जिसने यौवन का विराट आकाश
समेट लिया है अपनी बाहों में,
जिसने अपनी चितवन की प्रेरणा से
ठहरा दिया है सांसारिक गति को
तुम कौन हो ?
जिसने सौभाग्य की कुंकुमी सजावट
कर दी है मेरे माथे पर,
जिसने मंत्रमुग्ध कर दिया है जगत को
कल-कण्ठ की ऋचाओं से
तुम कौन हो ?
जिसने मेरी श्वांस-वेणु बजा दी है, और
लय हो गयी है चेतना में उसकी माधुरी,
जिसने अपने हृदय के कंपनों से भर दिये हैं
मेरे प्राण, कँप गयी है अनुभूति
तुम कौन हो ?
आखिर कौन हो तुम ?
कि तुम्हारे सम्मुख
प्रणय की पलकें काँप रही हैं
और मैं विलीन होना चाह रहा हूँ
तुममें ।
मैं क्या हूँ? क्या सुनहली उषा में जो खो गया, वह तुहिन बिन्दु या बीत गयी जो तपती दुपहरी उसी का विचलित पल; या फिर जो धुँधुरा गयी है शाम अभी-अभी उसी की उदास छाया? मैं क्या हूँ? जो सम्मुख हो रही है इस अन्तर-आँगन में वही ध्वनि, या किसी सुदूर बहने वाली किसी निर्झर-नदी का अस्पष्ट नाद? मैं क्या हूँ? बार-बार कानों में जाने अनजाने गूँज उठने वाली किसी दूरागत संगीत की मूर्छित लरी या फिर जिस आकाश को निरख रहा हूँ लगातार,उस आकाश का एक तारा?
मैं क्या हूँ? जानना इतना आसान भी तो नहीं!

18 comments:
कि तुम्हारे सम्मुख
प्रणय की पलकें काँप रही हैं
और मैं विलीन होना चाह रहा हूँ
तुममें ।
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प्रणय की पलके' वाह क्या बिम्ब दिया है
बहुत सुन्दर
दृश्य चित्र ने कविता की खूबसूरती को बढा दिया है ...उस निराकार ब्रह्म के सिवा और कौन हो सकता है...जिसमे हर कोई विलीन होना चाहता है ...जिसमे विलीन होना ही है !!
तुम कौन हो ?
जिसने सौभाग्य की कुंकुमी सजावट
कर दी है मेरे माथे पर,
जिसने मंत्रमुग्ध कर दिया है जगत को
कल-कण्ठ की ऋचाओं से
अति सुन्दर अभिव्यक्ति बधाई
चाहे वो कोई रहे न विलीन हों आप।
ब्लागरजन पछतायेंगे भोगेंगे संताप।।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
गजब कर दिया हिमांशु भाई!!
वाह वाह हिमांशु जी ..रविवार की सुबह सुबह ही सात्विक -आध्यात्मिक बना दिया आपने..शब्दों का चयन और उपयोग तो अद्भुत है हमेशा की तरह
बहुत श्रृंगारिक !
तुम कौन हो ?
आखिर कौन हो तुम ?...........यह सवाल तो अभी भी अनुत्तरित ही है ,बेहतरीन प्रस्तुति.
दार्शनिक प्रश्न की बहुत ही सुंदर काव्य प्रस्तुति है। पर यह इच्छा लोग कम ही करते हैं।
मैं विलीन होना चाह रहा हूँ तुममें।
सदा से ही उसी में हैं,उस से अलग होना संभव नहीं। हाँ अधिकांश स्वयं को उस से अलग समझते हैं। यह मानसिक द्वैत है यही अज्ञान है। इस से छुटकारा पा जाने पर विलीन होने की बात ही नहीं रह जाती है।
असार संसार का सुंदर चित्रण!
इसका उत्तर शून्य है।
कि तुम्हारे सम्मुख
प्रणय की पलकें काँप रही हैं
और मैं विलीन होना चाह रहा हूँ
तुममें ।
bahut hi sunder rahcana
बहुत प्रभावशाली रचना है
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पढ़िए: सबसे दूर स्थित सुपरनोवा खोजा गया
bahut khoob
वाह पूरा डुबो दिया आपकी इस रचना ने. बहुत शुभकामनाएं.
रामराम.
ॠग्वैदिक कवि ऐसे ही लिखते रहे होंगे ऋचायें!
Ise kahte hain prem ki paraakaashtha.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
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निकष रखने वाले हैं आप....सो छिद्रान्वेषण और छुद्र-आलोचना से परे जो कहेंगे सिर आँखों पर। आपकी दुलराती, सहलाती, फटकारती टिप्पणियाँ इस रचनाकार को आत्मस्थ करेंगी। अग्रिम आभार।