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	<title>Article | आलेख Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</title>
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	<description>हिंदी ब्लॉग। साहित्य, भाषा, संस्कृति, लोक व शास्त्र से संयुक्त। कविता, कहानी, समीक्षा, निबन्ध, नाटक एवं अनुवाद का सहज प्रकाशन। लोक साहित्य का रंग भी।</description>
	<lastBuildDate>Sun, 22 Mar 2026 14:06:58 +0000</lastBuildDate>
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	<title>Article | आलेख Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</title>
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	<item>
		<title>Arattai &#8211; संदेश और संवाद माध्यमों का स्वदेशी संस्करण</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2025/10/arattai-indian-messaging-calling-app.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 07 Oct 2025 10:31:11 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[General Articles]]></category>
		<category><![CDATA[Science]]></category>
		<category><![CDATA[Atmanirbhar Bharat]]></category>
		<category><![CDATA[Data Privacy]]></category>
		<category><![CDATA[Google Meet Alternative]]></category>
		<category><![CDATA[Indian Messaging App]]></category>
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		<category><![CDATA[WhatsApp Alternative]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>आत्मनिर्भर भारत के गुंजित स्वर में प्रधानमंत्री के स्वदेशी अपनाने के आह्वान का ऐसा असर हुआ कि भारतीय ऐप Arattai (अरट्टै, अरट्टई) एक मैसेजिंग ऐप...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="has-drop-cap">आत्मनिर्भर भारत के गुंजित स्वर में प्रधानमंत्री के स्वदेशी अपनाने के आह्वान का ऐसा असर हुआ कि भारतीय ऐप Arattai (अरट्टै, अरट्टई) एक मैसेजिंग ऐप ही नहीं बल्कि आत्मनिर्भर भारत की लहर का अभिनव प्रतीक बन कर उभरा। </p>



<p>Arattai (<a href="https://www.arattai.in/">अरट्टै, अरट्टई</a>) भारतीय कंपनी Zoho द्वारा विकसित एक मैसेजिंग ऐप है। Arattai शब्द तमिल में &#8216;आम बातचीत&#8217; और &#8216;चैट&#8217; के अर्थ में प्रयोग होता है। यह ऐप Zoho द्वारा पूरी तरह भारत में ही विकसित किया गया है। Arattai अरट्टै की आत्मा उसकी देशज आत्मनिर्भरता, सहजता और भारतीयता है। यहाँ संवाद पर बाहरी दबाव या विदेशी तकनीकी विसंगतियां नहीं हैं। इसमें संवाद की स्वतंत्रता, गोपनीयता एवं स्थानीयता का ताजा स्पर्श है।</p>


<div class="wp-block-image is-style-default">
<figure class="alignright size-full is-resized"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2025/10/Arattai_logo.webp 369w" type="image/webp" /><img fetchpriority="high" decoding="async" width="369" height="308" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2025/10/Arattai_logo.png?x47177" alt="Logo of Arattai App" class="wp-image-5218" style="width:240px;height:auto" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2025/10/Arattai_logo.png 369w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2025/10/Arattai_logo-300x250.png 300w" sizes="(max-width: 369px) 100vw, 369px" /></picture><figcaption class="wp-element-caption">Arattai App Logo</figcaption></figure>
</div>


<p>डिजिटल दिग्गजों के डिजिटल विकल्पों (WhatsApp, Telegram, Signal इत्यादि) के अभ्यस्त हम भारतीयों के लिए यद्यपि इसे अपनाना इतना सहज नहीं, पर Arattai की विशिष्टियाँ शायद हमें अपनी ओर खींच रही है। </p>



<p>उपयोगकर्ताओं द्वारा उपयोग की निरन्तरता और अरट्टै द्वारा बिना बाधा प्रदान की गई उन्नत एवं सक्षम सुविधाओं का मेल यदि संभव हुआ तो संदेशों के आदान प्रदान के लिए इससे सुंदर कोई भारतीय विकल्प नहीं। </p>



<p>भारतीयता का आग्रह, <a href="https://www.zoho.com/">जोहो Zoho</a> कंपनी की विशेषज्ञता, विश्वसनीयता एवं विदेशी ऐप के समर्थ विकल्प होने के कारण Arattai भारतीयों की आँखों का तारा बन गया है।</p>



<h2 class="wp-block-heading">Arattai की विशेषताएँ</h2>



<ul class="wp-block-list">
<li><strong>सुरक्षा और निजता भारत में :</strong> Arattai अरट्टै में उपयोगकर्ता की चैट, मीडिया और डेटा भारत के ही सर्वर पर सुरक्षित रहते हैं।</li>



<li><strong>बिना मोबाइल नंबर के उपयोग :</strong> Arattai अरट्टै की खास बात यह है कि यहाँ चैटिंग के लिए मोबाइल नंबर साझा करना अनिवार्य नहीं।</li>



<li><strong>ग्रुप कॉलिंग और मीटिंग्स :</strong> Google Meet या Zoom जैसे प्लेटफॉर्म की तरह, इस ऐप में &#8216;मीटिंग्स&#8217; नामक अलग फीचर है, जिससे औपचारिक बैठकें की जा सकती हैं। स्कूल, कार्यालय, व्यापार और परिवार के लोग वीडियो या ऑडियो मीटिंग एक क्लिक में कर सकते हैं।</li>



<li><strong>पॉकेट्स व मेंशंस :</strong> महत्वपूर्ण संदेशों, मीडिया व नोट्स को ‘पॉकेट्स’ में सुरक्षित कर सकते हैं जिसे आवश्यकतानुसार किसी भी सिंक्ड डिवाइस पर पुनः प्राप्त किया जा सकता है। मेंशंस टैब के अंतर्गत जब किसी समूह में आपको टैग किया जाएगा या नाम लिया जाएगा तो ‘मेंशंस’ टैब में वह सभी उल्लेख देखे जा सकते हैं।</li>



<li><strong>कमज़ोर इंटरनेट में भी सहज :</strong> यह ऐप धीमे नेटवर्क और पुराने स्मार्टफोन पर भी सुचारू रूप से चलता है—यह विशेष रूप से ग्रामीण भारत के लिए अनुकूल है।</li>



<li><strong>विज्ञापनविहीन, निजता-संरक्षण :</strong> यह ऐप विज्ञापन रहित है, कोई सूचना बेची नहीं जाती, न ही सूचनाओं को अनावश्यक किसी से साझा किया जाता है। शुद्ध संवाद, गोपनीय एवं सुरक्षित। </li>
</ul>



<h3 class="wp-block-heading">किन ऐप्स का विकल्प बन सकता है?</h3>



<p>अरट्टै मुख्य रूप से WhatsApp, Telegram, Signal जैसे मैसेजिंग ऐप तथा Google Meet/ Zoom जैसे वीडियो मीटिंग ऐप्स का सशक्त विकल्प है। इसमें एक ही जगह संवाद, ग्रुप, कॉलिंग और मीटिंग—ये सब सुविधाएँ उपलब्ध हैं। यह उन विदेशी ऐप्स की कमियों को दूर करता है, जो अक्सर उपयोगकर्ता की सूचनाओं को अपने देश से बाहर स्टोर करते हैं या अनचाहे AI व विज्ञापन थोपते हैं।</p>



<figure class="wp-block-image size-full"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2025/10/Hindi-Pronunciation-of-Arattai.webp 950w" type="image/webp" /><img decoding="async" width="950" height="500" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2025/10/Hindi-Pronunciation-of-Arattai.png?x47177" alt="Arattai का हिन्दी उच्चारण" class="wp-image-5219" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2025/10/Hindi-Pronunciation-of-Arattai.png 950w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2025/10/Hindi-Pronunciation-of-Arattai-300x158.png 300w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2025/10/Hindi-Pronunciation-of-Arattai-768x404.png 768w" sizes="(max-width: 950px) 100vw, 950px" /></picture><figcaption class="wp-element-caption">&#8216;Arattai&#8217; शब्द का हिन्दी उच्चारण</figcaption></figure>



<h3 class="wp-block-heading">Arattai हमारे लिए उपयोगी एवं विशेष क्यों है? </h3>



<p>भारतीयता संवाद के लिए भारत में विकसित ऐप होने के साथ ही Arattai व्यक्तिगत एवं प्रोफेशनल दोनों उपयोग के लिए अनुकूल है। भारतीय भाषाओं का समर्थन तो है ही भारत के डिजिटल स्वराज एवं तकनीकी स्वावलंबन की दिशा में एक प्रमुख पहल भी है यह।  </p>



<p>ग्रामीण भारत के लिए इसकी लो डेटा कंजम्प्शन व आसान फोन संगतता गेम चेंजर है। ग्रामीण भारत में ऐसी तकनीक बहुत बड़ी सहूलियत है जहां डेटा और उपकरण सीमित हैं।</p>



<p>इसमें ग्रुप, चैनल, स्टोरी, शेड्यूल मीटिंग, फोटो-वीडियो-डॉक्युमेंट शेयरिंग, लोकेशन, ऑडियो/वीडियो कॉलिंग जैसी सभी आधुनिक सुविधाएं मिलती हैं। </p>



<p>सरकारी विभाग, विद्यालय प्रशासन, सामुदायिक समूह—जिन्हें उपभोक्ता डेटा की निजता व संप्रभुता चाहिए, उनके लिए भी यह विश्वसनीय मंच है। </p>



<h3 class="wp-block-heading">अब WhatsApp, Telegram, Google Meet और Zoom छोड़िए Arattai अपनाइए </h3>



<p>हम लोग संदेशों के आदान प्रदान के लिए WhatsApp और Telegram जैसे ऐप अपनाए बैठे हैं, पर विदेशी उत्पाद होने के कारण हम इनके उपयोग से बचना भी चाहते हैं। हम WhatsApp से दूरी बनाना इसलिए भी चाह रहे हैं क्योंकि &#8211; </p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignright size-full is-resized"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2025/10/Screenshot-2025-10-07-154346.webp 348w" type="image/webp" /><img decoding="async" width="348" height="441" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2025/10/Screenshot-2025-10-07-154346.png?x47177" alt="" class="wp-image-5221" style="width:227px;height:auto" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2025/10/Screenshot-2025-10-07-154346.png 348w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2025/10/Screenshot-2025-10-07-154346-237x300.png 237w" sizes="(max-width: 348px) 100vw, 348px" /></picture><figcaption class="wp-element-caption">Scan &amp; Use Arattai App</figcaption></figure>
</div>


<ul class="wp-block-list">
<li>हाल के वर्षों में WhatsApp की नई प्राइवेसी पॉलिसी, डेटा शेयरिंग और विज्ञापन/AI इंटीग्रेशन को लेकर कई तरह के असंतोष फैल चुके हैं। </li>



<li>WhatsApp और Meta की सख्त और अस्पष्ट शर्तों ने उपयोगकर्ताओं को गैर-ज़रूरी डेटा भेजने-रखने के लिए मजबूर किया है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट और सरकार भी सवाल उठा चुकी है। </li>



<li>WhatsApp ने AI इंटीग्रेशन और targeted ads से जुड़ी फ़ीचर्स को बिना ऑप्शन के लागू किया, जिससे बहुत-से लोग परेशान हैं।</li>



<li>Data localization और प्राइवेसी नियमों के चलते सरकारी संस्थाएं WhatsApp के बजाय ऐसी देसी और सुरक्षित ऐप चुनना चाहती हैं, जिनका डेटा भारत में ही रहता हो।</li>
</ul>



<p>तो इसलिए अब हमारे पास एक उन्नत, तेज, समृद्ध और समर्थ भारतीय विकल्प Arattai है। यह सभी प्लेटफ़ॉर्म के लिए उपलब्ध है। इसे आप एंड्रॉयड, विंडोज़, मैक, IOS सभी के लिए प्रयोग में ला सकते हैं। अतः इंस्टॉल करिए और संदेश भेजने के देशी रंग को अपनाइए। </p>



<p>अब हमारे लिए यह कहना सहज एवं सुखद है &#8211; <strong>मेरा देश, मेरी भाषा, मेरा संवाद और मेरा ऐप।</strong></p>


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<p></p>
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			</item>
		<item>
		<title>आशीष त्रिपाठी का काव्य संग्रह शान्ति पर्व</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2024/09/%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 02 Sep 2024 04:47:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Article | आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[Book Review]]></category>
		<category><![CDATA[आशीष त्रिपाठी]]></category>
		<category><![CDATA[पुस्तक समीक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी कविता]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>शान्ति पर्व पढ़ गया। किसी पुस्तक को पढ़ कर चुपचाप मन ही मन संवाद की आदत है। पहली बार यह बातचीत बाहर आने को मचली।...</p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2024/09/%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5.html">आशीष त्रिपाठी का काव्य संग्रह शान्ति पर्व</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="has-drop-cap">शान्ति पर्व पढ़ गया। किसी पुस्तक को पढ़ कर चुपचाप मन ही मन संवाद की आदत है। पहली बार यह बातचीत बाहर आने को मचली। किसे पड़ी है समीक्षा की, इस कविताई को पढ़कर। पर हाथ में लीजिए वरिष्ठ कवि,आलोचक और संपादक आशीष त्रिपाठी का यह कविता संग्रह। जीवन और जगत, मन और आत्मा, प्रेम और साहचर्य तथा समय और समाज जैसे विषयों की चतुर्सरणी आ सिमटती है इस काव्य-सिन्धु में। शांति पर्व कवि का दूसरा काव्य-संग्रह है, पर मेरे लिए पहला है। <a href="https://rajkamalprakashan.com/shanti-parv.html">यह काव्य संग्रह</a> राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित है। समीक्षा और विवेचना की परिपाटी से बिलकुल अलग कविता को पढ़कर मन में जो निखर-निथर गया, उसे ही कहना हेतु है।</p>



<p>संग्रह की &#8216;सच मानो&#8217; समूह की एक काव्यात्मक स्फूर्ति &#8216;एक सुबह अस्पताल&#8217; है। सितम्बर मास, सरकारी अस्पताल का जनरल भर्ती वार्ड। अस्त-व्यस्त रोग शैया पर निढाल पड़ी वार्धक्य दिशि का आमंत्रण पढ़ती रुग्णा शिशु वत्सला माँ। घेर-घेर कर खड़े स्वजन-परिजन। पश्चाताप का पुरश्चरण करती फटी-फटी आँखों वाली रुग्ण की उश्वासें और इसी बीच धक्कामुक्की कर घुसी कौमार पीठिका पर आसीन डबडबायी आँखों वाली विह्वला एक बालिका। इतस्ततः चक्रमण करती घायल मृगशावकी के नयन गंगा यमुना हो गए हैं। वह भी ऐसी कि मार खाकर भी न बोली। पत्नी का आश्चर्य और पति का शून्यावलोकन- यह युगपत समीकरण भाजक-भाज्य बनकर कलेजा कचोट रहा है। काँख की गुदगुदी मुख का वमन बन गई है।</p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignright size-full is-resized"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2024/09/Shanti-parva.webp 486w" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" width="486" height="745" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2024/09/Shanti-parva.jpg?x47177" alt="" class="wp-image-5097" style="width:178px;height:auto" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2024/09/Shanti-parva.jpg 486w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2024/09/Shanti-parva-196x300.jpg 196w" sizes="auto, (max-width: 486px) 100vw, 486px" /></picture></figure>
</div>


<p>सच मानो ऐसी ही होती है किसी सरकारी अस्पताल की सामान्य व्याप्ति। सच मानो ऐसा ही होता है एक सुबह अस्पताल का कोई सितम्बर। सच मानो ऐसी ही होती है असहाय स्वजनों की भटकती आहें। सच मानो ऐसी ही होती है रुग्णा के रागरंजिता समिधा की आहुति। सच मानो ऐसी ही होती है किसी की आँखों से झरे अश्रुबिन्दु जैसी बालिका की अनबोली डबडबायी आँखें, और सच मानो ऐसा ही होता है मलिन बिस्तर के सिरहाने-पायदाने परिक्रमा करता कवि का संचारी भाव। &#8216;एक सुबह अस्पताल&#8217; यथार्थ से भी यथार्थ की हड्डी चुन लेने वाली कविता है।</p>



<p>एक बड़ी ही मार्मिक कविता है, <em>&#8216;<strong>दूध पीते बच्चे को देखकर&#8217;।</strong></em>  यों तो इस संग्रह की &#8216;जीना&#8217; &#8216;पुरवा&#8217;, &#8216;कलयुग&#8217;, &#8216;काला सूर्य&#8217;, कालिदास&#8217;, &#8216;क्षमा में जुड़े हैं मेरे हाथ&#8217;, &#8216;गहनों की दुकान पर&#8217;, &#8216;तुम्हारी याद&#8217; और &#8216;तुम्हारा जाना&#8217; जैसी अनेकों निराली रचनाएँ हैं जिनकी तासीर बहुत गर्म है और वे अलग से विवेच्य हैं, किन्तु सच मानो तो &#8216;दूध पीते बच्चे को देखकर&#8217; इस संग्रह की श्रेष्ठ रचनाओं में से एक है-</p>



<p>&#8216;स्तनों को अपने कोमल होठों के बीच दबाये<br>दूध की धार खींचता<br>वह मूँद लेता है अपनी आँखें<br>जैसे महासुख तृप्ति में नहीं<br>तृप्ति की प्रक्रिया में है।&#8221;</p>



<p>इन पंक्तियों में एक अनुत्तरा झंकृति है। स्तन खींच रहा है, खींच रहा है, खींच रहा है, ततः किम्! महासुख तृप्ति में नहीं तृप्ति की प्रक्रिया में है, ऐसा क्यों? इसलिए न कि गतिमत्यता ही जीवन है! दूध पीते बछडे की पीठ चाटती पयोधरा धेनु जिसका रोम-रोम दुग्धमय हो गया है, जिसकी आँखें बन्द हैं! शिशु जो स्तनपात निरत है, उसकी आँखें बन्द हैं। कुतिया की सूखी अठली को चिचोरते पिल्लों की आँखें बन्द हैं, क्यों? बन्द आँखों को गति का ख़याल कहाँ! गति तो पुनरावर्तन है, अगति तृप्ति है। छाती खींचता बालक मुँह पर दूध की धार झेलकर हँसता है, यह तृप्ति का ही आस्वाद है। <strong>&#8216;पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते&#8217;।</strong> धाय माँ की मजबूरी भी भजनफल में तृप्ति ही है। स्रवित पय पयोधरों से अधर का स्पर्श ही तृप्ति है। अन्यथा विविक्त संगी मुनियों ने इसी लिए यों ही नहीं कहा था- <strong>मातुः पयोधर रसं न पुनः पिवन्ति।&#8217;</strong> इस पयःपान कि अनबूझ पहेली सुलझाने में कवि की भावयित्री प्रतिभा अभी और अनेकों पृष्ठ रंगेगी।</p>



<p>मैं इस कविता के सम्मोहन में हूँ। भाव के स्तर पर वात्सल्य के स्पर्श से निथरती करुणा इस कविता मे स्मृति का स्पर्श पाकर विचारों की धुकधुकी में समा जाती है। कवि परम्परा और समय से दो चार होता है, विडम्बनाओं का स्वीकार विचित्र है उसके लिए-</p>



<p><em>&#8220;मनुष्य की महान जय यात्रा की कहानी<br>दरअसल शुरु होती है यहीं से<br>दो, तीन या चार थनों के दुह लिए जाने का स्वीकार ही है<br>सभ्यता की पहली मंजिल&#8221;</em><br><br>और अबूझ है धरती का अनन्तकाल से इसे चुपचाप सहना &#8211;</p>



<p><em>&#8220;इस दूध पीते बच्चे को देखते<br>मेरी आँखों में तैरती है धरती<br>एक गाय की तरह विवश<br>सहती अनन्तकाल से<br>दो, तीन या चार थनों का दुह लिया जाना<br>चुपचाप&#8221;</em></p>



<p>संग्रह की एक विलक्षण लम्बी कविता है &#8216;काला सूर्य&#8217;। यह &#8216;काला सूर्य&#8217; कविता विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र का अखंड पाठ कर रही है।<br>&#8216;आकाश है नीला/ पर दीखता है अभीं काला&#8217;<br>इसी सूर्य के ही कारण। आकाश क्षय रोगी है, बल वीर्य विहीन। काला सूर्य &#8216; मृगपति सरिस अशंक&#8217; उसी आकाश वीथि में ताण्डव मचाए है। दमकता है, चमकता है, आँखों में अन्धेपन की अविश्रान्त रतौंधी रच देता है। नव सर्जित सौर्य मण्डल में आकाश गंगा की परिक्रमा बीच अनिवार्य उछलकूद मचाता है। ग्रहण ग्रस्त न होने की कठिन व्यूह रचना कर ली है। गेरुआ, सफेद, पीला- सब रंग उसकी काली कामरी में लिपट कर काला-काला-काला की थपोड़ी बजा रहे हैं। </p>



<p>उजला सूर्य, उजली ऋचायें, उजले ऋषि, उजले मंत्र सब अतिसार के रोगी हो गए हैं और वमन विरेचन की ऐंठनदार प्रक्रिया में उलझकर हाथ पाँव पटक रहे हैं। फटी-फटी आँखें पूछती हैं &#8211; &#8216;उगा ही क्यों ऐसा सूर्य!</p>



<p>&#8220;पराया बनाने वाली ध्वनियाँ<br>दबंगों सी घूम रही हैं<br>चीखते चिल्लाते धमकाते&#8221;<br>कितना बलात्कार करेंगी ये! ऐसे शील-हरण का शठ सौन्दर्य अब बर्दास्त के बाहर है।</p>



<p>कवि कहता है-<br>&#8220;तेजस्वी काले सूर्य की अभ्यर्थना में<br>खड़े हैं हम<br>&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;<br>भागता हूँ<br>भागता ही जाता हूँ बेबस<br>कहीं मिले कोई दृश्य<br>कोई छुअन<br>कोई बोल&#8221;</p>



<p>इतना लाचार, इतना बेचारा, इतना बेबस! आँखें भरती हैं जब कवि अपनी आहों के शब्द विन्यास की अन्तिम कड़ी में पीठिका सँवारता है &#8211;</p>



<p>&#8220;आत्मा का उजास<br>किसी पर्वत की खोह में एक शैतानी संदूक में बंद है&#8221;</p>



<p>तनिक दृष्टि बदलें। पूरी की पूरी कविता ही द्वंद्व समास है। कृष्ण ने कहा था न कि समासों में मैं द्वंद्व हूँ। &#8216;चार्थे द्वंद्वः&#8221;। यह भी और वह भी। यह काले सूर्य का क्षैतिज पसारा जो दृश्य है, pessimism की ठठेरी सँजोये लुढ़क जायेगा अतलान्त महासागर में। आत्मा के कालकूट को मर्दित कर संजीवन अमृत का कलश लिए धन्वंतरि आने ही वाला है। आत्मा तो उसे ही आत्मसात करेगी। छटपटाता बिलखाता भाग खड़ा होगा काला सूर्य। <strong><em>&#8216;तमस्तदासीत गहनं गभीरं</em></strong> की यवनिका छिन्न भिन्न होगी, होगी और <strong><em>&#8216;यस्तस्य पारेभि विराजते विभुः&#8217;</em></strong> का विरोचन निकलने ही वाला है, निकलने ही वाला है। कवि की कसकती आत्मा वाह्य शब्दों का धोबियापाट भले ही लगा रही हो, पर मल्लयुद्ध में कुन्तीसुर की विजय सुनिश्चित है। हार जाएगा गांधारी का बेटा। </p>



<p>कविता अपनी मार्मिकता में इतना कुरेद रही है कि नींद उड़ जाती है।</p>



<p>आशीष त्रिपाठी की कविताई की मनोगति न तो मंदाक्रान्ता है न द्रुत विलंबित। न तो वसंत तिलका है न शिखरिणी। इन्द्रवज्रा भी नहीं। हाँ, शार्दूल विक्रीड़ित है। विहंगावलोकन नहीं, सिंहावलोकन। सूक्ष्मता से प्रत्येक भाव, भावना और विचारों का अवलोकन और अभिव्यक्ति में अनूठे संयम से प्रभावपूर्ण प्रकटन, यह दुर्लभ युति सहज सुलभ है आशीष त्रिपाठी की कविताओं में। </p>



<p>शान्ति पर्व ठिठक ठिठक कर पढ़ने की कविता की क़िताब है, क्योंकि हर ठिठकन पाठक को भाव, विचार, भाषा और अभिव्यक्ति का अनोखा वैभव साक्षात करने का अवसर देती है। बस इतना ही।</p>
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		<title>गुरु गोरखनाथ की बानी &#8211; मेरा गुरु तीन छंद गावै</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 14 Jun 2024 04:32:18 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Article | आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[Religion and Spirituality]]></category>
		<category><![CDATA[गुरु महिमा]]></category>
		<category><![CDATA[गोरखनाथ]]></category>
		<category><![CDATA[निर्गुण काव्य]]></category>
		<category><![CDATA[महान व्यक्तित्व]]></category>
		<category><![CDATA[माया एवं ब्रह्म का स्वरूप]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>महान संत, योगी एवं नाथ संप्रदाय के संस्थापक गुरु गोरखनाथ की गोरखबानी में गुरु की महिमा एवं गुरु-शिष्य के संबंधों पर विशेष उल्लेख है। गोरखबानी...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="has-drop-cap">महान संत, योगी एवं नाथ संप्रदाय के संस्थापक गुरु गोरखनाथ की गोरखबानी में गुरु की महिमा एवं गुरु-शिष्य के संबंधों पर विशेष उल्लेख है। गोरखबानी या गोरखवाणी गुरु गोरखनाथ द्वारा रचित भक्ति कविताओं और उपदेशों का संग्रह है। इस संग्रह में गुरु गोरखनाथ के उपदेश, आध्यात्मिक दृष्टिकोण और योग साधना के महत्व को अभिव्यक्त किया गया है। यह उपदेश तात्कालिक सहज भाषा में कहे गये हैं जिससे यह जनसामान्य में सहजता से ग्राह्य हुए। </p>



<p>गुरु के बिना गोरखनाथ स्वयं को अकेला अनुभव कर रहे हैं। गुरु का प्रत्येक अनुभव उन्हें स्मरण हो रहा है, वह बेचैन हैं। गुरु की उपस्थिति ही उन्हें सहज और संतुष्ट कर सकती है। वह गुरु के कहे गये वचन याद कर रहे हैं और उनकी गूढ़ता एवं अर्थ-गंभीरता से मुग्ध हैं। गुरु के वचन कितने अर्थयुक्त एवं रहस्यमय हैं कि गोरखनाथ अपनी नींद ही गँवा बैठे हैं- </p>



<blockquote class="wp-block-quote has-background is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow" style="background-color:#fcfeda">
<p>मेरा गुरु तीन छंद गावै <br>ना जाणौ गुरु कहाँ गैला, मुझ नींदणी न आवै।</p>
<cite>गोरखनाथ </cite></blockquote>



<p>इसका मतलब है, &#8216;मेरा गुरु तीन छंद गाता है। अर्थात् एक ही बात को तीन तरह से कहता है। मुझे पता नहीं, मेरा गुरु कहाँ चला गया? उसके बिना मुझे नींद नहीं आ रही है।&#8217; गुरु की अनुपस्थिति में गुरु की बताई अनेक बातें उन्हें याद आ रही हैं। </p>



<h2 class="wp-block-heading">गोरखनाथ का गुरु स्मरण: सतगुरु ही पार लगाएगा</h2>



<p>गोरखनाथ अपने गुरु द्वारा दी गई शिक्षाओं के प्रति विनम्र हैं, उन्हें सब समझाए हुए आप्त वचन स्मरण में आ रहे हैं। माया का निराला खेल उन्हें समझ में आ रहा है। माया कैसे प्रकट सत्य को भी भाँति-भाँति के उपकरणों में उलझाकर मनुष्य से गोपन रखती है, गोरखनाथ यह जान गये हैं। सतगुरु ही है जो इस माया का खेल समझा सकता है, उसके गोपन रहस्यों का उद्घाटन कर सकता है। माया का खेल तो देखो।</p>



<pre class="wp-block-verse has-medium-font-size">कुम्हरा के घर हांडी आछे अहीरा के घरि सांडी।<br>बह्मना के घरि रान्डी आछे रान्डी सांडी हांडी।<br>राजा के घर सेल आछे जंगल मंधे बेल।<br>तेली के घर तेल आछे तेल बेल सेल।<br>अहीरा के घर महकी आछे देवल मध्ये ल्यंग।<br>हाटी मध्ये हींग आछे हींग ल्यंग स्यंग।<br>एक सुन्ने नाना वणयां बहु भांति दिखलावे।<br>भणत गोरष त्रिगुंण माया सतगुर होइ लषावे।</pre>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignright size-full is-resized"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2024/06/gorakhnath-400-x-600-px.webp 400w" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" width="400" height="600" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2024/06/gorakhnath-400-x-600-px.jpg?x47177" alt="Guru Gorakhnath" class="wp-image-4960" style="width:182px;height:auto" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2024/06/gorakhnath-400-x-600-px.jpg 400w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2024/06/gorakhnath-400-x-600-px-200x300.jpg 200w" sizes="auto, (max-width: 400px) 100vw, 400px" /></picture></figure>
</div>


<p>उपरोक्त रचना में गोरखनाथ माया की लीला समझाते हैं। माया किस प्रकार भिन्न भिन्न दिखाई देने वाली हर सत्ता में व्यक्त हो रही है, उसके लिए वह रोचक एकरूपता ढूँढते है। वह कहते हैं कि माया कुम्हार के घर में &#8216;हांडी&#8217;, अहीर के घर में &#8216;सांडी&#8217; अर्थात् मलाई और ब्राह्मण के घर उसकी स्त्री (राँडी या रानी) के रूप में है। इस प्रकार रांडी, सांडी और हांडी एक ही चीज है। ठीक वैसे ही वह राजा के घर में &#8216;सेल&#8217; अर्थात् (शासन की छड़ी), जंगल में &#8216;बेल&#8217; (लता) और तेली के घर में &#8216;तेल&#8217; के रूप में है, और अलग अलग होते ही भी एक ही चीज है। </p>



<p>इसी तरह अहीर के घर में &#8216;दही/मट्ठे&#8217; के रूप में, देवस्थान अथवा मंदिर में &#8216;लिंग&#8217; तथा बाज़ार में &#8216;हींग&#8217; के रूप में व्याप्त है। यह माया एक ही है, परंतु भिन्न भिन्न स्थानों में, भिन्न भिन्न रूपों में विभिन्न कार्य-व्यापार में व्यक्त हो रही है। गोरखनाथ के अनुसार एक ही सत्य विभिन्न रूपों में प्रकट होता है और त्रिगुण (सत्त्व, रजस, और तमस) से युक्त माया को केवल सतगुरु के मार्गदर्शन से ही पार किया जा सकता है।</p>
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		<title>अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या निरंकुशता</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2024/06/freedom-of-expression.html</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 11 Jun 2024 06:42:23 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Article | आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[Psychology]]></category>
		<category><![CDATA[अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता]]></category>
		<category><![CDATA[निरंकुश अभिव्यक्ति]]></category>
		<category><![CDATA[मन एवं प्राण]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>अभिव्यक्ति, मनुष्य का नैसर्गिक गुण, जिससे हमारे विचार, हमारी भावनायें और हमारे अनुभव प्रकट होते हैं। कला, संगीत, साहित्य एवं संभाषण जैसे अनेकों माध्यम हमारी...</p>
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<p class="has-drop-cap">अभिव्यक्ति, मनुष्य का नैसर्गिक गुण, जिससे हमारे विचार, हमारी भावनायें और हमारे अनुभव प्रकट होते हैं। कला, संगीत, साहित्य एवं संभाषण जैसे अनेकों माध्यम हमारी अभिव्यक्ति को आकार देते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमारी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक अंग है। इससे हमारी अंतरात्मा का स्वर बाहर की दुनिया से एकमेक होता है। मैं सोचता हूँ कितना असर है अभिव्यक्ति का हमारे मन पर, हमारे प्राणों पर। इसका असर प्राणों पर ऐसे ही है जैसे मनुष्य का दर्पण पर। दर्पण को हारकर हमारा प्रतिबिम्ब देना ही पड़ता है।</p>



<p>बहुत पहले मनुष्य की अभिव्यक्ति पर पहरे थे। विश्वभर में इस पहरेदारी के विरुद्ध हमने क्रांतियाँ कीं।पश्चिम से शुरू हुई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत पूर्व में भी छा गई। हर एक संविधान तक में, हमारे संविधान में भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार व्याप्त कर दिए गए। हर जगह कहा जाने लगा  वह सब कुछ, जो मन में आया। इस अभिव्यक्ति के  ने शब्दों को नवीन गति, नई तीव्रता दी।</p>



<h3 class="wp-block-heading">निरंकुश अभिव्यक्ति की ओर </h3>



<p>पर हमने ख़याल नहीं किया कि बोलने का स्वातन्त्र्य धीरे धीरे निरंकुशता की ओर  गया। पश्चिम में तो बहुत पहले, कुछ वर्षों से हमारे देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर क्या क्या नहीं हुआ है। बोलने की आज़ादी ने मर्यादाओं का शील भंग कर दिया है, समाज का संस्कार ठुकरा दिया है। यह  स्वातंत्र्य न जाने कितनी मुक्तियों और न जाने कितने आंदोलनों के नाम हो गया। याद क्या करें, क्या-क्या करें। नारी देह की छद्म अभिव्यक्ति, देवी देवताओं के नग्न चित्र, वर्जनाओं को मुखर अभिव्यक्ति देते चलचित्र और फ़िल्में, अनियंत्रित भावना से उपजी महापुरुषों के लिए असंयत वाणी- सब हमारे सम्मुख है। </p>



<p>पश्चिम की <a href="https://blog.ramyantar.com/2008/12/deewanagi.html">अंतश्चेतना मन को नहीं जानती</a>, प्राण को भी नहीं जानती। इसलिए वहाँ अभिव्यक्ति निरंकुश हो जाय, तो आश्चर्य क्या! पश्चिम हर क्रिया की प्रतिक्रिया देता है, हर दोषारोपण की काट करता है, हर झूठ का स्पष्टीकरण देता है। उसे लगता है झूठ साफ़ हो जाएगा। पश्चिम को लगता है झूठ के पैर नहीं होते। सच है, पर झूठ के पास वीर्य होता है। इस वीर्य से प्राण गर्भित हो जाता है और झूठ प्राणवंत। </p>



<p>अभिव्यक्ति, वाणी जब निरंकुश हो जाती है तो वह सारे संयम तोड़कर जनसाधारण के प्राणों से बलात्कार करती है &#8211; </p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p>प्राण एक  निर्वस्त्र, असहाय  कुमारी कन्या की तरह है। वाणी पुरुषों का हुजूम है, जिन्हें प्रजातंत्र में इजाज़त है। जो चाहे बर्ताव प्राणों से करें। वे प्राण कुमारी से बलात्कार करते हैं और प्राण रोज़ उसके शब्दों से गर्भित होते हैं, और उसी के बच्चे पैदा करते हैं, जिनमे तानाकशी और झूठ तो वाणी का होता है और सारा बदन प्राणों का। </p>
<cite>निर्मल कुमार-  <a href="https://www.goodreads.com/book/show/126622363-rta-psychology-beyond-freud">&#8216;ऋत: साइकोलॉजी बियांड फ़्रायड&#8217; </a></cite></blockquote>



<p>इसलिए केवल अभिव्यक्ति, केवल बोलना सत्य नहीं रच सकता। अकेला तो प्राण भी सत्य नहीं रच सकता। जो सत्य है वह इसी प्राण और अभिव्यक्ति के संसर्ग से जन्म लेता है। </p>
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		<title>प्रेम प्रलाप</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2022/07/love-babble.html</link>
					<comments>https://blog.ramyantar.com/2022/07/love-babble.html#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 20 Jul 2022 15:08:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Article | आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[Contemplation]]></category>
		<category><![CDATA[Babbling in Love]]></category>
		<category><![CDATA[Disappointed in Love]]></category>
		<category><![CDATA[Love Thoughts]]></category>
		<category><![CDATA[Random Thoughts]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>मेरे प्रिय! हर घड़ी अकेला होना शायद बेहतर विकल्प है तुम्हारी दृष्टि में। मैं वह विकल्प नहीं बन सका जो  बनना चाहता था। मुझे मेरी...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p>मेरे प्रिय! हर घड़ी अकेला होना शायद बेहतर विकल्प है तुम्हारी दृष्टि में। मैं वह विकल्प नहीं बन सका जो  बनना चाहता था। </p>



<p>मुझे मेरी अतिशय भावनाओं ने मारा, मेरे सारे बेहतर काम दब गये मेरी भावनाओं के प्रकटीकरण में। तुम्हें नियंत्रित लोग, भावनायें, इच्छायें और संयमित व्यक्तित्व चाहिए, जो मैं बन कर दिखा न सका!</p>



<p>मैं विराट प्रेम की थाह में था, सब खो कर भी आपको पाने की अदम्य भावना से भरा, कुछ भी इधर-उधर न हो, इस तीव्र इच्छा से संपृक्त। पर भाग्य अबूझ है मेरे लिये। चन्द्रमा लिखने जाता हूँ, राहु लिख कर लौटता हूँ। </p>



<p>आपकी ऊँचाई के आस-पास भी न पहुँचा। आपके हृदय को दुखाया, अनेकों बार। आपने बहुत बार नजरअंदाज किया, पर हर बार कैसे क्षमा करेगा कोई! तुम्हारा दिया दंड मेरे लिये अनंत में जाने की राह बनेगा।</p>



<p>आपके आने के बाद धरती सुन्दर थी, लगने भी लगी थी, सब कार्य, निर्णय करने का एक उद्देश्य था। आपने सहज ही सारे संकट खत्म कर दिये मेरे लिये। अब कोई संघर्ष न रहा। आकाश की यात्रा की जा सकेगी अब।  धरती पर रहने का उद्देश्य खो गया अब।</p>



<p>निश्चित ही तुम्हें प्यार करना और तुम्हारा प्यार पाना अनूठी उपलब्धियाँं थीं मेरे लिये। जानता हूँ, यह आपकी इच्छा और कृपा से ही संभव हो पाया था। </p>



<p>दैवीय आत्मायें स्वयं किसी की इच्छा नहीं करतीं बिलकुल तुम्हारी तरह, पर उनकी इच्छा सम्पूर्ण सृष्टि करती है। तुमने मुझे वह गौरव दिया, वह संतुष्टि दी, इसके लिये मेरा जीवन कृतकृत्य है, ऋणी है। </p>



<p>शायद उस वक्त मेरी दिशा सही थी, मैं योग्य रहा या न रहा। वह कृपा हमेशा साथ रहेगी मेरे। अब जबकि मेरी दिशा ही ठीक नहीं शायद, और तुमने मुझे मेरे किये का दण्ड दे दिया है, तो दूर कर लोगे मुझे फ़िर भी कैसे दूर हो पाऊँगा मैं?  जो पा लिया है वह कैसे खोयेगा मेरे भीतर से?</p>



<p>मेरी माँग हमेशा से तुच्छ रही, तुम्हारे द्वारा वह माँगे पूरा किये जाने पर तुम्हारा गौरव घटता उसमें। मैं समझता हूँ यह। इसलिये- हर बुरी आदत छोड़ता रहा। पर बुराइयों से मुक्त न हो पाया, तुम्हारे योग्य न हो पाया।</p>



<p>मैंने सदैव तुम्हें कष्ट दिया, हमेशा तुम्हें परेशान किया, उससे तुम्हें छुटकारा ज़रूर मिलना चाहिए।</p>
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		<title>आधुनिक मनुष्य कौन? : भाग 2</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2015/08/modernity-carl-jung.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 20 Aug 2015 23:17:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Article | आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[Translated Articles]]></category>
		<category><![CDATA[Carl Gustav Jung]]></category>
		<category><![CDATA[Modernity]]></category>
		<category><![CDATA[Who is modern?]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>[डॉ० कार्ल गुस्ताव युंग (Carl Gustav Jung) का यह आलेख मूल रूप में तो पढ़ने का अवसर नहीं मिला, पर लगभग पचास साल पहले ’भारती’ (भवन...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<div style="text-align: justify;"><span style="color: #38761d;"><span style="background-color: white; font-family: 'Noto Sans Devanagari'; font-size: 16px; line-height: 24px;">[</span><a style="background-color: white; border: 0px; font-family: 'Noto Sans Devanagari'; font-size: 16px; font-stretch: inherit; line-height: 24px; margin: 0px; outline: none; padding: 0px; text-decoration: none; transition: all 0.25s; vertical-align: baseline;" href="https://en.wikipedia.org/wiki/Carl_Jung" target="_blank" rel="nofollow noopener">डॉ० कार्ल गुस्ताव युंग (Carl Gustav Jung)</a><span style="background-color: white; font-family: 'Noto Sans Devanagari'; font-size: 16px; line-height: 24px;"> का यह आलेख मूल रूप में तो पढ़ने का अवसर नहीं मिला, पर लगभग पचास साल पहले ’भारती’ (भवन की पत्रिका) में इस आलेख का हिन्दी रूपांतर प्रकाशित हुआ था, जिसे अपने पिताजी की संग्रहित किताबों-पत्रिकाओं को उलटते-पलटते मैंने पाया। आधुनिक मनुष्य कौन?- प्रश्न को सम्यक विचारता यह आलेख सदैव प्रासंगिक जान पड़ा मुझे। भारती (भवन की पत्रिका) के १५ नवम्बर १९६४ के अंक से साभार यह आलेख प्रस्तुत है। अनुवाद ’ऐन्द्रिला’ का है। अनुवादक और पत्रिका दोनों का आभार। प्रस्तुत है <a href="https://blog.ramyantar.com/2015/08/who-is-modern-Carl-Jung.html" target="_blank" rel="noopener">पिछली प्रविष्टि</a> का शेषभाग -]</span></span></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<h3 style="background-color: white; border: 0px; color: #444444; font-family: 'Noto Sans Devanagari'; font-size: 25.6000003814697px; font-stretch: inherit; margin: 0px 0px 0.6em; padding: 0px; position: relative; text-align: justify; vertical-align: baseline;"><span style="font-weight: normal;">आधुनिक मनुष्य कौन? &#8211; डॉ० कार्ल गुस्ताव युंग </span></h3>
<div style="text-align: justify;">
<div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2015/08/Carl2BGustav2BJung.webp" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" class="alignright" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2015/08/Carl2BGustav2BJung.png?x47177" width="421" height="254" border="0" /></picture></div>
<p><span class="first-letter">मैं</span> जानता हूँ कि कुशलता का विचार  तथाकथित आधुनिकों को विशेष रूप से अरुचिकर होता है, क्योंकि वह उन्हें बहुत ही दुखद तरीके से उनकी प्रवंचनाओं और पाखण्डों की याद दिलाता है। पर इसी कारण हम इस चीज को आधुनिक मनुष्य का निर्णायक माप-दण्ड बनाने से बाधित नहीं हो सकते। बल्कि हम ऐसा करने को बाध्य होते हैं, क्योंकि यदि वह कुशल और पुख्ता नहीं है, तो जो मनुष्य आधुनिकता का दावा करता है वह एक स्वच्छन्दाचारी जुआरी के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। उसे उच्चतम कक्षा का कुशल व्यक्ति होना चाहिए क्योंकि यदि वह अपनी सृजनात्मक क्षमता द्वारा परम्परा से सम्बन्ध-विच्छेद से उत्पन्न क्षति की पूर्ति करने में समर्थ न हो, तो वह भूतकाल के प्रति निपट बेईमान ही कहा जा सकेगा। यह निरी बाज़ीगरी होगी कि भूतकाल के इनकार को और वर्तमान चेतना को एक ही वस्तु के रूप में देखें।</p>
<p>’आज’, ’विगत कल’ और ’आगामी कल’ के बीच खड़ा है, और वह भूत और भविष्य के बीच की संयोजक कड़ी का निर्माण करता है; उसका और कोई अर्थ और प्रयोजन नहीं है। वर्तमान संक्रान्ति की प्रक्रिया का प्रतिनिधित्व करता है, और वही व्यक्ति अपने को आधुनिक कह सकता है, जो इस अर्थ में उसके बारे में सचेतन है।</p>
</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">कई लोग अपने को आधुनिक कहते हैं, खासकर वे लोग जो तथाकथित आधुनिक है, कहिए कि नक़ली आधुनिक हैं। इसी से प्रायः सच्चा आधुनिक मनुष्य उन लोगों के बीच पाया जाता है, जो अपने को पुरातनवादी कहते हैं। पर्याप्त कारणों से ही वह इस स्थिति को स्वीकार करता है। एक ओर वह इसलिए भूतकाल का आग्रह रखता है, क्योंकि उसे परम्परा से उसके सम्बन्ध-विच्छेद के दौरान एक समतुला साधनी होती है, दूसरे उसके मन पर अपराध का एक भार रहता है, जिसका उल्लेख पहले हो चुका है। दूसरी ओर छद्म आधुनिक कहे जाने से वह बचना चाहता है।</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">प्रत्येक सद्गुण का एक बुरा पक्ष भी होता है, और कोई भी अच्छी वस्तु, एक प्रत्यक्ष समानान्तर बुराई पैदा किए बिना जगत में नहीं आ सकती। यह एक दुखद तथ्य है। फिर यह एक खतरा भी है कि वर्तमान की सचेतनता भ्रान्ति पर आधारित एक उन्नयन के आवेश की ओर भी ले जा सकती है; भ्रान्ति यह होती है कि हम मानव जाति के इतिहास का चरम उत्कर्ष हैं, हम अनगिनत शताब्दियों की परिपूर्ति और परम निष्पत्ति हैं। यदि हम इस बात को स्वीकृति देते हैं तो हमें समझना चाहिए कि यह हमारी निराश्रयता की एक साभिमान स्वीकृति के अतिरिक्त और कुछ नहीं है: हम युग-युगान्तरों की आशाओं और प्रत्याशाओं की निष्फलता भी हैं।</div>
<div></div>
<div style="text-align: justify;">विचार करिए की दो हज़ार वर्षों तक क्रिश्चियन आदर्शों की प्रतिष्ठा होने के बाद भी मसीहा क्राइस्ट लौटकर नहीं आया और न स्वर्ग का राज्य आया, बल्कि उसके दौरान , उसकी पराकाष्ठा पर आया, क्रिश्चियन राष्ट्रों के बीच विश्व युद्ध, उसके कटीले तारों के घेरे और जहरीली गैसें। स्वर्ग और पृथ्वी पर यह कैसा दुःखान्तिक दृश्य है।</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">इस भीषण चित्र के सम्मुख हमें फिर से विनम्र हो जाना चाहिए। यह सच है कि आधुनिक मनुष्य एक चरम कोटि है, चरम प्रतिफलन है, पर आने वाले कल वह भी अतिक्रान्त हो जायेगा। बेशक वह युगान्तरव्यापी विकास की चरम निष्पत्ति है, पर साथ ही वह मानव जाति की आशाओं की निकृष्टतम  कल्पनीय निराशा और विफलता भी है।</div>
<div></div>
<div style="text-align: justify;">आधुनिक मनुष्य इस बात से अवगत है। उसने देखा जाना है कि विज्ञान, तकनालॉजी और संगठन कितने कल्याणकारी हैं, पर वह यह भी जानता है वे कितने दुःखान्तक भी हो सकते हैं। उसने यह भी देखा है कि सदाशयी सरकारों ने &#8211; ’शान्तिकाल में युद्ध की तैयारी करो!’ &#8211; वाले सिद्धान्त के आधार पर, इतनी अच्छी तरह शान्ति का मार्ग निर्माण किया है कि यूरप लगभग छिन्न-भिन्न हो गया है। और जहाँ तक आदर्शों की बात है, क्रिश्चियन चर्च, मानवों का भाईचारा, अन्तर्राष्ट्रीय सामाजिक प्रजातंत्र और आर्थिक प्रयोजनों का संघटन आदि सारी ही आदर्श प्रवृत्तियाँ सत्य की अग्निपरीक्षा  में विफल हो चुकी हैं।</div>
<div></div>
<div style="text-align: justify;">आज दो-दो भीषण महायुद्धों से गुज़रने के बाद, हम फिर से वही आशावाद, वही संगठन, वही राजनीतिक अभीप्सायें, वही बड़े-बड़े शब्द और सदुक्तियाँ पनपती देख रहे हैं। क्या हमारा यह भय स्वाभाविक ही नहीं है, कि ये सारी प्रवृत्तियाँ, फिर से दुःखान्तक परिणाम में ही विफल हो सकती हैं। युद्ध को अवैध बना देने की सारी सन्धियों के बावजूद हम सन्दिग्ध ही बने रहते हैं, जबकि हम हृदय से उनके लिए सम्पूर्ण सफलता चाहते हैं। ऐसे हर कल्याणकारी प्रयत्न के पीछे, उसके तल में एक सन्देह का काँटा खटकता  रहता है। कुल मिलाकर मैं मानता हूँ कि यह कहना अत्युक्ति नहीं होगी कि आधुनिक मनुष्य मनोविज्ञानतः एक प्राणहारी आघात से पीड़ित है और उसके परिणामस्वरूप वह अनिश्चय की स्थिति में पड़ गया है। इस अनिश्चय की अभेद्य अन्ध कुहा के भीतर से निश्चय की नयी चेतना भूमिका का जो आविष्कार करेगा, वही सच्चे अर्थों में ’आधुनिक मनुष्य’ कहा जा सकेगा।</p>
<div></div>
<div style="text-align: center;">&#8211;समाप्त&#8211;</div>
</div>
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		<title>आधुनिक मनुष्य कौन? (आलेख)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 16 Aug 2015 07:13:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Article | आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[Translated Articles]]></category>
		<category><![CDATA[Carl Gustav Jung]]></category>
		<category><![CDATA[Modernity]]></category>
		<category><![CDATA[आधुनिक मनुष्य]]></category>
		<category><![CDATA[आधुनिकता]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>आधुनिक मनुष्य कौन?: डॉ० कार्ल गुस्ताव युंग जिसे हम आधुनिक मनुष्य कहते हैं, जो तात्कालिक वर्तमान के प्रति सचेतन है, वह किसी भी सूरत में...</p>
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<p><a href="https://en.wikipedia.org/wiki/Carl_Jung" target="_blank" rel="noreferrer noopener">डॉ० कार्ल गुस्ताव युंग (Carl Gustav Jung)</a> का आधुनिक मनुष्य कौन? आलेख मूल रूप में तो पढ़ने का अवसर नहीं मिला, पर लगभग पचास साल पहले ’भारती’ (भवन की पत्रिका) में इस आलेख का हिन्दी रूपांतर प्रकाशित हुआ था, जिसे अपने पिताजी की संग्रहित किताबों-पत्रिकाओं को उलटते-पलटते मैंने पाया। आधुनिक मनुष्य कौन?- प्रश्न को सम्यक विचारता यह आलेख सदैव प्रासंगिक जान पड़ा मुझे। भारती (भवन की पत्रिका) के १५ नवम्बर १९६४ के अंक से साभार यह आलेख प्रस्तुत है। अनुवाद ’ऐन्द्रिला’ का है। अनुवादक और पत्रिका दोनों का आभार।</p>





<h3 class="has-luminous-vivid-orange-color has-text-color wp-block-heading">आधुनिक मनुष्य कौन?: डॉ० कार्ल गुस्ताव युंग </h3>



<p>जिसे हम आधुनिक मनुष्य कहते हैं, जो तात्कालिक वर्तमान के प्रति सचेतन है, वह किसी भी सूरत में औसत आदमी तो नहीं ही है। आधुनिक मनुष्य वही है, जो चोटी पर खड़ा है, जो दुनिया के छोर पर खड़ा है, उसके सामने है भविष्य की खाई, और उसके मस्तक पर है आकाश, और उसके पादप्रान्त में समस्त मनुष्य जाति है, अपने उस इतिहास को समेटे, जो आदिम कुहेलिका में अन्तर्धान हो जाता है। आधुनिक मनुष्य, या यों कहें कि तात्कालिक वर्तमान का मनुष्य, मुश्किल से ही देखने को मिलता है। </p>



<p>आधुनिकता की संज्ञा को सार्थक कर सकें, ऐसे लोग विरल ही होते हैं, क्योंकि उनमें पराकोटि की सचेतनता होना आवश्यक होता है। इसी से सम्पूर्ण रूप से वर्तमान का होने का अर्थ होता है मनुष्य के नाते अपने अस्तित्व के प्रति सम्पूर्ण रूप से सचेतन होना। इसके लिए अत्यन्त गहरी और व्यापक सचेतनता की आवश्यकता होती है, इससे कम से कम अचेतनता को ही अवकाश हो सकता है। यह बहुत स्पष्ट समझ में आ जाना चाहिए कि वर्तमान में जीने का निरा तथ्य ही किसी मनुष्य को आधुनिक नहीं बना देता; क्योंकि उस स्थिति में वर्तमान में जीने वाला हर आदमी आधुनिकता की संज्ञा पा जायेगा। केवल वही मनुष्य आधुनिक कहा जा सकता है, जो वर्तमान के प्रति सम्पूर्ण रूप से सचेतन है।</p>



<div class="wp-block-media-text has-media-on-the-right is-stacked-on-mobile is-image-fill has-background" style="background-color:#f5f5f5"><figure class="wp-block-media-text__media" style="background-image:url(https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2015/08/Carl2BGustav2BJung.jpg);background-position:0% 53%"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2015/08/Carl2BGustav2BJung.webp 320w" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" width="320" height="187" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2015/08/Carl2BGustav2BJung.jpg?x47177" alt="आधुनिक मनुष्य कौन?" class="wp-image-86 size-full" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2015/08/Carl2BGustav2BJung.jpg 320w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2015/08/Carl2BGustav2BJung-300x175.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 320px) 100vw, 320px" /></picture></figure><div class="wp-block-media-text__content">
<p>जिस मनुष्य को हम न्यायतः आधुनिक कह सकते हैं, वह अकेला होता है। वह आवश्यक रूप से और सर्वकाल अकेला ही होता है। क्योंकि वर्तमान के प्रति पूर्णतर सचेतना की ओर ले जाने वाला उसका हर अगला कदम उसे समुदाय की सर्व सहभागिता या सर्वसामान्य अचेतना में डूबे रहने से परे, और भी परे ले जाता है। उसके हर अगले कदम का अर्थ होता है, उस सर्वाश्लेषी, पूर्वकालीन अचेतना से उसे विच्छिन्न करना, जो सम्पूर्ण सामुदायिक मानवता को आच्छादित किए रहती है। हमारी आज की सभ्यताओं में भी मनोविज्ञानतः जो लोग मानव समुदाय के निम्नतम स्तर में होते हैं, वे आदिम जातियों की तरह ही अचेतन अवस्था में जीते हैं। उससे ऊपर के स्तर पर जो लोग जीते हैं, वे उस चेतनास्तर को व्यक्त करते हैं, जो मानवीय संस्कृति के आरम्भिक कालों की समकक्षिनी होती हैं। और जो सर्वसामान्य मानव-समुदाय के उच्चतम स्तर के लोग होते हैं; उनकी चेतना गत कुछ शताब्दियों के जीवन के साथ कदम मिलाकर चलने में समर्थ होती है।</p>
</div></div>



<p>हमारी संज्ञा के अर्थ में जो मनुष्य आधुनिक है वही यथार्थ में वर्तमान में जीता है, उसी की चेतना सच्चे अर्थों में अधुनातन होती है और वही यह अनुभव करता है कि पूर्वगामी स्तरों की समकक्ष जीवन-चर्चायें उसे बेस्वाद, निश्चेतन और अर्थहीन लगती हैं। ऐतिहासिक दृष्टिकोण के अलावा, उन विगत दुनियाओं के मूल्यों और प्रयत्नों में उन्हें दिलचस्पी नहीं होती। इस प्रकार शब्द के गहिरतम अर्थ में वह अनैतिहासिक हो जाता है, और उस मानव समुदाय से वह अपने को अलग कर लेता है, जो सम्पूर्ण रूप से परम्परा की परिधियों में जीता है। निश्चय ही, वह तभी सम्पूर्ण रूप से आधुनिक होता है, जब वह दुनिया के छोर पर आ खड़ा होता है; जो कुछ त्यक्त, तिरस्कृत और विगत हो चुका होता है, उस सबको  वह पीछे छोड़ देता है, और यह स्वीकार करता है कि वह एक शून्य के सामने खड़ा है, जिसमें से सारी चीजें उत्पन्न हो सकती हैं।</p>



<p>इन शब्दों को निरी खोखली ध्वनियाँ माना जा सकता है, और इनके अर्थों को वाहियात कह कर तुच्छ किया जा सकता है। वर्तमान की चेतना को प्रभावित करने से ज्यादा आसान और कुछ नहीं हो सकता। वास्तव में ऐसे निकम्मे लोगों की कमी नहीं है जो अपने अनेक दायित्वों और विकास के कई बीच में पड़ने वाले स्तरों पर से छलाँग मार कर आधुनिक मानव की बगल में आ खड़े होते हैं और आधुनिकता का दावा करने लगते हैं। ऐसे लोग रक्त-शोषक प्रेत की तरह होते हैं, जिनके खोखलेपन के सच्चे आधुनिक मानव का अस्पर्धनीय एकाकीपन मान लिया जाता है और जो उसकी प्रतिष्ठा को आघात पहुँचाता है। यह सच्चा आधुनिक मानव और उसी के वर्ग के अन्य लोग जो संख्या में बहुत ही कम होते हैं, तथाकथित नकली आधुनिकों के बादली प्रेतों से आच्छादित होकर, सामान्य जन-समुदाय की स्थूल दृष्टि से छुपे रहते है। इससे बचने का कोई उपाय नहीं है; आधुनिक मनुष्य तलबी और सन्देह का पात्र होता है; और भूतकाल में भी उसकी स्थिति सदा यही रही है।</p>



<p>आधुनिकता की ईमानदार साधना का अर्थ होता है अपने आप ही स्वयं को दीवालिया घोषित कर देना, एक नए अर्थ में गरीबी और शील का व्रत ले लेना, और इससे भी अधिक कष्टप्रद कदम है उसका उस गौरव के प्रभामण्डल का स्वयं ही त्याग कर देना, जिसके द्वारा इतिहास अपनी स्वीकृति के रूप में किसी भी व्यक्तित्व को मण्डित करता है। अनैतिहासिक होना एक ’प्रोमेथियन’ पाप है और इस अर्थ में सच्चा आधुनिक मनुष्य पाप में जीता है। चेतना का उच्चतर स्तर एक अपराध के गुरुतर भार की तरह होता है। लेकिन जैसा मैंने कहा है, लेकिन वही व्यक्ति, वर्तमान की सम्पूर्ण चेतना को उपलब्ध कर सकता है जो चेतना की भूतकालीन भूमिकाओं से उत्तीर्ण हो चुका होता है और अपनी दुनिया द्वारा नियुक्त सारे कर्त्तव्यों को जो परिपूर्ण रूप से सम्पन्न कर चुका होता है। ऐसा करने के लिए उसे उत्कृष्ट अर्थ में पुख्ता और कुशल होना चाहिए, यानि औरों जितनी उपलब्धि तो उसकी होनी ही चाहिए, पर उससे कुछ अधिक होनी चाहिए। इन्हीं गुणों के द्वारा वह चेतना की अगली उच्चतम भूमिका प्राप्त कर सकता है।</p>



<p>क्रमशः- <a href="https://blog.ramyantar.com/2015/08/modernity-carl-jung.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">अगली प्रविष्टि में पूर्ण..</a>.</p>
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		<title>मैं चिट्ठाकार हूँ, पर गिरिजेश राव जैसा तो नहीं</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 04 May 2015 03:02:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Blog & Blogger]]></category>
		<category><![CDATA[Blog]]></category>
		<category><![CDATA[Blogger]]></category>
		<category><![CDATA[Girijesh Rao]]></category>
		<category><![CDATA[एक आलसी का चिट्ठा]]></category>
		<category><![CDATA[गिरिजेश राव]]></category>
		<category><![CDATA[मैं चिट्ठाकार हूँ]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>मैं चिट्ठाकार हूँ, पर गिरिजेश राव जैसा तो नहीं जो बने तो निपट आलसी पर रचे तो जीवन-स्फूर्ति का अनोखा&#160; व्याकरण- बाउ। संस्कारशील गिरिजेश राव...</p>
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]]></description>
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<p>मैं चिट्ठाकार हूँ, पर <a href="https://www.blogger.com/profile/16654262548719423445" target="_blank" rel="noreferrer noopener">गिरिजेश राव</a> जैसा तो नहीं जो बने तो निपट आलसी पर रचे तो जीवन-स्फूर्ति का अनोखा&nbsp; व्याकरण- <a href="http://girijeshrao.blogspot.in/search/label/%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%8A" target="_blank" rel="noreferrer noopener">बाउ</a>। संस्कारशील गिरिजेश राव कहूँ?- शृंखलासापेक्ष, पर्याप्त अर्थसबल, नितान्त आकस्मिकता में भी पर्याप्त नियंत्रित। जो प्रकृति का शृंगार है- चाहे वह शोभन हो, मधुर हो, सुन्दर व शान्त हो अथवा भयानक व निष्ठुर हो- एक अनोखे व मूक प्राण प्रवाह से कोई शील निर्मित करता है और एक संस्कारशील <strong>सनातन कालयात्री</strong> सम्मुख हो जाता है।</p>



<p>गिरिजेश राव माने स्मृति में शाश्वत व्यक्तित्व ढूँढ़ता लठियारा। विनम्रता के साथ निर्भीकता का योग। गुंडई के साथ उदारता और गंभीरता में तनिक लंठई, माधुर्य। यह परम्परा का शील है, संस्कारों से प्राणवान्। शिव और अशिव, बूझ-अबूझ, तथ्य-मिथ्या की परवाह न करिए, गिरिजेश राव में धारणाओं की हार्दिक अनुभूति और प्रभाव का सौन्दर्य निरखिए।</p>



<p style="text-align: justify;"><strong><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2015/05/Girijesh-Rao.webp" type="image/webp" /><img decoding="async" class="alignright" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2015/05/Girijesh-Rao.jpg?x47177" border="0" /></picture>सनातन कालयात्री</strong> और चिरपरिचित <strong>आलसी</strong> संज्ञाभिहित! विचित्र दुविधा है। दोनों एक साथ? एक प्राण शक्ति है विकास की आकुलता एवं गति की अदम्यता से शाश्वत अंतःसंयुक्त और वह सदैव रहती है उर्ध्व-अग्रसर, आगे-आगे चलती हुई। इसी प्राणशक्ति के पुद्गलपुंज विश्राम के शाश्वत लोभ से भी विपरीततः आक्रान्त हैं। बात वही कि बार-बार भीतर-भीतर चलने की अदम्य प्रेरणा प्राप्त करना और पुनः पुनः अनुद्वेलित होकर जहाँ हैं वहीं पड़े रहने की विश्रामकामना भी पालते रहना। यह मूलतः तल्लीन नहीं, बल्कि विलीन होने की इच्छा है। इसी इच्छा को अति से बचाने के लिए सनातन गिरिजेश सत्वर लिखते हैं ब्लॉग और नाम देते हैं <a href="http://girijeshrao.blogspot.in/" target="_blank" rel="noreferrer noopener">एक आलसी का चिट्ठा</a>।</p>



<p><strong>मैं चिट्ठाकार हूँ, पर..</strong> एक <a href="https://blog.ramyantar.com/2009/08/blog-post-21.html">विशिष्ट श्रृंखला के रूप में</a> ब्लॉगिंग के शुरुआती दिनों में लिखना चाहा था। ब्लॉगिंग के महारथी व्यक्तित्वों पर लघु टिप्पणी का प्रयास था यह। एक ही प्रविष्टि आ सकी। बाद में कुछ आशंकायें कि इनके व्यक्तित्व से आक्रांत न हो जाऊँ मैं और कुछ निश्चिंतता कि कभी भी लिख लूँगा इन्हें सुविधानुसार- यह प्रविष्टियाँ छूटी पड़ी रही। ड्राफ्ट में पड़ा शीर्षक उलाहना देता था, पर बहाना न मिल पाता था। गिरिजेश भईया की फेसबुकिया आँख-मिचौनी (कभी अति सक्रिय, कभी गुम) ने तनिक बल दिया और यह दूसरी प्रविष्टि अपना स्वरूप ले पायी। अब शायद इस शृंखला को लिखने की अपनी यह अभीप्सा पूरी करूँ। और नाम भी तो जुड़ गए हैं सूची में।</p>



<p>चित्र: <a href="http://www.satyarthmitra.com/2009/10/blog-post_30.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">सत्यार्थमित्र</a> से साभार।</p>
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		<title>माँ की गोद ही चैत्र नवरात्रि है</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2015/03/navaratri.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Mar 2015 07:53:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Article | आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[Essays]]></category>
		<category><![CDATA[Religion and Spirituality]]></category>
		<category><![CDATA[आदिशक्ति]]></category>
		<category><![CDATA[चैत्र नवरात्रि]]></category>
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		<category><![CDATA[प्रकृति]]></category>
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		<category><![CDATA[वसंत पंचमी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8220;एक ज्योति सौं जरैं प्रकासैंकोटि दिया लख बाती।जिनके हिया नेह बिनु सूखेतिनकी सुलगैं छाती।बुद्धि को सुअना मरमु न जानैकथै प्रीति की मैना।दिपै दूधिया ज्योतिप्रकासैं घर...</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="has-text-align-left">&#8220;एक ज्योति सौं जरैं प्रकासैं<br>कोटि दिया लख बाती।<br>जिनके हिया नेह बिनु सूखे<br>तिनकी सुलगैं छाती।<br>बुद्धि को सुअना मरमु न जानै<br>कथै प्रीति की मैना।<br>दिपै दूधिया ज्योति<br>प्रकासैं घर देहरी अँगना।<br>नवेली बारि धरैं दियना॥&#8221;<br><strong><em>&#8212;(आत्म प्रकाश शुक्ल)</em></strong></p>



<p>नवसंवत्सर ने आनन्द भरित अँगड़ाई ली। आ गया वासंती नवरात्र (चैत्र नवरात्रि)। नव संवत्सर का प्रफुल्ल राज्यारोहण। भारतीय नव संवत्सर की द्वंद्व विसर्जिनी बेला। उत्तरायण सूर्य का अनिर्वेद्य पदचरण। चैत्र नवरात्रि का उन्मीलन राम-जन्म। आश्विन नवरात्र का अभियान रावण-विजय। दोनों समय महाशक्ति की अर्चना वेला। </p>



<p>यह समय लोकोत्सव की प्राचीन परम्परा है। यह संवत्सर का आगमन मातृ-रूपा शक्ति की अनुकूल का अमृतानन्दी दोलारोहण है। इस काल विशेष में लालायित होकर प्रकृति भद्रता का भण्डार लुटाती है- <strong>नमः प्रकृत्यै भद्रायै नीयताः प्रणतास्मताम्।</strong></p>



<h2 class="wp-block-heading">वात्सल्य और लावण्य की युगल पीठिका का पर्व</h2>



<p>इस शक्ति पर्व को हम वात्सल्य और लावण्य की युगल पीठिका के रूप में देखते हैं। जब सारे संभावना मुकुल मुरझाये हों, रचना मंजरियाँ चिता भूमि में भस्मसात् हो गयीं हो, स्वार्थों के रक्तबीज दुर्निवार क्रीड़ा कर रहे हों, शान्ति, सुख और मोद का उज्ज्वल भवितव्य ग्रहणग्रस्त हो गया हो तभी सर्वदेवशरीरजा जगन्माता प्राप्ति के उल्लास को बलीयसी बना देती हैं। महामोद बिखर जाता है-</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p>अतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजम्। एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा। (दुर्गा सप्तशती २/३)</p>
</blockquote>



<p>देवत्व पतन को प्राप्त था, उसी समय सौन्दर्य, शील और शक्ति की त्रिवेणी विपत्ति सिन्धु के संतरण की नौका बनी। यह संवत्सर उसी महोल्लास के वर्षण की बेला है। महिष मर्दन के बाद रक्तस्नात् भीषण स्वरूप के तिरोहित होने की गाथा और आनन्द सौन्दर्य के नवोन्मेष की अवाप्ति ही नवरात्रि के नव संवत्सर का महावर लगा देवि का चरण जलजात है। देवता प्रार्थना करते हैं-</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p>ईषत्सहासममलं परिपूर्णचन्द्रबिम्बानुकारि कनकोत्तमकान्तिकान्तम् &#8230;.</p>
</blockquote>



<p>इस स्वरूप को ही नवसंवत्सर की पीठस्थली स्वीकार्य करने में कभीं दो राय नहीं हो सकती। यह मांगल्यमयी विभावना है जो देवताओं के मुख से फूटी थी कि सबका वित्त, विभव, धन, दारादि सम्पदा बढ़े, बढ़े, बढ़ती रहे, फलती-फूलती रहे। गाँवों में होलिका दहन के समय होलिका पढ़ाते हुए नव संवत्सर की पताका लहराते हुए जनसमूह बोलता है-</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p>बेइल माता दिहा असीस, जिया लरीको लाख बरीस।<br>जे जीये ते खेलै खाय, जे मुऐ ते लेखै लाख। &#8230;..</p>
</blockquote>



<h2 class="wp-block-heading">नव संवत्सर का नवरात्र </h2>



<p>नव संवत्सर के नवरात्र की एक अनूठी कसक है। भगवती का उन्मीलन रमणीयता की पालकी में होता है। क्षण-क्षण रमणीय, क्षण-क्षण नूतन, यही तो नव संवत्सर की भूमि है &#8211; <a href="https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0%E0%A4%AE%E0%A5%8D:%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B6%E0%A5%80%E0%A4%AF%E0%A4%AE%E0%A5%8D_(%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A4%B2%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%96%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A5%8D).djvu/%E0%A5%AC%E0%A5%A7" target="_blank" rel="noreferrer noopener"><em><strong>क्षणे-क्षणे यन्नवतामुपैति तदैव रूपं रमणीयतायाः।</strong></em></a></p>



<p>वासंती यह नवरात्र वेला हमें देवि की वह ऋतुराज गर्भिणी संजीवनी सुधा प्रदान करती है जो जन्म-जन्मांतर की ज्वर बाधा को दूर कर देती है। शंकराचार्य इसी नव वर्ष की वासंती गोद में बैठकर इस विभावना में प्रवहित हुए थे-</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p>वसन्ते सानन्दे कुसुमित लताभिः परिवृते<br>स्फुरन्नानापद्मे सरसि कलहंसालिसुभगे।<br>सखीभिः खेलन्तीं मलयपवनान्दोलितजले<br>स्मरेद्यस्त्वां तस्य ज्वरजनितपीडापसरति॥ (आनन्द लहरी)</p>
</blockquote>



<p>ज्वर जनित पीड़ा क्या है- मदनोन्माद ही तो। <em>यौवन ज्वर केहि नहि बल कावा</em>। भला इस विषय-ज्वर को विनष्ट करने वाली इस भगवती का वासंती अर्चन कितना स्तुत्य है, प्रणम्य है।</p>



<p>आचार्य की इस आनन्द लहरी स्तुति का जैसे अनुवाद ही गोस्वामी तुलसीदास ने पुष्प-वाटिका प्रसंग में उपस्थित कर दिया है जहाँ जनक तनया सखियों के साथ जल क्रीड़ा करती हैं, एक दूसरे के ऊपर जल उछालती हैं। मलय पवनान्दोलित जल है, वसन्त की बेला है और फिर तब मुदित मन सीता गौरी-निकेतन गयी हैं- </p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p>भूप बागु वर देखेउ जाई ।जँह बसंत मृदु रही लुभाई॥<br>लागे बिटप मनोहर नाना। बरन बरन बर बेलि बिताना॥&#8230;&#8230;&#8230;<br>मध्य बाग सरु सोह सुहावा। मनि सोपान बिचित्र बनावा॥&nbsp;<br>बिमल सलिलु सरसिज बहुरंगा। जलखग कूजत गुंजत भृंगा॥&#8230;&#8230;.<br>मज्जनु करि सर सखिन्ह समेता। गई मुदित मन गौरि निकेता॥</p>
</blockquote>



<h2 class="wp-block-heading">चैत्र नवरात्रि जगन्माता की चिन्मयी लीला है</h2>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignright size-medium is-resized"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2015/03/Navaratri.webp 500w" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" width="300" height="210" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2015/03/Navaratri-300x210.png?x47177" alt="चैत्र नवरात्रि पर निबंध" class="wp-image-96" style="width:350px" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2015/03/Navaratri-300x210.png 300w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2015/03/Navaratri-320x224.png 320w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2015/03/Navaratri.png 500w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /></picture></figure>
</div>


<p>यह वासंती पर्व, यह नूतन वर्षी चरण-निपात जगन्माता की चिन्मयी लीला है। हिमालय से उत्पन्न हुई एक मनोहारिणी लता है। उसके नन्हे-नन्हे सुकोमल हाथ, उस लता के ललित पल्लव हैं। मुक्ताहार उस लता के वर्ण-वर्णी विमल पुष्प गुच्छ हैं। बिखरी हुई सुचिक्कण अलकावली का दोलन भ्रमरों की लीला है, स्थाणु (शिव) से तंदुल पिंड तिलावेष्टित है। पयोधरों के भार से विनत हो गयी है और अमिय वर्षी मीठी बोली ही उस लतिका की सरसता है- ऐसी चिदानन्द लतिका जगद्धात्री पराम्बा, नूतन वर्षाधिष्ठात्री अखिल विश्व में विचरण कर रही है-</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p>हिमाद्रेः संभूता सुललितकरैः पल्लवयुता<br>सुपुष्पा मुक्ताभिर्भ्रमरकलिता चालकभरैः।<br>कृतस्थाणुस्थाना कुचफलनता सूक्तिसरसा<br>रुजां हन्त्री गन्त्री विलसति चिदानन्दलतिका॥</p>
</blockquote>



<p><a href="https://blog.ramyantar.com/2009/12/blog-post_17.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">सौन्दर्य लहरी</a> की यह शंकराचार्य की उद्भावना अक्षरशः इस श्रेष्ठ पर्व की पत्रावली पर अमिट हस्ताक्षर है-</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p>तुरीया कापि त्वं दुरधिगमनिःसीममहिमा<br>महामाया विश्वं भ्रमयसि परब्रह्ममहिषी। (<a href="https://blog.ramyantar.com/2015/03/saundarya-lahari-16.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">सौन्दर्य लहरी</a>)</p>
</blockquote>



<p>यही नहीं नगपति किशोरी की विश्वविमोहिनी छवि इस नवसंवत्सरमयी वासंती नवरात्र की थाती है। यह जगत-दुख-द्वंद्व से ग्रस्त वत्स के लिए पयोधर क्षीर है। तापत्रय ज्वलित के लिए मलयज शीतल चन्दन लेप है। अद्भुत है यह पर्व। भाव राज्य में सत्य का ध्वज फहर उठा है। शीला का दृढ़ दण्ड सुन्दरता से सम्पन्न हो गया है। </p>



<p>माँ की ललित छवि निहार कर वसंत के नव-नव संवत्सरीय विलास पर सर्वात्मना बिछ जाने का जी होता है-</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p>मुखे ते ताम्बूलं नयनयुगले कज्जलकला<br>ललाटे काश्मीरं विलसति गले मौक्तिकलता।<br>स्फुरत्कांची शाटी पृथकटितटे हाटकमयी<br>भजामित्वां गौरीं नगपतिकिशोरीमविरतम्॥</p>
</blockquote>



<h2 class="wp-block-heading">वसंत का शक्ति पर्व</h2>



<p>नव वासंती यह शक्ति पर्व दुंदुभिनाद करते हुए आया है- <em>’उठो, मृत्यु के पद को ढकेल दो। धन धान्य और संतानों से फलो फूलो। इस जगत प्रपंच की दानवी मृत्यु लीला की कपाल क्रिया करो। धरित्री और इसके जीवन का सत्य अपराजेय है- <strong>सर्व स्वरूपे सर्वेशे सर्व शक्तिसमन्विते</strong> की करुणाप्लुता दृष्टि से स्नात हो जाओ। कुटिलता को पददलित करने में लगो, आनन्द शान्ति के अमृत रस का पान करो। जीवन को मधुर, सरस और प्रशान्त बनाओ। अशान्ति की चिर विदाई करो, शत्रु को पराभूत कर काल के कपाल पर चरण रखते हुए आगे दौड़ पड़ो। काली- काल-समय-क्षण की अधिष्ठात्री जो माँ है, उसकी ममतामयी गोद में बैठ जाओ। माँ की गोद में बैठकर माँ की लीला निहारो’</em> &#8211;</p>



<blockquote class="wp-block-quote tr_bq is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p><span class="fullpost">&#8220;पंकिल की पीठ पर हँथोरी मंजु फेरि-फेरि, बाँटा कर दुलार दीन बेटे की चिरौरी है।&#8221; <b>(<a href="https://blog.ramyantar.com/2010/05/blog-post_16.html" target="_blank" rel="noopener">शैलबाला शतक</a>)</b></span></p>
</blockquote>



<p>सप्तशती की फलश्रुति भी कहती है, ऐसी भावना वाले घर को मैं कभी भी नहीं छोड़ती हूँ- <em><strong>सदा न तद्विमोक्ष्यामि सांनिध्य तत्र मे स्थितं (१२/९)</strong></em></p>



<p>यह हमारी माँ की गोद ही चैत्र नवरात्रि है। यही नये सवंत्सर का दुलारमय अंचल है। यही मधुमास का बौर है। यही वैशाख की भोर है। यही जेठ की छाया है। इसी की याद ही आषाढ़ की घटा है। श्रावण-भादो की बरसात है। क्वार की जुन्हाई है। कार्तिक और अगहन की पयस्विनी है। पूष और माघ की दुपहरिया है। यही माँ की गोद ही फागुन का फाग है। यही हमारा सर्वस्व है। यही नवसंवत्सर ही हमारी पुष्पसज्जा है, दृष्टि है, हँसी है, स्वीकृति है, समर्पण-वृत्ति है। मातृभावमयी सारी प्रकृति हममें समा गयी है और हम उसमें समा गए हैं। <br></p>
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			</item>
		<item>
		<title>सुरसरि तीरवाँ खड़े हैं दुनो भईया रामा: केवट प्रसंग</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2012/12/malahavababa.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 15 Dec 2012 23:00:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Article | आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[General Articles]]></category>
		<category><![CDATA[Religion and Spirituality]]></category>
		<category><![CDATA[भोजपुरी]]></category>
		<category><![CDATA[केवट-प्रसंग]]></category>
		<category><![CDATA[गीत]]></category>
		<category><![CDATA[नाविक]]></category>
		<category><![CDATA[मछुआरा]]></category>
		<category><![CDATA[मलहवा बाबा]]></category>
		<category><![CDATA[लोकगीत]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रामभद्राचार्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>केवट प्रसंग रामायण के अत्यन्त सुन्दर प्रसंगों में से एक है, खूब लुभाता है मुझे। करुण प्रसंगों के अतिरेक में यह प्रसंग बरबस ही स्नेहनहास...</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p>केवट प्रसंग रामायण के अत्यन्त सुन्दर प्रसंगों में से एक है, खूब लुभाता है मुझे। करुण प्रसंगों के अतिरेक में यह प्रसंग बरबस ही स्नेहनहास का अद्भुत स्वरूप लेकर खड़ा होता है। विचारता हूँ राम की परिस्थिति को, कैकयी की निर्दयता अपना काम कर चुकी है, पिता से बिछड़ने का दुःख अभी असह्य ही है। सब कितना करुण है। तभी लटपटा प्रेम ले उपस्थित होता है केवट। </p>



<p>कितना जरूरी है इस केवट का प्रवेश दृश्यावली में! इस करुण समय में प्रेम की ऐसी ही अभिव्यक्ति तो वांछित थी जो विभोर भी करे और स्नेहनहास से हँसाये भी। राम के जीवन की घटनाओं का संतुलन है यह, बाबा तुलसी की महानतम काव्य-कथा में राम के वनगमन की करुण कथा में ही समुआया ’ड्रॉमेटिक रिलीफ’ है यह केवट।</p>



<h2 class="wp-block-heading">केवट प्रसंग का सौन्दर्य</h2>



<p>इस केवट की मनोहारी कथा पढ़ता, गुनता हूँ तभी इसे और भीतर तक पिरोने, मिट्टी की गंध से सराबोर कर अन्तर में  ठहराने <a href="https://blog.ramyantar.com/2009/09/blog-post-20.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">मलहवा बाबा</a> चले आते हैं। इस बार भी आये! गंगा-मईया की प्रीति का यह गवैया सुरसरि के तीर खड़े दोनों भाईयों (दुनो भईया) की कथा लेकर आ गया। मैं बाबा के स्वर में और तीर खड़े अवधपुरी के दोनों भाईयों के स्मरण में रम गया। </p>



<p>केवट-केवट पुकारते राम दिखे। सुरसरि-पार जाना है न! कहाँ हो केवट? तीर पर खड़े हैं राम, व्याकुल। सुमन्त से विदाई के बाद स्वयं को ओझल कर देने की असीम व्याकुलता समाई है भीतर। और केवट! कहाँ है न जाने? राम पुकार रहे हैं केवट-केवट! विचित्र है, पर है तो है। जिसके नाम से भवसागर सूख जाय वह गंगा न पार कर सके। उसे नाव चाहिए? उस नाव का नाविक चाहिए? यदि भगवान की यही लीला है तो भक्त भी चतुर है, कपटी है &#8211;<strong> &#8220;माँगी नाव न केवट आना; कहैं तुम्हार मरम मैं जाना।&#8221;</strong> छिपकर किया जाने वाला प्रेम और भी मधुर हो जाता है।</p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignright size-full"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2012/12/ramsitakewat.webp 400w" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" width="400" height="271" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2012/12/ramsitakewat.jpg?x47177" alt="केवट प्रसंग: राम सीता और केवट" class="wp-image-172" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2012/12/ramsitakewat.jpg 400w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2012/12/ramsitakewat-300x203.jpg 300w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2012/12/ramsitakewat-320x217.jpg 320w" sizes="auto, (max-width: 400px) 100vw, 400px" /></picture></figure>
</div>


<p>केवट नाव लेकर तो आता है पर सजग है, सतर्क है। उसे पता है कि राम के चरणकमल की धूलि मनुष्य बनाने वाली कोई जड़ी है। वह राम से शंकित नहीं, उनके चरण कमलों की धूलि से शंकित है। उत्कर्ष और अपकर्ष की विचित्र अवस्था में डाल दिया है केवट ने। राम रज हो गए हैं, रज राम हो गयी है। केवट तार्किक है। उसके पास <a href="https://blog.ramyantar.com/2009/12/blog-post_14.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">बाबा तुलसी की हुँकारी</a> है- <em><strong>&#8220;छुवत शिला भई नारि सुहाई; पाहन ते न काठ कठिनाई।&#8221;</strong></em> अब क्या हो? तर्क के स्वांग में प्रेम झाँक रहा है। भक्ति की सरल कामना सिर उठा रही है- <em>&#8220;बिना पग धोये नाथ नइया ना चढ़इबै हो&#8221;। </em></p>



<p>अब चाहते ही हो, विवश हो कर पार जाना ही है तो पग-पखारने दो- <br><em>“जो प्रभु अवशि पार गा चहहु। तौ पद पद्म पखारन कहहू।” </em></p>



<p>केवट की चातुरी अब समझ आयी है। यह सब पग-प्रच्छालन की चाल है। चरण-धूलि में ही अपने जीवन की सार्थकता की पराकाष्ठा देखने वाला अनन्य भक्त है केवट। सजल कर रहा है अपनी विदग्धता को। सारे तर्क ही तिरोहित हैं, सारी आशंकाएँ ही निर्मूल हैं- यदि चरण-रज मिले। केवट पी ले चरणामृत, बस इतनी-सी साध है।&nbsp;</p>



<p>अब कौन-सा चारा बचा है।&nbsp;</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-style-default is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p>“सुनि केवट के बचन प्रेम लपेटे अटपटे।<br>विहँसे करुणाअयन चितय जानकी लषण तन॥”</p>
</blockquote>



<p>विहँसना ही पड़ता है केवट सरीखे आदमी के लिए। हँसी भी आती है, रुलाई भी। गद्गद भी करता है, गुदगुदाता भी है। यह कहने के अतिरिक्त बचा क्या है – “सोई करहु जेहि नाव न जाई।” सो –&nbsp;</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p>“काठे के कठवत में चरन पखारै रामा<br>चरन पखारि केवट पीयैं चरन अमरित हो”<br>(अति आनंद उमगि अनुरागा….)</p>
</blockquote>



<p><em>’सोई करहु जेहि नाव न जाई’</em> कह राम स्वयं केवल अपराध से बचना चाहते हैं, अनुगृहीत करना नहीं चाहते। वह इस पैर धोने की चाल खूब समझते हैं और मन्द मुस्काते पार उतरते हैं। कुछ न देने का संकोच घेर कर खड़ा है। बाबा तुलसी तो सीता से मणि मुद्रिका दिलवाते हैं, पर हमारे मलहवा बाबा सीधी-सीधी बात जानते हैं–</p>



<p>“देवे लगलैं राम अपने हाथे कै मुंदरवा हो” <br>केवट ले क्यों? <br>“ना लेबे राम तोहार हाथे कै मुंदरवा हो” <br>राम नहीं मानते- <br>देवे लगलें राम जब डाली भर सोनवां हो <br>केवट क्यों मानने लगे? <br>ना लेबे राम तोहार डाली भर सोनवां हो &nbsp;&nbsp;</p>



<p>वह तो पा चुका है- “नाथ आज मैं काह न पावा।” यह क्या स्वर्ण-मुद्रिका दे रहे हो नाथ! भवसागर में अटकी पड़ी नाव के खेवइया हो राम! तुमसे कैसी उतराई। केवट भाव-विह्वल है, सजल है। फिर भी विदग्ध है-</p>



<p>“तूँ त हउवा भवसागर के तरवइया रामा <br>केवट से केवट नाहिं लेवैं अब खेवइया हो” </p>



<p>बिरादरी का मामला है। तुम भवसागर के तरवइया हो, हम गंगा-सरि के। तुमसे उतराई कैसे ले सकते हैं? ’स्टाफ’ की बात है। केवट ग़ज़ब है।</p>



<p>ग़ज़ब हमारे <a href="https://blog.ramyantar.com/2009/09/blog-post-20.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">मलहवा बाबा</a> भी हैं। तुलसी बाबा की लोक संवेदना के असली पहरुए। लोक काव्य की विशिष्टता से सजा कर बाबा अंतिम पंक्तियाँ गाने लगते हैं, भक्ति उमग रही है, विनय साक्षात हो गया है, शरणागत का स्वर आकार लेने लगा है-&nbsp;</p>



<p>“गहिरी बा नदिया देखा नइया बा पुरानी रामा <br>खेलन वाला अलख अनारी रामा।”</p>



<p>मलहवा बाबा और केवट दोनों एकरूप हो गा रहे हैं। अनन्य भक्ति सजल होकर बह रही है। केवट गंगा का सलोना बेटा है, अरज लगा रहा है-</p>



<p>“भवसागर से परवाँ उतारा गंगा माई हो।&#8221;</p>


<div class="epcl-shortcode epcl-box information"><span class="epcl-icon">💡</span><div class="epcl-box-content">यह वीडियो तो बस यूट्यूब पर अपलोड करने के लिए एकाध चित्र लगाकर बना दिया गया है। ऑडियो भी बहुत अच्छा नहीं था, क्योंकि रिकॉर्डिंग यंत्र ही नहीं था बेहतर कोई उस वक़्त। तेज वॉल्यूम कर काम चलाईये। अनुभूति अपना काम करेगी ही।</div></div>


<figure class="wp-block-embed is-type-video is-provider-youtube wp-block-embed-youtube wp-embed-aspect-4-3 wp-has-aspect-ratio"><div class="wp-block-embed__wrapper">
<iframe loading="lazy" title="Song of a sailor (Kevat Prasang)" width="726" height="545" src="https://www.youtube.com/embed/dLQJvkOVdN4?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" referrerpolicy="strict-origin-when-cross-origin" allowfullscreen></iframe>
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<h3 class="wp-block-heading has-text-align-center"><strong>गीत का मूल पाठ</strong></h3>



<p>सुरसरि तीरवाँ खड़े है दुनो भईया रामा / अवधपुरी के रहवइया दुनो भईया रामा<br>सुरसरि पार के जवइया दुनो भइया रामा / केवट-केवट राम पुकारैं रामा।</p>



<p>भोरे में नइया डोलल आवैला केवटवा हो / भोरे में तीरवाँ ………<br>बिना पैर धोये नाथ नइया ना चढ़इबै हो / बिना पैर धोये…..।</p>



<p>काठे के कठवत में चरन पखारै रामा / चरन पखारि केवट पीयैं चरन अमरित हो<br>अगवाँ जे बइठैलें राम-लछमण सीता जी / पीछवाँ ले बइठैं गंगा माई की जल फइली<br>भोरे में तीरवाँ ………..।</p>



<p>खेवत खेवत केवट घटवा में गइलैं रामा / देवे लगलैं राम अपने हाथे कै मुंदरवा हो<br>ना लेबे राम तोहार हाथे कै मुंदरवा हो / देवे लगलें राम जब डाली भर सोनवां हो<br>ना लेबे राम तोहार डाली भर सोनवां हो।</p>



<p>नदिया में नारि के खेवइया पड़ि रामजी हो / तूँ त हउवा भवसागर के तरवइया रामा&nbsp;<br>केवट से केवट नाहिं लेवैं अब खेवइया हो / गहिरी बा नदिया देखा नइया बा पुरानी रामा<br>खेलन वाला अलख अनारी रामा।</p>



<p>बुढ़िया मलाहिन अरज करत बा हो / भवसागर से परवाँ उतारा गंगा माई हो<br>सुरसरि तीरवाँ खड़े हैं दुनो भइया रामा।</p>



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<p>एक तरफ केवट की सजगता और दूसरी ओर राम के प्रति अनन्य भक्ति और प्रेम की अनूप भावना। वह छलक-छलक पड़ता है अपनी भावनाओं में। तुलसी पीठाधीश्वर जगद्गुरु श्री रामभद्राचार्य जी ने रच कर गाया है- <strong><a href="https://archive.org/details/AavaHoJag-naavKeKhevaiya-rambhadracharya" target="_blank" rel="noreferrer noopener">आवा हो जग नाव के खेवइया/ राघव तुम बिन सूनी मोरी नइया</a></strong>। </p>



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<p>जगद्गुरु श्री रामभद्राचार्य जी की रचना पर भावपूर्ण अभिनय का एक वीडियो भी मिला मुझे, अद्भुत आनन्ददायी।</p>



<figure class="wp-block-embed is-type-video is-provider-youtube wp-block-embed-youtube wp-embed-aspect-16-9 wp-has-aspect-ratio"><div class="wp-block-embed__wrapper">
<iframe loading="lazy" title="आवा हो जग नाव के खिवैया अो राघव तुम्हें बिना सूनी मोरी नैया" width="726" height="408" src="https://www.youtube.com/embed/X6yuoOrkUXQ?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" referrerpolicy="strict-origin-when-cross-origin" allowfullscreen></iframe>
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<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2012/12/malahavababa.html">सुरसरि तीरवाँ खड़े हैं दुनो भईया रामा: केवट प्रसंग</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
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