2 मई 2009

अथ-इति

निवृत्ति की चाह रही
अथ से भी
इति से भी ।

अथ पर ही अटका मन
इति को तो भूल गया
गति भी अनजान हुई ।

7 comments:

श्यामल सुमन ने कहा…

कम शब्द - गहरी बात।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

सुंदर और गहन अभिव्यक्ति.

रामराम.

Arvind Mishra ने कहा…

मेरी भी स्थिति इन दिनों कुछ ऐसी ही चल रही है -मैंने इसे वैराग्य के रूप में लिया है !

P.N. Subramanian ने कहा…

यह तो अति हो गयी.

महामंत्री - तस्लीम ने कहा…

अथ इति के बहाने एक गम्‍भीर कविता पढने को मिली।

-----------
TSALIIM
SBAI

रचना त्रिपाठी ने कहा…

हिमान्शु जी,

आपकी कविताएं कम शब्दों में ही बड़ी बात कह जाती हैं। साधुवाद।
आपने मेरे ब्लॉग पर आकर उत्साहबर्द्धन किया। आपका शुक्रिया।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

छोटे छोटे शब्दों में छुपा कर गहरी बात कही है............

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