19 जुलाई 2009

तुम कौन हो ? ...

तुम कौन हो ?
जिसने यौवन का विराट आकाश
समेट लिया है अपनी बाहों में,
जिसने अपनी चितवन की प्रेरणा से
ठहरा दिया है सांसारिक गति को

तुम कौन हो ?
जिसने सौभाग्य की कुंकुमी सजावट
कर दी है मेरे माथे पर,
जिसने मंत्रमुग्ध कर दिया है जगत को
कल-कण्ठ की ऋचाओं से

तुम कौन हो ?
जिसने मेरी श्वांस-वेणु बजा दी है, और
लय हो गयी है चेतना में उसकी माधुरी,
जिसने अपने हृदय के कंपनों से भर दिये हैं
मेरे प्राण, कँप गयी है अनुभूति

तुम कौन हो ?
आखिर कौन हो तुम ?
कि तुम्हारे सम्मुख
प्रणय की पलकें काँप रही हैं
और मैं विलीन होना चाह रहा हूँ
तुममें ।

18 comments:

M VERMA ने कहा…

कि तुम्हारे सम्मुख
प्रणय की पलकें काँप रही हैं
और मैं विलीन होना चाह रहा हूँ
तुममें ।
===

प्रणय की पलके' वाह क्या बिम्ब दिया है

बहुत सुन्दर

वाणी गीत ने कहा…

दृश्य चित्र ने कविता की खूबसूरती को बढा दिया है ...उस निराकार ब्रह्म के सिवा और कौन हो सकता है...जिसमे हर कोई विलीन होना चाहता है ...जिसमे विलीन होना ही है !!

Nirmla Kapila ने कहा…

तुम कौन हो ?
जिसने सौभाग्य की कुंकुमी सजावट
कर दी है मेरे माथे पर,
जिसने मंत्रमुग्ध कर दिया है जगत को
कल-कण्ठ की ऋचाओं से
अति सुन्दर अभिव्यक्ति बधाई

श्यामल सुमन ने कहा…

चाहे वो कोई रहे न विलीन हों आप।
ब्लागरजन पछतायेंगे भोगेंगे संताप।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

ओम आर्य ने कहा…

गजब कर दिया हिमांशु भाई!!

अजय कुमार झा ने कहा…

वाह वाह हिमांशु जी ..रविवार की सुबह सुबह ही सात्विक -आध्यात्मिक बना दिया आपने..शब्दों का चयन और उपयोग तो अद्भुत है हमेशा की तरह

Arvind Mishra ने कहा…

बहुत श्रृंगारिक !

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

तुम कौन हो ?
आखिर कौन हो तुम ?...........यह सवाल तो अभी भी अनुत्तरित ही है ,बेहतरीन प्रस्तुति.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

दार्शनिक प्रश्न की बहुत ही सुंदर काव्य प्रस्तुति है। पर यह इच्छा लोग कम ही करते हैं।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

मैं विलीन होना चाह रहा हूँ तुममें।
सदा से ही उसी में हैं,उस से अलग होना संभव नहीं। हाँ अधिकांश स्वयं को उस से अलग समझते हैं। यह मानसिक द्वैत है यही अज्ञान है। इस से छुटकारा पा जाने पर विलीन होने की बात ही नहीं रह जाती है।

premlata pandey ने कहा…

असार संसार का सुंदर चित्रण!
इसका उत्तर शून्य है।

mehek ने कहा…

कि तुम्हारे सम्मुख
प्रणय की पलकें काँप रही हैं
और मैं विलीन होना चाह रहा हूँ
तुममें ।
bahut hi sunder rahcana

‘नज़र’ ने कहा…

बहुत प्रभावशाली रचना है
---
पढ़िए: सबसे दूर स्थित सुपरनोवा खोजा गया

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) ने कहा…

bahut khoob

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

वाह पूरा डुबो दिया आपकी इस रचना ने. बहुत शुभकामनाएं.

रामराम.

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey ने कहा…

ॠग्वैदिक कवि ऐसे ही लिखते रहे होंगे ऋचायें!

Science Bloggers Association ने कहा…

Ise kahte hain prem ki paraakaashtha.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

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