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	<title>सुदामा Archives - सच्चा शरणम् - साहित्य, भाषा, संस्कृति व अनुभूति</title>
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	<description>हिंदी ब्लॉग। साहित्य, भाषा, संस्कृति, लोक व शास्त्र से संयुक्त। कविता, कहानी, समीक्षा, निबन्ध, नाटक एवं अनुवाद का सहज प्रकाशन। लोक साहित्य का रंग भी।</description>
	<lastBuildDate>Tue, 08 Nov 2022 13:03:34 +0000</lastBuildDate>
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	<title>सुदामा Archives - सच्चा शरणम् - साहित्य, भाषा, संस्कृति व अनुभूति</title>
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		<title>बतावत आपन नाम सुदामा: तीन</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 03 Oct 2014 11:01:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नाटक]]></category>
		<category><![CDATA[सुदामा]]></category>
		<category><![CDATA[कृष्ण सुदामा की मित्रता]]></category>
		<category><![CDATA[कृष्ण-सुदामा]]></category>
		<category><![CDATA[नाट्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>इस प्रविष्टि में कृष्ण सुदामा का मिलन है, भाव की अजस्र धारा है। पिछली प्रविष्टियों  ’बतावत आपन नाम सुदामा &#8211; एक और दो से आगे।...</p>
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<p>इस प्रविष्टि में कृष्ण सुदामा का मिलन है, भाव की अजस्र धारा है। पिछली प्रविष्टियों  ’बतावत आपन नाम सुदामा &#8211; <a href="https://blog.ramyantar.com/2014/09/krishna-sudama.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">एक</a> और <a href="https://blog.ramyantar.com/2014/09/krishna-sudama-2.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">दो</a> से आगे।</p>



<hr class="wp-block-separator has-alpha-channel-opacity is-style-wide"/>



<h3 class="has-text-align-center wp-block-heading">कृष्ण सुदामा का मिलन</h3>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color"><em>(प्रहरी राजमहल में प्रवेश करता है। प्रभु मखमली सेज पर शांत मुद्रा में लेटे हैं। रुक्मिणी पैर सहला रही हैं।<br>समीप में विविध भोग सामग्री सजी पड़ी है। गृह परिचारिकाएँ पंखा झल रहीं हैं। मह-मह सुगन्ध से पवन बोझिल है।)</em></p>



<p><strong>प्रहरी:</strong> हे देवाधिदेव! कृपा-करुणा-वरुणालय, स्नेहाम्बुनिधि, आनन्द-धन द्वारिका नरेश! सिंहद्वार पर एक अत्यन्त दीनहीन जीर्ण-शीर्ण वस्त्र धारण किए, मलिन, थकित, निरावृत पग ब्राह्मण कब से खड़ा है। वह आप से मिले बिना जाने का नाम नहीं ले रहा है। सुदूर देशवासी उस भिक्षुक से दीखने वाले ब्राह्मण की वाणी में बड़ी करुणा है, बड़ा दैन्य है। अपना नाम सुदामा बता रहा है। आपको अपना बालमित्र बता रहा है और कब से आप का धाम पूछते-पूछते भटकते-भटकते सिंहद्वार तक पहुँचा है। क्या आज्ञा है प्रभु?</p>



<p><strong>श्रीकृष्ण: </strong>अरे सुदामा!</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(प्रहरी पीछे छूट जाता है। रुक्मिणी सिंहासन के हिलने से नीचे गिर जाती हैं। कृष्ण पागलों की तरह विक्षिप्त हो, प्राचीर से लड़ते भिड़ते, अस्त-व्यस्त दुकूल सिंहद्वार पर पहुँच जाते हैं। अपनी मृणाल बाहों में विप्र को भरकर कलेजे से सटा लेते हैं। फूट-फूटकर रोते हैं, चरण चूमते हैं। अपने पीताम्बर को उनके गले में लटका देते हैं। फिर गोद में शिशुवत उठाकर कुशल-क्षेम पूछना प्रारम्भ करते हैं।)</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(विप्र के पाँवों को अपने हाथों में लेकर आँखों से बार-बार सहला रहे हैं। <a href="https://bhagavadgita.org.in/Blogs/5a95353208c5f06cbce644b7" target="_blank" rel="noreferrer noopener">युगल नयनों की जलधारा से पाँव धुलता जा रहा है।</a> रुक्मिणी का जलभरा पात्र अभी पहुँचा नहीं कि पगतली बार-बार धुलती गयी।)</p>



<p><strong>सुदामा:</strong> (गदगद कंठ, स्खलित वाणी, भावविभोर होकर) सखा मेरे, हे प्यारे कृष्ण! </p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p>जैसी तुम करी, तैसी करै को<br>कृपा को सिन्धु, ऐसी प्रीति दीनबन्धु दीनन पर आनै को। </p>
</blockquote>



<p>प्रभु जैसा सुना वैसा नहीं, उससे कोटि गुना अधिक पाया। जीवन धन्य हो गया। हे कृष्ण तुम्हारी जय हो! जय हो! जय हो! </p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(दोनों परस्पर गले मिलते हैं और एक दूसरे को सहलाते हैं।) </p>



<p style="text-align: justify;"><strong><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2014/10/Krishna-Sudama.webp" type="image/webp" /><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignright" title="Krishna-Sudama" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2014/10/Krishna-Sudama.jpg?x47177" alt="Krishna-Sudama" width="316" height="218" border="0" /></picture>श्रीकृष्ण:</strong> अरे भोजनभट्ट मेरे बड़े भैया! मेरे सुहृद, यह क्या कर रहे हो? भाभी की भेंट लौटाकर ले जाओगे? प्राचीन आदत मिटी नहीं? मित्र से चोरी अब नहीं चलेगी। <em>(अभी सुदामा कुछ समझ पाते कि कृष्ण उनकी काँख से फटी तन्दुल की पोटली बाहर खींच लेते हैं। कुछ चावल भूमि पर बिखर जाते हैं। श्रीकृष्ण जन्म-जन्मांतर भूखे की भाँति चावल मुट्ठी में भर फाँकना प्रारम्भ कर देते हैं)</em> काफी पुरानी धरोहर है। बिना खाये चैन कहाँ? सुदामा जी! आपकी दीनता और श्याम की दिव्यता का द्वन्द्व युद्ध प्रारम्भ हो गया है। जो लाये हो, अब उसे लेकर नहीं जाओगे।</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(एक मुट्ठी गाल में भर लेते हैं, दूसरी भरकर मुँह के पास ले जाते हैं, तब तक रुक्मिणी आगे दौड़ती हैं। दूसरी मुट्ठी भी कृष्ण मुख में डालते हैं। तीसरी भरने के पूर्व ही रानी उनकी कलाई कसकर पकड़ लेती हैं, प्रभु ठिठक जाते हैं। सुदामा काष्ठवत् सब चुपचाप देख रहे हैं। पूरा रनिवास, सभी सेवक स्तब्ध हैं।) </p>



<p><strong>रुक्मिणी:</strong> हे भुवनेश्वर! दो मुट्ठी तंदुल फाँककर आपने एक भिखारी को दो लोकों का वैभव बिहारी बना दिया है। क्या तीसरी मुट्ठी खाकर गली-गली के मंगन भिखारी स्वयं बन जाना चाह रहे हैं! अब रुक जाओ भक्तवत्सल! </p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(प्रभु के नयन नीर बरसा रहे हैं। सुदामा की हिचकी बँधी है। मंदहास मुरली मनोहर सुदामा के पास आ बैठ जाते हैं। उनकी भुजायें सुदामा के कंधे में झूल जाती हैं। दोनों एक दूसरे को अपलक निहार रहे हैं। दीनानाथ दीनबंधु भक्तवत्सल श्रीकृष्णचन्द्र की जय से वातावरण गूँज उठता है।)</p>



<hr class="wp-block-separator has-alpha-channel-opacity is-style-wide"/>



<h3 class="has-text-align-center wp-block-heading"><span style="text-decoration: underline" class="underline">दृश्य तृतीय</span></h3>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color"><em>(सुदामा का राजमहल सरीखा भवन। पहरेदार, तोरण-पताका, कोष, राजवैभव।)&nbsp;</em></p>



<p><strong>सुदामा:</strong>(चकित-से) अरे मेरी कुटिया कहाँ है? क्या मैं पथ भूल गया हूँ? कहाँ गयी मेरी धर्मभार्या, मेर जीर्णशीर्ण वस्त्रादि, मेरी पूजास्थली, दण्ड आदि।&nbsp;</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(सजी-सँवरी स्त्री के रूप में सुदामा की पत्नी का प्रवेश। हाथ मे आरती की थाल।)&nbsp;</p>



<p><strong>ब्राह्मणी:</strong> स्वामी! मैं ही आपकी वह भार्या हूँ जो मृत्यु का वरण करने के लिए महाकाल का थाल सजा रही थी। आज आपके सामने पूजन की थाली लेकर खड़ी हूँ। आप घर से निकले नहीं कि पलक मारते विश्वकर्मा ने यह सौंध सजाना प्रारम्भ कर दिया। सच में, कृष्ण की अघट घटना पटीयसी करुणा ने मेरी वेदना को आनन्द रागिनी में बदल दिया। (सुदामा की आरती उतारती हैं। सुदामा के आँसू थमने का नाम नहीं लेते।)&nbsp;</p>



<p><strong>सुदामा: </strong>प्रियतमे! अब कृष्ण प्रीतिचन्द्र में ग्रहण मत लगने देना। माँगा ही मुँह खोलकर तो फिर रह ही क्या गया?&nbsp;&nbsp;</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color"><em>(सुदामा विभोर जयकृष्ण, जयकृष्ण कह फूट पड़ते हैं। ब्राह्मणी लज्जित, संकुचित अपने आँचल से उनके आँसू पोंछती है।)&nbsp;</em></p>



<p><strong>ब्राह्मणी:</strong> प्रियतम! दारिद्र्य-अर्गला भग्नकर कृष्ण कृपा की किरण मेरी कुटिया में आ लगी है। मेरे प्राण आज अक्षय विश्वास से भरकर मुस्करा उठे हैं। प्रभु! प्रभात के इस प्रथम निःश्वांस के साथ मेरी चेतना आपको नमन कर सदा के लिए अक्षय बन जाय। मेरी जीवन-यात्रा का पुण्य प्रहर शृंगार कर उठा है। मेरे नैराश्य की शून्य नगरी स्वर्णिम शिखरों से मंडित हो उपहार लुटा रही है और मेरी प्राण-वीणा के तारों पर जैसे आरोह की रागिनी बज उठी है।&nbsp;</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color"><em>(ब्राह्मणी क्षमा याचना के भाव में विप्र के चरणों में बिछ जाती है। सुदामा के नेत्र बन्द हैं। हाथ प्रार्थना की मुद्रा में उठे हैं। जय-जयकार होती है।</em></p>



<p class="has-text-align-center"><strong>|| समाप्त ||</strong></p>
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		<title>बतावत आपन नाम सुदामा: दो</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 23 Sep 2014 04:56:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नाटक]]></category>
		<category><![CDATA[सुदामा]]></category>
		<category><![CDATA[कृष्ण सुदामा की मित्रता]]></category>
		<category><![CDATA[कृष्ण-सुदामा]]></category>
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		<category><![CDATA[सुदामा चरित्र]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पिछली प्रविष्टि बतावत आपन नाम सुदामा: एक से आगे। इस प्रविष्टि में द्वारिकापुरी में सुदामा की उपस्थिति एवं सखा कृष्ण का औत्सुक्य, फिर मिलन-संदेश के...</p>
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<p><a href="https://blog.ramyantar.com/2014/09/krishna-sudama.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">पिछली प्रविष्टि</a> बतावत आपन नाम सुदामा: एक से आगे। इस प्रविष्टि में द्वारिकापुरी में सुदामा की उपस्थिति एवं सखा कृष्ण का औत्सुक्य, फिर मिलन-संदेश के उपक्रम में संवादों की प्रभावान्विता दर्शनीय है। </p>



<hr class="wp-block-separator has-alpha-channel-opacity is-style-wide"/>



<h3 class="has-text-align-center wp-block-heading">दृश्य द्वितीय: द्वारिकापुरी में सुदामा</h3>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color"><em>(द्वारिकापुरी का दृश्य। वैभव का विपुल विस्तार। धन-धान्य का अपार भण्डार। धनिक, वणिक, कुबेर हाट सजाये। संगीतागार, मल्लशाला, शुचि गुरुकुल, प्रशस्त मार्ग, गगनचुम्बी अट्टालिकाओं की मणि-माला, विभूषित अखण्ड शृंखला, सुसज्जित घने विटप एवं राज्य सभागार के फहरते तोरण। <a href="https://en.wikipedia.org/wiki/Sudama" target="_blank" rel="noreferrer noopener">सुदामा </a>चकित, विस्मृत, आत्मविभोर चिन्तनरत कृष्णधाम की खोज में बढ़े चले जा रहे हैं। उपानह हीन पैर, फटा कुर्ता, घुटने तक धोती, फटी पगड़ी, फटा चादर कंधे पर।) </em></p>



<p style="text-align: justify;"><strong><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2014/09/Sudama-at-Krishna-door.webp" type="image/webp" /><img decoding="async" class="alignright" title="Sudama at Krishna Door" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2014/09/Sudama-at-Krishna-door.jpg?x47177" alt="Sudama at Krishna Door" width="393" height="225" border="0" /></picture>सुदामा: </strong>(स्वगत) हे श्रीकृष्ण, सीढ़ियाँ तो केवल खड़े होने के लिए होती हैं। जबकि अवगाहन सीढ़ी से सम्पूर्ण समर्पण माँगता है। तुमसे मिलूँगा तो मैं कहूँगा कि मेरे लिए सबसे प्रिय कार्य यही है कि जिस तरह दर्पण के सामने खड़े होकर मैं अपना मुख निहारा करता हूँ उसी तरह तुम्हारे सामने खड़े होकर अपनी आत्मा को तुम्हारे नेत्रों में प्रतिबिम्बित होता हुआ देखा करूँ। मेरी आत्मा एक नूतन आनन्द के लिए तड़प रही है। उसकी बातों ने मुझे ढकेलकर तुम्हारे द्वारे कर दिया है और मैं अपने व्यग्र हृदय को लेकर तुम्हारे पास आया हूँ। </p>



<p>(मार्ग में भूले हुए-से लोगों से पूछते हैं) भैया! द्वारिकाधीश का धाम कहाँ है? वे कहाँ मिलेंगे? वे मेरे बाल सखा हैं।</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color"><em>(लोग नाक भौं सिकोड़कर दुर्बल गात विप्र को आगे बढ़ने का संकेत कर देते हैं। वे पुनः विचार मग्न हो ठिठकते चले जा रहे हैं। एक ही तरह की भवन शृंखला एवं समान वैभव विस्तार से उन्हें आश्चर्य एवं मतिभ्रम हो रहा है।)</em></p>



<p><strong>सुदामा:</strong> (स्वगत) वाह रे द्वारिका के राजाधिराज! अधिक तपस्वी वे ही हैं जो पहले भी ताप सहे और अन्त में भी। उनकी तपस्या की बराबरी वे कैसे कर सकते हैं जिन्होंने प्रारम्भ में भले ही यातनायें सहीं किन्तु अन्त में तो मेवा ही चखा। (प्रकट) हे भाई गृहपति! द्वारिकाधीश का द्वार कौन है, बता दोगे? (आगे बढ़ने का इशारा पाते हैं)&nbsp;</p>



<p><strong>सुदामा:</strong>(एक भद्र पुरुष से पूछते हैं) तात! राजाधिराज महाराज द्वारिकापति भूप श्यामसुन्दर मदनमोहन श्रीकृष्णचन्द्र जी का घर कौन-सा है?</p>



<p><strong>भद्र पुरुष:</strong> विप्रवर! ठीक सामने वह जो स्वर्णखचित सिंहद्वार दृष्टिगोचर हो रहा है, वही महाराज श्रीकृष्ण का घर है। प्रहरी वहां विराजमान हैं। उन्हीं से आपको सब ज्ञात हो जायेगा।&nbsp;</p>



<p><strong>सुदामा:</strong> चिरंजीव भद्र। (पास जाते-जाते बुदबुदा रहे हैं) प्यारे कृष्ण! कब तुम्हारा मुखचन्द्र देखूँगा! धरती की धूलि आकाश पर खिले उज्जवल प्रसून का सुख चाह रही है। तुम्हारे ध्यान से मेरी सम्पूर्ण स्मृति मूर्च्छित-सी होती जा रही है। लगता है, अब कुछ भी निवेदन करने का अवसर नहीं रह गया है।&nbsp;</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color">(पास पहुँचकर एक प्रहरी से निवेदन करते हैं)&nbsp;</p>



<p>मेरे प्यारे कृष्णानुरागी प्रिय! मुझे श्रीकृष्ण से मिला दो। मेरा नाम उन्हें बता देना। कहना, गुरुकुल में साथ-साथ पढ़े सुदामा नामधारी ब्राह्मण आपका दर्शन करना चाहते हैं। कृष्ण मेरे बाल सखा हैं। मेरी यह विनती उन तक पहुँचा न दो मेरे प्यारे।&nbsp;</p>



<p><strong>प्रहरी:</strong> विप्र! प्रभु के विश्राम का समय तो हो गया है। क्या आप कुछ रुक नहीं सकते हैं?&nbsp;</p>



<p><strong>सुदामा:</strong> भैया! बहुत दूर से आया हूँ। कृष्ण प्यारे का अधिक समय नहीं लूँगा। हालचाल के बाद तुरन्त वापस हो जाऊँगा। ब्राह्मण की विनती है। अनसुनी न करो। मैं उनसे मिलने को बेचैन हूँ।&nbsp;</p>



<p><strong>प्रहरी:</strong> अच्छा ठहरिए! देश, काल, अवसर देखकर तदनुसार आपको सूचित करता हूँ।</p>



<p class="has-text-align-right"><a href="https://blog.ramyantar.com/2014/10/krishna-sudama.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">क्रमशः- </a></p>
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		<title>बतावत आपन नाम सुदामा: एक</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2014/09/krishna-sudama-3.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 07 Sep 2014 06:31:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नाटक]]></category>
		<category><![CDATA[सुदामा]]></category>
		<category><![CDATA[कृष्ण सुदामा की मित्रता]]></category>
		<category><![CDATA[कृष्ण-सुदामा]]></category>
		<category><![CDATA[नाट्य]]></category>
		<category><![CDATA[मित्रता]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दृश्य प्रथम: सुदामा की कुटिया (सुदामा की जीर्ण-शीर्ण कुटिया। सर्वत्र दरिद्रता का अखण्ड साम्राज्य। भग्न शयन शैय्या। बिखरे भाण्ड, मलिन वस्त्रोपवस्त्रम। एक कोने विष्णु का...</p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2014/09/krishna-sudama-3.html">बतावत आपन नाम सुदामा: एक</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">सच्चा शरणम् - साहित्य, भाषा, संस्कृति व अनुभूति</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<h3 class="has-text-align-center wp-block-heading">दृश्य प्रथम: सुदामा की कुटिया</h3>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color"><em>(सुदामा की जीर्ण-शीर्ण कुटिया। सर्वत्र दरिद्रता का अखण्ड साम्राज्य। भग्न शयन शैय्या। बिखरे भाण्ड, मलिन वस्त्रोपवस्त्रम। एक कोने विष्णु का देवविग्रह। कुश का आसन। धरती पर समर्पित अक्षत-फूल। तुरन्त देवार्चन से उठे सुदामा भजन गुनगुना रहे हैं। सम्मुख प्रसाद और जल रखती ब्राह्मणी। ब्राह्मणी की आँखों से आँसू टपक रहे हैं, श्वांसे गर्म हैं। उदास किनारे खड़ी हो जाती हैं। होंठ काँप रहे हैं, हाथ मुद्रित हैं।)</em></p>



<p><strong>सुदामा:</strong> भद्रे! रात्रि अस्पष्ट होती जा रही है। आलोक के अक्षयवट के नीचे ज्योत्सना ध्यान में डूब गयी है। दिगन्त के तट पर उषा अमृत कलश भर रही है। प्रभु के मन्दिर में प्रत्यूष का शीतल संगीत प्रारम्भ हो गया है। आकाश के नीड़ में प्रकाश का पक्षी जाग उठा है। इस विसुध आलोक के स्वर में तुम्हारी वेदना की झंकृति क्यों हो रही है। तुम्हारी श्वांस प्रश्वांस में यह कैसा रुदन झनझना रहा है!</p>



<p><strong>ब्राह्मणी:</strong> प्राणेश! अब सहा नहीं जाता। दारिद्र्य के इस विष बुझे बाणों ने कलेजे को एकदम जर्जर कर दिया है। जीवन के बोझ से झुके कंधे अब कभी सीधे नहीं हो सकते। घोर दुखों के घेरे में कभी सुख न जाने। विपत्ति की अंधियारी राहों में अनगिनत कांटे चुभे हैं। हृदय और मस्तिष्क को कहीं प्रकाश की झलक भी न मिली। एक क्षण हंसने को न मिला। जीवन आशा विरहित संज्ञाहीन शव की भांति हो गया है। अब इसे जकड़कर बाहों के आलिंगन में नहीं रख सकूँगी। आँसुओं भरी अपनी धरती पर अंतिम दर्शन का आँचल बिछाये इस भिक्षुणी की भूल चूक माफ करना हृदयेश्वर। अंतिम प्रणाम स्वीकारो। अब जीवन लीला का अवसान कर दूँगी।</p>



<p><strong>सुदामा: </strong>रुको भद्रशीले! यह क्या? तेरे इन पाँवों में फिसलन कहाँ से आयी? दैव विधान का अतिक्रमण कभी किसी के बूते की बात रही है? अतीत का अकृतार्थ निष्फल जीवन, चेतना का स्खलन-पतन, अशुभ-अनिष्ट का वरण सुदामा की धर्मपत्नी का शील हरण करने में सफल हो जाय- क्या यही चाहती हो!</p>



<figure class="wp-block-pullquote alignright"><blockquote><p>आप पाषाण के समान अचल रहे, किन्तु मैं अन्तःसलिला सदानीरा नहीं रह सकी। </p></blockquote></figure>



<p><strong>ब्राह्मणी:</strong> स्वामी! शास्त्रविद तो आप हैं ही। क्या ’दारिद्रमनन्तकम् दुखम्’ की उक्ति सत्य नहीं है? इस भग्न कुटीर के शीर्ष पर कितनी बार वसंत आकर लौट गया है और उसके अर्पित कंजन कुसुमों की धूलि में मिल मेरी अश्रुधारा वाय की गोद में विलीन हो गयी। कितनी बार ग्रीष्म यहाँ तप कर चला गया है और मेरी उदास संध्या उसकी व्यथा कथा ढोती रही। कितनी बार इस कुटिया के शीर्ष से श्रावणी मेघ मल्हार गाता हुआ पार हुआ है, मैं दीना दुःख की कथरी को समेटने में लगी रही। हंसों की माला पहने कितनी बार शरद आया है और स्वप्न की भाँति पार हो गया। चक्रवातों के क्रन्दन में लिपटा हेमंत आया है और अश्रु की ओस बूँदों से मैं लथपथ हो गयी हूँ। अपने मर्मर में पागल बने शिशिर के सामने सब अंगहीन, दीन प्राणों ने प्रलाप के स्वर में स्वर मिलाया है। आप पाषाण के समान अचल रहे, किन्तु मैं अन्तःसलिला सदानीरा नहीं रह सकी। नाथ! मैं मनोरथों के निर्गन्ध पुष्प एकत्र करती रह गयी। तुम्हारे मनचाहे अर्चा की बेला बीत गयी। फिर कभी जन्म होगा तो यह दासी आपकी पगतरी बनकर जीवन धन्य करेगी। अब विदा चाहती हूँ इस जीवन से।</p>



<p><strong>सुदामा:</strong> देवि! संदेहों के दीवट पर विश्वास का चिराग जलाओ! जीवन के अर्क से प्रेम स्नात होता है, जीवनान्त से नहीं। तुम्हीं बताओ, मेरे धूल भरे चरणों की छालों की महक में ऐसा कौन-सा रस मिल गया था कि जिससे आकृष्ट होकर तुमने अपने अश्रु नीर से उन्हें धोकर उन्हें अपने अधरों से चूम लिया था। आज क्या हुआ कि मुझ अकिंचन को और अकिंचन बना रही हो। परिस्थिति की प्रतिमा का अभिषेक आँख की सीपी में सुरक्षित स्वाति बूँदों से करो। श्रीकृष्ण की करुणा की विश्वासी बनो। ज्ञान के आलोक में देखो। यह समस्त संसार उसी के दर्पण में प्रतिबिम्बित है। माधव-स्मृति में एक ऐसे अमृत का स्रोत निरन्तर बहता है जो हर पार्थिवता को अमर बना देता है। प्रिये! धैर्य न छोड़ो।</p>



<p style="text-align: justify;"><strong><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2014/09/Sudama2Band2Bhis2Bwife2Bdiscussing2Bfor2Bhelp2Bof2BKrishna.webp" type="image/webp" /><img decoding="async" class="alignright" title="Sudama and his wife " src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2014/09/Sudama2Band2Bhis2Bwife2Bdiscussing2Bfor2Bhelp2Bof2BKrishna.jpg?x47177" alt="Sudama's wife urges him to seek ShriKrishna-help" width="316" height="198" border="0" /></picture>ब्राह्मणी:</strong> मेरे स्वामी! जीवन का आदि पढ़ते-पढ़ते मैं उन आख्यानों उपाख्यानों से उकता कर उसके अंत को देखने के लिए उत्सुक हो गयी हूँ। सारी उमंगे टकराकर चकनाचूर हो गयी हैं। अपने प्राणों की करुण लालसायें अब आप को अर्पित करती हूँ। हाय, कृष्ण की मित्रता भी आपके लिए दो कौड़ी को हो गयी। इस हाड़तोड़ दरिद्रता में आपको जीवित ही मार डालने वाले द्वारका के राजा का कौन सा यश बढ़ रहा है! आपने अपने स्वामी की निज-जन-रक्षण की माला के मनके में दाग लगाने की ही ठान ली है। ऐसे जीवन से तो मरण भला है।</p>
<p style="text-align: justify;">अब तक अर्द्ध मूर्च्छा में पड़ी मैं मन को भाँति-भाँति भुलावे से समझाती रही किंतु अब दरिद्रता की विषैली नागिन का गरल हृदय तक लहराने लगा है, और मेरा अंग प्रत्यंग असह्य दरिद्रता की दारुण ज्वाला में दहक रहा है। यदि मेरी महायात्रा के अंत तक आपके धैर्य-प्रदीप का स्नेह न समाप्त हो और अदृष्ट अवलम्बन की लकुटी न डगमगाये तो अधरों से मेरी भींगी पलकें पोंछकर आप अनुग्रह के करों से मेरे असंख्य पापों की कालिमा धो देना। जीवन नाटिका पर अंधकार की यवनिका का पटाक्षेप होने के पूर्व अब यह दुर्भाग्यदलिता दरिद्रा आपको तथा आपके लक्ष्मीपति मित्र द्वारिकाधीश को अंतिम प्रणाम करती है।</p>



<p><strong>सुदामा:</strong> प्रिये! प्रारब्ध का दारुण खेल चल रहा है। मैं कृष्ण का चरणानुरागी हूँ, धनानुरागी नहीं हूँ।</p>



<p><strong>ब्राह्मणी:</strong> मरे को मारकर मंगल चाहना आपके किस भगवान का रचा विधान है। द्वारे-द्वारे भटकना ही भक्ति का मानक है तो ऐसे भक्त और ऐसे भगवान को मैं क्या कहूँ? आप द्वारिका जाने के नाम से चिढ़ते रहे हैं। जिसका घर ही उजड़ गया हो उसका परलोक क्या? सब निचुड़ गया है। स्वल्प&nbsp; भी मिलता तो संतोष रहता। हाय!</p>


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<figure class="aligncenter size-large"><img decoding="async" src="https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/b/bc/Sudama%27s_wife_urges_him_to_seek_Krishna%27s_help%2C_ca._1775-ca._1790.jpg" alt=""/><figcaption class="wp-element-caption">Sudama’s wife urges him to seek Krishna’s help   Source: <a href="https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Sudama%27s_wife_urges_him_to_seek_Krishna%27s_help,_ca._1775-ca._1790.jpg" target="_blank" rel="noreferrer noopener">Wikimedia</a></figcaption></figure>
</div>


<p><strong>सुदामा:</strong> प्रिये! तुम मुझे तब छोड़कर जाने को राजी नहीं हुई जब कई दिन अन्न का मुँह नहीं देखा था और वह कठिन समय तुम मुझसे बातें करके काट लेती थी। तब नहीं छोड़ना चाहा था जब तुम्हारी सूखी छातियों में दूध नहीं होता था और अपने बच्चों को लोरियाँ गा-गाकर बहलाती थीं। तब नहीं छोड़ना चाहा, जब आँखों में पानी की परत लिए आकाश को निहारती रहती थी और आँखों से बरबस फूट पड़ने वाले आँसुओं को तुम हँस-हँसकर मुझसे छिपाती थी। भद्रशीले! तब मुझे छोड़कर नहीं गयी जब चटाई पर पड़ा मैं हड्डियों की मुट्ठी होकर रह गया था, कोई मेरे पास नहीं फटकता था। मेरी गन्दी चादर धोते, मेरे गीले कपड़ों को बदलते तुम नहीं ऊबती थी। मेरी हड्डियों की ठठरी को दुर्बल बाहों में उठा-उठाकर कंधे को सटा लेती थी और विलख-विलखकर मेरे प्राणों की भीख माँगती थी। आज क्या हो गया है तुम्हें? धैर्यवती का धीरज क्यों छूट रहा है?</p>



<p><strong>ब्राह्मणी:</strong> प्राणनाथ! किसी अदृश्य संकेत ने मुझे मथ दिया है। दुर्दशा की हद हो गयी है। एक पथ भूला राही किसी बन्द गली में आकर रुक जाय, ऐसी मेरी हालत हो गयी है। सारी पीड़ा, सारे दुःख, सारे अभाव एकत्र होकर मुझ दीना के विरुद्ध षड़यंत्र रच रहे हैं। अपनी मनोदशा क्या कहूँ? जैसे किसी डाल पर कोई घोंसला बनाये और नीचे से डाल टूट जाए। सारा रुदन अपने हिस्से समेटकर विदा हो जाना चाहती हूँ कि आपको न रोना पड़े।</p>



<p><strong>सुदामा:</strong> रुको भार्या-शिरोमणि! काल्पनिक छायाओं में न भागो जो तुम्हें विग्रह में डालती हैं। जो अतीत जीवन से मुक्त, भविष्य के जन्म मरणों से परे है, जिसमें हमारी स्थिति है, जिसमें हम सदा स्थित रहेंगे, उसी की आराधना करो और सभी प्रतिमाओं को तोड़ दो।</p>



<p><strong>ब्राह्मणी:</strong> प्रिये! वह प्रकाश प्रकाश नहीं है जो अंधेरे के भीतर है। कृष्ण की करुणा क्या शब्दकोष में ही दिखेगी? मित्र के दुःख का दूर से आनन्द लेना किस मैत्री का निर्वहन है।</p>



<p><strong>सुदामा:</strong> नहीं मानती हो, तो मैं कृष्ण के पास जा रहा हूँ। अपने प्राणों का परित्याग न करना। पर खाली हाथ कैसे जाऊँ। मन विचित्र हो रहा है। जिस मुँह से प्रेम मागा उसी से वैभव की याचना? फिर भी, त्रिया हठ के चलते जा रहा हूँ। कुछ हो तो दे दो।</p>



<p class="has-text-align-center has-vivid-red-color has-text-color"><em>(ब्राह्मणी थोड़ा तन्दुल लाकर देती है। सुदामा उसे अपने फटे दुपट्टे की कोर में बाँध लेते हैं। हरि-स्मरण करते हुए गृह से बाहर निकलते हैं।)</em></p>



<p class="has-text-align-right"><a href="https://blog.ramyantar.com/2014/09/krishna-sudama-2.html">क्रमशः- </a></p>
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