Tuesday, February 21, 2017

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टिप्पणी अदृश्य होकर करते हैं हम …

आशीष जी की यह पोस्ट पढ़कर टिप्पणी नियंत्रण का हरबा-हथियार (मॉडरेशन) हमने भी लगाया ही था कि पहली टिप्पणी अज्ञात साहब की ही आ गयी । रोचक है, और उपयोगी भी । कितना सच्चा अर्थ पकड़ा है उन्होंने मेरी कविता का ? आप भी देखें –

ये हुई न टिप्पणी !

टिप्पणीकारी को लेकर काफी बातें करते रहने की जरूरत हमेशा महसूस होती है मुझे । मैं इस चिट्ठाजगत में टिप्पणीकारी के अर्थपूर्ण स्वरूप को लेकर विमर्श करते रहने का हिमायती हूँ । पर आज अपनी इस प्रविष्टि में मैं किसी विमर्श या विचार को प्रस्तुत नहीं कर रहा हूँ, अपितु टिप्पणी के अनुशासन के साथ-साथ उसकी अर्थमय प्रभुता को प्रदर्शित करने वाली एक टिप्पणी आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ । यह टिप्पणी मेरी एक प्रविष्टि ’अकेला होना सबके साथ होना है’ पर डॉ० अरविन्द मिश्र ने दी है । अरविन्द जी का टिप्पणी-स्नेह-सम्बल सदैव मुझे लिखने की प्रेरणा देता रहता है । मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं हो रहा है कि कई प्रविष्टियाँ तो मैंने अरविन्द जी की एकमात्र अर्थगम्भीर टिप्पणी के लिये ही लिखी हैं, और न यह स्वीकारने में संकोच हो रहा है कि जिस प्रविष्टि पर यह टिप्पणी आयी है, वह प्रविष्टि अरविन्द जी की टिप्पणी के सामने टके भर की नहीं है । इसका प्रमाण तो स्वय़ं वह टिप्पणी ही है, जो प्रस्तुत है –

“अब कुछ इस प्रस्तुति के भाव -दार्शनिक पक्ष पर भी ! मनुष्य तो मूलतः एकाकी ही है -एक निमित्त मात्र बस प्रकृति के कुछ चित्र विचित्र प्रयोजनों को पूरा करने को धरती पर ला पटका हुआ -उसकी शाश्वत अभिलाषाओं की मत पूँछिये -वह कभी खुद अपने को ही जानने को व्यग्र हो उठता है तो कभी कहीं जुड़ जाने की अद्मय लालसा के वशीभूत हो उठता है -दरअसल उसकी यह सारी अकुलाहट खुद अपने को और अपने प्रारब्ध को समझने बूझने की ही प्राणेर व्यथा है -जिसे कभी वह अकेले तो कभी दुकेले और कभी समूची समष्टि की युति से समझ लेना चाहता है -पर अभी तक तो अपने मकसद में सफल नहीं हो पाया है -और यह जद्दोजहद तब तक चलेगी जब तक खुद उसका अस्तित्व है -और एक दिन (क़यामत !) या तो उसे सारे उत्तर मिल जायेंगें ( प्रकृति इतनी उदार कहाँ ?) या फिर वह चिर अज्ञानी ही धरा से विदा ले लेगा ! इसलिए हे हिमांशु इन पचडों में न पड़ कर तूं जीवन को निरर्थक ही कुछ तो सार्थक कर मित्र -कुछ तो साध ले भाई -अकेले रह कर या सबसे जुड़ कर यह सब तो बस मन का बहलाना ही है ! महज रास्ता है मंजिल नहीं !
इसलिए ही तो कहा गया है -सबसे भले वे मूढ़ जिन्हें न व्यापहि जगति गति ! !”

सही कह रहा हूँ न !

पंक्ति पर टिप्पणी

                             मेरी प्रविष्टि ’बस आँख भर निहारो मसलो नहीं सुमन को’ पर तरूण ने एक टिप्पणी दी –   ‘सबसे जबरदस्त पहली लाइन’ । मेरे लिये एक नया दरीचा खुला । इस टिप्पणी ने टिप्पणीकारी को लेकर मेरे मन में जो बात चल रही थी, उसको आपके सामने  रखने का एक बहाना दे दिया । कई बार अनेकों ब्लॉग-प्रविष्टियों को पढ़ते हुए, एक-एक पंक्ति को स्पर्श करते हुए यह महसूस होता रहा कि उस प्रविष्टि की उन मूल्यवान स्वतंत्र पंक्तियों पर टिप्पणी की जाय जिन्होंने उस प्रविष्टि का सौन्दर्य निखार दिया है, और जिस पंक्ति विशेष से वह सम्पूर्ण प्रविष्टि ही नायाब बन गयी है ।      कई बार प्रविष्टि को पढ़ते हुए ऐसा भी होता है कि पूरे का पूरा आलेख अपनी सम्पूर्णता में मुझे आकृष्ट नहीं करता, और न ही मुझे टिप्पणी का प्रयोजन देता है, पर उस स्थिति में भी उस आलेख की कुछ पंक्तियाँ विचारणीय और मूल्यवान जान पड़ती हैं । और चूँकि उस चिट्ठे पर पहुँचकर बिना टिप्पणी किये वापस लौटना मन में एक अतृप्ति का अबूझ भाव भर जाता है, इसलिये केवल उस पंक्ति मात्र पर टिप्पणी कर मैं संतुष्ट भी हो जाता हूँ, और उस पंक्ति-विशेष का अर्थ-गौरव भी प्रतिष्ठित हो जाता है । इसके लिये मैं टिप्पणी-बॉक्स में उल्लेखनीय़ पंक्ति को उद्धृत कर टिप्पणी कर दिया करता हूँ । पर आज जब तरुण ने यह टिप्पणी की और उसी वक्त जब मैं आदरणीय द्विवेदी जी के तीसरा खंबा के एक आलेख को पढ़ने पहुँचा, तो वहाँ पंक्ति विशेष के महत्व अथवा उसकी आलोचना को रेखांकित करने वाली उस सुविधा की तरफ मेरा linebuzzध्यान गया, जिसे अपने ब्लॉग पर तो मैंने लगा रखा था पर दूसरे चिट्ठों पर वह सुविधा उपलब्ध न होने के कारण मैं पंक्ति पर टिप्पणी करने से वंचित हो जाया करता था ।  इस सुविधा का नाम लाइनबज़ (LineBuzz) है जो चिट्ठाकारों को पंक्ति पर टिप्पणी (Inline Blog Comments) की सुविधा प्रदान करती है । यद्यपि मेरा ब्लॉग-पठन सीमित है परन्तु अपने देखे हिन्दी चिट्ठों में केवल तीन ही चिट्ठे मुझे यह सुविधा उपयोग में लाते दिखे हैं -   दिनेश राय द्विवेदी जी का तीसरा खंबा, मोहन वशिष्ठ का ’मोहन का मन’ और पवन मल्लline_buzz_4 का ’लतीफे’ ।  मेरे भी ब्लॉग पर यह सुविधा आप लगी हुई देख सकते हैं । इस सुविधा के लिये आपको एक खाता बना कर उससे प्राप्त हुई जावास्क्रिप्ट को अपने चिट्ठे पर लगाना होगा,  और फिर आप इसका लाभ प्राप्त कर सकेंगे । इस बक्से के लग जाने के बाद आपकी किसी भी पोस्ट की पंक्ति विशेष पर टिप्पणी करने के लिये केवल उस पंक्ति को सेलेक्ट करना होगा, फिर सामने दिखेगी एक पंक्ति – ‘Post an inline Comment’ । कुछ ऐसी  (तीर देखिये ) -  linebuzz5इस पंक्ति पर क्लिक करते ही एक और बक्से में आपको लिखनी होगी अपनी टिप्पणी और पोस्ट कर देना होगा । यह तरीका काव्य प्रविष्टियों की अन्यान्य विशेषताओं और सीमाओं को स्पष्ट करने के लिये अत्यन्त लाभकारी प्रतीत होता है मुझे । रही इसकी तकनीकी तौर पर योग्यता और समर्थता की बात तो इसे तकनीकी सिद्धहस्तों के लिये छोड़ रहा हूँ । वही इसकी उपयोगिता और इसकी सीमाओं का पूरा विवरण आपको प्रदान करेंगे ।

यह रही वेबसाइट  http://linebuzz.com/
खाता बनाने के लिये यहाँ क्लिक करें  http://linebuzz.com/myBuzz/
कुछ तकनीकी बातें यहाँ जान लें  http://linebuzz.com/getBuzzd/
ब्लॉग भी देखें  http://blog.linebuzz.com/

  बताना जरूरी है :  लाइव राइटर से लिख रहा हूँ । पता नहीं क्यों पैराग्राफ नहीं बदल पा रहा हूँ ।

ब्लॉगवाणी पर अभी कुछ कार्य, सुधार शेष है

ब्लॉगवाणी का चिट्ठा संकलकों में एक प्रतिष्ठित स्थान है । ज्यादातर चिट्ठों के अनेकों पाठक इस संकलक के माध्यम से ही पहुँचते हैं । मेरे आँकड़ों में भी ज्यादातर पाठक इस संकलक से ही आते हैं । हर चिट्ठे की फीड तत्परता से संकलित कर दिखाने के लिये प्रतिबद्ध यह संकलक क्या खुद को सजाने, सँवारने में दिलचस्पी नहीं रखता ! सबको अपडेट रखने वाला खुद अपडेट क्यों नहीं होता ? अजीब बेनियाजी है खुद के प्रति ।

आपको दिखाता हूँ एक चित्र । देखिये (लाल तीर)-

कितनी प्रतिबद्धता दिखती है इन पंक्तियों में –

“ब्लॉगवाणी पर अभी कुछ कार्य, सुधार शेष है. कोशिश है कि इस सप्ताहांत और अगले सप्ताहांत तक हम यह खत्म कर पायें.”

पहली-पहली बार अपने चिट्ठे को यहाँ शामिल कराने आया था तो भी यह पंक्तियाँ यूँ ही दम साध कर खड़ी थीं । मैं इन्तजार करता रहा, बात इस सप्ताहांत और अगले सप्ताहांत की ही तो थी । अब तक तो चिट्ठाकारी में आठ महीने गुजर गये । कितने सप्ताहांत हुए, जोड़ लीजिये । कहीं आप रिझा तो नहीं रहे हमें – “आशिक हूँ, पै माशूक फरेबी है मेरा काम …” की सोच कर ।

अच्छा नहीं लगता मुझे यह तकल्लुफ़ । सच्ची-सच्ची बात कहा करिये । हो सकता है, यह लिख कर चुप रह जाना आप की मजबूरी हो, पर हमारा भी तो खयाल करिये ।
ब्लॉगवाणी की यह पंक्तियाँ कहीं यह न जताये कि लिखे हुए का क्या ? वह तो यूँ ही लिख दिया गया है । अतः सुधार होना शेष है, इसे तो ज्ञापित करिये, पर समय के बंधन से मुक्त होकर ।

हिन्दी ब्लॉग लेखन: टिप्पणीकारी: Sow the wind and reap the whirlwind

Sow the wind and reap the whirlwind

पिछली प्रविष्टि का शेष .

“Sow the wind and reap the whirlwind” की प्रवृत्ति ने भी टिप्पणीकारी का चरित्र बहुत अधिक प्रभावित किया है । यह अनुभव भी बहुत कुछ प्रेरित करता रहा टिप्पणीकारी पर लिखने के लिये । मन अनेकों बार कसमसाता रहा यह देखकर कि जो ब्लॉग-प्रविष्टियाँ वास्तव में उल्लेखनीय़ थीं, उन्हें टिप्पणियाँ नहीं मिलीं (मिलीं भी तो खानापूर्ति करतीं) और जो ब्लॉग-प्रविष्टियाँ आडम्बरी और कम महत्वपूर्ण थीं वे अनेकों टिप्पणियों से समादृत हुईं। ब्लॉग-माध्यम ने टिप्पणीकारी का यह जो यंत्र हमें पकड़ा दिया है, क्या उसका दुरुपयोग नहीं कर रहे हैं हम? कितना टिप्पणियाँ मिलती हैं ’रचनाकार’ को, ’हिन्द-युग्म’ को, ’हिन्दी भारत’ को या ऐसे ही अन्य उल्लेखनीय़ चिट्ठों को? यद्यपि यह चिट्ठे अपनी मूल्यवत्ता और सौन्दर्य के लिये प्रतिष्ठित हैं, और “फूल के सौन्दर्य को फल की आकांक्षा से युक्त करके देखना सौन्दर्यबोध का निकृष्टतम पक्ष है।’ क्या करूँ –

” सब्र करना सख़्त मुश्किल है, तड़पना सहल है
अपने बस का काम कर लेता हूँ आसाँ देखकर ।”

कुछ चिट्ठों का नाम ले रहा हूँ तो कहना जरूरी है कि ’मोहल्ला’ व भड़ास’, अथवा ’कबाड़खाना’ एवं ’नारी’ आदि सामूहिक मंचों ने प्रविष्टियों का वैविध्य प्रस्तुत किया, अपनी कुछ आत्यन्तिक प्रभाव वाली प्रविष्टियों से ब्लॉग जगत को नये तेवर दिये और इन प्रविष्टियों पर टिप्पणियाँ भी मिलीं, परन्तु टिप्पणीकारी को प्रोत्साहित करने में ये उदासीन रहे। मेरी दृष्टि में ’हिन्द-युग्म’ ही एक ऐसा मंच दिखायी पड़ा जो टिप्पणीकारी के लिये बकायदा पुरस्कृत करता हो। ऐसे सामूहिक मंचों के पुरस्कर्ताओं में कुछ-एक को छोड़ दें तो सभी लोग नियमित टिप्पणीकारी से उदासीन रहा करते हैं।

अन्य चिट्ठाकारों द्वारा टिप्पणियों की दशा-दिशा देखनी हो तो ज्ञान जी का यह और यह आलेख, जितू जी का यह आलेख, और अनूप शुक्ल जी का यह आलेख पढ़ लें, मैं क्या लिखूँ?

अब अगर आप कुछ प्यारी-सी टिप्पणियाँ दें तो यह आलेख आगे बढ़ाऊँ।

हिन्दी ब्लॉग लेखन: टिप्पणीकारी: जो मन ने कहा

commentingटिप्पणीकारी को लेकर सदैव मन में कुछ न कुछ चलता रहता है। नियमिततः कुछ चिट्ठों का अध्ययन और उन चिट्ठों पर और खुद के चिट्ठे पर आयी टिप्पणियों का अवलोकन बार बार विवश करता रहा है कुछ व्यक्त करने के लिये। यद्यपि यह मेरा स्वभाव नहीं है परन्तु इस टिप्पणीकारी पर कुछ भी लिखने के पहले मैंने टिप्पणी/ टिप्पणीकारी केन्द्रित कुछ आलेख पढ़ने चाहे/ पढ़े भी। एक मनोदशा बननी चाहिये थी, पर बनी नहीं; क्योंकि यह सभी आलेख प्रकारांतर से प्रतिक्रिया के तौर पर लिखे गये आलेख थे और मौलिक रूप से टिप्पणीकारी के यथार्थ स्वरूप और उसके सौन्दर्य को व्यक्त करने में असमर्थ थे। अतः वांछित सन्दर्भ न पा सकने की वजह से एक निश्चित रूपरेखा न बन सकी और इसीलिये मन में जो कुछ अस्त-व्यस्त विचार आये उन्हें ज्यों का त्यों लिख रहा हूँ।

टिप्पणीकारी का महत्व इस बात में निहित है कि वह प्रविष्टि के मूलभूत सौन्दर्य को अक्षुण्ण बनाये रखते हुए उस प्रविष्टि के रिक्त स्थान को भरे और श्रृंखला को अविरल बनाये रखे। प्रविष्टि के वाक्यांशों के बीच छुपे हुए गहरे अर्थ को अनावृत करना अथवा उन वाक्यांशों की व्यर्थता को प्रचारित करना भी तो टिप्पणीकारी का ही कर्तव्य है। टिप्पणी के माध्यम से –

“कहीं हकीकत-ए-जाँकाहि-ए-मरज लिखिये
कहीं मुसीबत-ए-नासाजि-ए-दवा लिखिये।”

सामयिक प्रविष्टियों पर की जाने वाली टिप्पणियों की एकरसता भी मुझे समझ में नहीं आती। सामयिक प्रविष्टियों के लिये अथवा उन पर की गयी टिप्पणियों के लिये लिखा गया हर शब्द सिर्फ सामयिक नहीं होता, वह समय की चेतना को स्पर्श करता हुआ उससे आगे भी जाता है। तो सामयिक के लिये शाश्वत टिप्पणी क्यों नहीं?

जिस प्रकार प्रविष्टि के लेखन क्रम में चिट्ठाकार पठनीयता, प्रेषणीयता और स्वीकृति- तीनों सामान्य मूल्यों की प्रतिष्ठा एक साथ करता है, करने का प्रयास करता है; क्या उसी प्रकार उसे टिप्पणीकारी के लिय निश्चित सामान्य मूल्य निर्धारित नहीं कर लेने चाहिये? टिप्पणी केवल प्रशंसा या प्रक्षेपित आलोचना का माध्यम नहीं है बल्कि वह भी अभिव्यक्ति की एक अल्पज्ञात कला है। लिखित तौर पर अभिव्यक्ति का यह लघु रूप चिट्ठाकारी से ही सम्भव हो पाया है। टिप्पणी बार-बार दोहराती है –

“कद्र-ए-संग-ए-सर-ए-राह रखता हूँ
सख़्त अरजाँ है गिरानी मेरी ।”

छः माह की अपनी इस लघु चिट्ठाकारी में मैंने टिप्पणियों के आमोद का अन्तरानुभव किया है वहीं इन टिप्पणियों के उपादान व्यापार से विचलित भी हुआ हूँ। कई प्रविष्टियाँ (अपनी भी और अन्य की भी ) इस ब्लॉग-संसार में औचित्यहीन और प्रतिष्ठाच्युत होते देखी हैं और कई को बिना वजह ही प्रतिष्ठित और गुणाभिहित होते भी देखा है। टिप्पणीकार के अपने स्व-भाव का यह मनोरंजन भी कितना मनोरंजक है कि हम अपने ही मन के हिसाब से दूसरे के मन को रंगते जाते हैं। एक बार ईर्ष्या की प्रतीष्ठा कर देने से सीधी घटनायें भी उसी के पाण्डुरंग में रंगती चली जाती हैं।

पर क्या यह आँख का काम है? नहीं, यह चश्मे की करामात है। अब ख़याल करिये कि मंथरा (जानते हैं न? कैकेयी की दासी) झुकी है, तो जाहिर है वायु-रोग से ही झुकी है। परन्तु क्या कमल वायु से नहीं झुकता? और उसकी शोभा किसे मुग्ध नहीं करती? वह तो सौन्दर्य नहीं, सौन्दर्य की अदा है……। अब इस चश्मे से मत देखिये ब्लॉग-प्रविष्टि को।

क्रमशः …

चिट्ठाकार-चर्चा, चिट्ठा-चर्चा और चिट्ठा-चर्चा

आपने पढ़ी होगी। अगर नहीं पढ़ी, तो यह रही अरविन्द जी की चिट्ठाकार-चर्चा, इस चर्चा के एक कूट शब्द को अनावृत करती रचना जी की यह टिप्पणी और इस टिप्पणी पर थोड़ी और खुलती यह चिट्ठा-चर्चा। नहीं मालूम, अरविन्द जी कुछ निस्पृह-से क्यों हो गये हैं,पर जो मुझे महसूस हो रहा है कि वो कहना चाहते हैं, उसे ग़ालिब की जुबान में लिख रहा हूँ:

“दिल को हम हर्फ-ए-वफा समझे थे, क्या मालूम था
यानी, यह पहले ही नज्र-ए-इम्तिहाँ हो जायेगा ।”

हर्फ-ए-वफा़ – प्रेम-निर्वाह में काम आने वाला
नज्र-ए-इम्तिहाँ – परीक्षक की भेंट

रीमा जी की ’बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम’ और अरविन्द जी की टिप्पणी: कुछ मैं भी कहूँ

सबसे पहले स्पष्ट करूँ कि इस आलेख की प्रेरणा और प्रोत्साहन अरविन्द जी की टिप्पणी है, जो उन्होंने रीमा जी की प्रविष्टि पर की है। रीमा जी ने ’बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम’ मुहावरे को वृद्ध-परिहास का मुहावरा मान लिया है। वैसे तो इस प्रविष्टि पर मैंने अपनी टिप्पणी कर दी थी, परन्तु वह वस्तुतः अन्य-संदर्भित थी। ’अरविन्द जी” की टिप्पणी पढ़कर और उनके द्वारा अपनी पीठ-थपथपाहट से अनुप्रेरित होकर यह टिप्पणी लिखनी चाही थी। टिप्पणी का विस्तार हो गया, इसलिये इसे प्रविष्टि के तौर पर यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ।
 
ScreenShot of Reema Ji's Blog
Screen Capture of Reema Ji’s Blog
’बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम’ मुहावरा साहित्य में बूढ़ों के साथ बदसलूकी का इजहार करने के लिये सम्मिलित नहीं किया गया है । यह एक कूट वाक्य है, जो निरर्थक को सार्थक ढंग से सिद्ध करने के लिये प्रयुक्त किया जाता है। रामचरित मानस में नारद को मिथ्या आभास था कि वे ’हरि’ की सुन्दरता लेकर सुन्दर हो गये हैं, और शिव गणों ने इसी तथ्य को कूट-उक्ति में समझाया था –

“करहिं कूट नारदहिं सुनायी। नीक दीन्ह हरि सुंदरताई।”

यह नारद पर दोषारोपण नहीं था, नारद की आंख का विमोचन था।

हम तो इस मत के हैं कि समय बली होता है। उसकी गति में गतिमान रहना ही प्रगति है। उसके विरुद्ध खड़े होना नहीं। तुलसीदास ने कहा- “जस काछिय तस चाहिय नाचा।” अर्थात जैसी कछनी हो, वैसी नाच हो। अर्थात युवक की आकृति में वृद्ध की प्रकृति ठीक नहीं। तो बूढ़ी घोड़ी सम्मानिता है, अनुभव से भरी है तो जैसी है वैसी बनी रहे।

व्यंग एवं परिहास में अन्तर है। परिहास में अपमान है, व्यंग में विश्लेषण है। एक में Indication है, दूसरे में Cancellation है। ’बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम’ मुहावरे की उस शक्ति का परिचायक है जिसे साहित्य में ’औचित्य-सम्प्रदाय’ के अन्तर्गत रखा जा सकता है। अतः इसमें किसी भी साहित्य-प्रेमी को रस या अलंकार खोजना ठीक नहीं है। जो है, ठीक वही कह देना अर्थात “अरी बूढ़ी, लाल लगाम फेंक दे! निगोड़ी, तेरी अक्ल को यह क्या सूझा?” ऐसा यथार्थवादी कथन साहित्य नहीं कहता। साहित्य कहता है- “बूढ़ी घोड़ी ने लाल लगाम पहन ली है।” संभावना यही है कि बेचारी बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम की लाली में लाल न हो पायेगी। इसलिये इस मुहावरे ने धीरे से घाव पर उंगली रखी है कि जो अनुकरणीय है, धारण वही करना चाहिये। अतः इस मुहावरे का साहित्य में विश्लेषित अर्थ ही ग्रहण किया जाना चाहिये।

आदरणीय अरविन्द जी की टिप्पणी कितनी सार्थक है कि “एक भारतीय उम्रदराज ग्राम्य महिला साडी की बजाय स्कर्ट आदि परिधान में समाज में उठने बैठने लगे तो वह हास्यास्पद हो जायेगा !” और अपनी स्वाभाविकता की कपाल क्रिया हो जायेगी।

एक बात और, इस मुहावरे को एक और अर्थ में भी प्रयुक्त मान सकते हैं- “देखो न, लाल लगाम में यह बूढ़ी घोड़ी भी नयनाभिराम लग रही है। ’गोस्वामी जी’ ने लिखा है : “सियनि सुहावनि टाट पटोरे “, अर्थात टाट में भी रेशम की बखिया अच्छी लगती है। कितना मजा है, टाट भी रेशमी हो गया है। उसकी इज्जत बढ़ी है :

“तन बूढ़ा होता है होने दो, मन तो सदा जवान चाहिये।”

यह मुहावरा बूढ़े को सम्मान देने के लिये भी कहीं से घुस आया है। अब बूढ़ी बूढ़ी नहीं रही, लाल लगाम वाली लोकप्रिय प्राणी हो गयी है। इसमें वृद्धावस्था का गुरुत्वाकर्षण है, भण्डाफोड़ नहीं।

फिर यह भी तो देखिये कि वेश कार्यकुशलता को भी तो संकेतित करता है, अवस्था से क्या मतलब? खयाल करिये कि क्या सुकुमारी रानी भी मर्दानी नहीं हो गयी थी-

“खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।” या
“अस्सी बरस की हड्डी में भी जागा जोश पुराना था, कहते हैं कि कुँवर सिंह भी बड़ा वीर मर्दाना था।”

भृगु-सुत परशुराम का स्मरण करिये कि ब्राह्मण थे, पर मन के वेगानुसार कुठार भांजने लगे, तब अयोध्या के बालकों को कहना पड़ा –

“वेश बिलोके कहसि कछु, बालकहूँ नहिं दोस ।”

अतः घोड़ी बूढ़ी है तो क्या, मन लाल लगाम वाला है, तो क्या लाल लगाम नहीं पहनेगी? सार्थक है यह मुहावरा।

रीमा जी ने वृद्ध-विमर्श शब्द देकर इस मुहावरे की गरिमा और बढ़ा दी है। यह दृष्टिकोण झोर दे रहा है। यदि ’दलित-विमर्श’, ’नारी-विमर्श’ तो ’वृद्ध-विमर्श’ क्यों नहीं?

अंग्रेजी में हिन्दी का रचना संसार : शुरुआत भर कर रहा हूँ

हिन्दी साहित्य की अबाध धारा निरन्तर प्रवाहित हो रही है और उसकी श्री वृद्धि निरन्तर दृष्टिगत हो रही है। हिन्दी साहित्य के विविध आयामों में इतना सबकुछ जुड़ता और संचित होता चला जा रहा है कि हमारी राष्ट्रभाषा का कोश अक्षय गति को प्राप्त होने की दिशा में अग्रसर है। ऐसे में एक सहज विचार उदभूत हुआ कि यदि इस साहित्य के मनीषी एवं विज्ञ जनों की उपलब्धि और उनका रसास्वाद अंग्रेजी भाषा में हो तो यह हिन्दी साहित्य का एक सुशोभन अध्याय होगा।

कवि-रचनाकार का साहित्य जगत, उनकी सामान्य परिचय पृष्ठभूमि और उनके रचना का आस्वाद अंग्रेजी भाषा में भी हो, इस उद्देश्य से मैंने एक नया अंग्रेजी चिट्ठा ‘Eternal Sharing Literature’ नाम से प्रारम्भ किया है। यहाँ प्रायः प्रत्येक प्रमुख रचनाकार को अंग्रेजी भाषा की अभिव्यक्ति में बांधने का प्रयास करुँगा। कवि, कथाकार, उपन्यासकार, समालोचक, निबन्धकार आदि सभी पर प्रकाश डालना मेरा अभीप्सित है । इसी क्रम में उनकी कुछ रचनाओ का भी आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करने का प्रयास करुँगा।
Screenshot of ESL
यद्यपि मैं जानता हूँ कि यह कार्य महनीय है, और मेरा लघु मानस और सीमित सामर्थ्य इसे भली-भाँति संपादित कर पायेंगे, इसमें संशय है; परन्तु यह हिन्दी-प्रेम ही है जिसने यह कार्य करने का आत्म-बल दिया है । एक और आत्म-स्वीकृति यह है कि अंग्रेजी में मेरा भाषाई-ज्ञान सीमित है, और पता नहीं मैं न्याय कर भी पाउंगा या नहीं | अतः एक-एक पोस्ट तीन-चार दिनों का विराम ले ले तो आश्चर्य क्या?

इस आशा के साथ यह ब्लाग प्रारंभ कर रहा हूं कि हिन्दी साहित्य की चहलकदमी अंग्रेजी भाषा की वाटिका में बढ़े और आपका अबाध स्नेह मुझे प्राप्त हो।
ब्लोग का लिंक है – http://eternalliterature.blogspot.com

निंदक-वंदना का विवेक-सत्‍य

Swapnalok
Screenshot of Vivek Singh’s Blog
‘निंदक नियरे राखिये’ की लुकाठी लेकर कबीर ने आत्‍म परिष्‍कार की राह के अनगिनत गड़बड़ झाले जला डाले। ब्‍लागरी के कबीरदास भी इसी मति के विवेकी गुरूघंटाल हैं। कबीर ने तो खुद को कहा था, ‘जाति जुलाहा मति का धीर’। इस ब्‍लागर कबीर की मति का ही अनुमान लगायें, क्‍योंकि आज के सर्वसमाज में तो ‘जाँति पाँति पूछै नहिं कोई, ह‍‍रि का भजै सो हरि का होई’।
य़द्यपि अपने इस कबीर को कह तो मैं ‘कबीर’ रहा हूँ, पर निन्‍दक वन्‍दना की ऐसी ही शैली का प्रयोग जमकर ‘तुलसी’ बाबा अपनी खलवन्‍दना में करते हैं। अपने विवेक से मैं समझ रहा हँ ‘निन्‍दक नियरे राखिये’ का कूटनैतिक निहितार्थ। मैं समझ रहा हूँ निन्‍दकों को थपकी देकर सुलाने की आपकी मधुर चाल। अपनी निन्‍दा न हो, इसका अच्‍छा उपाय कर लिया है आपने इस मनोहारी नम्रता से। सच बताइये यह निन्‍दक-वन्‍दना पूज्‍य-भाव की है? सात्विक श्रद्धा की है? अथवा यह सर्प को मोह लेने की चाल है, जिससे वह डँस न सके। मेरे प्‍यारे ब्‍लॉगर, यह आत्‍म-समर्पण नहीं, पूर्व-समर्पण है।
 
हे मेरे चतुरंग चिट्रठाकार! सच कहो कि अनायास ही यह निन्‍दक वन्‍दना हो गयी अथवा सायास उद्यम है यह। कहीं इस वन्‍दना में जो ब्‍याजस्‍तुति है, परिहास की कपट-लीला है, उसमें निन्‍दकों को मन ही मन चिढाने की चाल तो नहीं । कहीं उन्‍हें आईना तो नहीं दे रहे कि वो इसमें आकृति देखें और अपना सा मुँह लेकर रह जॉंय। कहीं ऐसा तो नहीं कि सम्‍मान की ओट से भेद के बाण चलाये जा रहे हो आप?
 
मैं जानता हूँ कि निन्‍दक जीवन-सरिता की मँझधार में छिपे ग्राह हैं। वे जीवन श्रृंखला के बीच की कडी हैं, उन्‍हें हटाइयेगा तो श्रृंखला का ही विच्‍छेद हो जायेगा। पर इन्‍हें वन्‍दनीय न बनाइये प्रियवर! यद्यपि मैं समझ रहा हूँ थोडा-थोडा कि निन्‍दक को पास बिठाने का संकल्‍प आत्‍मविश्‍वास का नहीं, आभास का है। शायद यह आपकी खेचरी-मुद्रा है स्‍वयं-सिद्ध! यह निन्‍दक के प्रति विनय नहीं, विनय का व्‍यायाम लगता है।

आप बहुत चतुर हो श्रीमन्! बेचारे निन्‍दक क्‍या जानें कि जाने अनजाने उनकी कलई खोल रहे हैं आप। सब आये, आ के टिपिया गये। उन्‍हें क्‍या मालूम कि मधु और दंश की शैली है यह। बेचारे मूढ-मति नहीं जानते कि अदृश्‍य उपहास शत्रु पर सम्‍मुख प्रहार नहीं करता, वह शत्रु को निरस्‍त्र कर देता है।
 

खूब हवा भरते हो आप, फिर कॉंटा चुभा देते हो। मतलब समझे- पहले वायु-विकार, फिर खट्टी डकार। अभी भी नहीं समझे, समझाता हूँ। आप कहते हैं- ‘निन्‍दक महान हैं’, ध्‍वनि आती है- ‘महान निन्‍दक हैं’।

विवेक जी की यह पोस्‍ट तीन दिन पुरानी है, तीन दिन पुराना मेरा बुखार भी है। आज बुखार से निवृत्‍त हुआ हूँ, सो उस दिन की य‍ह प्रविष्टि आज पोस्‍ट कर रहा हूँ।