भोजपुरी Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम् https://blog.ramyantar.com/category/भोजपुरी हिंदी ब्लॉग। साहित्य, भाषा, संस्कृति, लोक व शास्त्र से संयुक्त। कविता, कहानी, समीक्षा, निबन्ध, नाटक एवं अनुवाद का सहज प्रकाशन। लोक साहित्य का रंग भी। Sun, 01 Mar 2026 06:38:28 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.2 https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2024/03/cropped-favicon-4-32x32.png भोजपुरी Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम् https://blog.ramyantar.com/category/भोजपुरी 32 32 शैलबाला शतक: भोजपुरी स्तुति काव्य (तेरह) https://blog.ramyantar.com/2017/04/shailbala-shatak-13.html https://blog.ramyantar.com/2017/04/shailbala-shatak-13.html#respond Mon, 03 Apr 2017 08:03:00 +0000 भाव कै भूख न भीख कै भाषा सनेह क जानी न मीन न मेखा कवनें घरी रचलै बरम्हा मोके हाँथे न माथे में नेह की...

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शैलबाला शतक: भोजपुरी स्तुति काव्य के छन्द पराम्बा के चरणों में अर्पित स्तवक हैं। यह छन्द विगलित अन्तर के ऐकान्तिक उच्छ्वास हैं। इनकी भाव भूमिका अनमिल है, अनगढ़ है, अप्रत्याशित है। भोजपुरी भाषा के इच्छुरस का सोंधा पाक हैं यह छन्द। इस रचना में भोजपुरी की लोच में, नमनीयता में सहज ही ओज-प्रासाद गुम्फित हो गया है। लोकभाषा की ’लोकवन्द्य’ शक्ति का परिचय देते हैं यह छन्द।

इस काव्य रचना के प्रारंभिक चौबीस छंद कवित्त शैली में हैं। इन चौबीस कवित्तों में प्रारम्भिक आठ कवित्त (शैलबाला शतक: एक एवं शैलबाला शतक: दो) काली के रौद्र रूप का साक्षात दृश्य उपस्थित करते हैं। प्रारंभिक छः प्रविष्टियों (शैलबाला शतक: एक, दो, तीन, चार, पाँच, छः) में इन चौबीस कवित्त छन्दों को प्रस्तुत किया जा चुका है। इसके बाद की प्रविष्टियाँ सवैया छंद में रची गयी हैं, जो इस ब्लॉग पर प्रकाशित हो चुकी हैं। इस प्रविष्टि के साथ ही शैलबाला शतक: भोजपुरी स्तुति काव्य इस ब्लॉग पर सम्पूर्ण हो रहा है।

भाव कै भूख न भीख कै भाषा सनेह क जानी न मीन न मेखा
कवनें घरी रचलै बरम्हा मोके हाँथे न माथे में नेह की रेखा
काँप उठि जम कै टँगरी उघरी हमरी करनी कै जो लेखा
एकहु बेर हमै करुनामयि पंकिल आँखि उघारि के देखा॥९७॥

एक स्वयं हम तीत करइला चढ़े दुसरे अघ नीम के रूखै
याद जबै जमदण्ड की आवै जिया झरबेर के काँट लौं सूखै
धीरज देत सुभाव तोहार पिटात तनय तन माई कै दूखै
पंकिल पूत भले हो कसाई पै माई सदा खरजूतिया भूखै॥९८॥

बीन के पुण्यन कै बिखरे तिनका जबहीं बिरची लघु छान्हीं
चोंथ कबारि किनारे करै करुनामयि काम की भीषन आन्हीं
खोदौं पहार कढ़ी चुहिया गर्हुआत बा पाप क पोटरि बान्हीं
पंकिल हे दुखिया क मतारी उठाइ ला गोद बिठाइ ला कान्हीं॥९९॥

काम से कइसों बचाइ ला माई ई धै बरियाई बिषय सरि गोतत
कोटिक दाँत निपोरी करीं पर छोड़ै न जइसे चहै तस जोतत
अवगुन पाप चमेली क तेल छुछुन्नर पंकिल माथे पै पोतत
तोरी कृपा अन्हियार मिटी पनबादर भानु के नाहिं अलोपत॥१००॥

ऊसर बा हमरी जिनगी करि दा गिरिनन्दिनि जीवन नन्दन
मानत हौं मोरि पीर बृथा न सही बिरहागि न व्याकुल क्रन्दन
पै एतनों सच हौ असमर्थ हूँ हो न सकै तेरो अर्चन बन्दन
चाह करौं तेरे पंकज पाँव की पंकिल धूरि लिलारे को चन्दन॥१०१॥

माँगौ नहीं सुगती मुकती बल बैभव ज्ञान गुमान बड़ो जस
साचों कहौं करुनामयि अम्ब तोहिं हमरी सुख सम्पति सरबस
जौ लगि पंकिल की जिनगी जग बीच रहै दुइ चारि दिना दस
रावरे नेह क गीत सदा हमरी सँसरी में बजै बँसुरी अस॥१०२॥

आलस पुंज रुचै भल भोजन घूमल चाहै न लाठे न डाँड़े
आनै क गूर औ आनै क घीव पै भोग लगावल चाहै लँ पाँड़े
डूबि मरीं चिरुआ भर पानी में फोरै घरे सिल ठेस पहाड़े
पंकिल तों सम माई की गोद में जीबो भलो चाहे मारे कि छाड़े॥१०३॥

एक त अइसे कपूत नलायक नाचन आवै न आँगन टेढ़ा
दूजे सवार सदा सिर काम बिलाए के पंथ कै लवले बा लेढ़ा
ना मन के थिर राखै कबौं गुन अवगुन बीच भिड़वले बा मेढ़ा
पंकिल काँहें न तूँ टस से मस होखैलू बइठि निहारैलू खेढ़ा॥१०४॥

भारत देश परोस में गंग औ काशीपुरी कुल भूसुर खाँटी
अइसन पाइ संजोग अभागा ई हीरा शरीर के कइलस माँटी
पूछी के पंकिल के कुकुरा बस डाँटन जोग जौ काटी की चाटी
माई बिपत्ति हरइया तोंहीं हँसवइया सबै दुख केहू न बाँटी॥१०५॥

नाहिं टिकै पद कंज तोरे डगरै मन मोर ज्यों थारी में पारा
तोंसे दयामयि कौन दुराव मनोज के आगे चलै नाहिं चारा
तूँ जग की दुखभंजनिहार हमार छली दुरबासना मारा
देही का तोंहिं दरिद्दर पंकिल ठाढ़ बा ले जल लोचन खारा॥१०६॥

अंतक आयसु से जननी दुतवा नटई तरवार से रेती
कौनों कमाई न का करबै मोरे गॉंवे न धाम सिवाने न खेती
पंकिल लीला तोरै महामाया सुतइबी त सूती चेतइबी त चेती
रंजिस नाहिं भली लरिका से तूँ गोदी में काँहें उठाइ न लेती॥१०७॥

मोर अन्हेरपुरी नगरी उर राज करै मन चौपट राजा
लूट मँची मनमानी भवानी टका सेर भाजी टका सेर खाजा
सूतल बाड़ू की जागलि माई तूँ ले तरवार खड़ा होइ भाँजा
पंकिल ताजा रहै तोहरे बल बाजै गहागह बिक्रम बाजा ॥१०८॥

—————————–समाप्त——————————

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करुणामयी जगत जननी के चरणों में प्रणत निवेदन हैं शैलबाला शतक के यह छन्द! शैलबाला शतक के प्रारंभिक चौबीस छंद कवित्त शैली में हैं। इन चौबीस कवित्तों में प्रारम्भिक आठ कवित्त (शैलबाला शतक: एक एवं शैलबाला शतक: दो) काली के रौद्र रूप का साक्षात दृश्य उपस्थित करते हैं। प्रारंभिक छः प्रविष्टियों (शैलबाला शतक: एक, दो, तीन, चार, पाँच, छः) में इन चौबीस कवित्त छन्दों को प्रस्तुत किया जा चुका है। इसके बाद की प्रविष्टियाँ सवैया छंद में रची गयी हैं, जो क्रमशः प्रस्तुत हैं। शैलबाला शतक – सात, आठ, नौ, दस एवं ग्यारह के बाद प्रस्तुत है अगली कड़ी-

का रहलीं भइलीं हम का जगदम्ब अराधै में आवैले जूड़ी
सौ सौ सासत झेलत नींच पै पापै क बइठल पोवत पूड़ी
पंकिल की बेरियॉं देवता हरलैं सब बइठल पेन्ह के चूड़ी
माई तोरै बल चाहे दुलारा या अँइठि के चूल्ही में जोरि दा मूड़ी॥८५॥
आरत बैन पुकारत दीन बेचैन फिरै पग पिंडलि सूजी
पेट के हेत चपेट सहै नाहिं चेट में एको छदाम की पूँजी
मारत मूस कलइया मड़इया में भौन में पुण्य की भाँगों न भूँजी
पंकिल पै ढरि ना घटबू यश जयजयकार दिगन्तर गूँजी॥८६॥
काम मथै मन आठो घरी धुन पापन की घुन लागे अनाजे
भोग की नींद में मातल नींच कबौं सुमिरै न अकाजे बिकाजे
पंकिल बूझि रहै परिनाम तबौं अघलीन मरै नहिं लाजे
लेहु उबारि तूँ बाँह पसारि गोहार करै बम्हना दरवाजे॥८७॥
शैलबाला शतकजीवन बीतत जात बृथा अजहूँ चित चंचल चेतत नाहीं
हाय बिहाइ दई सुर रूख गही तितली भॅंड़भॉंड की छॉंहीं
अंजलि जोरि निहोरि कहीं पकरीं अॅंगुरी पथ भूलल राही
राखहु अम्ब करीब गरीब के पंकिल की जिनगी के निबाही॥८८॥
लोचन मइल तूँ कै मोंहि चाहैलू कौन से घाट कै पानी पियावल
पंकिल कइसे ओही कर से बिष घोरि पियइबू जे दूध पियावल
कइसे मतारी रही चुप देखि के आँखि के आगे तनय ढठियावल
कौड़ी के मोल बिकात तनय तोर काँहें न चाहैलू तूँ अपनावल॥८९॥
धै बहियाँ भटके सुत कै कब ले चलबू रहिया सगुनौती
की तूँ न ऊ बुढि़या मोर माई जे माथो दुखइले पै मानै मनौती
काम कसाई बली महिसासुर माई पछारैला देइ चुनौती
पंकिल के गोदिया में उठाइ ला देबि दयामयि माई भगवती॥९०॥
चाहत नींच चखै फल आम कै बाउर बोइ बबूर की गाँछी
कोऊ रहै न चहै हमरे अँजरे पँजरे भनकै अघमाँछी
सार सम्हार करइया तोंही हमरी कछनी रुचि के रचि काछी
जोग छमा के गिनालैं सदा जननी सुत पंकिल बाम्हन बाछी॥९१॥
आपन पोसल लाख खली न केहू कुकुरो घर से दुरियावै
आँखिन ओट न होखन देत तनय सहि चोट मतारी बचावै
माता से तो बड़ नाता न देखल चाहे केहू कुछहू बतियावै
माई के नाँव क लाज रखा तुहिं पंकिल पूत गोहार लगावै॥९२॥
का मुँह लै बिनईं मँहतारी दुआरी तोहारी कलंकित कीनी
हौं तोहरी पचरंग दई चुनरी दगिहा लुगरी कइ दीनी
सत्तर मूँस चबाइ के पंकिल चाहै बिलारी भई भगतीनी
माई सबै सुख सम्पति छीनी पै आपन अम्ब दुलार न छीनी॥९३॥
ना सपनो में तूँ लउकैलू माई लखाय न खंजन कोने भँडारा
ना दहिनी फरकै अँखिया नाहिं कागा मुरेरे पै बाँटै ला चारा
आवा हमैं अपनावा दयामयि तूँ हमसे न करा छुटकारा
पंकिल के चाहे मारा दुलारा पै दीन बेचारा कै तोंहीं सहारा॥९४॥
की बड़की मोर माई न तॅूं कि न हौं बेटवा बड़का धमधूसर
की बिधिना लिखलैं भगिया हमरी तजि लेखनि थाम के मूसर
मो सम पूत अनेक तोरे पर तों सम माई हमार न दूसर
सींचि हरा करि दा जननी निज नेह के नीर से पंकिल ऊसर॥९५॥
सम्भु प्रिया मन मानै न मोर थिरात न जइसे लगी कुकुरौंछी
अम्ब पसीज के फेरि ला तॅू अपनी ओरियॉं हमरी मति ओछी
माई कोंहाइ के जालू कहॉं बिलखात बेटउवा क ऑंस के पोंछी
पंकिल लोटि चिरौरी करै दुखिया रखि पावैं गरे की अँगोछी॥९६॥

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शैलबाला शतक: भोजपुरी स्तुति काव्य (ग्यारह) https://blog.ramyantar.com/2017/04/shailbala-shatak-11.html https://blog.ramyantar.com/2017/04/shailbala-shatak-11.html#respond Fri, 31 Mar 2017 23:58:00 +0000 शैलबाला शतक स्तुति नयनों के नीर से लिखी हुई पाती है। इसकी भाव भूमिका अनमिल है, अनगढ़ है, अप्रत्याशित है। करुणामयी जगत जननी के चरणों...

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शैलबाला शतक स्तुति नयनों के नीर से लिखी हुई पाती है। इसकी भाव भूमिका अनमिल है, अनगढ़ है, अप्रत्याशित है। करुणामयी जगत जननी के चरणों में प्रणत निवेदन हैं शैलबाला शतक के यह छन्द! शैलबाला-शतक के प्रारंभिक चौबीस छंद कवित्त शैली में हैं। इन चौबीस कवित्तों में प्रारम्भिक आठ कवित्त (शैलबाला शतक: एक एवं शैलबाला शतक: दो) काली के रौद्र रूप का साक्षात दृश्य उपस्थित करते हैं। पिछली छः प्रविष्टियों (शैलबाला शतक: एक, दो, तीन, चार, पाँच, छः) में इन चौबीस कवित्त छन्दों को प्रस्तुत किया जा चुका है। इसके बाद की प्रविष्टियाँ सवैया छंद में रची गयी हैं, जो क्रमशः प्रस्तुत हैं। शैलबाला शतक – सात, आठ, नौ एवं दस के बाद प्रस्तुत है अगली कड़ी-

Shailbala Shatakचाही न बाउर के कछु आउर नेह क तूँ जेवनार बनावा
बोलि के खेलत पंकिल लाल के ले गोदिया दुलराइ जेंवावा
मद्धिम होन न पावे कबौं सुधि दीपक कै बतिया उकसावा
आग लगे का कुँआ खोदबू मुँह फेरा न माँ अँखिया से गिरावा॥७३॥अवगुन जाल फँसी जिनगी न बवाल ओराय कबों ओरियावल
जन्म हजारन के अघ की गठरी पर बा गठरी जोरियावल
जाई सही जमदूतन से अघ पंकिल प्रान बड़ा लतियावल
काहें के दूलम कइलू तोहूँ जननी अपनों बोलबो बतियावल॥७४॥

लालन कै मॅुंहवाँ मुरझै मत राखैलु आँचर ओट छिपाई
सातो समुन्दर सूखी पै माई तोरे उर कै दुधवा न ओराई
देखि तनय मुख स्वेद बिहाल तू पंकिल शोनित देलू बहाई
का करुना चुकलीं सिगरी घर फूँक तमाशा निहारैलू माई॥७५॥

बइठल तूँ चुप कइसे निहारैलू काम कसाई हमै धरि पीसत
रंचक जौ अँकुरै अनुराग त सोर उखारि के लातन मीसत
तोहूँ से काम कि भइलैं बली इहै पंकिल सोच करेजे में टीसत
दूधौ नहाय औ पूतों फरै जग जाको मोरी जगदम्ब असीसत॥७६॥

अन्तर मोर अन्हार गली न खिली रउरी अनुराग की राका
भाव सुगन्ध विदा उर से भवभामिनि नैन उघारि के ताका
मोर हृदय गढ़ तोर मच्यो तॅह पंकिल काम को धूम धड़ाका
पूत पुकारत हे दुख हारिनि जागा तोहार झुकै न पताका॥७७॥

कूदै सदा चढ़ि क्रोध कपारे मनोज करै बरजोर चढ़ाई
मत्सर की मुँगरी मुँह फोरत घोर करै अभिमान खिंचाई
आठो घरी घोरियवले घृना बिषयान की रात दिना पहुनाई
माई कोंहइलू कि गइलू ओंहाय कि पंकिल की न सुहाय रोआई॥७८॥

ज्यौं निरमोही तोंहिं बनबू फिर जाइ बसी कँहवाँ ममता रह
ना सुनली कि बेहाल तनय के बिहाइ मतारी हो नौ दू इग्यारह
कइसन माई हऊ नाहिं सालत कोढ़ में खाज गयो करजा रह
नैन उघारि निहारा बजै सुत पंकिल के चेहरा पर बारह॥७९॥

उफ्फर का तोहउँ डलबू अब जेके कहीं पुछवइया न कोई
सोचैलू पूत बड़ा तोहरे बिन बोले कि काग बिहान न होई
लेकिन माई हौ माइयै बइठल जोहै ले पैंड़ा बनाय रसोंई
बउरहवा बिलखै सुत पंकिल कइसे करेज न तोर करोई॥८०॥

तूँ सुत के नहवाइ सजाइ के भेंजैं लू खेलै दिठौना लगा के
आपस में अझुराइ कोंहाइ के लौटै घरे मुँहवाँ लटका के
पंकिल पागल होखैलू दइया रे का के खियवलस कइलस का के
हाय ऊ गइलैं दुलार कहाँ धँसि डूबि मरीं जननी कँह जा के॥८१॥

ऊपर से भल लागै भले भींतरा करतूत महान घिनौनी
काम के नाम पे नानी मरै पर नीच के चाही करेर नचौनी
सोझे मुँहें केहु बातो न पूछत बा सबकी टेढिअइलै बरौनी
पंकिल चउपट खम्भ के त्यागि के तोंहू बना मतवा मत मौनी॥८२॥

जौ सुत भार अँगेजै में काँपैलू काँहे मतारी क नाँव धरउलू
की हमके कढ़लू खोंढ़रा से न थारी बजउलू न सोहर गउलू
जौं जनलू कुल बोरन होइहैं त कॉंहें न माहुर घोर पियउलू
पंकिल की बेरियाँ मँहतारी तूँ ऊसर भइलू कि दूसर भइलू॥८३॥

अवगुन एको न बाचल बा अघिया करतूत में जव जव आगुर
लायक ना तोहरे जग जोग न दूनौं ठईं करनी से लजाधुर
त्रास धनी जन कै जम कै न घरे क न घाटे क धोबी क कूकुर
पंकिल कै दुखवा बूझिहा मुँहवाँ तोर ताकत टूकुर टूकुर॥८४॥

Photo Source: Google, Wikipedia

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शैलबाला शतक: भोजपुरी स्तुति काव्य (दस) https://blog.ramyantar.com/2015/10/shailbala-10.html https://blog.ramyantar.com/2015/10/shailbala-10.html#respond Tue, 20 Oct 2015 10:56:00 +0000 शैलबाला शतक शैलबाला शतक नयनों के नीर से लिखी हुई पाती है। इसकी भाव भूमिका अनमिल है, अनगढ़ है, अप्रत्याशित है। करुणामयी जगत जननी के...

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शैलबाला शतक
शैलबाला शतक नयनों के नीर से लिखी हुई पाती है। इसकी भाव भूमिका अनमिल है, अनगढ़ है, अप्रत्याशित है। करुणामयी जगत जननी के चरणों में प्रणत निवेदन हैं शैलबाला शतक के यह छन्द! पिछली छः प्रविष्टियों (शैलबाला शतक: एक, दो, तीन, चार, पाँच, छः) में चौबीस कवित्त छन्दों को प्रस्तुत किया जा चुका है। इसके बाद की प्रविष्टियाँ सवैया छंद में रची गयी हैं, जो क्रमशः प्रस्तुत हैं। शैलबाला शतक- सात, आठ, नौ  के बाद प्रस्तुत है अगली कड़ी-

शैलबाला शतक: सवैया छंद (61-72) 

Shailbala-Shatak-10ई दुनिया मोटरी टकटोरैले एक तोंहिं पोटरी देखवइया
दीन निहारि होंकारि के धावैलू जइसे पेन्हाइल कामद गइया
लाख असीसैलू जूड़े रहा हमरो उमरी ले जिया मोर भइया
पंकिल कै कहिया हरबू दुख नाचै सिरे साढ़े साती अढ़इया ॥६१॥

आपन जामल लाख गदाई न माई कबौं सुत खाईं में भेंजी
कइसे मतारी दुखारी तनय तजि आनन ढॉंकि परी सुख सेजी
छोड़े बनी नाहिं पंकिल जेकर जायल पोवल उहै सहेजी
बउरहवा डुहुरै बम्हना तूँ बना जननी मत काठ करेजी ॥६२॥

दीन मलीन गलीन गलीन फिरीं रिनियाँ पट अन्न न आँटत
अम्ब ओराय रही जिनिगी नित पेवन पै पुनि पेवन साटत
ना जेकरे चलहू क सहूर ते सौ पुरुखा उदघाटत डाँटत
पंकिल कै दुख देखि दयामयि कइसे करेज तोहार न फाटत ॥६३॥

पूत करोरन तोर धरा बिच हौं सबते पर अम्ब अनारी
बूझि परै कछु लाभ न हानि हनी निज हाँथहिं आपु कुदारी
ई सुखवा छिनिहा कबहूँ मत चाटि जियीं तोरि जूठन थारी
पंकिल के बूझिहा बेटवा अस भइया के भूलि न जइहा मतारी ॥६४॥

सोच में फूलत बा पेटवा बेटवा कहिके कहिया टेरबू तूँ
भूलि सुपन्थ कुपंथ में धावत लाल के बॉहिन में घेरबू तूँ
अंक ले ऑचर से मुँह पोंछ दुलारि हिये की व्यथा हरबू तूँ
पंकिल के रखबू पजरा नाहिं माई कबौं मॅुहवॉं फेरबू तूँ ॥६५॥

तूँ थकबू तोर पउवाँ पिराई न मो सम नीच मिली धरनी में
अंगनि अंगनि अवगुन व्यापल माहुर घोरल बा करनी में
ऊबत ना नख से शिख डूबल भोग की भीषण बैतरिनी में
कवनों बिधान रचा मन पंकिल लीन रहै शिव की घरनी में ॥६६॥

तूँ छिपि गइलू पराइ कहाँ फुसिलाइ के माई थमाइ खेलवना
पौरुष का छिपलैं तोंहसे मोर अम्बर चूमी कि बाँगुर बौना
साटि हिये सुत के सिगरी निशि अम्ब बितावै ले ओदे बिछौना
कइसे सहाई मतारी के पंकिल पूत क मउवत बेटी क गौना॥६७॥

काने मुहें तेलवा डलले मुँहवाँ ओरमाइ का बइठल बाटू
की अघ मेटै क बानि बिसारि निवारि सनेह उमइठल बाटू
मानल जालू महा सोझिया पर पूतै पै रूठ के अँइठल बाटू
पंकिल से के अघी जेकरे हियरे मल पोंछै के पइठल बाटू ॥६८॥

पाहन जौ तोंहऊॅं बन जइबू त माई क नाँव ओराई धरा से
के बिलखात निरीह बेटउवा कै आँस हरी अँगुरी अँचरा से
दूसर के मोर मेंटी पियास सबै सुर धोख धुआँ बदरा से
पंकिल कै कहलो सुनलो अब माफ करा मत जा पॅंजरा से ॥६९॥

गाढ़े सकेते तोहिं एक आँटैलू अइसन माई मिली कहाँ मोही
के सुत कै तकतै मॅुंह जीही ले अँवटल दूध कटोरी में जोही
लाख नलायक बा बेटवा पर राखे बनी चाहे काटी बकोटी
पंकिल की तजि के ममता न बना मतवा अब तू निर्मोही ॥७०॥

तूँ जोड़तै थकबू जननी अघ मोर कबौं गिनले न ओराई
छाला पड़ी तोहरे कर में पतरी नरमी अँगुरी घिसि जाई
बेंची ला मॉंस सदा तोहरै शशिशेखर की घरनी मोर माई
पाछिल चूक बिसारि के पंकिल पूत के ला गोदिया में उठाई ॥७१॥

सूखल जाला सदा बचवा बचवा कहतै मुँहवाँ तोर माई
देंह करोर धरे पर भी कबहूँ करजा न तोहार भराई
लाख उधातम कै सुत पोसैलू पूत बदै तन खून जराई
खूँटहिं के बल नाचत बाछा हौं पंकिल पूत तोहार तूँ माई ॥७२॥

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शैलबाला शतक: भोजपुरी स्तुति काव्य (नौ) https://blog.ramyantar.com/2015/10/shailbala-09.html https://blog.ramyantar.com/2015/10/shailbala-09.html#comments Tue, 13 Oct 2015 22:46:00 +0000 शैलबाला शतक: स्तुति काव्य नयनों के नीर से लिखी हुई पाती है। इसकी भाव भूमिका अनमिल है, अनगढ़ है, अप्रत्याशित है। करुणामयी जगत जननी के...

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शैलबाला शतक: स्तुति काव्य नयनों के नीर से लिखी हुई पाती है। इसकी भाव भूमिका अनमिल है, अनगढ़ है, अप्रत्याशित है। करुणामयी जगत जननी के चरणों में प्रणत निवेदन हैं शैलबाला शतक के यह छन्द! शैलबाला-शतक के प्रारंभिक चौबीस छंद कवित्त शैली में हैं। इन चौबीस कवित्तों में प्रारम्भिक आठ कवित्त (शैलबाला शतक: एक एवं शैलबाला शतक: दो) काली के रौद्र रूप का साक्षात दृश्य उपस्थित करते हैं। पिछली छः प्रविष्टियों (शैलबाला शतक: एक, दो, तीन, चार, पाँच, छः) में इन चौबीस कवित्त छन्दों को प्रस्तुत किया जा चुका है। इसके बाद की प्रविष्टियाँ सवैया छंद में रची गयी हैं, जो क्रमशः प्रस्तुत हैं। शैलबाला शतक-आठ के बाद प्रस्तुत है अगली कड़ी-

Kalighat_paintingशैलबाला शतक: स्तुति काव्य: सवैया 49-60

छोड़ैलू तू न कबौं हमके हमहीं तोहके हइ अम्ब भुलायल
मोर करी एतना के दुलार सनेह से नैना तोहार छछायल
पूत के लागत चोट पै होत है हाय करेज मतारी को घायल
अइसन पीर भरा तोहरे हित पंकिल प्रान रहै पगलायल ॥४९॥

भोग क जूठन पत्तल चाटत त्यागि के प्रीति परोसल थाली
खोज के तू थकबू जग में हमरे अस पइबू न पूत कुचाली
मो सम पापी न पाप विनाषिनि तों सम जोरी बनी है निराली
पंकिल कारिख पोतनहार पै तूँ रखवार सदा मुँहलाली ॥५०॥

छोह न छीजै दा आपन तूँ चाहे मारा मुआवा घरे से निकाला
आग में भूँजा पहार से झोंका या खउलत तेल कराह में डाला
चाहे हॅंसावा रोआवा गवावा या पंकिल बन्द करा मुँह ताला
पै अपने सुधि के दुधवा कै न ठाला कबौं करिहा गिरिबाला ॥५१॥

ज्ञानी गुनी न धनी जननी हमरी फुहरी मति अवगुन पूरी
चाल कुचाल कहाँ ले कहीं मुँह राम रटीं रखि काँख में छूरी
अवगुन पंक में डूबल कै पँखुरी धरि काढ़ा रखा मत दूरी
चाकर राखि मजूरी में दा निज पंकज पाँव की पंकिल धूरी ॥५२॥

नाहिं बली मन मानै छली थकलीं बिधि कोटिन्ह दाँत निपोरी
पापन कै परस्यो पकवान निहारि न छूटत जीभ चटोरी
चोट चपेटन में लटि पंकिल पूत तोहार करै हथजोरी
का पइबू मुअले के मुआइ दयामयि माइ बना न कठोरी ॥५३॥

जापै फिरै करुना कोनवा सोनवा बरिसै वोहि रंक की झोरी
अंधहिं सूझत मुरुख बूझत धावत पंगु पहार की ओरी
पारबती पसिजा कर राखि कृपानल अँवटल दूध कटोरी
पंकिल पूत के ले गोदिया बनि जा हिमशैलसुता लरिकोरी ॥५४॥

जानी न कवनें दिना तन से मोरे जीवन कै सुगना उडि जइहैं
काँपत बा टँगरी पँखुरी धइ के यम कै दूतवा घिसियइहैं
रात दिना छछनी जियरा अँखियान के कोर से लोर छँछइहैं
पंकिल माई बदे बिलखाई दयामयि ऊ दिनवाँ कब अइहैं ॥५५॥

जौ सच हौ जननी जग में जे करी जवनें फल चाखा
तौ सत देंह धरे पर भी न कबौं हमरी पुरिहैं अभिलाषा
पाप के पेड़ क सोर कबारा कि फेर कबौं पनपै मत साखा
आपन पंकिल प्रीति दिया धरि बारा उमा हमरे उर ताखा ॥५६॥

एक न छ छ अरी घेरले जे जहैं हमैं पाई तहैं हुरपेटी
काम अहेरी कुसंग के जाल में लेत विचार बिहंग लपेटी
माई बिना बिपदाइल पूत के के अपने अँकवारी में भेंटी
पंकिल के बिसरइया न मइया हिमालय की दुलरइतिन बेटी ॥५७॥

क्लेसन में कुँहुसै जिनिगी मति भ्रष्ट ढँकी अघ के चदरा
धमधूसर के उर ऊसर में बरसी कब तोर कृपा बदरा
कहिया खोजिया करबू मतवा बितलीं केतना रोहिनी अदरा
सुभ कौन मुहूरत सोचैलू धाम घरी में जरै नौ घरी भदरा ॥५८॥

में में करै केतनो बकरी पर जइसे छुरी न तजै निठुराई
तइसइ काम कसाई कुघात करै न सुनै थकलीं रिरियाई
का जग मात करीं जिनिगी भर जियै के बा छठियै में ओझाई
सूझै इहै कि उमा पग धै बिलखा मन पंकिल माई हो माई ॥५९॥

होइहैं हँसाई तोरो बहुतै उधिराई जो माई ई बात अनोखी
पंकिल दोखी तनय जमलैं अस शीलमई मँहतारी की कोखी
तू अस मोही कबौं सुत की सह पावै लू का खर सेवर खोंखी
पंकिल पाप कि तोर दया का गर्हू बा बिचार तराजू में जोखी ॥६०॥

क्रमशः–

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शैलबाला शतक: भोजपुरी स्तुति काव्य (आठ) https://blog.ramyantar.com/2015/08/shailbala-08.html https://blog.ramyantar.com/2015/08/shailbala-08.html#respond Wed, 05 Aug 2015 22:46:00 +0000 शैलबाला शतक: भोजपुरी स्तुति काव्य: 37-48  पूत भयों अस लोलक लइया सबै पुरुखा की बड़ाई बहाई माई की ड्यौढ़ी पै दारू सजावत सावन के अन्हरे...

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शैलबाला शतक: भोजपुरी स्तुति काव्य नयनों के नीर से लिखी हुई पाती है। इसकी भाव भूमिका अनमिल है, अनगढ़ है, अप्रत्याशित है। करुणामयी जगत जननी के चरणों में प्रणत निवेदन हैं शैलबाला शतक के यह छन्द! शैलबाला-शतक के प्रारंभिक चौबीस छंद कवित्त शैली में हैं। इन चौबीस कवित्तों में प्रारम्भिक आठ कवित्त (शैलबाला शतक: एक एवं शैलबाला शतक: दो) काली के रौद्र रूप का साक्षात दृश्य उपस्थित करते हैं। पिछली छः प्रविष्टियों (शैलबाला शतक: एक, दो, तीन, चार, पाँच, छः) में इन चौबीस कवित्त छन्दों को प्रस्तुत किया जा चुका है। इसके बाद की प्रविष्टियाँ सवैया छंद में रची गयी हैं, जो क्रमशः प्रस्तुत हैं। शैलबाला शतक-सात के बाद प्रस्तुत है अगली कड़ी- 

Shailbala Shatak 37-48शैलबाला शतक: भोजपुरी स्तुति काव्य: 37-48 

पूत भयों अस लोलक लइया सबै पुरुखा की बड़ाई बहाई
माई की ड्यौढ़ी पै दारू सजावत सावन के अन्हरे अस धाई
भारी गरूर न एको सहूर सदा घिघियात फिरै मुँह बाई
माई न आँख चोरइहैं कबौं केतनो यदि होइहैं बेटउवा गदाई ॥३७॥

बाँधि गरे रसरी बखरी बखरी घिसियावै बला धै नकेला
पंकिल कै बिधिना भयो बाम कि कागहिं आजु सिखावै कबेला
पेट खलाइ कहौं बिलखाइ बिलाइ गई बल बुद्धि झमेला
माई दुलारे क दूध पियावहु बीतल जाले कलेवा की बेला॥३८॥

की रउरी गति धूमिल ह्वै गइ की बघवा कै बुढ़ाइल काया
की महिसासुर भइलैं बली की ग्रसी रउरो कलिकाल की माया
की हम रावरे कोख क पूत न आयों कहीं से उठउवा पराया
कौन सी चूक परी जो पै झोंकत पंकिल चाहत आँचर छाया ॥३९॥

जोरि के तोरति क्यों रुख तूँ मन कीष नचावत काम मदारी
मैल भरे मति बैल से छैल की फैलि रही कुविचार अन्हारी
आगम की सुधि दे कर कंकन किंकिनि नूपुर की झनकारी
पंकिल प्रान को अम्ब अनन्द री राखहु अंक दुलारि मतारी ॥४०॥

पूरनमासी के मंजु मयंक सी आनन की जेहि के सुघराई
नैननि कज्जल रेख सुधा अधरान पै हीरक हास सुहाई
सोभत सिन्दुर कुंकुम भाल कपोलन ते छलकै अरुनाई
कामिनि कामविनासिनि की पिय कि संग मोरे हिये बसु माई ॥४१॥

अम्ब तोहैं बिधि चारमुखी शिव पंच मुखी नहिं जानै यथारथ
मौन षडानन शेष सहस्रमुखी पटकैं फन फूंकि अकारथ
बानिहुं की गति नाहिं जहाँ तँह पंकिल का करिहैं पुरुषारथ
तूँ अपनी दिसि देखि दयामयि पूत कपूत को कीजै कृतारथ ॥४२॥

मंत्र तोहार न बूझि परी मोहिं माई कोउ केतनो समुझइहैं
अरचन बंदन ध्यान बिधान हमैं जननी सपनों नाहिं अइहैं
पंकिल के रोअहु नाहिं आवत ए मतवा तोहैं कइसे रिझइहैं
आस इहै कि निरास के ले जननी अपनी गोदिया से लगइहैं ॥४३॥

माई हो माई मोरे पपवा से रंगाइल बा यमराज क खाता
कवने नछत्तर में ए कुलच्छन कै रचलैं तकदीर बिधाता
अइसन पूत परैं भरसाईं निबाहा तोहीं अब माई क नाता
पूत कपूत सुने बहु पंकिल पै न सुनी कहुँ माता कुमाता ॥४४॥

जौं अपनो कुल बोरन बूझि के माई हमैं घर से दुरिअइबू
आपन शील सुभाव सम्हारि के बाद में बइठि बड़ा पछितइबू
पंकिल पूतै रही न त तूँ केकरे बल से महतारी कहइबू
जौ उर में उमगी दुधवा तब लै केहिके गोदिया में पियइबू ॥४५॥

तू अनुकूल रहा तब का प्रतिकूल बिरंचि लकीर के खींचे
तोर दई सुख सम्पति सौगुन रीतै न कोटिहुँ हाँथ उलीचै
होत बृहस्पति सो वक्ता जड़ मूक तुम्हारी कृपा रस सीचे
राखहु पंकिल माथ हमार कृपामयि पंकज पाँव के नीचे ॥४६॥

नाहिं भुलइलो चढ़वली कबौं जननी पग पै चिरुआ भर पानी
अच्छत चन्नन फूल सुगंधित ले कइली न कबौं अगवानी
अइसो कपूत बदै होंकरै लू करेजे क के करुना तोरे जानी
पंकिल की खोजिया करिहा अपनी दिशि देखि महेश परानी ॥४७॥

जीवन कै हमरे फुलवा जननी अपने सुधि ताग में गूहा
आपन अम्ब सुधा उर छीर पियाइ जियावा तनय दुधमूहाँ
पंकिल तोहिं तबै सुमिरै जब आइ गिरै विपदा गिरि ढूहा
का करबू सुत रोवै तबै जब पेट में कूदन लागत चूहा ॥४८॥

Photo Credit: Wikipedia

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शैलबाला शतक: भोजपुरी स्तुति काव्य (सात) https://blog.ramyantar.com/2014/12/shailbala-07.html https://blog.ramyantar.com/2014/12/shailbala-07.html#respond Sun, 28 Dec 2014 02:29:00 +0000 शैलबाला शतक नयनों के नीर से लिखी हुई पाती है। इसकी भाव भूमिका अनमिल है, अनगढ़ है, अप्रत्याशित है।करुणामयी जगत जननी के चरणों में प्रणत...

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शैलबाला शतक नयनों के नीर से लिखी हुई पाती है। इसकी भाव भूमिका अनमिल है, अनगढ़ है, अप्रत्याशित है।करुणामयी जगत जननी के चरणों में प्रणत निवेदन हैं शैलबाला शतक के यह छन्द! शैलबाला-शतक के प्रारंभिक चौबीस छंद कवित्त शैली में हैं। इन चौबीस कवित्तों में प्रारम्भिक आठ कवित्त (शैलबाला शतक: एक एवं शैलबाला शतक: दो)  काली के रौद्र रूप का साक्षात दृश्य उपस्थित करते हैं। पिछली छः प्रविष्टियों (शैलबाला शतक: एक, दो, तीन, चार, पाँच, छः) में इन चौबीस कवित्त छन्दों को  प्रस्तुत किया जा चुका है। इसके बाद की प्रविष्टियाँ सवैया छंद में रची गयी हैं, जिनमें प्रारम्भिक बारह आज प्रस्तुत हैं।

अगली प्रविष्टियों में शेष सवैया छन्दों को बारह-बारह के समूह में प्रस्तुत कर कुल १०८ छन्दों की यह रचना सम्पूर्ण होगी। इन सभी प्रविष्टियों के साथ बाबूजी के स्वर में इनका पाठ भी संयुक्त है।

हे हिमशैल सुता सुत पै ममता में करा मत माँ कोतहाई
केकर ताकीं दुआरी मतारी बिना के हमारी हरी अधमाई
भोला के भौन की माँ भनडारिनि काहें मोरि विपदा बिसराई
पंकिल की जनि छाड़ कलाई दयामयि माई दोहाई दोहाई॥२५॥

माई बतावा बिना पद पंकज पवले कि प्रान अली सुख मानी
नाहीं सुहाई तनय दुधमूँह के शेष सुरेसहुँ की रजधानी
हे जगदम्ब कहाँ ले चढ़ाईं न चाउर चूँग न सोना न चानी
रोज भरा मोरि पंकिल आँखिन आपन पाँव पखारै के पानी॥२६॥

शैलबाला शतकबीर बड़े षट चोर चढ़े जगदम्ब हमारे हिये की अँटारी
पूत लुटात तू सोवति मात विकार की घोर घिरी अँधियारी
मोको जगाइ करेजे लगावहु काकी नहीं बिगरी तूँ सुधारी
भोला-सो लायक बाप सुन्यो नहिं गौरी-सी लायक नाहिं मतारी॥२७॥

सीचौं न औढरदानि परानि बिलोचन पानी सों प्रेम को पौधा
पाप पयोनिधि पैरत थाक्यों पगे न जुरी पनहीं चमरौधा
पंकिल आस पियासन धाइ पर्यौ लटुआइ रह्यौ चकचौंधा
माई दुआरे परी अरजी कलपद्रुम होइहैं कबौं कुकुरौंधा॥२८॥

सोचौं निरीह महाधूसर ऊ दिनवॉं जननी कब अइहैं
पंकिल रावरे पंकज पॉंय की लोचन नीर से धूरि बहइहैं
झंखै मनोरथ की कनियॉं उड़ि जइहैं ओहार कँहार परइहैं
के ए भिखारी क झोरी निहारी न जौ लों मतारी क माया छछइहैं॥२९॥

आन्हर में कनवाँ नृप ह्वै जगदम्ब रजाई की बाँधे हौं गाँती
डोलत काँपौं टटोलत मारग बोलत में नटई सहराती
अइसो अघी तुम ते कछु चाहत बाजै सुराग कि गाँडर ताँती
हौ जिय माँहि भरोसा इहै नाहि माई क होइहैं कसाई सी छाती॥३०॥

राखि उछंग निरीह लला को पियावहु प्रान सजीवनि घूँटी
रंक को कीजै निसंक दयामयि चाहत होंन निलाम लँगोटी
नानी घरे ननियउरा बखानत सूझ जुआरिहिं आपन गोटी
हाय दई हम क्यों न भयों महिषासुर के भईंसा की चमोटी॥३१॥

कासों सुनाऊँ दसा अपनी सब भागत जइसे करीं कछु टोना
बइठि कहीं केकरे पजरे अपनी फुटही तकदीर क रोना
कॉंहें न एकहुँ बेर निहारैलू माई उघारि के आँखी क कोना
की अइसैं बितिहैं जिनगी कहिं चाटत जूठ बटोरत दोना॥३२॥

पहिले पोसलू दुलरउलू परी जननी हमरे उदरे बिच पेटी
छाड़ु न पंकिल की बहियाँ बरु मारहु माई दबाई नरेटी
ई दुनियाँ हमरे पर थूकत के हमके अँकवारी में भेंटी
माई सम्हारि के राखा ई भागै न डोमे के धामे बखानल बेटी॥३३॥

आनन फेन बहै मृग बारि में धावत सूझै बतास न बेना
का बिधि ह्वै जठरागिनि सीतल बीतल चेट को चारि चबेना
पंकिल आँखिन में पर्यो चन्नर यों ढरकौं लुटिया बिन पेना
आज हुँकारी मतारी भरा फिर ऊधौ क लेना न माधौ क देना॥३४॥

कासे कहौं जिय की जरनी अपने सुख को सपनों भयो फीको
हौ जग रीति इहै जगदम्ब कि माथ निहार के सेन्हुर टीको
कै बजनी पहिर्यौं कछनी पर लाज मरौं नहिं नाचनौ नीको
हौं कितनों बदल्यौं परिवेश गनेश भयों पर गोबर हीको॥३५॥

तूँ अँखिया मुँदबू मतवा तब के हमके बचवा गोहरइहैं
माथै पै हॉथ दे चूमत चाटत ए टुअरा संगे के बतिअइहैं
पंकिल के जनमउलू अकारथ ई घुरफेकन साँझैं बिलइहैं
तूँ जब जोर लगइबू मतारी त ओरी क पानी बड़ेरी सिधइहैं॥३६॥

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शैलबाला शतक: भोजपुरी स्तुति काव्य (छः) https://blog.ramyantar.com/2014/12/shailbala-06.html https://blog.ramyantar.com/2014/12/shailbala-06.html#respond Tue, 23 Dec 2014 22:14:00 +0000 शैलबाला शतक भगवती पराम्बा के चरणों में वाक् पुष्पोपहार है। यह स्वतः के प्रयास का प्रतिफलन हो ऐसा कहना अपराध ही होगा। उन्होंने अपना स्तवन...

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शैलबाला शतक भगवती पराम्बा के चरणों में वाक् पुष्पोपहार है। यह स्वतः के प्रयास का प्रतिफलन हो ऐसा कहना अपराध ही होगा। उन्होंने अपना स्तवन सुनना चाहा और यह कार्य स्वतः सम्पादित करा लिया। यह उक्ति सार्थक लगी- “जेहि पर कृपा करहिं जन जानी/कवि उर अजिर नचावहिं बानी।” शैलबाला शतक के प्रारम्भ में माता के रौद्र रूप का अष्टक विलसित है किन्तु वहाँ क्रोध की आग नहीं करुणा का दूध बह रहा है।

शैलबाला शतक के चार और कवित्त प्रस्तुत हैं! करुणामयी जगत जननी के चरणों में प्रणत निवेदन हैं शैलबाला शतक के यह कवित्त! शतक में शुरुआत के आठ कवित्त काली के रौद्र रूप का साक्षात दृश्य उपस्थित करते हैं। पिछली पाँच प्रविष्टियाँ सम्मुख हो चुकी हैं आपके। शैलबाला शतक के प्रारंभिक चौबीस छंद कवित्त शैली में हैं। यह प्रविष्टि अंतिम चार कवित्त छंदों की प्रस्तुति है। इसके बाद की प्रविष्टियाँ सवैया छंद में रची गयी हैं, जो क्रमशः शीघ्र ही प्रकाशित होंगी। इन प्रविष्टियों के साथ बाबूजी के स्वर में इनका पाठ भी संयुक्त है।

जीवन निररथक मोर बीतल जात मात
कृशगात बिलखात फिरत जग झंझावात में
सुख सम्पति संचय रत वंचित नित होत जात
उलझि अकारथ सुत तात मात भ्रात में
स्वाती कै पानी बन के बरसा तू भवानी
पापी पंकिल पपीहरा के आनन सुखात में
मूढ़ मन मृग नइयाँ भटकि भटकि मरत अम्ब
लोटै दा अपने मंजु चरननि जलजात में ॥२१॥

शैलबाला शतक- छः देखि सुनि कोटि मत माथा चकरात मोर
देवता करोरन बीच केके हम भजबै
सब सुर चाहत सेवकाई पहुनाई सेवा
सम्पति अधिकाई हम कौने भॉंति गॅंजबै
जेके जवन भावै आपन डफली उठावै
आपन आपन राग गावै हम कॉंहें के बरजबै
हम तै सुखकारी शिवमानस विहारी
हिमशैलजा मतारी कै दुआरी नाहिं तजबै॥२२॥

एको बेर आपन पद पंकज देखाय देतू
हमके चढ़ाय निज लीला सुधि पालकी
बॉंहिन के हिंडोला में झुलावा दुलरावा मत
ख्याल करा पंकिल कपूत के कुचाल की
एतना अपने रंग बीच बोरा चभोरा हमै
तोहॅंके छोड़ आवै सुधि आज की न काल की
पंकिल झूमि गावै जस ताली बजावै बोलै
जय जय हिमशैलसुता शंकर शशि भाल की॥२३॥

हउवैं के गनेश के रमेश के दिनेश इन्द्र
बरम्हा बिशुन कोटि देव जानि कछु हम ना
जेकरे पर माई मोरि दाहिनदयाल रहबू
ओह सुत के सौ सौ जमराजो कै गम ना
आउर सुख सम्पति हमैं दिहा चाहे छीन लिहा
एतना मोर जीवनधन होखै कबौं कम ना
रोय रोय तोहरे आगे अम्मा रोज बिनवल करै
पंकिल बेटउवा बउरहवा दीन बम्हना ॥२४॥

क्रमशः–

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सरस भजन: कब सुधिया लेइहैं मन के मीत https://blog.ramyantar.com/2014/09/kab-sudhiya-bhajan.html https://blog.ramyantar.com/2014/09/kab-sudhiya-bhajan.html#comments Sun, 21 Sep 2014 05:00:00 +0000 https://blog.ramyantar.com/2014/09/kab-sudhiya-bhajan.html कब सुधिया लेइहैं मन के मीत: प्रेम नारायण पंकिल कब सुधिया लेइहैं मन के मीत, साँवरिया काँधा। कहिया अब बजइहैं बँसुरी, दिनवा गिनत घिसलीं अँगुरीकेतना...

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सहज, सरल, सरस भजन: कब सुधिया लेइहैं मन के मीत, साँवरिया काँधा। बाबूजी की भावपूर्ण लेखनी के अनेकों मनकों में एक। छुटपन-से ही सुलाते वक़्त बाबूजी अनेकों स्वरचित भजन गाते और सुलाते। लगभग सभी रचनायें अम्मा को भी याद होतीं और उनका स्वर भी हमारी नींद का साक्षी हुआ करता। बड़े होने पर यह सब अलभ्य, हम सब अकिंचन। इन्हें सँजो रहा हूँ बारी-बारी। कई हैं– इनमें से एक यहाँ।


कब सुधिया लेइहैं मन के मीत: प्रेम नारायण पंकिल

कब सुधिया लेइहैं मन के मीत, साँवरिया काँधा।

कहिया अब बजइहैं बँसुरी, दिनवा गिनत घिसलीं अँगुरी
केतना सवनवाँ गइलैं बीत, साँवरिया काँधा॥१॥

कहिया घूमि खोरी-खोरी, करिहैं कृष्ण माखन चोरी
हँसि के लेइहैं सबके मनवाँ जीत, साँवरिया काँधा॥२॥

हाय कब कदम की छहियाँ, फिरिहैं श्याम दे गलबहियाँ
मुरली में गइहैं मधुरी गीत, साँवरिया काँधा॥३॥

विकल बाल गोपी ग्वाले, कहाँ काली कमलीवाले
जोरि काहें तोरी पंकिल प्रीति, साँवरिया काँधा॥४॥
 

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सुरसरि तीरवाँ खड़े हैं दुनो भईया रामा: केवट प्रसंग https://blog.ramyantar.com/2012/12/malahavababa.html https://blog.ramyantar.com/2012/12/malahavababa.html#comments Sat, 15 Dec 2012 23:00:00 +0000 केवट प्रसंग रामायण के अत्यन्त सुन्दर प्रसंगों में से एक है, खूब लुभाता है मुझे। करुण प्रसंगों के अतिरेक में यह प्रसंग बरबस ही स्नेहनहास...

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केवट प्रसंग रामायण के अत्यन्त सुन्दर प्रसंगों में से एक है, खूब लुभाता है मुझे। करुण प्रसंगों के अतिरेक में यह प्रसंग बरबस ही स्नेहनहास का अद्भुत स्वरूप लेकर खड़ा होता है। विचारता हूँ राम की परिस्थिति को, कैकयी की निर्दयता अपना काम कर चुकी है, पिता से बिछड़ने का दुःख अभी असह्य ही है। सब कितना करुण है। तभी लटपटा प्रेम ले उपस्थित होता है केवट।

कितना जरूरी है इस केवट का प्रवेश दृश्यावली में! इस करुण समय में प्रेम की ऐसी ही अभिव्यक्ति तो वांछित थी जो विभोर भी करे और स्नेहनहास से हँसाये भी। राम के जीवन की घटनाओं का संतुलन है यह, बाबा तुलसी की महानतम काव्य-कथा में राम के वनगमन की करुण कथा में ही समुआया ’ड्रॉमेटिक रिलीफ’ है यह केवट।

केवट प्रसंग का सौन्दर्य

इस केवट की मनोहारी कथा पढ़ता, गुनता हूँ तभी इसे और भीतर तक पिरोने, मिट्टी की गंध से सराबोर कर अन्तर में  ठहराने मलहवा बाबा चले आते हैं। इस बार भी आये! गंगा-मईया की प्रीति का यह गवैया सुरसरि के तीर खड़े दोनों भाईयों (दुनो भईया) की कथा लेकर आ गया। मैं बाबा के स्वर में और तीर खड़े अवधपुरी के दोनों भाईयों के स्मरण में रम गया।

केवट-केवट पुकारते राम दिखे। सुरसरि-पार जाना है न! कहाँ हो केवट? तीर पर खड़े हैं राम, व्याकुल। सुमन्त से विदाई के बाद स्वयं को ओझल कर देने की असीम व्याकुलता समाई है भीतर। और केवट! कहाँ है न जाने? राम पुकार रहे हैं केवट-केवट! विचित्र है, पर है तो है। जिसके नाम से भवसागर सूख जाय वह गंगा न पार कर सके। उसे नाव चाहिए? उस नाव का नाविक चाहिए? यदि भगवान की यही लीला है तो भक्त भी चतुर है, कपटी है – “माँगी नाव न केवट आना; कहैं तुम्हार मरम मैं जाना।” छिपकर किया जाने वाला प्रेम और भी मधुर हो जाता है।

केवट प्रसंग: राम सीता और केवट

केवट नाव लेकर तो आता है पर सजग है, सतर्क है। उसे पता है कि राम के चरणकमल की धूलि मनुष्य बनाने वाली कोई जड़ी है। वह राम से शंकित नहीं, उनके चरण कमलों की धूलि से शंकित है। उत्कर्ष और अपकर्ष की विचित्र अवस्था में डाल दिया है केवट ने। राम रज हो गए हैं, रज राम हो गयी है। केवट तार्किक है। उसके पास बाबा तुलसी की हुँकारी है- “छुवत शिला भई नारि सुहाई; पाहन ते न काठ कठिनाई।” अब क्या हो? तर्क के स्वांग में प्रेम झाँक रहा है। भक्ति की सरल कामना सिर उठा रही है- “बिना पग धोये नाथ नइया ना चढ़इबै हो”। 

अब चाहते ही हो, विवश हो कर पार जाना ही है तो पग-पखारने दो- 
“जो प्रभु अवशि पार गा चहहु। तौ पद पद्म पखारन कहहू।” 

केवट की चातुरी अब समझ आयी है। यह सब पग-प्रच्छालन की चाल है। चरण-धूलि में ही अपने जीवन की सार्थकता की पराकाष्ठा देखने वाला अनन्य भक्त है केवट। सजल कर रहा है अपनी विदग्धता को। सारे तर्क ही तिरोहित हैं, सारी आशंकाएँ ही निर्मूल हैं- यदि चरण-रज मिले। केवट पी ले चरणामृत, बस इतनी-सी साध है। 

अब कौन-सा चारा बचा है। 

“सुनि केवट के बचन प्रेम लपेटे अटपटे।
विहँसे करुणाअयन चितय जानकी लषण तन॥”

विहँसना ही पड़ता है केवट सरीखे आदमी के लिए। हँसी भी आती है, रुलाई भी। गद्गद भी करता है, गुदगुदाता भी है। यह कहने के अतिरिक्त बचा क्या है – “सोई करहु जेहि नाव न जाई।” सो – 

“काठे के कठवत में चरन पखारै रामा
चरन पखारि केवट पीयैं चरन अमरित हो”
(अति आनंद उमगि अनुरागा….)

’सोई करहु जेहि नाव न जाई’ कह राम स्वयं केवल अपराध से बचना चाहते हैं, अनुगृहीत करना नहीं चाहते। वह इस पैर धोने की चाल खूब समझते हैं और मन्द मुस्काते पार उतरते हैं। कुछ न देने का संकोच घेर कर खड़ा है। बाबा तुलसी तो सीता से मणि मुद्रिका दिलवाते हैं, पर हमारे मलहवा बाबा सीधी-सीधी बात जानते हैं–

“देवे लगलैं राम अपने हाथे कै मुंदरवा हो”
केवट ले क्यों?
“ना लेबे राम तोहार हाथे कै मुंदरवा हो”
राम नहीं मानते-
देवे लगलें राम जब डाली भर सोनवां हो
केवट क्यों मानने लगे?
ना लेबे राम तोहार डाली भर सोनवां हो   

वह तो पा चुका है- “नाथ आज मैं काह न पावा।” यह क्या स्वर्ण-मुद्रिका दे रहे हो नाथ! भवसागर में अटकी पड़ी नाव के खेवइया हो राम! तुमसे कैसी उतराई। केवट भाव-विह्वल है, सजल है। फिर भी विदग्ध है-

“तूँ त हउवा भवसागर के तरवइया रामा 
केवट से केवट नाहिं लेवैं अब खेवइया हो” 

बिरादरी का मामला है। तुम भवसागर के तरवइया हो, हम गंगा-सरि के। तुमसे उतराई कैसे ले सकते हैं? ’स्टाफ’ की बात है। केवट ग़ज़ब है।

ग़ज़ब हमारे मलहवा बाबा भी हैं। तुलसी बाबा की लोक संवेदना के असली पहरुए। लोक काव्य की विशिष्टता से सजा कर बाबा अंतिम पंक्तियाँ गाने लगते हैं, भक्ति उमग रही है, विनय साक्षात हो गया है, शरणागत का स्वर आकार लेने लगा है- 

“गहिरी बा नदिया देखा नइया बा पुरानी रामा
खेलन वाला अलख अनारी रामा।”

मलहवा बाबा और केवट दोनों एकरूप हो गा रहे हैं। अनन्य भक्ति सजल होकर बह रही है। केवट गंगा का सलोना बेटा है, अरज लगा रहा है-

“भवसागर से परवाँ उतारा गंगा माई हो।”

💡
यह वीडियो तो बस यूट्यूब पर अपलोड करने के लिए एकाध चित्र लगाकर बना दिया गया है। ऑडियो भी बहुत अच्छा नहीं था, क्योंकि रिकॉर्डिंग यंत्र ही नहीं था बेहतर कोई उस वक़्त। तेज वॉल्यूम कर काम चलाईये। अनुभूति अपना काम करेगी ही।

गीत का मूल पाठ

सुरसरि तीरवाँ खड़े है दुनो भईया रामा / अवधपुरी के रहवइया दुनो भईया रामा
सुरसरि पार के जवइया दुनो भइया रामा / केवट-केवट राम पुकारैं रामा।

भोरे में नइया डोलल आवैला केवटवा हो / भोरे में तीरवाँ ………
बिना पैर धोये नाथ नइया ना चढ़इबै हो / बिना पैर धोये…..।

काठे के कठवत में चरन पखारै रामा / चरन पखारि केवट पीयैं चरन अमरित हो
अगवाँ जे बइठैलें राम-लछमण सीता जी / पीछवाँ ले बइठैं गंगा माई की जल फइली
भोरे में तीरवाँ ………..।

खेवत खेवत केवट घटवा में गइलैं रामा / देवे लगलैं राम अपने हाथे कै मुंदरवा हो
ना लेबे राम तोहार हाथे कै मुंदरवा हो / देवे लगलें राम जब डाली भर सोनवां हो
ना लेबे राम तोहार डाली भर सोनवां हो।

नदिया में नारि के खेवइया पड़ि रामजी हो / तूँ त हउवा भवसागर के तरवइया रामा 
केवट से केवट नाहिं लेवैं अब खेवइया हो / गहिरी बा नदिया देखा नइया बा पुरानी रामा
खेलन वाला अलख अनारी रामा।

बुढ़िया मलाहिन अरज करत बा हो / भवसागर से परवाँ उतारा गंगा माई हो
सुरसरि तीरवाँ खड़े हैं दुनो भइया रामा।


एक तरफ केवट की सजगता और दूसरी ओर राम के प्रति अनन्य भक्ति और प्रेम की अनूप भावना। वह छलक-छलक पड़ता है अपनी भावनाओं में। तुलसी पीठाधीश्वर जगद्गुरु श्री रामभद्राचार्य जी ने रच कर गाया है- आवा हो जग नाव के खेवइया/ राघव तुम बिन सूनी मोरी नइया।

जगद्गुरु श्री रामभद्राचार्य जी की रचना पर भावपूर्ण अभिनय का एक वीडियो भी मिला मुझे, अद्भुत आनन्ददायी।

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