निवृत्ति की चाह रहीअथ से भी
इति से भी ।
अथ पर ही अटका मन
इति को तो भूल गया
गति भी अनजान हुई ।
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मैं क्या हूँ? क्या सुनहली उषा में जो खो गया, वह तुहिन बिन्दु या बीत गयी जो तपती दुपहरी उसी का विचलित पल; या फिर जो धुँधुरा गयी है शाम अभी-अभी उसी की उदास छाया? मैं क्या हूँ? जो सम्मुख हो रही है इस अन्तर-आँगन में वही ध्वनि, या किसी सुदूर बहने वाली किसी निर्झर-नदी का अस्पष्ट नाद? मैं क्या हूँ? बार-बार कानों में जाने अनजाने गूँज उठने वाली किसी दूरागत संगीत की मूर्छित लरी या फिर जिस आकाश को निरख रहा हूँ लगातार,उस आकाश का एक तारा?
मैं क्या हूँ? जानना इतना आसान भी तो नहीं!
सावित्री के महनीय चरित्र को उद्घाटित करतीं नाट्य प्रविष्टियाँ
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राजा हरिश्चन्द्र के सत्यनिष्ठ-चरित्र पर आधारित नाटक
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7 comments:
कम शब्द - गहरी बात।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
सुंदर और गहन अभिव्यक्ति.
रामराम.
मेरी भी स्थिति इन दिनों कुछ ऐसी ही चल रही है -मैंने इसे वैराग्य के रूप में लिया है !
यह तो अति हो गयी.
अथ इति के बहाने एक गम्भीर कविता पढने को मिली।
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TSALIIM
SBAI
हिमान्शु जी,
आपकी कविताएं कम शब्दों में ही बड़ी बात कह जाती हैं। साधुवाद।
आपने मेरे ब्लॉग पर आकर उत्साहबर्द्धन किया। आपका शुक्रिया।
छोटे छोटे शब्दों में छुपा कर गहरी बात कही है............
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निकष रखने वाले हैं आप....सो छिद्रान्वेषण और छुद्र-आलोचना से परे जो कहेंगे सिर आँखों पर। आपकी दुलराती, सहलाती, फटकारती टिप्पणियाँ इस रचनाकार को आत्मस्थ करेंगी। अग्रिम आभार।