<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>नल दमयंती Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</title>
	<atom:link href="https://blog.ramyantar.com/category/%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A4%95/nal_damayanti/feed" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>https://blog.ramyantar.com/category/नाटक/nal_damayanti</link>
	<description>हिंदी ब्लॉग। साहित्य, भाषा, संस्कृति, लोक व शास्त्र से संयुक्त। कविता, कहानी, समीक्षा, निबन्ध, नाटक एवं अनुवाद का सहज प्रकाशन। लोक साहित्य का रंग भी।</description>
	<lastBuildDate>Tue, 08 Nov 2022 11:29:09 +0000</lastBuildDate>
	<language>en-US</language>
	<sy:updatePeriod>
	hourly	</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>
	1	</sy:updateFrequency>
	<generator>https://wordpress.org/?v=6.9.4</generator>

<image>
	<url>https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2024/03/cropped-favicon-4-32x32.png</url>
	<title>नल दमयंती Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</title>
	<link>https://blog.ramyantar.com/category/नाटक/nal_damayanti</link>
	<width>32</width>
	<height>32</height>
</image> 
	<item>
		<title>नल दमयंती: दमयंती स्वयंवर</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2013/05/nal-damyanti4.html</link>
					<comments>https://blog.ramyantar.com/2013/05/nal-damyanti4.html#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 15 May 2013 22:30:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नल दमयंती]]></category>
		<category><![CDATA[नाटक]]></category>
		<category><![CDATA[आख्यान]]></category>
		<category><![CDATA[दमयंती स्वयंवर]]></category>
		<category><![CDATA[नल-दमयंती]]></category>
		<category><![CDATA[नाट्य]]></category>
		<category><![CDATA[महाभारत]]></category>
		<category><![CDATA[मिथक]]></category>
		<category><![CDATA[वनपर्व]]></category>
		<guid isPermaLink="false"></guid>

					<description><![CDATA[<p>दमयंती स्वयंवर : पंचम दृश्य (दमयंती स्वयंवर का महोत्सव। नृत्य गीतादि चल रहे हैं। राजा महाराजा पधार रहे हैं। सब अपने अपने निवास स्थान पर...</p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2013/05/nal-damyanti4.html">नल दमयंती: दमयंती स्वयंवर</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[


<p style="text-align: justify;"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2013/05/lonely_maidens_friend_or24.webp 650w" type="image/webp" /><img decoding="async" class=" wp-image-129 alignright" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2013/05/lonely_maidens_friend_or24-300x217.jpg?x47177" alt="" width="252" height="182" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2013/05/lonely_maidens_friend_or24-300x217.jpg 300w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2013/05/lonely_maidens_friend_or24-320x232.jpg 320w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2013/05/lonely_maidens_friend_or24.jpg 650w" sizes="(max-width: 252px) 100vw, 252px" /></picture>नल दमयंती की यह कहानी अद्भुत है। भारत वर्ष के अनोखे अतीत की पिटारी खोलने पर अमूल्य रत्नों की विशाल राशि विस्मित करती है। इस पिटारी में यह कथा-संयोग ऐसा ही राग का एक अनमोल चमकता मोती है। भाव-विभाव और संचारी भाव ऐसे नाच उठे हैं कि अद्भुत रस की निष्पत्ति हो गयी है। निषध राजकुमार नल और विदर्भ राजकुमारी दमयंती के मिलन-परिणय की अद्भुत कथा है यह। रुदन, हास, मिलन, विछोह के मनके इस तरह संयुक्त हो उठे हैं इस कहानी में कि नल दमयंती मिलन की एक मनोहारी माला बन गयी है- अनोखी सुगंध से भरपूर। दमयंती स्वयंवर की यह कथा नाट्य-रूप में संक्षिप्ततः प्रस्तुत है। दृश्य-परिवर्तन के क्रम में कुछ घटनायें तीव्रता से घटित होती दिखेंगी। इसका कारण नाट्य के अत्यधिक विस्तृत  हो जाने का भय है, और शायद मेरी लेखनी की सीमा भी। प्रस्तुत है <a href="https://blog.ramyantar.com/2013/02/nal-damayanti.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">पहली</a>, <a href="https://blog.ramyantar.com/2013/02/nal-damyanti2.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">दूसरी</a>, <a href="https://blog.ramyantar.com/2013/03/nal-damyanti3.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">तीसरी</a> के बाद चौथी कड़ी।</p>





<h3 class="has-text-align-center wp-block-heading">दमयंती स्वयंवर : पंचम दृश्य</h3>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(<a href="https://www.youtube.com/watch?v=zhSsxfnOBf8">दमयंती स्वयंवर</a> का महोत्सव। नृत्य गीतादि चल रहे हैं। राजा महाराजा पधार रहे हैं। सब अपने अपने निवास स्थान पर यथास्थान विराजित होते हैं। सुन्दरी दमयंती अपनी अंगकांति से राजाओं के मन और नेत्रों को अपनी ओर आकर्षित करती हुई रंगमंडप में प्रवेश करती है। संग में सखी मंडल है। हाथ में वरमाला है। राजाओं का परिचय दिया जा रहा है।)</p>



<p><strong>दमयंती:</strong> <em>(सखियों के मुख की ओर निहारती है, फिर रंगभूमि की ओर देखती है, फिर चकित हो कर स्वगत भाषण करती हुई एक-एक को देखकर आगे बढ़ने लगती है। आगे एक ही स्थान पर नल के समान आकार और वेषभूषा के पाँच राजाओं को इकट्ठे ही बैठे हुए देखती है। संदेह और विस्मय के साथ स्वयमेव स्वयं से बातें कर रही है।)</em></p>



<p>अरे! मेरे प्राणेश्वर नल कौन है,यह कैसे जानूँ? कौन देवता हैं, कौन मेरे हृदयेश्वर हैं, यह कैसे पहचानूँ? (ठिठक जाती है, फिर अपनी अंगुलियों को अपने वक्षस्थल पर स्थापित कर दीर्घश्वांस भरती हुई कहने लगती है) बन्द करो मेरे दुर्भाग्य, यह नंगा नाच! अरे जगन्नियंता! मेरे किस अपराध की सजा मिलने वाली है। अरे मेरे व्याकुल नयन! तुम कौन-सा दृश्य देख रहे हो? जीवनधन कहाँ हो? हे विरहाग्नि में संतप्त होते हुए हृदय, यदि तुम लौहमय हो तो द्रवित क्यों नहीं होते। अरे जीवन! क्यों विलम्ब करते हो? तुम्हारा निवासभूत यह हृदय जल रहा है। क्यों नहीं निकल जाते? </p>



<p>अरे मंद-मंद बहते हुए मारुत! यदि विरहाग्नि में मैं जल कर मरूँ तो दीन वचन कह कर प्रार्थना करती हूँ कि मेरे मृत शरीर की भस्म को उत्तर दिशा में स्थित निषध देश में उड़ते हुए पहूँचा देना। ओ राजहंस! नल का संदेश देने वाले प्यारे विहंगम! किस तड़ाग में छिप गए हो? तुम मिल जाते तो मेरी इस यातना को मेरे हृदयेश्वर से परिचित करा देते। प्यारे नल! हे हृदयेश्वर! आपको वरण किए बिना ही यदि मेरे हतभाग्य प्राण निकल जाँय तो जन्म जन्मांतर में भी मैं हृदय से अनुरक्त हो कर आप को ही पुनः प्राप्त करूँ, यही मेरी याचना है। अनसुनी मत करना देव! छोड़ना मत प्राणनाथ! </p>



<p><em>(फिर देवताओं से ही हाथ जोड़कर प्रणामपूर्वक स्तुति करती हुई-)</em> हे देवताओं! हंसों के मुख से नल का वर्णन सुनकर मैंने उन्हें पति रूप से वरण कर लिया है। मैं मन से और वाणी से नल के अतिरिक्त किसी को भी नहीं चाहती। देवताओं! आपने ही, आपकी भाग्यविधाता सृष्टि ने ही, निषधेश्वर नल को ही मेरा पति बना दिया है, तथा मैंने नल की आराधना के लिए ही यह व्रत प्रारंभ किया है। मेरी इस सत्य शपथ के बल पर देवता लोग मुझे उन्हें ही दिखला दें। मैं  विनीता करबद्ध प्रार्थना करती हूँ। ऐश्वर्यशाली लोकपालों! आप लोग अपना रूप प्रकट कर दें, जिससे मैं पुण्यश्लोक नराधिराज राजा नल को पहचान लूँ।</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(दमयंती का अंतर्विलाप सुन कर देवता द्रवित हो जाते हैं। वे उसके दृढ़ निश्चय, सच्चे प्रेम, आत्मशुद्धि, बुद्दि, भक्ति और नल परायणता को देख कर उसे देवता और मनुष्य में भेद करने की शक्ति प्रदान कर देते हैं। उसको हृदय में ’विजयी भव’ का शब्द सुनायी पड़ता है।)</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-2-1536x864.webp 1536w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-2.webp 1920w" type="image/webp" /><img fetchpriority="high" decoding="async" width="1024" height="576" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-2-1024x576.jpg?x47177" alt="" class="wp-image-4339" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-2-1024x576.jpg 1024w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-2-300x169.jpg 300w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-2-768x432.jpg 768w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-2-1536x864.jpg 1536w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-2-409x230.jpg 409w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-2.jpg 1920w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></picture></figure>



<p><strong>दमयंती:</strong> (पुनः चमत्कृत होती हुई) अहा! अहा! अब तो पार्थक्या मुझे साफ दिखायी देने लगा है। देवताओं के शरीर पर पसीना नहीं है। पलकें गिरती नहीं हैं। उनकी ग्रीवा में पड़ी पुष्पमाला कुम्हलायी नहीं है। शरीर पर मैल नहीं है। वे सिंहासन पर स्थित हैं पर उनके पैर धरती को नहीं छूते और उनकी परछाईं नहीं पड़ती। इधर नल के शरीर की छाया पड़ रही है। माला कुम्हला गयी है। शरीर पर कुछ धूल और पसीना भी है। पलकें बराबर गिर रही हैं। अब मैं पहचान गयी। </p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(फिर सकुचा कर घूँघट काढ़ लेती हैं, और नल के गले में वरमाला डाल देती हैं। देवता और महर्षि साधु-साधु कहने लगते हैं। पुष्पवृष्टि होने लगती है। राजागण आश्चर्यचकित हो जाते हैं।) </p>



<p><strong>नल:</strong>(आनंद से फूले न समाते हुए) कल्याणी! तुमने देवताओं के सामने रहते हुए भी उन्हें वरण न करके मुझे ही वरण कर लिया है, इसलिए तुम मुझको प्रेम परायण पति समझना। मैं तुम्हारी बात मानूँगा। जब तक मेरे शरीर में प्राण रहेंगे तब तक मैं तुमसे प्रेम करूँगा, यह मैं तुमसे शपथ पूर्वक कहता हूँ। तुम्हारे योग्य आसन मेरा वक्षस्थल ही है। निष्कपट दूतता करने से इन्द्रादि देव मुझ पर दया करें। (देवता बहुत प्रसन्न होकर प्रकट हो जाते हैं तथा नल को वरदान देते हुए फूल बरसान लगते हैं।)</p>



<p><strong>इन्द्र</strong>: नल! तुम्हें यज्ञ में मेरा स्मरण करते ही दर्शन होगा और उत्तम गति मिलेगी।</p>



<p><strong>अग्नि:</strong> राजा नल! जहाँ तुम मेरा स्मरण करोगे, वहीं मैं प्रकट हो जाऊँगा। मेरे ही समान प्रकाशमय लोक तुम्हें प्राप्त होंगे।</p>



<p><strong>यम:</strong> नल! तुम्हारी बनायी हुई रसोई बहुत मीठी होगी और स्मरण रखो, तुम अपने धर्म में सदा दृढ़ रहोगे।</p>



<p><strong>वरुण:</strong> हे महाराज! जहाँ तुम चाहोगे,वहीं जल प्रकट हो जाएगा। तुम्हारी माला निरंतर उत्तम गंध से परिपूर्ण रहेगी।</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(सभी समवेत आशीर्वाद देते हैं।)&nbsp;</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(राजा नल महाराज भी की राजधानी कुण्डिनपुर में राजसम्मान से सुशोभित होते हैं। महामहोत्सव मनाया जाता है। तदनन्तर राजा भीम की अनुमति प्राप्त करके महाराज नल दमयंती के साथ अपनी राजधानी लौट आते हैं।)</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(पर्दा गिरता है।)</p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2013/05/nal-damyanti4.html">नल दमयंती: दमयंती स्वयंवर</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://blog.ramyantar.com/2013/05/nal-damyanti4.html/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>नल दमयंती: स्वयंवर की तैयारी</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2013/03/nal-damyanti3.html</link>
					<comments>https://blog.ramyantar.com/2013/03/nal-damyanti3.html#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 25 Mar 2013 21:18:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नल दमयंती]]></category>
		<category><![CDATA[नाटक]]></category>
		<category><![CDATA[आख्यान]]></category>
		<category><![CDATA[दमयंती स्वयंवर]]></category>
		<category><![CDATA[नल-दमयंती]]></category>
		<category><![CDATA[नाट्य]]></category>
		<category><![CDATA[महाभारत]]></category>
		<category><![CDATA[मिथक]]></category>
		<category><![CDATA[वनपर्व]]></category>
		<guid isPermaLink="false"></guid>

					<description><![CDATA[<p>नल: (उसकी बाहें पकड़कर सम्हालते हुए तथा आँसू पोंछते हुए) सुकुमारी! रोना अशुभ है, अतः मत रोओ। यदि मेरे अपराध के कारण तुम रो रही...</p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2013/03/nal-damyanti3.html">नल दमयंती: स्वयंवर की तैयारी</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[


<p style="text-align: justify;">नल दमयंती की यह कहानी अद्भुत है। भारत वर्ष के अनोखे अतीत की पिटारी खोलने पर अमूल्य रत्नों की विशाल राशि विस्मित करती है। इस पिटारी में यह कथा-संयोग ऐसा ही राग का एक अनमोल चमकता मोती है। भाव-विभाव और संचारी भाव ऐसे नाच उठे हैं कि अद्भुत रस की निष्पत्ति हो गयी है। निषध राजकुमार नल और विदर्भ राजकुमारी दमयंती के मिलन-परिणय की अद्भुत कथा है यह। रुदन, हास, मिलन, विछोह के मनके इस तरह संयुक्त हो उठे हैं इस कहानी में कि नल दमयंती मिलन की एक मनोहारी माला बन गयी है- अनोखी सुगंध से भरपूर। नल दमयंती की यह कथा नाट्य-रूप में संक्षिप्ततः प्रस्तुत है। दृश्य-परिवर्तन के क्रम में कुछ घटनायें तीव्रता से घटित होती दिखेंगी। इसका कारण नाट्य के अत्यधिक विस्तृत  हो जाने का भय है, और शायद मेरी लेखनी की सीमा भी। प्रस्तुत है <a href="https://blog.ramyantar.com/2013/02/nal-damayanti.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">पहली</a>, <a href="https://blog.ramyantar.com/2013/02/nal-damyanti2.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">दूसरी</a> के बाद <a href="https://blog.ramyantar.com/2013/03/nal-damyanti3.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">तीसरी</a> कड़ी।</p>





<p><strong>नल:</strong> (उसकी बाहें पकड़कर सम्हालते हुए तथा आँसू पोंछते हुए) सुकुमारी! रोना अशुभ है, अतः मत रोओ। यदि मेरे अपराध के कारण तुम रो रही हो तो उस अपराध के लिए राजा नल हाथ जोड़कर क्षमा माँगता है। निष्कारण क्रोध न करो, प्रिये! क्रोध को छोड़ो। मेरे ऊपर प्रसन्न हो जाओ। चाहे परिणाम जो हो, नल देवताओं के प्रतिशोध को झेल लेगा। तुम अधरों को मधुर हास्य से सुशोभित करो। नेत्रों को अपनी विलास लीला से चंचल करो। दृग बिन्दु की वर्षा समाप्त करो। प्रसन्नमुखी हो जाओ। मेरे सिंहासन को अलंकृत करो। मेरे अंक का विशिष्ट अलंकार बनो। तुम मेरी पीर का पराभव करो। वचन से अनुकंपा करो, अन्यथा मैं अब जी नहीं सकता। </p>



<p><strong>दमयंती: </strong>हे प्राणनाथ! &nbsp;मैं सब देवताओं को प्रणाम करके आप को ही पतिरूप में वरण कर रही हूँ। यह मैं सत्य-सत्य शपथ खा रही हूँ।</p>



<p><strong>नल:</strong> प्रिये! ज्यों ही पहली बार पाया तुम्हारी मुख छवि का दर्शन तो देखते ही निमिष मात्र में अन्तरतम्‌ के चिन्मय वातायन खुल गए। मेरे रोम रोम में आत्मरमण का आलोड़न जागा। मैं तन,मन, प्राण, आत्मा के सारे ही धरातलों पर समूचा ही तुमको पा गया। निहाल हो गए मेरे प्राण! देवताओं के वरण का तुमसे अनुरोध करने चला आया। तुम्हें नल ने घोर कष्ट दिया। किन्तु मैं धर्म विरुद्ध &nbsp;अपना स्वार्थ कैसे साधूँ, कमल नयने!</p>



<p><strong>दमयंती:</strong>(नल का मुख अपनी मृणाल कोमल अंगुलियों से ऊपर उठाती हुई गद्गद स्वर में) समझ रही हूँ प्राण! आप की अमोघ धर्मनिष्ठा को कौन नहीं जानता। नरेश्वर! इसके लिए एक निर्दोष उपाय है। इसके अनुसार काम करने से आपको को कोई दोष नहीं लगेगा। उपाय है कि आप लोकपालों के साथ स्वयंवर में मण्डप में आयें। मैं उनके सामने ही आपको वरण कर लूँगी। मेरा विनय अस्वीकार न करें जीवन-धन!&nbsp;</p>



<p><strong>नल:</strong> (दमयंती का सिर सहलाते हुए स्नेहमयी वाणी में) मुझे यशस्वी एवं कृतकार्य बनाने वाली गुणमयी राजकन्ये! तुम्हारी विनयशीलता एवं हृदय की पवित्रता के लिए कोई शब्द नहीं है मेरे पास। विधाता तुम्हें सफल मनोरथा करे। कल स्वयंवर में मुझे सनाथ करना।</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(नल का प्रस्थान। पर्दा गिरता है।)</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-1-1536x864.webp 1536w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-1.webp 1920w" type="image/webp" /><img decoding="async" width="1024" height="576" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-1-1024x576.jpg?x47177" alt="" class="wp-image-4334" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-1-1024x576.jpg 1024w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-1-300x169.jpg 300w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-1-768x432.jpg 768w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-1-1536x864.jpg 1536w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-1-409x230.jpg 409w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-1.jpg 1920w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></picture></figure>



<h3 class="has-text-align-center wp-block-heading">नल दमयंती की कहानी: चतुर्थ दृश्य </h3>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(देवता बाहर प्रतीक्षा कर रहे हैं। नल उन्हें प्रणाम करते हुए कहते हैं-)</p>



<p><strong>नल: </strong>हे देवगण! मैं आपलोगों की आज्ञा से दमयंती के महल में गया। बाहर अनेकों द्वारपाल पहरा दे रहे थे, परंतु उन्होंने आप लोगों के प्रभाव से मुझे देखा नहीं। केवल दमयन्ती और उसकी सखियों ने मुझे देखा। मैंने दमयंती से आप लोगों के गुण और प्रभाव का विशद वर्णन किया। कोई कोर कसर नहीं छोड़ी, परंतु वह तो आप लोगों को न चाह कर मुझे ही वरण करने पर तुली हुई है। </p>



<p>देववरों! वस्तुस्थिति तो यह है कि किसी भी सद्गुण का एक कण भी मुझमें नहीं है और सम्पूर्ण दोषों की जीवंत प्रतिमा हूँ मैं। पर बलिहारी है उसके अनुराग भरे नयनों की- उसके समर्पणपूर्ण उरस्थल की, कि वह केवल, केवल मुझ पर ही न्यौछावर हो गयी थी और उसे मेरे अतिरिक्त अन्य सबकी विस्मृति हो गयी थी। एक बार नहीं शत-सहस्र बार लज्जा में मेरे प्राण जैसे भूमि में समा जाते थे। पर वह समर्पिता मुझे ही अपना जीवन-सर्वस्व मान चुकी थी। उस लावण्यमयी की विभोरावस्था अवर्णनीय है सुरवरों! जल से पूरित  उसके उन नयन सरोजों को मैं भूल नहीं पाता। मैं उस भावमयी के भावों की आँधीं में ऐसा बह गया कि आपलोगों के पास पुनरावर्तित होने में इतना विलम्ब हो गया। उसके ताम्बूलरंजित अधर अभी कम्पित ही थे कि मैं किसी भाँति उसके प्राण रमण की संबोधनमयी वाणी को विस्तृत करता हुआ बाहर आप तक आ गया हूँ।</p>



<p><strong>देवगण: अब तुमसे क्या पूछना और क्या कहना</strong>! जब तुम्हारे साथ स्वयंवर में बैठना है, तो कल जो होगा, देखा जायेगा। बाकी बातें व्यर्थ ही हैं।&nbsp;(देवता अदृश्य हो जाते हैं।)&nbsp;</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color"> (पर्दा गिरता है।) </p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2013/03/nal-damyanti3.html">नल दमयंती: स्वयंवर की तैयारी</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://blog.ramyantar.com/2013/03/nal-damyanti3.html/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>नल दमयंती: प्रथम मिलन</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2013/02/nal-damyanti2.html</link>
					<comments>https://blog.ramyantar.com/2013/02/nal-damyanti2.html#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 17 Feb 2013 23:12:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नल दमयंती]]></category>
		<category><![CDATA[नाटक]]></category>
		<category><![CDATA[आख्यान]]></category>
		<category><![CDATA[दमयंती स्वयंवर]]></category>
		<category><![CDATA[नल-दमयंती]]></category>
		<category><![CDATA[नाट्य]]></category>
		<category><![CDATA[महाभारत]]></category>
		<category><![CDATA[मिथक]]></category>
		<category><![CDATA[वनपर्व]]></category>
		<guid isPermaLink="false"></guid>

					<description><![CDATA[<p>नल दमयंती: तृतीय दृश्य (रनिवास का दृश्य। नल चकित होकर रनिवास देखता है। दमयंती का प्रवेश।) दमयंती: हे वीराग्रणी! आप देखने में परम मनोहर और...</p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2013/02/nal-damyanti2.html">नल दमयंती: प्रथम मिलन</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[


<p style="text-align: justify;">नल दमयंती की यह कहानी अद्भुत है। भारत वर्ष के अनोखे अतीत की पिटारी खोलने पर अमूल्य रत्नों की विशाल राशि विस्मित करती है। इस पिटारी में यह कथा-संयोग ऐसा ही राग का एक अनमोल चमकता मोती है। भाव-विभाव और संचारी भाव ऐसे नाच उठे हैं कि अद्भुत रस की निष्पत्ति हो गयी है। निषध राजकुमार नल और विदर्भ राजकुमारी दमयंती के मिलन-परिणय की अद्भुत कथा है यह। रुदन, हास, मिलन, विछोह के मनके इस तरह संयुक्त हो उठे हैं इस कहानी में कि नल दमयंती मिलन की एक मनोहारी माला बन गयी है- अनोखी सुगंध से भरपूर। नल दमयंती की यह कथा नाट्य-रूप में संक्षिप्ततः प्रस्तुत है। दृश्य-परिवर्तन के क्रम में कुछ घटनायें तीव्रता से घटित होती दिखेंगी। इसका कारण नाट्य के अत्यधिक विस्तृत  हो जाने का भय है, और शायद मेरी लेखनी की सीमा भी। इस प्रविष्टि में <a href="https://en.wikipedia.org/wiki/Nala">राजा नल</a> देवताओं का संदेश लेकर दमयंती के पास प्रस्तुत हैं। नल दमयंती संवाद से अभिव्यक्ति के अनूप रूप उद्घाटित होंगे। प्रस्तुत है <a href="https://blog.ramyantar.com/2013/02/nal-damayanti.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">पहली</a> के बाद दूसरी कड़ी।</p>





<h3 class="has-text-align-center wp-block-heading">नल दमयंती: तृतीय दृश्य</h3>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(रनिवास का दृश्य। नल चकित होकर रनिवास देखता है। दमयंती का प्रवेश।)</p>



<p><strong>दमयंती:</strong> हे वीराग्रणी! आप देखने में परम मनोहर और निर्दोष जान पड़ते हैं। पहले अपना परिचय तो बतायें! आप यहाँ किस उद्देश्य से आये हैं? द्वारपाल ने आपको देखकर रोका नहीं?&nbsp;</p>



<p><strong>नल:</strong> इससे पहले कि मैं अपना परिचय दूँ, हे मृगाक्षी! तुम अधीरता छोड़कर संयमित हो जाओ। मुझे एक महत्वपूर्ण चर्चा करनी है।&nbsp;</p>



<p><strong>दमयंती: </strong>आप कहाँ से आ रहे हैं? आप कौन हैं? जो आपने सुरक्षित अन्तःपुर में प्रवेश किया है। यह अलक्ष्य समुद्र पार नहीं किया है क्या?&nbsp;</p>



<p><strong>नल:</strong>(विनीत भाव से) भद्रे! तुम्हारी कोमल काया स्वस्थ है न? तुम्हारा चित्त प्रसन्न है न? सुनो कर्णान्त दीर्घ नयने! मैं निषध देश का राजा नल हूँ। इन्द्र, अग्नि, वरुण और यम- ये चारों देवता तुमसे परिणय करना चाहते हैं। तुम इनमें से किसी एक का वरण कर लो। यही संदेश लेकर मैं तुम्हारे पास आया हूँ। उन देवताओं के प्रभाव से  ही मैं अदृश्य हो गया हूँ। जब मैं तुम्हारे महल में प्रवेश करने लगा, तब मुझे कोई देख नहीं सका। तुम अतिथि सत्कार छोड़कर मेरे दूतकर्म को सफल करो। मेरी विवशता और धर्मनिष्ठा  के चलते मुझपर कृपा करो। मैं वचनबद्ध हूँ। परकार्यसिद्धि हेतु अंतःपुर में प्रविष्ट हुआ हूँ। मैंने देवताओं का सन्देश कह दिया।  (स्नेहमयी दृष्टि से देखते हुए) कल्याणी! तुममें इन्द्रादि दिक्‌पालों का चित्त आसक्त है। अब जैसा विचारो वैसा करो।</p>



<p><strong>दमयंती:</strong> (किंचित हँसती है, फिर गंभीर होकर) हे राजा नल! आपकी अमृतमयी वाणी मैंने सुनी। पहले यह निवेदिता आपके श्री चरणों में प्रणाम करती है। पुनः प्रणाम करती है देवगणों को जिनके आग्रह और अनुग्रह से आपने दर्शन दिया। आपने यहाँ पधार कर गुरुतर उपकार किया है, उसके उपयुक्त प्रति-उपकार क्या हो सकता है नरेन्द्र? आप आज्ञा कीजिए, मैं आपकी यथाशक्ति सेवा करूँ। मेरे स्वामी! मैंने जिस दिन से हंस की बात सुनी है, उसी दिन से मैं व्याकुल हूँ और आपके लिए ही मैंने राजाओं की भीड़ इकट्ठी की है।&nbsp;</p>



<figure class="wp-block-embed is-type-video is-provider-youtube wp-block-embed-youtube wp-embed-aspect-16-9 wp-has-aspect-ratio"><div class="wp-block-embed__wrapper">
<iframe loading="lazy" title="Hindi Drama Video : Damayanti Swayamvar || हिन्दी नाटक : दमयंती स्वयंवर - Part 1" width="726" height="408" src="https://www.youtube.com/embed/zhSsxfnOBf8?start=725&#038;feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" allowfullscreen></iframe>
</div></figure>



<p><strong>नल:</strong> (दमयंती की वाक्‌पटुता से विस्मृत हो कर) हे मधुभाषिणी समुध्यये! तुम बहुत निपुण हो। अंगीकार कराना जानती हो। बोलने में ऐसी स्निग्ध समर्पिता वाक्‌पटुता दिखायी है कि मेरे उत्तर देने के लिए अवकाश ही नहीं रखा। हे मुग्धे! मुझे स्वयं में अपना रहने ही नहीं दिया। मेरी स्वाधीनता की कथा तो अब अस्तमित हो गयी। तुम्हारे वशीकरण शील गुणग्राम से मैं वशीभूत हो गया हूँ। परन्तु इसका ध्यान रखो कि मैं देवताओं के वचन से बँधा हूँ। मेरा निवेदन, मेरी बात सुनो। </p>



<p>जब बड़े-बड़े लोकपाल तुम्हारे प्रणय-संबंध के प्रार्थी हैं, तब तुम मुझ  मनुष्य की आकांक्षा क्यों कर रही हो? उन ऐश्वर्यशाली देवताओं की चरण-रेणु के समान भी तो मैं नहीं हूँ! तुम अपना मन उन्हीं में लगाओ। देवताओं का अप्रिय करने से मनुष्य को घोर विपत्ति झेलनी पड़ती है।मनुष्य की मृत्य तक हो जाती है। तुम मेरे वचन की रक्षा करो और उनका वरण कर लो। </p>



<p><strong>दमयंती:</strong> (घबरा जाती है। दोनों नेत्रों से आँसू झरने लगते हैं। भयभीत होकर कहती है-) नाथ! देवता केवल मेरे प्रणाम के योग्य हैं, वरण करने के योग्य नहीं। आपके प्रश्न का उत्तर नहीं देने से आपका अपमान होगा, इस कारण मैं आपका उत्तर देना चाहती हूँ।&nbsp; मैंने निषधेश्वर नल को बहुत समय से मन से वरण कर लिया है। अतः इन्द्रादि दिक्‌पालों के सन्देश पर मन से विचार भी नहीं करना चाहती, कार्य से उन्हें स्वीकार करना तो दूर की बात है।&nbsp;</p>



<p><strong>नल:</strong> हे पिकवयनी! तुम्हारा देवों से विमुख होना ठीक नहीं है। आयी हुई निधि के लिए किवाड़ बन्द करना कहाँ तक उचित है! देवों के अनुग्रह से तुम देवी बन जाओगी। स्वर्ग अपने यहाँ आश्रय देने के लिए तुम्हें बार-बार मानो हठ से खींच रहा है,किन्तु तुम नहीं चाहती, यह आश्चर्य है। तुम अपना मूर्खतापूर्ण दुराग्रह छोड़ दो मृदुभाषिणी!&nbsp;</p>



<p><strong>दमयंती:</strong>(लम्बी साँस लेती हुई) प्रियवर! आपका सन्देश कर्णकटु एवं मुझ पतिव्रता के लिए अपकीर्तिकारक है, अतः उसे मैं कदापि स्वीकार नहीं करूँगी। मेरे जीवन का एक मात्र आधार होने से मेरे ऊपर आपका पूर्ण प्रभुत्व है। (क्रोध से) मेरे वरमाला से कल स्वयंवर में राजा नल की ही पूजा होगी। यदि देवताओं को मुझ पर अनुग्रह करना है, तो वे प्रसन्न हो नल को ही पति रूप में भिक्षा देकर अपनी कृपा को चरितार्थ करें। राजाधिराज! मेरी दृढ़ प्रतिज्ञा सुन लें! (विलाप करती हुई गिर पड़ती है।) </p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2013/02/nal-damyanti2.html">नल दमयंती: प्रथम मिलन</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://blog.ramyantar.com/2013/02/nal-damyanti2.html/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>8</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>नल दमयंती: प्रारंभ</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2013/02/nal-damayanti.html</link>
					<comments>https://blog.ramyantar.com/2013/02/nal-damayanti.html#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 13 Feb 2013 03:09:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नल दमयंती]]></category>
		<category><![CDATA[नाटक]]></category>
		<category><![CDATA[आख्यान]]></category>
		<category><![CDATA[दमयंती स्वयंवर]]></category>
		<category><![CDATA[नल-दमयंती]]></category>
		<category><![CDATA[नाट्य]]></category>
		<category><![CDATA[महाभारत]]></category>
		<category><![CDATA[मिथक]]></category>
		<category><![CDATA[वनपर्व]]></category>
		<guid isPermaLink="false"></guid>

					<description><![CDATA[<p>प्रथम दृश्य (राजमहल का दृश्य। निषध नरेश नल विदर्भ राजकुमारी दमयंती के विवाह के लिए आयोजित स्वयंवर में जाने से पूर्व अपने कुलगुरु से आशीर्वाद...</p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2013/02/nal-damayanti.html">नल दमयंती: प्रारंभ</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[


<p>अरविन्द जी ने <a href="http://shilpamehta1.blogspot.in/" target="_blank" rel="noreferrer noopener">शिल्पा मेहता जी</a> के एक विशिष्ट आग्रह को पूर्ण करते हुए कुछ दिनों पूर्व नल-दमयंती आख्यान सरलतः <a href="https://blog.ramyantar.com/2013/01/blog-post_15.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">अपने ब्लॉग पर</a> प्रकाशित किया। नल और दमयंती की प्रणय-परिणय कथा मुझे भी आकर्षित किए हुए थी, और इसे नाट्य-रुप में ढालने की उत्कंठा भी बहुत पुरानी थी। अरविन्द जी से आशीर्वाद ले इस आख्यान को नाट्यरूप में प्रस्तुत करने का सहज प्रयास है यह। वस्तुतः यह आख्यान नाट्य-रूप में काफी विस्तार की माँग करता है। कोशिश यह होगी कि आख्यान के मर्मस्पर्शी अंश निश्चिततः विस्तार लें, और शेष सूत्रतः इस आख्यान को आगे बढ़ायें। इस प्रस्तुति की प्रेरणा के लिए अरविन्द जी का आभार। यह प्रविष्टि इस रूप में <a href="http://pankil.ramyantar.com/" target="_blank" rel="noreferrer noopener">बाबूजी</a> के विशिष्ट योग से आ पायी है, मैं सदा नत्‌।</p>







<p style="text-align: justify;">नल दमयंती की यह कहानी अद्भुत है। भारत वर्ष के अनोखे अतीत की पिटारी खोलने पर अमूल्य रत्नों की विशाल राशि विस्मित करती है। इस पिटारी में यह कथा-संयोग ऐसा ही राग का एक अनमोल चमकता मोती है। भाव-विभाव और संचारी भाव ऐसे नाच उठे हैं कि अद्भुत रस की निष्पत्ति हो गयी है। निषध राजकुमार नल और विदर्भ राजकुमारी दमयंती के मिलन-परिणय की अद्भुत कथा है यह। रुदन, हास, मिलन, विछोह के मनके इस तरह संयुक्त हो उठे हैं इस कहानी में कि नल दमयंती मिलन की एक मनोहारी माला बन गयी है- अनोखी सुगंध से भरपूर। नल दमयंती की यह कथा नाट्य-रूप में संक्षिप्ततः प्रस्तुत है। दृश्य-परिवर्तन के क्रम में कुछ घटनायें तीव्रता से घटित होती दिखेंगी (नेपथ्य में)। इसका कारण नाट्य के अत्यधिक विस्तृत  हो जाने का भय है, और शायद मेरी लेखनी की सीमा भी। प्रस्तुत है पहली कड़ी।</p>





<h3 class="has-text-align-center wp-block-heading"><span style="text-decoration: underline" class="underline">प्रथम दृश्य </span></h3>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(राजमहल का दृश्य। निषध नरेश नल विदर्भ राजकुमारी दमयंती के विवाह के लिए आयोजित स्वयंवर में जाने से पूर्व अपने कुलगुरु से आशीर्वाद के लिए प्रस्तुत होते हैं। कुलगुरु को प्रणाम करते हैं।)</p>



<p><strong>कुलगुरु:</strong> कल्याण हो राजन्‌! हे प्रजापालक! जो राजा, गुरु एवं श्रेष्ठजनों को आदर-सम्मान करता है, समकक्षी राजाओं को यथोचित स्थान देता है और प्रजा को पुत्रवत स्नेह करता है, उसका राज सदा ही निष्कंटक और चिरस्थायी होता है।</p>



<p><strong>नल:</strong> आशीष दें कुलगुरु! आपके आशीर्वचनों का अक्षरशः पालन कर सकूँ और मेरे मन मन्दिर में ले रही कल्पना की मूर्ति चिरस्थायी हो सके।</p>



<p><strong>कुलगुरु:</strong> जाओ राजन्‌! तुम्हारा मनोरथ निश्चय ही पूर्ण होगा। स्वयंवर में उपस्थित राजा-राजकुमार तुम्हारे तेज से वैसे ही प्रतिहत हो जायेंगे जैसे कि सूर्य की तेजोमय रश्मियों से तारे। विजयी भवः राजन! विजयी भव:।</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(नल प्रणाम करता है। पर्दा गिरता है।)</p>



<hr class="wp-block-separator has-text-color has-luminous-vivid-orange-color has-alpha-channel-opacity has-luminous-vivid-orange-background-color has-background is-style-wide"/>



<h3 class="has-text-align-center wp-block-heading"><span style="text-decoration: underline" class="underline">द्वितीय दृश्य</span></h3>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(पर्दा उठता है। इन्द्र, अग्नि, वरुण, यम राजा नल से मिलने जा रहे हैं)</p>



<p><strong>इन्द्र:</strong> देव! हम पहुँच गए! मुझे निषध नरेश नल की ही प्रतीति हो रही है जो सकल लोक हृदयानन्द त्रिभुवन विलोचन है। रमणीयता को भी दुगुनी रमणीयता प्रदान करने वाले और नवयौवन सागर का अमृत रस स्वरूप हैं वह।&nbsp;</p>



<p><strong>वरुण:</strong> हाँ देव! लग रहा है पुण्डरीकाक्ष नारायण ही, नल का रूप धारण कर लिए हैं। यह अमानुषी आकृति प्रणाम के योग्य है, यह भीम सुता को सनाथ करता हुआ प्रतीत हो रहा है।&nbsp;</p>



<p><strong>अग्नि:</strong> सत्य ही वरुण देव! लगता है इस महीपति के हृदय में धर्म का, अनुग्रह में कुबेर का, नेत्र में लक्ष्मी का और वाणी में वीणावादिनी का सत्व रच बस गया है। बुद्धि में वृहस्पति, तेज में भाष्कर तथा सौन्दर्य में मनसिज की निवास भूमि होने से यह सर्वदेवमय प्रकटित नल रूप ही है जो दमयंती स्वयंवर को सुशोभित करेगा।&nbsp;</p>



<p><strong>यम: </strong>हाँ, अग्निदेव! मुझे पूर्ण विदित है कि महाराज नल का राजभवन श्रेष्ठ मित्रों, राजपुरुषों से सदा सुशोभित रहता है। यज्ञ-यज्ञादि धर्म कार्य से सम्पूर्ण प्रजा सुयश और सम्मान का भाजन बनती है। अभ्यागतों का आदर सम्मान करने वाला यह महापुरुष अत्योत्तम है।</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(देवताओं का आगमन। नल सबको प्रणाम करते हैं।)</p>



<p><strong>वरुण:</strong> राजेन्द्र नल! आप बड़े सत्यव्रती हैं। हम लोग याचक होकर आपके पास आये हैं। आपसे अपने कार्य की सम्पन्नता के लिए आग्रह करते हैं। आप वचन दीजिए कि हमारा मनोरथ सिद्ध करेंगे।</p>



<p><strong>नल:</strong> कोई भी याचना करे और नल उसे पूरा न करे, ऐसा कभी संभव नहीं हो सकता। मैं आपका कार्य अवश्य करूँगा, ऐसी प्रतिज्ञा करता हूँ। किन्तु पहले आप अपना परिचय देने की कृपा तो करें। आप लोग कौन हैं?&nbsp;</p>



<p><strong>इन्द्र:</strong> महाराज नल! हम देवता हैं, मैं इन्द्र हूँ, ये अग्नि हैं, आप वरुण हैं और आप यम। आप हमारा दूत-कर्म कर दें। दमयंती के पास जाकर यह निवेदन कर दें कि इन्द्र, वरुण, अग्नि और यम देवता तुमसे परिणय करना चाहते हैं।&nbsp;</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-1536x864.webp 1536w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti.webp 1920w" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="576" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-1024x576.jpg?x47177" alt="Raja_Ravi_Varma,_Damayanthi" class="wp-image-4324" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-1024x576.jpg 1024w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-300x169.jpg 300w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-768x432.jpg 768w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-1536x864.jpg 1536w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti-409x230.jpg 409w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/11/Nal-Damayanti.jpg 1920w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></picture></figure>



<p><strong>नल:</strong>(दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए) देवराज! जिस दमयंती का वरण करने मैं जा रहा हूँ उसी का दूतकर्म भला कैसे करूँगा? ऐसे सर्वज्ञ, विश्वपूज्य आप लोगों को मुझ तुच्छ को ठगने में क्या दया नहीं आयी? खेद है! बड़े लोगों को तो पहले, उचित है कि वे किसी को ठगने का विचार ही न करें और यदि करें भी तो उन्हें बड़े लोगों को ही ठगना चाहिए। मनुष्य होने से देवताओं की अपेक्षा अत्यन्त तुच्छ, मुझे ठगने में तो आप जैसे देवताओं को दया होनी चाहिए। ऐसा तुच्छ काम भला मैं क्यों करूँ? आपलोग कृपया इस विषय में मुझे क्षमा ही करें। मुझे दूत बनाकर वहाँ भेजने से आपलोगों का कार्य सिद्ध होना तो दूर रहा, पहले ही सबको विदित होने से बिगड़ जाएगा।&nbsp;</p>



<p><strong>वरुण:</strong> नल! तुम क्षत्रिय हो और कदाचित तुम्हें स्मरण होगा कि क्षत्रिय वचन पालन हेतु प्राणोत्सर्ग करने में भी किंचित मात्र नहीं हिचकिचाते, अतः नल! अपने कुल और क्षत्रिय धर्म की रक्षा हेतु दिए गए वचन को पूर्ण करो और अविलम्ब प्रस्थान करो।&nbsp;</p>



<p><strong>नल:</strong> दमयंती के लिए जिस प्रकार आपलोगों ने मुझसे याचना की है, उसी प्रकार मैं एक साधारण मानव होकर श्रेष्ठ देवाधिपति आपलोगों से भीम कुमारी दमयंती की याचना करता हूँ। कुण्डिल पुराधीश की कन्या ने तो पहले से ही मुझे वरण कर लिया है, ऐसा निश्चित है। अतः सहसा मुझे देखने पर वह सात्विक भावों के उदय होने से लज्जित हो जाएगी और निश्चय है कि आप लोगों का वरण नहीं करेगी। वह आपलोगों के वरण का प्रस्ताव भी नहीं सुनना चाहेगी। अतः उसके लिए आपलोगों की इच्छा करना व्यर्थ ही है। इस कारण आपलोग मेरे ऊपर प्रसन्न हों क्योंकि यह मेरे लिए अत्यन्त अनुचित है।&nbsp;</p>



<p><strong>इन्द्र:</strong> हे नल! तुम चन्द्रमा के समान अपने निर्मल यश को क्यों छोड़ रहे हो? याचना पूरा करने के लिए आग्रह स्वीकार करके फिर उसे पूरा न करना तुम्हारे जैसे व्यक्ति के लिए कलंक है। तुम्हें हम लोगों के प्रति ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। तुमने अब तक किसी भी याचना करने वाले को ’नहीं’ नहीं कहा। अतः अब भी हम लोगों को ’नहीं’ मत कहो। याचना करने पर धीर दाता कहाँ विलम्ब करता है राजन! किसी व्यक्ति के क्षण मात्र भी जीने की ज़िम्मेदारी कोई नहीं उठा सकता। हम जैसे सतपालों को पहले देने को कह कर फिर निराश करने पर तुम्हें बड़ा कलंक तथा दोष लगेगा। अपनी कुल-मर्यादा क्यों छोड़ रहे हो, राजन!</p>



<figure class="wp-block-embed is-type-video is-provider-youtube wp-block-embed-youtube wp-embed-aspect-16-9 wp-has-aspect-ratio"><div class="wp-block-embed__wrapper">
<iframe loading="lazy" title="Hindi Drama Video : Damayanti Swayamvar || हिन्दी नाटक : दमयंती स्वयंवर - Part 1" width="726" height="408" src="https://www.youtube.com/embed/zhSsxfnOBf8?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" allowfullscreen></iframe>
</div></figure>



<p><strong>नल:</strong> (कुछ सोचते हुए) देव! आपलोग हमें वचन में बाँधकर निज कार्य सिद्धि के लिए विवश कर रहे हैं। मैं कृतप्रतिज्ञ हूँ। अतः जो आपकी अभिलाषा है, उसे अवश्य पूरा करूँगा। परंतु यह तो बताईये कि राजमहल में निरंतर कड़ा पहरा रहता है, मैं कैसे जा सकूँगा?&nbsp;</p>



<p><strong>इन्द्र:</strong> तुम्हें अभी भी हिचकिचाहट है राजन! देव दाता हैं। दूसरे लोग हमसे अभीष्ठ वर की याचना करते हैं। ऐसे हम तुमसे याचना कर रहे हैं, यह आश्चर्य है। हे दानवीर! तुम केवल हम लोगों के मनोरथ ही पूर्ण मत करो, इन्द्रादि दिगपाल तुम्हारे यहाँ याचक बने, ऐसे अपने यश से सारी दिशाओं को पूर्ण कर दो। तुम्हारी कीर्ति चमक उठेगी। अतः तुम्हें ऐसा अवसर नहीं चूकना चाहिए। लाभ हानि सोच लो। रही बात, तुम्हारे अन्तःपुर में प्रवेश करने की। हम आशीर्वाद देते हैं कि तुम राजमहल में बेरोक-टोक अदृश्य रुप में प्रवेश कर जाओगे और राजबाला दमयंती से अबाध रूप से मिल पाओगे। हम लोग राजद्वार के बाहर उत्सुकतापूर्वक तुम्हारी प्रतीक्षा करेंगे। शुभं भवतु।&nbsp;</p>



<p><strong>नल:</strong> हे सुरवरों! हमारा प्रणाम स्वीकार करें। नल आपके मनोरथ की पूर्ति के लिए राजा भीम के अन्तःपुर में प्रविष्ट होने जा रहा है। (नल प्रवृत्त होता है। देवताओं का प्रस्थान।)</p>



<p><strong>नल: </strong>(आँखों में आँसू भरकर आकाश में निहारते हुए) नल के जीने को धिक्कार है। हाथ में आयी हुई पारसमणि को ठोकर मारने पर विवश हो रहा है। हे देव दुर्लभ सुन्दरी राजकन्ये! ज्वाला को स्तंभित करने के लिए कूद पड़ते हैं काले-काले पतंगे,किन्तु वे जल्द ही पंखहीन बनकर राख हो जाते हैं। तब भी ज्वाला अक्षुण्ण ही रहती है। चाहे जो हो, हे आनन्द निकेतन! तुम्हारे यश की दीपशिखा अम्लान जलती रहे। मनुष्य तो सदा से ही परिस्थितियों का दास रहा है नल! चलो, अब अपनी राह पकड़ो!</p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2013/02/nal-damayanti.html">नल दमयंती: प्रारंभ</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://blog.ramyantar.com/2013/02/nal-damayanti.html/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>6</slash:comments>
		
		
			</item>
	</channel>
</rss>

<!--
Performance optimized by W3 Total Cache. Learn more: https://www.boldgrid.com/w3-total-cache/?utm_source=w3tc&utm_medium=footer_comment&utm_campaign=free_plugin

Page Caching using Disk: Enhanced 

Served from: blog.ramyantar.com @ 2026-04-28 06:56:32 by W3 Total Cache
-->