Friday, February 24, 2017

आलेख

बनारस के प्रकाशन पुरुष: कृष्णचन्द्र बेरी

बनारस के प्रकाशन-संस्थानों में 'हिन्दी प्रचारक संस्थान' का एक विशेष महत्व है। महत्व मेरी दृष्टि में इसलिये है कि इस संस्थान ने मेरी...

कवितायें

सम्हलो कि चूक पहली इस बार हो न जाये(गज़ल)

सम्हलो कि चूक पहली इस बार हो न जाये सब जीत ही तुम्हारी कहीं हार हो न जाये। हर पग सम्हल के रखना बाहर...

कहाँ हो मेरे मन के स्वामी आओ

कहाँ हो मेरे मन के स्वामी आओ, मैं हूँ एक अकिंचन जग में प्रेम-सुधा बरसाओ। आज खड़ा है द्वार तुम्हारे तेरी करुणा का यह प्यासा दृष्टि फेर...

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उल्लेखनीय प्रविष्टियाँ

प्राण रच रहे तम का खेला (गीतांजलि का भावानुवाद )

Clouds heap upon clouds and it darkens. Ah, love, why dost thou let me wait outside at the door all alone ? In the busy moments of...

जाग जाये यह मेरा देश (गीतांजलि का भावानुवाद)

यह देश अपूर्व, अद्भुत क्षमताओं का आगार है। यहाँ जो है, कहीं नहीं है, किन्तु यहाँ जो होता दिख रहा है वह भी कहीं...

बहुत हठी दृढ़ हैं बाधायें (गीतांजलि का भावानुवाद)

Obstinate are the trammels: A song of Geetanjali by Tagore R.N.TAGORE Obstinate are the trammels, but my heart aches when I try to break them. Freedom is all...

हमारा जो है अपना आप(गीतांजलि का भावानुवाद)

He whom I enclose with my name is weepingin this dungeon. I am ever busy buildingthis wall and around; and as this wall goesup...

शैलबाला शतक – ४

प्रस्तुत हैं चार और कवित्त!  करुणामयी जगत जननी के चरणों में प्रणत निवेदन हैं शैलबाला शतक के यह चार प्रस्तुत कवित्त! शतक में शुरुआत...

पिया संग खेलब होरी…

सखि ऊ दिन अब कब अइहैं, पिया संग खेलब होरी । बिसरत नाहिं सखी मन बसिया केसर घोरि कमोरी । हेरि हिये मारी पिचकारी मली कपोलन रोरी । पीत मुख...

शैलबाला शतक – १०

शैलबाला शतक  शैलबाला शतक नयनों के नीर से लिखी हुई पाती है। इसकी भाव भूमिका अनमिल है, अनगढ़ है, अप्रत्याशित है। करुणामयी जगत जननी के...

शैलबाला शतक – ३

प्रस्तुत हैं चार और कवित्त !  करुणामयी जगत जननी के चरणों में प्रणत निवेदन हैं शैलबाला शतक के यह चार प्रस्तुत कवित्त! शतक में...

रम्य रचनायें

अंधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?

बड़ी घनी तिमिरावृत रजनी है। शिशिर की शीतलता ने उसे अतिरिक्त सौम्यता दी है। सबकी पलकों को अपरिमित विश्रांति से भरी हथेलियां सहलाने लगीं...

मस्ती की लुकाठी लेकर चल रहा हूँ

A leaf  (Photo credit: soul-nectar) मैं यह सोचता हूँ बार-बार की क्यों मैं किसी जीवन-दर्शन की बैसाखी लेकर रोज घटते जाते अपने समय को शाश्वत...

कैसे मुक्ति हो?

Photo Source: Google बंधन और मोक्ष कहीं आकाश से नहीं टपकते। वे हमारे स्वयं के ही सृजन हैं। देखता हूं जिन्दगी भी क्या रहस्य है।...

नई प्रविष्टियाँ

गीतांजलि

मैंने सोचा मेरी यात्रा का हुआ अंत – गीतांजलि का हिन्दी काव्य रूपांतर

प्रस्तुत है गुरुदेव रवीन्द्र की पुस्तक गीतांजलि के गीत I thought that my voyage had come to its end का हिन्दी भावानुवाद। Geetanjali: Tagore I thought...

मेरे प्यारे मज़दूर – कविता

मैं जानता हूँ तुम्हारे भीतर कोई ’क्रान्ति’ नहीं पनपती पर बीज बोना तुम्हारा स्वभाव है। हाथ में कोई 'मशाल' नहीं है तुम्हारे पर तुम्हारे श्रम-ज्वाल से भासित है हर दिशा। मेरे...

सौन्दर्य लहरी – 21

स्वदेहोद्भूताभिर्घृणिभिरणिमाद्याभिरभितो, निषेवे नित्ये त्वामहमिति सदा भावयति यः। किमाश्चर्यं तस्य त्रिनयनसमृद्धिं तृणयतो, महासंवर्ताग्निविरचयति नीराजनविधिं ॥95॥ स्वशरीरोद्भूत किरणसमूह अणिमादिक सुसेवित जो स्वरूप त्वदीय नित करता निषेवित अहं भावित कौन सा आश्चर्य शंभुसमृद्धि वह साधकशिरोमणि तृणसदृश गिनता प्रलय का प्रज्ज्वलित पावक...