वृक्ष-दोहद Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम् https://blog.ramyantar.com/category/वृक्ष-दोहद हिंदी ब्लॉग। साहित्य, भाषा, संस्कृति, लोक व शास्त्र से संयुक्त। कविता, कहानी, समीक्षा, निबन्ध, नाटक एवं अनुवाद का सहज प्रकाशन। लोक साहित्य का रंग भी। Tue, 03 Mar 2026 17:03:19 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.2 https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2024/03/cropped-favicon-4-32x32.png वृक्ष-दोहद Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम् https://blog.ramyantar.com/category/वृक्ष-दोहद 32 32 रमणी के नर्म वाक्यों से फूल उठा मंदार : वृक्ष दोहद-8 https://blog.ramyantar.com/2009/09/mandar.html https://blog.ramyantar.com/2009/09/mandar.html#comments Mon, 07 Sep 2009 09:57:00 +0000 मुझे क्षण-क्षण मुग्ध करती, सम्मोहित करती वृक्ष दोहद की चर्चा जारी है। मंदार की चर्चा शेष थी अभी। कैसा विश्वास है कि वयःसंधि में प्रतिबुद्ध...

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Mandar

मुझे क्षण-क्षण मुग्ध करती, सम्मोहित करती वृक्ष दोहद की चर्चा जारी है। मंदार की चर्चा शेष थी अभी। कैसा विश्वास है कि वयःसंधि में प्रतिबुद्ध कोई बाला यदि बायें पैर से अशोक को लताड़ दे (मेंहदी लगाकर), या झुकती आम्र-शाख पर तरुण निःश्वांस छोड़ दे, स्मित बिखेर दे चम्पक के सम्मुख, गुनगुनाये नमेरु के लिये, आदि, आदि तो उसकी मुराद उसी वक्त पूरी हो जाती है। फलित हो जाता है कन्या का दोहद। प्रकृति भी संकेत देती है। वृक्ष की शाखें मौसम-बेमौसम सीधे फूलों से लद जाती हैं-

पादाघाताद् अशोकः, तिलकवुरबकौ वीक्षणा-ऽलिंनभ्याम्,
(स्त्रीणां) स्पर्शात् प्रियंगुः, विकसित बकुलः सीधुगण्डूषसेकात्,
मन्दारो नर्मवाक्यात्, पटुमृदुहासनात् चम्पको, वक्त्रवातात्
चूतो, गीताद् नमेरुर्, विकसति च पुरो नर्तनात् कर्णिकारः॥

वृक्ष-दोहद की चर्चा में मंदार तक आ पहुँचा हूँ। चिन्तन की जीभ लपलपा रही है। सोचता हूँ, रमणियों की यह अन्यान्य क्रियायें- पैरों की लाली, बाँकी चितवन, अयाचित मजाक, गाना-गुनगुनाना, इठलाना, मुस्कराना, निःश्वांस-उच्छ्वास- क्या ये कामिनियों के बाण हैं- और ये खुल-खिल जाने वाले आम्र,अशोक, प्रियंगु, नमेरु, कर्णिकार, मंदार- क्या इस बाण से पहली ही नजर में घायल चरित्र हैं, अवतार हैं? संस्कृत कवि-सम्प्रदाय व अन्योक्तियों में रस सदा इसी कोमलता या श्रृंगाराभास के आरोप से ही आता है न!

देवताओं का प्रिय पुष्प मंदार

मंदार देवताओं का प्रिय पुष्प है। भूत-भावन शिव की अर्चा का साधन यह पुष्प देवराज इंद्र के नन्दन कानन के पंच-पुष्पों में से एक है- अलकापुरी में सदा शोभित। कुमारसंभव में महाकवि ने इंद्र और मंदार दोनों को शिव-चरणाश्रित उल्लिखित किया है-

“असम्पदस्तस्य वृषेण गच्छतः प्रभिन्न दिग्वारणवाहनो वृषा ।
करोति पादावुपगम्य मौलिना विनिद्रमन्दाररजोऽरुणांगुलि ॥”

[“ऐरावतवाहन इन्द्र भी उस वृषभारूढ़ हर के चरण पर अपने सकिरीट मस्तक को अवनत करता है तथा मंदार वृक्ष की पुष्प रज से हर के चरणों को सर्वदा रंजित करता है ।”]

मदार

मंदार का एक नाम अर्क भी है। शिव का प्रिय, इसलिये विषयुक्त। फारसी में ’दरख्ते जहरनाक”। क्या यही दरख्ते जहरनाक अलकापुरी के प्रिय पुष्पों में से एक है? ’रघुवंश ’में उल्लेख है कि मंदार के पुष्पों को इंद्राणी अपनी अलकों में सुशोभित करती थीं। ’शाकुंतलम’ में वर्णित है- इंद्र ने दुष्यंत को मंदार-माला दी थी। क्या इसी ’आक’ या ’अर्क’ के पुष्पों की माला? शायद नहीं।

कालिदास का मंदार ‘अर्क’ या ‘आक’ नहीं बल्कि दूसरा है। कुछ-कुछ वनस्पतिशास्त्रियों का जाना-पहचाना ’कोरल-ट्री’ जैसा। कालिदास जिस पुष्प का वर्णन करते हैं उसमें पुष्पों के स्तवक (गुच्छे) हैं। ’ब्रांडिस’ ने भी अपनी पुस्तक ’इंडियन ट्रीज’ (Indian Trees) में मंदार का जो चित्र दिया है उसमें पुष्पों के स्तवक हैं। कालिदास का मंदार बड़ा नहीं होता। हाँथ से छुए जा सकने वाले आकार का वृक्ष। कुछ पीले भूरे पुष्प और उनमें गोल-गोल बैंगनी रंग-से छोटे-छोटे स्तवक।

कालिदास के साहित्य में उल्लेख

कवि-प्रसिद्धि है कि मंदार रमणियों के नर्म वाक्यों से पुष्पित होता है- ’मंदारो नर्मवाक्यात”। कालिदास ने इस विश्वास की पुष्टि की है। इस मोहक पुष्प से कामिनियों का प्रेम विलक्षण है। ’कुमारसंभव’, ’रघुवंश’, ’शाकुंतलम’, ’विक्रमोर्वशीय’, मेघदूत- सबमें महाकवि कालिदास ने इस पुष्प का वर्णन किया है।

अलकानगरी की अभिसारिकायें रात्रि में प्रियतम के समीप गमन करती हैं, क्षिप्रता में वेणियों से सरक जाता है मंदार का पुष्प-

“गत्युत्कन्पादलकपतितैर्यत्र मन्दारपुष्पैः
पत्रच्छेदैः कनककमलैः कर्णविभ्रंशिभिश्च …..”

मेघदूत में ही मेघ को अपने घर का पता देता यक्ष मंदार के उस छोटे वृक्ष को नहीं भूलता जिसे उसकी भार्या (यक्षिणी) ने सस्नेह संवर्धित किया है –

“….तस्योपान्ते कृतकतनयः कान्तया वर्धितो मे
हस्तप्राप्यस्तवकनमितो बाल मन्दार वृक्षः।”

मंदार के औषधीय गुण

अलकापुरी का मंदार, कवियों का वर्णित मंदार पता नहीं हमारे आस-पास दिखते मंदार का सहरूप है या नहीं, पर उष्ण एवं शुष्क प्रदेशों  में पाये जाने वाला आज का परिचित मंदार भी कम महत्वपूर्ण नहीं। मंदार 3 से 9 फुट उँचे वर्षानुवर्षी या बहुवर्षायु तथा बहुशाखी क्षुप होते हैं जो एक प्रकार के दुग्धमय एवं चरपरे रस (Acrid Juice) से परिपूर्ण होते हैं। कोमल शाखायें धुनी हुई रुई की तरह सफेद रोयें से घनावृत्त, पत्तियाँ छोटे डंठलों वाली, अभिलट्वाकार (Obovate)  अधस्तल पर रुई की भाँति रोमावृत तथा पुष्प बाहर से सफेद तथा भीतर बैंगनी रंग के होते हैं।

लघु-रुक्ष-तीक्ष्ण गुण, कटु-तिक्त रस, कटु विपाक, ऊष्ण वीर्य, वेदनास्थापन, शोथघ्न, व्रणशोधन, कुष्ठघ्न, वामक, श्वांसहर आदि प्रधान कर्म वाले इस वृक्ष का सबसे प्रभावकारी अंश इसमें पाये जाने वाला चरपरा पीला राल होता है। मंदार के यह पुष्प सालभर में कभी फूल-फल से खाली नहीं रहते किन्तु अपेक्षाकृत जाड़ों में अधिक फलते-फूलते हैं।

# मदार के पत्तों पर विशिष्ट टिड्डों के चित्र यहाँ मिलेंगे।


वृक्ष दोहद से संबंधित सभी प्रविष्टियों के लिंक नीचे दिये गये हैं। संबंधित प्रविष्टि को पढ़ने के लिये उस शीर्षक पर क्लिक करें-

० सुरुपिणी की मुख मदिरा से सिंचकर खिलखिला उठा बकुल (वृक्ष-दोहद के… ) 
० सुकुमारी ने छुआ और खिल उठा प्रियंगु (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा)
० सुन्दरियों के गान से विकसित हुआ नमेरु (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा)
० शुभे ! मृदु हास्य से चंपक खिला दो (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा )
० रूपसी गले मिलो कि कुरबक फूल उठे (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा )
० फूलो अमलतास ! सुन्दरियाँ थिरक उठी हैं (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा)
० रमणियों की ठोकर से पुष्पित हुआ अशोक (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा)
० स्त्रियाँ हँसीं और चम्पक फूल गया (वृक्ष-दोहद के बहाने वक्ष-पुष्प चर्चा)

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सुरूपिणी की मुख मदिरा से सिंचकर खिलखिला उठा बकुल: वृक्ष दोहद-7 https://blog.ramyantar.com/2009/08/bakul.html https://blog.ramyantar.com/2009/08/bakul.html#comments Mon, 17 Aug 2009 08:01:00 +0000 कवि समय की प्रसिद्धियों में अशोक वृक्ष के साथ सर्वाधिक उल्लिखित प्रसिद्धि है बकुल वृक्ष का कामिनियों के मुखवासित मद्य से विकसित हो उठना। बकुल...

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बकुलकवि समय की प्रसिद्धियों में अशोक वृक्ष के साथ सर्वाधिक उल्लिखित प्रसिद्धि है बकुल वृक्ष का कामिनियों के मुखवासित मद्य से विकसित हो उठना। बकुल वर्षा ऋतु में खिलने वाले पुष्पों मे कदम्ब के पश्चात सर्वाधिक उल्लेखनीय़ पुष्प है। हिन्दी में मौलसिरी के नाम से विख्यात यह पुष्प सम्पूर्ण संस्कृत साहित्य में अपनी सुगंधि के कारण प्रेम और सौन्दर्य के प्रतीक के रूप में वर्णित है। अपने विशाल आकार, घनी छाया और आमोदमय पुष्पों के कारण यह साधारण जन और कवि दोनों का परम प्रिय है।

साहित्य एवं शास्त्रों में बकुल 

बकुल हिन्दुओं के मध्य एक पवित्र पौधे के रूप में प्रतिष्ठित है एवं अनेकों धर्मग्रंथों व प्राचीन संस्कृत ग्रंथो में इसका अन्यान्य स्थलों पर पर्याप्त उल्लेख है। स्वर्ग-पुष्पों में स्थान प्राप्त यह पुष्प पुराणों में प्रतिष्ठित है। कहते हैं यमुना किनारे इसी बकुल वृक्ष के नीचे खड़े होकर कृष्ण बाँसुरी बजा-बजा कर गोपांगनाओं का मनरंजन किया करते थे। रामायण में वसंत ऋतु में इसका खिलना वर्णित है और महाभारत में भी। ’अय्यर’ (Aiyer) ने अपनी पुस्तक “The antiquity of some field and forest flora of India’ (1956) में संकेत किया है कि बकुल गंधमादन पर्वत पर विकसित पुष्प-वृक्षों (रामायण) एवं युधिष्ठिर की राजधानी इन्द्रप्रस्थ में रोपित वृक्षों (महाभारत) में से एक है। वाल्मीकि रामायण में भी पम्पासर वन, लंका के अशोक वन आदि स्थानों पर इस वृक्ष के होने के संकेत है।
साहित्य में राजशेखर ने इसके वसंत-विकास का वर्णन किया है, इसी संदर्भ में इस कवि प्रसिद्धि का भी समर्थन होता है जिसमें कहा गया है कि बकुल स्त्रियों की मुख मदिरा से सिंचकर पुष्पित हो उठता है-

“नालिंगितः कुरबकस्तिलको न दृष्टो नो ताडितश्च चरणैः सुदृशामशोकः।
सिक्तो न वक्त्रमधुना बकुलश्च चैत्रे चित्रं तथापि भवति प्रसवावकीर्णः॥” (काव्यमीमांसा)

जयदेव के गीतगोविंद में भी इस पुष्प के वसंत विकास की चर्चा है। कालिदास इस पुष्प को वसंत और वर्षा दोनों ऋतुओं में वर्णित करते हैं। वस्तुतः यह खिलता तो है वसंत के अंत में और शरत्काल तक खिलता रहता है। शरत्काल तक आते-आते इसके पुष्प मादक गंध से भर जाते हैं। शायद इसीलिये निघंटुकारों ने इसका एक नाम ’शीधुगंध’ रखा है।
कालिदास को फूलों का वर्णन बहुत रुचता है। बकुल पुष्प भी कालिदास के काव्य में सर्वत्र उल्लिखित है। रघुवंश में बकुल की सर्वोल्लिखित प्रसिद्धि का उल्लेख है तो अभिज्ञानशाकुंतल में इसी प्रसिद्धि के विवरण के साथ यह सूचना भी कि बकुल के यह पुष्प सूर्यातप से मुरझा कर भी अपनी सुगंध नहीं खोते। कुमारसंभव एवं ऋतुसंहार में इस पुष्प को केसर नाम से व्यवहृत करते हैं कालिदास। मेघदूत की यह पंक्ति तो प्रतिष्ठित है ही-

“रक्ताशोकश्चलकिसलयः केसरश्चात्र कान्तः प्रत्यासन्नौ कुरवकवृतेर्माधवीमण्डपस्य।
एकः सख्यास्तव सह मया वामपादाभिलाषी कांक्षत्यन्यो वदनमदिरां दोहदच्छद्मनाsस्याः।”

[हे मेघ ! क्रीड़ाशैल पर, कुरबक वृक्षों की पाँत वाले वासन्ती लता-मण्डप के समीप रक्ताशोक एवं सुन्दर बकुल के दो वृक्ष लगे हुए हैं । उनमें से एक रक्ताशोक – मेरे साथ आपकी सखी के बाँए पैर के ताड़न का अभिलाषी है । दूसरा बकुल – प्रफुल्लित होने के लिये आपकी सखी के मुख की मदिरा उच्छिष्ट रूप में चाहता है ।]

औषधीय गुण एवं वैज्ञानिक विशिष्टताएँ

सघन चिकने पत्रयुक्त, सदा हरित मध्यम कद का यह वृक्ष अपेक्षाकृत छोटे और सीधे काण्डस्कण्ध (Trunk) वाला होता है, जिससे शाखा प्रशाखायें निकल कर चारों ओर फैली रहती हैं। पत्तियाँ चिकनी व अग्र पर यकायक नुकीली होती हैं। इसके पुष्प सफेद रंग के तथा अत्यंत सुगंधित होते हैं, जो या तो अकेले या मंजरियों में निकलते हैं। फल (Berry) इसके १ इंच तक लम्बे, कच्चेपन में हरे और पकने पर पीत या नारंग-पीत वर्ण के होते हैं। प्रत्येक फल में एक बीज होता है, जो अंडाकार किन्तु चपटा और चमकीले भूरे रंग का होता है। ग्रीष्म से शरत्काल तक इसमें पुष्प आते हैं, बाद में फल लगते हैं।
बकुल के पुष्प अपनी मनोरम सुगंध के कारण मनःप्रसादकर होते हैं। गुरु गुण, कटु काषाय, कटु विपाकी, कफपित्तशामक, स्रावस्तम्भक, गर्भाशय शैथिल्यहर, ज्वरघ्न, विषघ्न कर्म वाले बकुल वृक्ष की छाल में टैनिन, रंजक द्रव्य, वैक्स, स्टार्च एवं क्षार या भस्म पायी जाती है। फूलों में एक सुगंधित उड़नशील तैल पाया जाता है। फलमज्जा में शर्करा तथा सैपोनिन की उपलब्धता होती है। यूनानी मतानुसार बकुल के पुष्प गरम और खुश्क तथा फल एवं छाल शीत एवं रुक्ष होते हैं।

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सुकुमारी ने छुआ और खिल उठा प्रियंगु: वृक्ष दोहद-6 https://blog.ramyantar.com/2009/07/priyangu.html https://blog.ramyantar.com/2009/07/priyangu.html#comments Mon, 27 Jul 2009 02:15:00 +0000   प्रियंगु अपनी अनेक संज्ञाओं, यथा फलप्रिया, शुभगा, नन्दिनी, मांगल्य, प्रिया, श्रेयसा, श्यामा, प्रियवल्लि, कृष्णपुष्पी इत्यादि के साथ प्राचीन संस्कृत काव्य-ग्रंथों व लगभग सभी आयुर्वेद-ग्रंथों...

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प्रियंगु पुष्प की भूमिकाप्रियंगु! यथा नाम तथा गुण। काव्य रसिकों और औषधि विज्ञानियों दोनों का प्रिय। कालिदास इसकी सुगंध के सम्मोहन में हैं। ऋतुसंहार में सुगंधित द्रव्यों के साथ इस पुष्प का वर्णन है। चरक जैसे औषधि विज्ञानी भी इसे खूब चाहते हैं। दाह की चिकित्सा में प्रमुख बताते हुए प्रियंगु और चंदन चर्चित रमणियों के कोमल स्पर्श को दाह की महौषधि सिद्ध करते हैं। प्राचीन काल में राज प्रासादों और बाग-बगीचों के अग्रभाग में प्रियंगु के फूल शोभित होते थे- बृहत संहिता में ऐसा उल्लेख है। अमरकोष, चरक संहिता की टीकाओं, वनौषधिदर्पण और धन्वंतरि निघंटु- सर्वत्र प्रियंगु किसी न किसी संदर्भ में उल्लिखित एवं उद्धृत है।

प्रियंगु सम्बन्धित कवि प्रसिद्धियाँ 

इस पुष्प के संदर्भ में दो कवि प्रसिद्धियों का उल्लेख है- पहली कि यद्यपि इसके पुष्प पीतवर्णी होते हैं परन्तु कवि परम्परा में उन्हें श्यामवर्णी वर्णित करना चाहिये। अजीब है- श्याम रंग का तो यह है ही, फिर नयी बात क्या? श्याम रंग का ही तो लिखेंगे। बृहन्निघंटु रत्नाकर भी यही कहता है कि यह कृष्ण-वर्णी है। यद्यपि ‘डिमक खोरी’ ने इसे पीला कहा है परन्तु दूसरे वनस्पति विज्ञानी ’नाइट’ अपनी पुस्तक ’फिगर्स ऑफ इण्डियन प्लांट्स’ में इसका श्याम वर्णी चित्र ही प्रदान कर देते हैं। फिर संदेह कैसा? शायद संदेह नवग्रह स्तोत्र के बुध-ध्यान मंत्र से हो गया हो- “प्रियंगु कलिका श्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधं सौम्यं गुणोपेतं तं बुधं  प्रणामाम्यहम्।”

बुध पीत-वर्णी हैं, परन्तु इस मंत्र में उन्हें श्याम वर्ण का कह दिया गया है- प्रियंगु-कलिका के सदृश रंग वाला। तो काव्यशास्त्रियों ने सोचा होगा कि यदि मंत्रादि में बुध को श्याम कलिका के सदृश श्याम रंग का बताया जा रहा है तो प्रियंगु भी बुध की ही भाँति पीत वर्ण का होगा, उसे श्याम रंग का केवल कवि-कल्पना या अभिव्यंजना की उड़ान से कह दिया गया होगा। फिर प्रचलन में आ गया होगा यह कवि समय कि प्रियंगु होता तो पीत है परन्तु वर्णित श्याम रंग का ही होना चाहिये।

दूसरी कवि प्रसिद्धि यह है कि प्रियंगु सुन्दर स्त्रियों के स्पर्श से विकसित हो उठता है। मधुर स्पर्श प्रियंगु को हर्षातिरेक से भर देता है और प्रियंगु अपना रंग-रूप सर्वस्व अर्पित करने को उद्यत हो उठता है। प्रियंगु के विकसित पुष्पों की मंद सुगंध समा जाती है स्त्री देंह में। राजशेखर ने तो अतिरेकी साम्य दे दिया- इसमें कवित्व भी देखियेगा-

“प्रियंगुश्याममम्भोधिरान्ध्रीणां स्तनमण्डलम्।
अलङ्कर्तुमिव स्वच्छाः सूते मौक्तिकसम्पदः॥”
(दक्षिण समुद्र, आन्ध्र-रमणियों के प्रियंगु-पुष्प के समान श्याम-वर्ण स्तन-मण्डल को मानों, अलंकृत करने के लिये, स्वच्छ मोतियों की सम्पदा उत्पन्न करता है।”)

 

प्रियंगु अपनी अनेक संज्ञाओं, यथा फलप्रिया, शुभगा, नन्दिनी, मांगल्य, प्रिया, श्रेयसा, श्यामा, प्रियवल्लि, कृष्णपुष्पी इत्यादि के साथ प्राचीन संस्कृत काव्य-ग्रंथों व लगभग सभी आयुर्वेद-ग्रंथों में उपस्थित है। संहितायें इस पुष्प का विस्तार से वर्णन करती हैं। वहाँ इसके दो प्रकारों का उल्लेख है- प्रियंगु व गंध प्रियंगु। दूसरी प्रजाति सुगंधित होती है। वस्तुतः यही औषधि-कार्य में प्रयुक्त होती है। गंध-प्रियंगु की धान्य सदृश पुष्पकलिकायें व छोटे छोटे फल होते हैं और बाजार में फूल-प्रियंगु के नाम से बिकते हैं।
 
हिमालय की तराई में काश्मीर से आसाम तक तथा बंगाल, बिहार में इसके गुल्म जंगलों के किनारे, घाट और ऊँची चढ़ाइयों पर, खुले मैदान और परती में पाये जाते हैं। बरसात में पुष्पित होता है यह। जाड़ों में फल आते हैं जो फूल-प्रियंगु के नाम से बिकते हैं। इसे मसल दें तो गंध फैल जाती है। कहीं श्याम रंगी तो कही हल्के गुलाबी रंग के छोटे छोटे फूलों वाला यह वृक्ष रुक्ष गुण, तिक्त रस, कटु विपाक, शीत वीर्य वाला होता है। औषधि कर्म तो अनगिनत हैं जिनमें प्रमुख हैं- त्रिदोषशमन, दाह-प्रशमन, वेदनास्थापन, स्तम्भन, रक्तशोधन आदि।
 
चलते चलते बता दूँ कि वाराहमिहिर ने अपनी ’वृहत्संहिता’ में दकार्गल विज्ञान (हाइड्रोलॉजी ) के अन्तर्गत कुछ ऐसे वृक्षों का भी उल्लेख किया है जिनके द्वारा भूमि के जल-स्तर का पता चलता है, और इसीलिये उन्होंने घरों के समीप अशोक, पुन्नाग, शिरीष एवं नीम के साथ प्रियंगु भी लगाने की अनुशंसा की है।

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सुन्दरियों के गान से विकसित हुआ नमेरु: वृक्ष दोहद-5 https://blog.ramyantar.com/2009/07/nameru.html https://blog.ramyantar.com/2009/07/nameru.html#comments Mon, 20 Jul 2009 13:11:00 +0000 स्त्रियोचित प्रतिभाओं में सर्वाधिक प्रशंसित और आकर्षित करने वाली प्रतिभा उनका मधु-स्वर-संपृक्त होना है। स्त्री का मधुर स्वर स्वयं में अनन्त आनन्द का निर्झर-स्रोत है।...

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Calophyllum inophyllum or Alexandrian Laurelस्त्रियोचित प्रतिभाओं में सर्वाधिक प्रशंसित और आकर्षित करने वाली प्रतिभा उनका मधु-स्वर-संपृक्त होना है। स्त्री का मधुर स्वर स्वयं में अनन्त आनन्द का निर्झर-स्रोत है। यह अनावश्यक नहीं कि वृक्ष-दोहद की महत्वपूर्ण क्रिया जो अनेक स्त्री-क्रिया-व्यवहारों से सम्पन्न होती हो उसमें स्त्री के गायन मात्र से पुष्पोद्गम या वृक्षॊ के विकास के कार्य सम्पादित होने का कोई उल्लेख हो! स्त्री के इस सु-स्वभाव और नमेरु के सुरूप ने अत्यन्त आकर्षित किया मुझे। सुन्दरी स्त्रियाँ मदमस्त होकर गा उठें तो खिल उठेगा नमेरु। कवि प्रसिद्धि है कि स्त्रियों के गान से नमेरु स्वतः ही विकसित होकर खिलखिला उठता है, और शायद यही मधुगान ही नमेरु में पुंकेसरों के स्वरूप में अभिव्यक्त हो उठता है।
नमेरु की विरदावली कालिदास ने भी गायी है। सुरपुन्नाग कहा जाने वाला नमेरु कालिदास के काव्य कुमारसंभव में यत्र-तत्र उल्लिखित है। शिव की तपस्या भंग करने कामदेव जब शिव-स्थान कैलाश पहुँचे तो उन्हें इस पुष्प-वृक्ष की ओट ही मिली छिपने को- नन्दी की आँख बचाकर कामदेव इस वृक्ष की घनच्छाय आकृति के पीछे हो लिये और धीरे-धीरे शिव के समाधिस्थान तक पहुँच गये-

दृष्टिप्रपातं परिहृत्य तस्य कामः पुरः शुक्रमिव प्रयाणे।
प्रान्तेषु संसक्तनमेरुशाखं ध्यानास्पदं भूतपतेर्विवेश॥

वृक्ष दोहद - नमेरु

शिव का समाधिस्थल तो इन नमेरु वृक्ष की शाखाओं की छाया से आच्छन्न था ही, शिव के गण भी नमेरु पुष्पों के विभिन्न आभूषण धारण कर पार्वत्य औषधों से व्याप्त उन शिलाओं पर आसीन थे। कालिदास की लेखनी का मनोहारी स्वरूप देखिये-

“गणा नमेरुप्रसवावतंसा भूर्जत्वचः स्पर्शवतीर्दधानाः।
मनःशिलाविच्छुरिता निषेदुः शैलेयनद्धेषु शिलातलेषु॥”

नमेरु की रमणीयता का जितना उल्लेख कालिदास के काव्य में है, अन्यत्र नहीं। अन्य स्थानों पर, औषधि ग्रंथों में जरूर इसका विभिन्न नामों के व्यवहार से उल्लेख किया गया है और इसकी औषधि-उपयोगिता पर प्रकाश डाला गया है। भारत में दक्षिण कोंकण से मालाबार तक तथा कोयम्बटूर में समुद्रतटीय प्रदेशों में यह स्वयंजात और बोये जाने वाला वृक्ष अनेक स्थानों और अनेक भाषाओं में भिन्न-भिन्न नामों से व्यवहृत है। पुन्नाग, सुरपुन्नाग, सुल्तान चम्पा, सुरपर्णिका, सुरतुंग, सुरेष्ठ, नागपुष्प, प्रमुखः, तुंग, सुरपुन, उंडी आदि नाम नमेरु के ही हैं। औषधीय ग्रंथों में लाल नागकेशर के नाम से व्यवहृत यह पुष्प असली नागकेशर का छद्म रूप धारण कर पंसारियों की दुकान से बिकता है और उन्हें मालामाल करता है।

कैसा है यह नमेरु? (Callophyllum inophyllum or Alexandrian Laurel)

2209458436_c7356cd2c8 यद्यपि नमेरु के वृक्षों का स्वाभाविक विकास तनिक मद्धिम है, फिर भी यह सदाबहार, छायादार वृक्ष बड़े-बड़े प्रांगणों और सड़कों के किनारे लगाया जाता है। इसकी गोलाई लेती हुई मोटी चिकनी पत्तियाँ, सुन्दर सुरंग पुष्प और उनके मध्य पीत पुंकेसर, उनसे रंग-साम्य रखती हुई डंठल और सबसे बढ़कर हल्की मीठी सुगंध किसे खींच न लेगी अपनी ओर! चित्रों में दिख रहा हरित पीत फल भी बड़े काम का है। पुराने दिनों में इससे निकाला तेल इंधन के तौर पर प्रयुक्त हुआ करता था। इसे पिन्नाई या डिलो तेल कहा जाता था।
चिकनी सतह वाले नमेरु के पुष्प व फल त्वचा को चिकनी भी बना सकते हैं और अल्सर जैसी अन्य बीमारियाँ भी दूर कर सकते हैं। लघु गुण, कषाय रस, कटु विपाक, कफ-पित्तशामक, दुर्गंधनाशक, स्वेदापनयन, रक्तस्तम्भक आदि प्रधान कर्म वाला यह पुष्प-वृक्ष सुश्रुतोक्त एलादि गण, प्रियंग्वादिगण एवं अञ्जनादिगण आदि में उल्लिखित है। और अच्छा तो और लगने लगता है यह नमेरु तब जब यह अनुभव करता हूँ कि जिस कम्प्यूटर से यह नमेरु-पाती लिख रहा हूँ, उसका कैबिनट भी बन सकता है नमेरु वृक्ष की लकड़ियों से, और नाव भी बन सकती है, और रेलवे के शयनयान की सीट भी बन सकती है और प्लाइवुड भी क्योंकि इसकी लकड़ियाँ विश्वसनीय और दीर्घावधि उपयुक्त जो होती हैं। अब बस!

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० शुभे ! मृदु हास्य से चंपक खिला दो (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा )
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यह देखिये कि बूँदे बरसने लगीं हैं, सूरज की चातुरी मुंह छुपा रही है और ग्रीष्म ने हिला दिये हैं अपने हाँथ, और इधर मैं हूँ कि ग्रीष्म के कनकवर्णी चम्पक को ही विस्मृत किये बैठा हूँ। यह कैसे संभव है कि जिस पुष्प की कांचन प्रतिभा से ग्रीष्म की रागिनी धूप भी चमक उठती हो उसे ग्रीष्म के अतीत होने तक भी याद न किया जाय! कवि-समय के उल्लेख में तो राजशेखर ने इसे ग्रीष्म में वर्णित करने की राह ही सुझायी थी-

Champak Flower

विचकिलकेसरपाटलिचम्पकपुष्पानुवृत्तयो ग्रीष्मे

राजशेखर: काव्य मीमांसा १८

पर यह बात अलग है कि कालिदास ने इसे वसंत का फूल ही मान लिया। यह संभव भी था वसंत की प्रकृति के हिसाब से कि चम्पा जैसा सुगंधित फूल उसी ऋतु में खिलता। वस्तुतः यह सुरभित करता भी है दोनों ऋतुओं को, और खिलता है वसंत और ग्रीष्म की संधि में। चम्पक (चम्पा) की सुगंध ने बहुत लुभाया है साहित्यिकों को, और रसिकों को भी।

चंपा उत्कट गंध वाला पुष्प है

आज जब यह पुष्प मन में उतर गया तो रूप से अधिक इसके गंध की माधुरी खिल गयी। वृंत पर अकेले (अकेले क्यों? क्या इसकी गंध वैयक्तिकता की गंध है?) खिलने वाला यह फूल भौंरे को मनमानी नहीं करने देता। झट से झिझक जाती है भ्रमर वृत्ति- अनोखा है यह पुष्प। यह अकेला ऐसा पुष्प होना चाहिये जिसकी उत्कट गंध के कारण भौंरे इनके पास नहीं जाते। बाबा तुलसी को भी यह बात रिझा गयी थी, और यही कारण है कि अयोध्या में राम के बिना भरत का अयोध्या के प्रति राग वैसा ही था- जैसे भौरा चंपक के बाग में हो। सर्वत्र बिखरा हुआ ऐश्वर्य (सुगंध), पर किसी काम का नहीं- “तेहि पुर बसत भरत बिनु रागा/ चंचरीक जिमि चंपक बागा ।”

भारतवर्ष के इस परिचित पुष्प का सौन्दर्य इसके हल्के पीले नारंगी रंग के फूलों से है। यही कारण है कि संस्कृत में यह कांचन, या सुवर्णपुष्प है। “गोस्वामी तुलसीदास” ने तो इस रूप का रहस्य भी खोल ही दिया है अपनी बरवै रामायण में-

चंपक हरवा गर मिलि अधिक उदोत
कन अँगुरी की मुंदरी कंगन होत ..।

तुलसीदास

वियोगिनी सीता के गले में झूलकर यह चंपक और भी कनकवर्णी होकर चमक उठा है, और ऐसा सहज ही हो क्यों न, यदि (किसी कवि की पंक्ति से कहूँ तो)-

सिया सोने की अँगूठी, राम साँवरो नगीना हैं।

champa flowers

चम्पक रमणियों की हँसी से पुष्पित होता है

वृक्ष-दोहद के संबंध में यह कवि-प्रसिद्धि है कि चंपक रमणियों के पटु-मृदु हास्य से पुष्पित होता है। तो इस सम्मति में कैसा संदेह कि स्त्री-स्मित की सुगंध ही व्याप्त हो गयी होगी इस फूल में अपनी पूरी तीव्रता से! जैसे सम्पुट में ठहरा हुआ विरलतम होता है किसी रमणी का मधुहास, वैसा ही तो खिलता है यह वृक्ष-वृंतों पर शरमाया-सा, पर पूर्णतया अभिव्यक्त और प्रभावी।

भारत, इण्डोनेशिया और पड़ोसी क्षेत्रों का असली निवासी यह फूल पूर्वी हिमालय के क्षेत्रों में पूरी ऊर्जा से खिलता है। सदाबहार वृक्ष है यह। इसलिये ही तो अत्यन्त प्रिय है वाल्मीकि और कालिदास को। जितना ही यह सहित्य में वर्णित है उतना ही स्वीकृत है जन-जन में अपनी सुगंध के लिये। देवता के चरणों पर आस्था की सुगंध पहुँचाता है भली भाँति। गर्म-आर्द्र रात्रि में इसकी सुगंध की दूरी नाप नहीं सकते हमसब। यह गूढ़ बात भी तो समझानी है इसे- “फूल डाली से गुँथा ही झर गया, घूम आयी गंध पर संसार में।”

The Champa Flower1

चम्पा का यह गौरव-गीत अक्षुण्ण है। कवि वाल्मीकि ने इसे गाया अपनी रामायण में। कालिदास ने वसंत वर्णन करते हुए ऋतुसंहार में, मेघदूत में। तुलसी, रवीन्द्रनाथ से होती हुई यह यात्रा आधुनिक कवि शलभ श्रीराम सिंह तक आयी। अजित वडनेरकर के शब्दों के सफर का एक पड़ाव यह चंपक भी था। वहीं से खयाल आया कि बिहार के चंपारन जिले का नाम इन चंपक वृक्षों की वहाँ बहुतायत से पड़ा। चम्पक+अरण्य= चम्पकारण्य, बाद में समयगति से चम्पारन। शेष फिर!

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रूपसी गले मिलो! कि कुरबक फूल उठे: वृक्ष दोहद-3 https://blog.ramyantar.com/2009/07/kurabak.html https://blog.ramyantar.com/2009/07/kurabak.html#comments Fri, 03 Jul 2009 09:48:00 +0000 यूँ तो अनगिनत पुष्प-वृक्षों को मैंने जाना पहचाना नहीं, परन्तु वृक्ष दोहद के सन्दर्भ में कुरबक का नाम सुनकर मन में इस पुष्प के प्रति...

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Kurbak

यूँ तो अनगिनत पुष्प-वृक्षों को मैंने जाना पहचाना नहीं, परन्तु वृक्ष दोहद के सन्दर्भ में कुरबक का नाम सुनकर मन में इस पुष्प के प्रति सहज ही उत्कंठा हो गयी। मैंने इसे पहचानने का प्रयास किया। प्रथमतः जैसा कुछ ग्रंथों में उल्लिखित है, यह बहुत कुछ कांचनार या कोविदार जैसा एक पुष्प है, रूप और गुण के लिहाज से। परन्तु धन्वंतरि निघंटु के अनुसार सौरेयक के चार प्रकारों में से पीत सौरेयक को कुरण्टक और रक्त सौरेयक को कुरबक कहते हैं। हिन्दी में यही कटसरैया या पियाबासा कहा जाता है। पियाबासा के यह पुष्प सर्वत्र सुलभ हैं।

कुरबक का वर्णन साहित्य में एक रक्त-वर्णी पुष्प के रूप में किया गया है। अमरकोष के अनुसार भी कुरबक के फूल लात होते हैं। रामायण के वसंत वर्णन में रक्त कुरबकों का उल्लेख है। कालिदास भी इसे रक्त वर्णी ही उल्लिखित करते हैं। कुरबक को कटसरैया मान लेने में थोड़ी समस्या यह भी थी कि कटसरैया पूर्णतः लाल नहीं होती और अनेकों स्थानों पर तो इसके पीत और शुभ्र पुष्प ही प्राप्त होते हैं। परन्तु विभिन्न स्थानों पर इसके भिन्न-भिन्न प्रकार एवं इसकी स्वभावगत विशेषता के साम्य के कारण इसे कटसरैया मान लेना ही उपयोगी है।

कुरबक के अलग-अलग रंग रूप

वनौषधि निदर्शिका (हिन्दी समिति, सूचना विभाग, उत्तर प्रदेश) में भी इसका स्पष्ट उल्लेख है कि पुष्प के रंग भेद से कटसरैया चार प्रकार की होती है – श्वेत , पीत, रक्त और नील। इनमें रक्त सौरेयक (barleria cristata) को ही कुरबक कहते हैं। इसके पुष्प भड़कीले, गुलाबी रंग के होते हैं। यह पौधे स्थान-भेद से पत्तों और पुष्प-वर्णों में भिन्न-भिन्न होते जाते हैं। हिमालय-क्षेत्र और हमारे आसपास यह पौधे जामुनी नील रंग के होते हैं। 

साहित्य में कवि-प्रसिद्धि है कि कुरबक सुन्दर स्त्रियों के आलिंगन से पुष्पित हो जाता है। इस विश्वास की जानकारी कालिदास को भी थी और राजशेखर को भी। राजशेखर ने अपनी काव्य-मीमांसा में वसंत-वर्णन के क्रम में इसका संकेत किया है–

“नालिङ्गितः कुरबकस्तलको न दृष्टो ना ताडितश्च चरणैः सुदृशामशोकः|
सिक्ता न वक्त्रमधुना बकुलश्च चैत्रे चित्रं तथापि भवति प्रसवावकीर्णाः||”

(आश्चर्य यह है कि इस मास में कुरबक का वृक्ष रमणी के आलिंगन के बिना, तिलक का वृक्ष उसकी चितवन के बिना, अशोक वृक्ष उसके पदाघात के बिना और बकुल वृक्ष मद्य-गंडूष के बिना ही पुष्प प्रसव करने लगते हैं।”)

Kurabak स्त्रियों द्वारा आलिंगन करने की इस कवि-प्रसिद्धि के पीछे शायद इस पुष्प-वृक्ष का छोटी झाड़ी या पौधे की तरह होना है। इस पौधे के स्वयंजात क्षुप आसानी से गाँवों के आसपास बगीचों की मेड़ों पर या मन्दिरों के उद्यानों, परिसरों में लगे हुए मिल जाते हैं। 

 
कालिदास ने कुरबक का यह पुष्प वसंत में खिलते देखा था। कालिदास के काव्य में यह पुष्प सर्वत्र विद्यमान है। मेघदूत में यक्ष उद्यान के प्रसंग में उल्लेख है कि उस उद्यान के माधवी-मंडप का बेड़ा कुरबक का था। रघुवंश के वसंत वर्णन में इसका उल्लेख है। मालविकाग्निमित्र में इस पुष्प के वर्णन कि वसंत की प्रौढ़ावस्था में कुरबक के फूल पतित हो जाते हैं, हम एक संकेत भी ग्रहण कर सकते हैं कि यह कुरबक ही कटसरैया है।

देवपूजा के उपयोग में आने वाला यह पुष्प समस्त भारतवर्ष के उष्णकटिबंधीय प्रदेशों में पाया जाता है। इसकी शाखायें जड़ से निकलती हैं, पत्तियाँ अण्डाकार, अभिमु्खक्रम से स्थित; पुष्प अवृन्त बड़े, प्रायः एकाकी होते हैं। फल यवाकृतिक तथा द्विकोष्ठीय व जड़ काष्ठीय़ होती है। लघु-स्निग्ध गुण, तिक्त-मधुर रस, कटु विपाक व ऊष्ण वीर्य वाला यह पुष्प कफवातशामक, रक्तशोधक, ज्वरघ्नक, कुष्ठ्घ्न आदि है। श्वसन संस्थान के रोगों में इसका औषधि-प्रयोग अत्यन्त उपकारी है।


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० फूलो अमलतास ! सुन्दरियाँ थिरक उठी हैं (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा)

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फूलो अमलतास! सुन्दरियाँ थिरक उठी हैं: वृक्ष दोहद-2 https://blog.ramyantar.com/2009/07/amaltas.html https://blog.ramyantar.com/2009/07/amaltas.html#comments Wed, 01 Jul 2009 07:12:00 +0000 स्वर्ण-पुष्प वृक्ष की याद क्यों न आये इस गर्मी में। कौन है ऐसा सिवाय इसके जो दुपहरी से उसकी कान्ति चुराकर दुपहर से भी अधिक...

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वृक्ष दोहद अमलतास

स्वर्ण-पुष्प वृक्ष की याद क्यों न आये इस गर्मी में। कौन है ऐसा सिवाय इसके जो दुपहरी से उसकी कान्ति चुराकर दुपहर से भी अधिक तीव्रता से चमक उठे और सारा जीवन सारांश अभिव्यक्त करे। वह कौन-सी जीवनी शक्ति है जो इस अमलतास को जीवन्त बनाये रखती है कठिनतम धूप में भी, और जो मुस्कराता रहता है सदैव अपने पीताभ वर्ण में गलबहियाँ खोले! अमलतास से हम सब बातें करना चाहते हैं कुछ न कुछ – सिद्धेश्वर भी बतिया रहे हैं अमलतास से मेरे मन की- 

“जैसे–जैसे
बढ़ता जाता है धूप का ताप
और मौसम को लग जाता है
कोई अनदेखा– अनचीन्हा पाप
वैसे–वैसे
तुम्हारी हर कलिका से उभरता है अनोखा उल्लास
देखा है–सुना है
तरावट के बिना
पत्रहीन होकर नग्न हो जाते हैं गाछ
तब तुम्हारे ये दिव्य वस्त्राभरण
बताओ तो किस करघे पर काता गया
यह मखमली रेशम– जादुई कपास।

भरी दोपहरी में
जब गहराता है आलस का अंधियारा
दोस्त! तुम्हीं तो ले आते हो
थोड़ी रोशनी–थोड़ा उजास।”

अमलतास का नाम कर्णिकार है संस्कृत साहित्य में

वृक्ष-दोहद के सन्दर्भ में कर्णिकार (यही नाम तो व्यवहृत है अमलतास का संस्कृत साहित्य में) का उल्लेख देखा तो मन मचल उठा। बहुत कुछ स्मरण हो उठा कालिदास की लेखनी का चमत्कार। कालिदास ने अपने काव्य में अनगिन स्थानों पर इस कर्णिकार का उल्लेख किया है अशोक के साथ। ब्रांडिस (Brandis) भी तो अशोक और अमलतास दोनों को एक ही जाति (Cassia) का सिद्ध करते हैं। प्रसिद्धि है कि यदि कर्णिकार वृक्ष के आगे स्त्रियाँ नृत्य करें तो प्रमुदित होकर वह पुष्पित हो उठता है।

वृक्ष-दोहद के संबंध में कर्णिकार को संयुक्त करने का कारण इस वृक्ष का स्त्री-सहचर होना लगता है। कालिदास के रम्य काव्य में एकाधिक स्थानों पर इस तथ्य का उल्लेख है कि स्त्रियों से अत्यन्त निकट है यह वृक्ष। अमलतास सुन्दरियों के कानों में और केशों मॆं झूलता है, कुमार संभव में पार्वती की नील अलकों में यह नवकर्णिकार पुष्प सुशोभित है –

उमाsपि नीलाsलकमध्यशोभि विसंसयन्ती नवकर्णिकारम्
चकार कर्णच्युतपल्लवेन् मूर्ध्ना प्रणामं वृषभध्वजाय ।

कालिदास: कुमारसम्भव

और ऋतुसंहार में कान में नवकर्णिकार-पुष्पों को लगाने का उल्लेख है। स्वतः में अयत्नसंभूत यह वृक्ष स्त्रियों के मनरंजक प्रयत्नों से हर्षाभिव्यक्ति करता पुष्पित हो उठता है।

अमलतास के वसंत में पुष्पित होने की कवि प्रसिद्धि

यूँ तो यह फूलता है वैशाख- जेठ की ग्रीष्मावधि में, पर साहित्य में कवि प्रसिद्धि है कि अमलतास वसंत में पुष्पित होता है। रामायण में वसंत-वर्णन के अवसर पर कर्णिकार के सुनहले पुष्पों का वर्णन मिलता है, राजशेखर वसंत में ही इसका प्रस्फुटित होना बताते हैं अपनी काव्य मीमांसा में और कालिदास ने भी वसंत में ही इन पुष्पों को खिलते देखा था। वैज्ञानिक इस पुष्प के फलों को तीखी गंध वाला बताता है और कवि कहते हैं यह पुष्प निर्गंध होता है –

“वर्णप्रकर्षे सति कर्णिकारं दुनोति निर्गंधतया स्म चेतः।
प्रायेण सामग्र्यविधौ गुणाना परांगमुखी विश्वसृजः प्रवृत्ति॥”

(कर्णिकार नामक पुष्प देखने में अत्यन्त सुन्दर होते हुए भी उनमें गंध के न होने से सहृदय पुरुषों के हृदय में उनपर तरस आती थी। ब्रह्मदेव की यह एक बुरी आदत है कि वह सकल पदार्थों में कुछ न कुछ गुण की कमी कर, किसी को सम्पूर्ण गुणसम्पन्न नहीं रहने देता।)

अमलतास के उच्छ्वसित सौन्दर्य की प्रशंसा उत्तरी हिमालय के यात्रियों ने भी मुक्त कंठ से की है। यह हिमालय के चार हजार फुट ऊँचे प्रदेशों में भी पुष्पित होता दृष्ट हुआ है। मूलतः है तो यह दक्षिण एशिया का वृक्ष, पर पूरे विश्व तक इसका विस्तार है। सूर्य-प्रिय है यह, और अकाल की भीषण स्थिति का भी सामना सहज ही खिलते हुए करता है। रूखा मौसम अमलतास को अत्यन्त प्रिय है, और यह जरा-सी भी सर्दी बर्दाश्त नहीं करता।

अमलतास के औषधीय गुण

अमलतास के औषधीय गुण

राजनिघंटुकार के मत से क्षुद्र आरग्वध (Disease-Killer) ही हिन्दी में अमलतास है। औषधीय गुणकारी यह वृक्ष एक बेहतर दर्दनिवारक और रक्त-शोधक सिद्ध है। इसकी फलियाँ अलसर, तेज बुखार, पीलिया, पेचिस आदि व्याधियों में सहायक हैं। त्वचा की देखभाल करने के लिये भी यह गर्मी में हमारी सहायता के लिये उपलब्ध है। अमलतास के औषधीय रेचक गुण (laxative actions) एंथ्राक्विनोन्स (anthraquinones) से आते हैं। अमलतास के बीजों में 2% एंथ्राक्विनोन्स (anthraquinones), 24% प्रकृत प्रोटीन (crude protein), 6.65% वसा (fat), 20% फाइबर (crude fibre) एवं 39.86% कार्बोहाइड्रेट्स (carbohydrates) की व्याप्ति होती है।

अपने स्वर्णिम पुष्पों, अपनी कमनीय प्रकृति, अपने औषधीय गुण-धर्म एवं साज-सज्जा में अपने चारु उपयोग के लिये यह वृक्ष सर्व-प्रिय व सर्व-प्रशंसित है।


# वृक्ष-दोहद के बहाने यह वृक्ष-पुष्प चर्चा जारी रहेगी। अगला पड़ाव कुरबक होगा।

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रमणियों की ठोकर से पुष्पित हुआ अशोक: वृक्ष दोहद-1 https://blog.ramyantar.com/2009/06/ashoka-tree.html https://blog.ramyantar.com/2009/06/ashoka-tree.html#comments Wed, 24 Jun 2009 00:13:00 +0000 वृक्ष दोहद की संकल्पना के पीछे प्रकृति के साथ मनुष्य का वह रागात्मक संबंध है जिससे प्रेरित होकर अन्यान्य मानवीय क्रिया-कलाप वृक्ष-पादपों पर आरोपित कर...

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Asoca Tree

वृक्ष दोहद की संकल्पना के पीछे प्रकृति के साथ मनुष्य का वह रागात्मक संबंध है जिससे प्रेरित होकर अन्यान्य मानवीय क्रिया-कलाप वृक्ष-पादपों पर आरोपित कर दिये जाते रहे हैं। प्रकृति के साथ मनुष्य के  यह रागात्मक सम्बन्ध वस्तुतः उसके आनन्द को और व्यापक बनाते हैं। मनुष्य के अन्तर्निहित भावों की अभिव्यक्ति इसी कारण प्रकृति के माध्यम से होने लगी और अनेकों इच्छायें (पूर्ण-अपूर्ण) विभिन्न क्रियाकलापों में दृष्ट होने लगीं।

वृक्ष-दोहद का सम्बन्ध वृक्षों में असमय/अ-ऋतु ही पुष्प के उदगम से लिया जाता रहा है। आश्चर्यजनक है कि स्त्रियाँ जो स्वयं उर्वरता और प्रजनन के लिये उत्तरदायी हैं, विपरीततः अपनी विभिन्न क्रियाओं से वृक्षों को गर्भित करती हैं, पल्लवित-पुष्पित करती हैं। वृक्ष-दोहद की क्रिया के अन्तर में मुझे सहज स्वाभाविक गर्भिणी स्त्रियों की सामान्य उत्कंठा दिखायी पड़ती है जो स्वतः में अनूभूत होने वाले उस विरल अनुभूति-व्यापार को अपने सामने, अपने से इतर कहीं घटित होते देखना चाहती हैं। प्रकृति से अच्छा साधन उन्हें कहाँ मिलेगा?

विज्ञान की अननन्तर सिद्ध सैद्धांतिकी कि वृक्षों में जीवन है  और वह संवेदित भी होते हैं, साहित्य की कल्पनाशीलता से घुलमिल कर एक रुचिकर प्रसंग वृक्ष दोहद के रूप में हमारे सामने उपस्थित है। वृक्ष दोहद के संबंध  में प्राचीन साहित्य शिल्प में जिन वृक्षों का उल्लेख है, उनमें सबसे प्रिय और महत्वपूर्ण वृक्ष अशोक है। कहते हैं, सुन्दर स्त्रियों के पदाघात (पैरों के प्रहार) से अशोक में पुष्प खिल आते हैं, और पैर भी कैसे? किंकिणि-नूपूर-सज्जित, कुमकुम लेपित। नूपूर-सज्जित रमणियों के वाम पैर ही वृक्ष में आघात देते हैं और अशोक पुष्पित हो उठता है। उत्कीर्ण मूर्तियों में अशोक दोहद की क्रिया सम्पादित करती यक्षिणियाँ अपने वाम पैरों से ही आघात करती मालूम पड़ती हैं (A.K. Coomarswami – Yaksas)|

साहित्य में अशोक को कुसुमित करने की क्रिया का उल्लेख

अशोक के फूल

अशोक को कुसुमित करने की इस क्रिया के अनेकों उदाहरण हमारे साहित्य में व्याप्त हैं। राजशेखर की काव्यमीमांसा में इसका उल्लेख है। हमारे विश्व-प्रसिद्ध कवि कालिदास के समस्त काव्य में वसंत-उत्सव के बहाने, अथवा मदनोत्सव के बहाने अशोक को कुसुमित करने की क्रिया का वर्णन है। कुमारसंभव में वसंत का वर्णन करते हुए कवि अशोक को स्कंध पर पल्लवित और कुसुमित बताता है; मेघदूत में भी यक्ष के माध्यम से वह इस क्रिया का उल्लेख करा देता है कि “अशोक तो यक्षिणी के वामपाद का अभिलाषी है”। कालिदास की रचना ’मालविकाग्निमित्र” के तृतीय अंक की सारी कथा ही मालविका के पदाघात से अशोक को पुष्पित करने की क्रिया को केंद्र बना कर रची हुई है।

मदनोत्सव में कामदेव की अभ्यर्थना के पश्चात अशोक को पुष्पित करने की क्रिया विस्तार से वर्णित है मालविकाग्निमित्र में। सामान्यतः होता यही है कि कोई सुन्दर स्त्री अपने समस्त श्रृंगार के साथ, पैरों में अलक्तराग और नूपुर सजा कर, हाथों में अशोक के पल्लव के गुच्छे पकड़कर  अपने बायें पैर से अशोक वृक्ष पर आघात करती है। अशोक नूपुर-ध्वनि से उल्लसित होकर अपने कंधे पर ही फूल उठता है। इस मादक क्रिया को अपनी लेखनी से और मादक बना दिया है कालिदास ने।

हेम-पुष्प (स्वर्ण वर्ण के फूलों से लदा हुआ) और तामृपल्लव के नाम से विख्यात अशोक एक सदाबहार वृक्ष है। सदैव हरा रहने वाला। सदैव हरा तो कामदेव ही है। मन, तन, सृष्टि और जीवन- सब की हरीतिमा हर क्षण बनाये रखने वाला और कौन है सिवाय कामदेव के। इसलिये ही यह अशोक भी समस्त शोक को हरने वाला है। खयाल करिये कि कामदेव के पंच बाणों में एक अशोक ही है।

धार्मिक संदर्भ: बौद्ध एवं जैन धर्म

इसे विचित्र संयोग कहें या अशोक की महत्ता को स्थापित करने वाला ईश्वरीय विधान कि यह बौद्ध और जैन दोनों धर्मों के प्रवर्तकों के जीवन से संयुक्त होकर इन धर्मों के लिये श्रद्धा और आदर का पात्र बना। कहते हैं, शाक्य रानी महामाया ने लुम्बिनी के उपवन में इसी वृक्ष के नीचे बुद्ध को जन्म दिया। कथायें कहतीं है, कि रानी माया अपने उपवन में विहार कर रहीं थी और तनिक क्लांत होकर वह एक अशोक वृक्ष के नीचे आकर विश्राम करने लगीं। तभी अचानक ही विचित्रतः अशोक की शाखायें झुकने लगीं, और उन्होंने एक शाखा पकड़ ली। तत्क्षण ही रानी माया के दक्षिण भाग से महात्मा बुद्ध का अवतरण हो गया। जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर के संबंध में भी कहा जाता है कि वैशाली में इसी प्रकार के वृक्ष के नीचे बैठकर उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया।

वैज्ञानिक एवं चिकित्सकीय विशिष्टताएँ

Scientific Classification of Saraca Asoca

अशोक सदा हरित रहने वाला २५ से ३० फुट उंचा, अनेकों शाखाओं युक्त घना व छायादार वृक्ष होता है। देखने में कुछ कुछ मौलश्री के वृक्ष-सा। सम्पूर्ण भारतवर्ष में इसकी बहुतायत है। पत्ते लंबे, गोल व नोंकदार होते हैं। कोमल अवस्था में इन पत्तों का रंग लाल, फिर गहरा हरा हो जाता है।  बहुत औषधीय गुण भी हैं इसमें – यह बांझपन का कष्ट हरता है, मातृत्व देता है; रक्त प्रदर में, मूत्र के रोगों में चिकित्सा में सहायक होता है; गर्भाशय की अंतःसतह (एण्डोमेट्रीयम) व डिम्ब ग्रंथि (ओवरी) के ऊतकों पर लाभकारी प्रभाव डालता है और गुर्दे के दर्द एवं पुरुषों में अण्डकोष-सूजन की चिकित्सा में सहायक होता है।

वैज्ञानिक दृष्टि डालें तो अशोक में कई जैव-सक्रिय पदार्थ पाये जाते हैं। मुख्यतः टैनिन्स, कैटेकाल, इसेन्शियल आयल, हिमेटॉक्सिलीन, ग्लाइकोसाइड, सौपोनिन्स, कैल्शियमयुक्त कार्बनिक यौगिक और लौह खनिजयुक्त कार्बनिक यौगिक। आधुनिक वैज्ञानिक मत कहते हैं कि अशोक की छाल का निष्कर्ष गर्भाशय को उत्तेजित करता है। इसके प्रयोग से गर्भाशय की संकुचन दर बढ़ जाती है और यह संकोचन अधिक समय तक बना रहता है। ऐलोपैथिक संश्लेषण औषधि की अपेक्षा इसका प्रभाव हानिरहित माना जाता है। वैज्ञानिकों ने अशोक की त्वचा में कुछ ऐसे संघटकों की खोज भी की है, जो कैंसर का होना रोकते हैं।


# वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प की यह चर्चा जारी रहेगी। किंचित अगला पड़ाव अमलतास होगा।

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साहित्य के अन्तर्गत कवि-समय का अध्ययन करते हुए अन्यान्य कवि समयों के साथ वृक्ष दोहद का जिक्र पढ़कर सहित्य की विराटता देखी। वृक्ष-दोहद का अर्थ वृक्षों में पुष्पोद्गम से है। यूँ तो दोहद का अर्थ गर्भवती की इच्छा है, पर वृक्ष के साथ इस दोहद का प्रयोग फूलों के उद्गम के अर्थ में ही किया जाता है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी  ने अपनी पुस्तक ’हिन्दी साहित्य की भूमिका’ में कवि-प्रसिद्धियों के अन्तर्गत वृक्ष-दोहद का सुन्दर विवेचन किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि ’दोहद’ शब्द ’दौहृद’ शब्द का, प्राकृत रूप है जिसका अर्थ भी मिलता जुलता है। दोहद के सम्बन्ध में आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि “कुशल व्यक्तियों द्वारा वृक्षों-लताओं आदि में जिन पदार्थों और क्रियाओं से असमय, अऋतु में ही फूलों का उदगम करा दिया जाता है, उसे दोहद कहते हैं।”

यह वृक्ष दोहद मेरे लिये एक विचित्र चीज है। साहित्य और शिल्प में वर्णित, निर्मित यह वृक्ष-दोहद रोचक जान पड़ता है। संस्कृत काव्य में यथास्थान वृक्ष दोहदों का उल्लेख है। कालिदास के ग्रंथों, मल्लिनाथ के ग्रंथ, काव्य-मीमांसा व साहित्य दर्पण आदि शास्त्रीय ग्रंथों में इस वृक्ष दोहद का पर्याप्त उल्लेख है।

कवि प्रसिद्धियाँ

यूँ तो इन ग्रंथों में अशोक, बकुल, तिलक, कुरबक- इन चार ही वृक्षों से सम्बन्धित कवि-प्रसिद्धियाँ मिलती हैं, परन्तु अन्यत्र कुछ स्थानों पर कर्णिकार (अमलतास), चंपक (चंपा), नमेरु(सुरपुन्नाग), प्रियंगु, मंदार, आम आदि वृक्ष-पुष्पों के भी स्त्री-क्रियायों से उदगमित होने के उल्लेख हैं।

मेरी रुचि अचानक ही इन वृक्षों के सम्बन्ध में बहुत कुछ जानने की तरफ हो गयी, और अपने आस-पास इनमें से कुछ वृक्षों को देखकर मन कल्पनाजनित वही दृश्य देखने लगा जिनमें सुन्दरियों के पदाघात से अशोक के फूल खिल रहे हों,अमलतास स्त्रियों के नृत्य से पुष्पित हो रहा हो, स्त्रियों की गलबहियाँ से कुरबक हँस कर खिल गया हो, चंपा फूल गया हो स्त्रियों की हँसी से चहककर, गुनगुना रही हों स्त्रियाँ और विकसित हो गया हो नमेरु, छूने भर से विकसित हुआ हो प्रियंगु और कुछ कहने भर से स्त्रियों के फूल गया हो मंदार आदि-आदि। 

कवि समय

कवि समय का अर्थ है कवियों का आचार या सम्प्रदाय। इस शब्द का सबसे पहले प्रयोग राजशेखर ने किया। इसका मतलब है कि “यद्यपि देश, काल आदि के विरुद्ध विषयों का वर्णन करना कवित्व का दोष है, तथापि कवि परम्परा में वर्णित ऐसी बातें निर्दोष होती हैं। लोक और शास्त्र विरोधी वे ही बातें कवि समय के अन्तर्गत आती हैं जिन्हें प्राचीन काल के पंडित अनेकों ज्ञात-अज्ञात वेद-शास्त्रों का अवगाहन कर निश्चित कर गए हैं।”

हिन्दी साहित्य की भूमिका पुस्तक से उद्धृत अंश

इन वृक्षों और फूलों के सम्बन्ध में तलाशने निकला इस अन्तर्जाल पर। जो कुछ मिला वह इस कवि-समय से ताल्लुक तो नहीं रखता था, परन्तु काफी ज्ञानवर्द्धन करने के लिये पर्याप्त था। इन वृक्ष-पुष्पों के वानस्पतिक नामों की खोज ने तो और भी बहुत कुछ हाथ पकड़ा दिया। तो एक भाव मन में जागा। इन वृक्षों और पुष्पों को एक आत्मीय भाव से निरखते हुए इनकी परिचयात्मक चर्चा करूँ, यदि संभव हो तो शास्त्रीय और वैज्ञानिक सन्दर्भों के साथ।  सब कुछ इसी अन्तर्जाल और संकलित पुस्तकों की सामग्री का ही प्रस्तुतिकरण होगा- मेरा अपना कुछ नहीं।

क्रमशः –

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