16 मई 2013

नल दमयंती -4

पहलीदूसरी एवं तीसरी कड़ी से आगे...

A play based on the story of Nal and Damayanti
पंचम दृश्य 
(दमयंती स्वयंवर का महोत्सव। नृत्य गीतादि चल रहे हैं। राजा महाराजा पधार रहे हैं। सब अपने अपने निवास स्थान पर यथास्थान विराजित होते हैं। सुन्दरी दमयंती अपनी अंगकांति से राजाओं के मन और नेत्रों को अपनी ओर आकर्षित करती हुई रंगमंडप में प्रवेश करती है। संग में सखी मंडल है। हाथ में वरमाला है। राजाओं का परिचय दिया जा रहा है।)

दमयंती: (सखियों के मुख की ओर निहारती है, फिर रंगभूमि की ओर देखती है, फिर चकित हो कर स्वगत भाषण करती हुई एक-एक को देखकर आगे बढ़ने लगती है। आगे एक ही स्थान पर नल के समान आकार और वेषभूषा के पाँच राजाओं को इकट्ठे ही बैठे हुए देखती है। संदेह और विस्मय के साथ स्वयमेव स्वयं से बातें कर रही है।) 
अरे! मेरे प्राणेश्वर नल कौन है,यह कैसे जानूँ? कौन देवता हैं, कौन मेरे हृदयेश्वर हैं, यह कैसे पहचानूँ? (ठिठक जाती है, फिर अपनी अंगुलियों को अपने वक्षस्थल पर स्थापित कर दीर्घश्वांस भरती हुई कहने लगती है) बन्द करो मेरे दुर्भाग्य, यह नंगा नाच! अरे जगन्नियंता! मेरे किस अपराध की सजा मिलने वाली है। अरे मेरे व्याकुल नयन! तुम कौन-सा दृश्य देख रहे हो? जीवनधन कहाँ हो? हे विरहाग्नि में संतप्त होते हुए हृदय, यदि तुम लौहमय हो तो द्रवित क्यों नहीं होते। अरे जीवन! क्यों विलम्ब करते हो? तुम्हारा निवासभूत यह हृदय जल रहा है। क्यों नहीं निकल जाते? अरे मंद-मंद बहते हुए मारुत! यदि विरहाग्नि में मैं जल कर मरूँ तो दीन वचन कह कर प्रार्थना करती हूँ कि मेरे मृत शरीर की भस्म को उत्तर दिशा में स्थित निषध देश में उड़ते हुए पहूँचा देना। ओ राजहंस! नल का संदेश देने वाले प्यारे विहंगम! किस तड़ाग में छिप गए हो? तुम मिल जाते तो मेरी इस यातना को मेरे हृदयेश्वर से परिचित करा देते। प्यारे नल! हे हृदयेश्वर! आपको वरण किए बिना ही यदि मेरे हतभाग्य प्राण निकल जाँय तो जन्म जन्मांतर में भी मैं हृदय से अनुरक्त हो कर आप को ही पुनः प्राप्त करूँ, यही मेरी याचना है। अनसुनी मत करना देव! छोड़ना मत प्राणनाथ! 

यह प्रस्तुति

नल दमयंती की यह कहानी अद्भुत है। भारत वर्ष के अनोखे अतीत की पिटारी खोलने पर अमूल्य रत्नों की विशाल राशि विस्मित करती है। इस पिटारी में यह कथा-संयोग ऐसा ही राग का एक अनमोल चमकता मोती है। भाव-विभाव और संचारी भाव ऐसे नाच उठे हैं कि अद्भुत रस की निष्पत्ति हो गयी है। निषध राजकुमार नल और विदर्भ राजकुमारी दमयंती के मिलन-परिणय की अद्भुत कथा है यह। रुदन, हास, मिलन, विछोह के मनके इस तरह संयुक्त हो उठे हैं इस कहानी में कि नल दमयंती मिलन की एक मनोहारी माला बन गयी है- अनोखी सुगंध से भरपूर। नल दमयंती की यह कथा नाट्य-रूप में संक्षिप्ततः प्रस्तुत है। दृश्य-परिवर्तन के क्रम में कुछ घटनायें तीव्रता से घटित होती दिखेंगी। इसका कारण नाट्य के अत्यधिक विस्तृत  हो जाने का भय है, और शायद मेरी लेखनी की सीमा भी। प्रस्तुत है पहलीदूसरीतीसरी के बाद चौथी कड़ी।

(फिर देवताओं से ही हाथ जोड़कर प्रणामपूर्वक स्तुति करती हुई-) हे देवताओं! हंसों के मुख से नल का वर्णन सुनकर मैंने उन्हें पति रूप से वरण कर लिया है। मैं मन से और वाणी से नल के अतिरिक्त किसी को भी नहीं चाहती। देवताओं! आपने ही, आपकी भाग्यविधाता सृष्टि ने ही, निषधेश्वर नल को ही मेरा पति बना दिया है, तथा मैंने नल की आराधना के लिए ही यह व्रत प्रारंभ किया है। मेरी इस सत्य शपथ के बल पर देवता लोग मुझे उन्हें ही दिखला दें। मैं  विनीता करबद्ध प्रार्थना करती हूँ। ऐश्वर्यशाली लोकपालों! आप लोग अपना रूप प्रकट कर दें, जिससे मैं पुण्यश्लोक नराधिराज राजा नल को पहचान लूँ।
(दमयंती का अंतर्विलाप सुन कर देवता द्रवित हो जाते हैं। वे उसके दृढ़ निश्चय, सच्चे प्रेम, आत्मशुद्धि, बुद्दि, भक्ति और नल परायणता को देख कर उसे देवता और मनुष्य में भेद करने की शक्ति प्रदान कर देते हैं। उसको हृदय में ’विजयी भव’ का शब्द सुनायी पड़ता है।)

दमयंती: (पुनः चमत्कृत होती हुई) अहा! अहा! अब तो पार्थक्या मुझे साफ दिखायी देने लगा है। देवताओं के शरीर पर पसीना नहीं है। पलकें गिरती नहीं हैं। उनकी ग्रीवा में पड़ी पुष्पमाला कुम्हलायी नहीं है। शरीर पर मैल नहीं है। वे सिंहासन पर स्थित हैं पर उनके पैर धरती को नहीं छूते और उनकी परछाईं नहीं पड़ती। इधर नल के शरीर की छाया पड़ रही है। माला कुम्हला गयी है। शरीर पर कुछ धूल और पसीना भी है। पलकें बराबर गिर रही हैं। अब मैं पहचान गयी। (फिर सकुचा कर घूँघट काढ़ लेती हैं, और नल के गले में वरमाला डाल देती हैं। देवता और महर्षि साधु-साधु कहने लगते हैं। पुष्पवृष्टि होने लगती है। राजागण आश्चर्यचकित हो जाते हैं।) 

नल: (आनंद से फूले न समाते हुए) कल्याणी! तुमने देवताओं के सामने रहते हुए भी उन्हें वरण न करके मुझे ही वरण कर लिया है, इसलिए तुम मुझको प्रेम परायण पति समझना। मैं तुम्हारी बात मानूँगा। जब तक मेरे शरीर में प्राण रहेंगे तब तक मैं तुमसे प्रेम करूँगा, यह मैं तुमसे शपथ पूर्वक कहता हूँ। तुम्हारे योग्य आसन मेरा वक्षस्थल ही है। निष्कपट दूतता करने से इन्द्रादि देव मुझ पर दया करें। (देवता बहुत प्रसन्न होकर प्रकट हो जाते हैं तथा नल को वरदान देते हुए फूल बरसान लगते हैं।)

इन्द्र: नल! तुम्हें यज्ञ में मेरा स्मरण करते ही दर्शन होगा और उत्तम गति मिलेगी।

अग्नि: राजा नल! जहाँ तुम मेरा स्मरण करोगे, वहीं मैं प्रकट हो जाऊँगा। मेरे ही समान प्रकाशमय लोक तुम्हें प्राप्त होंगे।

यम: नल! तुम्हारी बनायी हुई रसोई बहुत मीठी होगी और स्मरण रखो, तुम अपने धर्म में सदा दृढ़ रहोगे।

वरुण: हे महाराज! जहाँ तुम चाहोगे,वहीं जल प्रकट हो जाएगा। तुम्हारी माला निरंतर उत्तम गंध से परिपूर्ण रहेगी।
(सभी समवेत आशीर्वाद देते हैं।) 
(राजा नल महाराज भी की राजधानी कुण्डिनपुर में राजसम्मान से सुशोभित होते हैं। महामहोत्सव मनाया जाता है। तदनन्तर राजा भीम की अनुमति प्राप्त करके महाराज नल दमयंती के साथ अपनी राजधानी लौट आते हैं।)

(पर्दा गिरता है।)

27 मार्च 2013

होली, होली, होली

Happy Holi
मुझे वहीं ले चलो मदिर मन जहाँ दिवानों की मस्त टोली 
होली, होली, होली।

कभी भंग मे, कभी रंग में, कभीं फूल से खिले अंग में
कभी राग में, कभी फाग में, कभीं लचक उठती उमंग में
पीला कोई गाल न छूटे मल दो सबमें कुंकुम रोली - 
होली, होली, होली॥१॥

किसी षोडसी का थाम अंचल, वसंत गा ले वयस्क चंचल 
सतरंगी भींगी कंचुकि में, भटक अटकना सदैव मनचल 
भर पेटाँव वैकुण्ठ भोग है, वसंत बाला की मस्त बोली -
होली, होली, होली॥२॥

जग की रंजित परिधि बढ़ा दो, वसंत की रागिनी पढ़ा दो
प्रति उल्लास हर्ष वनिता को रंग भरी चूनरी उढ़ा दो 
हर तरुणी का चुम्बन कर लो भुला के बातों में भोली-भोली -
होली, होली, होली॥३॥

रंगों की इन्द्रधनुषी माया, सबकी सुरभित बना दो काया 
हुड़दंगी स्वर में झूम गाओ, ’वसंत आया, वसंत आया’
’फागुन में प्रियतमे न रूठो, कर दो अबकी माफ ठिठोली’ -
होली, होली, होली॥४॥

26 मार्च 2013

नल दमयंती -3

पहली एवं दूसरी कड़ी से आगे...

A play based on the story of Nal and Damayanti
नल: (उसकी बाहें पकड़कर सम्हालते हुए तथा आँसू पोंछते हुए) सुकुमारी! रोना अशुभ है, अतः मत रोओ। यदि मेरे अपराध के कारण तुम रो रही हो तो उस अपराध के लिए राजा नल हाथ जोड़कर क्षमा माँगता है। निष्कारण क्रोध न करो, प्रिये! क्रोध को छोड़ो। मेरे ऊपर प्रसन्न हो जाओ। चाहे परिणाम जो हो, नल देवताओं के प्रतिशोध को झेल लेगा। तुम अधरों को मधुर हास्य से सुशोभित करो। नेत्रों को अपनी विलास लीला से चंचल करो। दृग बिन्दु की वर्षा समाप्त करो। प्रसन्नमुखी हो जाओ। मेरे सिंहासन को अलंकृत करो। मेरे अंक का विशिष्ट अलंकार बनो। तुम मेरी पीर का पराभव करो। वचन से अनुकंपा करो, अन्यथा मैं अब जी नहीं सकता। 

यह प्रस्तुति

नल दमयंती की यह कहानी अद्भुत है। भारत वर्ष के अनोखे अतीत की पिटारी खोलने पर अमूल्य रत्नों की विशाल राशि विस्मित करती है। इस पिटारी में यह कथा-संयोग ऐसा ही राग का एक अनमोल चमकता मोती है। भाव-विभाव और संचारी भाव ऐसे नाच उठे हैं कि अद्भुत रस की निष्पत्ति हो गयी है। निषध राजकुमार नल और विदर्भ राजकुमारी दमयंती के मिलन-परिणय की अद्भुत कथा है यह। रुदन, हास, मिलन, विछोह के मनके इस तरह संयुक्त हो उठे हैं इस कहानी में कि नल दमयंती मिलन की एक मनोहारी माला बन गयी है- अनोखी सुगंध से भरपूर। नल दमयंती की यह कथा नाट्य-रूप में संक्षिप्ततः प्रस्तुत है। दृश्य-परिवर्तन के क्रम में कुछ घटनायें तीव्रता से घटित होती दिखेंगी। इसका कारण नाट्य के अत्यधिक विस्तृत  हो जाने का भय है, और शायद मेरी लेखनी की सीमा भी। प्रस्तुत है पहलीदूसरी के बाद तीसरी कड़ी।

दमयंती: हे प्राणनाथ!  मैं सब देवताओं को प्रणाम करके आप को ही पतिरूप में वरण कर रही हूँ। यह मैं सत्य-सत्य शपथ खा रही हूँ।

नल: प्रिये! ज्यों ही पहली बार पाया तुम्हारी मुख छवि का दर्शन तो देखते ही निमिष मात्र में अन्तरतम्‌ के चिन्मय वातायन खुल गए। मेरे रोम रोम में आत्मरमण का आलोड़न जागा। मैं तन,मन, प्राण, आत्मा के सारे ही धरातलों पर समूचा ही तुमको पा गया। निहाल हो गए मेरे प्राण! देवताओं के वरण का तुमसे अनुरोध करने चला आया। तुम्हें नल ने घोर कष्ट दिया। किन्तु मैं धर्म विरुद्ध  अपना स्वार्थ कैसे साधूँ, कमल नयने!

दमयंती: (नल का मुख अपनी मृणाल कोमल अंगुलियों से ऊपर उठाती हुई गद्गद स्वर में) समझ रही हूँ प्राण! आप की अमोघ धर्मनिष्ठा को कौन नहीं जानता। नरेश्वर! इसके लिए एक निर्दोष उपाय है। इसके अनुसार काम करने से आपको को कोई दोष नहीं लगेगा। उपाय है कि आप लोकपालों के साथ स्वयंवर में मण्डप में आयें। मैं उनके सामने ही आपको वरण कर लूँगी। मेरा विनय अस्वीकार न करें जीवन-धन! 

नल: (दमयंती का सिर सहलाते हुए स्नेहमयी वाणी में)मुझे यशस्वी एवं कृतकार्य बनाने वाली गुणमयी राजकन्ये! तुम्हारी विनयशीलता एवं हृदय की पवित्रता के लिए कोई शब्द नहीं है मेरे पास। विधाता तुम्हें सफल मनोरथा करे। कल स्वयंवर में मुझे सनाथ करना।
(नल का प्रस्थान। पर्दा गिरता है।)

चतुर्थ दृश्य 
(देवता बाहर प्रतीक्षा कर रहे हैं। नल उन्हें प्रणाम करते हुए कहते हैं-)
नल: हे देवगण! मैं आपलोगों की आज्ञा से दमयंती के महल में गया। बाहर अनेकों द्वारपाल पहरा दे रहे थे, परंतु उन्होंने आप लोगों के प्रभाव से मुझे देखा नहीं। केवल दमयन्ती और उसकी सखियों ने मुझे देखा। मैंने दमयंती से आप लोगों के गुण और प्रभाव का विशद वर्णन किया। कोई कोर कसर नहीं छोड़ी, परंतु वह तो आप लोगों को न चाह कर मुझे ही वरण करने पर तुली हुई है। देववरों! वस्तुस्थिति तो यह है कि किसी भी सद्गुण का एक कण भी मुझमें नहीं है और सम्पूर्ण दोषों की जीवंत प्रतिमा हूँ मैं। पर बलिहारी है उसके अनुराग भरे नयनों की- उसके समर्पणपूर्ण उरस्थल की, कि वह केवल, केवल मुझ पर ही न्यौछावर हो गयी थी और उसे मेरे अतिरिक्त अन्य सबकी विस्मृति हो गयी थी। एक बार नहीं शत-सहस्र बार लज्जा में मेरे प्राण जैसे भूमि में समा जाते थे। पर वह समर्पिता मुझे ही अपना जीवन-सर्वस्व मान चुकी थी। उस लावण्यमयी की विभोरावस्था अवर्णनीय है सुरवरों! जल से पूरित  उसके उन नयन सरोजों को मैं भूल नहीं पाता। मैं उस भावमयी के भावों की आँधीं में ऐसा बह गया कि आपलोगों के पास पुनरावर्तित होने में इतना विलम्ब हो गया। उसके ताम्बूलरंजित अधर अभी कम्पित ही थे कि मैं किसी भाँति उसके प्राण रमण की संबोधनमयी वाणी को विस्तृत करता हुआ बाहर आप तक आ गया हूँ।

देवगण: अब तुमसे क्या पूछना और क्या कहना! जब तुम्हारे साथ स्वयंवर में बैठना है, तो कल जो होगा, देखा जायेगा। बाकी बातें व्यर्थ ही हैं। (देवता अदृश्य हो जाते हैं।) 
 (पर्दा गिरता है।) 

क्रमशः---

17 मार्च 2013

सौन्दर्य लहरी - 11

Hindi translation of Saundarya Lahari-a well-known and appriciated tantra and poetic work of Acharya Shankar
’सौन्दर्य-लहरी’ संस्कृत के स्तोत्र-साहित्य का गौरव-ग्रंथ व अनुपम काव्योपलब्धि है। आचार्य शंकर की चमत्कृत करने वाली मेधा का दूसरा आयाम है यह काव्य। निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है ’सौन्दर्य-लहरी’ में। उत्कंठावश इसे पढ़ना शुरु किया था, सुविधानुसार शब्दों के अर्थ लिखे, मन की प्रतीति के लिये सस्वर पढ़ा, और भाव की तुष्टि के लिये हिन्दी में इसे अपने ढंग से गढ़ा। अब यह आपके सामने प्रस्तुत है। ’तर्तुं उडुपे नापि सागरम्’ - सा प्रयास है यह । अपनी थाती को संजो रहे बालक का लड़कपन भी दिखेगा इसमें। सो इसमें न कविताई ढूँढ़ें, न विद्वता। मुझे उचकाये जाँय, उस तरफ की गली में बहुत कुछ अपना अपरिचित यूँ ही छूट गया है। उमग कर चला हूँ, जिससे परिचित होउँगा, उँगली पकड़ आपके पास ले आऊँगा। जो सहेजूँगा,यहाँ लाकर रख दूँगा। पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठीं, सातवीं, आठवीं, नौवीं, दसवीं के बाद आज ग्यारहवीं कड़ी -

गतै-र्माणिक्यत्वं गगनमणिभिः सांद्रघटितं
किरीटं ते हैमं हिमगिरिसुते कीतयति यः ॥
स नीडेयच्छाया-च्छुरण-शकलं चंद्र-शकलं
धनुः शौनासीरं किमिति न निबध्नाति धिषणाम् ॥४१॥

गगनमणि द्वादश दिवाकर
सान्द्र किरण समूह सुघटित
चमत्कृत माणिक्य-सम
कलधौत निर्मित मुकुट तेरा
ध्यान में किसके नहीं
होता स्फुरित यह इन्द्रधनु-सा
ग्रहण कर माणिक्य की द्युति
भाल संस्थित चन्द्रमा में
जो तुम्हारा स्वर्ण मंडित मुकुट है
गिरिबालिके हे!

धुनोतु ध्वांतं न-स्तुलित-दलितेंदीवर-वनं
घनस्निग्ध-श्लक्ष्णं चिकुर निकुरुंबं तव शिवे ।
यदीयं सौरभ्यं सहज-मुपलब्धुं सुमनसो
वसंत्यस्मिन् मन्ये बलमथन वाटी-विटपिनाम् ॥४२॥

जो प्रफुल्लित
चिकुर तेरा सघन कोमल
रुचिर भरित सुगंध
उसका सुरभि भार समेटने को
ललक आ बसते मनोज्ञ प्रसूनगण नंदन विपिन के
वह तुम्हारा रम्य केश कलाप
कर दे सहज मेरे हृदय संस्थित
घन तिमिर का नाश
छविचिकुरे शिवे हे!

वहंती- सिंदूरं प्रबलकबरी-भार-तिमिर
द्विषां बृंदै-र्वंदीकृतमेव नवीनार्ककिरणम् ॥

तनोतु क्षेमं न-स्तव वदनसौंदर्यलहरी
परीवाहस्रोतः-सरणिरिव सीमंतसरणिः।
४३॥

सघन श्यामल केश-दल में
राजती सिन्दूर रेखा
बैरियों को बाँध जैसे
नवल दिनमणि की किरण हो
वह ललाम चटक
तुम्हारे भाल की सिन्दूर रेखा
विलसती जैसे तुम्हारे
वह वदन सौन्दर्य लहरी के अबाध प्रवाह के हित
सरणि-सी कच में खड़ी हो
स्रोतस्विनी सुषमामयी हे!
वह ललित सीमंत सरणी
नित्य क्षेम सँवार दे मेरा।

अरालै स्वाभाव्या-दलिकलभ-सश्रीभिरलकैः
परीतं ते वक्त्रं परिहसति पंकेरुहरुचिम् ।
दरस्मेरे यस्मिन् दशनरुचि किंजल्क-रुचिरे
सुगंधौ माद्यंति स्मरदहन चक्षु-र्मधुलिहः ॥४४॥

युवा-अलि-दल-सा सहज सुन्दर
कुंचित केश संवृत तुम्हारा मुख कमल है,
इस मुख कमल की सुषमा
तिरस्कृत कर रही सरसिज सुमन को
और इसके वरदंत स्मिति की
कान्तिमय मधु सुरभि रस से
मत्त परिमल गंध
स्मरदहन शिव के विलोचन
घूमते मंदस्मिते हे!

ललाटं लावण्य द्युति विमल-माभाति तव यत्
द्वितीयं तन्मन्ये मकुटघटितं चंद्रशकलम् ।
विपर्यास-न्यासा दुभयमपि संभूय च मिथः
सुधालेपस्यूतिः परिणमति राका-हिमकरः ॥४५॥

विमल द्युति लावण्यमय
जो भाल उद्भासित तुम्हारा
मुकुटमंडित
अपर हिमकर खंड
सदृश विराजता है
इन युगल विपरीत भागों का
अमोलक घटित संगम
सुधालेप प्रवाह पूरित
पूर्णिमा का चन्द्र बन जाता
ललामललाटिके हे!

क्रमशः---

15 मार्च 2013

बस इतना ही स्वल्प हमारा (गीतांजलि का भावानुवाद)

Geetanjali: Rabindra Nath Tagore

Tagore by Chiranjit Mitra
(CC BY-NC-ND 3.0)
Let only that little be left of me
whereby I may name thee my all.

Let only that little be left of my will
whereby I may feel thee on every side, and
come to thee in every thing, and offer to
thee my love every moment.

Let only that little be left of me whereby I
may never hide thee.

Let only that little of my fetters be left
whereby I am bound with thy will,
and thy purpose is carried out in
my life-and that is the fetter of thy love. 

हिन्दी भावानुवाद: प्रेम नारायण पंकिल

बस इतना ही स्वल्प हमारा रहने दो प्रभु शेष
जिससे मैं सर्वस्व कह सकूँ तुमको हे प्राणेश।

हो दिशि दिशि में अनुभव तेरा वस्तु वस्तु में संग
प्रति क्षण प्रीति-दान मय हो ऐसा अभिलाषा रंग
तुम्हें छिपा पाऊँ न कभी भी हे मेरे सर्वेश -
जिससे मैं सर्वस्व कह सकूँ तुमको हे प्राणेश।

बँधा तुम्हारी इच्छा से हूँ रहने दो  यह बंध
तव उद्देश्य पूर्ति ही पंकिल जीवन गति संबंध
यही तुम्हारे प्रेम रज्जु का बंधन हमें न क्लेश-
जिससे मैं सर्वस्व कह सकूँ तुमको हे प्राणेश।

गीतांजलि के अन्य भावानुवाद

एक, दो, तीन, चार, पाँच, छः, सात, आठ, नौ, दस, ग्यारह, बारह, तेरह, चौदह, पन्द्रह, सोलह, सत्रह, अट्ठारह, उन्नीस, बीस, इक्कीस, बाइस, तेईस, चौबीस, पच्चीस, छब्बीस, सत्ताइस, अट्ठाईस, उन्तीस, तीस, इकतीस, बत्तीस, तैतीस 

10 मार्च 2013

निर्वाण षटकम्: आचार्य शंकर


आचार्य शंकर की विशिष्ट कृति सौन्दर्य लहरी के पठन क्रम में इस स्तोत्र-रचना से साक्षात हुआ था । सहज और सरल प्रवाहपूर्ण संस्कृत ने इस रचना में निमग्न कर दिया था मुझे। बस पढ़ने के लिए ही हिन्दी में लिखे गए इसके अर्थों को थोड़ी सजावट देकर आपके सम्मुख प्रस्तुत कर रहा हूँ। शिवरात्रि से सुन्दर अवसर और क्या होगा इस प्रस्तुति के लिए। आचार्य शंकर और शिव-शंकर दोनों के चरणों में प्रणति! सभी को शिवरात्रि की शुभकामनायें!

Hindi Translation with original Sanskrit text of Nirvana Shatakam of Shankaracharyaमनो बुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहम्
न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे
न च व्योम भूमिर् न तेजो न वायु:
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥१॥

मैं मन नहीं हूँ, न बुद्धि ही, न अहंकार हूँ, न अन्तःप्रेरित वृत्ति;
मैं श्रवण, जिह्वा, नयन या नासिका सम पंच इन्द्रिय कुछ नहीं हूँ
पंच तत्वों सम नहीं हूँ (न हूँ आकाश, न पृथ्वी, न अग्नि-वायु हूँ)
वस्तुतः मैं चिर आनन्द हूँ, चिन्मय रूप शिव हूँ, शिव हूँ।

न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायु: 
न वा सप्तधातुर् न वा पञ्चकोश:
न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायू 
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥२॥

मैं नहीं हूँ प्राण संज्ञा मुख्यतः न हूँ मैं पंच-प्राण1 स्वरूप ही,
सप्त धातु2 और पंचकोश3 भी नहीं हूँ, और न माध्यम हूँ
निष्कासन, प्रजनन, सुगति, संग्रहण और वचन का4;
वस्तुतः मैं चिर आनन्द हूँ, चिन्मय रूप शिव हूँ, शिव हूँ। 
1. प्राण, उदान, अपान, व्यान, समान;  2. त्वचा, मांस, मेद, रक्त, पेशी, अस्थि, मज्जा;
3. अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनन्दमय; 4. गुदा, जननेन्द्रिय, पैर, हाथ, वाणी

न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ 
मदो नैव मे नैव मात्सर्य भाव:
न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: 
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥३॥

न मुझमें द्वेष है, न राग है, न लोभ है, न मोह,
न मुझमें अहंकार है, न ईर्ष्या की भावना
न मुझमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ही हैं,
वस्तुतः मैं चिर आनन्द हूँ, चिन्मय रूप शिव हूँ, शिव हूँ। 

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खम् 
न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा: न यज्ञा:
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता 
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥४॥

न मुझमें पुण्य है न पाप है, न मैं सुख-दुख की भावना से युक्त ही हूँ
मन्त्र और तीर्थ भी नहीं, वेद और यज्ञ भी नहीं
मैं त्रिसंयुज (भोजन, भोज्य, भोक्ता) भी नहीं हूँ
वस्तुतः मैं चिर आनन्द हूँ, चिन्मय रूप शिव हूँ, शिव हूँ।

न मृत्युर् न शंका न मे जातिभेद: 
पिता नैव मे नैव माता न जन्म
न बन्धुर् न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य: 
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥५॥

न मुझे मृत्य-भय है (मृत्यु भी कैसी?), न स्व-प्रति संदेह, न भेद जाति का
न मेरा कोई पिता है, न माता और न लिया ही है मैंने कोई जन्म
कोई बन्धु भी नहीं, न मित्र कोई और न कोई गुरु या शिष्य ही
वस्तुतः मैं चिर आनन्द हूँ, चिन्मय रूप शिव हूँ, शिव हूँ।

अहं निर्विकल्पॊ निराकार रूपॊ 
विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्
न चासंगतं नैव मुक्तिर् न मेय: 
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥६॥ 

मैं हूँ संदेह रहित निर्विकल्प, आकार रहित हूँ
सर्वव्याप्त, सर्वभूत, समस्त इन्द्रिय-व्याप्त स्थित हूँ  
न मुझमें मुक्ति है न बंधन; सब कहीं, सब कुछ, सभी क्षण साम्य स्थित
वस्तुतः मैं चिर आनन्द हूँ, चिन्मय रूप शिव हूँ, शिव हूँ।
आचार्य शंकर रचित निर्वाण षटकम्‌ || स्वर: पूजा प्रसाद 

6 मार्च 2013

सौन्दर्य लहरी -10

Hindi Translation of Shankar's Saundarya Lahari’सौन्दर्य-लहरी’ संस्कृत के स्तोत्र-साहित्य का गौरव-ग्रंथ व अनुपम काव्योपलब्धि है । आचार्य शंकर की चमत्कृत करने वाली मेधा का दूसरा आयाम है यह काव्य । निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है ’सौन्दर्य-लहरी’ में । उत्कंठावश इसे पढ़ना शुरु किया था, सुविधानुसार शब्दों के अर्थ लिखे, मन की प्रतीति के लिये सस्वर पढ़ा, और भाव की तुष्टि के लिये हिन्दी में इसे अपने ढंग से गढ़ा । अब यह आपके सामने प्रस्तुत है । ’तर्तुं उडुपे नापि सागरम्’ - सा प्रयास है यह । अपनी थाती को संजो रहे बालक का लड़कपन भी दिखेगा इसमें । सो इसमें न कविताई ढूँढ़ें, न विद्वता । मुझे उचकाये जाँय, उस तरफ की गली में बहुत कुछ अपना अपरिचित यूँ ही छूट गया है । उमग कर चला हूँ, जिससे परिचित होउँगा, उँगली पकड़ आपके पास ले आऊँगा। जो सहेजूँगा,यहाँ लाकर रख दूँगा। पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठीं, सातवीं, आठवीं, नौवीं के बाद आज दसवीं कड़ी -

विशुद्धौ ते शुद्धस्फटिक विशदं व्योम-जनकं
शिवं सेवे देवीमपि शिवसमान-व्यवसिताम् ।
ययोः कांत्या यांत्याः शशिकिरण्-सारूप्य सरणे:
विधूतांत-र्ध्वांता विलसति चकोरीव जगती ॥ ३६ ॥

अम्ब
चक्र विशुद्ध तेरा
स्फटिक मणि सम विशद निर्मल
वहाँ अम्बर जनक शंकर
तथा शंकर के सदृश ही
व्यवसिता हो अम्ब तुम भी 
शशि किरण की सरणि-सी द्युतिमान
अंतर्तिमिरहारी
उस विलसती ज्योति को
जिसको समोद निहारता है
अखिल जगत चकोरवामा  सदृश
मैं भजता
शिवे हे!

समुन्मीलत् संवित्कमल-मकरंदैक-रसिकं
भजे हंसद्वंद्वं किमपि महतां मानसचरम् ।
यदालापा-दष्टादश-गुणित-विद्यापरिणतिः
यदादत्ते दोषाद् गुणमखिलमद्भ्यः पय इव ॥ ३७ ॥

जो कि संवितमय
समुन्मीलित कमल मकरंदरस-प्लुत
उस कमल मकरंद रस के
पान में रममाण हैं जो
महज्जन के
हृदय मानस बीच में
युग हंस विचरण-शील हैं जो
अष्टदश विद्या विवर्धन की
जहाँ परिणति सँवरती
मैं किन्हीं उन हंस द्वंद्वों का
स्मरण करता कृपामयि!

तव स्वाधिष्ठाने हुतवहमधिष्ठाय निरतं
तमीडे संवर्तं जननि महतीं तां च समयाम् ।
यदालोके लोकान् दहति महसि क्रोध-कलिते
दयार्द्रा या दृष्टिः शिशिरमुपचारं रचयति ॥ ३८ ॥

चक्र स्वाधिष्ठान तेरा
अग्निमय  आश्रयाधिष्ठित
हैं जहाँ संवर्त
समयायुत
उन्हें है प्रणति मेरी
महाक्रोधाविष्ट
लोक जब लगते जलाने
तब तुम
निज दयार्द्रादृष्टि से
करती शिशिर उपचार उसका
दयासंभरिता 
जननि हे!

तटित्वंतं शक्त्या तिमिर-परिपंथि-स्फुरणया
स्फुरन्नाना रत्नाभरण-परिणद्धेंद्र-धनुषम् ।
तव श्यामं मेघं कमपि मणिपूरैक-शरणं
निषेवे वर्षंतं-हरमिहिर-तप्तं त्रिभुवनम् ॥ ३९ ॥

तिमिरहर पथदर्शिनी
कल शक्तियुत विद्युत प्रभामय
विविध रत्नाभरण भूषित
प्रकट जैसे इन्द्रधनु हो
शंभु दिनमणि तप्त
त्रिभुवन को
बरस पीयूषधारा सींचता है जो
तुम्हारा श्यामघन मणिपूर शरणी
मैं उसी अमृताम्बुवर्षी
सजल श्यामल वारिधर का  
कर रहा सेवन सुधाप्लुत
मोदमय अभिराम जननी!

तवाधारे मूले सह समयया लास्यपरया
नवात्मान मन्ये नवरस-महातांडव-नटम् ।
उभाभ्या मेताभ्या-मुदय-विधि मुद्दिश्य दयया
सनाथाभ्यां जज्ञे जनक जननीमत् जगदिदम् ॥ ४० ॥

मूलाधार संस्थित
लास्य लीनालीन
समयासम
संग संयुत
नवात्मन नवरस वलित
ताण्डव निरत शिव
इस युगल युति की दया से
जनक जननी भाव भावित
जगत होता है समुद्भव प्राप्त
देवि दयालुनि हे!

क्रमशः---

 

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