013/01/savitri1_7.webp" type="image/webp" /><img decoding="async" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2013/01/savitri1_7.jpg?x47177" alt=""/></picture></figure>
</div>


<p>चारित्रिक औदात्य एवं समृद्धि के पर्याय ऐसे अनेकों चरित्र भारतीय मनीषा की अशेष धरोहर हैं जिन्होंने अपनी प्रज्ञा, अपनी महनीयता एवं अनुकरणीय विशेषताओं से इस देश व सम्पूर्ण विश्व को चकित किया । ऐसा ही अनोखा नाम है सती सावित्री। सावित्री का यह विशिष्ट चरित्र कालजयी है। नारी की अटूट व दृढ़ सामर्थ्य का अप्रतिम उदाहरण है। प्रस्तुत नाट्य प्रविष्टि वस्तुतः नारी की महानता का आदर है, सहज स्वीकार है। इस प्रविष्टि में सावित्री सत्यवान के वन-गमन से विचलित है। उसे बार-बार सत्यवान के अंतिम दिवस का स्मरण हो रहा है। वह सत्यवान की अकाल-मृत्यु की भविष्यवाणी के सत्य होने की आशंका से विचलित है एवं अत्यन्त क्लान्त अनुभव कर रही है। <a href="https://blog.ramyantar.com/2012/12/blog-post.html">सावित्री-1</a>, <a href="https://blog.ramyantar.com/2012/12/2.html">सावित्री-2</a>, <a href="https://blog.ramyantar.com/2012/12/3.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">सावित्री-3</a> एवं <a href="https://blog.ramyantar.com/2012/12/4.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">सावित्री-4</a> से आगे। </p>





<h3 class="has-text-align-center wp-block-heading">सत्यवान का वन-गमन</h3>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(महाराजा द्युमत्सेन की पवित्र स्थलीय आश्रम जैसी व्यवस्था। सावित्री पति के साथ सुख पूर्वक निवास करती है। आभूषण उतार कर रख देती है और गैरिक वसना हो जाती है। पति सास-ससुर की सेवा कर उन्हें प्रसन्न रखती है।  इस प्रकार वह अभाव में भी भाव  का सृजन कर स्वयं संतुष्ट रहती और पूजनीयों को भी संतुष्ट और सुखी रखती। सावित्री उस निर्जन को भी अपनी उपस्थिति से नंदन-वन बना देती है।)</p>



<p><strong>सत्यवान:</strong> (एकान्त विश्राम स्थल में) हे मेरी चिरकाम्या! तुम नहीं होती तो यहाँ पर कौन मुझको खोजता! भरी भरी यह नर्म हथेली चिर अमरता का आश्वासन कहाँ से दे पाती। तुम्हारे इस दर्शन से मेरे ऊपर सकल चराचर की ममता उमड़ आयी है। तुम्हारे सानिध्य में मैं अकिंचन अनन्त निःसीम हो गया हूँ।</p>



<p><strong>सावित्री:</strong> हे मेरे हृदयेश्वर! तुम ही मेरे प्राणों की सर्व स्वहारिणी पुकार &nbsp;हो। कोई यह नवीन संयोग नहीं है। विश्वास करो प्रिय! रात की निस्तब्धता को चीर कर कोई अनजाना स्वर गूँज उठता था। वह तुम्हारा स्वर ही तो था। शैया पर छितरी अलस मेरी लटों को यदि कोई स्पर्श किया होता तो मैं भूल से भी यह नहीं सोचती &nbsp;कि ढीठ सपने उनींदी पलकें चूमने आये हैं। यह तुम्हीं तो आते थे। गवाक्ष की अर्गला पार कर कोई पद्मगंध पास आती तो मैं भरम नहीं जाती थी कि सलोनी चाँदनी गदरा गयी है। स्वरों के पीछे छिपे पदचाप, सिहरनों के पार की अंगुलियों के स्पर्श में तुम्हीं तो नित्य आते थे हमारे पास तक।</p>



<p><strong><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2013/01/savitri1.webp" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" class="alignright" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2013/01/savitri1.jpg?x47177" width="215" height="220" border="0" /></picture>सत्यवान: </strong>वरानने! तुमने मेरी श्वासों में इतना ज्वार भर दिया है कि इस जीर्ण-शीर्ण कन्था में, मोती ही समा नहीं रहा। मेरे भग्न सितार के तार-तार को तुमने कस कर जन्म-जन्म के बिसरे गीत को जगा दिया है। मनसिज और मनसिज दहन शंकर की चिर गोपन लीला का भेद आज समझ में आ गया है।  हे मेरी तापसी प्रिये! मैं तुम्हें तन-मन-प्राण-आत्मा के सारे ही धरातलों पर प्रेम में, वासना में, पावन में, अपावन में, नाश में, सृजन में, अपने समस्त में आज मैं तुमको समस्त ही पा गया। तुम्हारी बाहों के ममतामय बन्धन में असीम और अनन्त समा गया है, चाहे वह कहीं हो।</p>



<p><strong>सावित्री:</strong> रात्रि काफी बीत चुकी है। अब शयन करें। आपके श्री चरणों को प्रणाम करती हूँ।</p>



<p>(सत्यवान शयन के लिए जाते हैं। सावित्री को नारद की बात भूलती नहीं। वह चिन्तित होकर मौन आकाश की ओर देखती है।)</p>



<p><strong>सावित्री</strong>: (स्वगत) अब तो प्राणनाथ के जीवन का एक ही दिन शेष रह गया है। वज्र हृदय! कल का दिन मेरी अग्निपरीक्षा का दिन होगा। सूर्योदय होने में बस एक प्रहर ही बाकी है। (आँखें हथेलियों से ढक कर फफक कर रो पड़ती है, फिर बेसुध हो जाती है।)</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(सत्यवान का प्रवेश। सावित्री को बेसुध देख कर जगाता है।)</p>



<p><strong>सत्यवान:</strong>&nbsp;प्रिये! (चौंक कर सावित्री जगती है) क्या बात है प्रिये! तुम्हारा जी कुछ अनमना-सा लग रहा है। जाओ, थोड़ा विश्राम कर लो, मैं समिधा चुनने जा रहा हूँ।</p>



<p><strong>सावित्री:</strong>&nbsp;नहीं &nbsp;नाथ! आज आप अकेले न जाँय। मैं भी आपके साथ चलूँगी।</p>



<figure class="wp-block-embed is-type-video is-provider-youtube wp-block-embed-youtube wp-embed-aspect-4-3 wp-has-aspect-ratio"><div class="wp-block-embed__wrapper">
<iframe loading="lazy" title="हिन्दी नाटक : सावित्री ॥ Hindi Play : Savitri - Part-5" width="726" height="545" src="https://www.youtube.com/embed/wxLAVJUO22Y?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" allowfullscreen></iframe>
</div><figcaption class="wp-element-caption"><a href="https://youtu.be/wxLAVJUO22Y" target="_blank" rel="noreferrer noopener">सावित्री नाटक का मंचन: रम्यांतर यूट्यूब चैनल</a></figcaption></figure>



<p><strong>सत्यवान:</strong>&nbsp;प्रिये! वन का रास्ता बहुत कठिन है। तुम वन में पहले कभी नहीं गयी हो और इधर व्रत और उपवास ने तुम्हें दुर्बल बना दिया है। तुम पैदल न चल सकोगी।</p>



<p><strong>सावित्री:</strong>&nbsp;उपवास से मुझे कोई कष्ट और थकावट नहीं है। चलने के लिए &nbsp;मन में उत्साह है इसलिए रोकिए मत। मध्याह्न की अलस बेला में जब उदासी कुंज-कुंज फेरा डालेगी तो मैं तुम्हारी स्वर लहरी में स्वर मिलाकर शून्यता को बाँसुरी बना दूँगी। दिवा-रात्रि में तुम्हारा साथ नहीं छोड़ूँगी, नहीं छोड़ूँगी।<br><strong>सत्यवान:</strong>&nbsp;यदि तुम्हें चलने का उत्साह है तो प्रिये! &nbsp;मैं नहीं रोकूँगा, किन्तु माता-पिता से आशीर्वाद तो ले लो।</p>



<p>(सत्यवान के माता पिता विराजमान हैं। सावित्री उनके चरणों को छूकर जाने को तैयार हो जाती है।)&nbsp;</p>



<p><strong>सावित्री:</strong> पिता श्री! आज मुझे नाथ के साथ वन जाने की अनुमति दें।</p>



<p><strong>द्युमत्सेन:</strong> तुम जब से बहू बन कर आयी हो, तब से अब तक किसी बात के लिए याचना की हो, मुझे स्मरण नहीं। अतः आज तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी हो जानी चाहिए। अच्छा बेटी, तू जा!</p>



<div class="wp-block-group is-vertical is-content-justification-center is-layout-flex wp-container-core-group-is-layout-4b2eccd6 wp-block-group-is-layout-flex">
<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(सावित्री आज्ञा पाकर पति के साथ वन की ओर चल देती है। उसके मुख पर हँसी थी किन्तु हृदय में दुःख की आग जल रही थी।)&nbsp;</p>



<p class="has-vivid-red-color has-text-color">(पर्दा गिरता है)&nbsp;</p>
</div>
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		<title>सावित्री: विवाह निश्चय</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2012/12/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b9-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%9a%e0%a4%af.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 19 Dec 2012 09:19:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नाटक]]></category>
		<category><![CDATA[सावित्री]]></category>
		<category><![CDATA[नाट्य]]></category>
		<category><![CDATA[पौराणिक कहानियाँ]]></category>
		<category><![CDATA[महान व्यक्तित्व]]></category>
		<category><![CDATA[मिथक]]></category>
		<category><![CDATA[सती सावित्री]]></category>
		<category><![CDATA[सत्यवान]]></category>
		<category><![CDATA[स्वयंवर]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>सावित्री: विवाह निश्चय: तृतीय दृश्य (महाराजा अश्वपति का राजदरबार। बन्दी विरद गान कर रहे हैं। आमोद-प्रमोद का हृदय हारी दृश्य। देवर्षि नारद का प्रवेश।) नारद:...</p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2012/12/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b9-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%9a%e0%a4%af.html">सावित्री: विवाह निश्चय</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[


<p>चारित्रिक औदात्य एवं समृद्धि के पर्याय ऐसे अनेकों चरित्र भारतीय मनीषा की अशेष धरोहर हैं जिन्होंने अपनी प्रज्ञा, अपनी महनीयता एवं अनुकरणीय विशेषताओं से इस देश व सम्पूर्ण विश्व को चकित किया। ऐसा ही अनोखा नाम है सती सावित्री। सावित्री का यह विशिष्ट चरित्र कालजयी है। नारी की अटूट व दृढ़ सामर्थ्य का अप्रतिम उदाहरण है। प्रस्तुत नाट्य प्रविष्टि वस्तुतः नारी की महानता का आदर है, सहज स्वीकार है। <a href="https://blog.ramyantar.com/2012/12/blog-post.html">सावित्री-1</a>, <a href="https://blog.ramyantar.com/2012/12/2.html">सावित्री-2</a> एवं <a href="https://blog.ramyantar.com/2012/12/3.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">सावित्री-3</a> से आगे।</p>





<h3 class="has-text-align-center wp-block-heading">सावित्री: विवाह निश्चय: तृतीय दृश्य</h3>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(महाराजा अश्वपति का राजदरबार। बन्दी विरद गान कर रहे हैं। आमोद-प्रमोद का हृदय हारी दृश्य। देवर्षि नारद का प्रवेश।)</p>



<p><strong>नारद:</strong> नारायण! नारायण!<br><strong>महाराजा:</strong> देवर्षि के चरणों में राजदरबार सहित अश्वपति का प्रणाम स्वीकार हो। आसन ग्रहण करें देवर्षि।</p>



<p class="has-text-align-center">(सावित्री का गुरुदेव के साथ प्रवेश। सावित्री महाराज और देवर्षि को प्रणाम करती है।)</p>



<p><strong>नारद:</strong> सौभाग्यशालिनी हो पुत्री।<br><strong>महाराजा:</strong> कल्याण हो पुत्री।</p>



<p><strong>नारद:</strong> राजन! आपकी यह कन्या कहाँ से लौट रही है? अब तो यह अभिषेक योग्य हो गयी है। आपने अभी तक इसका विवाह नहीं किया?</p>



<p><strong>महाराजा:</strong> देवर्षि! इसी कार्य के लिए मैंने इसे भेजा था। यह अभी-अभी लौटी है। अब इसी के मुख से सुनिए देवर्षि!</p>



<p><strong><a href="http://lh3.ggpht.com/-BtzdFw9kifA/UNHUSkXr64I/AAAAAAAABfs/-330l87AyXM/s1600-h/Savitri%252520%2525288%252529%25255B9%25255D.jpg"></a>सावित्री:</strong> तात! शाल्व देश में एक धर्मात्मा राजा थे। उनका नाम द्युमत्सेन है। वे पहले राज्य करते थे, किन्तु पीछे उनकी आँख अन्धी हो गयी। उस समय इनका पुत्र बहुत छोटा था। शत्रुओं को आक्रमण करने का मौका मिल गया। पड़ोस के शत्रु राजा ने उनका राज्य छीन लिया । तब वे गोद में बालक लिए पत्नी के साथ वन में चले गए और वहाँ उत्तम नियमों का पालन करते हुए तपस्या में लग गए। उनके पुत्र सत्यवान जो राज्य में जन्म लेकर तपोवन में पले और बढ़े हैं, सर्वथा मेरे योग्य है। अतः मैंने अपने मन से उन्हीं को अपना वर स्वीकार किया है।</p>



<p><strong>नारद:</strong>(चौंक कर) राजन! यह तो बड़े खेद की बात हो गयी। सावित्री ने बड़ी भूल की है । बेचारी जानती नहीं थी इसीलिए उत्तम गुणों से युक्त सत्यवान का वरण कर लिया। इस राजकुमार के माता-पिता सदा सत्य बोलते हैं। इसलिए ब्राह्मणों ने उसका नाम सत्यवान रख दिया।</p>



<p><strong>महाराजा:</strong>(नारद से) क्या इस समय भी माता-पिता के प्रति भक्ति रखने वाला सत्यवान तेजस्वी, बुद्धिमान, क्षमावान और शूरवीर है।</p>



<p><strong><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2012/12/savitri1.webp" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-169 alignright" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2012/12/savitri1.jpg?x47177" alt="" width="214" height="139" /></picture>नारद:</strong> नारायण! नारायण! महाराज अश्वपति! आप ने पूछा है इसलिए कहने में संकोच नहीं करूँगा। द्युमत्सेन का वह पुत्र परमवीर, तेजस्वी, सूर्य के समान प्रतापवान, वृहस्पति के सदृश बुद्धिमान, इन्द्र के समान वीर, पृथ्वी की भाँति क्षमाशील, ययाति के समान उदार, चन्द्र के समान नयनाभिराम और अश्वनी कुमारों के समान रूपवान है। वह जितेन्द्रिय, विनयी, पराक्रमी, सत्यप्रतिज्ञ, मिलनसार, ईर्ष्या रहित, लज्जाशील और तेजस्वी है।</p>



<p><strong>महाराजा:</strong>(आश्चर्य से) मुनिवर! आपने तो उसे समस्त गुणों का भण्डार बता दिया। उसमें कोई दोष भी है क्या?</p>



<p><strong>नारद:</strong> राजन! दोष तो उसमें एक ही है। जिसने समस्त गुणों को ढँक लिया है। दोष भी साधारण नहीं है। उसे किसी भी प्रयत्न द्वारा मिटा देना असंभव है। आज से ठीक एक वर्ष बाद उसकी आयु समाप्त हो जायेगी। उसे देह त्याग करना पड़ेगा राजन्!</p>



<p><strong>महाराजा:</strong>(व्यग्र होकर) मेरी नयनपुतरी, बेटी सावित्री! तुम फिर से यात्रा करो और दूसरे किसी योग्य वर का वरण करो। उसकी आयु थोड़ी है । वह एक ही वर्ष में शरीर त्याग देगा।</p>



<p><strong>नारद:</strong> पुत्री! पिता की इच्छा को समझो। पति-विहीन जीवन कैसा जीवन?</p>



<p><strong>सावित्री:</strong> मुनिवर! प्रातःकालीन दैदीप्यमान किरण-सी उस राजपुत्र की छवि को मैंने अपनी प्राणों की अंतर्गुहा में बंद कर लिया है। उसकी गुनगुनी गरमाहट से मेरे अन्दर का कोना-कोना पिघल रहा है। अब मेरा पूर्णकाम, आप्तकाम, परम काम वही होगा। अपनी समर्पण गर्भा प्रीति की मरणभेदी लौ से उस भंगुर में भी अमर यौवन का रसायन , यदि नहीं भर दिया तो मेरा सावित्री नाम नहीं।</p>



<p><strong>नारद:</strong> सावित्री! तुम सती शिरोमणि हो। निःसंदेह तुम्हारा धार्मिक भाव जीवन और मृत्यु की सीमा से ऊँचा उठ चुका है; पर शुभाशुभ को विचार कर कसौटी पर कस लेना ही चाहिए।</p>



<p><strong>सावित्री:</strong> कहाँ कोई विकल्प बचने दिया है ऊपर वाले ने मुनिवर! सच कहती हूँ, मेरा मन मन्दिर और तन मृगछाला हो गया है। मैं बिना वरमाला के ही वरण हो गयी। वरदान, अभिशाप, पुण्य-पाप सबकी कपाल क्रिया हो गयी उसी क्षण जब परस्पर परिचय के लिए हमने एक दूसरे की समीपता स्वीकारी। (पिता की ओर दृष्टिपात करती हुई) पूज्य पिताजी! कन्या एक ही बार किसी को दी जाती है। सत्यवान दीर्घायु हों अथवा अल्पायु, गुणवान हों अथवा निर्गुण, मैंने एक बार उन्हें अपना पति स्वीकार कर लिया। अब दूसरे पुरुष को मैं नहीं वर सकती। अतः मैंने जिस पति का निश्चय किया है उसमें मेरा मन ही प्रमाण है।</p>



<p><strong>नारद:</strong>(सहर्ष) महाराज! सावित्री की बुद्धि स्थिर है। इसने धर्म का आश्रय लिया है। इसे किसी प्रकार इस निश्चय से विचलित नहीं किया जा सकता है। सत्यवान में जो जो गुण हैं वो किसी दूसरे पुरुष में हैं ही नहीं। अतः मुझे तो अब यही अच्छा जान पड़ता है कि आप इसका कन्यादान कर दें ।</p>



<p><strong>महाराजा:</strong> भगवन्! आप ही मेरे गुरु हैं। आपने जैसा कहा मैं वैसा ही करूँगा।</p>



<p><strong>नारद:</strong> सावित्री का विवाह निर्विघ्न समाप्त हो तथा आप सब लोगों का कल्याण हो, इसके लिए यथासाध्य चेष्टा करूँगा। नारायण, नारायण!</p>



<p>(यह कहकर नारद प्रस्थान कर जाते हैं।)</p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2012/12/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b9-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%9a%e0%a4%af.html">सावित्री: विवाह निश्चय</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
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