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	<title>Translated Articles Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</title>
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	<description>हिंदी ब्लॉग। साहित्य, भाषा, संस्कृति, लोक व शास्त्र से संयुक्त। कविता, कहानी, समीक्षा, निबन्ध, नाटक एवं अनुवाद का सहज प्रकाशन। लोक साहित्य का रंग भी।</description>
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	<title>Translated Articles Archives - Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</title>
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		<title>आधुनिक मनुष्य कौन? : भाग 2</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 20 Aug 2015 23:17:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Article | आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[Translated Articles]]></category>
		<category><![CDATA[Carl Gustav Jung]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>[डॉ० कार्ल गुस्ताव युंग (Carl Gustav Jung) का यह आलेख मूल रूप में तो पढ़ने का अवसर नहीं मिला, पर लगभग पचास साल पहले ’भारती’ (भवन...</p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2015/08/modernity-carl-jung.html">आधुनिक मनुष्य कौन? : भाग 2</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<div style="text-align: justify;"><span style="color: #38761d;"><span style="background-color: white; font-family: 'Noto Sans Devanagari'; font-size: 16px; line-height: 24px;">[</span><a style="background-color: white; border: 0px; font-family: 'Noto Sans Devanagari'; font-size: 16px; font-stretch: inherit; line-height: 24px; margin: 0px; outline: none; padding: 0px; text-decoration: none; transition: all 0.25s; vertical-align: baseline;" href="https://en.wikipedia.org/wiki/Carl_Jung" target="_blank" rel="nofollow noopener">डॉ० कार्ल गुस्ताव युंग (Carl Gustav Jung)</a><span style="background-color: white; font-family: 'Noto Sans Devanagari'; font-size: 16px; line-height: 24px;"> का यह आलेख मूल रूप में तो पढ़ने का अवसर नहीं मिला, पर लगभग पचास साल पहले ’भारती’ (भवन की पत्रिका) में इस आलेख का हिन्दी रूपांतर प्रकाशित हुआ था, जिसे अपने पिताजी की संग्रहित किताबों-पत्रिकाओं को उलटते-पलटते मैंने पाया। आधुनिक मनुष्य कौन?- प्रश्न को सम्यक विचारता यह आलेख सदैव प्रासंगिक जान पड़ा मुझे। भारती (भवन की पत्रिका) के १५ नवम्बर १९६४ के अंक से साभार यह आलेख प्रस्तुत है। अनुवाद ’ऐन्द्रिला’ का है। अनुवादक और पत्रिका दोनों का आभार। प्रस्तुत है <a href="https://blog.ramyantar.com/2015/08/who-is-modern-Carl-Jung.html" target="_blank" rel="noopener">पिछली प्रविष्टि</a> का शेषभाग -]</span></span></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<h3 style="background-color: white; border: 0px; color: #444444; font-family: 'Noto Sans Devanagari'; font-size: 25.6000003814697px; font-stretch: inherit; margin: 0px 0px 0.6em; padding: 0px; position: relative; text-align: justify; vertical-align: baseline;"><span style="font-weight: normal;">आधुनिक मनुष्य कौन? &#8211; डॉ० कार्ल गुस्ताव युंग </span></h3>
<div style="text-align: justify;">
<div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2015/08/Carl2BGustav2BJung.webp" type="image/webp" /><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignright" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2015/08/Carl2BGustav2BJung.png?x47177" width="421" height="254" border="0" /></picture></div>
<p><span class="first-letter">मैं</span> जानता हूँ कि कुशलता का विचार  तथाकथित आधुनिकों को विशेष रूप से अरुचिकर होता है, क्योंकि वह उन्हें बहुत ही दुखद तरीके से उनकी प्रवंचनाओं और पाखण्डों की याद दिलाता है। पर इसी कारण हम इस चीज को आधुनिक मनुष्य का निर्णायक माप-दण्ड बनाने से बाधित नहीं हो सकते। बल्कि हम ऐसा करने को बाध्य होते हैं, क्योंकि यदि वह कुशल और पुख्ता नहीं है, तो जो मनुष्य आधुनिकता का दावा करता है वह एक स्वच्छन्दाचारी जुआरी के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। उसे उच्चतम कक्षा का कुशल व्यक्ति होना चाहिए क्योंकि यदि वह अपनी सृजनात्मक क्षमता द्वारा परम्परा से सम्बन्ध-विच्छेद से उत्पन्न क्षति की पूर्ति करने में समर्थ न हो, तो वह भूतकाल के प्रति निपट बेईमान ही कहा जा सकेगा। यह निरी बाज़ीगरी होगी कि भूतकाल के इनकार को और वर्तमान चेतना को एक ही वस्तु के रूप में देखें।</p>
<p>’आज’, ’विगत कल’ और ’आगामी कल’ के बीच खड़ा है, और वह भूत और भविष्य के बीच की संयोजक कड़ी का निर्माण करता है; उसका और कोई अर्थ और प्रयोजन नहीं है। वर्तमान संक्रान्ति की प्रक्रिया का प्रतिनिधित्व करता है, और वही व्यक्ति अपने को आधुनिक कह सकता है, जो इस अर्थ में उसके बारे में सचेतन है।</p>
</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">कई लोग अपने को आधुनिक कहते हैं, खासकर वे लोग जो तथाकथित आधुनिक है, कहिए कि नक़ली आधुनिक हैं। इसी से प्रायः सच्चा आधुनिक मनुष्य उन लोगों के बीच पाया जाता है, जो अपने को पुरातनवादी कहते हैं। पर्याप्त कारणों से ही वह इस स्थिति को स्वीकार करता है। एक ओर वह इसलिए भूतकाल का आग्रह रखता है, क्योंकि उसे परम्परा से उसके सम्बन्ध-विच्छेद के दौरान एक समतुला साधनी होती है, दूसरे उसके मन पर अपराध का एक भार रहता है, जिसका उल्लेख पहले हो चुका है। दूसरी ओर छद्म आधुनिक कहे जाने से वह बचना चाहता है।</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">प्रत्येक सद्गुण का एक बुरा पक्ष भी होता है, और कोई भी अच्छी वस्तु, एक प्रत्यक्ष समानान्तर बुराई पैदा किए बिना जगत में नहीं आ सकती। यह एक दुखद तथ्य है। फिर यह एक खतरा भी है कि वर्तमान की सचेतनता भ्रान्ति पर आधारित एक उन्नयन के आवेश की ओर भी ले जा सकती है; भ्रान्ति यह होती है कि हम मानव जाति के इतिहास का चरम उत्कर्ष हैं, हम अनगिनत शताब्दियों की परिपूर्ति और परम निष्पत्ति हैं। यदि हम इस बात को स्वीकृति देते हैं तो हमें समझना चाहिए कि यह हमारी निराश्रयता की एक साभिमान स्वीकृति के अतिरिक्त और कुछ नहीं है: हम युग-युगान्तरों की आशाओं और प्रत्याशाओं की निष्फलता भी हैं।</div>
<div></div>
<div style="text-align: justify;">विचार करिए की दो हज़ार वर्षों तक क्रिश्चियन आदर्शों की प्रतिष्ठा होने के बाद भी मसीहा क्राइस्ट लौटकर नहीं आया और न स्वर्ग का राज्य आया, बल्कि उसके दौरान , उसकी पराकाष्ठा पर आया, क्रिश्चियन राष्ट्रों के बीच विश्व युद्ध, उसके कटीले तारों के घेरे और जहरीली गैसें। स्वर्ग और पृथ्वी पर यह कैसा दुःखान्तिक दृश्य है।</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">इस भीषण चित्र के सम्मुख हमें फिर से विनम्र हो जाना चाहिए। यह सच है कि आधुनिक मनुष्य एक चरम कोटि है, चरम प्रतिफलन है, पर आने वाले कल वह भी अतिक्रान्त हो जायेगा। बेशक वह युगान्तरव्यापी विकास की चरम निष्पत्ति है, पर साथ ही वह मानव जाति की आशाओं की निकृष्टतम  कल्पनीय निराशा और विफलता भी है।</div>
<div></div>
<div style="text-align: justify;">आधुनिक मनुष्य इस बात से अवगत है। उसने देखा जाना है कि विज्ञान, तकनालॉजी और संगठन कितने कल्याणकारी हैं, पर वह यह भी जानता है वे कितने दुःखान्तक भी हो सकते हैं। उसने यह भी देखा है कि सदाशयी सरकारों ने &#8211; ’शान्तिकाल में युद्ध की तैयारी करो!’ &#8211; वाले सिद्धान्त के आधार पर, इतनी अच्छी तरह शान्ति का मार्ग निर्माण किया है कि यूरप लगभग छिन्न-भिन्न हो गया है। और जहाँ तक आदर्शों की बात है, क्रिश्चियन चर्च, मानवों का भाईचारा, अन्तर्राष्ट्रीय सामाजिक प्रजातंत्र और आर्थिक प्रयोजनों का संघटन आदि सारी ही आदर्श प्रवृत्तियाँ सत्य की अग्निपरीक्षा  में विफल हो चुकी हैं।</div>
<div></div>
<div style="text-align: justify;">आज दो-दो भीषण महायुद्धों से गुज़रने के बाद, हम फिर से वही आशावाद, वही संगठन, वही राजनीतिक अभीप्सायें, वही बड़े-बड़े शब्द और सदुक्तियाँ पनपती देख रहे हैं। क्या हमारा यह भय स्वाभाविक ही नहीं है, कि ये सारी प्रवृत्तियाँ, फिर से दुःखान्तक परिणाम में ही विफल हो सकती हैं। युद्ध को अवैध बना देने की सारी सन्धियों के बावजूद हम सन्दिग्ध ही बने रहते हैं, जबकि हम हृदय से उनके लिए सम्पूर्ण सफलता चाहते हैं। ऐसे हर कल्याणकारी प्रयत्न के पीछे, उसके तल में एक सन्देह का काँटा खटकता  रहता है। कुल मिलाकर मैं मानता हूँ कि यह कहना अत्युक्ति नहीं होगी कि आधुनिक मनुष्य मनोविज्ञानतः एक प्राणहारी आघात से पीड़ित है और उसके परिणामस्वरूप वह अनिश्चय की स्थिति में पड़ गया है। इस अनिश्चय की अभेद्य अन्ध कुहा के भीतर से निश्चय की नयी चेतना भूमिका का जो आविष्कार करेगा, वही सच्चे अर्थों में ’आधुनिक मनुष्य’ कहा जा सकेगा।</p>
<div></div>
<div style="text-align: center;">&#8211;समाप्त&#8211;</div>
</div>
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		<title>आधुनिक मनुष्य कौन? (आलेख)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 16 Aug 2015 07:13:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Article | आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[Translated Articles]]></category>
		<category><![CDATA[Carl Gustav Jung]]></category>
		<category><![CDATA[Modernity]]></category>
		<category><![CDATA[आधुनिक मनुष्य]]></category>
		<category><![CDATA[आधुनिकता]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>आधुनिक मनुष्य कौन?: डॉ० कार्ल गुस्ताव युंग जिसे हम आधुनिक मनुष्य कहते हैं, जो तात्कालिक वर्तमान के प्रति सचेतन है, वह किसी भी सूरत में...</p>
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<p><a href="https://en.wikipedia.org/wiki/Carl_Jung" target="_blank" rel="noreferrer noopener">डॉ० कार्ल गुस्ताव युंग (Carl Gustav Jung)</a> का आधुनिक मनुष्य कौन? आलेख मूल रूप में तो पढ़ने का अवसर नहीं मिला, पर लगभग पचास साल पहले ’भारती’ (भवन की पत्रिका) में इस आलेख का हिन्दी रूपांतर प्रकाशित हुआ था, जिसे अपने पिताजी की संग्रहित किताबों-पत्रिकाओं को उलटते-पलटते मैंने पाया। आधुनिक मनुष्य कौन?- प्रश्न को सम्यक विचारता यह आलेख सदैव प्रासंगिक जान पड़ा मुझे। भारती (भवन की पत्रिका) के १५ नवम्बर १९६४ के अंक से साभार यह आलेख प्रस्तुत है। अनुवाद ’ऐन्द्रिला’ का है। अनुवादक और पत्रिका दोनों का आभार।</p>





<h3 class="has-luminous-vivid-orange-color has-text-color wp-block-heading">आधुनिक मनुष्य कौन?: डॉ० कार्ल गुस्ताव युंग </h3>



<p>जिसे हम आधुनिक मनुष्य कहते हैं, जो तात्कालिक वर्तमान के प्रति सचेतन है, वह किसी भी सूरत में औसत आदमी तो नहीं ही है। आधुनिक मनुष्य वही है, जो चोटी पर खड़ा है, जो दुनिया के छोर पर खड़ा है, उसके सामने है भविष्य की खाई, और उसके मस्तक पर है आकाश, और उसके पादप्रान्त में समस्त मनुष्य जाति है, अपने उस इतिहास को समेटे, जो आदिम कुहेलिका में अन्तर्धान हो जाता है। आधुनिक मनुष्य, या यों कहें कि तात्कालिक वर्तमान का मनुष्य, मुश्किल से ही देखने को मिलता है। </p>



<p>आधुनिकता की संज्ञा को सार्थक कर सकें, ऐसे लोग विरल ही होते हैं, क्योंकि उनमें पराकोटि की सचेतनता होना आवश्यक होता है। इसी से सम्पूर्ण रूप से वर्तमान का होने का अर्थ होता है मनुष्य के नाते अपने अस्तित्व के प्रति सम्पूर्ण रूप से सचेतन होना। इसके लिए अत्यन्त गहरी और व्यापक सचेतनता की आवश्यकता होती है, इससे कम से कम अचेतनता को ही अवकाश हो सकता है। यह बहुत स्पष्ट समझ में आ जाना चाहिए कि वर्तमान में जीने का निरा तथ्य ही किसी मनुष्य को आधुनिक नहीं बना देता; क्योंकि उस स्थिति में वर्तमान में जीने वाला हर आदमी आधुनिकता की संज्ञा पा जायेगा। केवल वही मनुष्य आधुनिक कहा जा सकता है, जो वर्तमान के प्रति सम्पूर्ण रूप से सचेतन है।</p>



<div class="wp-block-media-text has-media-on-the-right is-stacked-on-mobile is-image-fill has-background" style="background-color:#f5f5f5"><figure class="wp-block-media-text__media" style="background-image:url(https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2015/08/Carl2BGustav2BJung.jpg);background-position:0% 53%"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2015/08/Carl2BGustav2BJung.webp 320w" type="image/webp" /><img decoding="async" width="320" height="187" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2015/08/Carl2BGustav2BJung.jpg?x47177" alt="आधुनिक मनुष्य कौन?" class="wp-image-86 size-full" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2015/08/Carl2BGustav2BJung.jpg 320w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2015/08/Carl2BGustav2BJung-300x175.jpg 300w" sizes="(max-width: 320px) 100vw, 320px" /></picture></figure><div class="wp-block-media-text__content">
<p>जिस मनुष्य को हम न्यायतः आधुनिक कह सकते हैं, वह अकेला होता है। वह आवश्यक रूप से और सर्वकाल अकेला ही होता है। क्योंकि वर्तमान के प्रति पूर्णतर सचेतना की ओर ले जाने वाला उसका हर अगला कदम उसे समुदाय की सर्व सहभागिता या सर्वसामान्य अचेतना में डूबे रहने से परे, और भी परे ले जाता है। उसके हर अगले कदम का अर्थ होता है, उस सर्वाश्लेषी, पूर्वकालीन अचेतना से उसे विच्छिन्न करना, जो सम्पूर्ण सामुदायिक मानवता को आच्छादित किए रहती है। हमारी आज की सभ्यताओं में भी मनोविज्ञानतः जो लोग मानव समुदाय के निम्नतम स्तर में होते हैं, वे आदिम जातियों की तरह ही अचेतन अवस्था में जीते हैं। उससे ऊपर के स्तर पर जो लोग जीते हैं, वे उस चेतनास्तर को व्यक्त करते हैं, जो मानवीय संस्कृति के आरम्भिक कालों की समकक्षिनी होती हैं। और जो सर्वसामान्य मानव-समुदाय के उच्चतम स्तर के लोग होते हैं; उनकी चेतना गत कुछ शताब्दियों के जीवन के साथ कदम मिलाकर चलने में समर्थ होती है।</p>
</div></div>



<p>हमारी संज्ञा के अर्थ में जो मनुष्य आधुनिक है वही यथार्थ में वर्तमान में जीता है, उसी की चेतना सच्चे अर्थों में अधुनातन होती है और वही यह अनुभव करता है कि पूर्वगामी स्तरों की समकक्ष जीवन-चर्चायें उसे बेस्वाद, निश्चेतन और अर्थहीन लगती हैं। ऐतिहासिक दृष्टिकोण के अलावा, उन विगत दुनियाओं के मूल्यों और प्रयत्नों में उन्हें दिलचस्पी नहीं होती। इस प्रकार शब्द के गहिरतम अर्थ में वह अनैतिहासिक हो जाता है, और उस मानव समुदाय से वह अपने को अलग कर लेता है, जो सम्पूर्ण रूप से परम्परा की परिधियों में जीता है। निश्चय ही, वह तभी सम्पूर्ण रूप से आधुनिक होता है, जब वह दुनिया के छोर पर आ खड़ा होता है; जो कुछ त्यक्त, तिरस्कृत और विगत हो चुका होता है, उस सबको  वह पीछे छोड़ देता है, और यह स्वीकार करता है कि वह एक शून्य के सामने खड़ा है, जिसमें से सारी चीजें उत्पन्न हो सकती हैं।</p>



<p>इन शब्दों को निरी खोखली ध्वनियाँ माना जा सकता है, और इनके अर्थों को वाहियात कह कर तुच्छ किया जा सकता है। वर्तमान की चेतना को प्रभावित करने से ज्यादा आसान और कुछ नहीं हो सकता। वास्तव में ऐसे निकम्मे लोगों की कमी नहीं है जो अपने अनेक दायित्वों और विकास के कई बीच में पड़ने वाले स्तरों पर से छलाँग मार कर आधुनिक मानव की बगल में आ खड़े होते हैं और आधुनिकता का दावा करने लगते हैं। ऐसे लोग रक्त-शोषक प्रेत की तरह होते हैं, जिनके खोखलेपन के सच्चे आधुनिक मानव का अस्पर्धनीय एकाकीपन मान लिया जाता है और जो उसकी प्रतिष्ठा को आघात पहुँचाता है। यह सच्चा आधुनिक मानव और उसी के वर्ग के अन्य लोग जो संख्या में बहुत ही कम होते हैं, तथाकथित नकली आधुनिकों के बादली प्रेतों से आच्छादित होकर, सामान्य जन-समुदाय की स्थूल दृष्टि से छुपे रहते है। इससे बचने का कोई उपाय नहीं है; आधुनिक मनुष्य तलबी और सन्देह का पात्र होता है; और भूतकाल में भी उसकी स्थिति सदा यही रही है।</p>



<p>आधुनिकता की ईमानदार साधना का अर्थ होता है अपने आप ही स्वयं को दीवालिया घोषित कर देना, एक नए अर्थ में गरीबी और शील का व्रत ले लेना, और इससे भी अधिक कष्टप्रद कदम है उसका उस गौरव के प्रभामण्डल का स्वयं ही त्याग कर देना, जिसके द्वारा इतिहास अपनी स्वीकृति के रूप में किसी भी व्यक्तित्व को मण्डित करता है। अनैतिहासिक होना एक ’प्रोमेथियन’ पाप है और इस अर्थ में सच्चा आधुनिक मनुष्य पाप में जीता है। चेतना का उच्चतर स्तर एक अपराध के गुरुतर भार की तरह होता है। लेकिन जैसा मैंने कहा है, लेकिन वही व्यक्ति, वर्तमान की सम्पूर्ण चेतना को उपलब्ध कर सकता है जो चेतना की भूतकालीन भूमिकाओं से उत्तीर्ण हो चुका होता है और अपनी दुनिया द्वारा नियुक्त सारे कर्त्तव्यों को जो परिपूर्ण रूप से सम्पन्न कर चुका होता है। ऐसा करने के लिए उसे उत्कृष्ट अर्थ में पुख्ता और कुशल होना चाहिए, यानि औरों जितनी उपलब्धि तो उसकी होनी ही चाहिए, पर उससे कुछ अधिक होनी चाहिए। इन्हीं गुणों के द्वारा वह चेतना की अगली उच्चतम भूमिका प्राप्त कर सकता है।</p>



<p>क्रमशः- <a href="https://blog.ramyantar.com/2015/08/modernity-carl-jung.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">अगली प्रविष्टि में पूर्ण..</a>.</p>
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			</item>
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		<title>पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-7</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2011/02/premature-obituary-of-book-7.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 08 Feb 2011 15:54:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Translated Articles]]></category>
		<category><![CDATA[Translated Works]]></category>
		<category><![CDATA[Mario Vargas Llosa]]></category>
		<category><![CDATA[Nobel Prize]]></category>
		<category><![CDATA[नोबेल पुरस्कार]]></category>
		<category><![CDATA[मारिओ वर्गास लोसा]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य क्यों?]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>प्रस्तुत है पेरू के प्रख्यात लेखक मारिओ वर्गास लोसा के एक महत्वपूर्ण, रोचक लेख The Premature Obituary of the Book: Why Literature का हिन्दी रूपान्तर।...</p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2011/02/premature-obituary-of-book-7.html">पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-7</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p>प्रस्तुत है पेरू के प्रख्यात लेखक <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Mario_Vargas_Llosa">मारिओ वर्गास लोसा</a> के एक महत्वपूर्ण, रोचक लेख The Premature Obituary of the Book: Why Literature का हिन्दी रूपान्तर। &#8216;लोसा&#8217; साहित्य के लिए आम हो चली इस धारणा पर चिन्तित होते हैं कि साहित्य मूलतः अन्य मनोरंजन माध्यमों की तरह एक मनोरंजन है, जिसके लिए समय और विलासिता दोनों पर्याप्त जरूरी हैं। साहित्य-पठन के निरन्तर ह्रास को भी रेखांकित करता है यह आलेख। इस चिट्ठे पर क्रमशः सम्पूर्ण आलेख हिन्दी रूपांतर के रूप में उपलब्ध होगा । <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/10/premature-obituary-of-book.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">पहली</a>, <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/11/premature-obituary-of-book-2.html">दूसरी</a>, <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/11/premature-obituary-of-book-3.html">तीसरी</a>, <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/12/premature-obituary-of-book-4.html">चौथी</a>, <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/12/premature-obituary-of-book-5.html">पांचवी</a> और <a href="https://blog.ramyantar.com/2011/01/premature-obituary-of-book-6.html">छठीं कड़ी</a> के बाद प्रस्तुत है <a href="https://blog.ramyantar.com/2011/02/premature-obituary-of-book-7.html">सातवीं और अन्तिम कड़ी</a>।</p>



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<p>इस प्रकार साहित्य की अवास्तविकताएँ, साहित्य की मिथ्यावादितायें भी मानव की गुह्यतम वास्तविकताओं के ज्ञान के लिए मूल्यवान साधन हैं। जिन सत्यों को यह अभिव्यक्त करता है वह हमेशा खुशामदी करने वाले ही नहीं होते और कभीं-कभीं तो जो हमारी छवि उपन्यासों और कविताओं के दर्पण में उभरती है वह राक्षस की छवि होती है। ऐसा तब होता है जब हम वैसी अप्रिय कामुक प्राणि-हत्याओं के बारे में पढ़ते हैं जिसकी कल्पना डि सेड (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Marquis_de_Sade">Marquis de Sade</a>) ने की है या अंधेरे में की गयी नोंच-चोंथ  और निर्मम प्राणहरण की घटनायें जिनसे सचर-मासोक (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Sacher-Masoch">Sacher-Masoch</a>) और बेटे (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Bataille">Bataille</a>) की अभिशापित पुस्तकें भरीं पड़ी हैं, पढ़ते हैं। उन समयों में ये दर्पण इतने अपराधी, इतने भयंकर हो जाते हैं  कि उधर देखना बर्दास्त के बाहर हो जाता है। </p>



<p>फिर भी इनके पन्नों में वर्णित रक्तपात, अवमानना और दुर्दान्त पीड़क घटनायें उतनी अधिक बुरी बातें नहीं हैं, जितना कि यह पता लग जाना कि यह हिंसात्मकता व ज्यादती हमलोगों के लिए अजनबी नहीं है। यह हमारी मानवता का ही बहुत बड़ा हिस्सा है। ये उखाड़ फेंकने को लालायित रहने वाले राक्षस हमारे व्यक्तित्व के अत्यंत अंतरंग अवकाश के गह्वरों में छिपे रहते हैं, और अपने छिपे हुए अंधकारपूर्ण स्थान से वे अनुकूल मौके की तलाश करते रहते हैं ताकि वे स्वयं का अधिकार जमा सकें, अपनी बेकाबू हुई इच्छाओं को लागू कर सकें जिनसे बौद्धिक क्षमता, सामुदायिक एकता और यहाँ तक कि अस्तित्व तक भी मटियामेट हो जाता है।</p>



<p>और यह विज्ञान नहीं था जिसने साहसपूर्ण खोज की मानव मस्तिष्क के इन दुष्कृतिकर स्थानों की और खोज की उस विध्वंसक और आत्मविनाशक शक्ति की जिसको यह रूप देता है। केवल साहित्य ही था जिसने यह खोज की। साहित्य के बिना संसार करीब-करीब अंधा ही बना रहेगा- उन भयानक गहराइयों के प्रति, जिनको जानने-देखने की हमें नितान्त आवश्यकता है।</p>



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<div class="wp-block-image">
<figure class="alignright size-full is-resized"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2011/02/Llosa.webp" type="image/webp" /><img decoding="async" width="100" height="126" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2011/02/Llosa.jpg?x47177" alt="Why Literature" class="wp-image-231" style="width:198px;height:auto"/></picture><figcaption class="wp-element-caption">Mario Vargas Llosa</figcaption></figure>
</div>


<p>मारिओ वर्गास लोसा पेरू&nbsp; के चर्चित एवं प्रतिष्ठित साहित्यकार होने के साथ साथ कुशल पत्रकार और राजनीतिज्ञ भी हैं। इन्हें वर्ष २०१० के लिए साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है ।<br><strong>जन्म :</strong> २८ मार्च, १९३६<br><strong>स्थान :</strong> अरेक्विपा (पेरू)&nbsp;<br><strong>रचनाएं :</strong> द चलेंज–१९५७; हेड्स –१९५९; द सिटी एण्ड द डौग्स- १९६२; द ग्रीन हाउस–१९६६;&nbsp; प्युप्स –१९६७; कन्वर्सेसन्स इन द कैथेड्रल – १९६९; पैंटोजा एण्ड द स्पेशियल -१९७३; आंट जूली अण्ड स्क्रिप्टराइटर-१९७७; द एण्ड ऑफ़ द वर्ल्ड वार-१९८१; मायता हिस्ट्री-१९८४; हू किल्ड पलोमिनो मोलेरो-१९८६;द स्टोरीटेलर-१९८७;प्रेज़ ऑफ़ द स्टेपमदर-१९८८;डेथ इन द एण्डेस-१९९३; आत्मकथा–द शूटिंग फ़िश-१९९३।</p>



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<p>बिना साहित्य के यह संसार, यह डरावना संसार, जिसका खाका मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ, असभ्य, खतरनाक, असंवेदनशील, भद्दी भाषा बोलने वाला, अज्ञानी, आदिम मनोवृत्तियों से भरा अनुचित भावनाओं और भद्दे भोथरे प्रेम-व्यवहार वाला होगा, और इसका मुख्य-कार्य होगा सुनिश्चितता बनाना और शाश्वत रूप से मानव-जाति का शक्ति के आगे समर्पित हो जाना। इस तरह से विशुद्ध रूप में यह संसार पाशविक संसार भी हो जायेगा। इसमें आदिम मनोभाव ही जीवन के नित्य के क्रियाकलापों का नियमन करेंगे, अस्तित्व के लिये संघर्ष ही कार्यों के सम्पादन का प्रधान गुण होगा, अज्ञात का भय सताता रहेगा, कार्य होंगे भौतिक आवश्यकताओं की ही पूर्ति के। आध्यात्मिकता के लिये कोई जगह नहीं होगी। सबसे बड़ी बात यह होगी कि इस संसार में जीवन में एकरूपता ही बनी रहेगी, जीवन को हमेशा निराशावाद की छाया घेरे रहेगी, यह अनुभव घर किये रहेगा कि जैसा जीवन होना था वह यही है, और यह हमेशा-हमेशा के लिये ऐसा ही रहेगा, और कोई भी कुछ भी इसमें परिवर्तन नहीं कर सकता।</p>



<p>कोई भी जब ऐसे संसार की कल्पना करता है तो बरबस ही उसके सामने आदिमवासियों का वह चित्र सामने आ जाता है जो बाघाम्बर पहनते थे, जो छोटॆ-छोटे जादुई धार्मिक संप्रदाय के थे, जिनका निवास आधुनिकता के एकदम हाशिए पर लैटिन अमेरिका, ओसीनिया और अफ्रीका में था। लेकिन मेरे मस्तिष्क में एक दूसरी असफलता का चित्र है। जिस भयाकृति की मैं चेतावनी दे रहा हूँ वह अविकास नहीं, अतिविकास की है. तकनीक के विकास और उसके प्रति हमारी अति आज्ञाकारिता के चलते हमें भविष्य में ऐसे समाज की कल्पना दिखायी दे रही है जो कम्प्यूटर की स्क्रीन और स्पीकरों से भरी होगी और बिना पुस्तकों की होगी। बिना पुस्तकों का समाज या यों कहें कि बिना साहित्य का समाज वैसा ही होगा जैसा भौतिक शास्त्र के युग में मध्ययुग की अलकेमी (तुच्छ धातुओं से सोना बनाने की कला) थी, जैसी पुरातन पंथियों की उत्सुकता मीडिया-सभ्यता की चहारदीवारों के लिए मनस्तापग्रस्त अल्पसंख्यकों द्वारा दिखायी जाती थी। मुझे भय है कि अपनी समृद्धि और शक्ति के बावजूद, अपने उच्च जीवन-स्तर और वैज्ञानिक उपलब्धि के बावजूद, यह साइबरनेटिक दुनिया बहुत अधिक असभ्य और पूरी तरह से अनात्मक रहेगी, मानवता पदच्युत हो जायेगी, साहित्य के बाद के मशीनीकरण से स्वतंत्रता छिन जायेगी।</p>



<p>सच में, यह पूरी तरह से असंभव है कि इस तरह का भयावना और अप्रिय कल्पनालोक कभीं आयेगा भी। हमारी कहानी का अंत, हमारे इतिहास की समाप्ति, अभीं लिखी नहीं गयी है, और न इसके बारे में पूर्व सुनिश्चित है। हमें जो होना है, वह पूरी तरह से हमारी परिकल्पना और हमारी इच्छा पर निर्भर करता है। लेकिन यदि हमें अपनी कल्पना का भिखमंगापन दूर करने की चाहत है, और इच्छा है कि वह मूल्यवान असंतोष विदा हो जाय जो हमारी संवेदनाओं को सीमित करता है, हमें लचीली और श्रमसाध्य बातचीत की शिक्षा देता है, जो हमारी स्वतंत्रता को कमजोर बना देता है, तो हमें लगना होगा। संक्षेप में कहें तो हमें पढ़ना होगा।</p>



<p class="has-text-align-center">&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-समाप्त&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2011/02/premature-obituary-of-book-7.html">पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-7</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
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		<title>पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-6</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2011/01/premature-obituary-of-book-6.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 26 Jan 2011 12:29:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Translated Articles]]></category>
		<category><![CDATA[Translated Works]]></category>
		<category><![CDATA[Mario Vargas Llosa]]></category>
		<category><![CDATA[Nobel Prize]]></category>
		<category><![CDATA[नोबेल पुरस्कार]]></category>
		<category><![CDATA[मारिओ वर्गास लोसा]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य क्यों?]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>प्रस्तुत है पेरू के प्रख्यात लेखक मारिओ वर्गास लोसा के एक महत्वपूर्ण, रोचक लेख का हिन्दी रूपान्तर। &#8216;लोसा&#8217; साहित्य के लिए आम हो चली इस...</p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2011/01/premature-obituary-of-book-6.html">पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-6</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p>प्रस्तुत है पेरू के प्रख्यात लेखक <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Mario_Vargas_Llosa">मारिओ वर्गास लोसा</a> के एक महत्वपूर्ण, रोचक लेख का हिन्दी रूपान्तर। &#8216;लोसा&#8217; साहित्य के लिए आम हो चली इस धारणा पर चिन्तित होते हैं कि साहित्य मूलतः अन्य मनोरंजन माध्यमों की तरह एक मनोरंजन है, जिसके लिए समय और विलासिता दोनों पर्याप्त जरूरी हैं। साहित्य-पठन के निरन्तर ह्रास को भी रेखांकित करता है यह आलेख। इस चिट्ठे पर क्रमशः सम्पूर्ण आलेख हिन्दी रूपांतर के रूप में उपलब्ध होगा। <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/10/premature-obituary-of-book.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">पहली</a>, <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/11/premature-obituary-of-book-2.html">दूसरी</a>, <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/11/premature-obituary-of-book-3.html">तीसरी</a>, <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/12/premature-obituary-of-book-4.html">चौथी</a>, <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/12/premature-obituary-of-book-5.html">पांचवी</a> कड़ी के बाद प्रस्तुत है छठीं कड़ी।</p>



<hr class="wp-block-separator has-text-color has-luminous-vivid-orange-color has-alpha-channel-opacity has-luminous-vivid-orange-background-color has-background is-style-wide"/>



<p>चलें, हम एक मजेदार ऐतिहासिक पुननिर्माण का प्रयास करें. हम एक ऐसे विश्व की परिकल्पना करें जिसने कविता या उपन्यास न पढ़ा हो। ऐसी क्षयग्रस्त सभ्यता में, जिसमें गुर्राहटों या वनमानुषी चेष्टाओं से लटपटी शब्दावली हो, कुछ खास तरहके विशेषणॊं को जगह नहीं मिल पायेगी। वे विशेषण होंगे- क्विजोटिक(<a href="http://en.wiktionary.org/wiki/quixotic">quixotic</a>), काफकेस्क (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Kafkaesque">kafkaesque</a>), रैबेलेशियन (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Rabelaisian">Rabelaisian</a>), ऑरवेलियन (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Orwellian">Orwellian</a>), सैडिस्टिक (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Sadistic">sadistic</a>) मासोचिस्टिक (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Masochistic">masochistic</a>) &#8211; इन सबकी अपनी उत्पत्ति भूमि साहित्यिक है। बिलकुल पक्की बात है कि हमें अपवित्र लोग मिलेंगे, स्वपीड़क मिलेंगे, उत्पीड़क भावना वाले लोग मिलेंगे। लोग असामान्य रूप से भुक्खड़ और अनियंत्रित असीम क्रोध वाले होंगे। ऐसे द्विपाद होंगे जो जबर्दस्ती तकलीफ पहुँचाने वाले या कष्ट प्राप्त करने वाले हॊंगे। </p>



<p>लेकिन अपनी संस्कृति के मूलाधार के द्वारा निषिद्ध अपने इन अतिरंजित व्यवहारों का हमें कुछ भी ज्ञान नहीं होगा, न हम कुछ सीख पायेंगे कि मानवीय स्थिति के लिए आवश्यक गुण क्या हैं। हम अपने उन क्रिया कलापों का संधान नहीं पायेंगे जो कारवेन्टस(<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Cervantes">Cervantes</a>), काफ्का(<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Kafka">Kafka</a>), रिवेलियस(<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Rabelaisian">Rabelais</a>), ऑरवेल(<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/George_Orwell">Orwell</a>) डिसेड (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/De_Sade">de Sade</a>) और सचर-मसाक (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Sacher-Masoch">Sacher-Masoch</a>) हमें बता गए हैं।</p>



<p>जैसे ही उपन्यास &#8216;डन क्वीजोट डि ला मन्क&#8217; (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Don_Quixote_de_la_Mancha">Don Quixote de la Mancha</a>) सामने आया, इसके पहले पाठकों ने इस  ख्याली पुलाव पकाने वाले स्वप्नद्रष्टा की खूब हँसी उड़ायी, और ऐसा ही उपन्यास के शेष पात्रों के साथ भी किया। लेकिन आज हम जानते हैं कि &#8216;कैवलेरो डि ला ट्रिस्टे फिगरा&#8217; का उन स्थानों पर प्रेत  देखने को बल डालना जहाँ पवन चक्कियाँ थीं, बड़ी ही उदारता पूर्ण बात है, उसका जो बेतरतीब व्यवहार प्रतीत होता है वह भी वास्तव में श्रेष्ठतम औदार्यमय कार्य ही है, और सांसारिक कष्टों के विरोध का साधन है- इस आशा के साथ कि इस पीड़ा को परिवर्तित कर दिया जाय। </p>



<p>हमारी आदर्शों की संचेतनायें और हमारी आदर्शवादिता जो सकारात्मक मूल्यों की सुगंध से संकेतित होती हैं, वैसी नहीं होतीं जैसी हैं, न उसके सम्मानित मूल्य ही स्पष्ट हो पाते यदि ये कारवेन्टस की समर्थ प्रतिभा के द्वारा उपन्यास के नायक में अवतरित न कर दिये गये होते। यही बात उस छोटी यथार्थवादी स्त्री क्वीजोट (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Quixote">Quixote</a>), एम्मा बॉवेरी (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Emma_Bovary">Emma Bovary</a>) के बारे में भी कहा जा सकता है, जिसने प्रेम और विलासिता के लिए बड़ी गर्मजोशी से संघर्ष किया जिसका ज्ञान उसे उपन्यासों से हुआ। तितली की तरह  उड़ती हुई वह आग की लपट के अत्यंत नजदीक पहुँच गयी और आग में जल मरी। </p>



<hr class="wp-block-separator has-text-color has-vivid-purple-color has-alpha-channel-opacity has-vivid-purple-background-color has-background is-style-wide"/>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignright size-full is-resized"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2010/12/vargasllosa2.webp" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" width="125" height="133" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2010/12/vargasllosa2.jpg?x47177" alt="Mario Vargas Llosa" class="wp-image-237" style="width:225px;height:auto"/></picture><figcaption class="wp-element-caption">Mario Vargas Llosa</figcaption></figure>
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<p>पेरू के प्रतिष्ठित साहित्यकार। कुशल पत्रकार और राजनीतिज्ञ भी। वर्ष २०१० के लिए साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता।<br><strong>जन्म :</strong> २८ मार्च, १९३६ <br><strong>स्थान :</strong> अरेक्विपा (पेरू)<br>&nbsp;<strong>रचनाएं :</strong> द चलेंज–१९५७; हेड्स – १९५९; द सिटी एण्ड द डौग्स- १९६२; द ग्रीन हाउस – १९६६;&nbsp; प्युप्स –१९६७; कन्वर्सेसन्स इन द कैथेड्रल – १९६९; पैंटोजा एण्ड द स्पेशियल -१९७३; आंट जूली अण्ड स्क्रिप्टराइटर-१९७७; द एण्ड ऑफ़ द वर्ल्ड वार-१९८१; मायता हिस्ट्री-१९८४; हू किल्ड पलोमिनो मोलेरो-१९८६;द स्टोरीटेलर-१९८७;प्रेज़ ऑफ़ द स्टेपमदर-१९८८;डेथ इन द एण्डेस-१९९३; आत्मकथा–द शूटिंग फ़िश-१९९३।</p>



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<p>सभी महान साहित्यिक रचनाकारों की रचनाएं हमारी अज्ञात जीवन स्थिति के प्रति हमारी आँखें खोल देती हैं। ये हमें अतलांत जीवन की गहराई को खोजने और समझने में पूर्णतः समर्थ बना देती हैं। जब हम &#8216;बोर्गेसियन&#8217; (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Borgesian">Borgesian</a>) कहते हैं, तो यह शब्द तत्काल मन में उस विभाजक मस्तिष्क का चित्र उकेर देता है, जो बौद्धिकता की तार्किक क्रमबद्धता से अलग है, और हमारा प्रवेश उस शानदार दुनिया में हो जाता है जो श्रमपूर्वक रची रमणीक मनोमय संरचना वाली होती है। जो लोगॊं के लिए भूलभुलैया और करीब-करीब दुर्बोध होती है और उसमें साहित्यिक संकेत और बिम्ब भरे होते हैं। इनकी ख़ासियत यही है कि वह हमारे लिए परदेशी नहीं होतीं क्योंकि उनमें हम अपने व्यक्तित्व की उन छिपी इच्छाओं को और अपने अंतरंग सत्यों को पहचान पाते हैं जो आकार ग्रहण कर लेते हैं। जॉर्ज लुइ बोर्गेस (George Luis Borges) की साहित्यिक रचनाओं को फिर धन्यवाद न दें तो क्या दें। शब्द &#8216;काफकेस्क&#8217; (Kafkaesque) दिमाग में आता है, वैसा ही रूप दिखाता हुआ, जैसे पुराने कैमरा की कारीगरी उजागर हो गयी हो- हारमोनियम जैसी बाहें, हमेशा हमें भयभीत रखने वाली, हमेशा हमें असुरक्षित बनाये रखने वाली- शक्ति का दमनचक्र चलाने वाली मशीनें जिनसे आधुनिक संसार में अपार कष्ट और अन्याय फैला है। भावबोध होता है अधिकार में मतवाले शासन का, पार्टियों की लम्बी कतारों, असहिष्णु चर्चों की नाक में दम कर देने वाली नौकरशाही का। </p>



<p>सताये गए प्रेम के यहूदी की लघुकथायें एवं उपन्यासों के बिना, जिसने जर्मन में लिखा और हमेशा सावधानी बनाये रहा, हम बहिष्कृत एकाकी पड़े निःसत्व आदमी की भावनाएँ समझ सकने में सक्षम ही नहीं थे, हम सतायी गयी और भेदभाव बरती गयी अल्पसंख्यकों की पीड़ा नहीं समझ सकते, न समझ सकते हैं उस सर्वग्रासी ताकत से हुआ उनका आमना-सामना जो उन्हें कुचल कर रख देती थी और बरबाद कर देती थी, और हिंसक कार्य कर देने वाले भक्षक बने रक्षकों का चेहरा तक भी देखने को नहीं मिलता था। </p>



<p>विशेषण &#8216;ऑरवेलियन'(Orwellian), &#8216;कॉफकेस्क'(Kafkaesque) का पहला भतीजा, भयंकर संत्रासकारी क्रोध को ध्वनित करता है, असीम भद्दगी की अनुभूति जगाता है- ऐसा बेढंगापन, बेतुकापन दिखाता है जो सर्वप्रभुता सम्पन्न बीसवीं शताब्दी के तानाशाहों ने पैदा किया था, जो बड़े शौकीन, निर्दयी और इतिहास में वर्णित पक्के तानाशाह थे, जिनके कार्य और अधिकार के वशीभूत समाज के सदस्यों के अनेकों दल हुआ करते थे। 1984 में जॉर्ज ऑरवेल (George Orwell) ने ठंढभरी अभिशप्त झाड़ियों में बड़े साहब (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Big_Brother_%28Nineteen_Eighty-Four%29">Big Brother</a>) द्वारा दमन की गयी मानवता का वर्णन किया है, उस सबसे बड़े साहब द्वारा, जिसने प्रभूत आतंक और तकनीक का संयोग साधकर स्वतंत्रता, सहज निरंतरता और समानता का उन्मूलन कर दिया और समाज को मशीनी परिचालन का मधुमाखी का छाता बना दिया। </p>



<p>इस दुःस्वप्नमयी दुनिया में भाषा भी शक्ति की जी हुजूरी करती है और परिवर्तित हो चुकी है &#8216;नौकरशाहों एवं राजनीतिज्ञों की छलनामयी शब्दावली &#8216;(<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Newspeak">newspeak</a>) के रूप में। सारे आविष्कारों और व्यक्तिनिष्ठ गुणों से पवित्रीकृत हो गयी है यह, जनसामान्य स्थितिमयता में रूपान्तरित हो चुकी है, ताकि इस उपक्रम में व्यक्ति की दासता एकदम पक्की हो जाय। यह सत्य है कि 1984 की अनर्थकारी भविष्यवाणी आगे नहीं निकल पायी और सोवियत यूनियन की संपूर्ण साम्यवादिता जर्मनी और अन्य दूसरी जगह संपूर्ण धुर दक्षिणवादी राजनीतिक धारा की राह में अग्रसर हो गयी, और इसके बाद यह चीन में ह्रासोन्मुखी होने लगी और समय के दोष से भरित क्यूबा और उत्तरकोरिया में भी इसका यही हाल हुआ। लेकिन खतरा कभीं भी टला हुआ नहीं है, और ऑरवेलियन&#8217; शब्द अभी भी खतरे की उद्घोषणा कर रहा है, और इसको समझने में हमारी मदद कर रहा है।</p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2011/01/premature-obituary-of-book-6.html">पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-6</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
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		<title>पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-5</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 24 Dec 2010 09:28:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Translated Articles]]></category>
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		<category><![CDATA[Mario Vargas Llosa]]></category>
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		<category><![CDATA[साहित्य क्यों?]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>वे लोग जो अपनी नियति से ही संतुष्ट हैं, अपने उसी जीवन से संतोष कर लेते हैं जैसा वे जी रहे हैं, तो उनके लिए...</p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/12/premature-obituary-of-book-5.html">पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-5</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[


<p class="has-black-color has-text-color has-link-color wp-elements-2d6cb1cb618172ac41319007b95a2a8a">प्रस्तुत है पेरू के प्रख्यात लेखक <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Mario_Vargas_Llosa">मारिओ वर्गास लोसा</a> के एक महत्वपूर्ण, रोचक लेख का हिन्दी रूपान्तर। &#8216;लोसा&#8217; साहित्य के लिए आम हो चली इस धारणा पर चिन्तित होते हैं कि साहित्य मूलतः अन्य मनोरंजन माध्यमों की तरह एक मनोरंजन है, जिसके लिए समय और विलासिता दोनों पर्याप्त जरूरी हैं। साहित्य-पठन के निरन्तर ह्रास को भी रेखांकित करता है यह आलेख। इस चिट्ठे पर क्रमशः सम्पूर्ण आलेख हिन्दी रूपांतर के रूप में उपलब्ध होगा। <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/10/premature-obituary-of-book.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">पहली</a>, <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/11/premature-obituary-of-book-2.html">दूसरी</a>,  <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/11/premature-obituary-of-book-3.html">तीसरी</a>, <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/12/premature-obituary-of-book-4.html">चौथी</a> के बाद प्रस्तुत है पांचवी कड़ी।</p>





<p class="has-drop-cap">वे लोग जो अपनी नियति से ही संतुष्ट हैं, अपने उसी जीवन से संतोष कर लेते हैं जैसा वे जी रहे हैं, तो उनके लिए साहित्य में कहने के लिए कुछ भी नहीं है। साहित्य तो क्रान्तिकारी आत्मा का भोजन है, साहित्य अनिश्चितताओं का ध्वजवाहक है, ऐसे प्राणियों की शरणस्थली है जिनके जीवन में बहुत कुछ है या बहुत कुछ नहीं है। अप्रसन्नता और अपूर्णता से पिण्ड छुड़ाने के लिए साहित्य अभयारण्य है। मंथर गति &#8216;रोसिनेंट&#8217;<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Rocinante">(Rocinante)</a> के किनारे अश्वारोहण करना और दिग्भ्रमित शूरमा के रूप में &#8216;ला मंक&#8217; <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/La_Mancha">(La Mancha) </a>के मैदानों में घूमना, ह्वेल की पीठ पर सवार होकर &#8216;कैप्टन अहब&#8217; <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Ahab_%28Moby-Dick%29#Ahab">(Captain Ahab)</a> के साथ सागर संतरण करना, &#8216;एम्मा बोवेरी&#8217; <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Emma_bovary">(Emma Bovary) </a>के साथ संखिया पी लेना, &#8216;ग्रेगर सम्सा&#8217;<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Gregor_Samsa">(Gregor Samsa) </a>के साथ कीट-सा बन जाना &#8211; ये सभी ऐसे तरीके हैं जो हमने स्वयम् की त्रुटियों से एवं जीवन के अनुचित आरोपणों से निर्वस्त्र होने के लिए आविष्कृत कर लिए हैं, उस जीवन से मुक्त होने के लिए रचे हैं जो हमें हम जैसे हैं वैसे ही बने रहने के लिए बाध्य करता है, जबकि हम एक से अनेक होना चाहते हैं ताकि अपनी अनेक इच्छाओं को तृप्त कर सकें।</p>



<p>साहित्य हमारे प्रबल असंतोष को क्षणिक रूप में ही शांत कर सकता है, किन्तु इसी आश्चर्यमय स्थिति में, जीवन के इसी  क्षणिक ठहराव में साहित्यिक घटाटोप हमें उठाकर इतिहास से बाहर पहुँचा देता है, और हम एक समयातीत लोक के निवासी हो जाते हैं, और इस तरह अमर हो जाते हैं। हम और और गंभीर, और वैभवशाली, और संश्लिष्ट होते जाते हैं और सामान्य जीवन की बँधी हुई दिनचर्या की अपेक्षा और सरल सुबोध होते जाते हैं। जब हम पुस्तक पढ़ना बन्द करते हैं और साहित्यिक उपन्यास से अलग होते हैं तो वास्तविक स्थिति में लौट आते हैं। </p>



<p>तुलना कीजिए इसकी और उस शानदार लोक की जहाँ से हम अभीं अभीं लौटे हैं. कितनी उदासी हमारी प्रतीक्षा करती होती है। साथ ही वह विराट अनुभूति भी हमारी प्रतीक्षा करती रहती है कि वह उपन्यास का मजेदार जीवन इस जीवन से कहीं अधिक अच्छा है, कहीं अधिक खूबसूरत है, अधिक फैलाव वाला है, अधिक सुगठित है। जब हम जगे हैं, तबके इस सीमाबद्ध एवं जटिल परिस्थितियों में जकड़े जीवन से वह जीवन कहीं अधिक पूर्ण है। इस प्रकार अच्छा साहित्य, वास्तविक साहित्य हमेशा अननुगामी, न दबने वाला और क्रान्तिकारी होता है, वह &#8216;जो है&#8217; उसके प्रति एक चैलेन्ज के रूप में खड़ा होता है।</p>



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<div class="wp-block-image">
<figure class="alignright size-large is-resized"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa.webp 1200w" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="683" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa-1024x683.jpg?x47177" alt="Llosa" class="wp-image-4057" style="width:288px;height:auto" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa-1024x683.jpg 1024w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa-300x200.jpg 300w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa-768x512.jpg 768w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa-409x273.jpg 409w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></picture></figure>
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<p class="has-text-align-left">पेरू के प्रतिष्ठित साहित्यकार। कुशल पत्रकार और राजनीतिज्ञ भी। वर्ष २०१० के लिए साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता। <br><strong>जन्म :</strong> २८ मार्च, १९३६ <br><strong>स्थान :</strong> अरेक्विपा (पेरू)&nbsp;<br><strong>रचनाएं :</strong> द चलेंज–१९५७; हेड्स – १९५९; द सिटी एण्ड द डौग्स- १९६२; द ग्रीन हाउस – १९६६;&nbsp; प्युप्स –१९६७; कन्वर्सेसन्स इन द कैथेड्रल – १९६९; पैंटोजा एण्ड द स्पेशियल -१९७३; आंट जूली अण्ड स्क्रिप्टराइटर-१९७७; द एण्ड ऑफ़ द वर्ल्ड वार-१९८१; मायता हिस्ट्री-१९८४; हू किल्ड पलोमिनो मोलेरो-१९८६;द स्टोरीटेलर-१९८७;प्रेज़ ऑफ़ द स्टेपमदर-१९८८;डेथ इन द एण्डेस-१९९३; आत्मकथा–द शूटिंग फ़िश-१९९३।</p>



<hr class="wp-block-separator has-text-color has-luminous-vivid-orange-color has-alpha-channel-opacity has-luminous-vivid-orange-background-color has-background is-style-wide"/>



<p>&#8216;वार एण्ड पीस<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/War_and_Peace">(War and Peace)</a> &#8216; या &#8216;रिमेम्बरेंस ऑफ थिंग्स पास्ट&#8217; (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Remembrance_of_Things_Past">Remembrance of Things Pas</a>t) पढ़ने के बाद हम उस संसार में लौटकर, जो तथ्यहीनता से खचाखच भरा है, चारों ओर से अवरोधक सीमाओं से आबद्ध है, कदम-कदम पर हमारे स्वप्नों को रौंद देने वाला है, हम ठगा हुआ सा महसूस नहीं कर सकते हैं? संस्कृति की निरंतरता बनाये रखने की आवश्यकता से अधिक भाषा को समृद्ध करने के लिए साहित्य का सर्वोत्तम अनुदान मानव की प्रगति में यही है कि यह संभवतः हमें स्मरण करा देता है (अधिकांश मामलों मे अनिच्छित ही), कि दुनिया बुरी ही बनी है। और जो बलवान और किस्मत वाले इसका उल्टा सोचने का बहाना बनाते हैं, वे झूठ बोलते हैं। झूठ बोलते हैं कि दुनिया को वैसे ही सुगठित किया जा सकता है, जैसा कि संसारों का सृजन कल्पना और शब्द करने में समर्थ हैं। </p>



<p>एक स्वतंत्र और प्रजातांत्रिक समाज में उत्तरदायी और संवेदनशील पुरुषों की नितान्त आवश्यकता है जो उस आवश्यकता के प्रति सतत सचेष्ट रहें जो उस जगत का जिसमें वे रहते हैं, सतत परीक्षण किया करे। यद्यपि है यह अधिकाधिक असंभव-सा कार्य, पर प्रयास किया करें कि जैसी दुनिया में हम रहना पसंद करेंगे करीब-करीब वैसी ही इस दुनिया को भी निर्मित कर दें। और अच्छे साहित्य के पठन के अतिरिक्त दूसरा कोई उत्तम साधन नहीं है जिससे असंतोष के अस्तित्व का उत्सर्जन किया जा सके; कोई उत्तम साधन नहीं है जिससे विवेचक एवं स्वतंत्र नागरिकों का निर्माण किया जा सके, उन नागरिकों का निर्माण जो अपने शासकों द्वारा संचालित न होते हों, और जिनमें स्थायी आत्मिक तरलता और गतिमयी कल्पनाशीलता हो।</p>



<p>फिर भी साहित्य को राज्यविद्रोही कहे जाने, क्योंकि यह संसार की अपूर्णताओं के प्रति पाठक की चेतना को संवेदनशील बनाता है, का अर्थ यह नहीं है- जैसा कि चर्च व राजसत्ताएँ सेंसरशिप कायम करते हुए अर्थ लगाती हैं- कि साहित्यिक कृतियाँ तत्काल उथल पुथल कर पैदा कर देंगी या क्रांति को और बढ़ावा देंगी। किसी कविता, नाटक या उपन्यास के भविष्य में घटित प्रभाव को नहीं सोच लेना चाहिए क्योंकि वे सामूहिक रूप से नहीं रचित होते, न उनका अनुभव सामूहिक होता है। वे व्यक्तियों के द्वारा रचित होते हैं और व्यक्तियों के द्वारा पढ़े जाते हैं। और उनके अंत भी अनेकों प्रकार के होते हैं जो उनकी रचनाओं से, उनके पठन से छन कर आते हैं। </p>



<p>अतः यह कठिन है और असंभव भी कि किसी एक ठोस धरातल की रचना हो. सबसे बड़ी बात तो यह है कि किसी साहित्यिक रचना का सामाजिक परिणाम उसके सौन्दर्यशास्त्रीय गुण से बहुत कम मेल खाता हुआ हो सकता है। &#8216;हैरियट बीचर स्टो'(<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Harriet_Beecher_Stowe">Harriet Beecher Stowe</a>) का एक सामान्य सा उपन्यास भी संयुक्त राज्य (United States) में दासता के आतंक के विरोध में सामाजिक एवं राजनैतिक चेतना उत्पन्न करता प्रतीत होता है। यह तथ्य कि साहित्य के ये प्रभाव पहचान में आने कठिन हैं यह नहीं बतलाते कि उनका अस्तित्व ही नहीं है। प्रमुख तथ्य यह है कि ये प्रभाव नागरिकों के क्रियाकलापों से उत्पन्न होते हैं जिनके व्यक्तित्वों का निर्माण कुछ हद तक पुस्तकों द्वारा हुआ है।</p>



<p>अच्छा साहित्य क्षणिक रूप में जहां मानव की असंतुष्टि को शमित करता है वहीं जीवन के प्रति आलोचनात्मक एवं अविश्वस्त धारणा का विकास करके इस असंतुष्टि को बढाता भी है। इसे हम ऐसे भी कह सकते हैं  कि साहित्य मानव जातियों को अधिकाधिक अप्रसन्न ही बनाता है। असंतुष्ट रहना, अपने अस्तित्व से जूझना उन चीजों की अपेक्षा करना है जो उपस्थित ही नहीं हैं, या किसी की व्यर्थ की लड़ाई लड़ने  के लिए निंदा करना है, ऐसी लड़ाई जैसी कि कर्नल  &#8216;ओरेलिआनो बुएंदिया&#8217; (Aureliano Buendia) ने  &#8216;वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सालीटयूड&#8217;<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/One_Hundred_Years_of_Solitude">(One Hundred Years of Solitude)</a> में लड़ी, यह जानते हुए भी कि वह उन सबको हार जाएगा। ये सब बातें सही हो सकती हैं। </p>



<p>फिर भी यह भी सही है   कि जीवन की साधारण स्थिति एवं गन्दगी के विरुद्ध विद्रोह के बिना हम अभी भी आदिम युग में ही जीते और इतिहास ही अवरुद्ध हो गया होता, स्वायत्त व्यक्ति का ही सृजन न हो पाता, विज्ञान और तकनीकी का विकास ही न हुआ होता, मानव अधिकारों की पहचान ही न हो पाती, स्वतंत्रता का अस्तित्व ही नहीं रह पाता। ये सारी चीजें अप्रसन्नता से ही पैदा होती हैं, अपर्याप्त और असहनीय दर्शित जीवन के प्रति खुली अवज्ञा से ही पैदा होती हैं। इस भावना के लिए जो, जीवन जैसा है उससे नाराजगी से पैदा होती है, और पैदा होती है &#8216;डोन क्विजोट&#8217; <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Don_Quixote">(Don Quixote)</a> के उस पागलपन से जिसकी अपावनता बहादुरी भरे उपन्यास के पढ़ने से निकली, साहित्य ने एक भाला सरीखा काम किया है।  </p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/12/premature-obituary-of-book-5.html">पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-5</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
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		<title>पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि: साहित्य क्यों?-4</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 10 Dec 2010 12:45:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Translated Articles]]></category>
		<category><![CDATA[Translated Works]]></category>
		<category><![CDATA[Mario Vargas Llosa]]></category>
		<category><![CDATA[Nobel Prize]]></category>
		<category><![CDATA[नोबेल पुरस्कार]]></category>
		<category><![CDATA[मारिओ वर्गास लोसा]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य क्यों?]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि: साहित्य क्यों? &#8211; मारिओ वर्गास लोसा साहित्य ने अपनी ग्राह्यता प्रेम इच्छाओं और काम-कलापों में भी स्वीकृत करा दी है। यह...</p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/12/premature-obituary-of-book-4.html">पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि: साहित्य क्यों?-4</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
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<p class="has-black-color has-text-color has-link-color wp-elements-a9156a3ed2fc911d5952e863b4ce7de3">प्रस्तुत है पेरू के प्रख्यात लेखक मारिओ वर्गास लोसा के एक महत्वपूर्ण, रोचक लेख पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि: साहित्य क्यों? &#8211; <a href="https://newrepublic.com/article/78238/mario-vargas-llosa-literature" target="_blank" rel="noreferrer noopener nofollow">The premature obituary of the book : Why Literature</a> का हिन्दी रूपान्तर। &#8216;लोसा&#8217; साहित्य के लिए आम हो चली इस धारणा पर चिन्तित होते हैं कि साहित्य मूलतः अन्य मनोरंजन माध्यमों की तरह एक मनोरंजन है, जिसके लिए समय और विलासिता दोनों पर्याप्त जरूरी हैं। साहित्य-पठन के निरन्तर ह्रास को भी रेखांकित करता है यह आलेख। इस चिट्ठे पर क्रमशः सम्पूर्ण आलेख हिन्दी रूपांतर के रूप में 7 किश्तों में उपलब्ध होगा। आज प्रस्तुत है चौथी किश्त! </p>





<h3 class="wp-block-heading">पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि: साहित्य क्यों? &#8211; मारिओ वर्गास लोसा</h3>



<p>साहित्य ने अपनी ग्राह्यता प्रेम इच्छाओं और काम-कलापों में भी स्वीकृत करा दी है। यह कलात्मक रचना का स्तर बनाये रखता है। साहित्य के बिना कामोद्दीपन रह ही नहीं सकता है।&nbsp;प्रेम और आनन्द और दीन हो जायेंगे।&nbsp;उनकी नजाकत, उनकी सटीक चोट क्षीणतर होती चली जायेगी। वे उस गहनता की&nbsp; उपलब्धि से&nbsp; वंचित रह जायेंगे जो साहित्यिक कल्पना&nbsp;प्रदान&nbsp;करती है।&nbsp;</p>



<p>न तो श्रव्य-दृश्य माध्यम में ही वह सामर्थ्य है कि साहित्य को अपने उस स्थान से च्युत कर दे जो मानव को पूर्ण विश्वास और पूर्ण कौशल के साथ यह सिखाता है कि भाषा के गुंफन में&nbsp;असाधारण रूप से अपार समृद्ध संभावनायें सन्निहित&nbsp;हैं। उल्टे श्रव्य-दृश्य संप्रेषण के माध्यम, जहाँ तक कल्पना का, बिम्बों का सम्बन्ध है, शब्दों को दोयम नम्बर पर पदावनत करके रख देते हैं जो संप्रेषण का मूलभूत तत्व है, और ये भाषा को उसके उस वाचिक प्रस्तुतीकरण से बहुत-बहुत दूर रख देते हैं जो उसका लिखित आयाम है। किसी फिल्म या टेलीविजन के कार्यक्रम को ‘साहित्यिक परिभाषित करने को मजेदार रूप में यह कहेंगे कि यह उबाऊ है। यही कारण है कि रेडियो या टॆलीविज़न के साहित्यिक कार्यक्रम शायद ही लोगों को अपने में बाँध पाते हैं। जहाँ तक मुझे ज्ञात है, इस नियम का अपवाद फ्रांस में बर्नार्ड पायवट&nbsp;<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Bernard_Pivot">(Bernard Pivot)</a>&nbsp;का साहित्यिक कार्यक्रम ‘एपास्ट्राफीज’ <a href="http://www.dailymotion.com/video/x3fxba_apostrophes-bernard-pivot_people">(Apostrophes)</a> था। और यह मुझे सोचने के लिए प्रोत्साहित करता है कि पूर्ण ज्ञान और पूर्णतः भाषा पर अधिकार के लिए साहित्य न केवल अपरिहार्य है, बल्कि पुस्तकों का भाग्य भी इसी से सम्बन्धित होकर सुरक्षित है जिसे व्यावसायिक उत्पाद इन दिनों प्रयोगवाह्य घोषित कर रहे हैं।</p>



<div class="wp-block-columns is-layout-flex wp-container-core-columns-is-layout-9d6595d7 wp-block-columns-is-layout-flex">
<div class="wp-block-column is-layout-flow wp-block-column-is-layout-flow" style="flex-basis:66.66%">
<h3 class="wp-block-heading has-vivid-red-color has-text-color">काग़जों और क़िताबों के अन्त की उद्घोषणा का सच</h3>



<p>यह सोचना मुझे<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Bill_Gates">&nbsp;बिल गेट्स&nbsp;</a>(Bill Gates) की ओर आकर्षित कर रहा है। बहुत दिन नहीं हुए वह मैड्रिड में थे। उन्होंने उस रायल स्पैनिश एकेडमी (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Real_Academia_Espa%C3%B1ola">Royal Spanish Academy</a>) का भ्रमण किया जिसने&nbsp;<a href="http://www.microsoft.com/">माइक्रोसॉफ्ट&nbsp;</a>पर साहसपूर्ण संयुक्त रूप से नया कार्य किया। अन्य दूसरी चीजों के बीच गेट्स ने एकेडमी के सदस्यों को विश्वस्त किया कि वह व्यक्तिगत रूप से यह गारंटी देंगे कि कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर से ‘N’ शब्द को कभी भी हटाया नहीं जा सकता। यह एक ऐसी प्रतिज्ञा थी जिससे पाँच महाद्वीपों के&nbsp;<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Spanish_language">स्पैनिश</a>&nbsp;बोलने वाले चार सौ करोड़ व्यक्तियों ने राहत की साँस ली, क्योंकि इतने आवश्यक अक्षर का साइबर स्पेस से देश निकाला एक अत्यंत विशाल समस्या सृजित कर देता। स्पैनिश भाषा के लिए सौहार्दपूर्ण छूट का स्थान बनाने के तुरंत बाद और एकेडमी परिसर के बाहर निकलते हुए भी उन्होंने एक प्रेस कॉन्फरेंस में यह प्रतिज्ञा की कि अपने उच्चतम आदर्श को अपनी मृत्यु के पहले वह स्थापित कर देने की अभिलाषा रखते हैं। वह लक्ष्य क्या था, इसको स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा, कि वह लक्ष्य कागज और फिर किताबों का अंत कर देना है।</p>



<p>अपने निर्णय में उन्होंने कहा है कि पुस्तकें समयानुकूल नहीं, दोष से पूर्ण हैं। उनका तर्क था कि कम्प्यूटर की स्क्रीन कागज को उसके द्वारा किए जाने वाले अबतक के समस्त कार्यों के साथ उसके स्थान से च्युत कर सकती है। उनका इस पर भी बल था कि कम कठिन और कम प्रयत्न-साध्य होने के अतिरिक्त कम्प्यूटर कम स्थान घेरते हैं, उन्हें आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाया जा सकता है, और यह भी कि समाचार-पत्रों और पुस्तकों के स्थान पर इन इलेक्ट्रिक माध्यमों से समाचार देने या साहित्य संप्रेषित करने में पर्यावरण सम्बन्धी लाभ भी हैं। जंगलों का विनाश, जो कागज उद्योग की प्रेरणा का दुष्फल है, रुकता है। गेट्स ने अपने श्रोताओं को विश्वास दिलाया कि वे कम्प्यूटर स्क्रीन पर पढ़ेंगे और परिणामतः वातावरण में पहले की अपेक्षा और अधिक ‘क्लोरोफिल’ उपस्थित रहेगी।</p>



<p>‘बिल गेट्स’ के इस छोटॆ से संभाषण के समय मैं उपस्थित नहीं था। प्रेस के द्वारा मुझे सब कुछ मालूम हुआ। यदि मैं वहाँ होता तो मैं गेट्स के उन इरादों पर जो वह निर्लज्जतापूर्वक मेरे सहयोगियों, बेरोजगार लेखकों के लिए उद्घोषित कर रहा था, घोर अरुचि और अनिच्छा अभिव्यक्त करता. मैं दृढ़तापूर्वक स्पष्ट रूप से उनके विश्लेषण विरोध में उठ खड़ा होता।</p>
</div>



<div class="wp-block-column is-layout-flow wp-block-column-is-layout-flow" style="flex-basis:33.33%">

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<figure class="aligncenter size-medium"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa.webp 1200w" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" width="300" height="200" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa-300x200.jpg?x47177" alt="Nobel Prize winner for Literature in 2010, Mario Vargas Llosa" class="wp-image-4057" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa-300x200.jpg 300w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa-1024x683.jpg 1024w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa-768x512.jpg 768w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa-409x273.jpg 409w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /></picture></figure>
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<h3 class="wp-block-heading has-text-align-left"><a href="https://en.wikipedia.org/wiki/Mario_Vargas_Llosa" target="_blank" rel="noreferrer noopener nofollow">Mario Vargas Llosa</a></h3>



<p>पेरू के प्रतिष्ठित साहित्यकार। कुशल पत्रकार और राजनीतिज्ञ भी। वर्ष २०१० के लिए साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता।</p>



<p><strong>जन्म :</strong> २८ मार्च, १९३६</p>



<p><strong>स्थान :</strong> अरेक्विपा (पेरू)&nbsp;</p>



<p><strong>रचनाएं :</strong> द चलेंज–१९५७; हेड्स – १९५९; द सिटी एण्ड द डौग्स- १९६२; द ग्रीन हाउस – १९६६;&nbsp; प्युप्स –१९६७; कन्वर्सेसन्स इन द कैथेड्रल – १९६९; पैंटोजा एण्ड द स्पेशियल -१९७३; आंट जूली अण्ड स्क्रिप्टराइटर-१९७७; द एण्ड ऑफ़ द वर्ल्ड वार-१९८१; मायता हिस्ट्री-१९८४; हू किल्ड पलोमिनो मोलेरो-१९८६; द स्टोरीटेलर-१९८७;प्रेज़ ऑफ़ द स्टेपमदर-१९८८;डेथ इन द एण्डेस-१९९३; आत्मकथा–द शूटिंग फ़िश-१९९३।</p>


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<h3 class="wp-block-heading has-vivid-red-color has-text-color">क्या कम्प्यूटर स्क्रीन पुस्तकों का स्थान ले सकती है?</h3>



<p>क्या सचमुच कम्प्यूटर स्क्रीन हर दृष्टिकोण से पुस्तकों का स्थान ले सकती है? मुझको इतना निश्चित विश्वास नहीं होता। नयी तकनीक, जैसे इन्टरनेट ने संचार और सूचना के क्षेत्र में कितनी बड़ी क्रान्ति कर दी है, मैं इससे पूरी तरह अवगत हूँ, और मैं यह स्वीकार करता हूँ कि इन्टरनेट असाधारण रूप से मेरे दैनिक कार्य में प्रतिदिन सहायता करता है। लेकिन इन असाधारण सुविधाओं के लिए मेरी कृतज्ञता मुझे इस विश्वास से नहीं भर सकती कि इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन कागज का स्थान ले सकती है, या कम्प्यूटर स्क्रीन पर पढ़ना साहित्यिक पठन की बराबरी कर सकता है। इनके बीच की गहरी खाई को मैं लाँघ नहीं सकता। मैं यह स्वीकार नहीं कर सकता कि अनौपचारिक या अयथार्थवादी पठन जिसको किसी सूचना या लाभप्रद किसी तात्कालिक संवाद की आवश्यकता नहीं है, वह कम्प्यूटर की स्क्रीन पर सपनों को,शब्दों के आनन्द को उसी समुत्तेजना, उसी निकटता, उसी मानसिक एकाग्रता और आत्मिक एकान्त के साथ सम्बन्ध कर सकता है जैसा कि एक पुस्तक के पढ़ने की क्रिया द्वारा उपलब्ध होता है. </p>



<p>यह पूर्वाग्रह शायद अभ्यास की कमी और साहित्य का पुस्तकों और कागजों से लम्बे समय तक सम्बन्धित रहने के कारण उपजा है. मैं यद्यपि विश्व-समाचार जानने के लिए वेब-सर्फिंग का आनन्द लेता हूँ, लेकिन मैं स्क्रीन पर ‘गंगोरा’ (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Luis_de_G%C3%B3ngora">Gongora</a>) की कवितायें पढ़ने, या ‘ऑनेटी’ (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Onetti">Onetti</a>)का उपन्यास पढ़ने या ‘पाज’ (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Octavio_Paz">Paz</a>)का लेख पढ़ने नहीं जाऊँगा, क्योंकि मैं पूरी तरह विश्वस्त हूँ कि इस पठन का प्रभाव उस पठन के समान नहीं होगा. मुझे विश्वास है, यद्यपि मैं इसे सिद्ध नहीं कर सकता, कि यदि किताबें गुम हुईं तो साहित्य को एक गहरा धक्का लगेगा, और उसे नैतिक आघात भी मिलेगा. वास्तविकता तो यह है कि फिर भी&nbsp; ‘साहित्य’ शब्द का कभीं लोप नहीं हो सकता. इसका निश्चित ही प्रयोग उस पाठ्य वस्तु के लिए किया जाता रहेगा जिसका दूर-दूर तक, जिसे आज हम साहित्य समझते हैं, उससे सम्बंध नहीं होगा, ठीक वैसे ही जैसे ‘सोफोकल्स’&nbsp;<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Sophocles">(sophocles)</a>&nbsp;और ‘शेक्सपियर’&nbsp;<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/William_Shakespeare">(Shakespeare)</a>&nbsp;के दुःखान्त नाटक धारावाहिकों के रूप में प्रस्तुत हो रहे हैं.</p>



<p>एक दूसरा भी कारण है जिसके चलते राष्ट्रों के जीवन में साहित्य का स्थान स्वीकृत किया जाएगा. बिना इसके उस आलोचनात्मक मस्तिष्क की अपूरणीय क्षति होगी जो ऐतिहासिक परिवर्तन का वास्तविक संवाहक है और स्वतंत्रता का सर्वोत्तम संरक्षक है. ऐसा इसलिए है कि सभी उत्तम साहित्य क्रान्तिकारी परिवर्तक होता है, और जिस संसार में हम रह रहे हैं उसके सम्बंध में क्रान्तिकारी प्रश्नों को बनाये रखता है. सभी उत्तम साहित्यिक रचनाओं में, चाहे लेखक का इरादा रहा हो या न रहा हो, तल्लीन कर लेने की शक्ति की ओर ओर झुकाव बना ही रहता है.</p>



<p>क्रमशः&#8211; <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/12/premature-obituary-of-book-5.html">पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The premature obituary of the book)-5</a></p>



<figure class="wp-block-embed is-type-video is-provider-youtube wp-block-embed-youtube wp-embed-aspect-16-9 wp-has-aspect-ratio"><div class="wp-block-embed__wrapper">
<iframe loading="lazy" title="Essay : Why Literature? - Mario Vargas Llosa || Visual Essays #03" width="726" height="408" src="https://www.youtube.com/embed/ptwMnJbdhfc?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" allowfullscreen></iframe>
</div><figcaption class="wp-element-caption"><strong>Visual Essays: Why Literature &#8211; Mario Vargas Llosa</strong></figcaption></figure>





<p class="has-text-align-center has-white-color has-vivid-red-background-color has-text-color has-background"><strong>इस हिन्दी रूपांतर को पूर्णतः निम्न प्रविष्टियों के माध्यम से पढ़ा जा सकता है</strong></p>




<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/12/premature-obituary-of-book-4.html">पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि: साहित्य क्यों?-4</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
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		<title>पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book): 3</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2010/11/premature-obituary-of-book-3.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 06 Nov 2010 05:26:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Translated Articles]]></category>
		<category><![CDATA[Translated Works]]></category>
		<category><![CDATA[Mario Vargas Llosa]]></category>
		<category><![CDATA[Nobel Prize]]></category>
		<category><![CDATA[नोबेल पुरस्कार]]></category>
		<category><![CDATA[मारिओ वर्गास लोसा]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य क्यों?]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>The Premature Obituary of the Book : Why Literature? जनसामान्य के उद्भव और उसके लक्ष्य के प्रति चेतना का सृजन करके तथा मानव जाति को...</p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/11/premature-obituary-of-book-3.html">पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book): 3</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
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<p class="has-black-color has-text-color has-link-color wp-elements-1fe17e06a41f5119f157d9f4c8c9203d">प्रस्तुत है पेरू के प्रख्यात लेखक मारिओ वर्गास लोसा के एक महत्वपूर्ण, रोचक लेख पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि &#8211; <a href="https://newrepublic.com/article/78238/mario-vargas-llosa-literature" target="_blank" rel="noreferrer noopener nofollow">The premature obituary of the book : Why Literature</a> का हिन्दी रूपान्तर। &#8216;लोसा&#8217; साहित्य के लिए आम हो चली इस धारणा पर चिन्तित होते हैं कि साहित्य मूलतः अन्य मनोरंजन माध्यमों की तरह एक मनोरंजन है, जिसके लिए समय और विलासिता दोनों पर्याप्त जरूरी हैं। साहित्य-पठन के निरन्तर ह्रास को भी रेखांकित करता है यह आलेख। इस चिट्ठे पर क्रमशः सम्पूर्ण आलेख हिन्दी रूपांतर के रूप में 7 किश्तों में उपलब्ध होगा। आज प्रस्तुत है तीसरी किश्त! </p>





<h3 class="wp-block-heading">The Premature Obituary of the Book : Why Literature?</h3>



<p>जनसामान्य के उद्भव और उसके लक्ष्य के प्रति चेतना का सृजन करके तथा मानव जाति को परस्पर संवाद के लिए बाध्य करके साहित्य उसमें जो भाईचारा स्थापित करता है, वह सारे भौतिक बंधनों को पार कर जाता है। साहित्य हमें विगत में पहुँचा देता है और उन लोगों से हमारा सम्बन्ध स्थापित कर देता है, जिन्होंने अतीत काल में योजनायें रचीं, आनन्द प्राप्त किया और उन रचनाओं की स्वप्न-सृष्टि में डूबे रहे जो हम तक उतर कर आयी हैं; और जो आज भी हमें आनन्द लेने और स्वप्न संरचना की पृष्ठभूमि प्रदान करती हैं। यह संयुक्त मानव अनुभूति में अपनी उपस्थिति की भावना जो समय और काल की सीमा के पार होती है, संस्कृति की सर्वोत्तम उपलब्धि होती है, और&nbsp;पीढ़ी दर पीढ़ी इसके पुनर्नवीनीकरण में जितना योगदान साहित्य देता है उतना और कुछ भी नहीं।</p>



<p><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Jorge%20Luis%20Borges">बोर्गेज (Borges)</a>&nbsp;प्रायः उत्तेजित हो जाता करता था जब उससे पूछा जाता था,&nbsp;<strong>“ साहित्य का उपयोग क्या है?”</strong>&nbsp;उसके लिए यह प्रश्न मूर्खतापूर्ण लगता था और इसके लिए वह यही उत्तर देगा,&nbsp;<strong>“यह तो कोई नहीं पूछेगा कि&nbsp;<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Domestic%20Canary">कैनरी (Canary)</a>&nbsp;के गीतों का या सूर्यास्त का क्या उपयोग है ? यदि इन मनोहर चीजों का अस्तित्व है, और धन्यवाद है उनको कि यदि जीवन उनके लिए अत्यल्प भद्देपन और उदासीनता का उदाहरण है तो क्या किसी चीज की प्रायोगिक तथ्यता खोजना नगण्य एवं तुच्छ नहीं है ?”&nbsp;</strong>परंतु प्रश्न एक अच्छा प्रश्न है। उपन्यास और कवितायें पक्षियों के गीत की तरह नहीं हैं और न तो अंतरिक्ष में डूबते हुए सूर्य की चमक की तरह हैं, क्योंकि उनकी रचना संयोगवश या प्रकृति के द्वारा नहीं हुई। ये मनुष्य की रचनाएँ हैं, इसलिये यह पूछना उचित है कि वे कैसे और क्यों आये संसार में, और उनके आने का उद्देश्य क्या है, और वे इतने दिनों तक अस्तित्व में बनी क्यों हैं।</p>



<div class="wp-block-columns is-layout-flex wp-container-core-columns-is-layout-9d6595d7 wp-block-columns-is-layout-flex">
<div class="wp-block-column is-layout-flow wp-block-column-is-layout-flow" style="flex-basis:66.66%">
<h3 class="wp-block-heading has-luminous-vivid-orange-color has-text-color">साहित्यिक रचना प्रक्रिया</h3>



<p>जो साहित्यिक रचनायें हैं वे रचनाकार की चेतना की गहन आत्मीयता में एक आकृति-विहीन प्रेतात्मा की तरह उत्पन्न होती हैं। उनमें अचेतन की संयुक्त शक्ति होती है और होती है लेखक की संवेदना जो उसके चतुर्दिक व्याप्त विश्व के प्रति होती है, और होते हैं लेखक के संवेग– और ये ही चीजे हैं जिनको कवि या कथाकार शब्दों के साथ जूझता हुआ क्रमशः रूप, आकार, गति, लय, छंद और जीवन प्रदान करता है।&nbsp;यह निश्चित ही एक बनावटी जीवन है, निश्चित ही एक काल्पनिक जीवन है, फिर भी नर-नारी यह बनावटी जीवन खोजते हैं – कुछ तो तीव्र गति से, कुछ बिखरे हुए भाव से। ऐसा इसलिए कि वास्तविक जीवन उनके लिए छोटा पड़ जाता है, और उनको वह देने में समर्थ नहीं हो पाता है जो वे चाहते हैं। </p>



<h3 class="wp-block-heading has-luminous-vivid-orange-color has-text-color">साहित्य और पठन</h3>



<p>साहित्य एक व्यक्ति की रचना के द्वारा अस्तित्व में आना प्रारंभ नहीं करता। यह तभीं अस्तित्व में रह सकता है जब दूसरे लोग भी इसको स्वीकार करते हैं, और यह एक सामाजिक जीवन का हिस्सा बन जाता है, और जब यह पठन, बहुत धन्यवाद की बात है कि, एक दूसरे में परस्पर बँटी हुई अनुभूति हो जाती है।</p>



<p>इसके लाभप्रद प्रभावों में से एक है भाषा के स्तर का लाभ। लिखित साहित्य से विहीन समाज की अभिव्यक्ति&nbsp; में निश्चितता का अभाव होता है , विविध कोमल अर्थों एवं आकृतियों की समृद्धि का अभाव होता है और अपेक्षाकृत उस स्पष्टता का अभाव होता है जो साहित्यिक रचनाओं के माध्यम से विरचित एवं पूर्ण होती हुई उस समाज को प्राप्त होती है जिसका परस्पर सम्वाद का अस्त्र शब्द है। ऐसी पठन पाठन से विहीन मानवता उस बहरे और शब्दविहीन गूंगों का समूह होगी, जिसमें अपरिपक्व एवं अविकसित भाषा के चलते परस्पर संवाद की घोर कठिनाई झेलनी पड़ती है। यह व्यक्तियों के लिए भी सत्य है।&nbsp;</p>



<p>जो व्यक्ति पढ़ता नहीं है या कम पढता है या पढ़ता भी है तो व्यर्थ की चीजें पढ़ता है, तो वह एक हकलाने वाला व्यक्ति है। वह बोल तो बहुत सकता है , पर कहेगा बहुत कम, क्योंकि उसका शब्दकोष आत्माभिव्यक्ति में अक्षम है।</p>
</div>



<div class="wp-block-column is-layout-flow wp-block-column-is-layout-flow" style="flex-basis:33.33%">

<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-medium"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa.webp 1200w" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" width="300" height="200" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa-300x200.jpg?x47177" alt="Nobel Prize winner for Literature in 2010, Mario Vargas Llosa" class="wp-image-4057" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa-300x200.jpg 300w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa-1024x683.jpg 1024w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa-768x512.jpg 768w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa-409x273.jpg 409w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /></picture></figure>
</div>


<h3 class="wp-block-heading has-text-align-left"><a href="https://en.wikipedia.org/wiki/Mario_Vargas_Llosa" target="_blank" rel="noreferrer noopener nofollow">Mario Vargas Llosa</a></h3>



<p>पेरू के प्रतिष्ठित साहित्यकार। कुशल पत्रकार और राजनीतिज्ञ भी। वर्ष २०१० के लिए साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता।</p>



<p><strong>जन्म :</strong> २८ मार्च, १९३६</p>



<p><strong>स्थान :</strong> अरेक्विपा (पेरू)&nbsp;</p>



<p><strong>रचनाएं :</strong> द चलेंज–१९५७; हेड्स – १९५९; द सिटी एण्ड द डौग्स- १९६२; द ग्रीन हाउस – १९६६;&nbsp; प्युप्स –१९६७; कन्वर्सेसन्स इन द कैथेड्रल – १९६९; पैंटोजा एण्ड द स्पेशियल -१९७३; आंट जूली अण्ड स्क्रिप्टराइटर-१९७७; द एण्ड ऑफ़ द वर्ल्ड वार-१९८१; मायता हिस्ट्री-१९८४; हू किल्ड पलोमिनो मोलेरो-१९८६; द स्टोरीटेलर-१९८७;प्रेज़ ऑफ़ द स्टेपमदर-१९८८;डेथ इन द एण्डेस-१९९३; आत्मकथा–द शूटिंग फ़िश-१९९३।</p>


</div>
</div>



<h3 class="wp-block-heading has-luminous-vivid-orange-color has-text-color">भाषा परिष्कार में साहित्य का अवदान</h3>



<p>इसकी यह केवल वाचिक सीमा ही नहीं है। बुद्धि और कल्पना में भी इसकी सीमा प्रकट होती है। इसमें विचारों का कंगालीपना है। सीधा सा कारण् यही है कि विचार, अवधारणाएँ जिनसे हम अपनी स्थिति के रहस्यों को ग्रहण कर पाते हैं, वे शब्दों से अलग स्थित नहीं होते हैं। अच्छे साहित्य और केवल अच्छे साहित्य से ही हम यह सीख पाते हैं कि कैसे सही रूप से, गंभीरता से, दृढ़ता और सूक्ष्मता से बोला जाता है। </p>



<p>कलाओं की किसी भी साज-सज्जा में, किसी भी शाखा में साहित्य के स्थान की पूर्ति करने की शक्ति नहीं है जो लोगों के लिए आवश्यक भाषा की संरचना कर सके। ठीक-ठीक कहें तो समृद्ध और परिवर्तनशील भाषा के स्वामित्व के लिए, संवाद-सृजन हेतु प्रत्येक विचार, प्रत्येक संवग की प्राप्ति हेतु सामर्थ्य के लिए, चिंतन,अध्यापन, सीख एवं संवाद के लिए तथा कल्पनाशीलता, स्वप्न और अनुभूति के लिए अच्छी तरह तैयारी करनी होती है। गुप्त रूप में शब्द हमारे क्रिया-कलाप में अनुगुंजित होते है। उन कार्यों में भी उनकी अनुगूंज सुनाई पड़ती है जो भाषा से बहुत दूर स्थित प्रतीत होते हैं। और चूंकि भाषा अनावृत हुई, उसका विकास हुआ तो धन्यवादार्ह है साहित्य कि उससे भाषा अपने परिष्कार और तौर तरीकों में उच्च स्थान प्राप्त कर सकी- इसने मानव के आनंद की संभावना में चार-चाँद लगाया।</p>



<hr class="wp-block-separator has-text-color has-vivid-green-cyan-color has-alpha-channel-opacity has-vivid-green-cyan-background-color has-background is-style-wide"/>



<p>क्रमशः&#8211; <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/12/premature-obituary-of-book-4.html">पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The premature obituary of the book)-4</a></p>



<figure class="wp-block-embed is-type-video is-provider-youtube wp-block-embed-youtube wp-embed-aspect-16-9 wp-has-aspect-ratio"><div class="wp-block-embed__wrapper">
<iframe loading="lazy" title="Essay : Why Literature? - Mario Vargas Llosa || Visual Essays #03" width="726" height="408" src="https://www.youtube.com/embed/ptwMnJbdhfc?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" allowfullscreen></iframe>
</div><figcaption class="wp-element-caption"><strong>Visual Essays: Why Literature &#8211; Mario Vargas Llosa</strong></figcaption></figure>





<p class="has-text-align-center has-white-color has-vivid-green-cyan-background-color has-text-color has-background"><strong>इस हिन्दी रूपांतर को पूर्णतः निम्न प्रविष्टियों के माध्यम से पढ़ा जा सकता है</strong></p>




<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/11/premature-obituary-of-book-3.html">पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book): 3</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
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		<item>
		<title>पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary Of The Book): 2</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2010/11/premature-obituary-of-book-2.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 01 Nov 2010 13:44:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Translated Articles]]></category>
		<category><![CDATA[Translated Works]]></category>
		<category><![CDATA[Mario Vargas Llosa]]></category>
		<category><![CDATA[Nobel Prize]]></category>
		<category><![CDATA[नोबेल पुरस्कार]]></category>
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		<category><![CDATA[साहित्य क्यों?]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि: साहित्य क्यों? (Why Literature?) हम ज्ञान के विशिष्टीकरण के युग में रह रहे हैं। धन्यवाद देता हूँ और विज्ञान और तकनीक...</p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/11/premature-obituary-of-book-2.html">पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary Of The Book): 2</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
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<p>प्रस्तुत है पेरू के प्रख्यात लेखक मारिओ वर्गास लोसा के एक महत्वपूर्ण, रोचक लेख पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि &#8211; <a href="https://newrepublic.com/article/78238/mario-vargas-llosa-literature" target="_blank" rel="noreferrer noopener nofollow">The premature obituary of the book : Why Literature</a> का हिन्दी रूपान्तर। &#8216;लोसा&#8217; साहित्य के लिए आम हो चली इस धारणा पर चिन्तित होते हैं कि साहित्य मूलतः अन्य मनोरंजन माध्यमों की तरह एक मनोरंजन है, जिसके लिए समय और विलासिता दोनों पर्याप्त जरूरी हैं। साहित्य-पठन के निरन्तर ह्रास को भी रेखांकित करता है यह आलेख। इस चिट्ठे पर क्रमशः सम्पूर्ण आलेख हिन्दी रूपांतर के रूप में 7 किश्तों में उपलब्ध होगा। आज प्रस्तुत है दूसरी किश्त! </p>





<h3 class="wp-block-heading">पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि: साहित्य क्यों? (Why Literature?)</h3>



<p>हम ज्ञान के विशिष्टीकरण के युग में रह रहे हैं। धन्यवाद देता हूँ और विज्ञान और तकनीक के आश्चर्यजनक और शक्तिशाली विकास को और परिणामस्वरुप अगणित खण्डों में ज्ञान के बँट जाने को। यह जो सांस्कृतिक प्रवृत्ति है इसपर संभवतः आनेवाले वर्षों में और बल दिया जायेगा। यह बात सच है कि विशिष्टीकरण के अनेकों लाभ हैं। इससे गहरी छानबीन और महान प्रयोगों की स्थिति बनती है। यह प्रगति का इंजिन ही है, फिर भी इसके नकारात्मक परिणाम भी हैं। क्योंकि यह उन सामान्य बौद्धिक और सांस्कृतिक प्रवृत्तियों को किनारे लगा देता है जो पुरुष और स्त्री को साथ-साथ रहने का संयोग बनाते हैं, उनके आपस में संवाद का सृजन करते हैं और दो वर्गों के मेल की अनुभूति का भाव पैदा करते हैं। विशिष्टीकरण सामाजिक समझ को कम करने में प्रमुख भूमिका निभाता है। यह मनुष्यों को एक ऐसी भीड़ में विभक्त कर देता है जिन्हें टेक्नीशियन या विशेषज्ञ कहेंगे। </p>



<p>ज्ञान के विशिष्टीकरण को एक विशिष्ट भाषा की आवश्यकता होती है, जिनमें दुर्बोध संकेतों की बाढ़ होती है, क्योंकि सूचना अधिक से अधिक विशिष्ट और खंडों में विभक्त होती है। इसी विशेषता और विभाजन की ओर संकेत करते हुए एक पुरानी कहावत ने सचेत किया है– शाखा या पत्ती पर बहुत अधिक ध्यान मत दो, कहीं ऐसा न हो कि तुम यह भूल जाओ कि वे एक वृक्ष के अंग हैं, या वृक्ष पर अधिक ध्यान मत दो, कहीं ऐसा न हो कि&nbsp; वृक्ष एक जंगल का हिस्सा है यह भूल&nbsp; जाय। वन की उपस्थिति के प्रति सचेत रहना एक समानता की भावना को पैदा करता है, एक ऐसी भावना को उपस्थित करता है जो समाज को आपस में बाँधे रहती है और इसे असंख्य आत्मकेन्द्रित या अहंवादी विशेष खंड से बचाए रखती है। राष्ट्रों और व्यक्तियों का अहमन्यवादी होना एक संभ्रम और उन्माद को जन्म देता है। उससे वास्तविकता खंड-खंड हो जाती है और घृणा, युद्ध और यहाँ तक कि जाति-संहार भी उत्पन्न हो जाता है।</p>



<div class="wp-block-columns is-layout-flex wp-container-core-columns-is-layout-9d6595d7 wp-block-columns-is-layout-flex">
<div class="wp-block-column is-layout-flow wp-block-column-is-layout-flow" style="flex-basis:66.66%">
<h3 class="wp-block-heading has-luminous-vivid-orange-color has-text-color">विज्ञान और तकनीकी की भूमिका</h3>



<p>हमारे समय में विज्ञान और तकनीकी संघटित करने या जोड़ने का कार्य नहीं कर सकते। खास कर इसलिए कि उसमें अनन्त ज्ञान का खजाना है और उसके विस्तारीकरण की पर्याप्त गति है। इसका फल है कि विशिष्टीकरण और अस्पष्टता उत्पन्न हो जाती है। लेकिन साहित्य एक प्रमुख सामान्य मूल्य के रूप में मनुष्य के अनुभवों के साथ रहा है, है और आगे भी रहेगा जिससे मनुष्य अपने को पहचानते हैं और एक दूसरे के साथ विचारों का आदान-प्रदान करते हैं, चाहे उनका पेशा, उनकी जीवन की योजनाएँ, उनका भौगोलिक और सांस्कृतिक स्थान,उनकी व्यक्तिगत समस्याएँ कितनी भी भिन्न क्यों न हों। यह मनुष्यों को उनकी हर विशेषताओं के साथ अपनी ऐतिहासिकता से परे पहुँचा देता है।&nbsp;</p>



<p><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Miguel_de_Cervantes">सर्वेंटिस (Cervantes)</a>,&nbsp;<a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%B0">शेक्सपियर</a>&nbsp;<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/William_Shakespeare">(Shakespeare)</a>,&nbsp;<a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%87_%E0%A4%90%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%97%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%80">दाँते</a>&nbsp;<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dante_Alighieri">(Dante)</a> और&nbsp;<a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B_%E0%A4%9F%E0%A5%89%E0%A4%B2%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%89%E0%A4%AF">ताल्सतॉय</a>&nbsp;<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Leo_Tolstoy%20">(Tolstoy)</a> के पाठक के रूप में हम यह पाते हैं कि प्रत्येक अपने समय और स्थान की सीमा को पार कर गया है और हम स्वयं को उसी जाति के लोगों के बीच का पाते हैं। क्योंकि इन लेखकों की रचनाओं में हम एक मनुष्य के रूप में हिस्सा बँटाते हैं जो पूरे विभेदों के बीच में भी हमें विलग होने से रोके रखता है। </p>



<h3 class="wp-block-heading has-luminous-vivid-orange-color has-text-color">साहित्य हर विखंडन से बचाता है</h3>



<p>साहित्य के अतिरिक्त दूसरी ऐसी कोई अच्छी चीज नहीं है जो ईर्ष्या, जातीयता, धार्मिक और राजनीतिक कट्टरपना से हमारी रक्षा कर सके, और एक खास राष्ट्रवाद से हमें बचा सके। यह सत्य महान साहित्य में ही दिखायी पड़ता है कि सम्पूर्ण राष्ट्रों और सभी स्थानों के नर-नारी वास्तविक रूप से एक समान हैं। केवल अन्याय ही उनमें विभेद, वर्गीकरण और विखण्डन का बीज बोता है।</p>



<p>राष्ट्रीय या जातिगत या सांस्कृतिक विभेदों के बीच भी अपनी मानवता की विरासत की सम्पन्नता को साहित्य के अतिरिक्त अच्छी तरह से और कौन सिखा सकता है,और साहित्य के अतिरिक्त कौन बता सकता है&nbsp; कि वे विभिन्नताएं मानवता की बहुवर्णी रचनात्मकता का प्रकटीकरण ही हैं। </p>



<p>वास्तव में अच्छा साहित्य पढ़ना एक आनन्द की अनुभूति की बात है, लेकिन यह उस सीख की भी अनुभूति है कि हम अपनी एकता और अपूर्णता में, अपने कर्मों, अपने स्वप्नों और अपनी प्रतिछाया में, अकेले या औरों के साथ रहकर, जनसामान्य के बीच की छवि और एकांत में चेतना के अवकाश की स्थिति में क्या हैं और कैसे हैं।</p>
</div>



<div class="wp-block-column is-layout-flow wp-block-column-is-layout-flow" style="flex-basis:33.33%">

<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-medium"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa.webp 1200w" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" width="300" height="200" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa-300x200.jpg?x47177" alt="Nobel Prize winner for Literature in 2010, Mario Vargas Llosa" class="wp-image-4057" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa-300x200.jpg 300w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa-1024x683.jpg 1024w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa-768x512.jpg 768w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa-409x273.jpg 409w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /></picture></figure>
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<h3 class="wp-block-heading has-text-align-left"><a href="https://en.wikipedia.org/wiki/Mario_Vargas_Llosa" target="_blank" rel="noreferrer noopener nofollow">Mario Vargas Llosa</a></h3>



<p>पेरू के प्रतिष्ठित साहित्यकार। कुशल पत्रकार और राजनीतिज्ञ भी। वर्ष २०१० के लिए साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता।</p>



<p><strong>जन्म :</strong> २८ मार्च, १९३६</p>



<p><strong>स्थान :</strong> अरेक्विपा (पेरू)&nbsp;</p>



<p><strong>रचनाएं :</strong> द चलेंज–१९५७; हेड्स – १९५९; द सिटी एण्ड द डौग्स- १९६२; द ग्रीन हाउस – १९६६;&nbsp; प्युप्स –१९६७; कन्वर्सेसन्स इन द कैथेड्रल – १९६९; पैंटोजा एण्ड द स्पेशियल -१९७३; आंट जूली अण्ड स्क्रिप्टराइटर-१९७७; द एण्ड ऑफ़ द वर्ल्ड वार-१९८१; मायता हिस्ट्री-१९८४; हू किल्ड पलोमिनो मोलेरो-१९८६; द स्टोरीटेलर-१९८७;प्रेज़ ऑफ़ द स्टेपमदर-१९८८;डेथ इन द एण्डेस-१९९३; आत्मकथा–द शूटिंग फ़िश-१९९३।</p>


</div>
</div>



<h3 class="wp-block-heading has-luminous-vivid-orange-color has-text-color">सम्पूर्ण मानवता का ज्ञान केवल साहित्य में है</h3>



<p>जैसा&nbsp;<strong>ईसा बर्लिन</strong>&nbsp;(<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Isaiah_Berlin">Isaiah Berlin</a>) कहा करता था कि इन विरोधाभासी सत्यों का सम्पूर्ण योग ही मनुष्य की परिस्थितियों के सार तत्व का निर्माण करता है। आज के संसार में यह जीवन्त और सम्पूर्ण मानवता का ज्ञान केवल साहित्य में ही पाया जा सकता है। मानविकी की और किसी भी शाखा में चाहे दर्शन, इतिहास या कला हो ऐसा कहीं नहीं पाया जाता, और निश्चित रूप से सामाजिक विज्ञान भी एकता का सूत्र सँजोने में सफल नहीं हुए हैं, यह वैश्विक संवाद बनाने में सफल नहीं हुए हैं। इन मानविकी शाखाओं को भी ज्ञान के वर्गीकरण, उपवर्गीकरण का कैंसर लग गया है। ये अपने को भी किसी खंड या तकनीकी क्षेत्र में समेटने में लग गए हैं जहाँ के विचार और शब्द सामान्य नर-नारी की पहुँच के परे है। </p>



<p>कुछ आलोचक या सिद्धान्तवादी साहित्य को भी विज्ञान में बदल देना चाहेंगे, लेकिन ऐसा कभी नहीं होगा, क्योंकि उपन्यास केवल एक क्षेत्र या अनुभव को खोजने के लिए नहीं होता। यह कल्पना के द्वारा मनुष्य जीवन की सम्पूर्णता को समृद्ध बनाने के लिए होता है जिसको लोगों से अलग नहीं किया जा सकता, विखंडित नहीं किया जा सकता और न तो ऐसे विशिष्ट आकार-प्रकार को सूत्रबद्ध कर सकता है जो किसी से अज्ञात रह जाँय। यह&nbsp;<strong>प्राउस्ट</strong>&nbsp;<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Proust">(Proust)</a>&nbsp;के निरीक्षण का अर्थ ही है कि <strong>“वास्तविक जीवन, अंततः विचारशील और अभिव्यक्त जीवन, पूरी तरह से जिया गया एकमात्र जीवन यदि कोई है तो वह साहित्य है।”</strong>&nbsp;वह अतिशयोक्ति नहीं कर रहा था और न तो अपने निजी व्यवसाय के प्रति अपना स्नेह अभिव्यक्त कर रहा था। वह तो उस खास सिद्धान्त को आगे बढ़ा रहा था कि साहित्य के फलस्वरूप ही जीवन को अच्छी तरह से समझा और जीया जा सकता है, और पूरी तरह से जीया गया जीवन दूसरों के जीने और दूसरों के साथ जीने और उनमें सहभागी होने की आवश्यकता की पूर्ति करता है।</p>



<p>क्रमशः&#8211; <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/11/premature-obituary-of-book-2.html">पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The premature obituary of the </a><a href="https://blog.ramyantar.com/2010/11/premature-obituary-of-book-3.html">book)-</a>3</p>



<figure class="wp-block-embed is-type-video is-provider-youtube wp-block-embed-youtube wp-embed-aspect-16-9 wp-has-aspect-ratio"><div class="wp-block-embed__wrapper">
<iframe loading="lazy" title="Visual Essay : Why Literature - Mario Vargas Llosa || आलेख : साहित्य क्यों?" width="726" height="408" src="https://www.youtube.com/embed/20Ksf7o5w_M?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" referrerpolicy="strict-origin-when-cross-origin" allowfullscreen></iframe>
</div><figcaption class="wp-element-caption"><strong>Visual Essays: Why Literature &#8211; Mario Vargas Llosa</strong></figcaption></figure>





<p class="has-text-align-center has-white-color has-vivid-purple-background-color has-text-color has-background"><strong>इस हिन्दी रूपांतर को पूर्णतः निम्न प्रविष्टियों के माध्यम से पढ़ा जा सकता है</strong></p>




<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/11/premature-obituary-of-book-2.html">पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary Of The Book): 2</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
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		<item>
		<title>पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The premature obituary of the book)</title>
		<link>https://blog.ramyantar.com/2010/10/premature-obituary-of-book.html</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Himanshu Pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 31 Oct 2010 10:06:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Translated Articles]]></category>
		<category><![CDATA[Translated Works]]></category>
		<category><![CDATA[Mario Vargas Llosa]]></category>
		<category><![CDATA[Nobel Prize]]></category>
		<category><![CDATA[नोबेल पुरस्कार]]></category>
		<category><![CDATA[मारिओ वर्गास लोसा]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य क्यों?]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>प्रस्तुत है पेरू के प्रख्यात लेखक मारिओ वर्गास लोसा के एक महत्वपूर्ण, रोचक लेख The premature obituary of the book : Why Literature का हिन्दी...</p>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/10/premature-obituary-of-book.html">पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The premature obituary of the book)</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p>प्रस्तुत है पेरू के प्रख्यात लेखक मारिओ वर्गास लोसा के एक महत्वपूर्ण, रोचक लेख <a href="https://newrepublic.com/article/78238/mario-vargas-llosa-literature" target="_blank" rel="noreferrer noopener nofollow">The premature obituary of the book : Why Literature</a> का हिन्दी रूपान्तर। &#8216;लोसा&#8217; साहित्य के लिए आम हो चली इस धारणा पर चिन्तित होते हैं कि साहित्य मूलतः अन्य मनोरंजन माध्यमों की तरह एक मनोरंजन है, जिसके लिए समय और विलासिता दोनों पर्याप्त जरूरी हैं। साहित्य-पठन के निरन्तर ह्रास को भी रेखांकित करता है यह आलेख। इस चिट्ठे पर क्रमशः सम्पूर्ण आलेख हिन्दी रूपांतर के रूप में 7 किश्तों में उपलब्ध होगा। आज प्रस्तुत है पहली किश्त!</p>



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<h3 class="wp-block-heading" id="0-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82-why-literature-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%93-%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%B8-%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%B8%E0%A4%BE-mario-vargas-llosa">साहित्य क्यों? (Why Literature?): मारिओ वर्गास लोसा (Mario Vargas Llosa)</h3>



<p class="has-drop-cap">पुस्तक मेलों या पुस्तक की दुकानों पर प्रायः ऐसा होता रहता है कि कोई सज्जन व्यक्ति मेरे पास आता है और मुझसे हस्ताक्षर की बात करता है, और कहता है, <em>“यह मेरी पत्नी के लिए है, मेरी छोटी लड़की के लिए है या मेरी माँ के लिए है।&#8221;</em> वह इसे स्पष्ट करते हुए कहता है कि वह बहुत बड़ी पढ़ने वाली है और साहित्य से प्रेम करती है। मैं तुरंत पूछ बैठता हूँ, <em>“और तुम्हारी अपने बारे में क्या स्थिति है? क्या तुम्हें पढ़ना पसन्द नहीं है?”</em> एक ही तरह का उत्तर प्रायः मिला करता है, <em>“वास्तव में मुझे पढ़ना पसन्द है किन्तु मैं बहुत व्यस्त आदमी हूँ।”</em> दर्जनों बार मैंने ऐसा स्पष्टीकरण सुना है। </p>



<p>यह आदमी और इसी तरह के हज़ारों आदमी ऐसे हैं जिन्हें अनेकों महत्वपूर्ण कार्य करने हैं, उनकी अनेकों प्रतिबद्धताएँ हैं, अनेकों उत्तरदायित्व हैं और वे अपना मूल्यवान समय किसी उपन्यास में सिर गड़ा कर, कोई कविता की किताब पढ़ते हुए या घंटों-घंटों साहित्यिक लेख पढ़ते हुए नष्ट नहीं करना चाहते हैं। इस व्यापक विचारधारा के अनुसार साहित्य एक गौण क्रिया-कलाप है। निःसन्देह आनन्ददायक और लाभदायक है जो संवेदनाएं और अच्छे रंग-ढंग प्रदान करता है, लेकिन वास्तव में यह एक मनोरंजन है, एक प्यारा मनोरंजन है जिसे आदमी केवल मनोरंजन के लिए ही प्रयोग में लाने पर समय दे सकता है। यह कुछ ऐसी चीज है जो खेलों, चलचित्रों, ताश या शतरंज के खेल के बीच में बैठाई जा सकती है, और बिना सिर खपाए इसको बलिदान कर दिया जा सकता है जब जीवन के संघर्ष में कोई कार्य या कोई ड्यूटी “प्राथमिकता” के रूप में अनिवार्य रूप से सामने आ जाती हो।</p>



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<div class="wp-block-column is-layout-flow wp-block-column-is-layout-flow" style="flex-basis:66.66%">
<p>ऐसा स्पष्ट मालूम होता है कि साहित्य अधिक से अधिक औरतों के क्रिया-कलाप की चीज हो गयी है। पुस्तक की दुकानों में, किसी सम्मेलन में या लेखकों के सार्वजनिक पठन में और मानविकी के लिए समर्पित विश्वविद्यालय के विभागों में भी स्त्रियाँ स्पष्ट रूप से पुरुषों से आगे निकल जाती हैं। पारंपरिक रूप से ऐसा स्पष्टीकरण दिया जाता है कि मध्यमवर्ग की स्त्रियाँ ज्यादा इसलिए पढ़ती हैं क्योंकि वे पुरुषों की अपेक्षा कम काम करती हैं और उनमें से अनेकों ऐसा अनुभव करती हैं कि वे पुरुषों की अपेक्षा आसानी से उस समय को प्रयोग में ला सकती हैं जो उनके द्वारा कल्पनाओं और भावों के लिए समर्पित किया जाता है। मैं कुछ हद तक ऐसी व्याख्याओं से खीझ जाता हूँ जो पुरुष और स्त्रियों को एक असंवेदनशील श्रेणी में विभक्त कर देती हैं और प्रत्येक वर्ग को उनके गुण, चरित्र और उनकी कमियों के रूप में स्थापित कर देती हैं; लेकिन निःसन्देह साहित्य के कम से कम पाठक हैं और जो थोड़े बहुत पाठक रह भी गए हैं स्त्रियाँ उनकों पीछे छोड़ देती हैं।</p>



<p>प्रायः यही दशा हर जगह है। उदाहरण के लिए स्पेन में ’जनरल सोसाइटी ऑफ स्पेनिश राइटर्स’ (General Society of Spanish Writers) ने अपने ताजा सर्वेक्षण में इस बात को अभिव्यक्त किया है कि देश की जनसंख्या का आधा भाग कभीं भी कोई किताब नहीं पढ़ा है। इस सर्वेक्षण ने यह भी बताया है कि उन कम लोगों में, जो पढ़ते भी हैं, उनमें स्त्रियाँ जो पठनशील हैं वे पुरुषों से ६.२ प्रतिशत के हिसाब से आगे निकल जाती हैं। यह एक ऐसा अन्तर है जो बढ़ता हुआ दिखायी दे रहा है। मुझे इन स्त्रियों से बड़ी प्रसन्नता है, लेकिन मुझे ऐसे मनुष्यों और लाखों-लाखों ऐसे मनुष्यों पर बड़ा दुख होता है, जो पढ़ तो सकते थे लेकिन न पढ़ने का निर्णय ले बैठे।</p>



<p>मुझे ऐसे लोगों पर इसलिए दया नहीं आती है कि वे एक आनन्द को खो रहे हैं बल्कि इसलिए भी कि मुझे विश्वास है कि बिना साहित्य का कोई समाज, या ऐसा समाज जिसमें साहित्य को पदावनत कर दिया गया है वह आध्यात्मिक रूप से उद्दंड होगा। साहित्य को इस तरह से किनारे कर दिया जाय जैसे वह सामाजिक और व्यक्तिगत दोष हो और समाज में उसे एक अलग टुकड़े में बाँट दिया गया हो, तो ऐसा समाज एक असभ्य समाज होगा और यह अपनी स्वतंत्रता को भी खतरे में डाल देगा। मैं साहित्य को अवकाश के क्षणों में विलासिता की वस्तु के विपक्ष में कुछ तर्क प्रस्तुत करना चाहता हूँ और इस पक्ष में तर्क देना चाहता हूँ कि साहित्य मस्तिष्क के क्रियाकलापों के लिए एक प्राथमिक और आवश्यक वस्तु है और आधुनिक प्रजातांत्रिक समाज, स्वतंत्र व्यक्तियों के समाज के लिए नागरिकों के निर्माण कार्य की एक ऐसी वस्तु है जिसे हटाया नहीं जा सकता है।    </p>
</div>



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<figure class="aligncenter size-medium"><picture><source srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa.webp 1200w" type="image/webp" /><img loading="lazy" decoding="async" width="300" height="200" src="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa-300x200.jpg?x47177" alt="Nobel Prize winner for Literature in 2010, Mario Vargas Llosa" class="wp-image-4057" srcset="https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa-300x200.jpg 300w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa-1024x683.jpg 1024w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa-768x512.jpg 768w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa-409x273.jpg 409w, https://blog.ramyantar.com/wp-content/uploads/2022/10/Mario_Vargas_Llosa.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /></picture></figure>
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<h3 class="wp-block-heading has-text-align-left" id="1-mario-vargas-llosa-"><a href="https://en.wikipedia.org/wiki/Mario_Vargas_Llosa" target="_blank" rel="noreferrer noopener nofollow">Mario Vargas Llosa</a></h3>



<p>पेरू के प्रतिष्ठित साहित्यकार। कुशल पत्रकार और राजनीतिज्ञ भी। वर्ष २०१० के लिए साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता।</p>



<p><strong>जन्म :</strong> २८ मार्च, १९३६</p>



<p><strong>स्थान :</strong> अरेक्विपा (पेरू)&nbsp;</p>



<p><strong>रचनाएं :</strong> द चलेंज–१९५७; हेड्स – १९५९; द सिटी एण्ड द डौग्स- १९६२; द ग्रीन हाउस – १९६६;&nbsp; प्युप्स –१९६७; कन्वर्सेसन्स इन द कैथेड्रल – १९६९; पैंटोजा एण्ड द स्पेशियल -१९७३; आंट जूली अण्ड स्क्रिप्टराइटर-१९७७; द एण्ड ऑफ़ द वर्ल्ड वार-१९८१; मायता हिस्ट्री-१९८४; हू किल्ड पलोमिनो मोलेरो-१९८६; द स्टोरीटेलर-१९८७;प्रेज़ ऑफ़ द स्टेपमदर-१९८८;डेथ इन द एण्डेस-१९९३; आत्मकथा–द शूटिंग फ़िश-१९९३।</p>


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<p>क्रमशः&#8211; <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/11/premature-obituary-of-book-2.html">पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The premature obituary of the book)-2</a></p>



<figure class="wp-block-embed is-type-video is-provider-youtube wp-block-embed-youtube wp-embed-aspect-16-9 wp-has-aspect-ratio"><div class="wp-block-embed__wrapper">
<iframe loading="lazy" title="Visual Essay : Why Literature - Mario Vargas Llosa || आलेख : साहित्य क्यों?" width="726" height="408" src="https://www.youtube.com/embed/20Ksf7o5w_M?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" referrerpolicy="strict-origin-when-cross-origin" allowfullscreen></iframe>
</div><figcaption class="wp-element-caption"><strong>Visual Essays: Why Literature &#8211; Mario Vargas Llosa</strong></figcaption></figure>
<p>The post <a href="https://blog.ramyantar.com/2010/10/premature-obituary-of-book.html">पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The premature obituary of the book)</a> appeared first on <a href="https://blog.ramyantar.com">Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्</a>.</p>
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