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	<title>Politics Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</title>
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	<description>हिंदी ब्लॉग। साहित्य, भाषा, संस्कृति, लोक व शास्त्र से संयुक्त। कविता, कहानी, समीक्षा, निबन्ध, नाटक एवं अनुवाद का सहज प्रकाशन। लोक साहित्य का रंग भी।</description>
	<lastBuildDate>Tue, 11 Jun 2024 05:47:24 +0000</lastBuildDate>
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	<title>Politics Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</title>
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		<title>भागवत! जनता तुम्हारा जूता देख रही है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 31 Mar 2009 19:31:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[General Articles]]></category>
		<category><![CDATA[Politics]]></category>
		<category><![CDATA[Election]]></category>
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		<category><![CDATA[लोकतंत्र का उपहास]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>मेरे जिले की एकमात्र संसदीय लोकसभा सीट चन्दौली के लिये नामांकन कार्यालय में एक प्रत्याशी, नाम तो बड़ा सुशोभन है भागवत किन्तु करनी बड़ी भोथरी...</p>
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<p class="has-drop-cap">मेरे जिले की एकमात्र संसदीय लोकसभा सीट चन्दौली के लिये नामांकन कार्यालय में एक प्रत्याशी, नाम तो बड़ा सुशोभन है भागवत किन्तु करनी बड़ी भोथरी है, गधे पर बैठकर और जूते की माला पहनकर नामांकन करने गया। लोकतंत्र का इतना विभत्स मजाक पहली बार देखने को मिला है। ’भागवत’ की बुद्धि भरसाँय (भाँड़) में चली गयी है। (खबर पढ़ने के लिये <a href="http://picasaweb.google.com/lh/photo/SzaLGipnU1VOgv69UDD3VA?authkey=Gv1sRgCKC1vYGakbb0uAE&amp;feat=directlink">यहां </a>क्लिक करें)</p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignright"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/04/Scan10005.webp" type="image/webp" /><img decoding="async" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2009/04/Scan10005.jpg?x47177" alt=""/></picture></figure>
</div>


<p>ये महानुभाव गधे पर क्यों बैठे? गधा तो शीतला मइया का वाहन है, अतः भागवत जी तो महामारी लेकर आ गये। भोली जनता को गधा बनाने वाला ऐसा गधा (माफ करें) कहाँ मिलेगा? यदि निरीह प्राणी की ही बात है तो गधा तो ’रजक’ (धोबी) वर्ग का सम्मानित जीव है। खुर भी चलाता है, दाँत भी चलाता है, भार भी ढोता है। सेवक है, सुशील है, सत्कर्मी है।</p>



<h3 class="wp-block-heading">गधे को गधा ही रहने दीजिये, उसे गरुड़ न बनाइए</h3>



<p>अच्छा होता ’भागवत जी’ मेमने पर बैठ गए होते! अंग्रेजी कवि ’विलियम ब्लेक’ ने मेमने (लैम्ब ) को सबसे निरीह माना है- न पूँछ, न सींग। कोई भेंड़ भी चुन सकते थे, समयानुसार भोजन कर लेते, जैसे नेता जनता का कर लिया करते हैं। जूते की माला की जगह कुर्सी लटका लेते- कुर्सी भी तो चलती है संसद में; चला भी लेते, उस पर बैठ भी जाते। ऐसी अभद्रता किस लोकतंत्र की धरोहर है? जनता तुम्हारा जूता देख रही है जिसे गले से निकालकर किसी के गाल पर चला सकते हो। ऐसी सुबुद्धि को शत-शत बार प्रणाम।</p>



<p>जिसका शील, जिसका आचरण, जिसकी वाणी और जिसके कर्म उपहार के नहीं उपहास के पात्र बन जांय, उसे संसद में भेंजने का कौन प्रयास करेगा! इसलिये अभीं प्रारम्भ में ही ऐसे विदूषकों को निकालकर बाहर कर दिया जाय तो यह देश के लिए अच्छी तारीख होगी। गधे को गधा ही रहने दीजिये, उसे गरुड़ मत बनाइये। मैं तो यही कहूंगा कि ऐसे संसदीय सीट का सपना देखने वाले ’श्री भागवत चौरसिया जी’ एक बार फिर अपने श्रृंगार-कक्ष में चले जाँय और आइने में अपना मुंह देख लें। देश तिजारत नहीं है, देश भारत है। इस भा-प्रकाश को भास्वर रहने दें, धूल-धूसरित न करें।</p>
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		<title>वाक् वैदग्ध्य, हास्य और चुनाव का महापर्व</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 22 Mar 2009 05:21:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[General Articles]]></category>
		<category><![CDATA[Politics]]></category>
		<category><![CDATA[Election]]></category>
		<category><![CDATA[Humour]]></category>
		<category><![CDATA[Laughter]]></category>
		<category><![CDATA[Theory of Humour]]></category>
		<category><![CDATA[चुनाव का महापर्व]]></category>
		<category><![CDATA[वाक् वैदग्ध्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>आजकल चुनावों का महापर्व ठाठें मार रहा है। इस महापर्व के संवाद-राग में मैने वाक् वैदग्ध्य के प्रकार ढूंढे। माफी मुझे पहले ही मिल जानी...</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>आजकल चुनावों का महापर्व ठाठें मार रहा है। इस महापर्व के संवाद-राग में मैने वाक् वैदग्ध्य के प्रकार ढूंढे। माफी मुझे पहले ही मिल जानी चाहिये यदि यह सब कुछ केवल बुद्धि का अभ्यास लगे। बात यह भी थी कि कुछ लिख नहीं पा रहा था, सो कलम की चलाई भी इसी बहाने हो गयी।</p>
<p>वाक् वैदग्ध्य (Wit) <a href="https://blog.ramyantar.com/2009/01/gobar-ganesh.html">हास्य</a> का एक बौद्धिक स्रोत है। इसमें केवल बुद्धि का व्यायाम नहीं, थोड़ी रसमयता भी होती है। वैदग्ध्य नाना रूपों में सम्मुख होता है। कुछ रूप प्रस्तुत हैं।<span class="fullpost"><br />
</span></p>
<h3><span class="fullpost"><span style="font-weight: normal;"><span style="font-size: 130%;">१) संदर्भान्तरण:</span></span> </span></h3>
<p><span class="fullpost">एक नेता जी बार-बार चुनाव जीत जाते थे, पर क्षेत्र के विकास का पहिया ठहरा ही रहता । इस चुनाव में भी वे वोट मांगने पहुंचे :</span></p>
<blockquote><p><span class="fullpost"><b>मतदाता:</b> आप फिर आ गये वोट मांगने ?</span><br />
<span class="fullpost">(तात्पर्य, इस बार हम पहचान गये हैं आप को, वोट नहीं देंगे)</span><br />
<span class="fullpost"><b>नेता जी:</b> जी! मैं तो आपका पुराना ग्राहक हूं। खयाल रखियेगा।</span><br />
<span class="fullpost">(तात्पर्य, मेरे बार-बार आने से आपकी सदाशयता उचित है )</span></p></blockquote>
<h3><span style="font-weight: normal;"><span class="fullpost"><span style="font-size: 130%;">२) विरुद्धमति से उत्पन्न व्यंग:</span></span></span></h3>
<p><span class="fullpost">कांग्रेस और भाजपा के समर्पित कार्यकर्ता राहुल गांधी और वरुण गांधी की तुलना करते हुए:<br />
</span></p>
<blockquote><p><span class="fullpost"><b>कांग्रेसी कार्यकर्ता:</b> कहां राहुल गांधी और कहां वरुण गांधी!</span><br />
<span class="fullpost"><b>भाजपा कार्यकर्ता:</b> जी हां, कहां राहुल गांधी और कहां वरुण गांधी!</span></p></blockquote>
<p><span class="fullpost">(यहां मात्र आवृत्ति से व्यंग की स्थापना हो गयी है । एक-से अर्थ में वाक्य का प्रयोग है, बस पुरुष स्थानापन्न हो गये हैं। )</span></p>
<h3><span style="font-weight: normal;"><span class="fullpost"><span style="font-size: 130%;">३) प्रभावाभास:</span> </span></span></h3>
<p><span class="fullpost"> प्रभावकेन्द्र एक पद से हटाकर दूसरे पर प्रतिष्ठित किया जाय।</span></p>
<blockquote><p><span class="fullpost"><b>नरेन्द्र मोदी:</b> सुना है, तुम हिन्दुत्व के सबसे बड़े पैरोकार बनने चले हो!</span><br />
<span class="fullpost"><b>वरुण गांधी: </b>बेअदबी माफ, क्या मैं उम्मीद करूं कि मेरी शोहरत हुजूर मुझसे छीन न लेंगे।</span></p></blockquote>
<p><span class="fullpost">(मोदी अपना प्रभाव ’सबसे बड़े पैरोकार’ पर केन्द्रित रखते हैं। लक्ष्य ’हिन्दुत्व की पैरोकारी’ को लेकर तिरस्कार का भाव है। वरुण विनम्र विनोद कर बैठते हैं। नम्रता से व्यंग का पुट भी मिल जाता है।)</span></p>
<h3><span style="font-weight: normal;"><span class="fullpost"><span style="font-size: 130%;">४) वैपरीत्य-अभेद:</span> </span></span></h3>
<p><span class="fullpost">विपरीत बात कही जाय पर ध्वनि आवृत्ति की ही आये।<br />
दो पार्टियों के दो नेता जिन्हें चुनाव का टिकट नहीं मिल सका :</span></p>
<blockquote><p><span class="fullpost"><b>पहला:</b> आप को टिकट नही मिला न!</span><br />
<span class="fullpost"><b>दूसरा: </b>जी, और आप को तो मिल गया! </span></p></blockquote>
<p><span class="fullpost">(बात ऐसी ही है, जैसे शब्द को उलट दें फिर भी भेद न आये, जैसे ’चम्मच’।)</span></p>
<h3><span style="font-weight: normal;"><span class="fullpost"><span style="font-size: 130%;">५) आधार-आधेय विपर्यय: </span></span></span></h3>
<blockquote><p><span class="fullpost"><b>मतदाता:</b> पिछले १५ वर्षों से आप हर चुनाव में हमसे राम-राज्य का वायदा करते हैं, फिर झांकने भी नहीं आते।</span><br />
<span class="fullpost"><b>नेता:</b> सज्जनों! मैं उन लोगों में नहीं जो आज कुछ तो कल कुछ और ही कहते हैं।</span></p></blockquote>
<p><span class="fullpost">(यहां मतदाता सापेक्षिक सत्य की बात करता है, नेता निरपेक्ष सत्य की।)</span></p>
<h3><span style="font-weight: normal;"><span class="fullpost"><span style="font-size: 130%;">६) मितव्यय:</span> </span></span></h3>
<p><span class="fullpost">बहुत बड़ी बात की संभावना में बात का छोटा सिद्ध होना।<br />
एक प्रत्याशी चुनावी भाषण में:</span></p>
<blockquote><p><span class="fullpost"><b>प्रत्याशी:</b> यदि मैं आपकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सका तो अपने पद से इस्तीफा दे दूंगा।</span><br />
<span class="fullpost"><b>श्रोता: </b>अच्छा हो कि चुनाव ही मत लड़ें।</span></p></blockquote>
<h3><span style="font-weight: normal;"><span class="fullpost"><span style="font-size: 130%;">७) आकांक्षापहरण</span>: </span></span></h3>
<p><span class="fullpost">यहां आकांक्षा का अपहरण हो जाता है। सोचा गया परिवर्तित होकर सामने आता है।<br />
नेता अपनी एक जनसभा में देश की स्थिति पर:</span></p>
<blockquote><p><span class="fullpost"><b>नेता:</b> देश की माली हालत और योजनाओं की क्रियान्विति की दशा देखकर लोग समझ जायेंगे कि देश में कितना भ्रष्टाचार है?</span><br />
<span class="fullpost"><b>मतदाता:</b> और आप जैसे लोगों की माली हालत देखकर लोग कारण भी समझ जायेंगे।</span></p></blockquote>
<p><span class="fullpost"> (यहां मुंह की बात छीन लेने में वाग्वैदग्ध है।) <span style="font-size: 85%;"><br />
</span></span></p>
<div class="info3">बताना जरूरी है: समस्त अवधारणायें उधार ली हैं &#8216;प्रो0 जे0 पाण्डे&#8217; की पुस्तक ’हास्य के सिद्धान्त’ से। जो मेरा है, वह सहज ही समझ जायेंगे आप।</div>
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		<item>
		<title>समाजवाद, लोकतंत्र एवं हमारा नेतृत्व</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2009/02/socialism.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Feb 2009 18:56:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[General Articles]]></category>
		<category><![CDATA[Politics]]></category>
		<category><![CDATA[Socialism]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति एवं समाजवाद]]></category>
		<category><![CDATA[समाजवाद एवं लोकतंत्र]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>हम घोर आश्चर्य और निराशा के घटाटोप में घिर गये हैं। अपने पूर्वजों पर दृष्टि डालते हैं तो देखते हैं कि बहुत से लोग आर्थिक...</p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2009/02/socialism.html">समाजवाद, लोकतंत्र एवं हमारा नेतृत्व</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="has-drop-cap">हम घोर आश्चर्य और निराशा के घटाटोप में घिर गये हैं। अपने पूर्वजों पर दृष्टि डालते हैं तो देखते हैं कि बहुत से लोग आर्थिक दृष्टिकोण से पिछड़े वर्ग के सदस्य न थे। किंतु उन्होने अपनी दौलत को बजाय किसी निजी लक्ष्य में उपयोग करने के देश हित में लगा दिया। वहीं स्वतंत्रता के बाद पढ़े-लिखे और आर्थिक रूप से सम्पन्न लोग अपने सार्वजनिक जीवन को ही मात्र सुधारने में लगे हुए हैं। उन्होंने &#8216;जमीन चोरों&#8217; के लिये देश सेवा छोड़ दी है। </p>



<p>गत छः दशक से &#8216;सेन्सिबल&#8217; कहे जाने वाले लोगों ने इस देश को अनाथ बना दिया है। लोकतंत्र को भीड़तंत्र बना दिया गया है। अंग्रेजों को क्या इसीलिये भगाया गया था कि इस देश की बोटी-बोटी नोंच लें कि इसकी लाश भी पहचानी न जा सके। समाजवाद की व्याख्या हर नेता अपने-अपने ढंग से अलग-अलग कर रहा है, तभी तो हमारा यह प्यारा देश समाजवाद की गोद में कराह रहा है। </p>



<p>मैं ही अकेले अब देखता सुनता नहीं, अब पोते-पोतियों को कंधे पर लादकर बड़े-बूढ़े सभी देख रहे हैं। बाज़ार में कीमतें आसमान छू रही हैं। आंदोलन होते हैं। हमारी सजग सरकार तुरंत दुकानदारों को कड़वी धमकी देती है और जनता को मीठा आश्वासन। इसके बावजूद कीमतें बढ़ती रहती हैं। कोई चारा न देखकर असहाय जनता इन्हें सिर-माथे ले लेती है। यही बार-बार होता है। वाह री नासमझ जनता। हमारी समाजवादी सरकार कोई अच्छा काम क्यों करने लगी? फ़िर बढ़ी कीमतें, फ़िर हाहाकार। एक उलझन सुलझाने के लिये हजारों उलझने पैदा कर दी जाती हैं। समाजवाद की इस नौटंकी को अनेकों वर्षों से हम बेबस निहार रहे हैं।</p>



<h3 class="wp-block-heading">कैसे आयेगा सच्चा समाजवाद</h3>



<p>सुना है पश्चिम जर्मनी के नेता &#8216;डा0 एरहार्ड&#8217; का नाम, जिसने भारत से कहीं अधिक विषम परिस्थितियों से गुजर रहे अपने देश में ग्यारह वर्षों में ही सच्चा समाजवाद ला कर संसार को आश्चर्यचकित कर दिया। एक ओर तो उन्होंने मुद्रास्फ़ीति कम की और दूसरी ओर मूल्यवृद्धि पर लगाम लगायी। मजदूरों से हड़ताल न करने, मजदूरी न बढ़ाने की अपील की, बल्कि उन्हें उत्पादन बढ़ाने के लिये प्रोत्साहित किया। देश में व्याप्त कंट्रोल कोटा-परमिट का धंधा खत्म करके सरकारी फ़िजूलखर्ची कम की। फ़ालतू महकमों को बंद करके सरकारी नौकरों की भीड़भाड़ में छंटनी की। मूल्यों में कमी हो जाने से आमदनी में होने वाली बचत बैंकों में जमा करने के लिये प्रोत्साहन दिया। करों में कमी कर दी। कहीं एकाधिकार न हो जाय, अतः हर क्षेत्र में पूर्ण नियंत्रण रखा। विदेशी व्यापारों पर हावी होने के लिये उद्योगपतियों को बढ़ावा दिया।</p>



<p>लेकिन हमारा समाजवादी नेतृत्व इसके लिये कभीं तैयार नहीं हुआ। विलासिता और आरामतलबी में यह संभव भी नहीं है। सन् 1973 में जब यही बात संसद में उठायी गयी कि वेतन, भत्तों और सुविधाओं सहित एक संसद सदस्य पर सरकार प्रतिमाह पाँच हजार रुपये खर्च करती है तो अध्यक्ष महोदय तिलमिला उठे थे। पर, आज तो महाराजाओं जैसी सुविधाओं को हस्तगत करने के लिये देशनायक मारामारी कर रहे हैं। हमारे लीडर समाजवादी हैं। अपने समाज का हमेशा ध्यान रखते हैं। कब पलटेगा पासा?</p>



<p>अब बहुत हो चुका। <a href="https://blog.ramyantar.com/2009/02/first-person.html">जनता</a> बिना कहे नहीं रहेगी अब-</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p>मेरा दिल फेर दो मुझसे ये सौदा हो नहीं सकता।</p>
</blockquote>
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			</item>
		<item>
		<title>उस समाज पर गाज गिरे जिसके तुम नायक</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 01 Feb 2009 05:30:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Article | आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[Essays]]></category>
		<category><![CDATA[Politics]]></category>
		<category><![CDATA[नेताओं की लफ़्फ़ाजी]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति का दलदल]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>एक पार्टी का झंडा लिये एक भीड़ मैदान से गुजरी है। अपनी पड़ोस का कुम्हार उसी में उचक रहा है। उसे मिट्टी का दलदल पता...</p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2009/02/nayak.html">उस समाज पर गाज गिरे जिसके तुम नायक</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="has-drop-cap">एक पार्टी का झंडा लिये एक भीड़ मैदान से गुजरी है। अपनी पड़ोस का कुम्हार उसी में उचक रहा है। उसे मिट्टी का दलदल पता है। राजनीति का भी एक दलदल है, वह क्या जाने? बी0ए0 प्रथम वर्ष की छात्र पंजिका में रजिस्टर्ड बच्चे उत्सुकता से हुजूम देख रहे हैं। पास ही लकड़ी की दुकान पर रंदा चलाने वाला मुझसे पूछ रहा है- &#8220;सभा कब होगी?&#8221; मैने पूछा- &#8220;क्यों?&#8221; उत्तर मिला- &#8220;यूँ ही उत्सुकता है।&#8221;</p>



<p>सोचने लगा, उत्सुकता ही है, उपलब्धि हवा है। दलों के दलदल में फ़ँसा आज का हमारा भारतीय समाज मुखौटों का खेल खेल रहा है। भगवान बचायें। वह दिन कब होगा जब सत्ता सुखदाता होगी। मुझे उस कुम्हार, रंदा चलाने वाले कारीगर और गाइड लेकर घूमने वाले बी0ए0 के विद्यार्थी की दबी आवाज सुनाई देने लगी &#8211;</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p>डूबने वाली कलम-सा मैं लिखा हूँ<br>ब्याज तो क्या मूल से भी कम दिखा हूँ<br>लाभ-शुभ अंकित रहे<br>पर पिट गये मेरे दिवाले ।<br>जिस्म पर लिपटे हुए हैं कफ़न<br>पर कहता दुशाले ।<br>कर गये कुछ लोग क्यों हमको बबूलों के हवाले।</p>
</blockquote>



<p>नेता जी मैदान में ओजस्वी भाषण दे रहे हैं- बहुत से वायदे, बहुत सी मनुहार। नेतागिरी की इस लफ़्फ़ाजी की शल्य-क्रिया जरूरी है। विदा हो बदसलूकी खिदमतगारी। <a href="https://blog.ramyantar.com/2009/01/arman-hain-na-sapne.html">मुझे यह समाज नहीं चाहिये</a>।</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p>उस समाज पर गाज गिरे जिसके तुम नायक।<br>हस्तिमूर्ख हो सका कभीं भी नहीं विनायक।</p>
</blockquote>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2009/02/nayak.html">उस समाज पर गाज गिरे जिसके तुम नायक</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
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			</item>
		<item>
		<title>समय की पहचान और सफल होने के नुस्खे</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2008/11/samay-ki-pahchan.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 09 Nov 2008 10:19:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[General Articles]]></category>
		<category><![CDATA[Politics]]></category>
		<category><![CDATA[छद्म संतत्व]]></category>
		<category><![CDATA[दलित विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[विमर्श की राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[समय का वर्गीकरण]]></category>
		<category><![CDATA[स्त्री विमर्श]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>मैं समय की पहचान कर रहा हूँ। यह प्रयास विचित्र है। मुझे लगा समय समाज को अतिक्रमित नहीं करता- उसे व्यक्त करता है। मेरे अस्तित्व...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="has-drop-cap">मैं समय की पहचान कर रहा हूँ। यह प्रयास विचित्र है। मुझे लगा समय समाज को अतिक्रमित नहीं करता- उसे व्यक्त करता है। मेरे अस्तित्व ने मेरे व्यक्तित्व को अनगिन मौकों पर इस समय और समाज से लड़ते देखा है। मैंने अपनी इस लड़ाई में कहीं न कहीं समय (समाज) की सीमाओं को महसूस किया है और इस सीमाओं से मुक्त होने की चेष्टा में ख़ुद भी इन्ही सीमाओं में बंधता चला गया हूँ।</p>



<p>आज का समय सफलता, असफलता का समय है। इस युग के दो वर्ग किए जा सकते हैं &#8211;&nbsp;</p>



<p><em>1) सफलता का युग, 2) असफलता का युग।</em></p>



<p>मेरे आसपास सफल लोगों की एक लम्बी भीड़ है। मैं सफल उन्हें कह रहा हूँ जो अपने अपने मध्यम बरतते हुए एक भीड़ से हटकर पहचाने जाने वाली शख्सियत बन गए हैं; जिन्होंने समाज को अपने ढंग से देखने की कोशिश में समाज की अतिरंजनाओं से कहीं न कहीं अपने को संयुक्त कर लिया है। मैं सफल लोगों की सफलता का कारण वर्त्तमान युग की प्रकृति से साधर्म्य मानता हूँ।</p>



<h3 class="wp-block-heading has-vivid-red-color has-text-color has-link-color wp-elements-3f17b60436d62c2b429de3a10156ff71">समय का वर्गीकरण तथा सफल लोगों की सफलता के कारण</h3>



<p>अपने समय को पहचानने की कोशिश में मैंने सफल लोगों की सफलता एवं उस सफलता के कारणों को पहचानने की कोशिश की। बहुत कुछ समझ बूझ कर विवेचना से इतर मैंने आज के समय का वर्गीकरण कर दिया है। वस्तुतः यह वर्गीकरण मैंने अपने भुक्त यथार्थ एवं सापेक्ष सामाजिक जुड़ाव से निर्मित किया है, अतः यह पूर्णतः अप्रासंगिक भी हो सकता है (होगा- मुझे आश्चर्य नहीं)।</p>



<h4 class="wp-block-heading">1. अयोग्यता का समय</h4>



<p>मेरा समय अयोग्यता का समय है। अयोग्यता का समय इसलिए कि योग्यता एवं अयोग्यता की विभाजन रेखा बहुत कुछ धुंधली हो गयी है। योग्यता एवं अयोग्यता की कसौटी सफलता बन गयी है। सफल होने के लिए समाज ने अनगिनत उपकरण निर्मित किए। रिश्वतखोरी, नातेदारी, भाई-भतीजावाद, क्षेत्रवाद जातिवाद आदि ने योग्यता एवं अयोग्यता का गुण धर्म छीन लिया। वस्तुतः छिन गयी योग्यता प्राप्त करने की ललक।</p>



<h4 class="wp-block-heading">2. मिथ्यावादिता का समय</h4>



<p>मेरा समय मिथ्यावादिता का समय भी है। सत्य की रोशनी में अब शायद सफलता के सूत्र नहीं ढूंढें जा सकते । झूठ सफलता के न जाने कितने मुलम्मे चढ़ाकर चमक रहा है। सच का मध्यम बरतते हुए सफल होना एक लम्बी जद्दोजहद है, पर झूठ के बल पर सफल होने का करिश्मा रोज हुआ करता है। झूठ जरूरतों के लिए जन्म लेता है और उनकी पूर्ति के लिए अपना विकास करता है। अयोग्यता एवं झूठ समकक्षी हैं। मेरे कस्बे में सभी डॉक्टर एमबीबीएस थे। मुख्या चिकित्साधिकारी ने जांच कराई- एक को छोड़ सभी ने क्लिनिक हफ्ते भर के लिए बंद कर दिए। पर उसी हफ्ते भर के भीतर मुख्य चिकित्साधिकारी का मुंह भी बंद हो गया। मेरे इस कस्बे के इकलौते एमबीबीएस हर वर्ष एक एमबीबीएस पैदा करते हैं- डॉक्टरों की भीड़ बढ़ती जाती है, क्लिनिक खुलते जाते हैं ।</p>



<h4 class="wp-block-heading">3. छद्म संतत्व का समय</h4>



<p>अयोग्यता, मिथ्यावादिता एवं छद्म संतत्व मिलकर एक नए गुणधर्म का विकास करते हैं- वह है छद्म संतत्व। आजका समय छद्म संतत्व का समय है। अयोग्यता ने, मिथ्यावादिता ने सुनहरा आवरण ओढ़ लिया है। सफलता का मुहावरा बन गया है छद्म संतत्व। बिना किसी प्रयास श्रम एवं संघर्ष के यह संतत्व सफलता के नए प्रतिमान गढ़ता है। छलता है हमारी समरसता, हमारी योग्यता, हमारी ग्राह्यता, हमारे बंधुत्व एवं हमारे मन को- कभी भगवा आवरण में, कभी मौलाना टोपी व लम्बी दाढी में, कभी कंघा, कड़ा, कृपाण आदि के प्रतीकों में तो कभी &#8216;धम्म-संघ&#8217; की पहेलियों में।</p>



<h4 class="wp-block-heading">4. स्त्री विमर्श का अबूझा समय</h4>



<p>मेरा समय अबूझा समय है। शासक पुरूष है, शासित स्त्री। पर सदैव बहस मुसाहिबे का विषय बनती है स्त्री। अजीब है कि भाषा पुरुष की है और उस भाषा में विमर्श स्त्री का। कैसी कुटिल नीति है? नहीं, नहीं, यह सफलता का नुस्खा है। स्त्री-विमर्श मुद्दा-ए-ख़ास है। वस्तुतः मेरा समय ही स्त्री-विमर्श का समय है। मेरा एक मित्र कहा करता है, &#8220;किसी भी विमर्श के लिए भाषा चाहिए- अपनी स्व-अर्जित भाषा। आज स्त्री की भाषा कहाँ है, इस पुरुष समाज में? फिर जब अपनी भाषा नहीं तो विमर्श कैसा? कहाँ है स्त्री-विमर्श?&#8221; पर मैं सदा समझाता हूँ उसे कि यह विमर्श स्त्री-अस्मिता के लिए नहीं, पुरुष के अस्तित्व के नए स्वरूप के विकास के लिए है। युगों की भांति एक बार फिर उपकरण है स्त्री। नहीं,नहीं -स्त्री-विमर्श ।</p>



<h4 class="wp-block-heading">5. दलित विमर्श का समय</h4>



<p>स्त्री-विमर्श की ही तरह दलित-विमर्श ने मेरे युग को एक औजार थमा दिया है । दलित-विमर्श का विमर्श दलितों के लिए अथवा दलितों का विमर्श नहीं है, अपितु यह विमर्श दलितों पर विमर्श है । आज यह विमर्श विमर्शकारों की बहुआयामी प्रतिभा एवं कुशल विमर्शकार बनने की काबीलियत का साक्ष्य बन गया है। दलित विमर्शकाऱी ने साहित्य, समाज में सफलता के नए आयाम छुए है। दलित विमर्श एक बौद्धिक नुस्खा है सफलता का। अतः मेरा समय दलित विमर्श का समय है।</p>



<p>वस्तुतः मेरा यह समय <em>1)अयोग्यता, 2) मिथ्यावादिता, 3)छद्म संतत्व, 4)स्त्री-विमर्श एवं 5)दलित विमर्श</em> का समय है और वस्तुतः समय के यही गुणधर्म समय के स्वरूप की निर्मिति के औजार भी हैं।</p>



<p>मेरा यह वर्गीकरण उन सभी विभूतियों को अपवाद स्वरुप मानता है जिन्होंने अपनी क्षमता, कार्यकुशलता, श्रम एवं योग्यता से सफलता के अप्रतिम कीर्तिमान गढ़े हैं।</p>
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