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कई बार निर्निमेष अविरत देखता हूँ उसे

कई बार निर्निमेष अविरत देखता हूँ उसे यह निरखना उसकी अन्तःसमता को पहचानना है मैं महसूस करता हूँ नदी बेहिचक बिन विचारे अपना सर्वस्व उड़ेलती है फिर भी वह अहमन्य नहीं होता सिर नहीं फिरता उसका; उसकी अन्तःअग्नि, बड़वानल दिन…

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पर्यावरण के प्रति प्रेम का अनूठा प्रतीक-बंधन

राखी बीत गयी । बहुत कुछ देखा, सुना, अनुभूत किया – पर एक दृश्य अनावलोकित रह गया, एक अनुभव फिसल गया । मेरे कस्बे सकलडीहा के बहुत नजदीक के एक गाँव की दो बच्चियों ने रक्षाबंधन पर राखी बाँधी ,…

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पाँच पुरुषों की कामिनियाँ

द्रौपदी के पाँच पुरुषों की पत्नी होने पर बहुत पहले से विचार–विमर्श होता रहा है । अनेक प्रकार के रीति–रिवाजों और प्रथाओं का सन्दर्भ लेकर इसकी व्याख्या की जाती रही है । अपने अध्ययन क्रम में मुझे अचानक ही श्री…

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रावण की भुजाओं के अस्त्र-शस्त्र एवं अन्य प्रतीक

आत्म रामायण के प्रतीकों की चर्चा करती हुई कल की प्रविष्टि का शेष आज लिख रहा हूँ । रावण की भुजाओं के अस्त्र-शस्त्र एवं काटने वाले बाण अस्त्र-शस्त्र काटने वाले बाण कुबुद्धिक मान पाप-बाण विश्चासघात चक्र हिंसा-खड्ग परद्रोह नेजा(बघ नख)…

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रावण के दस सिर और उन्हें काटने वाले बाण

मेरे एक मित्र यूँ तो चिट्ठाकारी नहीं करते, पर चिट्ठा-चर्चा और अन्य चिट्ठे पढ़ते जरूर हैं। यद्यपि इन्हें पढ़ने का उनका शौक मेरे ही कम्प्यूटर से पूरा हो पाता है, क्योंकि मेरे कस्बे में दूसरी जगहों पर इण्टरनेट केवल व्यावसायिक…