Friday, February 24, 2017

Contemplation

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चौथी शरण की खोज

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’बच्चन’ का एक प्रश्न-चिह्न मस्तिष्क में कौंध रहा है, उत्तर की खोज है –

“भूत केवल जल्पना है
औ’ भविष्यत कल्पना है
वर्तमान लकीर भ्रम की
और क्या चौथी शरण भी ?
स्वप्न भी छल जागरण भी।”

वह चौथी शरण क्या है ? उत्तर की तलाश में ’विनोबा’ की बात याद में उतर आयी –

“गीता के आधार पर अकेला मनुष्य सारी दुनियाँ का मुकाबला कर सकता है।”

लगा ‘चौथी शरण’ का समाधान हो गया। वह ‘आदमी’ ही है चौथी शरण। अखंड निर्लिप्त कर्मयोगी ‘मनुष्य’ ही भूत-भविष्य एवं तथाकथित भ्रमित वर्तमान की अर्गला तोड़ सकता है। कर्मयोग में न प्रसन्नता है न द्वेष। न विकर्म है, न अकर्म। न फलाकांक्षा है, न परिग्रह। वह चौथी शरण मानव स्वयं में स्वयं का उद्धारक है। कृष्ण के “कर्मण्येवाधिकारस्ते’ में निःसन्देह उसी ‘चौथी शरण’ का ही मंडन है और भूत, भविष्य, वर्तमान के जल्पना, कल्पना और भ्रम का खंडन। गीता ने समस्या हल कर दी।

भोगवादियों के अनुसार हम न तो वर्तमान को मात्र यथार्थ मानते हैं और न वैरागियों की तरह उसको स्वप्नवत मानते हैं। हम उसको कर्मभूमि मानते हैं क्योंकि वह हमें व्यक्ति-निर्माण करने के अपने अधिकार को किसी मूल्य पर छोड़ने नहीं देती। वस्तुतः भविष्य होता ही नहीं। निर्माण एवं सृजन की भावभूमि वाली कर्मकुशलता हमें योगी बनाती है और यही योग ही हमारी चौथी शरण है-

“योगः कर्मसु कौशलम् “

हम तो अस्तित्ववादियों की भाँति जीवन को क्षणवादी भी नहीं मानते, क्योंकि वह क्षण-क्षण करके हमें जीवन की समग्रता प्रदान करने वाला होता है। हमारी चाह है, कर्मफल की आशा का दंश न झेलते हुए निरंतर कर्म में लगे रहने की। फल तो आनुषंगिक है। इसी लिये जीवन का सूत्र ‘चौथी शरण’ कृष्ण ने बता दिया-

“तस्मात् योगी भवार्जुनः”।

पर क्या अर्जुन को ही …………।

अंधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?

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Deepakबड़ी घनी तिमिरावृत रजनी है। शिशिर की शीतलता ने उसे अतिरिक्त सौम्यता दी है। सबकी पलकों को अपरिमित विश्रांति से भरी हथेलियां सहलाने लगीं हैं। नयन-गोलकों के नन्हें नादान शिशु पलकों की थपकी से झंपकी लेने लगे हैं। अब काम आराम का क्षमापन स्तोत्र बांचने लगा है। Rest belongs to the work as eyelids to the eye.
मैं शय्या-सुख से विरत हो बाहर निकल आया हूं। नक्षत्र खचित नीरव-रात्रि का आकर्षण बड़ा अद्भुत है। स्वच्छ टिमटिमाते तारों के अक्षर में लिखी आकाश-पाती प्राप्त हुई है। सांसे विराट के सन्देशों का स्वगत वाचन प्रारंभ कर देती हैं। याद आ जाती है ’भागवत’ के ’गजेन्द्र मोक्ष’ की वह पंक्ति –

“तमस्तदासीत गहनं गभीरं, यस्तस्य पारेभिराजते विभुं।”
(तब घोर गंभीर अन्धकार था। वह विभु उसीके पार बैठा था।)

बहुत गहरी से गहरी अनुभुति की मन्जूषा के पट खुल जाते हैं। अन्धकारपूरिता निशा मां की गोद-सी सुखद प्रतीत होती है। विविधाकार विलीन हो गया है। एक ही मां की ममतामयी गोद में सारा कोलाहल शांत हो गया है। ‘One appears as uniform in the darkness’. मैं अंधेरे की लय में तल्लीन होने लगता हूं।
अन्धेरा परमातिपरम है। व्यर्थ ही भयभीत होते हैं हम इसके कारुण्यमय विस्तार में- “The mystery of creation is like the darkness of night.” क्यों न प्रार्थना की विनत भावाकुलता में माथा झुक जाय।
मैं रात्रि की गहनता का चारण बन जाता हूं। डरो मत- ’मा भेषि’- का इंगित करती निशा को प्रणाम करता हूं। क्यों नहीं समझते हम कि प्रकाश का उत्स यह अन्धकार है। रात्रि की ही अधिष्ठात्री का नाम तो उषा है। पंत की भाषा में कहें तो क्या नहीं है यह रात्रि?- “देवि, सहचरि, मां!” बड़ी ही भावाकुलित बेला में टैगोर के मुख से निकला था –

I feel thy beauty, darknight, like that of the loved woman, when she has put out the lamp.

हमारी नासमझी ने रात्रि की गहनता को अबूझ पहेली बना दिया। मां के गर्भ से अन्धमय क्या होगा जहां सृजन अपने को संवारता है। हमारी ही भूल है कि हमने रात्रि की अंचल छांव को दुःखान्तक खेल समझ लिया। तुम्हारे सांय-सांय के स्वर में सन्नाटे का संगीत बार-बार हमें यही समझा रहा है- “मां भेषि, मां भेषि”- “मत डर, मत डर”। रात की इस गहनता ने समझा दिया है –

“We read the world wrong / and say that it deceives.” – TAGORE

यह प्रविष्टि दो दिन पहले लिखी थी। इस प्रविष्टि को बहुत हद तक ललित निबंध का स्वरूप देने की प्रेरणा मेरे बाबूजी की है। बहुत सारे उद्धरण उन्हीं से लिए हैं, इस प्रविष्टि पर चर्चा करते हुए। बहुत कुछ मेरा नही है इसमें, पर हौसला मेरा है।

मैं कुछ लिख नहीं पा रहा तो …

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मैं लिख नहीं पा रहा हूँ कुछ दिनों से। ऐसा लगता है, एक विचित्रता भर गयी है मुझमें। मैं सोच रहा हूँ कि चिट्ठाकारी का यह कार्य-व्यापार कुछ दिनों के लिए ठहर क्यों नहीं जाता? वहीं, जहाँ छोड़कर इसे मैं ठहर गया हूँ। यह निरंतर गतिशील अखण्डता-अनवरतता का मोह क्यों बांधे रहता है जगत को? कि हम रोज लिख-रच रहे होते हैं।
मैं महसूस करता हूँ कि सर्जनात्मकता जब धर्म बन जाती है, तो वह गति-अगति से ऊपर, ज्ञात-अज्ञात से परे किसी भी विभाजन के पार ‘अज्ञेय’ की स्वीकृति बन जाती है।

“सर्जनात्मकता का प्रस्थान-बिन्दु ही यह जिद है कि जो कहा नहीं जा सकता, जो पहली निगाह में गूंगे के गुड़-सा अकथ प्रतीत होता है, उसे शब्द (या किसी अन्य माध्यम ) के जरिये कहा जाय यानी सिर्फ़ दूसरे को सुनाने के लिए ही नहीं, ख़ुद भी सुनने के लिए……….” (डॉ पुरुषोत्तम अग्रवाल)

तो ख़ुद भी सुनने के लिए / दूसरों को सुनाने के लिए मनुष्य (मैं) सर्जनाशील रहने का यत्न करता है, बिना समय-असमय का विचार किए। हर समय यह मनुष्य समय की चिंता करता रहता है। मन एक अजीब सी जीवैषणा से त्रस्त हुआ जाता है-गत को झुठलाना, अनागत की प्रतीक्षा करना। तो निरंतर चिन्ताशील मनुष्य का यह मन आशाओं का आश्रय ले अपनी क्रिया-गति तीव्र कर देता है। यह गति काल के पदाघात से निरंतर और भी तीव्र होती जाती है। मैं डर जाता हूँ। सोचता हूँ-

“जिस दिन गति इतनी तीव्र हो जायेगी कि वह अ-गति का रूप ले लेगी- तो क्या होगा”? (प्रभाकर माचवे)

एक हफ्ते इस चिट्ठाकारी से अयाचित विराम, उसी दौरान की बीमारी और इस अवधि में कुछ गंभीर पठन के कारण इस प्रकार के अस्पष्ट विचार उत्पन्न हुए; उन्हें ज्यों का त्यों लिखने की बात सोची- एकांश प्रस्तुत है। अर्थ की संगति न बैठे, तो क्षमाप्रार्थी!

मैं क्या हूँ? जानना इतना आसान भी तो नहीं

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अपनी कस्बाई संस्कृति में हर शाम बिजली न आने तक छत पर लेटता हूँ। अपने इस लघु जीवन की एकरस-चर्या में आकाश देख ही नहीं पाता शायद अवकाश लेकर। और फिर आकाश को भी खिड़कियों से क्या देखना। तो शाम होते ही, अंधेरा गहराते ही कमरे में बिखरी इन्वर्टर की रोशनी अपने मन में सहेज छत की ओर रुख करता हूँ। चटाई बिछाकर लेट जाता हूँ। तत्क्षण ही छत पर बिखरी निस्तब्धता पास आकर सिर सहलाने लगती है, आँखें कुछ मुँद सी जाती हैं। फिर तो झूम-झूम कर सम्मुख होती हैं अनगिनत स्मृतियाँ, कुछ धुँधली तस्वीरें, और………न जाने किसकी सुधि जो कसकती है अन्तर में, व्यथित करती है।

मुक्ताकाश के नीचे इस लघु शयन में एक स्वर बार-बार प्रतिध्वनित होता है इस एकाकी अन्तर में। मन का निर्वेद पिघलने लगता है। स्वर के पीछे छिपी असंख्य संभावनाओं का चेतस भाव मन को कँपाने लगता है। मैं अचानक ही अपने को ढूँढने लगता हूँ, अपने अस्तित्व की तलाश में लग जाता हूँ।

इस मुक्ताकाश के नीचे मैं स्वयं को प्रबोध देते हुए पूछ्ता हूँ स्वयं से- मैं क्या हूँ?- क्या सुनहली उषा में जो खो गया, वह तुहिन बिन्दु या बीत गयी जो तपती दुपहरी उसी का विचलित पल; या फिर जो धुँधुरा गयी है शाम अभी-अभी उसी की उदास छाया?

मैं क्या हूँ?- जो सम्मुख हो रही है इस अन्तर-आँगन में वही ध्वनि, या किसी सुदूर बहने वाली किसी निर्झर-नदी का अस्पष्ट नाद?

मैं क्या हूँ?- बार-बार कानों में जाने अनजाने गूँज उठने वाली किसी दूरागत संगीत की मूर्छित लरी या फिर जिस आकाश को निरख रहा हूँ लगातार, उस आकाश का एक तारा?

मैं क्या हूँ?- जानना इतना आसान भी तो नहीं!

photo : google

पीपे का पुल

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अपने बारे में कहने के लिए चलूँ तो यह पीपे का पुल मेरे जेहन में उतर आता है। गंगा बनारस में बड़ी चुहल करती हुई मालूम पड़ती हैं। गंगा लहरों की गति के साथ जीवन की गति संगति बैठाती है । गंगा के तटीय क्षेत्र गंगा के आश्वासन पर जीते हैं, लहरों की मनुहार पर उनके अस्तित्व का पारावार छलक-छलक सा जाता मालूम पड़ता है। पीपे के यह पुल गंगा की गोद में झूला झूलते गंगा से लोक का नाता जोड़ते हैं। सहचरी गंगा हमारे रोम को सहलाने लगाती है। कंक्रीट के ऊंचे विशालकाय पुलों से लोक उतना नहीं जुड़ता जितना ये पीपे के पुल- लहराती हुई नदी पर लहराते हुए पुल- हमें हमारी थाती, हमारी गंगा से जोड़ते हैं। 
Bridge-on-Gangesगाँव का लहरी मन गंगा की लहरों को इस लहराते हुए पुल से ही पार कर लेना चाहता है। यह पुल पूँजी के उस दलदल से दूर आम आदमी की स्वाभाविक जिंदगी के पैरोकार मालूम पड़ते हैं। कितना साफ अक्स दिखता है इस पुल में आम आदमी का। न जाने कितनी कड़ियों को जोड़ कर बनता है पुल पीपे का- रस्सियों के सहारे, और न जाने कितने ऐसे ही नियति-सम्भाव्यों से निर्मित होता है आम आदमी। पुल का उठना गिरना गंगा की लहरों की क्रीडाएं हैं और उठते, गिरते, लहराते इस पुल का बने, टिके रहना गंगा की इच्छा। गंगा का तनिक भ्रू-भंग इस पुल के अस्तित्व का नष्ट होना है। बहुत अलग नहीं है एक आदमी का वजूद । नियति की लहरों पे अठखेलियाँ करता न जाने कितनों का ह्रदय सूत्र क्षण में ही टूट कर नष्ट हो जाता है। मैं क्या कहूं अपने लिए । अज्ञेय की कविता की तरह- “मैं सेतु हूँ “।

तुमने मुझे एक घड़ी दी थी…

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time-flies-clock तुम्हें याद है…तुमने मुझे एक घड़ी दी थी-कुहुकने वाली घड़ी । मेरे हाँथों में देकर मुस्करा कर कहा था, “इससे वक्त का पता चलता है । यह तुम्हें मेरी याद दिलायेगी । हर शाम चार बजे कुहुक उठेगी । आज भी….चार ही न बज रहे हैं अभी…लगता है बाकी हैं कुछ सेकेण्ड ।” फिर तुम खिलखिलाकर हँस पड़े..और अचानक ही वह कुहुक उठी । आज वर्षों के अंतराल पर तुम्हें देखा है । घड़ी कुहुक उठी है । चार तो नहीं बजे …. फिर क्यों ? हर शाम चार बजे घड़ी कुहुकती रही , मैं तुम्हारी यादों में निमग्न सुध-बुध खोता रहा ….तुम्हारी वह अंतिम मुस्कान, और फिर तुम्हारी वह खिलखिलाहट ! दुर्निवार …! मैंने कई बार महसूस किया ढलती हुई शाम में घंटो सोचते, उग आये चंद्रमा की चाँदनी-सी विस्तरित होती तुम्हारी खिलखिलाहट के बारे में … सोचता रहा, सोचता रहा….सोच न सका, समझ न सका । आज वर्षों के अंतराल पर तुम मिले हो । घड़ी वैसे ही चल रही है….चार बजे कुहुक रही है । वर्षों तक समझ न पाया, पर आज शायद तुम्हारा इशारा समझ रहा हूँ , समझ पा रहा हूँ । क्षण को अक्षुण्ण बनाये रखने की अदम्य अभीप्सा मुझे सौंपकर तुमने समझा दिया कि ऐसे ही किसी क्षण को अनन्त समय तक अ-व्यतीत बनाये रखने की संघर्षमयता में न जान कितने अमूल्य क्षण बीतते चले जाते हैं । अनवरतता का मोह ही ऐसा है । तुम्हारी उदभावना न समझी थी उस वक्त । मैं सोच रहा हूँ, तुमने उस क्षण को जी लिया…. फिर चल पड़े । मैंने उस क्षण को पकड़ लिया…. अटक गया । उस विशेष काल को विराट-काल से घुला-मिला दिया तुमने, मैंने उसे बाँध लेने की कोशिश की । क्या मैं समझता न था कि मनुष्य घड़ियों से कब बँधा है ?  घड़ियाँ हमेशा कुहुकती रही हैं, हँसती रहीं हैं उस पर । यद्यपि हम दोनों ने उस क्षण को विराट से लय कर देना चाहा, शाश्वत बना देना चाहा….तुमने उस क्षण-विशेष को सततता के सौन्दर्य में परखा…मैंने उस क्षण-विशेष की साधना से उसे ही सतत बना देना चाहा । क्या ऐसा हो सकता है कि बरसों बाद भी मनुष्य, उसका कोई एक अनुभव, उसका बोध – सब गतिहीन होकर ठहरा रह जाय ! क्या यह स्थिरता है – प्रेम की स्थिरता ! घड़ी जो तुमने दी थी, वो तो चल रही थी…चार बजना, उसक कुहुकना गति की सूचना थी । क्षण अटका नहीं था चार पर, क्षण का अनुभव था, जो चार की सापेक्षता में स्थायी हो गया था । बस यूँ ही….

रंग-गंध-मिलन क्षणिक मादक

मिल गयी है फूल की वह  गंध

जाकर रंग से….

ढूँढ़ना मत अमरता,

सज गया है वह अनोखा राग

जाकर गीत पर…

खोजना मत सततता ।

 

रंग-गंध-मिलन क्षणिक मादक

वियोग की करुण कथा है,

राग तो आकाश में लय हो उठेगा

मनोवांछा की व्यथा है..।

सिन्धु में डूबा न मैं, डूबा नयन के नीर में

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आज की सुबह नए वर्ष के आने के ठीक पहले की सुबह है। मैं सोच रहा हूँ कि कल बहुत कुछ बदल जायेगा, कैलेंडर के पन्ने बदल जायेंगे, सबसे बढ़कर बदल जायेगी तारीख। मैं चाहता हूँ इस ठीक पहले की सुबह को अपनी आंखों में भर लूँ। क्या पता कल हो न हो?

मैं चादर में लिपटा अपने घर से बाहर निकला हूँ। सामने की गली में चपल चरण शिशु कुछ असुविधा भरी चाल सम्हाले चले जा रहे हैं। कोहरे से ढंके वातावरण में सामने दो बच्चों को देख रहा हूँ। इतनी सुबह एक बच्चा पंसारी की दुकान पर दाल की बोरी उझक उझक कर उठाते, सम करते कुछ बुदबुदा रहा है। दूसरा बच्चा चट्टी पर चुहल भरी भीड़ में खोया सा, चाय की प्याली और कुछ प्लेट खंगाल रहा है। मैं अपनी आँखें फेर लेता हूँ। कुछ दूर निकलता हूँ, देखता हूँ राजमिस्त्री के साथ देर शाम तक खट कर सोया बालू ढोने वाला बच्चा फ़िर बालू के टीले पर पहुँच गया है। मैं उदास हो जाता हूँ, तभी एक ठण्ड से कांपते अंगूठे पर ईंट के टुकड़े गिर जाने से रो रहे बच्चे को देख कर रुलाई छोट पड़ती है। याद आ जाते हैं राजेश जोशी-

“काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे ?
क्या सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आँगन
ख़त्म हो गए हैं इस दुनिया में ?”

मुझे रोना इसलिए आता है कि कुछ ही महीनों पहले बाल दिवस मनाया गया। बाल-श्रम रोकने के चटक विज्ञापन प्रकाशित हुए। बच्चों की खूबी का इतना बयान हुआ कि आकाश भर गया। पर क्या वास्तविकता की प्रश्नावली के उत्तर में रिक्त स्थान की पूर्ति हुई? क्या प्रश्न-चिह्न के आगे व्याकरण का विराम चिन्ह नहीं लग गया है? क्या होगा इस बचपन का? आह निकलती है कि कोई राह निकल जाती। क्या दृष्टिगत हो रहे इसी बचपन की ही मांग ‘पन्त’ ने की है –

“चित्रकार क्या करुणा करके मेरा भोला बालापन
मेरे यौवन के आँगन में चित्रित कर दोगे पावन?”

मैं घुलने लगता हूँ। वसुदेवनंदन कृष्ण ने घोर अंगरिस को जीवन रस की दीक्षा देते हुए छान्दोग्य उपनिषद् में कहा कि अपनी भूख, अपनी प्यास, अपने अकेलेपन को इतनी गहराई से अनुभव करना कि वह सबकी भूख, सबकी प्यास, सबका अकेलापन बन जाय। यही जीवन यज्ञ की दीक्षा है। इस जीवन का गुरु भी जीवन है।
मेरी सर्द साँसें गर्म होने लगती हैं। बच्चे की किलकारी गूंजने देना चाहता हूँ, क्रंदन नहीं। आदमी की भीड़ का आदमी जगना चाहिए। “Men are cruel but man is kind.” बच्चे को श्रम नहीं, प्रेम की जरूरत है। ‘भूल से, बेसुरेपन से, अक्षमता से भी आनंद पाने की शक्ति प्रेम में ही होती है’। हमें याद आ जानी चाहियें, बच्चे की-

“Ten little fingers, getting into trouble when at rest”,
“A combination of thousand questions, all asked at the same time”,
“An innocent calf like depth that breaks your heart when you want to scold.”

नए वर्ष के आगमन पर प्रार्थना करता हूँ सृष्टि के सिरमौर मानव से –

“होने पाये न किसी फूल को एहसास खिजाँ
ऐसा माहौल गुलिस्ताँ में बनाए रखना।”

मस्ती की लुकाठी लेकर चल रहा हूँ

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A leaf in front of Lumia
A leaf  (Photo credit: soul-nectar)
मैं यह सोचता हूँ बार-बार की क्यों मैं किसी जीवन-दर्शन की बैसाखी लेकर रोज घटते जाते अपने समय को शाश्वत बनाना चाहता हूँ? क्यों, यदि सब कुछ क्षणभंगुर है तो उसे अपनी मुट्ठियों में भर कर कालातीत कर देना चाहता हूँ? मैं क्यों लगातार बीत रहे इस समय से आक्रांत हूँ? मैं बार-बार सोचता हूँ, पर समझ नहीं पाता।
मैं समझ शायद इसलिए नहीं पाता कि समय के सत्य को नहीं समझा मैंने । मैंने पटरी नहीं बैठाई सामयिकता से। मुझे लगता है मैंने कुछ स्वप्न बुने, उनसे आदर्शों का खाका खींचा और भविष्य की अतिरंजित कल्पना में वर्तमान का सत्य मैंने भुला दिया। मैं समझ नहीं पाया कि सामयिक जीवन की राग-रंजित तात्कालिकता को क्षणवादी चेतना से मुक्त नहीं किया जा सकता।
मैंने चिट्ठे लिखने की शुरुआत अचानक ही कर दी थी । रवीश कुमार की ब्लॉग-वार्ता पढ़कर और रचनाकार के सापेक्ष उद्देश्य को देखकर मैंने चिट्ठाकारी से समाज को दिशा देने, साहित्य को समृद्ध करने का किंचित विचित्र भाव मन में पाल लिया था । मैंने यथार्थ को भुला दिया था कि संसाधनों के सीमित होने का दंश क्या मेरे इस अभिनव प्रयास (मेरे लिए) को नहीं झेलना पडेगा? कि क्या किसी-किसी तरह लिख कर मैं श्रेष्ठतम की अभिव्यक्ति कर पाउँगा? पर मैंने तात्कालिकता को क्षणवादी चेतना से मुक्त कर शाश्वत जीवन-बिन्दु पर स्थापित करने की चेष्टा की थी ।
और तब, जब पिछले चार दिन लिखा नहीं पाया, कहीं टिप्पणी नही दी- तो लगा कि मैंने अपने जीवन के यथार्थ को अस्वीकार करने का कछुआ-धर्म निभाया था। उस कस्बे से जिसमें बिजली आठ घंटे आती हो-वह भी अनियमित; उस कस्बे से जिसमें एकमात्र इन्टरनेट सेवा प्रदाता बी०एस०एन०एल० बार-बार अपनी आँखें बंद कर लेता हो; उस परिवार का सदस्य होकर जिसमें जीवन व्यतीत कर लेने की ही सामर्थ्य विकसित हो पायी हो, और वैसे व्यक्ति होकर जो स्वतः में आत्मनिर्भर बनने की और प्रयत्नशील हो- ब्लॉग्गिंग करना मुश्किल-ए-जान है ।
आज जब यह प्रविष्टि लिख रहा हूँ, तो एक संतोष-सा मालूम पड़ रहा है, क्योंकि पिछले चार दिनों के अनुभवों से मेरे प्रथित जीवन-दर्शन की वैशाखी मेरे हाथों से फिसल गयी है। पर मैंने अपने स्वप्न नहीं खोये, अपनी रीति नहीं बदली। मैं भी अब उसी मस्त की घर फूंक मस्ती की लुकाठी लेकर चल रहा हूँ जो बीत रहे हर क्षण को ओढ़ सकता है , बिछा सकता है ।
मैं समझ गया हूँ कि मेरी सार्थकता व्यतीत में नहीं है, भविष्य में भी नहीं। इसलिए सामयिकता को जितना भर सकूं उतना बाहों में भर कर, जितना प्यार दे सकूं उतना प्यार देकर जीने योग्य ही नहीं, सुंदर बनाना होगा। यह लेखन, यह साहित्य इसी प्रयत्न के परिणाम हैं।

तुम भी उबर गये पथरीली राह से

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तुम अब कालेज कभी नहीं आओगे। तुम अब इस सड़क, उस नुक्कड़, वहाँ की दुकान पर भी नहीं दिखोगे। तुम छोड़ कर यह भीड़ कहीं गहरे एकान्त में चले गये हो। पता नहीं वह सुदूर क्षेत्र कैसा है? अन्धकारमय या सर्वत्र प्रकाशित?

तुम कल तक मेरी कक्षा के विद्यार्थी थे, वही तीसरी बेंच पर बैठे हुए। टुक-टुक देखते, निहारते भर आँख मुझे- अब तुम वहाँ नहीं रहोगे। मेरे कहे गये हर एक शब्द को अपनी जीभ से चखते, स्वादते, तृप्त होते मैं देखता था तुम्हें। मैं निरखता था कि मेरा कहा एक-एक शब्द तुम्हारी आत्मा की थाती बन जाता था।
मैं साहित्य पढ़ाता था तुम्हें। तुम्हें ही क्यों, पूरी कक्षा को। पर बार-बार तुम ही खयाल में क्यों आ रहे हो? क्योंकि तुमने मेरी कही बातें सच मान लीं। कमबख्त साहित्य भी प्रेम, सौन्दर्य, श्रृंगार की चाकरी करता है कक्षाओं में, पाठ्यक्रमों में। कविता पढ़ाते वक्त देखता था तुम्हें – तुम्हारी अनुभूतियों के प्रत्यक्षीकरण के साथ। भावजगत की जितनी स्वतंत्रता मेरी कविता का कवि लेता उससे कहीं ज्यादा स्वतंत्र तुम अपनी अनुभूतियों में हो जाया करते थे। तुम्हारी तल्लीनता मुझे भी तल्लीन कर देती थी। पर अब तुम नहीं रहोगे मेरे एक एक शब्द को पीने के लिये, फ़िर कहीं ठहर न जाय मेरा यह शब्द-प्रवाह।

मैं क्या जानता था कि इतना गम्भीर हो जाते हो तुम इस भाव-यात्रा में। कविता की रहनुमाई का जीवन गढ़ लिया है तुमने – नहीं पता था। मैने उस दिन कविताओं का अर्थ बताते, प्रेम में स्व-विसर्जन की भूमिका तुम्हारे ही लिये गढ़ी थी, नहीं जानता था। काश समझ पाता कि ‘जियेंगे तो साथ, मरेंगे तो साथ’ का सूत्र-सत्य बहुत गहराई से आत्मसात कर लिया था तुमने उस दिन।

तुमने क्यों नहीं समझा कि साहित्य मनुष्य के सौन्दर्यबोध, कर्म और विचार का समुच्चय है। ज्ञान, क्रिया और ईच्छा की त्रिवेणी साहित्य में ऐसा संगम निर्मित करती है जिसे जीवन कहा जा सकता है। मैं शायद समझा न सका तुम्हें कि केवल भाव-भावना जीवन का निर्माण नहीं करती। कर्म और भाव दोनों मिलकर मानव-जीवन का निर्माण करते हैं।

मेरे साहित्य के विद्यार्थी! जीवन का ऐसा निषेध? साहित्य का तो उद्देश्य ही है व्यक्ति-चेतना का रूपायन और व्यष्टि का उन्नयन। इससे प्रभावित, निर्मित होता है जीवन और फ़िर बनती है जीवन के प्रति आकांक्षा। यह जीवन समाज का प्रतिरोध भी हो सकता है और प्रस्ताव भी। मेरे प्यारे! तुम जान नहीं सके कि अनुकूलता या विपरीतता उतनी महत्वपूर्ण नहीं जितनी यह कि जीवन में श्रद्धा-भाव की स्वीकृति हो।

कल अखबार में पढ़ा, तुम इस जीवन से विरम गये। पकड़कर उसका हाथ, जिससे साथ जीने-मरने की कसमें खायीं थीं, रेल की पटरी पर मुँह-अँधेरे ही सो गये थे तुम। फ़िर ट्रेन आयी, गुजर गयी। तुम दोनों भी उबर गये पथरीली राह से।

मेरा अकेलापन और रचना का सत्य-सूत्र

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New-born leaves
मैं लिखने बैठता हूँ, यही सोचकर की मैं एक परम्परा का वाहक होकर लिख रहा हूँ। वह परम्परा कृत्रिमता से दूर सर्जना का विशाल क्षितिज रचने की परम्परा है जिसमें लेखक अपनी अनुभूतियाँ, अपने मनोभाव बेझिझक, बिना किसी श्रम और संकोच के प्रकट करता है। मैं उसी स्वाभाविकता की खोज में अपने को निमग्न पाता हूँ जिसमें रचना विशिष्ट संप्रेषण की विशिष्ट स्थिति में पहुँच जाती है, भाव का तादात्म्य कर लेती है।
इसलिए मैं अकेला होकर रचने बैठता हूँ कि अपने इस एकांत के गह्वर से अभिव्यक्ति की रोशनी की किरण समेट लाऊं कि भावना के जगत का बहुत सारा रहस्य अनावृत हो जाय। पर मैं देखता हूँ कि मेरी यथार्थगत जड़ता मेरी भावना के उत्साह और रचना-प्रक्रिया के मौन आमंत्रण के जादू को क्षण भर में तोड़ डालती है। मैं यह भी देखता हूँ कि मेरी एकान्तिक कल्पना और अनभिव्यक्ति के अन्तराल में कई चेहरे अचानक सामने आ जाते हैं, फ़िर अपने आप को नष्ट करते रहते हैं।
मैं छटपटा-छटपटा कर अपनी रचना का सत्य-सूत्र खोजना चाहता हूँ। मैं इस सत्य को पाने के लिए बेचैन हूँ-उसी सत्य को जिसमें सब होने की सार्थकता है। जहाँ सारी बेचैनी, सारी घबराहट आकर समाप्त हो जाते है, जिसको ऋचाएं कहती हैं कि वह पूर्ण है, सम्पूर्ण है-

“सर्वं खत्विदं ब्रह्म ”

मैं रचना के इसी सत्य से अपना साक्षात्कार चाहता हूँ, पर साथ ही मैं यह भी आभास करता हूँ कि मेरा यह लघु मानस इतना विराट सत्य कैसे खोज सकेगा, प्राप्त कर सकेगा? मेरे इस मानव-मन की सीमायें हैं, और उनका अतिक्रमण कभी भी सम्भव नहीं हो सकेगा। फलतः मेरा सत्य खंड-सत्य ही हो सकता है, पूर्ण सत्य नहीं।
तो यह सत्य मेरे लिए रहस्य बन कर खडा है। यह सत्य रहस्य है, इसलिए अपरिचित और अकल्पित मेरे कण-कण को ओत-प्रोत किए है। वह निकटतम और अन्यतम है।
मुझे धीरे-धीरे यह लगने लगा है कि जो अबूझ की पीड़ा और मेरी जीवन-कथा की व्यथा है, उसी में यह रहस्य बोलता है।